आचार्य प्रशांत आपके बेहतर भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं
लेख
ठगे गए उम्मीदों के कारोबार में || आचार्य प्रशांत (2019)
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
16 मिनट
51 बार पढ़ा गया

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम! अपने संबंधित व्यक्तियों से उम्मीदें रहती हैं। उम्मीदें पूरी न होने पर चुभता सा रहता है, ठगा सा महसूस करता हूँ। कृपया मार्गदर्शन करें।

आचार्य प्रशांत: नहीं, ठगे नहीं गए। व्यापार में घाटा हो गया। यह जो उम्मीद का कारोबार है, यह पारस्परिक होता है भाई। मैं तुमसे उम्मीद रखूँगा, तुम मुझसे उम्मीद रखो; मैं तुम्हारी उम्मीद पूरी करूँगा, तुम मेरी उम्मीद पूरी करो। यह होता है उम्मीद का कारोबार। और ना तुम्हारी उम्मीदें पूरी होने से तुम्हे कुछ मिल जाने वाला है, ना मेरी उम्मीदें पूरी होने से मुझे कुछ मिल जाने वाला है। पर हमारा आपस का रिश्ता यही रहेगा — मेरे कुछ अरमान तुम पूरे कर दो, तुम्हारे कुछ अरमान मैं पूरा कर दूँ। मिलना किसी को कुछ नहीं है इस पारस्परिक आदान प्रदान से। जब मिलना किसी को कुछ नहीं है तो दोनोंं ही पक्षों को क्या लगता है? ठगे गए।

ऐसा थोड़े ही है कि जो आपकी उम्मीदें पूरी नहीं कर पा रहे, उनको देख कर सिर्फ़ आपको ही लग रहा है आप ठगे गए। थोड़ा उनसे भी तो जाकर पूछ लीजिए। वह भी यही कहेंगे। हमारी उम्मीदें भी पूरी नहीं हुईं, हम भी ठगे गए। ठगा कोई नहीं गया है। बस दोनोंं को व्यापार में घाटा हो गया है। क्योंकि यह जो कारोबार है, यह है ही घाटे का। इसमें आजतक किसी को मुनाफ़ा हुआ नहीं। यह बात अजीब है।

आप सोचेंगे साहब! जब दो लोग आपस में कोई अनुबंध, कोई करार करते हैं, कुछ लेन-देन करते हैं उसमे से एक को अगर घाटा होता है तो निश्चित ही दूसरे को फायदा हो जाता है। बल्कि जितना एक को घाटा हो जाता है, ठीक उतना ही दूसरे को फायदा हो जाता है। ऐसे ही होता है ना? तो शायद आपको यह लग रहा है कि आपको नुकसान हुआ है और दूसरे व्यक्ति को फायदा। इस बात को सोच कर आप और भी ज़्यादा व्यथित हो जाते हैं कि मैं ही बेवकूफ़ बन गया और दूसरा वाला बाज़ी मार ले गया। नही ऐसा नहीं है।

यह लेन देन का कारोबार है ही ऐसा कि जो इसमें उतरेगा वह घाटा खायेगा। दो व्यापारी इसमें अगर कोई समझौता कर रहे हैं, कोई व्यापार कर रहे हैं, दोनोंं लूट जायेंगे। दोनोंं को लगेगा यही कि दूसरे ने लूट लिया। दूसरे ने नहीं लूटा। इस कारोबार की जो प्रकृति है उसने लूटा लिया।

कृपा करके दुसरे को दोष न दें। दूसरा भी आप की तरह ही परेशान है। पति पत्नी से परेशान रहता है मेरी उम्मीदें नहीं पूरी करती। पत्नी भी तो बराबर ही परेशान रहती है ना पति से, यह मेरी उम्मीदें नहीं पूरी करता। पति कहेगा मैं इसकी उम्मीदें क्यों पूरी करूँ, इसकी उम्मीदें ही नाजायज़ हैं। पत्नी कहती है मैं इसकी उम्मीदें क्यों पूरी करूँ, इसकी उम्मीदें बेवकूफ़ी भरी हैं। दोनोंं को यही लगता है कि ठगे गए। और दोनोंं ठगे जाने का इल्ज़ाम दूसरे पर लगाते हैं। कोई नहीं ठगा गया, दोनोंं ठगे गए। और दोनोंं को जो ठगने वाली है? "माया महा ठगनी, हम जानी।" उसकी करतूत यह कि वह ठग लेती है और यह आपको पता भी नही चलता कि ठग किसने लिया, आप दोष किसी दूसरे पर रख देते हैं।

जैसे कि दो लोग चले जा रहे हों एक दूसरे की कमर में हाथ डाले। जैसे कि जोड़े अक्सर चलते हैं। इन्होंने उसकी कमर में हाथ डाल रखा है, उन्होंने इसकी कमर में हाथ डाल रखा है। और दोनोंं ने ही पैंट डाल रखी है और दोनोंं की ही पैंट की पीछे वाली जेब में दोनोंं के पर्स हैं, वॉलेट हैं। कमर में हाथ डाल रखा है एक दूसरे के पीछे। और दोनोंं ने ही पीछे क्या रख रखा है अपना अपना? जमा, कमाई, रुपया पैसा। थोड़ी देर में दोनोंं पाते हैं कि दोनोंं की जेबें कट चुकी हैं। और लगते हैं दोनोंं एक दूसरे को पीटने, क्योंकि भई शक जायेगा और किसपर? मेरी जेब के पास हाथ ही किसका था? तेरा। तूने ही कमर में हाथ डाल रखा था। और कमर के ठीक नीचे मेरी जेब है। और वह कह रही है मेरी जेब के पास हाथ किसका था? तेरा। कमर में तूने हाथ डाल रखा था, ठीक नीचे जेब है। दोनोंं दनादन दनादन एक दूसरे को। रुपया पैसा तो गया ही, पीटे भी गए। और पीछे वह खड़ी होकर खूब हँस रही है। और उसके हाथ में हैं दोनोंं बटुए। माया महा ठगनी हम जानी।

यहाँ कोई किसी को नहीं ठग रहा है। यहाँ सब ठगे ही जा रहे हैं। आप जिस खेल में हैं वह खेल पीट रहा है आपको। खिलाड़ी नहीं पीट रहे। आप गलत खेल में हैं। इस खेल में आप जिस भी खिलाड़ी से मिलेंगे वही आपको लगेगा कि आपका दुश्मन है। हो सकता है अभी लगे दोस्त है। फिर कुछ दिनों बाद लगेगा कि दुश्मन है। यह खेल ही गलत है। खिलाड़ियों पर इल्ज़ाम मत रखिए। यहाँ हर खिलाड़ी बेचारा ठगा ही गया है। और ठगने वाला कोई नहीं। कोई दूसरा खिलाड़ी नहीं। खेल ठग रहा है सबको। माया खेल का नाम है। हमारी आंतरिक व्यवस्था का नाम है। एक सिस्टम का नाम है माया। वह हमें भीतर से संचालित करता है। उसी को प्रकृति कहते हैं। वह हमारी देह में बैठा हुआ है। बात समझ रहे हैं?

तो इस सिस्टम को, इस व्यवस्था को अगर आपको हराना है तो क्या करना पड़ेगा? क्या करना पड़ेगा? अपने खिलाफ़ जाना पड़ेगा। क्योंकि यह व्यवस्था हमारे भीतर मौजूद है। हमारी जो भावनाएं है, हमारे जो विचार हैं, हमारी वृत्तियां हैं, हमारे आवेग हैं इन्ही का नाम माया है। यह सब जान बूझ कर नहीं होते। यह बस होते हैं। आप कहते नहीं कि आप भावुक होना चाहते हैं। आप बस भावुक हो जाते हैं। ऐसा ही होता है ना? यही माया है। इसीलिए शास्त्रों ने माया, प्रकृति और अविद्या तीनों को एक कहा है।

तो अगर इसको जीतना है तो तरीका फिर क्या हुआ? साफ़ दिखना चाहिए, हमारे भीतर से जो कुछ उठता है वही ठग रहा है हमको। कोई बाहर वाला नहीं। हमें कौन ठग रहा है? हमारे भीतर से जो आवेग उठते हैं वही ठग रहे हैं हमको, कोई बाहर वाला नहीं। तो फिर इस माया को जीतना है तो क्या करना पड़ेगा? अपने खिलाफ़ जाना पड़ेगा। जो चाहते हो कि ठगे ना जाए जीवन के खेल में वह अपने खिलाफ़ जाना सीखें।

अब जैसे कि अभी आपको क्या लग रहा है? मुझे किसी दूसरे ने ठगा। ठीक? अभी यही लग रहा है ना प्रश्नकर्ता को कि मुझे किसी दूसरे ने ठग लिया। तो फिर अपने खिलाफ़ जाने का अर्थ क्या हुआ? यह मानना बिलकुल छोड़ना है कि मुझे किसी दूसरे ने ठगा। जैसे अभी अपनी जो भावना है और जो विचार है वह अपने-आपको क्या बता रहा है? कि वह जो सामने वाला है ना वह बड़ा दोषी है, बड़ा अपराधी है।

तो अपने खिलाफ़ जाने का अर्थ क्या हुआ? जो लग रहा है कि आपको ठग रहा है, उसके प्रति सद्भावना रखें। क्योंकि वह ठग नहीं रहा है, वह भी ठगा गया है। वह बिलकुल आपके ही जैसा है। माया तो चाहती है कि आप उसके प्रति क्रोध से भर जाओ। किसके प्रति? जो आपका साथी है, जिससे आपने उम्मीद रखी थी। माया तो चाहती है कि आप उसके प्रति क्रोध से भर जाओ और सारा दोष उसी पर रख दो, "तूने ठगा, तूने ठगा।"

पर हम जानते हैं माया को हराने का तरीका। क्या? अपने खिलाफ़ जाना। तो जब लगे किसी दूसरे ने ठग लिया, तत्काल भीतर से सारी कड़वाहट हटा दो। उसने नहीं ठगा। और थोड़े निष्पक्ष होकर देखो। तुम्हे दिखाई देगा कि वह भी दुखी है। तुम दुखी हो ना? वह भी दुखी है। माया ने तुम दोनोंं का एक साथ शोषण करा है। यहाँ कोई और दुश्मन नहीं तुम्हारा, सिर्फ़ एक दुश्मन है माया और वह माया कहीं इधर उधर नहीं घूम रही है भई। वह भीतर बैठी हुई है। इस देह का नाम ही माया है। माया तुम्हे जो कुछ भी प्रतीत करवाती हो, तुम्हारे भीतर जो भी एहसास उठाती हो, जान लेना वही दुश्मन है तुम्हारा। तुरंत अपने विरुद्ध खड़े हो जाओ।

भीतर से आसक्ति उठती हो, मोह उठता हो, कुछ बड़ा अच्छा अच्छा, भला भला लगता हो, जान लो कि ठगनी आ गई लूटने। बाहर से नहीं आयी, भीतर से आयी। आ गई लूटने। भीतर से बड़ी कड़वाहट उठती हो, कोई बहुत बुरा लगता हो, उसे मार देने का मन करता हो, जान लो कि ठगनी आ गयी लूटने। और भीतर से किसी दूसरे से उम्मीदें उठती हों तब तो बिलकुल ही सतर्क हो जाओ, "लो डाल दिया जाल।"

बहुत मेरा मन कर रहा है कि उससे उम्मीदें रखूँ। दूसरा तुम्हारी उम्मीदें पूरी करने के लिए पैदा हुआ है क्या? और दूसरा अगर तुम्हारी उम्मीद पूरी करने के लिए पैदा हुआ है तो तुम किसलिए पैदा हुए हो? फिर तो तुमने अपनी ज़िन्दगी भी बर्बाद कर ली ना। फिर तो तुमने कह दिया दूसरे का काम है मेरी उम्मीदें पैदा करना, इसका तुम्हारे लिए अर्थ क्या हुआ? कि तुम्हारा बस यही काम है जीवन भर दूसरों की उम्मीदें पूरी करते रहो। चाहोगे ऐसा? कोई किसी की उम्मीदें पूरी करने के लिए नहीं होता। यह सब हमारी बहुत पुरानी जंगली पशुता है।

प्रेम में और परनिर्भरता में अंतर होता है। प्रेम दूसरे से अगर उम्मीद रखता भी है तो बस यह कि तू अपना बुरा मत कर। और परनिर्भरता कहती है कि तू मेरे लिए कुछ अच्छा कर दे ना। अंतर समझ रहे हैं? और हम अक्सर इस उम्मीदबाज़ी को ही प्रेम समझ लेते हैं। बहुत लोगों को तो यह बात बड़ी स्वाभाविक लगेगी, वह कहेंगे "ऐसा तो है ही। अगर आप दूसरे से प्रेम करते हैं तो उससे उम्मीदें तो रखेंगे ही। उम्मीदों के बिना कौन सा प्रेम होता है।" नहीं साहब, अगर उम्मीदों हैं तो प्रेम बिलकुल नहीं है। और खास तौर पर अगर उम्मीदें अपने लिए हैं, और उम्मीदें हमारी होती भी किसके लिए हैं। आहत भी तो हम तभी होते हैं जब हमारा कोई स्वार्थ पूरा नहीं होता दूसरे से। आहत हम तब थोड़े ही होते हैं जब कोई अपना नुकसान कर ले। वास्तव में जब कोई अपना नुकसान कर रहा होता है तो हमें पता भी नहीं चलता, क्यों? क्योंकि हम फायदे-नुकसान की सही परिभाषा जानते ही नहीं हैं। हम तो सतही सुख जानते हैं। तो दूसरे से उम्मीद भी हमारी यही रहती है कि कोई हमें सतही सुख दे दे।

दूसरों पर दोषारोपण से बचिए। दूसरों की शिकायत करना, दूसरों के खिलाफ़ द्वेष भाव रखना, अपनी कमियों, अपनी खोट और अपनी बेहोशी से मुँह चुराने का बड़ा आजमाया हुआ तरीका है। बल्कि मैं कहूँगा कि जो व्यक्ति दिखाई दे कि दूसरों के प्रति शिकायत से भरा हुआ है, वह आदमी निश्चित रूप से बेईमान होगा। वरना वह दूसरों की शिकायत क्यों करेगा, वह अपनी बात करेगा ना।

दो साल पहले, मैं स्क्वैश सीख रहा था। तो कोच थे मेरे। तो कोच रैली के बीच में मार दें ऐसा शॉट के मैं तो उसके आस पास कुछ भी नहीं। और जब मैं नहीं उठा पाऊँ तो मुझसे कहें कि क्या? तो मैं कहूँ कि आपने शॉट ही ऐसा मारा है, मुझसे क्या पूछ रहे हैं कि क्या? मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता था। तो बोले "नहीं, मैंने शॉट ऐसा मारा नहीं, तुमने मुझे ऐसा शॉट मारने का मौका दिया। मैंने विनर मारा नहीं है। विनर मारने के लिए मेरी पोजिशन , मेरा प्लेसमेंट सब बहुत अच्छा होना चाहिए ना। तुमने मुझे मौका क्यों दिया?" तो यह मत कहो कि कोच साहब इतने बढ़िया हैं मैं क्या कर सकता हूँ। मैं तो बेचारा हूँ, मजबूर हूँ। तुम अपने-आपको देखो कि तुमने रैली के बीच में उन्हें मौका क्यों दिया कि वह विनर मार दें। और जिसको मौका मिलेगा वह तो मारेगा ही मारेगा ना विनर। कि नहीं मरेगा?

तुमने एक बार प्रतिद्वंदी को मौका दे दिया, वह तो मारेगा ही। और तुम कहोगे कि "अरे! ना।" उंगली हमेशा अपनी ओर रखो। हमेशा अपनी ओर रखो। यह बात आ रही है समझ में? उंगली हमेशा अपनी ओर रखो। और जब कुछ अच्छा हो जाए तो उंगली अपनी ओर मत रखना। तब उंगली ऊपर की ओर रखना।

अच्छा तो हमारे साथ कम ही होता है। ज़्यादातर तो हम शिकायत से ही भरे होते हैं, "ये बुरा हो गया, यह गलत हो गया। उसने लूट लिया, वह ठग है, वह मक्कार निकला। मैं तो राजा राम चंद्र हूँ, बहुत सीधा-सादा आदमी। यह बाकी सब राक्षस-ही-राक्षस भरे हुए हैं दुनिया में।" जब भी कभी दुख आए उंगली सदा अपनी ओर। और जब भी दुख से मुक्ति मिले, उंगली ऊपर, "तूने दिया।" मुक्ति मिलती हो तो श्रेय मत ले लीजिएगा कि "मैं तो हूँ ही ऐसा। मुझे तो मिलनी ही चाहिए थी। मुक्ति मुझे नहीं मिलेगी तो किसको मिलेंगी, इसको। यह तो निकम्मा है, ठग है, चोर है। मुक्ति तो ढूँढ ढूँढ के मेरा पता मेरे पास आयी है।" नहीं, मुक्ति अगर आयी है तो बहुत विनम्रता के साथ कहिए अनुकंपा है, कृपा है, देने वाले ने दी। पर भूल के भी उंगली दूसरों पर नहीं कि दोष तुम्हारा है, हमेशा कहिए मैं।

दूसरे आपको चोट भी पहुँचा दें, साफ़ दिखता हो कि उसने पत्थर मारा है अभी अभी, साफ़ दिखता है कि किसी ने योजना बना कर ठगा है आपको तब भी कहिए मुझमें ही दोष था, नहीं तो यह मुझे ठग कैसे पाता। क्योंकि जो ठगा जा रहा है निश्चित रूप से या तो उसे डर है या लालच है। कोई कैसे बेवकूफ बनाता है आपको? या तो आपको डरा के या आपको ललचा के। तो ठगे जाए कभी तो भी उंगली ऐसे न हो कि उसने ठग लिया। दोष स्वंय को दें, "मेरे भीतर ज़रूर लालच था। इसीलिए तो मैं दुख झेल रहा हूँ।" यही अध्यात्म है, यही मूल अद्वैत है। जो कुछ हैं आप हैं। आपसे बाहर कोई दूसरी सत्ता ही नहीं। आप इल्ज़ाम किसको दे रहे हैं भाई? अच्छे तो आप, बुरे तो आप, सुख तो ज़िम्मेदारी आपकी, दुख तो ज़िम्मेदारी आपकी, बंधन तो आपका चुनाव, मुक्ति तो आपने चाही। किसी और का इसमें कोई योगदान ही नहीं है। बिलकुल नहीं है। कम से कम दुनिया वालों का तो बिलकुल भी नहीं है।

इस संसार का एक दम नहीं है योगदान आपकी वर्तमान स्थिति में। संसार तो आपकी छाया है, आपका प्रक्षेपण है। वह क्या कर लेगा आपका? पर अपनी हालत की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ना लेनी पड़े इसलिए हम क्या करते हैं? दूसरों की शिकायत। और बहुत तेजी से अपने भीतर भाव उठता है, क्या करने का? शिकायत करने का। यह जो तेजी से भीतर से भाव उठता है, हमने कहा इसी का नाम है माया। और भीतर से दूसरों के लिए बुरे भाव उठते हों, वही भर माया नहीं है। भीतर से तथाकथित अच्छे भाव उठते हों, उसे भी माया ही जानिएगा। मैंने कहा, कुछ गलत हो जाए इसके लिए दूसरों को दोष नहीं देना है, इसका मतलब यह नहीं है कि कुछ अच्छा हो तो श्रेय दूसरों को देना है। दूसरे हैं ही नहीं। दूसरे हैं ही नहीं।

जब वह कुछ बुरा नहीं कर सकते आपका तो कुछ अच्छा भी नहीं कर सकते। कुछ अच्छा भी हो गया है तो दूसरों को श्रेय भी नहीं दे देना है। "तुम हो ही नहीं।" और यह बात दूसरों के प्रति ना अवमानना से भरी हुई है, ना क्रूरता से। आपको शायद समझने में थोड़ी कठिनाई हो या समय लगे। लेकिन जब आप यह कह देते हैं कि तुम हो ही नहीं, वह जगत के प्रति सर्वाधिक करुणा का वक्तव्य है। इससे ज़्यादा प्रेमपूर्ण बात नहीं हो सकती। आप कहेंगी, "ये भी कोई प्रेम की बात है कि कोई सामने है उससे कह रहे हो तुम हो ही नहीं?" जी। धीरे धीरे प्रयोग करेंगे, अभ्यास करेंगे तो समझ में आएगा। क्योंकि हम कब कहते हैं कि तुम हो? हम दूसरे को तभी कहते हैं कि तुम हो जब उससे हमारा कुछ स्वार्थ जुड़ जाता है। आप एक भीड़ में खड़े हैं। आपके लिए कौन कौन है भीड़ में? भीड़ में दस हजार लोग हैं। क्या आपके लिए भीड़ में दस हजार लोग हैं? आपके लिए कौन है भीड़ में? वही तीन-चार लोग जिनसे आपने कारोबार जोड़ रखा है। मतलब जब हम कहते हैं कि तुम हो, तब हम उस व्यक्ति से कारोबार बिठा चुके होते हैं। और कारोबार का मतलब ही यह है कि अब मैं तुम्हे पीटूँगा, तुम मुझे पीटोगे। यह सोचके कि मैने तुम्हारी जेब काटी है और तुमने मेरी जेब काटी है। तो जब आप कह देते हैं कि तुम नहीं हो, तब आपने दूसरे को पिटाई से मुक्त कर दिया। और खुद भी बच गए।

क्या आपको आचार्य प्रशांत की शिक्षाओं से लाभ हुआ है?
आपके योगदान से ही यह मिशन आगे बढ़ेगा।
योगदान दें
सभी लेख देखें