आचार्य प्रशांत आपके बेहतर भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं
लेख
वो कहते हैं धर्म ने बर्बाद किया भारत को
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, इस देश में हज़ारों सालों से अध्यात्म की परम्परा रही है, फिर भी हज़ारों सालों से यह देश लगातार अनेक क्षुद्र चुनौतियों और विषमताओं से जूझता रहा है, क्या कारण है?

आचार्य प्रशांत: आप में से कौन-कौन लोग अपने घर की नियमित रूप से सफ़ाई करते हैं?

(नियमित रूप से सफ़ाई करने वाले श्रोता अपना हाँथ उठाते हैं)

(कुछ श्रोतगण अपना हाथ नहीं उठाते हैं) इतने लोग हैं जो नहीं करते? चलिए जो लोग करते हैं, उन्हीं का उदाहरण लेकर आगे बढ़ते हैं। कोई आपसे कहे कि इतनी सफ़ाई करते हो फिर भी तुम्हारे घर में कचरा क्यों आ जाता है, तो क्या जवाब देंगे? क्योंकि प्रकृति का काम है कचरा फैलाना। आप अपना घर ताला बंद करके चले जाइए। घर में कोई है अब? तो इंसान तो अब है नहीं कि कोई करतूत करेगा। घर में आप कोई अपना पालतू पशु-पक्षी भी मत छोड़िए कि इसने गंदा कर दिया होगा, और दो महीने बाद लौटिए, घर कैसा मिलता है? यहाँ तक कि जो बर्तन आप रसोई में धो कर रख कर गए होते हैं, आप उनका इस्तेमाल अगर एक महीने बाद करना चाहें, तो क्या कर सकते हैं? उनको दोबारा धोना पड़ता है, है ना? ये गंदा किसने कर दिया? प्रकृति ने। प्रकृति का काम है धूल-धूसरित कर देना।

अब प्रश्नकर्ता पूछ रहे हैं कि अध्यात्म का फ़ायदा क्या, धर्म का फ़ायदा क्या—इतने दिनों से अध्यात्म है, धर्म है, फिर भी इतनी गंदगी है। भारत के संदर्भ में पूछा है या विश्व के?

प्र: इस देश के।

आचार्य प्रशांत: इस देश के। भारत में इतने तरीके की कुरीतियाँ रही हैं, अंधविश्वास भी रहे, अन्याय-शोषण भी रहा, गुलामी भी रही, दरिद्रता भी रही, तो फिर अध्यात्म का फ़ायदा क्या?

सवाल ये है कि अगर अध्यात्म नहीं होता, तब क्या होता? कोई कहे कि तुमने इतनी सफ़ाई करी, फिर भी सफ़ाई करनी पड़ती है, तो आप क्या कहेंगे? कि भाई, इतनी सफ़ाई करी इसलिए गनीमत है कि बस थोड़ी ही और करनी पड़ती है। अगर एकदम ही नहीं करी होती तो सोचो क्या हालत होती!

वास्तव में हम भूल जाते हैं कि हम हैं कौन, और हमारा धर्म से रिश्ता क्या है। अब बहुत लोग हैं आजकल जिनका ऐसा विचार है कि हम तो बड़े अच्छे लोग हैं। वो मानवता में यकीन रखते हैं। वो कहते हैं कि हमारा धर्म है इंसानियत। वो कहते हैं कि हम तो बड़े अच्छे लोग हैं, हम तो पैदा ही अच्छे होते हैं, वो तो धर्म ने हमको बिगाड़ दिया। उनका ख्याल है कि दुनिया की बहुत बड़ी-बड़ी समस्याओं का कारण धर्म है और वो बड़ा विचार करके, बड़ी गंभीरता से बोलते हैं। ऐसे बहुत लोग होंगे, आप भी जानते होंगे जो कहते हैं कि, “धर्म की ज़रुरत क्या है? धर्म से ही तो सब गड़बड़ हो रही है दुनिया में। धर्म को ही हटा दो, सब गड़बड़ियाँ ठीक हो जाएंगी।" और ऐसे अनाड़ी लोग अक्सर बुद्धिजीवी वर्गों में ज़्यादा पाए जाते हैं। जो बुद्धिजीवी हो, वही ऐसी मूर्खता की बात कर सकता है। इस बात को करने वाला कभी ये समझता ही नहीं कि वो है कौन । और अभी मैं बहुत गूढ़ किसी आध्यात्मिक रहस्य की बात नहीं कर रहा हूँ, मैं बहुत ज़मीनी बात कर रहा हूँ। हम कौन हैं, हम जानते भी हैं क्या? हम कहते हैं कि हम तो बड़े दूध के धुले थे, धर्म ने हमें आकर ख़राब कर दिया। ठीक है साहब, एक प्रयोग करके देख लिजिए: या तो किसी बच्चे को जंगल में छोड़ दीजिए इस तरीके से कि उसकी बस शारीरिक आवश्यकताओं की किसी तरह पूर्ति होती रहे। बच्चा मरेगा नहीं। उसको आप किसी तरह का कोई संस्कार मत दीजिए, धार्मिक संस्कार भी मत दीजिए, फिर देखिए क्या होता है। या फिर आप किसी तरीके से कुछ कृत्रिम करके, कहीं ज़ोर ज़बरदस्ती करके ऐसे समाज की रचना कर लिजिए जिसको धर्म की कोई सीख ही ना दी जाए, और फिर देखिए वो समाज कैसा होता है।

हम भूल ही जाते हैं कि हम जंगली जानवर हैं। हम भूल ही जाते हैं कि हम पशु मात्र हैं। कई लोगों का अपने बारे में बड़ा गरिमापूर्ण ख्याल है। वो सोचते हैं कि हम तो पैदा ही होते हैं बड़े पाक-साफ; हम तो पैदा ही होते हैं बड़े समझदार। वो तो बाद में धर्म आकर के हमको मैला-कुचैला, कंडीशंड कर देता है। साहब, हम उतने ही जंगली हैं जितना जंगल का कोई जानवर। अंतर बस ये है कि हम जंगल के जानवर से कई ज़्यादा खतरनाक हैं क्योंकि अपनी जंगली वृत्तियों को रूप, आकार, अभिव्यक्ति देने के लिए हमारे पास बुद्धि-रूपी हथियार है। वृत्ति हमारी बिल्कुल वही है जो जंगली अजगर की है, सांप की है, किसी भी हिंसक पशु, किसी दरिंदे की है। बस वो ज़रा कम खतरनाक हैं क्योंकि उनके पास बुद्धि उतनी ज़्यादा नहीं है। उनको लालच होता भी है तो इतना ही कि किसी को मार-काट के अभी खा जाओ। लालच उनका देह तक सीमित है। हमारे पास क्योंकि बुद्धि है तो इसलिए हमारे लालच की कोई सीमा नहीं। हम बहुत दूर का लालच करते हैं। ठीक वही मूल शक्तियाँ हैं।

मैं बार-बार 'वृत्ति' कहूँगा, आप अटक जाते हैं। आप कहते हैं "वृत्ति माने क्या होता है?”, तो इसलिए मैं कह रहा हूँ ‘ताकत’। ठीक वही मूलभूत ताकत जो जंगल के किसी जानवर को संचालित करती है, वो हमें भी संचालित करती है। हमें लगता भर है कि हमारे दस-पचास-सौ अलग-अलग तरह के उद्देश्य हैं। वास्तव में हमारे उद्देश्य भी वही हैं जो किसी शेर-चीते-गीदड़-सियार के होते हैं। जानते हैं मूल ताकत क्या है प्रकृति की? - कामवासना और शरीर का संरक्षण। इसी का खेल जंगल में भी चलता है और इसी का खेल हमारे घरों में भी चलता है। हम कुछ भी कर रहे हों, उसके पीछे छुपी हुई जो हमारी मनसा होती है, वो मनसा जंगली ही होती है। वो मनसा या तो ये होती है कि मुझे तमाम तरीके के सुख मिल जाऐं, या वो मनसा ये होती है कि किसी तरीके से मुझे अपनी जेनेटिक सामग्री को आगे बढ़ाने का कोई तरीका मिल जाए *(कामवासना)*। आप समझ रहे हैं? इसी मनसा के तमाम तरीके के अलग-अलग नाम होते हैं, अलग-अलग व्यवस्थाएँ होती हैं, और ये मनसा ख़ासतौर पर उन लोगों को पूरी तरह संचालित करती है जिनका 'धर्म' से कोई लेना देना नहीं।

आदमी अगर अपनी ही बुद्धि का शिकार नहीं हो गया है आज तक, अगर आदमी किसी तरीके से थोड़ी भी शांति अनुभव कर पाता है, अगर आदमी, आदमी का ही गला काटकर उसका खून नहीं पी रहा है, अगर आदमी में किसी भी तरह के उच्चतर मूल्य हैं, तो वो इसलिए नहीं हैं कि आप आदमी की देह लेकर पैदा हुए हो, वो इसलिए है कि आपके ऊपर संतों और ऋषियों का प्रभाव है। ये बात कृपा करके स्वीकारें। और उन लोगों ने, जिन्होंने आपको जानवर से इंसान बनाया, उनके प्रति ज़रा सम्मान रखा करें। इस प्रकार की अनादरपूर्ण बातें करने से बचें कि “धर्म की ज़रूरत क्या है? हम तो 'धर्म' के बिना ही खुश हैं!”

एक बात बताना, तुम भूखे होते हो लेकिन फिर भी कोशिश करते हो कि किसी दूसरे की थाली का छीनकर ना खाजाओ, करते हो कि नहीं? ये तुम्हें किसने सिखाया, बताओ? जंगल में जाकर के देखो, वहाँ क्या होता है, दो भूखे पशु हों और उनमें से एक भूखा पशु हड्डी चबा रहा हो, दूसरा वाला क्या करेगा? उसे छीनकर भाग जाएगा। हैं तो हम भी जंगली, हमें भी यह करना चाहिए था—एक आदमी भूखा है तो वो दूसरे की रोटी लेकर भाग जाए। हम करते भी हैं ऐसा, पर ज़रा कम करते हैं। ज़हाँ तक हो सकता है, बचते हैं ऐसा करने से।

ऐसा करने से क्यों बचते हैं? हमें किसने सिखाया, बताओ? विज्ञान ने सिखाया? गणित ने सिखाया? बोलो, किसने सिखाया तुम्हें? पर इन बातों को तो तुम ऐसा मान लेते हो—टेकन फ़ॉर ग्रांटड। तुम कहते हो, "नहीं, ये तो इंसानियत का तकाज़ा है न।"

ये इंसानियत क्या चीज़ होती है, भई? इंसानियत क्या चीज़ होती है? बच्चे में इंसानियत कहाँ से आ गई? तुम बच्चे को धर्म ना सिखाओ, फिर देखना उसकी इंसानियत। आदमी आदमी के साथ बिल्कुल वही व्यवहार करेगा जो जानवर जानवर के साथ करता है। और मैं कह रहा हूँ जानवर जानवर के साथ कम बुरा व्यवहार करता है, आदमी, आदमी के साथ दरिंदों से गहरी दरिंदगी करेगा, क्योंकि हमारे पास क्या है? बुद्धि। हमारे पास क्या है? एक तड़पती हुई 'बेचैन छटपटाती चेतना', जो कोई सीमाएँ नहीं मानती। जो प्रकृति की सीमाएँ भी नहीं मानती। जानवर तो प्रकृति में अगर दूसरे को मारता है तो उतना ही मारता है जितनी उसकी प्राकृतिक ज़रुरत है, ठीक? ज़ब आदमी मारने पर आता है तब ये नहीं देखता है कि प्रकृतिगत ज़रुरत कितनी है, बस मारता है, अंधाधुंध मारता है। आदमी को इस अंधाधुंध दरिंदगी से और हिंसा से किसने रोक कर रखा है आज तक, बताओ? पर साहब लोगों को ये बात समझ में ही नहीं आती, और ख़ास तौर पर जो नई पीढ़ी निकल रही है, उसको तो ये लगता है कि 'धर्म' बिल्कुल ही व्यर्थ चीज़ है।

धर्म व्यर्थ चीज़ नहीं है। धर्म ही एकमात्र समाधान है, खासकर आजकल की समस्याओं का। अध्यात्म के अलावा और कोई समाधान नहीं है विश्व के सामने जो आज़ बड़ी-से-बड़ी समस्याएँ खड़ी हैं उनका। दुनिया के सामने जो सबसे बड़ी समस्याएँ खड़ी हैं वो हैं उपभोग की। चाहे बायोडाइवर्सिटी लॉस (जैव विविधता हानि) , क्लाइमेट कैटॉस्ट्रफ़ी (जलवायु तबाही) हो, इनका मूल कारण क्या है? उपभोग। वातावरण में जितनी भी ग्रीन हाउस गैसें आ रही हैं–मीथेन हो, कार्बन डाइऑक्साइड हो—कहाँ से आती हैं? अपने आप ही आ जाती हैं? नहीं। ये हमारे उपभोग से आती हैं, खपत से आती हैं। तुम्हें कौन सिखाएगा कि भोग कम करो? भोग से शांति नहीं मिलती, ये तुम्हें विज्ञान सिखाएगा क्या? बोलो। भोग से शांति नहीं मिलेगी, ये बात कौन सीखाएगा? विज्ञान? दूसरे से ईर्ष्या मत रखो, ये बात तुमको विज्ञान सिखाएगा, या गणित, रसायन शास्त्र, भौतिकी, ये सिखाएंगे? बोलो! या ये बात तुमको संविधान सिखाएगा? ये बात तुमको धर्मशास्त्र ही सीखाएंगे ना?

ऐसे भी लोग घूम रहे हैं जो कह रहे हैं कि देखो, दो चीजें चाहिए: तकनीकी प्रगति के लिए विज्ञान की किताबें और सामाजिक प्रगति के लिए संविधान। 'प्रेम' कौन सिखाएगा तुम्हें? संविधान के किस अनुच्छेद में 'प्रेम' सिखाया गया है, बताओ मुझे? जो लोग कहते हैं कि “मेरी गीता मेरा क़ुरान, सब कुछ है संविधान,” मैं पूछ रहा हूँ कि प्रेम कौन सीखाएगा? बताओ किस आर्टिकल में, किस डाइरेक्टिव प्रिंसिपल में, कहाँ लिखा हुआ है प्रेम? और कौन करुणा सिखाएगा? और एक बात ध्यान रखना, गर्भ से बच्चा ना प्रेम लेकर पैदा होता है, ना करुणा, ये सिखानी पड़ती हैं। इसलिए धर्म चाहिए। खासतौर पर जो इंसानियतवादी लोग हैं, मानवतावादी लोग हैं, मैं उनसे कह रहा हूँ कि कुछ नहीं होती मानवता या इंसानियत— इंसान को इंसान बनाता है धर्म।

ये बात हम भूल गए हैं, हम बड़े कृतघ्न, अकृतज्ञ लोग हैं। दो वैज्ञानिक भी एक दूसरे का गला ना काटें, ये उन्हें कौन सिखाएगा, बताओ? बोलो, सापेक्षता का सिद्धांत सिखाएगा? दो वैज्ञानिक ही एक दूसरे का गला ना काटें, ये सिखाएगा कौन? और उनके पास बहुत कारण हैं एक दूसरे का गला काट देने के—प्रतिस्पर्धा हो सकती है, ईर्ष्या हो सकती है, राष्ट्रीय सरोकार हो सकते हैं, जातीय सरोकार हो सकते हैं, धार्मिक प्रतिद्वंदिता हो सकती है, बहुत कारण हो सकते हैं, व्यवसायिक दौड़ हो सकती है; कौन आगे निकलेगा, इस प्रयोगशाला का प्रमुख कौन बनेगा, क्यों न एक-दूसरे का वो गला काट दें?

मैं बहुत-बहुत कद्र करता हूँ विज्ञान की और जो लोग विज्ञान का अपमान करते हैं वो मुझसे बहुत खरी-खोटी सुनते हैं, लेकिन मैं फिर भी पूछ रहा हूँ, किसने पढ़ाया “न्यूटन का करुणा का नियम”? ग्रहों की गति के केपलर नियम तो आपने पढ़े हैं, करुणा का नियम भी पढ़ा है क्या? तुम खारिज कर दो वेदांत को, उपनिषदों को, गीता को, संतों की वाणी को, बाइबल को, क़ुरान को, तुम बिल्कुल उठाकर कचरे में डाल दो, अब मुझे बता तो दो कि तुम्हें करुणा कौन सिखाएगा, और बिना करुणा के जियोगे कैसे? बिना प्रेम के क्या हो जाओगे?

प्र: आचार्य जी, धर्म के जिस पराकाष्ठा के विषय में अभी आपने बताया, बहुत सुंदर है, उसका उद्देश्य यह है कि मनुष्य बस जानवर की तरह ही ना मर जाए। पर मानव इतिहास ने यह देखा है कि धार्मिक मुद्दों पर, धार्मिक मतभेदों के कारण, मनुष्य के मन में इतनी छोटी सोच, इतनी संकुचित विचारधारा बनी है, जितनी हिंसा और जितना ख़ून-ख़राबा धर्म के नाम पर हुआ है, उतना किसी और विषय पर नहीं हुआ है, चाहे वो भारत-पाकिस्तान के बीच में युद्ध हो, इस्राईल-पलेस्टाइन में हो, अफ़गानिस्तान-ईराक की लड़ाई हो।

आचार्य प्रशांत: मेरे मालिक! आप कीचड़ में नहाए बैठे हैं, ठीक? और कीचड़ में ऐसे नहाए बैठे हैं कि नख-शिख, उपर से लेकर नीचे तक कीचड़ ही कीचड़ है। आँखों में भी कीचड़ भरा हुआ है, दिखाई तो पड़ नहीं रहा, कान में भी पड़ा है, सुनाई भी नहीं पड़ रहा, और मैं आपको पानी दूँ, साफ़ पानी, बिल्कुल निर्मल ज़ल, कि लो, धो लो ख़ुद को। और उससे आप अपने आप को थोड़ा धोएँ, ज़रा सी आपकी आँख खुले, बिल्कुल ज़रा सी, और आप देखें नीचे पानी। कौन-सा पानी? जिससे अभी आपने आपने आप को धोया है। अब धोया है तो सारा पानी बह रहा है। और आप कहें कि, “इतना गंदा पानी दिया था मुझे? दुश्मन हो तुम मेरे! तुम्हारी वज़ह से मैं गंदा हो गया। अब मुझे समझ में आ रहा है कि मुझ पर इतना कीचड़ क्यों लगा हुआ है। तुमने ही तो इतना गंदा पानी दिया था मुझको।” कुछ बात समझ में आ रही है?

हम इतने गंदे लोग हैं कि हमें निर्मल जल, स्वच्छ धर्म भी दिया गया तो हमने उसको गंदा कर दिया और तुर्रा ये है कि हम इल्ज़ाम लगा रहे हैं कि हमें धर्म से गंदा किया गया था, बल्कि धर्म ने हमें गंदा कर दिया है। कल्पना करो ना, ये बैठे हुए हैं बिल्कुल कीचड़ में लथपथ हों, और मैं यहाँ से पानी दूँ, बिल्कुल साफ़ पानी कि ये साफ़ हो जाऐं। तो आँख खुले थोड़ी और अपने आसपास देखें तो कैसा पानी दिखाई देगा? और वो पानी गंदा हुआ क्यों है? क्योंकि तुम गंदे हो। और तुम इल्ज़ाम क्या लगा रहे हो? हम पर गंदा पानी डाला इसलिए तो हम गंदे हैं, वरना हम गंदे कहाँ थे? हम तो देवता हैं, हम तो माँ के गर्भ से बिल्कुल देवता पैदा हुए थे, ये तो धर्म नामक गंदा पानी हम पर डाल दिया गया तो देखो हम कीचड़ से इतने लथपथ दिखाई दे रहे हैं। हम भूल ही जाते हैं कि हम कौन हैं

हम धर्म के नाम पर लड़ लेते हैं क्योंकि हमें लड़ना है भाई! हमें क्यों लड़ना है? क्योंकि बाहर हमारे वो खरगोश बैठे हुए हैं, वो भी लड़ लेते हैं। जानते हो अभी क्या हुआ है? तीन छोटे ज़रा-ज़रा से इतने से खरगोशों के शावक पैदा हुए। इतने-इतने हैं वो, आधी हथेली पर आ जाएँ। आठ-दस खरगोश और हैं बड़े-बड़े, उनमें से किसी एक ने एक छोटे बच्चे को मार डाला। हम वैसे हैं। भूल ही जाते हो कि हम कौन हैं । जानते हो क्यों मार डाला उस छोटे बच्चे को? क्योंकि हम ऐसे ही हैं। प्रकृति ऐसी ही होती है। प्रकृति ऐसी ही होती है, उसमें करुणा नहीं होती। जितने कम लोग रहेंगे खाने को उतना ज़्यादा मिलेगा। और अगर तादात बढ़ गई तो खाना बट जाएगा। तो उन्होंने कितना वो छोटा-सा बच्चा था, उसको मार डाला। फिर दो बचे हुए थे, उनको ले जा कर अभी अलग रखा हुआ है। हम ऐसे हैं।

हम धर्म के नाम पर लड़ेंगे नहीं तो क्या करेंगे, बोलो? लेकिन इसका क्या ये मतलब है कि हमें धर्म ने लड़वाया है? हमें धर्म ने नहीं लड़वाया, हमें हमारी वृत्तियों ने लड़वाया है। हमें हमारी देह ने लड़वाया है। हमारे भीतर शैतान बैठा है जो हमें लड़वाता है। और वो शैतान इतना ताकतवर है कि वो कभी-कभी धर्म पर भी हावी हो जाता है। हम उस शैतान का ज़िक्र ही नहीं करना चाहते क्योंकि अहंकार को ठेस लगती है ना ये मानते हुए कि हम ही शैतान हैं? उस शैतान का तो हम ज़िक्र ही नहीं करना चाहते। हम कहते हैं, “देखो, धर्म की वजह से बड़ा दुनिया में उपद्रव है। सब आतंकवाद धर्म के कारण है। ये सब धर्म के कारण हैं। ज़रा बताना कौन-सी धार्मिक किताब है जो तुम्हारे उपयोग की ना हो, बशर्ते तुम उसे ठीक से पढ़ना जानो? ठीक से पढ़ना नहीं जानते तो फिर तो तुम किसी भी किताब को उठाकर कह सकते हो कि देखिए इसमें ये लिखा है, वो लिखा है। और भूलना नहीं वो सब किताबें एक समय में, एक संदर्भ में रची गई थीं। उनमें कुछ बातें निश्चित रूप से ऐसी हैं जो बस उस संदर्भ में, उस समय में उपयोगी थीं। उन बातों को आज महत्व देने की ज़रुरत नहीं है। लेकिन सब किताबों में वो बातें हैं जो जीवनदायिनी हैं; जिनके बिना जी नहीं सकते तुम।

आइंदा कभी भी धर्म पर तोहमत लगाने से पहले ये उदाहरण याद रख लेना कि कीचड़ से सने बैठे हैं अपने ही करतूत के कारण, क्योंकि हम हैं ही कीचड़ के पुजारी। फिर कोई आप पर निर्मल गंगाजल भी डाले, तो आप अपनी गंदगी का इल्ज़ाम किस पर लगा रहे हैं? गंगाजल पर, कि गंगाज़ल ने ही तो गंदा कर दिया हमको।

धर्म ना होता तो क्या होता? कभी इसकी भी तो कल्पना कर लो, और सच्ची कल्पना करना। ये मत कह देना कि धर्म नहीं होता तो हम सब बहुत वैज्ञानिक तरीके से जी रहे होते, हम बड़े तर्कसंगत लोग होते। ये मूर्ख़ता की बात है। धर्म में निश्चित रुप से आज अशुद्धियाँ हैं, वो अशुद्धियाँ मुझे बताना धर्म के संस्थापकों ने डाली हैं या तुमने डाली हैं? जल्दी बोलो। सनातन धर्म में जाति-प्रथा एक अशुद्धि है, मुझे बताना, वो अशुद्धि उपनिषदों ने दी है क्या तुमको या तुम्हारे अपने निजी स्वार्थों के कारण आई है, बोलो? आदमी को आदमी का शोषण करना है किसी भी तरीके से क्योंकि प्रकृति हमे शोषण सिखाती है, और वो शोषण हम हर तरीके से करते हैं। मुझे बताना कौन-सा धर्म है जिसमें जात नहीं चलती? कौन-सा धर्म है जिसमें ज़बरदस्त जातिप्रथा नहीं है? ईसाइयत में नहीं है? इस्लाम में नहीं है? इसलिए है क्योंकि आदमी शोषणकारी होता ही होता है। उसको जो मिलता है, वो उसी चीज़ का शोषण करता है।

ये शोषण धर्म नहीं सिखा रहा। बल्कि धर्म तो सिखा रहा है कि शोषण मत करो। धर्म तो दया, स्नेह, अहिंसा सिखा रहा है। शोषण तुम्हारी अपनी निजी चीज़ है, भई। इसीलिए फ़र्क नहीं पड़ता कि दुनिया का कौन-सा कोना है, फ़र्क नहीं पड़ता कि समय की कौन-सी घड़ी है, फ़र्क नहीं पड़ता कि कौन-सा समुदाय है, हर जगह आतातायी रहे हैं। हर जगह ऐसे लोग रहे हैं जिन्होंने दूसरे के उपर ज़ुल्म करे हैं। उन ज़ुल्मों का ज़िम्मेदार अपने आप को मानो, धर्म को नहीं। धर्म तो उन ज़ुल्मों के खिलाफ़ खड़े होने का विज्ञान है। ये उल्टी गंगा बहा रहे हैं। बात समझ में आ रही है कुछ?

आप इतने लोग इस व्यक्ति के सामने बैठकर क्यों सुन रहे हो? मुझे बताओ, मैं आपको क्या दे दूँगा? यहाँ पर रुपया पा रहे हो? पैसा पा रहे हो? खाना-कपड़ा-लत्ता-ज़मीन-जायदाद पा रहे हो? बल्कि पैसा तो खर्च हुआ है यहाँ आने में, ठीक? क्यों सुन रहे हो? ये किसने सिखाया कि बोध का मूल्य होता है? जंगल ने सिखाया? शरीर ने सिखाया? प्रकृति ने सिखाया? कहो!

प्रकृति, मैं बताता हूँ अब आप को क्या सिखा रही है: ठीक इस वक्त आप में से बहुत लोग बैठे होंगे जो सोच रहे हों, “अरे! ग्यारह बज रहा है, घर जाना है,” प्रकृति ये सिखा रही है क्योंकि जितने जंगल के जानवर हैं, वो सब क्या करते हैं? रात हुई नहीं कि अपने-अपने घोंसलों में दुबक जाते हैं, गुफाओं में घुस जाते हैं। वो जंगल हमारे भीतर भी बैठा हुआ है; तो प्रकृति तो आपसे यही चाहती है कि आप मेरी बात ना सुनें, लेकिन फिर भी आप मेरी बात सुन रहे हो क्योंकि आप पर अभी कुछ धार्मिक प्रभाव है। और आप में से ऐसे भी लोग हो सकते हैं जिन पर धार्मिक प्रभाव ना हो, वो हो सकता है अभी बीच में दो-चार लोग उठकर भी चल दें। बहुत लोग ऐसे होंगे जो आए ही नहीं होंगे ये सोच कर कि, “अरे! बड़ी देर-देर तक बोलते हैं, आधी रात कर देते हैं, नहीं जाएंगे।” कुछ समझ में आ रही है बात?

हमारे जीवन में जो कुछ भी सुंदरतम है, श्रेष्ठतम है, उच्चतम है, वो हमें धर्म से मिला है; हमारे जीवन में जो कुछ भी न्यूनतम है, निकृष्टतम है, वो हमें स्वयं से मिला है; तो जब भी देखो आदमी की फटेहाली और बर्बादी, उसका ज़िम्मेदार अपने आप को मानो। इंसान पैदा हुए हो, जो कि अपने आप मे एक दंड होता है। इंसान पैदा हुए हो माने भीतर तमाम तरह की गंदगियाँ, वृत्तियाँ, विकार बैठे हुए हैं।

अपनी सब बर्बादियों का कारण स्वयं को मानो, और जीवन में जो कुछ भी खूबसूरत हो, शांतिप्रद हो, उसका ज़िम्मेदार धर्म को मानो—ये सही दृष्टि है।

प्र: क्या कारण रहा कि वो धर्म जिसे मनुष्य को बदलना था, वह खुद मनुष्य के कब्ज़े में आकर कुछ से कुछ हो गया?

आचार्य: लड़ाई चल रही है, भाई! ऐसा थोड़े ही है कि 'कुछ' हो गया। अभी कोई आखरी परिणाम थोड़े ही सामने आ गया कि तुम कह रहे हो ऐसा कैसे हो गया कि मनुष्य ने धर्म को हरा दिया! मनुष्य ने अगर धर्म को हरा दिया होता तो तुम मेरे सामने नीचे काहे बैठे होते? उछल के मेरा गला नहीं पकड़ लिया होता कि आचार्य जी इतने सारे लोगों के सामने मेरी बात काट रहे हैं, मुझे गलत सिद्ध कर रहे हैं? धर्म अगर हार गया होता तो तुम मेरे सामने शालीनता से क्यों बैठे होते, बताओ? शालीनता से इसीलिए बैठे हो क्योंकि धर्म अभी हारा नहीं है। हारेगा भी नहीं! यह तो एक अनादि संघर्ष है, आत्यन्त चलेगा। एक तरफ माया है और एक तरफ मुक्ति है, और लगातार इनमें कशमकश, रस्साकशी चलती रहती है। कभी किसी का पलड़ा भारी होता है, कभी किसी का पलड़ा भारी होता है। वह तो तुम पर निर्भर करता है तुम किसको जिताना चाहते हो।

धर्म हार नहीं गया है और धर्म कभी पूरी तरह जीत भी नहीं जाएगा। जब भी कोई नया बच्चा पैदा होगा दुनिया में, एक नया कुरुक्षेत्र पैदा होगा, जिसमें लड़ाई होनी है। हर बार एक नया संघर्ष होगा जिसमें एक नया विजेता घोषित होगा। ना कोई पहले से हारा हुआ है, ना कोई पहले से जीता हुआ है। हर बार एक नई लड़ाई लड़ी जानी है, प्रतिपल। वह कुरुक्षेत्र हम सबके भीतर है, हमें निर्णय करना है कि हम किसको जिताएँगे: माया को या मुक्ति को।

प्र: क्या यह अनिवार्य है कि यह लड़ाई उन धर्मों के नाम पर लड़ी जाए जो इतिहास ने हमें दी है?

आचार्य: अरे बाबा! पचास-साठ धर्म नहीं होते, धर्म एक होता है: मुक्ति। उसकी अनंत अभिव्यक्तियाँ होती हैं। अरब के रेगिस्तान में जब मुक्ति की बात होगी तो वह अरबों के तरीके से होगी। भारत में जब मुक्ति की बात होगी तो कभी वो कृष्ण के तरीके से, कभी शौनक के तरीके से होगी, कभी अष्टावक्र के तरीके से होगी, कभी अरण्यक के तरीके से, कभी नचिकेता के तरीके से होगी और कभी बुद्ध, कभी महावीर के तरीके से होगी और कभी कबीर साहब, कभी नानक और कभी-कभी गुरु गोविंद साहब के तरीके से होगी। यह तो तरीकों का अंतर है। धर्म बहुत सारे नहीं होते, बात करने के तरीके अलग-अलग होते हैं। बहुत पहले बता दिया गया था ना कि सत्य एक होता है और उसको जानकार लोग अलग-अलग तरीकों से वर्णित करते हैं।

प्र: क्या ऐसा है कि पुराने तरीके हार गए हैं और हमें एक नया तरीका चाहिए?

आचार्य: हर क्षण को एक नया तरीका चाहिए। पुराना तरीका कोई एक नहीं होता। सब तरीके पुराने होते हैं। उदाहरण के लिए: कल के सत्र में जो मैंने बोला उसके बाद मुझे पुनः आज बोलने की जरूरत क्या है? या आज के ही सत्र में मैंने जो पहला उत्तर दे दिया, उसके बाद मुझे दस और उत्तर देने की जरूरत क्या है? क्योंकि हर पल एक नई चुनौती होता है, जो कि एक नया जवाब माँगता है। अगर तुम सही जवाब दे पा रहे हो तो इसी का नाम धार्मिकता है।

प्र: आचार्य जी, यह जो धर्म आप बता रहे हैं यह बहुत सूक्ष्म है, मर्मदर्शी है। जो धर्म सामान्यतः समाज में माना जाता है उसमें एक धर्म ग्रंथ है, कुछ संस्थापक होंगे, कुछ सांस्कृतिक क्रियाएँ होंगी। वे धर्म तो अलग होते ही हैं ना? उनमें तो भेद होता ही है ना?

आचार्य: उनकी किताबों के अक्षर अलग होते हैं, उनके रीति-रिवाज़ अलग होते हैं, उनके 'मर्म' नहीं अलग होते। और भूलना नहीं आज से पाँच-सात साल पहले जब मेरे साथ शिविर जाते थे तुम लोग और लौट के आते थे तो तुम लोगों को क्या क्रिया करने को बोलता था? मैं तब खुद पढ़ाया करता था। एक-एक शिविर में दस-पंद्रह अलग-अलग ग्रंथ इन लोगों को पढ़ा देते थे। कोई इस देश के, कोई उस देश के, कोई इस कोने के, कोई उस कोने के, कोई पिछली शताब्दी के, कोई ईसा पूर्व के और फिर मैं कहता था इन ग्रंथों को उठाओ और इनमें जो जो श्लोक या पद जो बिल्कुल एक तरफ इशारा करते हैं, उनको एक गुच्छा बनाकर रखते जाओ सामने। और बड़ा मज़ा आता था! ये लोग इस तरह से लाते थे कि ये लीजिए, ये प्रश्नोपनिषद से है एक प्रश्न और ये बाबा बुल्लेशाह की काफ़ी है, और ये तुलसीदास का पद है, और यह तीनों बिल्कुल एक ही बात कह रहे हैं। और कई बार तो उनके शब्द भी लगभग एक समान होते थे। तो धर्मों का मर्म अलग-अलग नहीं होता बशर्ते कि तुम मर्मदर्शी हो , बशर्ते तुम में मर्म को देखने की ताकत है। और मर्म को देखने की ताकत नहीं है तो भी कोई बात नहीं। बहुत तुमको सहायता उपलब्ध है। आदमी का इतिहास तुमको बहुत सहायता देकर गया है, वह सब संकलित है। जिन्होंने सहायता दी है उनके पास चले जाओ, उनसे सीख लो। खुद नहीं बात समझ में आती तो जो समझाते हैं उनका ज़रा सम्मान कर लो। इसीलिए मैं बार-बार कह रहा हूँ, धर्म का अपमान करना छोड़ो, थोड़ी संगत तो करके देखो उपनिषदों की, उसके बाद यह सब मूर्खता भूल जाओगे कि धर्म बुरा है और अध्यात्म में कुछ रखा नहीं है।

प्र१: मैं विज्ञान में विश्वास रखता हूँ और अपनी पूरी ज़िंदगी अध्यात्म के बिना जी सकता हूँ, पर क्या एक आध्यात्मिक आदमी, विज्ञान के बिना जी सकता है?

आचार्य: अरे, शाबाश! अपनी ओर से बिल्कुल गुगली डाली है।

अब सुनो!

(श्रोतगण से पूछते हैं) सवाल समझ गए? "मैं विज्ञान में विश्वास रखता हूँ और मैं पूरी ज़िन्दगी जी सकता हूँ, बिना कोई आध्यात्मिक ग्रंथ पढ़े, बिना अध्यात्म में विश्वास किए, लेकिन क्या कोई आध्यात्मिक व्यक्ति जीवन भर बिना विज्ञान के जी सकता है?”

प्रश्नकर्ता को अभी अध्यात्म और विज्ञान दोनों को समझना बाकी है। अध्यात्म का अर्थ है 'जानना'। किसको जानना? जैसा अध्यात्म शब्द से ही स्पष्ट होगा 'स्वयं को जानना'। तुम अपने आप को जानोगे कैसे जब तक तुम उसको नहीं जानते जिसके संदर्भ में तुम हो? समझिएगा! क्या आप कुछ भी हैं अगर आपकी ना आँखे हो, ना कान हों, ना स्मृति हो, ना मन हो? बताइएगा? आप में से कितने लोग अपने अस्तित्व का भी अनुभव कर पाएंगे अगर आपके पास कोई इंद्रियाँ ना हों और मन ना हो, बोलिए? "मैं हूँ" इसकी भी पुष्टि होती है 'इंद्रियों' से और 'मन' से। आँख कुछ देखती है तो लगता है कि "मैं हूँ", ठीक? आप जब बेहोश हो जाते हो तो आपको लगता है कि आप हो? क्योंकि तब इंद्रियाँ और मन बहुत गहरी नींद में चले जाते हैं, है ना?

तो हमारा होना किस-से साफ-साफ जुड़ा हुआ है? इंद्रियों से और मन से। और इंद्रियों का 'विषय' क्या है लगातार? संसार। मन और इंद्रियाँ लगातार किस चीज़ से जुड़ी रहती हैं? मन किस चीज़ से लगातार भरा रहता है? दुनिया से ही तो भरा रहता है। आँखें किसको देखती हैं? बाहर ही तो देखती हैं। कान किस को सुनते हैं? बाहर का ही सुनते हैं। मन में क्या चीज़ चलती रहती है, कौन-से विचार, कौन-सी स्मृतियाँ? दुनिया के ही तो विचार, दुनिया की ही स्मृतियाँ। समझ में आ रही है बात? तो 'स्वयं' को जानने के लिए उसको भी जानना पड़ता है जो दिखाई पड़ रहा है, जिसका अनुभव हो रहा है, और उसको भी जानना पड़ता है जो देख रहा है, जो अनुभव कर रहा है। अध्यात्म इस पूर्णता का नाम है। दोनों बातें समझ में आई हैं?

अध्यात्म का मैंने क्या अर्थ कहा? पहला - जानना, स्वयं को जानना। लेकिन स्वयं को आप जान नहीं सकते जब तक आपने उसको नहीं जाना जिसके संदर्भ में आपकी हस्ती है। जिसके संदर्भ में आप अपने आप को परिभाषित करते हो। समझ रहे हो बात को? तो इसीलिए अध्यात्म की दो शाखाएँ हुई: एक वह जो दुनिया को जानती है, एक वह जो स्वयं को जानती है। यह दोनों शाखाएँ एक दूसरे के बिना जी नहीं सकती।

तुम स्वयं को नहीं जान सकते जब तक कि यह ना समझो कि यह दुनिया क्या चीज़ है। और तुम दुनिया को नहीं जान पाओगे जब तक तुम्हें यह नहीं पता दुनिया को देखने, जानने, समझने वाला कौन है। अध्यात्म इन दोनों की बात करता है।

अध्यात्म कहता है - संसार को भी जानना है, स्वयं को भी जानना है, और यह भी समझना है कि स्वयं और संसार बिल्कुल जुड़े हुए हैं, बिल्कुल एक ही हैं, इनमें कोई बड़ा गहरा नाता है।

अध्यात्म का ही एक छोटा-सा हिस्सा, एक सबसेट है विज्ञान। विज्ञान कहता है - जानना तो मुझे भी है लेकिन बस जानना है बाहर वाले को। तो विज्ञान कभी यह कहता ही नहीं कि, "जानने वाला कौन है?” एक तरह से विज्ञान अधूरा विज्ञान है, अध्यात्म पूरा विज्ञान है। 'विज्ञान' जिसको तुम आमतौर पर साइंस कहते हो, अधूरा विज्ञान है, क्योंकि वह सिर्फ विषयों की, ऑब्जेक्ट्स की बात करता है। वह कभी जानने वाले की, विष्येता की, सब्जेक्ट की बात करता ही नहीं। अध्यात्म कहता है, ऐसे तो कुछ पता ही नहीं चलेगा, मैं बस दीवार की बात करूँ और उस चेतना की बात ही ना करूँ जो इस दीवार को देखती है, जिसमें यह दीवार अस्तित्वमान है, तो मैंने इस दीवार के बारे में कुछ जाना ही नहीं। और अध्यात्म यह भी कहता है - दीवार को जानने के पहले मुझे स्वयं को जानना पड़ेगा। क्यों? कारण समझिएगा! कुछ भी जानने की ललक किसमें उठी है? दीवार में या मुझ में? तो पहला हक किसका है जाने जाने पर? पहला विषय कौन होना चाहिए जिस पर जिज्ञासा की जाए? दीवार पर या मन पर? दो हैं: मन और दीवार। और दोनों बिल्कुल संबंधित हैं आपस में, दीवार पता चलती है मन में, तो इन दोनों में मैं सबसे पहले किसके बारे में जानूँ? किसके बारे में मैं जानकारी इकट्ठा करूँ? मन के बारे में। क्यों? परेशान कौन है, दीवार या मन? तो पहले ज़रा हम 'मन' की तहकीकात कर लें? दीवार की भी करेंगे हीं करेंगे।

अध्यात्म दोनों को जानना चाहता है - संसार को भी, स्वयं को भी। इन दोनों में पहले वह स्वयं को जानना चाहता है। कहता है, क्या पता स्वयं को जान लें तो संसार को जानना आसान हो जाए। यह अध्यात्म कहता है।

विज्ञान जैसे एक तरफ से अँधा है। दो तरह की दृष्टि होती है ना? आगे की, पीछे की। विज्ञान पीछे की ओर से अँधा है, उसने अपनी परिभाषा ही अधूरी रख दी है। वह कहता है: "दुनिया को जानना। बताओ, दुनिया में क्या-क्या है, उसकी बात करेंगे।" ऐसे समझ लो, तुम यहाँ बैठे उस घड़ी को देख रहे हो (दीवार पर लगी घड़ी की ओर इशारा करते हुए) , ठीक है? वह घड़ी चल रही है। वह घड़ी एक यंत्र है जो समय दर्शा रहा है। तुम यहाँ बैठे हो और तुम बहुत तनाव में हो, आँखों में आँसू हैं और तुम उसको देख रहे हो। अगर वैज्ञानिक है कोई, शुद्ध वैज्ञानिक, तो उसका सरोकार इससे होगा कि वह यंत्र ठीक काम कर रहा है कि नहीं। और वह पूछेगा, वह जो समय बता रहा है, वह ठीक है, इत्यादि-इत्यादि। कोई आध्यात्मिक व्यक्ति आएगा और देखेगा, तुमको और उस यंत्र को, तो वह यंत्र के बारे में जिज्ञासा करेगा ही करेगा, वह सबसे पहले यह पूछेगा कि तुम तनाव में क्यों हो, वह जो समय है, वह तुमको इतना तड़पा और रुला क्यों रहा है। अध्यात्म और विज्ञान की दृष्टि में अंतर समझना: वैज्ञानिक आ कर बस इतना देखेगा, "हाँ, ये घड़ी ठीक है, चाबी दी हुई है, सेल ठीक हैं। कोई 'ज़ीरो एरर' तो नहीं दे रही है?” वैज्ञानिक इतना देखेगा और चल देगा। वैज्ञानिक को दृश्य से सरोकार है, दृष्टा से बिल्कुल नहीं। "देखने वाला कौन है भाड़ में जाए"—कहता है विज्ञान। तुम्हारा काम है उस यंत्र की रीडिंग्स लेना। तुम्हारा मन अभी कैसा है—मीठा है, खट्टा है, तुम हर्षित हो, तुम दुखी हो—फर्क नहीं पड़ता।

अध्यात्म कहता है, "नहीं, उसकी (घड़ी की) बात करेंगे, ज़रूर करेंगे, लेकिन पहले 'तुम्हारी' बात करेंगे। तुम्हें इतनी आवश्यकता क्या है समय से उलझने की? और समय में ऐसा क्या है जिसके कारण तुम समय में इतना दबाव झेल रहे हो?” यह है अध्यात्म।

वैज्ञानिक आएगा तो बस इतना पूछेगा, "व्हाट इज़ द टाइम?"

ऋषि आएगा तो पूछेगा, "व्हाट इज़ टाइम?"

बात समझ में आ रही है? "व्हाट इज़ टाइम?” यह 'समय' ही क्या चीज़ है?

अब प्रश्नकर्ता कह रहे हैं, "मैं अध्यात्म में विश्वास नहीं रखता और मैं बिना अध्यात्म के अपनी पूरी जिंदगी गुजार सकता हूँ विज्ञान के सहारे।"

तुम पगले हो। तुम्हें पता ही नहीं तुम यह जो सवाल भी पूछ रहे हो, इसमें भी अध्यात्म बैठा हुआ है। बताता हूँ कैसे। विज्ञान की कौन-सी किताब में विश्वास या श्रद्धा नामक शब्द है बताना? बोलो, है? तुम यह मुझसे सवाल पूछ रहे हो, किसी भरोसे पर पूछ रहे हो न? और तुम कह रहे हो तुम्हारा अध्यात्म से कोई ताल्लुक नहीं है। अगर तुम्हारा ताल्लुक बस विज्ञान से है, तो तुम्हें 'भरोसा' किसने सिखाया? विज्ञान की किताब में तो कोई ऐसा चैप्टर नहीं होता है जिसका नाम हो 'भरोसा'।

तुम कहोगे, "नहीं नहीं आचार्य जी, हमें आप पर कोई भरोसा-वरोसा थोड़े ही है। वह तो हमने आपसे पूछ लिया चुनौती की तरह।" ठीक है, मुझ पर भरोसा नहीं है, किसी पर तो होगा? माँ पर, बाप पर, प्रेमिका, पति-पत्नी, बच्चे—किसी पर तो भरोसा होगा?

अब फंस गए बच्चु! कैसे मान लें कि भरोसा होगा। हमने तो कह दिया है "हम बिना अध्यात्म के पूरी जिंदगी जी लेंगे, हम सिर्फ विज्ञान पर पूरी जिंदगी जीते हैं।" मैं पूछ रहा हूँ बताओ न कौन-सी साइंस की बुक है जिसमें एक चैप्टर है 'ट्रस्ट' नाम से, बोलो? तो अब बच्चु फंस गए हैं! तो अब कुतर्क करेंगे, "नहीं हम किसी पर भरोसा नहीं करते हैं। हम बिना भरोसे के जी लेंगे।" तो मैं कहूँगा, "जी कैसे लोगे बिना भरोसे के? जी कैसे लोगे?” और दूसरी बात, तुम कह रहे हो तुम्हें किसी पर भरोसा नहीं है, तो तुम्हें अपनी इस बात पर भरोसा कैसे है कि तुम बिना भरोसे के जी लोगे? इतने भरोसे के साथ कैसे कह रहे हो कि बिना भरोसे के जी लोगे? पर तुम में इतनी बुद्धि होती तो ऐसे सवाल ही क्यों पूछते कि "बिना अध्यात्म के हम जी लेंगे!”?

'अध्यात्म' के बिना जो आदमी जी रहा है वह जानवर है! उसकी जिंदगी में बस एक बहुत बड़ा पेट होगा जिसे उसको भरना है और जननांग होंगे जिनके माध्यम से उसे संतानोत्पत्ति करनी होगी—और कुछ नहीं होगा उसके पास, ना उसकी ज़िन्दगी। पेट का जो आधुनिक पर्याय है, उसका नाम है 'जेब'। जो लोग बिना अध्यात्म के जी रहे हैं, अगर बहुत पहले के ज़माने में होते तो पेट भर रहे होते और आज के ज़माने में होंगे तो जेब भर रहे होंगे। ये बिल्कुल प्राकृतिक है।

जानवर अपना पेट फुला घूमता है, जल्दी से कुछ मिल जाए। अजगर को देखा है? वह एक बार में इतना ले लेता है कि अब दस दिन तक ज़रूरत नहीं पड़ेगी। वह बिल्कुल अब चित्त पड़ा हुआ है और पेट में उसके क्या है? हिरण ले लिया उसने अंदर। वैसे ही सेठ होता है, वह जेब फुलाए घूमता है। उसने हिरण नहीं, पूरा जंगल अंदर ले लिया है। ऐसा होता है पूरा अध्यात्म-हीन जीवन। उस जीवन में मैं कह रहा हूँ, दो ही चीज़ें होती हैं: पेट और जननांग। पेट, ताकि अपना शरीर चलता रहे और जननांग ताकि आगे बच्चे-वच्चे होते रहें और यह प्रजाति आगे बढ़ती रहे। समझ में आ रही है बात?

प्र: आचार्य जी, आपके युवा जीवन में दो लोग हैं जिन्होंने आपको बहुत प्रभावित किया है: एक धूमिल, जिनका जिक्र आप बार-बार करते हैं, और दूसरे भगत सिंह, जिनके जीवन से आप बहुत प्रभावित रहे। दोनों के ही जीवन में तो धर्म कहीं मौजूद नहीं था। भगत सिंह ने तो यहाँ तक कहा कि "मैं नास्तिक हूं"।

आचार्य: धर्म यही नहीं होता कि तुम किसी मूर्ति की पूजा कर रहे हो या किसी मस्ज़िद में सज़दा कर रहे हो। क्योंकि हम धर्म जानते नहीं इसीलिए धर्म का आशय हम इन्हीं चीज़ों से लगा लेते हैं कि कोई जनेऊ डालकर घूम रहा है तो वह धार्मिक है वगैरह-वगैरह। धर्म यह थोड़े ही होता है। अगर भगत सिंह धार्मिक नहीं थे तो कौन धार्मिक था? ठीक है, उन्होंने अपने मुँह से कह दिया कि "मैं नास्तिक हूं", जब वह कह रहे हैं कि वो नास्तिक हैं तो इसका अर्थ है कि जो उस समय धर्म का प्रचलित अर्थ था, उसमें वह किसी तरह से साझीदार नहीं थे। बिल्कुल ठीक कहा। उस अर्थ में तो मैं भी महा नास्तिक हूँ! धर्म का आजकल जो प्रचलित और व्यापक अर्थ है, यहाँ कौन है जो उससे ताल्लुक रखता है, उस से सहमति रखता है? हम भी नास्तिक हैं, घोर नास्तिक हैं।

प्र: क्या यही माया नहीं है कि जो धर्म का प्रचलित अर्थ होगा, वह गलत ही होगा?

आचार्य: ये माया अगर है भी तो तुम्हारे अंदर की है ना, धर्म के अंदर की थोड़े ही है। धर्म का जो प्रचलित अर्थ है, उसे प्रचलित करता कौन है, धर्म या तुम? तुम करते हो ना? तो धर्म के अर्थ को जोड़ना, तोड़ना, उसमें विकृति लाना, यह करतूत किसकी है, ऋषियों की या तुम्हारी? ऋषि तो अपनी ओर से सब बात सीधी-सपाट लिख कर चले गए। एकदम साफ-साफ श्लोक दे दिए हैं। किस्से कहानियां भी नहीं दी हैं। बिल्कुल संक्षिप्त श्लोक दिए हैं जिनका अर्थ तुम आसानी से विकृत कर ना सको। पर हम तो ऐसे सूरमा हैं कि हमें गणित का एक समीकरण भी दे दिया जाए, दो और दो चार, तो हम उसमें भी कुछ-न-कुछ जोड़-तोड़ कर हीं देंगे।

धूमिल धार्मिक नहीं है तो और कौन धार्मिक है? जिसमें संवेदनशीलता है, वह धार्मिक है। जिसके चित्त में काव्यात्मकता है, वह धार्मिक है। फिर भले ही वह जनेऊ पहने ना पहने, अपने नाम के साथ अपने वर्ण का उल्लेख करे न करे, प्रचलित रीति-रिवाज़, तीज-त्यौहार मनाए न मनाए। वास्तविक धार्मिकता का इन सब चीजों से क्या ताल्लुक कि तुम सर मुड़ाते हो या नहीं मुड़ाते हो, रुद्राक्ष की माला डालते हो या नहीं डालते हो, फ़लाना त्यौहार मनाते हो कि नहीं मनाते हो, फ़लानी कहानी में यकीन करते हो या नहीं करते हो? धर्म इन सब चीज़ों का नाम थोड़े ही है भाई!

मन को शांति और मुक्ति की ओर ले जाना है और यही जीव का एकमात्र कर्तव्य है, इस बात को निरंतर याद रखना धर्म है। सीधी-सच्ची-सपाट बात।

प्र: और इसे याद रखने में अगर सामान्य 'इंस्टीट्यूशनल रिलीज़न' बाधा बन रहा हो तो?

आचार्य: वह इंस्टिट्यूशन किसने बनाया? वो जो संस्थागत धर्म है वह किसने बनाया, बताओ? क्रिश्चियानिटी का एक बहुत बड़ा इंस्टिट्यूशन है और इस इंस्टिट्यूशन के अंदर सौ अलग-अलग तरह के चर्च हैं। यह जो पूरा इंस्टीट्यूशनलाइज़ेशन था, यह जीज़स करके गए थे? वह सीधा-सादा आदमी बेचारा, उसको तुमने टाँग दिया, मार दिया। उसको कहाँ फुर्सत थी कि वह बैठकर इतना लंबा-चौड़ा बंदोबस्त करेगा, इंस्टीट्यूशनलाइजेशन?

आज तुमने इतने करोड़ देवी देवता बना लिए, इतनी जातियाँ, उपजातियाँ, गोत्र, ये और वो, और भी सत्तर चीजें बना ली, यह अष्टावक्र की मंशा थी कि तुम यह सब करो? तुम जिस तरह के त्यौहार मनाते हो, तुम जिन देवी-देवताओं की पूजा करने लग गए हो, मैं फिर पूछ रहा हूँ, क्या यह उपनिषदों में वर्णित है? यह तो तुम्हारी मर्ज़ी है कि तुम यह सब करने लग जाओ।

प्र: तो क्या धर्म को संस्थागत रूप से प्रचारित, प्रसारित करना गलत है?

आचार्य: तुम्हारी मर्ज़ी पर है कि तुम उस संस्था का उपयोग क्या करोगे, बाबा! संस्था माने क्या? संस्था अपने आप में तो कोई जीवित चीज़ होती नहीं। संस्था माने संस्था के पीछे कौन-सा इंसान बैठा है और उसकी मंशा क्या है। तुम एक संस्था इसलिए भी बना सकते हो कि तुम्हारी जेब भरती रहें और तुम्हारा अपना नाम चमकता रहे, तुम चंदा इकट्ठा करते रहो, और तुम एक संस्था इसलिए भी बना सकते हो कि धर्म में जितने विकार, विकृतियाँ, बुराइयाँ आ गई हैं, तुम उनको साफ कर दो।

प्र: तो इसका मतलब अगर पीर, पैगंबर, गुरुजन संस्था में ना हों तो संस्था का विगलन हो जाना चाहिए?

आचार्य: बिल्कुल। 'धर्म' को हमेशा एक जीवित चेतना की ज़रूरत पड़ेगी। यह धर्म की आवश्यकता है, इसको तुम धर्म की कमज़ोरी भी कह सकते हो।

प्र: इसका मतलब है आज जितने भी धर्म ज़ोरों से चल रहे हैं, जिनके पीछे कोई जीवित चेतना नहीं है, उन सब का विगलन हो जाना चाहिए?

आचार्य: देखो, जीवित चेतना तो होंगी। धर्मों की जितनी भी धाराएँ बह रही हैं, उनमें कुछ लोग तो ऐसे होंगे जो अतिचैतन्य होंगे। हाँ! तुम उन लोगों के नाम ना जानो, उनकी कद्र ना करो, उनके पास जाकर ना बैठो, यह तुम्हारी मर्ज़ी है। मैं इस बात को मानने से इनकार करता हूँ कि भले ही कोई छोटी-मोटी धार्मिक धारा हो, जिसके मानने वाले मान लो कुल बीस ही हज़ार लोग हैं दुनिया में और उन बीस हज़ार में कोई जागृत, जीवित, उच्च कोटि की चेतना नहीं होगी, ऐसा नहीं हो सकता, कोई तो होगा। और आमतौर पर, अक्सर एक नहीं, कई होंगे ऐसे। अब यह तुम्हारे ऊपर है कि तुम उन लोगों को खोजो, उनसे सीखो।

प्र: अगर मानें कि वह जीवित चेतना है इन धर्मों के पीछे, मौजूद हैं, तो मानव इस धर्म को इतना विकृत कैसे कर दे रहा है? वह ऐसा होने कैसे दे रहे हैं?

आचार्य: तुम भूल जाते हो बार-बार हम कितने मजबूत लोग हैं। हम 'माया' के सिपाही हैं, भाई! हम कुछ भी कर सकते हैं। हम किसी भी चीज़ को विकृत कर सकते हैं, हम साफ-से-साफ जगह को गंदा कर सकते हैं, ऊँचे-से-ऊँचे वचनों में घपला कर सकते हैं, हम कुछ भी कर सकते हैं। बल्कि जो जगह जितनी साफ, ऊँची और पवित्र होती है, उस पर कीचड़ उछालने में हमें उतना ही रस आता है। कभी कोई पालतू जानवर जिन लोगों ने पाला है, वह जानते हैं कि बहुत सिखाना पड़ता है ना कि टट्टी कहाँ करनी है? जब उसे नया-नया लेकर आओ तब वह क्या करता है? घर में आप कभी कोई कुत्ते का छोटा-सा बच्चा लाए हों, बिल्ली लाए हों या कुछ भी लाए हों, तो आदत क्या होती है उनकी? बस कहीं भी गंदगी कर देंगे! तो वही हैं हम भी। जहाँ पाया वहीं हग दिया। और साफ जगह मिल जाए तो फिर तो पूछो ही मत! कुछ ऊँचा मिल जाए जो आसमान की तरफ बढ़ रहा हो तो कुत्ते को देखा है तुरंत क्या होता है? कुत्ते को खंभा दिखा नहीं, कि कुत्ते ने टाँग उठाई और... यही काम इंसान ने किया है। किसी मंदिर में कोई स्तंभ हो—और मंदिरों में तो स्तंभ होते ही हैं आमतौर पर—और कुत्ते को वह स्तंभ मिल जाए तो कुत्ता तुरंत उस स्तंभ का क्या इस्तेमाल करेगा? मूत देगा! वही हम सब भी करते हैं, खासतौर पर कोई बुद्धिजीवी।

प्र: जितने भी धर्म इस समय 2020 में, समाज में प्रचारित-प्रसारित हैं, जिनके ग्रंथ पढ़े जा रहे हैं, जिनकी संस्कृतियों पर समाज बन रहे हैं, बच्चे बड़े हो रहे हैं, आपकी समझ में इनमें से कौन-सा धर्म है जो मुक्ति के लिए सबसे ज़्यादा सहायक होगा?

आचार्य: देखो, जो तुम्हें रुचे, जो तुम्हारे लिए उपयोग का हो, वही ग्रंथ तुम्हारे लिए सर्वश्रेष्ठ है। यही एकमात्र मापदंड है, इसके अलावा कोई दूसरा पैमाना नहीं होता। धर्म यह नहीं कहता कि तुम फलाने किताब से जाकर चिपक जाओ, या फ़लाने व्यक्ति से चिपक कर बैठ जाओ। धर्म कहता है तुमको अपनी चेतना की उच्चतम स्थिति को प्राप्त करना है। उसके लिए जो करना चाहिए वो सब करो। वह इतनी ऊँची और मूल्यवान बात है कि उसके लिए जो कीमत चुकानी हो चुकाओ, जो रास्ता लेना पड़े लो।

प्र: यह बात हम सत्संगियों के लिए आसान होगी, सामान्य जनता के लिए यह बहुत ऊँची बात है।

आचार्य: तुम मुझसे यदि मेरी व्यक्तिगत पसंद पूछोगे तो मैं कहूँगा, वेदांत।

प्र: धर्म कौन-सा?

आचार्य: वेदान्त, बस यही, हो गया। लेकिन जब मैं कह रहा हूँ 'वेदांत’, तो उससे मेरा यह आशय नहीं है कि जो धर्म की और भी दस, बीस, पचास धाराएँ हैं उनमें किसी प्रकार की हीनता या कमज़ोरी है। जिसको जहाँ लाभ होता हो, उसके लिए वही जगह ठीक है। बस तुम इस बात का ख़्याल रख लेना कि तुम्हें लाभ हो रहा है कि नहीं हो रहा है। मुझे सर्वाधिक लाभ वेदांत से हुआ है और संतवाणी से हुआ है, तो मैं बार-बार उसका उल्लेख करता हूँ।

प्र: क्या अद्वैत-वेदांत ने भी कुछ त्रुटियाँ, कमियाँ हैं?

आचार्य: हम में होती हैं।

प्र: आचार्य जी, मुक्ति का अर्थ विस्तार से बताने की कृपा करें, क्या मुक्ति पाने की कोई विशेष विधि होती है?

आचार्य: जैसे अभी आप सवाल पूछ रहे हैं, अगर मैं आपसे कुछ कहूँ तो आप यही चाहेंगे ना कि आपके भीतर जो उलझन है वह मिट जाए? इसी को 'मुक्ति' कहते हैं।

मेरे भीतर कोई उलझन थी, मैंने कोई कर्म करा, अगर वह कर्म शुभ है, अगर वह कर्म धार्मिक है तो उस कर्म के फलस्वरुप मैं उस उलझन से मुक्त हो गया, इसी का नाम मुक्ति है।

प्र: जीवन में सबसे बड़ा अभिप्राय क्या है?

आचार्य: और क्या है, भाई? आप अगर परेशान हो, जो कि हम सब हैं, तो जीवन का और क्या उद्देश्य हो सकता है? परेशानी मिटाना।

प्र: क्या इसके लिए हमें किसी गुरु का सहारा लेते हुए आगे बढ़ना चाहिए?

आचार्य: जो सहारे लेने पड़े, सब लो!

प्र: हमारे एक गुरु थे जो अब जीवित नहीं हैं, उनको एनलाइटनमेंट हुआ था, उन्होंने जो मार्ग बताया है अगर हम उस पर चलें तो क्या हम मुक्ति प्राप्त नहीं करेंगे?

आचार्य: वह आप देखो ना कि आपको लाभ हो रहा है कि नहीं हो रहा है। बताने वाले ने अपनी क्षमता अनुसार जो आपको बताना था बता दिया, अब उससे आपको लाभ हो रहा हो, आपके बंधन शिथिल हो रहे हों, आपकी चेतना आगे बढ़ रही हो तो जो रास्ता आपको बताया गया है, आप उस पर आगे चलते रहें। और अगर आप पाएँ कि अब लाभ नहीं हो रहा है, ईमानदारी से जाँच करने पर पाएँ कि अब लाभ नहीं हो रहा है, तो दूसरा कोई रास्ता खोजें या फिर थोड़ा बहुत मुड़ें, कुछ संशोधन लाएँ अपने रास्ते में।

प्र: मन को नियंत्रित करना सबसे बड़ी समस्या है।

आचार्य: सबकी वही है।

प्र: अभी हम एक कविता पढ़ रहे थे, उसमें लिखा था, "कुछ भी हासिल करने के पहले हमारी प्राथमिकता सदैव 'शांति' है"।

आचार्य: बस वह याद रखना होता है कि वही प्राथमिकता है। अभी आप मेरे सामने बैठे हैं तो आपको याद है कि यही प्राथमिकता है कि मन स्थिर रहे, शांत रहे, अब सत्र समाप्त होने वाला है, कुछ मिनटों बाद आप बाहर होंगे, फिर देखिएगा आपकी प्रायोरिटी (वरीयताएँ) कैसे बदलती हैं। अभी यहाँ बैठे हैं, सामने मैं हूँ, अभी कुछ मिनटों बाद आपके हाथों में आपके फोन होंगे, देखिएगा आपकी वरीयताएँ कैसे बदलती हैं। तो यह मत पूछिए कि जो मेरी वरीयताएँ हैं, वह मैं हासिल कैसे करूँ। समझिएगा ध्यान से! बस आपकी जो वरीयता है उसको याद रखिए कि वही तो 'आपकी' वरीयता है। हम अपनी वरीयताएँ बिल्कुल भुला देते हैं। अभी कुछ महत्वपूर्ण है, थोड़ी देर में कुछ और महत्वपूर्ण हो जाता है।

प्र: क्या सांसारिक जीवन जीते हुए हम अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं?

आचार्य: सब आपके ऊपर निर्भर है। यह चीज़ ऐसी है जो खुद ही करनी पड़ती है। क्यों? पूछो! क्योंकि दर्द हम सब 'अकेले' झेलते हैं। दर्द क्योंकि हम सब अकेले झेलते हैं, इसीलिए मुक्ति की यात्रा भी अकेले ही करनी पड़ेगी। बहुत सौभाग्यशाली हो आप, बहुत धन्यवाद और अनुग्रह से भरे रहो आप अगर उस यात्रा में थोड़ा बहुत भी सहारा मिल जाता है। लेकिन अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे मत हटना। यात्रा तो तुम्हें ही करनी है, अकेले ही करनी है, क्योंकि दर्द तुम्हारा अपना है।सबको वह ज़िम्मेदारी खुद ही उठानी पड़ेगी। इसीलिए वह प्रत्येक जीव के जीवन का उद्देश्य है।

प्र: आचार्य जी, जब यात्रा बोलते हैं तो मंज़िल की परिकल्पना मन में आती है, फिर एक 'परमानेंट एनलाइटनमेंट' और पूर्ण मुक्ति का विचार भी मन में आता है।

आचार्य: परमानेंट कुछ भी हो, तो किसी के लिए होगा ना? आमतौर पर जब आप जीवन में कहते हो कि आपको कुछ परमानेंटली मिल गया है, तब आपका आशय यह होता है कि आप हो और आपके पास अब सदा वह चीज़ रहेगी। "मुझे कुछ मिल गया परमानेंटली!” तो परमानेंस साथ-साथ निहित होता है 'वो' जिसे कुछ मिल रहा है परमानेंटली, वो बचा रहेगा। बचा ही नहीं रहेगा, वह जरूरी है परमानेंस के लिए, ठीक?आध्यात्मिक यात्रा में जो मंज़िल होती है, वहाँ पर उसी का ख़ात्मा करना है, जिसकी वजह से आपको यह सब यात्रा करनी पड़ी। भूलिएगा नहीं, ये यात्रा आप इसलिए कर रहे हो क्योंकि आप बेचैन हो। आप ऊपर से लेकर नीचे तक बेचैनी का ही नाम हो इसीलिए आप यह यात्रा कर रहे हो, तो इस यात्रा की मंज़िल क्या है? बेचैनी से मुक्ति। और बेचैनी से मुक्ति माने किस से मुक्ति? खुद से। तो अब कोई बचा ही नहीं। आध्यात्मिक यात्रा के अंत में वही नहीं बचता जिसको मजबूर होकर यात्रा करनी पड़ी थी। जब वह बचा ही नहीं तो परमानेंस किसके लिए बाबा? परमानेंस के लिए हमेशा कोई सब्जेक्ट चाहिए ना? कोई रिसीवर, कोई विषय चाहिए, कोई होल्डर चाहिए, जो कहे कि मुझे यह चीज़ अब सदा के लिए मिल गई: अब यह मेरे लिए परमानेंट है।

अध्यात्म के अंत में जो मुक्ति आती है उसे परमानेंट इसीलिए नहीं बोलते, उसे 'इटरनल' बोलते हैं, उसे 'टाइमलेस' बोलते हैं। वह कालातीत है। समय ही बंद हो गया क्योंकि समय ही बेचैनी था। परमानेंस का मतलब होता है: समय तो चलता रहेगा लेकिन मुझे जो चीज़ मिली है, वह छिनेगी नहीं। 'इटरनिटी' का मतलब होता है: समय ही बंद हो गया तो अब काहे का परिवर्तन आएगा? जिसमें परिवर्तन आना था वही नहीं रहा।

समझ में आ रही है बात? तो परमानेंस जैसा कुछ नहीं होता।

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