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तुम्हारे भी मन की भूख नहीं मिटती? || आचार्य प्रशांत, कबीर साहब पर (2021)
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
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आचार्य प्रशांत: प्रकाश से आशय होता है — वस्तुओं का संज्ञान। प्रकाश न हो तो ऑंखें किसी भी वस्तु का संज्ञान नहीं ले सकतीं; और जब प्रकाश होता है तो प्रकाश स्वयं नहीं देखा जाता, प्रकाश में वस्तु देखी जाती है। तो जैसे हम हैं, हमारे लिए वस्तु तभी है जब प्रकाश है। अभी मैं नेत्रों के सीमित संदर्भ में बात कर रहा हूँ।

आँखों के लिए संसार सिर्फ़ तभी है जब रोशनी है। रोशनी नहीं है तो कम-से-कम आँखों के लिए संसार नहीं है। हाथों के लिए हो सकता है, शायद आप छू सकते हों किसी चीज़ को, आँखों के लिए कुछ नहीं है। तो प्रकाश क्या है? प्रकाश सूचक है वस्तु का, प्रकाश माने वस्तु और वस्तु माने संसार। तो जहाँ प्रकाशित इकाइयों की बात हो रही है — जैसे चंद्र, सूरज, अग्नि, बिजलियाँ — तो उनसे क्या आशय हुआ? संसार। दोहराता हूँ, जब आप प्रकाश की बात करते हैं तो संदर्भ आँखों का होता है न, कान का तो होता नहीं, कान के लिए तो प्रकाश की कोई महत्ता नहीं।

आँखों के लिए प्रकाश क्या है? आँखों के लिए प्रकाश अपनेआप में स्वाधीन रूप से कोई महत्वपूर्ण चीज़ नहीं हो सकती; क्योंकि प्रकाश स्वयं देखा नहीं जा सकता‌। प्रकाश एक माहौल है, प्रकाश एक माध्यम है जिसमें चीज़ें देखी जाती हैं। जब प्रकाश किसी वस्तु पर पड़ता है तो उस वस्तु से टकरा कर आपकी आँखों पर आता है; फिर वो आपकी आँखों से भी टकराता है। पहले वो किससे टकराया? जिस चीज़ पर पड़ा, उस चीज़ से टकराने के बाद वो किससे टकराया? आपकी आँखों के परदे से टकराया।

इस तरह से प्रकाश उस चीज़ और आपकी आँखों के बीच का पुल बन गया। तो प्रकाश की अपनेआप में कोई महत्ता नहीं है, उसकी महत्ता यही है कि प्रकाश पुल बनकर उस चीज़ को आप तक ले आया, तो महत्ता फिर किसकी हुई? उस चीज़ की, प्रकाश तो माध्यम मात्र है। प्रकाश माध्यम मात्र है संसार को आँखों तक लाने का। तो जब कहा जाता है 'प्रकाश', तो आशय संसार से है। क्योंकि प्रकाश माने वस्तु, जिस वस्तु पर प्रकाश पड़कर आप तक आ रहा है, और वस्तु माने संसार। वस्तुओं के समूह को ही संसार कहते हैं।

ये जितनी चीज़ें हैं जो चेतना का विषय हैं, इनमें परमात्मा नहीं समाया हुआ है। इनसे नहीं है परमात्मा। न तो ये परमात्मा को घेरे हुए हैं, न ही इनसे परमात्मा का उद्भव है; बल्कि उल्टी बात है — परमात्मा है तो ये चीज़ें हैं।

अब इसमें जो समीकरण है उसको थोड़ा और आगे ले जाएँगे। देखिए, उपनिषद् बहुत साफ़-सुथरे ग्रंथ हैं; कल्पना के लिए, अनुमान के लिए, तीर-तुक्केबाज़ी के लिए इनमें कोई जगह नहीं है। गणितीय हैं, बहुत सत्यनिष्ठ हैं, बड़े ईमानदार हैं।

तो हमने कहा था प्रकाश, और प्रकाश को जानो वस्तु और वस्तु को जानो संसार। अब उसी को एक कड़ी और आगे बढ़ाइए, अगली कड़ी में कहिए — संसार को जानो संसारी। क्योंकि संसार किसके लिए है? जो उसको देख रहा है और संसारी हम जब कहते हैं कि संसार को देख रहा है तो वास्तव में हम संसारी की चेतना की बात कर रहे हैं। आपका नाख़ून थोड़े ही संसार को देखता है। और जब आपकी चेतना सुप्त पड़ जाती है तो आपको संसार प्रतीत होता है क्या?

तो प्रकाश से आशय हुआ वस्तु, वस्तु से आशय हुआ संसार, संसार से आशय हुआ संसारी और संसारी से आशय हुआ चेतना।

समझ में आ रही है बात?

तुम्हारी चेतना में नहीं है सत्य, लेकिन सत्य के होने से तुम्हारी चेतना है। ये कबीर साहब ने कई शताब्दियों बाद क्या कहा कि 'चाँद-सूरज वहॉं पवन न पानी कौं सन्देस पहुँचावे, नैहरवा हमको न भावे।' बिलकुल वही बात है न जो उपनिषद् के ऋषि कह रहे हैं। और ऋषियों ने तो प्रकाश भर की बात करी थी, कबीर साहब ने उसमें और इंद्रियों को भी जोड़ दिया। कहा, न पवन है न पानी।‌ तो दो इंद्रियॉं और जोड़ दीं हैं, कौन-सी दो इंद्रियॉं? पवन और पानी का संबंध किन-किन इंद्रियों से है? नाक और त्वचा और तुम जिह्वा भी उसमें जोड़ सकते हो, बल्कि तीन इंद्रियॉं जोड़ दीं।

सब इंद्रियों का विषय क्या है? संसार। तो जब कहा जाए कि वहाँ पर ये सब वस्तुएँ नहीं हैं, तो वास्तव में ये कहा जा है कि वहाँ पर संसार नहीं है, माने संसारी नहीं है माने संसारी की चेतना नहीं है। माने तुम्हारी चेतना का — जैसी तुम्हारी चेतना होती है — वहाँ कोई प्रवेश नहीं है।

तुम्हारी चेतना जैसी अभी है, वहाँ प्रवेश नहीं कर पाएगी लेकिन तुम्हारी चेतना का उद्गम, तुम्हारी चेतना का स्रोत वही है। आपको दो बातें बताई जा रही हैं — बहुत करीब है आपसे और बहुत दूर भी है। आप जैसे हैं आपसे बहुत दूर है, आप प्रवेश नहीं कर पाएँगे। लेकिन बहुत निकट है आपके क्योंकि आप जैसे हैं, आप हैं उसी से। आप जैसे हैं आप उस तक पहुँच नहीं सकते, तो बहुत दूर हो गया, बहुत दूर हो गया —‘तद् दूरे तद्वन्तिके' —उपनिषद् कहते हैं।

क्या मतलब है इसका? बहुत पास है और बहुत दूर है। आपकी चेतना वहाँ तक नहीं पहुँच पाएगी, आपके विचारों में वो नहीं समाएगा। संसार में उसको ढूॅंढेंगे कि सत्य है कहीं पर, परमात्मा है कहीं पर, कुछ नहीं मिलने वाला। अपनेआप को मूर्ख न बनाएँ। लेकिन फिर भी आप ये नहीं कह सकते कि वो चीज़ अप्राप्य है। शिकायत करने की कोई सुविधा नहीं है आपको कि हम क्या करें, उसे पाने का कोई तरीक़ा नहीं। क्योंकि उसे पाने का कोई तरीक़ा नहीं तो आप कहाँ से आ गए?

ये जो आपकी हलचल है, ये जो आपकी गति है, ये जो सुबह-शाम की बेचैनी है, ये जो पल-पल की धड़कन है, ये कहाँ से आ गई और किसके लिए अगर उसको पाने का, छूने का कोई तरीका नहीं है? लेकिन थोड़ी विनम्रता रखिए, आप जैसे हैं आपको नहीं मिलेगा, इन हाथों में नहीं समाएगा। बहुत पास है अगर आप हटने को मिटने को तैयार हों, बहुत दूर है अगर आपको अपनी सत्ता, अपनी हस्ती, अपना वजूद — जैसे आप हैं, अपनी अस्मिता बनाए ही रखनी है तो। ऐसे बनाए रखोगे तो कुछ नहीं होगा।

सारी समस्या हमारी वही है न! हम कलपते रहते हैं, परेशान होते रहते हैं — 'बेहतरी चाहिए, सुख चाहिए, लेकिन जैसे बने हुए हैं, वैसा रहते हुए चाहिए।' ये तो कोई कहता ही नहीं कि उसे दुख चाहिए लेकिन दुख मिलता सबको है। क्यों मिलता है? क्योंकि दुख आपको दुखी रहते हुए हटाना है। कह रहे हैं दुख हटाना है, पर जो दुखी है उसको बचाना है। सुख चाहिए दुखियारे को दुखियारा बने रहते हुए, कैसे मिलेगा बताओ? बोलो!

ये बात यहाँ कहने में आसान लग रही है। सैद्धांतिक रूप से सुनने में आसान लगती है। लेकिन हम दिन-प्रतिदिन करते यही हैं। हम अपनी चेतना, अपनी वर्तमान स्थिति पर इतना भरोसा करते हैं, इतना नाज़ है हमें अपने ऊपर, इतना आत्मविश्वास है कि हम कहते हैं, ‘ऐसे ही रहते-रहते हमारी आंतरिक प्रगति हो जाएगी या हो सकती है, हम कोशिश करेंगे। हमें भरोसा पूरा है।’ और वो होती नहीं।

ऋषिओं ने इसीलिए बार-बार, बार-बार कहा है — नहीं, नहीं, नहीं! उन्होंने और किसको नहीं बोला है? किसको नकारा है? उन्होंने हमारे आत्मविश्वास को नकारा है। वास्तव में सबसे बड़ा अंधविश्वास आत्मविश्वास ही है। हम सोचते हैं कि बाहर की किसी ऐसी चीज़ पर भरोसा कर लेना जो है ही नहीं, अंधविश्वास कहलाता है। नहीं, पहला अंधविश्वास है अपने भीतर की उस चीज़ पर भरोसा कर लेना जो है ही नहीं।

हम सोचते हैं कि हमारे भीतर कोई सच बैठा हुआ है, हमारे भीतर कोई सच नहीं है, बस एक खालीपन, सूनापन, खोखलापन है। तो पहला अंधविश्वास है अपने पर भरोसा करना, आत्मविश्वास से बड़ा धोखा दूसरा नहीं। अंधविश्वास कहा भी मत करा करो, आत्मविश्वास कहा करो क्योंकि जो आदमी बाहर की किसी चीज़ पर भी अंधविश्वास कर रहा है, उसे अपने विश्वास पर बड़ा आत्मविश्वास है न! 'मुझे भरोसा है कि बाहर की जिस चीज़ पर मैं भरोसा कर रहा हूँ वो चीज़ ठीक है।' तो ले देकर उसने भरोसा किस पर किया है — बाहर की चीज़ पर या खुद पर?

तो जब आप खुद पर भरोसा करते हैं, तब तो आप आत्मविश्वासी हैं ही, जब आप बाहर की भी किसी चीज़ पर भरोसा करते हैं, तब भी आप आत्मविश्वासी ही हो रहे हैं। तो बाहर की चीज़ पर अगर आप अंधविश्वास कर रहे हैं, तो वो भी है आत्मविश्वास का ही एक प्रकार।

समझ में आ रही है बात?

और ऋषिओं की लगातार कोशिश है उस झूठे आंतरिक अंधविश्वास को तोड़ें। कुछ भी हो जाए तोड़ो इसको, क्योंकि वही आपको रोके हुए है।

दो तरह के लोग होते हैं — एक वो जिन्हें खुद को छोड़ने से बड़ा डर लगता है, तो वो अपनेआप को पकड़े रहते हैं, पकड़े रहते हैं — यही तो आत्मविश्वास है न। उन्हें जताया भी जाता है, उन्हें दिखाया भी जाता है‌। उन्हें यदा-कदा दिख भी जाता है कि उनके भीतर ऐसा कुछ नहीं जिस पर भरोसा किया जा सके, वो तो भी अपनी ही चाल चलने पर डटे रहते हैं।

और दूसरे लोग होते हैं फिर हमारे साहब जैसे जो कहते हैं, 'नैहरवा हमका न भावे'। जो ये कहना शुरू कर देते हैं हमको नहीं पसंद है अपना वर्तमान स्वरूप; ये जो हम इस धरती से बहुत कुछ लेकर के खड़े हैं, हमको पसंद नहीं है। नैहर यही है।

हमका 'न' भावे, नकार देख रहे हो? वो कह रहे हैं, 'हमें 'हम' पसंद नहीं हैं'— हम माने कौन-सा हम? जो अहम् है, वो हमें पसंद नहीं है; नैहरवा माने अहम्। आसमान के हैं हम, ज़मीन पर गिर गए हैं और यहाँ फॅंस गए हैं; यही नैहर है, नीचे। ये हमें पसंद नहीं है। असली घर हमारा वहॉं है। और फिर अपने घर का वर्णन करते हैं, 'अजी! अपने घर का क्या बताएँ, वहॉं कोई आवे न जावे।'

तो ये दो तरह के लोग हुए — एक, जो इसको ही अपना घर मान बैठे हैं। क्या बताएँ उन्हें जलती हुई चिताएँ भी कुछ होश नहीं दिला पातीं, तुम इसे अपना घर मान बैठे हो! और दूसरे हैं जो कहते हैं, 'अगर ये घर है तो ये हमका न भावे।' संसार नहीं भाए, ये बाद की बात है। संसार अगर तुम्हें पीट-पाट दे तो तुम कुछ समय के लिए कह सकते हो, ‘संसार हमें नहीं भाता’। बहुत लोग कहने लगते हैं, ‘ये दुनिया, ये महफ़िल मेरे काम की नहीं’, क्यों काम की नहीं? क्योंकि पीट दिए गए। बात उससे आगे की हो रही है, बात हो रही है कि क्या जो तुम हो, तुम खुद को भाते हो क्या? अपनेआप को भाना बंद करो।

अपनी पार्थिव हस्ती के प्रति एक वैराग्य का भाव होना चाहिए और तुममें जो वृति है अपनी पार्थिवता से ही लिप्त रहने की उसके प्रति तुममें ज़रा-सी घृणा भी होनी चाहिए। तुम अनासक्त हो सको, विरक्त हो सको, साक्षी ही हो सको, उसके पहले तुम्हें ज़रा-सी घिन आनी चाहिए। घिन में भी थोड़ी आसक्ति होती है लेकिन वो ज़रूरी होती है लिप्सा को काटने के लिए। साक्षित्व अचानक से नहीं आ जाएगा, पूर्ण वैराग अचानक से नहीं आ जाएगा, पहले थोड़ी-सी घिन आनी चाहिए।

दिक्कत ये है कि घिन तो दूर की बात रही, हम अपने बड़े दीवाने होते हैं। हमें अपने पर बड़ा नाज़ होता है। ऋषि समझा रहे हैं — ‘क्यों इतना नाज़ कर रहे हो अपनेआप पर? तुम्हारे हाथ बहुत गंदे हैं इनमें कोई साफ़ चीज़ नहीं आने वाली। तुम्हारे चाँद-सूरज भी बहुत, बहुत मैले हैं। इनका प्रकाश बहुत क्षीण है। ये भी तुम्हें राह नहीं दिखा पाएँगे। तुम्हारी दुनिया में ऐसा कुछ नहीं है जो अंततः तुम्हारे काम आ पाएगा। और इसकी ज़िम्मेदार दुनिया नहीं है क्योंकि दुनिया अपनेआप में कुछ नहीं है, वो तुम्हारी दुनिया है। अपने पर इतना भरोसा, इतना विश्वास करना बंद करो।’

'तो फिर क्या करें? क्या करें?' जो तड़प रहा है, उसके दीवाने मत हो जाओ। जो तड़प रहा है उसका नाम 'मैं' है; वो तुम हो। उस पर क्या इतना भरोसा करते हो? क्या इतनी अदाएँ, अठखेलियॉं दिखाते हो? जिसके लिए वो तड़प रहा है, उसके दीवाने हो जाओ।

समझ में आ रही है बात?

तुम कौन हो? तुम एक वेदना हो, कराह हो, एक पुकार हो। अँधेरे में रात में दूर तक फैलती हुई एक चीख हो। चीखने वाले के क्या तुम इतने प्रशंसक हुए जाते हो? देखो कि वो किसको पुकार रहा है, देखो कि उसकी चीख पर किसका नाम खुदा है। कुछ उसकी भी बात करोगे? ऋषि कह रहे हैं, ‘जिसके लिए हो तुम, उसको याद करो। अपनेआप को क्या दिन भर याद करते रहते हो — 'मैं मैं मैं मैं मैं!'

और अपने लिए नहीं हो तुम, क्योंकि अपने लिए तुम यदि होते तो तुम्हें तो तुम प्राप्त ही हो, तुम संतुष्ट होते अब तक। तुम्हीं अगर बहुत बड़ी चीज़ होते तो तुम इतने असंतुष्ट क्यों होते? बताओ न! क्योंकि तुम्हें तुम तो मिले ही हुए हो न, तुम्हें और कुछ मिला हो चाहे न मिला हो, तुम्हें तुम तो प्राप्त हो। और उसके बाद भी दिन भर का ताप है, अतृप्ति है, भूख है, अज्ञान है, छटपटाहट‌।

तो तुममें तो ऐसी कोई बहुत बड़ी चीज़ नहीं, ऐसी कोई होशियारी नहीं, ऐसी कोई ख़ूबसूरती, कुछ नहीं। लेकिन है कोई, है कुछ, जिसकी ख़ातिर तुम्हारी कराह है। उसको याद करो, उसका नाम लो, और बाकी सब नामों को ज़रा पीछे रखो। यूॅं ही नहीं हो तुम, किसी के लिए हो तुम, सोद्देश्य हो तुम, सप्रयोजन हो तुम। निश्चित-सी बात है कि अगर तुम किसी उद्देश्य के लिए हो तो उद्देश्य तुमसे बड़ा है न! क्योंकि तुम्हारी हस्ती उसी के लिए है; तुम छोटे हुए, वो बड़ा हुआ। तो जो बड़ा है, प्रकट-सी बात है उसको ज़्यादा महत्व दोगे, उसको याद रखोगे न? बोलो!

कटोरा तुम्हारा खाली है, पेट तुम्हारा खाली है, दाद देते फिरोगे? पेट बजा-बजा के नाचोगे कि पेट मेरा खाली है और कटोरा मेरा खाली है? या उसको तलाशोगे जो तुम्हारे पात्र और पेट दोनों को भर देगा? बोलो!

हम ऐसे ही हैं। हम जानते हैं कि हम कितने खाली हैं, हम अपने खालीपन को ही बजा-बजा के नाचते रहते हैं। जैसे कोई खाली ढ़ोल बजाए, आवाज़ खूब आती है। आती है न? हमसे भी आवाज़ कितनी ज़्यादा आती है। जो खाली होता है उससे आवाज़ ज़्यादा ही आती है। और उसको बजाते-बजाते हम भूल ही गए हैं कि पैदा हुए हैं उसको भरने के लिए। जो उसको भरेगा वही हमारे होने की सार्थकता है, प्रयोजन है; उसको याद रखना है।

समझ में आ रही है बात?

वो हमसे बड़ा है, वो हमसे आगे का है। हम जैसे हैं, उससे बहुत छोटे हैं, इसलिए वो हममें नहीं समाएगा। इसी बात को ऋषि बार-बार कहते हैं कि नहीं, तुम्हारा प्रकाश उस तक नहीं पहुँच पाएगा, तुम्हारे दिन-रात उस तक नहीं पहुॅंच पाएँगे; तुम्हारे विचार, तुम्हारे ख़्वाब, तुम्हारी कल्पनाएँ, उस तक नहीं पहुॅंच पाएँगी; तुम्हारा दर्शन उस तक नहीं पहुॅंच पाएगा; तुम्हारा गणित, तुम्हारा तर्क़ उस तक नहीं पहुॅंच पाएगा; क्योंकि तुम्हारा जो कुछ है वो बहुत छोटा है। छोटा है इसलिए वो माॅंग करता है विराट होने की।

छोटे को विराट होना है, तुम्हारा काम है छोटे को विराट होने का मौका देना।‌ या तुम्हारा काम है कि छोटे के छुटपन का ही उत्सव मनाना? कि 'देखो, कितना छोटा है, कितना छोटा है, आओ गीत गाएँ!' तुम गीत गा भी लोगे तो भी छोटा तो परेशान ही रहेगा क्योंकि छोटा होना उसका स्वभाव नहीं है न। वो तलाश रहा है बड़प्पन को, वो तलाश रहा है वैराट्य को। वो बार-बार कह रहा है कि मुझे बड़ा चाहिए। और तुम कह रहे हो, 'न! न! तू कितना छोटा है, कितना प्यारा है, उ लू लू लू, तुझे चुम्मी ले लूँ।'

ऐसा हमारा जीवन है। जैसे तुम्हें कोई भिखारी मिल गया हो दस दिन का भूखा, और तुम कलाकार आदमी, तुम कहो, 'आ हा हा! क्या भिखारी मिला है! आओ, इसकी तस्वीर बनाएँ, चित्रोत्सव करेंगे।' और तुम्हारा एक और दोस्त आ गया, वो कह रहा है, 'आ हा हा! क्या भिखारी है! मैं इस भिखारी पर एक गीत लिखूॅंगा, ढ़ोल बजा-बजा के गाऊॅंगा।' और भिखारी कह रहा है, 'भाई! मेरी वर्तमान हालत में ऐसा कुछ नहीं है जिसका तुम उत्सव मना सको। मेरी वर्तमान हालत उत्सव मनाने के लिए नहीं है, बदलने के लिए है।' ये बात हमें समझ में ही नहीं आती।

हमारी जो वर्तमान हालत है, तुम्हें उसका उत्सव नहीं मनाना है, गीत नहीं गाने हैं। नाचना नहीं है अपनी वर्तमान हालत पर। वो भिखारी कराह रहा है उसे खाने को चाहिए, तुम भिखारी पर कविता लिख रहे हो, गीत लिख रहे हो, पूरा ऑर्केस्ट्रा बुला लिया है। वो रो रहा है, कह रहा है, 'तुम मेरी हालत में ऐसा क्या देख रहे हो कि तुमको राग-रंग सूझ रहा है? मज़ा दिख रहा है तुम्हें मुझमें? मैं तो चाहता हूँ कि मेरी वर्तमान हालत बदले और तुम मेरी वर्तमान हालत को ही गौरवान्वित कर रहे हो!'

ऐसे ही हम हैं, वो भिखारी कौन है? कौन है? वो हम हैं। हम अपनी वर्तमान हालत को बदल नहीं रहे हैं, हम क्या कर रहे हैं? हम उसी का गीत गा रहे हैं — आ हा हा! तस्वीर खींची जा रही है, लेख लिखे जा रहे हैं। नाच-गाना चल रहा है और भिखारी कह रहा है, 'ये सब कुछ देर तक और चलता रहा तो मैं बचूॅंगा नहीं।' उसकी मौत तो पता चल जाएगी, वो कटे पेड़ की तरह गिर पड़ेगा, भूखा है बहुत; हमारी मौत आंतरिक होती है, पता भी नहीं चलती।

आ रही है बात समझ में?

यहाँ कुछ ऐसा नहीं है जो पूर्ण हो, यहाँ कुछ ऐसा नहीं है तुम जिसके प्रशंसक बन जाओ, मुरीद बन जाओ। जिसको ले करके तुम्हारे भीतर से गीत-सरिता उमड़ने लगे, यहाँ कुछ ऐसा नहीं है। यहाँ तो जो कुछ है वो एक भूख के जैसा है, यहाँ तो जो कुछ है वो एक तलाश के जैसा है, जो कुछ है एक पुकार के जैसा है। उसे पूर्णता दो, उसे प्राप्ति दो, उसे तृप्ति दो। वही फिर नाचना-गाना है, वही असली राग है, उसी में रंग है, वही उत्सव है। सच के अलावा किसका त्यौहार मनाने लग गए? बताओ न!

दोनों बातें हमेशा एक साथ रहेंगी, कितना सुंदर है न, 'नैहरवा हमका न भावे, नैहरवा हमका न भावे, नैहरवा हमका न भावे', तीन बार; फिर 'सांई की नगरी परम अति सुंदर, जहाँ कोई आवे न जावे।' बात देख रहे हो! तीन बार नकारा पहले, फिर ये कहने का हक़ मिला 'सांई की नगरी परम अति सुंदर।' शुरुआत तो वहाॅं से करोगे न जहाँ फॅंसे हुए हो‌। यहाँ नकारो तो पहले — 'नैहरवा हमका न भावे, न भावे, न भावे। सांई की नगरी परम अति सुंदर।'

कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें सांई की नगरी से कोई मतलब ही नहीं, कुछ ऐसे होते हैं जो कहते हैं उन्हें सांई की नगरी से मतलब तो है पर नैहरवा भी ठीक है — ये दोनों ही खुद को मूर्ख बना रहे हैं। पहले नेति-नेति करनी पड़ेगी उन सब की जो तुम्हें बाॅंधे हुए हैं, पकड़े हुए हैं।

अभी उस दिन मैं कह रहा था कि जो त्रिदेव हैं, त्रिपुटी है, उसमें महादेव का स्थान सबसे ऊँचा इसीलिए है क्योंकि वो नकार के प्रतीक हैं। वो समाप्ति के सूचक हैं। शुरू करना आसान होता है, रोकना कठिन होता है। ठीक वैसे, जैसे जीवन की शुरुआत बहुत आसानी से हो जाती है पर जीवन से मुक्ति — मैं मृत्यु की बात नहीं कर रहा — मुक्ति, बड़ी मुश्किल से मिलती है।

अपने जीवन में किसी का प्रवेश करा लेना आसान है पर जीवन में तुम जिन बंधनों में बॅंध गए हो, उनको काटना जानते हो न कितना मुश्किल है। शिव काटते हैं, इसीलिए शिव सर्वोच्च हैं; ब्रह्मा से भी ऊपर, विष्णु से भी। काटना ऊपर की बात है इसीलिए पहले काटने की बात करनी पड़ेगी, 'नैहरवा हमका न भावे, न भावे, न भावे।’ फिर कहो, ‘सांई की नगरी परम अति सुंदर।'

जीसस की बात है, बाइबिल में कहते हैं — जब तक तुम ऐसे न हो जाओ कि तुम अपने घर से, परिवार से, समाज से, माँ-बाप से, पत्नी से, यहाँ तक की ख़ुद से और अपनी ज़िंदगी से भी घृणा न हो जाए, तब तक तुम मेरे पास नहीं आ सकते। 'नैहरवा हमका न भावे!' आना ही मत मेरे पास जब तक तुम्हें अपने बारे में सब कुछ घृणास्पद न लगता हो।

जिनको अभी अपने ऊपर बड़ा विश्वास है, जो अभी खुद को देख-देख के ही इतराते हों, जो अपनेआप को बड़ा रूपवान या गुणवान समझते हों, उनको अभी भ्रम की चक्की मुबारक — पिसते रहो।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, उस भूख की तृप्ति कैसे करें?

आचार्य: वो भूख कैसे पैदा होती है — प्रक्रिया समझना बहुत ज़रूरी है न, ध्यान से समझिएगा। वो भूख पैदा होती है ग़लत चीज़ें खा-खा के। जो हमारी सामान्य भूख होती है पेट की, वो होती है इसलिए क्योंकि हमें सही चीज़ मिली नहीं। तो तुम्हें कुछ खाना है, फल, सब्ज़ी-तरकारी, तुम्हें उसकी भूख है, तुम्हें रोटी चाहिए, भूख है। तो इस भूख की प्रकृति क्या है जो हमें सामान्यतया लगती है, जो शारीरिक भूख है? कि कुछ चाहिए था जो मिला नहीं, इसलिए भूख है।

यहाँ जिस भूख की बात हो रही है उसकी प्रकृति बिलकुल दूसरी है। वो भूख इसलिए है क्योंकि तुम्हें कुछ चाहिए नहीं था, पर तुमने ऊल-जलूल, अंड-बंड बहुत सारा खा लिया। शरीर की जो भूख है वो इच्छित वस्तु या आवश्यक वस्तु के प्राप्त न होने से लगती है। कुछ कमी है तो भूख है। ये शारीरिक भूख की प्रकृति है। क्या? कुछ कमी है तो भूख है। अच्छे से समझो, कुछ कमी है तो भूख है। आंतरिक भूख की प्रकृति बिलकुल उल्टी है; वहाॅं की क्या प्रकृति है? कुछ अधिक है इसलिए भूख है। कुछ तुमने ऐसा ले लिया है जो तुम्हें नहीं लेना चाहिए था, कुछ अनावश्यक पकड़ लिया है तुमने इसलिए तुम्हें भूख लगी हुई है।

शरीर की भूख कहती है कि कुछ कमी है और मन की भूख कहती है कि कुछ अधिक है, कुछ अतिरिक्त है, कुछ अनावश्यक है। तो अब बताओ भूख मिटाएँ कैसे भीतर वाली? शरीर की भूख कैसे मिटाएँगे? कुछ खा के क्योंकि कमी है। शरीर की भूख क्या बोलती है, कुछ कमी है तो उसे मिटाने के लिए क्या करना पड़ेगा? कुछ लेना पड़ेगा अंदर, कुछ जोड़ना पड़ेगा स्वयं में। कुछ स्वयं में जोड़ना पड़ेगा, किसी चीज़ का सेवन करना पड़ेगा।

मन की भूख बोलती है कि भूख इसलिए लगी है क्योंकि कुछ अतिरिक्त है, तो वो भूख कैसे मिटेगी फिर? त्यागना पड़ेगा, त्याग। ये बात हमें समझ में ही‌ नहीं आती। क्योंकि हमें तो जब भी कुछ परेशानी हुई है तो वो परेशानी हमने दूर करी है किसी चीज़ को अपने में जोड़ के ही।

गरीबी है, अपनेआप में पैसा जोड़ो; भूख लगी है, अपनेआप में भोजन जोड़ो; अकेलापन है, अपनेआप में व्यक्ति जोड़ो; अज्ञानी हो, अनाड़ी हो, अपनेआप में ज्ञान जोड़ो, है न! हमारा ऐसा ही चला है न? यही हमारा अनुभव है। तो भीतर भी जब वो ख़लिश उठती है — बेचैनी, सूनापन — तो अपने पुराने अनुभवों पर चलते हुए हम क्या सोचते हैं कि इसमें भी हमें कुछ जोड़ देना है तो ये मिट जाएगा।

नहीं, वो जोड़ देने से नहीं मिटेगा, उसकी प्रकृति बिलकुल विपरीत है। वो त्यागने से मिटेगा। तुम्हें वमन करना पड़ेगा। तुमने कुछ व्यर्थ का खा लिया है, उलटी करो। त्यागो, छोड़ो। उलटी करने में हमें डर लगता है। हम कहते हैं, 'अभी तक चीज़ अपनी थी, पेट में थी, उलट देंगे तो नुक़सान न हो जाए!' तो तुम एक काम करो, तुम एक थैले में उलट लो और वो थैला सर पर बाॅंध लो। लेकिन उलट लो भाई!

होते हैं कुछ ऐसे भी सूरमा! वो कहते हैं, 'बताओ यार, दो सौ ग्राम अपनी चीज़ है बाहर, कैसे छोड़ दें किसी के लिए! हीरे-मोती हैं! हम बाहर छोड़ देंगे, कोई चुरा ले गया तो? अभी तो अपना है न, पेट के अंदर है।' ऐसी हमारी हालत है। अब हॅंस रहे हो तुम लोग कि ऐसा कौन होगा! इतना बेवकूफ़ कौन होगा कि वमन करते समय कहेगा कि हीरे-मोती हैं और हम उल्टी कर देंगे, वो उल्टी कोई चुरा ले गया तो?

पर यही तो हम करते हैं न आंतरिक तौर पर। जो चीज़ त्यागने लायक है उसको पकड़ कर बैठे हुए हैं कि हीरे-मोती है, हीरे-मोती है। उसको फेंकना होता है बाहर, फेंको! वमन करो। तुमने कुछ ऐसा ले लिया है जो तुम्हें लेना नहीं था। पूर्ण से अपूर्ण जानते हो न कैसे बनते हैं — कुछ घटा के नहीं, कुछ जोड़ के। पूर्ण में से कुछ घटा दो तो वो पूर्ण ही रहता है। लेकिन बड़ी त्रासद, बड़ी दुखद घटना घट जाती है जब तुम पूर्ण में कुछ जोड़ने की कोशिश करते हो।

उपनिषद् यहाँ तक तो कहते हैं कि 'पूर्ण से पूर्ण को हटा दो तो भी पूर्ण ही शेष रहता है।' लेकिन एक बात वो साफ़-साफ़ नहीं बोलते कभी, वो मैं बता रहा हूँ तुमको —'पूर्ण से पूर्ण हटा दोगे तो पूर्ण ही शेष रहेगा, लेकिन पूर्ण में अगर कुछ जोड़ दोगे तो वो अपूर्ण बन जाएगा।' पूर्ण में से पूर्ण घटा देना — ये तो कुछ नहीं, लीला है, मज़ेदार बात है। पूर्ण में कुछ जोड़ने की कोशिश करना, हिमाकत करना, धृष्टता, दुस्साहस करना — ये माया है। जो पूरा है, उसमें भी कुछ जोड़ना है, ये हम करते हैं।

अहंकार पूर्ण से वास्तव में छोटा नहीं होता, वो पूर्ण से थोड़ा बड़ा होता है। वो कहता है, 'पूर्ण वास्तव में पूरा है नहीं, हम उसमें कुछ और जोड़ेंगे, कुछ हासिल करेंगे; और हासिल कैसे करेंगे? जन्म लेकर के।' अब वो जन्म लिया है और दुनिया में कुछ हासिल करने निकले हुए हैं । कह रहे हैं, 'बिना जन्म लिए मजा नहीं आ रहा था, ये मुक्ति वगैरह काफ़ी उबाऊ बात थी। तो अब हम बंधनों में उतरे हैं, कुछ यहाँ पर करतूत करके दिखाएँगे। मैदान मारेंगे, दुनिया जीतेंगे, बादशाहत हासिल करेंगे।'

समझ में आ रही है बात?

अहंकार आत्मा का अभाव नहीं है, अहंकार आत्मा के ऊपर पड़ा हुआ आवरण है। अहंकार है आत्मा में कुछ जो जुड़ गया। आत्मा विलुप्त तो हो नहीं सकती, या हो सकती है? वो तो अनंत है! वास्तव में उस पर कोई आवरण भी नहीं पड़ सकता इसीलिए वो जो आवरण पड़ता है उसको कहते हैं कि झूठ है, मिथ्या है, माया है। पर अहंकार कहता है जो अनंत आत्मा है, मैं उस पर भी कुछ जोड़ दूँगा। जैसे आवरण डाल दो किसी एक चीज़ पर।

किसी भी चीज़ के ऊपर तुम जो आवरण डालते हो, जो उसके ऊपर का लिहाफ़ होता है, एनवेलप होता है, वो उससे बड़ा ही होगा न! बड़ा ही तो होगा! तो अहंकार अपनी दृष्टि में आत्मा से बड़ा होता है। आत्मा से बड़ा कुछ हो नहीं सकता, तो फिर हम कहते हैं कि अहंकार क्या है? मिथ्या है, झूठ है। पर अपनी नज़र में वो क्या होता है? वो ढक लेता है, वो आच्छादित कर लेता है, वो ऑब्फसकेट (ढकना) कर लेता है, वो एनवेलप कर लेता है, किसको? सत्य को भी।

तो ऐसे मिटानी है भूख! कैसे? कुछ हटा के, कुछ छोड़ के, कुछ वमन करके। किसका है अभी याद नहीं आ रहा, पर कहा था अभी, खोजोगे तो मिल जाएगा कि पाप की परिभाषा थी कि जो अनावश्यक है, जो अतिरिक्त है, वही पाप है। शायद गुरजिएफ की बात है। बिलकुल औपनिषदिक बात कही है। तुम तो पूरे ही पूरे हो, कुछ नहीं भी हो तो भी पूरे हो। ये जो तुमने ज़बरदस्ती चीज़ें पकड़ रखी हैं न, यही तुम्हें अधूरा बनाए हुए हैं।

'तो फिर क्यों कहते हैं आप कि सप्रयोजन ज़िंदगी जिएँ?' इसलिए कि बेटा तुमने जो अनावश्यक चीज़ें पकड़ ली हैं, उनको तुम यूॅं ही नहीं छोड़ पाओगे। उन्हें छोड़ने के लिए भी तुम्हें कुछ और चीज़ें चाहिए। सही चीज़ें पकड़ना ताकि जो गलत चीज़ें पकड़ रखी हैं, वो छूट जाएँ — ये साधना है। और ये साधना तलवार की धार जैसी है क्योंकि और-और ज़्यादा चीज़ें पकड़ने को तो हम आतुर हैं ही, और साधना भी कहती है कि कुछ नया पकड़ो ताकि पुराना छूट सके।

तो जो नया पकड़ना है, बड़ी सावधानी के साथ पकड़ना होता है। नहीं तो ये होगा कि अगर पुरानी दस चीज़ें थीं, तो उन दस चीज़ों को छुड़ाने के नाम पर तुम एक और ग्यारहवीं चीज़ पकड़ लोगे। ग्यारहवीं चीज़ ऐसी हो कि पुरानी पकड़ी हुई दस चीज़ों को छुड़ा दे — ये बड़ी सावधानी का काम है। इसीलिए हर ग्रंथ शास्त्र नहीं होता और हर शास्त्र उपनिषद् नहीं होता। हर किताब में वो दम नहीं है कि पिछली सब किताबों ने तुम्हारे दिमाग़ पर जो अत्याचार करा है, उसकी दवा कर दे। नहीं हो पाता।

बहुत सावधानी से किसी एक शास्त्र का, एक औषधि का चयन करना पड़ता है। यही साधना है — सही चयन करो और फिर जो चुना है सही, उसको ऐसे मुट्ठी भींच के पकड़ लो कि कुछ भी हो जाए, इसको छोड़ेंगे नहीं, जान चली जाए भले।

प्र२: इसी में आचार्य जी कई बार और कई लोगों से ये प्रश्न आया है कि कोई व्यक्ति अगर जीवन में आ गया है, उसको नहीं त्यागा जाता; और यह पता भी है कि उसके साथ जीवन ख़राब भी जा रहा है, समय ख़राब जा रहा है।

आचार्य: नहीं, 'व्यक्ति नहीं त्यागा जाता', मैं इस बात को थोड़ा विस्तार में समझाना चाहूॅंगा। व्यक्ति को त्यागने का क्या मतलब होता है? तुमने कोई व्यक्ति पकड़ रखा है, इस बात का क्या अर्थ है? जब तुम कहते हो कि मैंने जीवन में कोई व्यक्ति पकड़ रखा है, इसका क्या अर्थ है? क्योंकि इसी से सम्बंधित ये बात है कि मुझे कोई व्यक्ति त्यागना है; त्यागना तो पीछे होगा, पहले ये बताओ, 'पकड़ रखा है' — इससे आशय क्या है तुम्हारा? हाथ से पकड़ रखा है? कैसे पकड़ रखा है?

प्र२: मन से रिश्ता। मोह कह लीजिए एक तरह से।

आचार्य: उस मोह से किसको लाभ हो रहा है — तुमको या उस व्यक्ति को?

प्र२: लाभ तो पारस्परिक है, दोनों को ही है एक तरह से लाभ।

आचार्य: तुम्हारे मोह से उसको लाभ होता है, वाक़ई?

प्र२: नहीं, मोह से नहीं होता।

आचार्य: किसी व्यक्ति को त्यागने की बात उसी तल पर होगी न जिस तल पर तुमने उसे पकड़ रखा है। तुमने उसे हाथ से तो पकड़ रखा नहीं है या पकड़ रखा है हाथ से? तुमने उसे मन से पकड़ रखा है न! और मन से तुमने उसे अपने स्वार्थ की ख़ातिर पकड़ रखा है। तो उससे जो तुम्हारा स्वार्थ है, वो त्याग दो।

व्यक्ति नहीं त्यागना होता है, व्यक्ति से सम्बंधित अपना स्वार्थ त्यागना होता है।

क्योंकि व्यक्ति को त्यागने जैसी बात ही बड़ी विचित्र है, व्यक्ति को पकड़ किसने रखा होता है? किसी ने नहीं। जो तुमने उससे अपना स्वार्थ पकड़ा हुआ है न, उसको छोड़ दो। उसके बाद तुम भले उस व्यक्ति के साथ एक कमरे में भी रह रहे हो, तो भी तुम उससे लिप्त नहीं हो, आसक्त नहीं हो, बद्ध नहीं हो। और अगर तुम्हारा उससे मन से स्वार्थ का रिश्ता है, तो हो सकता है तुम भारत में हो वो अमेरिका में है, तो भी तुमने उसको अपनी पूरी हस्ती से जकड़ रखा है।

व्यक्ति को त्यागने का मतलब ये क़तई नहीं होता है कि तुम उसके घर से निकल जाओ या उसे अपने घर से निकाल दो। ये नहीं होता मतलब। उससे जो भी तुमने अपना स्वार्थ बैठाया है, उस स्वार्थ की व्यर्थता को जान लो, छोड़ दो — बस यही है मुक्ति! और इस मुक्ति में तुम्हारा भी भला है, उस व्यक्ति का भी भला है क्योंकि जब रिश्ता स्वार्थ का नहीं होगा, तो फिर उस रिश्ते में भलाई आती है।

और जब तक रिश्ते में स्वार्थ होता है, तुम उस स्वार्थ को कोई और नाम दे दो भले — तुम उसे ज़िम्मेदारी कह लो, मोह कह लो, विवशता कह लो, आदत कह लो। लेकिन ये जितने भी नाम हैं, ये सब कटुता और क्लेश के पर्यायवाची हैं। किसका भला होता है कटुता से और क्लेश से?

प्र३: प्रणाम, आचार्य जी। तो ये जो पूरी प्रक्रिया चल रही है और इसकी अपनी गति, इसका अपना मोमेंटम (संवेग) है। और आपने बताया पिछले सत्र में कि अभ्यास की ज़रूरत पड़ती है, और हमसे ऋषि बार-बार कह रहे हैं कि ये चीज़ जान लेने से इससे मुक्ति हो जाती है। तो अभ्यास की ज़रूरत क्या इसलिए पड़ती है क्योंकि जानने में कुछ कमी है?

आचार्य: वास्तव में जब तक तुम वही हो जो पहले था, तुम जान सकते ही नहीं। तो जानना और होना बिलकुल एक बात है और साथ-साथ चलते हैं। अगर तुम्हारा दावा है — मान लो अभी हम बात कर रहे हैं और इस सत्र में तुम्हारा दावा है कि हमने जो कुछ बातें करीं वो तुमने जान लीं, अगर तुमने जान ली हैं, तो तुम यहाँ से वही नहीं निकल सकते जो यहाँ पर आए थे। तो फिर तुम्हें अपने दावे को पुष्ट करने के लिए, सत्यापित करने के लिए, बिलकुल दूसरा इंसान हो जाना पड़ेगा। और अगर दूसरा इंसान नहीं हो पाए तो अभी जान नहीं पाए। तो होना और जानना, इनको लगातार एक मानना।

तुम सिर्फ़ उतना ही जानते हो जितना तुम हो गए हो।

नोइंग मस्ट बी ऑथेंटिकेटिड बाय बीइंग। (जानने को होने के द्वारा प्रमाणित किया जाना चाहिए।) अगर बीइंग नहीं हुई है, तो नोइंग (जानने) का दम्भ मत भरो। इसलिए अभ्यास चाहिए।

प्र४: अभी आपने आचार्य जी बताया कि हमने काफ़ी कुछ पकड़ लिया होता है। क्योंकि आपने बताया कि अगर आप पूर्ण में से कुछ घटा दोगे तो, तो वो पूर्ण ही है लेकिन अगर आप कुछ जोड़ देते हो तो उसमें अपूर्णता आती है।

आचार्य: और जोड़ा जा नहीं सकता क्योंकि पूर्ण अनंत है, तुम अनंत में कुछ जोड़ सकते नहीं हो लेकिन अहंकार तो पगला है, उसको मिथ्या ही ये गुमान रहता है कि वो पूर्ण माने अनंत, माने इंफिनिटी (अनंतता) में भी कुछ जोड़ सकता है और वो ऐसा कर भी डालता है। उसके कर डालने का सबूत हम लोग हैं।

प्र४: तो, आचार्य जी, ये बात सुनने में तो सही लगती है, लेकिन आपने कहा है कि आप उसको छोड़ दो, तो हमने ऐसा क्या पकड़ रखा है जिसको हम छोड़ दें?

आचार्य: अभी देखो जैसे तुमने ये सवाल पूछा, ये सवाल कहाँ से आया?

प्र४: ये सवाल इससे आया कि जब आपने बोला कि हम कुछ पकड़ रहे हैं क्योंकि अंदर से कुछ बेचैनी तो है, और आपने बोला कि बेचैनी पूर्ण में तो हो नहीं सकती है।

आचार्य: तो ये सवाल तुम्हारे पास था, तभी आया न! तो इसे छोड़ दो। जैसे तुमने पूछा न, 'हम कैसे पकड़ते हैं?', जैसे अभी ये सवाल पूछा, ऐसे पकड़ते हैं।

जो कुछ भी हमें अपना लगता है, जैसे सवाल हमें क्या लग रहा है, अपना लग रहा है। मैं नहीं कह रहा हूँ कि सवाल छोड़ दो, जैसे तुम छोड़ते हो चीज़ों को वैसे सवाल को छोड़ नहीं पाओगे। तुम्हारे लिए तो सवाल छोड़ने की विधि यही है कि सवाल को पूछ लो। जब पूछ लोगे तो छूट जाएगा। पर जो तुम्हारा प्रश्न है कि हमने ऐसा पकड़ ही क्या रखा है, तुमने बहुत कुछ पकड़ रखा है जैसे तुमने ये सवाल पकड़ रखा है।

तो अंतःकरण में जो कुछ चल रहा है, वही तो वो सबकुछ है जो तुमने पकड़ रखा है। क्या तुम्हारी जो चेतना है वो सामग्रीशून्य है? तुम्हारी कॉन्शियसनेस कंटेंटलेस (चेतना सामग्रीरहित) है क्या? वहाॅं कुछ नहीं है? खोपड़े में चल रही हैं न चीज़ें? वही वो सब कुछ हैं जो तुमने पकड़ रखा है। उसी से मुक्ति चाहिए।

प्र४: तो आपने बोला कि सवाल पूछ लो, क्या इसका मतलब है कि जो चीज़ें छुपा रखी हैं वो बता दो, ये जो भी सबकुछ अंदर चल रहा है अपने खोपड़े में?

आचार्य: जब तुम कोई चीज़ प्रकट करते हो तो अगर उत्तर देने वाला सही है, ईमानदार है, तो वो उस चीज़ की मूल्यहीनता प्रदर्शित कर देता है। फिर तुम्हारा लालची मन उसे पकड़ेगा नहीं। पहले भी उसने पकड़ क्यों रखी थी वो चीज़? बड़ी मूल्यवान लगती थी।

तो तुम अपनी तरफ़ से तो हीरे-जवाहरात जैसा सवाल निकाल कर लाए‌ लेकिन गुरु अगर ठीक-ठाक है थोड़ा, तो वो तुम्हारे हीरे जैसे सवाल को क्या कर देगा? उसका जवाब नहीं देगा, तुम्हारे हीरे को उठा कर कचरे में फेंक देगा; क्योंकि तुम्हारा सवाल है ही क्या? कचरा। अब एक बार उसने कचरे में फेंक दिया तो तुम उसको दोबारा उठाने जाओगे नहीं, क्योंकि कचरा हो गया अब वो। कचरा हो गया! ऐसे तुम्हें मुक्ति मिल गई अपने प्रश्न से।

चीज़ें जो तुमने पकड़ रखी हैं, वो पकड़ ही इसीलिए रखी हैं क्योंकि तुम्हें उनमें कुछ दम दिखता है, कुछ जान, कुछ मूल्य दिखता है। गुरु का काम होता है जिन चीज़ों में तुम्हें मूल्य दिखता है, उनको मूल्यहीन साबित कर देना।

प्र४: आचार्य जी, इसको गुरु के सामने बोला तो वो दिखा देगा कि ये कचरा है, लेकिन जब हम चीज़ें छुपाते हैं या अपने अंदर रख लेते हैं, तो हम सबके सामने इसलिए नहीं बोल पाते हैं क्योंकि हमें लगता है कि भाई, लोग तो हमें जज (आँकलन) करेंगे। क्योंकि हर कोई एक जैसा नहीं होता न। आपके सामने चीज़ें बोलना अलग बात है और सबके सामने बोलना अलग। इसलिए हम चीज़ें छुपा लेते हैं अपने अंदर।

आचार्य: एक छोटा-सा बच्चा है, वो मुझे जब भी देखता है तो वो मुझे कभी बोलता है बीअर। एक कोई इंटरनेट पर सीरीज़ है माशा एंड द बीअर के नाम से, तो उसमें 'माशा' है एक छोटी-सी लड़की और बीअर है एक बड़ा-सा भालू, मोटा! तो वो मुझे जब भी देखता है तुरंत क्या बोलता है — 'बीअररर'‌। तो मुझे तो रोने लगना चाहिए न कि इसने मुझे इतना बुरा जज किया। अभी मैं दस बार सुन के आ रहा हूँ। बाहर भी निकल रहा था तो — बीअररर। उसको बिलकुल मैं उस बीअर जैसा ही लगता हूँ।

मैं क्या कहना चाह रहा हूँ? तुम सिर्फ़ उस सामग्री को ही मूल्य नहीं देते जो तुम्हारे भीतर है, तुम उन सबको भी बहुत मूल्य देते हो, जो तुम्हारी उस सामग्री को तुम्हारे शब्दों में 'जज' कर रहे हैं। जो जज कर रहा है, अगर मुझे पता ही हो कि बच्चे समान है तो मुझे बुरा क्यों लगेगा? तुम्हारी नज़रों में बड़ी कीमत है इन सबकी जो तुम्हे जज करते हैं! तुम तो बिलकुल इन्हें ' यस, माय लार्ड (जी महाराज), योर ऑनर (जज साहब)! जज ही बना दिया तुमने इनको, वो भी बिलकुल सुप्रीम कोर्ट (उच्चतम न्यायालय) का।

कोई तुम्हें जज कर रहा है, उसकी कही बात की तुम इतनी कीमत करने लग गए, इसका मतलब तुम किसकी कीमत कर रहे हो? वो जिससे वो बात आ रही है, वो है इस लायक कि तुम उसको इतना महत्त्व, इतनी इज़्ज़त दे रहे हो? तो ये तो अजीब बात है तुम जिसको देखो उसी को मूल्य दिए जा रहे हो। तुम्हारे भीतर जो सामग्री है तुम उसको भी मूल्य देते हो। वो सामग्री भीतर से बाहर आ गई तो उस सामग्री को जो लोग जज कर रहे हैं, तुम उनको भी मूल्य देते हो, तुम्हारी नज़रों में तो सब बहुत कीमती हैं।

जैसे कि कोई ड्राइवर (चालक) हो, वो गाड़ी इसलिए नहीं चला रहा है, कह रहा है, 'साइकिल वाला आ रहा है, नहीं-नहीं आप आगे निकलिए, आप आगे निकलिए। कि सब बहुत कीमती हैं। साइकिल वाले को भी तो साइड देनी पड़ती है न!' कोई छोटा बच्चा आ रहा है अपनी ट्राय-साइकिल ले के, उसको भी कह रहे हैं, 'नहीं-नहीं, आप आगे निकलिए, आप आगे निकलिए।' तुम चलाओगे कब?

तुम्हारे लिए सब बहुत कीमती हैं, तो तुम्हें मंज़िल कैसे मिलेगी? तुम्हारी गाड़ी ही नहीं चलेगी, बड़े हैवी ड्राइवर हो! सबको तुम आगे ही निकलने दे रहे हो अगर रुक के तो तुम अपनी मंज़िल तक कैसे पहुॅंचोगे, ये बताओ? बात तुम्हारी तड़प और तुम्हारी मंज़िल के बीच की है न। तुम्हें ये बाकी सब इतने दिखाई क्यों देते हैं अंदु-पंदु? क्यों दिखाई देते हैं?

कि जैसे कोई जम्बो-जेट का पायलट हो, वो आ रहा है बम्बई से दिल्ली, इंदौर के ऊपर से उड़ रहा है और हवा में उसने रोक दिया, बोलता है, 'क्यों रोक दिया?' बोलता है, 'नीचे वो रेड सिग्नल (लाल संकेत) है।' अरे! तुम अलग तल के खिलाड़ी हो भाई, तुम्हें उस नीचे वाले रेड सिगनल से क्या मतलब है? या बोल रहे हो, 'नीचे वो लूना वाला हॉर्न (भोंपू) मार रहा था न तो मैंने कहा वो आगे निकल जाए इसलिए मैंने हवा में अपना जहाज़ ही रोक दिया।'

तुम्हारी मंज़िल आसमानों की, बाक़ी लोग ज़मीनों के खिलाड़ी, तुम्हें उनकी इतनी परवाह क्यों हो गई?

डर है, डर; डरे हुए हो‌। डर नहीं हटेगा जब तक उस डरे हुए इंसान से तुमको बहुत प्यार रहेगा। बोलो, 'राघववा हमका न भावे' (प्रश्नकर्ता का नाम राघव), क्योंकि वो तो डरपोक ही है। वो जो इतना डरपोक है, गलीच, उसकी क्या कद्र करनी! हटाओ उसको। वो जो कुछ भी चाहता है हम उल्टा ही करेंगे उसका। फ़िक्र नहीं करेंगे, क़ीमत ही नहीं देंगे। वो जो कुछ भी बोल रहा है, पड़ा रहे, हम कुछ और करेंगे। सबसे बड़ा अनुशासन और साधना है — अपनी न सुनना।

आ रही है बात समझ में?

डर मिटाना है, डर त्यागना है तो डरे हुए को त्याग दो। और डरा हुआ बेकार की बातें बोलता है, सुनो ही मत उसकी, ऐसे त्यागा जाता है उसे। अपनी डरी हुई हालत में वो जो कुछ भी बोल रहा है, उस पर कान ही मत धरो। बहुत कुछ बोलेगा देखो, तुम उसको नहीं रोक सकते। वो जानते हो न कहाँ बैठा है? कहाँ बैठा है? शरीर में बैठा है। तुम्हारा, तुम्हारा रेशा-रेशा, तुम्हारी एक-एक कोशिका के भीतर बैठा हुआ है वो। ये सब तुम्हारे नहीं हैं, ये सब उसके हैं। तुम्हारा जो डीएनए है, वो उसका प्रतिनिधि है। उससे कैसे लड़ लोगे? उससे लड़ नहीं सकते, उसको बस नज़रअंदाज़ कर सकते हो।

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