आचार्य प्रशांत आपके बेहतर भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं
लेख
विचार कहाँ से आते हैं? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
9 मिनट
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वक्ता : नवनीत(श्रोता को इंगित करते हुए) पूछ रहे हैं कि हमारे कर्म हमारे विचारों से निकलते हैं। मुझे लगता है इस बात से तो हम सभी सहमत होंगे। सही है?

पर यह हम नहीं समझ पाते कि विचार आते कहाँ से हैं? विचार कहाँ से आते हैं, नवनीत? श्रोता : सर, हमारे मन से। वक्ता: तो फिर मन में कहाँ से आते हैं? श्रोता : हमारी दिन-प्रतिदिन कि गतिविधियों से। वक्ता: इसको थोड़ा और गहरे देख कर ही आप समझ पाओगे कि विचार और कार्य कैसे सम्बंधित हैं। कार्य का जन्म विचार से ही होता है, जो बहुत अच्छी बात है। पर क्या आप उसे गहराई से जान सकते हैं जहाँ से विचार आते हैं? श्रोता: जो भी हम देखते हैं। श्रोता: कल्पना से।

वक्ता : सोचो कि आप हिंदी में बात कर रहे हो। सोच सकते हो न? आसान है! अब यह सोचिए कि आप अंग्रेज़ी में बात कर रहे हो। अब यह सोचिए कि आप रूसी भाषा में बात कर रहे हो। क्या आप कर सकते हो इसकी कल्पना?

सभी श्रोता: नहीं, सर।

वक्ता: तो फिर विचार आते कहाँ से हैं? आपके अतीत के अनुभवों से। जो आपके अतीत में नहीं आया है ,वो आपके विचारों में भी नहीं आ सकता। आप अपने अतीत के बिना कुछ सोच ही नहीं सकते। उस हिसाब से आपकी सारी कल्पना मात्र अतीत है।कल्पना विचार है। सही? सारी कल्पना विचार के अलावा कुछ नहीं है।तो लोगों ने कहा है कि विचार सत्य नहीं है। बिलकुल सही कहा है क्यूँकी सत्य तो अभी है। विचार कहाँ हैं?

सभी श्रोता: अतीत में।

वक्ता: तो वो वास्तविक कैसे हो सकता है?

श्रोता: लेकिन सर, जो अतीत में हो चुका है, वह भी तो सच है।

वक्ता: वह अभी का सच नहीं है। वह स्मृति है, सिर्फ़।

श्रोता: लेकिन सर, जब हम पहली बार करते हैं तो वह हमारे सोच का ही परिणाम होता है।

वक्ता: बहुत बढ़िया। इसका अर्थ समझ रहे हो क्या है? इसका अर्थ है कि तुम जो अपने लिए भविष्य बनाते हो सोच- सोच कर, वह कोई भविष्य है ही नहीं, वह अतीत ही है। अतीत को दोहराना चाहते हो सिर्फ़।

देखो क्या होता है मन में; मन हज़ार तरीको के अनुभवों से गुज़रा है। उन अनुभवों में कुछ में उसको अभिराम मिला और कुछ में उसको मिली पीड़ा, दुःख। जिन अनुभवों में उनको सुख मिला है, वह उन्हीं को दोहराना चाहता है। जिन अनुभवों में उसको दुःख मिला उन से दूर होना चाहता है। इसी इच्छा से वह भविष्य की कल्पना करता है।

भविष्य और कुछ नहीं है, तुम्हारा मन जिस भविष्य की कामना करता रहता है, वह भविष्य तुम्हारे अतीत का पुनः चक्रण है।

“हम सब कहते हैं कि हमें एक नया भविष्य चाहिए,ठीक है न? हम सभी कहते हैं कि हमें एक नया, खुशहाल भविष्य चाहिए। पर मज़ेदार बात यह है कि आपकी सारी कल्पना जो भविष्य के बारे में होती है, उसमें कुछ नया है ही नहीं। वो सब आपके अतीत से आ रहीं हैं। आपकी सभी कल्पनाएँ, भविष्य के बारे में अतीत से ही आती हैं। चाहे आप कितना भी दावा कर लें कि आपको एक नया भविष्य चाहिए, आप और कुछ नहीं सिर्फ अतीत का पुनह्चक्रण चाहते हैं क्यूँकी नए के बारे में तो मैं सोच ही नहीं सकता।

मन सोचता सिर्फ़ उसको है, जिसको अतीत में अनुभव कर चुका है।

उसके अतरिक्त कुछ और सोच पाना उसके बस में ही नहीं है। निश्चित रूप से कुछ सुना होगा, पढ़ा होगा, जाना होगा, बस उसी को दोहराना चाहता है। वर्तमान सर्वथा नया है।

क्या आप कभी पहले इस क्षण में आए हैं?

क्या यह सवाल आपने पहले भी पूछा है। मैं ठीक इस तरह पहले भी बैठा हूँ। ठीक! यह क्षण पहले भी आपकी ज़िन्दगी में आ चुका है।

जो वर्तमान है वो हमेशा नया होगा पर जो विचार है वो हमेशा पुराना होगा। तो जो विचारों में जीते हैं वो वर्तमान में नहीं रह पाते। अभी आप में से जो लोग मुझे सुन रहे होंगे, वह, सोच नहीं रहे होंगे। जो विचार में खोए हुए हैं, वह मुझे सुन नहीं पा रहे होंगे। जो भी कोई मुझे ध्यान से सुन रहा होगा वह गौर करे कि वह सिर्फ सुन रहा होगा, सोच नहीं रहा होगा। क्या तुम सोच रहे हो अभी?

श्रोता: नहीं, सर।

वक्ता: सिर्फ सुन रहे हो।

श्रोता : जी सर।

वक्ता: कई लोग है जिनके चहरे से स्पष्ट है कि वह सोच रहे है। वह खूब सोच रहे हैं। सोचिए, खूब सोचिए। सोच कर आप सिर्फ सोच मे हो जाएँगे, जो हो रहा उसके सम्पर्क में नहीं आएँगे और सोच तो पुरानी है, बासी है।

समझ में आ रहा है? स्पष्ट हो रहा है कुछ?

श्रोता: जी, सर।

वक्ता: विचार सही क्यों नहीं है? इस जवाब को थोड़ा और आगे बढ़ाइए। हमने कहा कि हर कार्य विचार से उत्पन्न हो रहा है।

अगर वर्तमान का एक्शन विचार से निकल रहा है तो यह गड़बड़ होगी। कार्य कब हो रहा है?

श्रोता : वर्तमान में।

वक्ता: वर्तमान में। कर्म निकल किससे रहा है?

श्रोता : अतीत से।

वक्ता: अतीत से। गड़बड़ होगी कि नहीं होगी। यह ऐसी बात हो गई कि मैं गाड़ी सड़क पर ड्राइव कर रहा हूँ और इस आधार पर ड्राइव कर रहा हूँ कि कल एक ट्रक यहीं पर आया था और मुझे ट्रक नहीं मिला तो मै हॉर्न भी नहीं मारूँगा। जो भी लोग अपने से बाइक चलाते हैं या गाड़ी ड्राइव करते हैं वो समझ जाएँगे, बिल्कुल तुरन्त समझ जाएँगे। जब आप बाइक चला रहे होते हो, तो आप इंडिकेटर, या जो बैलेंसिंग होती है, सोच सोच के करते हो क्या? आपकी गाड़ी चल रही 60 या 100 की स्पीड पर, क्या आप सोच रहे होते हो। आप को जो टर्न लेने हैं, सामने जो गड्ढा आ रहा है, आपको टर्न लेना है, तो क्या सोच कर टर्न लेते हो?

श्रोता : हाँ, जो नए- नए, सीखते हैं, उनको सोचना पड़ता है। इसी कारण वह बेचैन रहते हैं क्यूँकी वह सोच रहे होते हैं। जिन्होंने नई- नई गाड़ी चलाना सीखी है वह, बहुत सोच- सोच कर चला रहे होते हैं। इस कारण बड़े बेचैन रहते हैं। सोचना क्या?

अभी स्थिति है, अभी उसका उत्तर दिया; अभी रिस्पोंस किया। बैठा है, सोचना क्या इसलिए विचार से जो कार्य निकलेगा वह हमेशा गड़बड़ रहेगा। बहुत ज़्यादा गड़बड़ रहेगा।

वक्ता: गाड़ी कैसे चलाते हो। बाइक चलाते हो? जब चल रहे हो उस वक़्त क्या हो रहा होता है? सोच रहे होते हो?

श्रोता : नहीं, सर।

वक्ता: चल रही है ना। अभी सर हिलाया? अभी हाँ सर बोला। सोच-सोच के कर रहे हो। काम चल रहा है ना मजे से, बस ऐसा ही है।

श्रोता : सर, इसका मतलब कि भविष्य के बारे में सोचना ही बंद कर दें।

वक्ता: तुम खुद देखो, भविष्य कहा से आ रहा है।

श्रोता : अतीत से।

वक्ता: भविष्य के बारे में कुछ भी सोचते हो या बोलते हो तो वह सब कहाँ से आ रहा होता है?

श्रोता : अतीत से?

श्रोता : अभी आपने बोला कि जो मुझे समझ रहे हैं, वह अभी सोच नहीं रहे होंगे। सर, आपने बोला, कुछ और मैंने रिएक्शन किया, आप से प्रश्न पूछा। यह तो सोच से ही उत्पन्न हुआ?

वक्ता: सोचो नहीं, फिर से फँस गए, सवाल पूछ कर। जो समझ रहे हैं वह भ्रमित नहीं हैं। जो उसकी तुलना कर रहे हैं, यहाँ–वहाँ सोच रहे हैं, तो भ्रम आएगा। भ्रम के लिए विचार आवश्यक हैं। तभी भ्रम आएगा, नहीं तो, जो बात कही जा रही वह इतनी साधारण है कि उसमें भ्रम का कोई करण हो नहीं सकता। वह कोई बाहर वाला है ही नहीं। इसमें भ्रम तो हो ही नहीं सकता। भ्रम होगा सिर्फ़ एक वजह से कि मैंने जो कहा और तुम उसकी कहीं-ना-कहीं तुलना कर रहे हो। नहीं तो बात तो इतनी साधारण है कि यह रही दीवार देख लो। मैंने तुम्हारे जीवन को ही उठा कर बता दिया है, इसमें सोचना क्या है। प्रकट सत्य है।

श्रोता : सर, आप कह रहे थे कि जो लोग सुन रहे हैं वह सोच नहीं रहे हैं। लेकिन आप जब बोला था, तो मैंने कुछ प्रश्न पूछा था, वो उस सोच से ही तो उत्पन्न हुआ था।

वक्ता: मैने कहा तो क्या सोच–सोच के सर हिला रहे हो। कार्य होता है बिना सोचे होता है। अभी तो तुमसे बोल रहा हूँ, सोच-सोच कर बोल रहा हूँ। एक्शन हो रहा है, बिना सोचे हो रहा है। सोचने और समझने में बड़ा अंतर है। यह जो निकल रहा है, मेरे समझ से निकल रहा है। इसमें सोच के लिए बहुत कम स्थान है। तुमने कहा और मैंने कहा उत्तर आ गया, इसमें सोच के लिए कहाँ स्थान है।

हाँ, मुझे सोचना पड़ता अगर मेरे अन्दर स्पष्टता ना होती। सोचता कैसे, उत्तर दूँ, दाएँ जाऊँ या बाए जाऊँ। किधर से शुरू करूँ, किधर से अंत करूँ। मुझे दस बातें सोचनी पड़ती। सोच इस बात का प्रमाण है कि तुम्हारे भीतर स्पष्टता नहीं है। स्पष्टता होती है, सोच की अवस्था नहीं होती है। एक सहज उत्तर आता है, एक सहज रिस्पोंस आता है।

मैंने कहा ना, जो नया – नया गाड़ी चलाने वाला होता है, उसे बहुत सोचना पड़ता है। उसके मन में दस तरीके के ख्याल आते हैं। जिसको पवित्रता हासिल हो जाती है, उसको नहीं सोचना पड़ता। सोचना अगर तुम्हें बहुत पड़ रहा है, तो समझ लेना कि यह उलझन की निशानी हैं।

‘शब्द-योग’सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

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