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लेख
शून्यता और अद्वैत में क्या अंतर है? || आचार्य प्रशांत (2018)
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
11 मिनट
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आचार्य: हर शब्द का अपना एक माहौल होता है, एक पृष्ठभूमि होती है, वो कहाँ से आ रहा है। तो जब मन में बहुत कुछ भरा रहे, संसार बहुत अर्थपूर्ण लगे तब शून्यता शब्द की प्रासंगिकता है।

जब लगे कि आगे-पीछे जो कुछ है, ऊपर-नीचे जो कुछ है, स्मृतियों में जो कुछ है, भविष्य में जो कुछ है उसका बड़ा मूल्य है। तो उस स्थिति के लिए फिर सन्तों ने समझाया शून्यता। कि तुम इनका मूल्य बहुत मान रहे हो, वास्तव में इनका मूल्य शून्य है। ठीक है? शून्यता इस परिप्रेक्ष्य से निकल कर आ रही है। जब लगे कि किसी चीज़ की क़ीमत बहुत है, अर्थ बहुत है, तब तुम कह देते हो शून्यता कि नहीं इसकी क़ीमत शून्य है, मन को खाली रखो।

जैसे ही समझ जाओगे कि किसी चीज़ की क़ीमत शून्य है वैसे ही मन उस चीज़ को छोड़ देगा। क्योंकि मन चीज़ों को पकड़ता ही इस उम्मीद में है कि जिस चीज़ को पकड़ा है उसकी क़ीमत बहुत ज़्यादा है। क़ीमत अगर शून्य है तो क्यों पकड़ा जाएगा? कुछ भी नहीं पकड़ा जाएगा। मन खाली हो गया, बोझ उतर गया, यह शून्यता हो गयी।

और अद्वैत की पृष्ठभूमि यह है कि मन प्राकृतिक तौर पर द्वैत में जीना चाहता है, ऐसी ही उसकी संरचना है। तुम्हें मन को द्वैत सिखाना नहीं पड़ेगा, मन के लिए द्वैत बड़ी सीधी-सरल बात है। मन की भाषा में द्वैत-ही-द्वैत है। क्या है द्वैत? दूरी, भेद, अन्तर, विभाजन। मैं छोटा हूँ, बाहर कुछ बड़ा है, वो मिल गया तो मेरा छुटपन ख़त्म हो जाएगा, यह द्वैत है।

अगर मुझे कष्ट मिल रहा है तो उस कष्ट का कारण कहीं बाहर है कोई, यह द्वैत है। मैं अलग हूँ, संसार अलग है, जीव और संसार दो पृथक इकाइयाँ हैं, यह भावना द्वैत है। और यह भावना, मैंने कहा, मन को सिखानी नहीं पड़ती, यह भावना मन में होती-ही-होती है। यह मन की प्रकृति है।

चूँकि यह मन की प्रकृति है और मन की यह प्रकृति मन को लगातार दुख में रखती है। तो इसलिए सिखाने वालों को कहना पड़ा 'अद्वैत', फिर उन्होंने तुम्हें सिखाया अद्वैत। चूँकि तुम द्वैत में लगातार जीते हो, इसीलिए सिखाने वालों ने सिखाया अद्वैत। क्योंकि द्वैत में जीने का अंजाम क्या होता है? दुख। तो जिन्होंने चाहा कि तुम्हें दुख से मुक्ति मिले, उन्होंने कहा कि तुम्हारे दुख का मूल कारण तुम्हारी द्वैत भावना है। तो फिर उन्होंने तुम्हें अद्वैत बताया।

तो यह हुई शून्यता और यह हुआ अद्वैत‌। दोनों में सम्बन्ध भी साफ़ है; दिख ही जाएगा। मन को जो चीज़ें भरती हैं वो भरती ही द्वैत भावना के कारण हैं, नहीं तो मन को कुछ क्यों भरेगा। तुम हो, तुम अपनेआप को फटेहाल समझ रहे हो और बाहर तुमको लग रहा है हीरे-मोती बिखरे हुए हैं, तो तुम उन हीरे-मोतियों के ख़याल से अपनेआप को भर लोगे। तो वो ख़याल आया कहाँ से? द्वैत से। और जब उस ख़याल से तुमने अपनेआप को भर लिया, तो वो स्थिति कहलाती है बोझिल हो जाना। वो स्थिति कहलाती है तमाम तरह की संख्याओं के नीचे दब जाना, संसार के नीचे दब जाना।

तो द्वैत का अंजाम है एक भरा हुआ मन। द्वैत का अंजाम है एक भरा हुआ मन, उस भरे हुए मन को खाली करने को कहते हैं शून्यता। भरा हुआ मन अपने भार से शून्य हो गया, खाली हो गया, यह शुन्यता हो गयी। सम्बन्ध साफ़ है अब? तो फिर शून्यता और अद्वैत बड़े अड़ोस-पड़ोस की बातें हो गयीं।

प्र: एक और प्रश्न था मेरा कि सन्त और योगी में क्या अन्तर है?

आचार्य: फिर पृष्ठभूमि का ही अन्तर है और कुछ नहीं। चूँकि मन लगातार द्वैत में जीता है — अभी थोड़ी देर पहले हमने कहा न — तो इसीलिए मन वियोग में जीता है। हमने कहा था द्वैत माने विभाजन, दूरी, उसी दूरी को कहते हैं वियोग। ठीक है? तो द्वैत माने वियोग। तो अब योग समझ ही गये होगे, क्या है? अगर द्वैत माने वियोग…।

प्र: तो अद्वैत माने योग। योगी जो अद्वैत में जी रहा है।

आचार्य: योगी जिसे जुड़ जाना है वापस, जिसे दो से एक हो जाना है। और एक अकेला बचेगा नहीं तो उसे शून्य हो जाना है, तो लो शून्यता आ गयी। दो के अभाव में एक भी अकेला बच नहीं सकता। शुद्ध एकत्व को शून्यता कहते हैं। तो शून्यता आ गयी वहाँ से।

सन्त कौन हैं? चारों तरफ़ इतना असन्तत्व रहता है, इतनी हैवानियत रहती है, इतने शैतान हैं कि उनके ख़िलाफ़ जो अपवाद खड़ा हो जाए उसे फिर कहते हैं सन्त। सन्त कौन? जिसकी चेतना संसार जैसी ही नहीं है, जिसकी चेतना संसार से अच्छादित नहीं है। सन्त कौन? जो संसार में मारा-मारा नहीं फिर रहा है, जो संसार से कुछ हांसिल करने के लिए तड़प नहीं रहा।

तो तुम देख रहे हो कि सन्त के बारे में मैं जो कुछ भी बोल रहा हूँ उसमें नहीं शब्द कितना प्रधान है। नहीं! ले-देकर सन्त कौन? जो संसारी नहीं है। संसारी कौन? जो हमारे चारों ओर हैं। हमारे चारों ओर बिखरा हुआ है संसार और जो संसार की ही प्रधानता में यक़ीन रखे सो संसारी।

सन्त वो जिसे संसार एक सराय की तरह लगता हो, कभी एक चुटकुले की तरह लगता हो, हल्की-फुल्की बातचीत है संसार। कभी उन्होंने कह दिया कि जैसे सपना रैन का, वैसा यह संसार।

“जागो लोगों मत सुवो, ना करो नींद से प्यार। जैसे सपना रैन का, वैसा यह संसार।।”

तो सन्त वो जिसको संसार बहुत बड़ा राजा न लगता हो। सन्त वो जिसके ऊपर संसार एक हौवे की तरह सवार न हो जाए। सन्त वो जो संसार को हल्के में ले सके। ‘हाँ ठीक है संसार है, ठीक है, कोई बात नहीं।’ वो मना नहीं कर रहा है संसार के अस्तित्व से, वो कह रहा है ‘ठीक है, है।’ जैसे सपना भी तो है न, पर जगे हुए आदमी के लिए सपने की कितनी क़ीमत? वैसे ही सन्त के लिए संसार की बहुत क़ीमत नहीं। या यह कह सकते हो कि संसार की क़ीमत तो है पर वो क़ीमत किसी और चीज़ की क़ीमत के आगे बड़ी छोटी है।

प्र: कहते हैं ‘तेरे बिना पत्ता नहीं हिलता, न बदले चींटी की चाल।’ फिर दुनिया का बुरा कैसे हुआ हाल?

आचार्य: देने वाले ने ताक़त दी है आपको, क्योंकि उसका काम है देना। और वो वही देगा जो उसके पास है, वो वही देगा जैसा वो है। वो बली भी है और मुक्त भी है। वो बली भी है और मुक्त भी है, तो उसने आपको बल भी दिया है और मुक्ति भी दी है कि आप उस बल का क्या इस्तेमाल करेंगे। अब आप उस बल का अपने ही ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर लें, तो वो बेचारा क्या करे।

बाप, बेटे को ताक़त दे दे और आज़ादी दे दे‌ — और आज़ादी बड़ी ऊँची चीज़ होती है, बड़ी कीमती चीज़ होती है — बाप ने बेटे को आज़ादी दे दी, ताक़त दे दी और उसे छोड़ दिया, जा! अब बेटा जा करके उस ताक़त का प्रयोग अपने ही ख़िलाफ़ कर ले, तो बाप क्या करे? और बाप ने वचन भी दे दिया है कि तुझे जो मैंने मुक्ति दी है वो तुझसे छीनूँगा नहीं। ताक़त दी है तुझे, तू चुन, तू फैसला कर कि इस ताक़त का क्या इस्तेमाल करेगा। अब आप उस ताक़त का इस्तेमाल अपने ही ख़िलाफ़ कर लो, दुरुपयोग कर लो तो इसमें परमात्मा क्या करे!

प्र: तो उन्होंने बोला न “एक ओंकार सतनाम करता पुरख”, तो मतलब करने वाला, तो वही हुआ।

आचार्य: यह बात नानक देव जी ने बोली न, कि करने वाला वो हुआ। आपकी दृष्टि में तो आप ही करने वाले हैं और इसका प्रमाण है आपका तनाव। एक बार आपको दिख जाए कि आप कुछ नहीं करते तो आपको तनाव बचेगा क्या? तनाव तो आदमी को तभी बचता है न जब उसे लगता है कि वो कुछ कर सकता है। तो यह बात तो संतों, गुरुओं ने समझी कि करता पुरख एक ही है और वो मैं तो हूँ नहीं। आम आदमी तो अपनेआप को ही कर्ता माने चलता है, और जितने बड़े तुम कर्ता रहोगे उतना ज़्यादा तुम परेशान रहोगे, और उतना ज़्यादा चोटें पड़ेंगी।

प्र: यह सेंस ऑफ़ रेस्पॉन्सिबिलिटी (ज़िम्मेदारी का भाव) जो आ जाती है कि मैंने करना है, यह भी तो इतना घना होती है न। जहाँ पर बन्दे को पूरा कहीं से कुछ और नहीं मिल रहा होता, तो वो ख़ुद ही करता है। ‘मैं नहीं करूँगा तो कौन करेगा।’ दोनों ओपोजिट फ़ोर्सेज़ (विपरीत बल) हैं न।

आचार्य: देखो एक बात है कि कोई चीज़ करने योग्य है, जो चीज़ करने योग्य होती है उसको बोलते हैं कर्तव्य। कर्तव्य का मतलब यह नहीं होता की किसी ने आपको क्या सिखा दिया है, आपका कर्तव्य। जो चीज़ करने योग्य होती है उसको बोलते हैं कर्तव्य। ठीक है? जैसे हम यहाँ पर घूम रहे हैं, तो यह स्थान रमण योग्य है, तो इसको बोलेंगे रमणीक। वैसे ही जो काम करने लायक है उसको बोलते हैं कर्तव्य या करणीय। ठीक है?

काम करना और काम के नतीजे के साथ अपनी बेहतरी को, अपनी सलामती को जोड़ लेना। क्या ये दो बहुत अलग-अलग बातें नहीं हैं? ग़ौर से बताइएगा। एक बात यह है कि काम हो रहा है, काम करना है। क्योंकि जीव हो अगर, देह से सम्बद्ध हो अगर, तो गति तो लगातार चलेगी — कुछ-न-कुछ तो लगातार होता रहेगा। प्रकृति में कुछ भी एक पल को भी ठहरता नहीं। तो एक चीज़ तो यह है कि काम हो रहा है। और दूसरी चीज़ यह है कि तुम कलपे जा रहे हो कि काम अच्छा नहीं हुआ, तो मैं बर्बाद हो जाऊँगा और काम अच्छा हो गया तो मैं बादशाह हो जाऊँगा।

हम सिर्फ़ करते थोड़े ही हैं, हम गिनते भी बहुत हैं। हमारी दो आँखों में से एक आँख लगती है काम करने पर और दूसरी आँख लगती है अंजाम गिनने पर। करने से किसी को कोई दुख नहीं मिलता, दुख तब मिलता है जब तुम्हारी अंजाम से सम्बन्धित उम्मीदें टूटती हैं। और उम्मीद तुम इसलिए रखते हो, क्योंकि अपनेआप को कर्ता समझते हो। कर्ता इसलिए समझते हो, क्योंकि अभी तुम्हें लगता है कि आधे-अधूरे हो, कुछ करना बाक़ी है।

जो मस्त हो गया, जो पूर्ण होकर बैठ गया — "अनहद के मैदान में रहा कबीरा सोय"— और सो ही गये, इतने पूरे हैं कि सो गये, करने को कुछ बचा ही नहीं अब। कैसा कर्तृत्व? जिसको करने को कुछ बचा नहीं, जो पूरा है, उसके लिए अब कर्ता भाव कैसा? कर्ता भाव कौन धारण करेगा? जिसकी ज़िन्दगी अभी अधपकी, इधर से कटी, उधर से छँटी, यहाँ छेद है। तो फिर आदमी कहता है, ‘कुछ करते हैं। मामला अभी ठीक नहीं है, ज़िन्दगी में बहुत कुछ है जो अभी गड़बड़ है और हम ही तो वो हैं जो उसे ठीक करेगा। चलो कुछ करते हैं।’

कर्ता भाव और अपूर्णता का चोली-दामन का साथ है। आ रही है बात? क्या इसका अर्थ यह है कि जो पूर्ण हो गया वो काम नहीं करेगा? नहीं, जो पूर्ण हो गया वो कर्म करेगा बिना कर्ता भाव के। कर्म करो न, कर्ता भाव क्यों आवश्यक है! जो लगे कि अभी होना चाहिए वो कर डालो। हाँ, अभी फ़लानी चीज़ करणीय है, तो कर डालो। यह डर क्यों कि अगर नहीं करा तो मेरा क्या होगा? यह लालच क्यों कि अगर कर दूँगा तो बादशाह बन जाऊँगा?

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