आचार्य प्रशांत आपके बेहतर भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं
लेख
शादी की उम्र हो रही है, पर रिश्ते पसंद नहीं आ रहे || आचार्य प्रशांत, आर.डी.वी.वी. के साथ (2023)
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमस्ते। मेरा प्रश्न ये है कि शादी की उम्र हो रही है और रिश्ते जो आ रहे हैं वह पसंद नहीं आ रहे। तो आगे फिर क्या करना चाहिए ये नहीं समझ में आ रहा है।

आचार्य प्रशांत: शादी की उम्र हो रही है। हम, हम कौन हैं? हम एक उम्र में पहुँच जाएँगे, तो हम कुछ निश्चित काम हैं वो करना शुरू ही कर देंगे तो फिर तो हम बस, हम बस शरीर ही हो गये न? शरीर एक उम्र को पहुँच गया और हम कहने लगे कि शरीर इस उम्र में आया है तो अब मुझे एक शारीरिक, सामाजिक काम करना ही करना है। तो ये तो एक अजीब सी विवशता हो गयी।

रिश्ते पसंद नहीं आ रहे हैं तो ये कोई समस्या की बात तो नहीं होनी चाहिए। समस्या तो तब होती जब जो रिश्ता पसंद आने लायक नहीं था, उसको किसी मजबूरी में या बेहोशी में पसंद कर लिया होता। लेकिन अगर अपने ऊपर इतना ज़्यादा दबाव बनाओगे कि मेरी उम्र हो रही है, मेरी उम्र बीती जा रही है तो यही होगा कि किसी भी उल्टे-पुल्टे रिश्ते को मजबूरी में फिर स्वीकार कर लोगे।

ये बात चूँकि हमने बचपन से देखी है, समाज में देखी है, घर-परिवार में देखी है, फ़िल्मों में देखी है तो हमको ऐसा लगता है जैसे ये सत्य हो। सत्य वही होता है न जिसका कोई अपवाद नहीं होता? सत्य की क्या पहचान है? कि वह अटल होता है, अकाट्य होता है, निरपवाद होता है। ठीक है।

हम कहते हैं सत्य हर जगह, हर तरफ़ है। अब हर जगह, हर तरफ़ निरपवाद रूप से हम तो शादी ही देखते हैं। तो हमको वो सब चीज़ सत्य लगने लग जाती है। मतलब गज़ब देखिए कि हमारे लिए विवाह पर्याय बन गया है निर्गुण, निराकार, अगम, अगोचर सत्य का। जैसे वो चहुँओर है। संतों ने इसके गीत गाए हैं न कि वो तो हर जीव में है, वो कण-कण में है, वो अंतर्यामी है, वो कूटस्थ है। वैसे ही हमारे लिए शादी बन गयी है। हर जीव की है, चारों ओर है, होनी ही होनी है। जैसे जन्म हो, जैसे मृत्यु हो वैसे ही विवाह है, 'वो तो होना ही होना है'। नहीं, ऐसा नहीं है।

सिर्फ़ इसीलिए कि लोगों ने किसी चीज़ को बहुत-बहुत बड़ा बना दिया है, वो चीज़ उतनी बड़ी हो नहीं जाती। इतना परेशान होने की कोई बात नहीं है।

आप एक जीव हैं। आप इसीलिए नहीं पैदा हुए हैं कि आप विपरीत लिंग के किसी दूसरे जीव के साथ सहवास करना शुरू कर दें। वो जीवन की एक घटना हो सकती है। वो जीवन की ओर, जीवन के लक्ष्य की ओर बढ़ने के दौरान घटा एक प्रकरण हो सकता है, कि बढ़ रहे थे किसी मंज़िल की ओर और मंज़िल की ओर बढ़ते-बढ़ते यूँ ही अनायास, संयोगवश सफ़र में कोई हमसफ़र मिल गया। ये तो हो सकता है, पर वो चीज़ जीवन का एक बड़ा आवश्यक लक्ष्य थोड़े ही हो सकती है। और इतना आवश्यक तो कतई नहीं कि आप घबराना शुरू कर दें कि उम्र बीती जा रही है। एकदम नहीं, कुछ नहीं।

मिल गया तो बहुत अच्छी बात, नहीं मिला तो करने के लिए न जाने कितने दूसरे आवश्यक बल्कि अनिवार्य काम हैं। लेकिन दुनिया वालों से पूछो तो वो तो ऐसे बोलेंगे कि इंसान पैदा ही होता है शादी करने के लिए।

आमतौर पर इसको बड़ा एक ख़ुफ़िया प्रश्न माना जाता है। कहते हैं गूढ़ प्रश्न है। जीवन का उद्देश्य क्या है? पर्पस ऑफ लाइफ ? कहेंगें इट्स अ डीप, एसोटेरिक क्वेश्चन (ये गहरा, गूढ़ प्रश्न है)। लेकिन इसमें कुछ ख़ुफ़िया वगैरह है नहीं। आम आदमी की ज़िन्दगी को देखो तो आपको इसका उत्तर मिल जाएगा। आम आदमी के लिए जीवन का लक्ष्य ही शादी है। और नहीं है कोई लक्ष्य, शादी ही लक्ष्य है। शादी करो, फिर उसमें से और नए छोटे-छोटे लक्ष्य पैदा हो जाते हैं अपनेआप।

शादी न अच्छी चीज़ है, न बुरी चीज़ है। शादी बस एक छोटी चीज़ है। न अच्छी है, न बुरी है, न उसका बहुत समर्थन करने की ज़रूरत है, न उसका बहुत विरोध करने की ज़रूरत है। वो चीज़ छोटी है और छोटी चीज़ का क्या बड़ा समर्थन करना है, क्या बहुत विरोध करना। हो गयी तो हो गयी, नहीं हो गयी तो नहीं हो गयी। आज हो गयी तो आज हो गयी और कल हुई तो कल हुई और नहीं हुई तो नहीं हुई। वह चीज़ इतनी बड़ी है ही नहीं कि आप उसे अपने मन में इतना महत्वपूर्ण स्थान दें। आप कह रहे हैं उम्र बीती जा रही है, उम्र तो आपकी और भी कई चीजों की बीती जा रही है। आपकी क्या उम्र हो गयी?

प्र: सर, अट्ठाइस।

आचार्य: अट्ठाइस। अच्छे खिलाड़ी बत्तीस-चौंतीस साल के होते-होते रिटायर होना शुरू कर देते हैं, है न? और एक बार वो उम्र बीत गयी, उसके बाद तो आप कोई खेल सीख भी नहीं पाओगे। मुझे बताओ आपने कौन-कौन से खेल सीख लिए हैं? उम्र तो उसकी भी बीत रही है आपकी।

शादी तो फिर भी हो जाएगी अड़तीस में शायद। पर क्या आपको तैरना आता है? आपने पहाड़ों पर चढ़ने का कुछ अनुभव लिया? जो दूसरे साधारण खेल होते हैं क्रिकेट, बैडमिंटन, टेनिस, ये भी आपने कितने सीख लिए?

अब ये मेरी बात बहुत लोगों को मज़ाक की लगेगी। कहेंगें अरे शादी की तुलना बैडमिंटन से कर रहे हैं। मैं क्यों न करूँ? बैडमिंटन कम से कम आपका स्वास्थ्य तो अच्छा रखेगा। शादी में बता दो क्या पा जाओगे? और उम्र तो बैडमिंटन की भी बीती जा रही है। सत्ताईस-अट्ठाइस के हो गये, रैकेट कब उठाओगे आप? और अगर अभी तक आपने पानी में कूदना नहीं सीखा तो क्या चालीस की उम्र में कूदोगे? उम्र तो उसकी भी बीती जा रही है, उसकी बात क्यों नहीं करते?

आपने दुनिया के कितने देश घूम लिए? आपने भारत देश ही कितना घूम लिया? क्या उम्र नहीं बीती जा रही? घड़ी तो टिक-टिक कर ही रही है। आपने दुनियाभर का साहित्य कितना पढ़ लिया? आपने शिक्षा यदि ली भी होगी तो किसी एक क्षेत्र में ली होगी। क्या क्षेत्र है आपका?

प्र: सर, एमबीए किया है मैंने।

आचार्य: आपने बिज़नेस (व्यापार) की पढ़ाई की है। मैं आपसे पूछूँ आपने ह्यूमैनिटीज़ (मानविकी) पढ़ी कुछ? आपने अर्थशास्त्र पढ़ा, आपने समाजशास्त्र पढ़ा, आपने मनोविज्ञान पढ़ा, आपने दर्शन-शास्त्र पढ़ा? दर्शन में भी आपने भारतीय दर्शन पढ़ा, आपने पाश्चात्य दर्शन पढ़ा, आपने ग्रीक दर्शन पढ़ा? और ये सब नहीं पढ़ा तो बताओ क्या आपकी उम्र नहीं बीती जा रही? ये सब कब पढ़ोगे बताओ? उम्र तो इन चीजों की भी बीत रही है न, पर हम इनकी तो परवाह ही नहीं करते।

और आप तो फिर भी पुरुष हैं, स्त्रियाँ होती हैं, वह तो बिलकुल ही नहीं परवाह करतीं। और तीस वर्ष की हो गयी हो कोई स्त्री, उसका विवाह न हुआ हो तो समाज उस पर इतना दबाव डालता है कि वो बेचारी कहाँ जाकर फिर मुँह छिपाये। और मैं उससे कहूँ तुम शादी की इतनी परवाह कर रही हो, तुमने प्लेटो को पढ़ा? तुमने वोल्टायर को पढ़ा? वो कहेंगी, ‘कैसी बात कर रहे हैं? ये आदमी विक्षिप्त है। मैं कह रही हूँ मेरा विवाह करवा दो ये मुझे वोल्टायर बता रहा है।‘

पर मैं तो पूछूँगा, क्योंकि मेरी दृष्टि में दर्शन का, कृष्ण का और कबीर का और अष्टावक्र का महत्व विवाह से कहीं आगे का है। और आपको वर्ष मिले हैं कुल गिनती के; सत्तर-अस्सी साल की आदमी की ज़िन्दगी होती है, उसमें भी आखिरी के पाँच-दस सालों में वो किसी काम का नहीं रहता, अस्पताल में पड़ा रहता है। तो आप जो भी कुछ सार्थक उद्यम करना चाहते हैं उसके लिए तो जवानी के ही कुछ वर्ष होते है न? और जवानी के कुछ वर्षों में इंसान कोई सार्थक काम करने की सोचता ही नहीं है।

इंसानी जवानी के सारे साल बस एक ही लक्ष्य के पीछे ख़राब हो जाते। अगर लड़की है तो उसको लड़का चाहिए, अगर लड़का है तो उसको लड़की चाहिए। अरे ये लड़का-लड़की के खेल में ज़िन्दगी के बाकी काम कब करोगे, भाई?

और मैं क्यों विरोध करूँगा कि लड़की को लड़का न मिले, लड़के को लड़की न मिले? बहुत अच्छी बात है, मिल जाए। लेकिन प्रायौरिटी (वरीयता) भी कोई चीज़ होती है कि नहीं होती है? वो चीज़ ज़िन्दगी का लक्ष्य थोड़े ही बन सकती है, उसको जीवन में इतना ज़्यादा महत्व थोड़े ही दे सकते हो। महत्व ज्ञान का है, महत्व मुक्ति का है। इन सबके पीछे-पीछे अगर हो गया विवाह तो हो गया। अगर कोई मिल गया आपको विपरीत लिंगी साथ देने के लिए तो मिल गया, नहीं मिला तो नहीं मिला। उतना उसमें क्या परेशान होना?

लेकिन भारत में यही जैसे हमारा नैश्नल पैशन (राष्ट्रीय जुनून) है – विवाह। शहनाई कब बजेगी? ढोल कब बजेंगे, बैंड-बाजा कब बजेगा? लड़की की विदाई कब कराओगे, गुप्ता जी?

और उसके बाद फिर ये कि अब बच्चे भी पैदा होने चाहिए। अब आप बच्चे पालोगे या अपने जीवन का निर्माण करोगे, अपने व्यक्तित्व का विकास करोगे? और मैं नहीं कह रहा ये दोनों काम साथ-साथ नहीं हो सकते। हो सकते हैं, ठीक है। विवाह और गृहस्थी और आत्म-विकास ये साथ-साथ चल सकते हैं। लेकिन इन तीनों में वरीयता किसकी है, प्रायौरिटी , वो तो हमें पता होनी चाहिए न। या अपने जीवन को राख़ करके गृहस्थी खड़ी करनी है? इस बात पर थोड़ा ध्यान दीजिएगा, क्योंकि ज़्यादातर लोग ऐसा ही करते आ रहे हैं और आज भी कर रहे हैं। अपनी ज़िन्दगी की लाश पर गृहस्थी थोड़े ही खड़ी की जाती है।

कोई पूछे राजनीति में क्या चल रहा है? नहीं पता। कोई पूछे अर्थव्यवस्था में क्या चल रहा है? नहीं पता। कोई इतिहास के बारे में बात करना चाहे, हम नहीं बात कर सकते। कोई कहे कि आज दुनिया के सामने इतने जलते हुए मुद्दे खड़े हैं, बताओ आप क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) के बारे में क्या कर रहे हो। और वो आज के युग का बड़े से बड़ा सवाल है, क्लाइमेट चेंज। कोई पूछे ‘बताओ क्लाइमेट चेंज के बारे में क्या कर रहे हो?’ तो लड़का और लड़की कहेंगे हम कुछ भी नहीं कर रहे। तो फिर तुम दोनों क्या कर रहे हो? अगर तुम दोनों क्लाइमेट चेंज को लेकर के कोई सामाजिक सक्रियता नहीं दिखाते, तो फिर तुम करते क्या हो? तो लड़का-लड़की कहेंगे ‘हम एक दूसरे के पीछे भागते हैं, हम तो ये करते हैं।‘

एक-दूसरे का साथ देना भी है तो किसी ऊँचे लक्ष्य की ओर दो न। जैसे दो लोग एक साथ किसी ऊँचे पहाड़ पर चढ़ रहे हों शिखर की तरफ़। ये थोड़ी बात बनी भी कि ठीक है। मैं भी तुम्हारी तरफ़ नहीं आ रहा, मैं भी जा रहा हूँ उस चोटी की तरफ़। तुम भी मेरी तरफ़ नहीं आ रही, तुम भी जा रही हो उस चोटी की तरफ़। और साथ चलते-चलते संयोग की बात है कि एक दूसरे को हमने थोड़ा समय दे दिया, थोड़ा सहारा दे दिया। लेकिन फिर भी न तुम मेरा लक्ष्य हो, न मैं तुम्हारा लक्ष्य हूँ। हम दोनों का साझा लक्ष्य वो शिखर है। ऐसा अगर रिश्ता बने तो फिर भी ठीक है। ये कौनसी बात होती है कि अब आप इतने साल के हो गये हैं या हो गयीं हैं तो अब आपके जीवन का एक ही परम उद्देश्य है – विवाह।

और आप जाना, देखना, विशेषकर उत्तर और मध्य भारत में आज भी यह दशा है, बड़े खेद की बात है कि घर में अगर तीन-चार लड़कियाँ हों और उनकी शादी न हो रही हो तो भयानक माहौल का वातावरण रहता है। तनाव का माहौल रहता है घर में, आप देखिएगा। और फिर उसके ब्याह के लिए किसी भी हद तक दहेज भी दिया जा सकता है, और किसी भी तरह की शर्त स्वीकार भी की जा सकती है।

ये सब क्या है? हम समझ ही नहीं रहे हैं हम कौन हैं, हम पैदा क्यों हुए हैं, ज़िन्दगी है किस लिए। ज़िन्दगी किसी व्यक्ति की गोद में जाकर बैठ जाने के लिए नहीं है, भाई। पुरुष हैं आप तो आपका जीवन इसीलिए नहीं कि किसी स्त्री के आँचल में मुँह छुपा लिया। इसीलिए नहीं पैदा हुए हैं आप। हाँ, फ़िल्मों ने आपको ऐसा सिखा दिया है। समाज ने और परंपरा ने आपको ऐसा बता दिया है, लेकिन ये नहीं है जीवन का उद्देश्य। और न स्त्री के जीवन का ये उद्देश्य है कि किसी पुरुष की छाँव में खड़ी हो जाए और उसके बच्चे पैदा करे।

आप समझिये तो कि जीवन कितने गौरव की, गरिमा की, आनंद की बात हो सकता है। लेकिन जीवन में जो कुछ आनंद देने वाला है, हम उससे बिल्कुल वंचित रह जाते हैं। हम बस दो कमरों के एक घर में घुस जाते हैं और उसी को ज़िन्दगी बना लेते हैं। न समुद्रों में गोता मारा, न पहाड़ों पर चढ़ाई की। न गाँव देखे, न देश देखे। न अतीत को जाना, न भविष्य को गढ़ा। क्या करा? ‘जी हमारे तो जीवन की उपलब्धि ये है कि हमने विवाह करा।‘ ये कहाँ की बात है? आपने इतने विवाहित लोगों को देखा है, उत्तर दीजिएगा, उनको देखकर लगता है कि उनके जीवन में सूरज दमक रहा है? कम-से-कम चाँद-तारे जगमग हो रहे हैं, ऐसा लगता है क्या?

प्र: ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं है।

आचार्य: हाँ, ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं है। आप बाज़ार की ओर निकलिए या आप रेलवे स्टेशन पर चले जाइये, वहाँ प्लेटफॉर्म पर देखिए, वहाँ एक जोड़ा चला आ रहा होगा रेलवे प्लेटफॉर्म पर। उन्होंने अपना सामान उठा रखा है। दो बच्चे हैं, एक स्त्री की गोद में है, वो ज़ोर-ज़ोर से रो रहा है, चिल्ला रहा है, उसकी नाक बह रही है। एक दूसरा बच्चा है, वो छोटा है, पुरुष ने उसका हाथ पकड़ रखा है और उसको लगभग घसीटते हुए भाग रहा है कि भाग-भाग ट्रेन छूट रही है। पुरुष के सर पर दो बैग रखे हुए हैं। स्त्री भी एक ट्रॉली घसीट रही है और गोद में जो बच्चा है वो हाथ-पाँव पटक रहा है और रो रहा है, तो उसको थप्पड़ मार देती है। यही स्वर्ग है, इसी स्वर्ग के लिए आप पैदा हुए थे?

देखिये, मुझे न स्त्री से कोई समस्या, न पुरुष से समस्या, न बच्चों से समस्या । मुझे समस्या ये है जब यही सब जो सर्कस है, हम इसी को जीवन का चरम समझने लगते हैं। मुझे उस बात से समस्या है। बाकी विवाह ज्ञानियों ने भी करा है और बच्चे क्रांतिकारियों ने भी पैदा करें हैं। मुझे उसमें क्या आपत्ति हो सकती है?

लेकिन एक आम आदमी की ज़िन्दगी को तो देखिये न वो क्या करता है। उससे पूछो कि उपलब्धियाँ बताओ। कोई उपलब्धि नहीं है उसके पास। उससे पूछो कुछ सार्थकता बताओ, कुछ ज्ञान बताओ, कुछ वीरता बताओ, कुछ साहस बताओ, कहीं कोई समर्पण दिखाओ, कुछ नहीं है उसके पास। कुल मिलाकर के उसके पास एक नौकरी होती है अदद, जिससे वो कुछ चंद पैसे कमाकर लाता है और अपने परिवार का पेट पालता है। ये कैसी ज़िन्दगी है? और कोई क्यों स्वीकार करे इस ज़िन्दगी को? हर जवान आदमी को अपनेआप से ये सवाल पूछना ही होगा।

जो जीवन का रस है उस पर ध्यान केन्द्रित करिए। जहाँ जीवन की सार्थकता है, उस दिशा में आगे बढ़िए। शादी-ब्याह छोटी चीज़ है, हो गया तो हो गया, नहीं हुआ तो नहीं हुआ। और एक बात बता दूँ, मजबूरी में जब शादी-ब्याह किये जाते हैं तब तो पक्का ही होता है कि ये तो अब नर्क निकलेगा। शादी हो भी तो ऐसे हो कि मजबूरी कुछ नहीं थी। राह चलते कोई बहुत अच्छा मिल गया और आपस में प्रेम हो गया, सम्मति बन गयी, हमने विवाह कर लिया। ऐसे शादी हो तो फिर भी संभावना है कि शायद ठीक निकल जाए।

लेकिन ये जो मजबूरी में की जाती है न शादी कि लड़का तीस का हो रहा है, अरे जल्दी शादी कराओ। जो मिले उसी से बाँध दो। और लड़की! लड़की अट्ठाईस-तीस की हो रही है। इस बार तो शादी के मौसम में इसको कहीं न कहीं धकेल ही देना है बाहर। ऐसे में जो ब्याह होते हैं वह तो निश्चित रूप से नर्क का ही द्वार होते हैं। तो संयमित रहिए, सहज रहिए। इतनी चिंता, इतनी बेचैनी बिलकुल भी आवश्यक नहीं है। जीवन के उच्चतर लक्ष्यों की ओर ध्यान केन्द्रित करिए। ब्याह होना होगा तो हो जाएगा।

प्र: सर, मेरा एक सवाल था। सर मेरे लिए तो ठीक है कि मैं ये मान लूँगा कि हाँ, ठीक है, हुआ तो हुआ, नहीं हुआ तो कोई बात नहीं। मैं समझ गया इस बात को। लेकिन अब मेरी सिस्टर (बहन) के लिए मैं क्या करूँ?

आचार्य: आपकी सिस्टर कितने साल की हैं?

प्र: सर, वो ट्वेंटी-सिक्स (छब्बीस) की है, दो साल छोटी है मुझसे।

आचार्य: तो उनके लिए आप कुछ क्यों करेंगे? छब्बीस साल तो अच्छी खासी उम्र होती है न। वयस्क हैं, समझदार हैं। जो करना होगा अपनी ज़िन्दगी में ख़ुद करेंगी। आप और मैं होते कौन हैं उनकी ज़िन्दगी का फैसला करने वाले, या उनकी ज़िन्दगी के बारे में बात करने वाले? हमारा अधिकार क्या है? दो पुरुष बैठकर के एक वयस्क महिला के जीवन का निर्धारण कैसे कर रहे हैं? हमारा क्या हक़ है? हम कौन होते हैं? आप हों, चाहे आपकी माता जी हों, चाहे आपके पिताजी हों।

जब तक बहन छोटी थी, चलो छः साल की, तब तक उसको ठीक से पाल दिया। जब तक सोलह साल की थी, तब तक उसको कुछ दिशा-निर्देश बता दिए। चलो अठारह-बीस-इक्कीस की हुई तो उसको कुछ सलाह दे दी। अब वह छब्बीस-अट्ठाईस-तीस की होगी, क्या अभी भी हम चाहते हैं कि उसके जीवन को हम निर्धारित करें? नहीं, बिल्कुल भी अच्छा नहीं है।

आपने कहा आप सत्ताईस-अट्ठाइस के हैं, है न? अगर मान लीजिये आप यहाँ न हो, आपकी बहन यहाँ हों और बहन पूछें, 'सर, बताइए मैं अपने भाई का क्या करूँ? भाई की उम्र बीती जा रही है शादी कराने की,' तो आपको कैसा लगेगा?

आपकी और आपकी बहन की उम्र लगभग एक बराबर है। आप अब वयस्क हैं दोनों, है न? एक छब्बीस, एक सत्ताइस-अट्ठाइस। तो जैसे आप कह रहे हैं कि अब मैं अपनी सिस्टर का क्या करूँ, वैसे ही सिस्टर यहाँ पर आकर पूछे मैं अपने ब्रदर (भाई) का क्या करूँ? तो आपको कैसा लगेगा? आपको अजीब लगेगा, आप कहेंगे, 'तू कौन होती है मेरी शादी-ब्याह और ज़िन्दगी में दख़ल देने वाली? मैं देख लूँगा न भई, मैं ख़ुद देखूँगा।'

लेकिन हमारे उत्तर भारत में, हमारे ख़ासकर हिंदी भाषी क्षेत्रों में ये बहुत चलता है कि लड़की चाहे कितनी भी उम्र की हो जाए, पहले वो पिता के आश्रित रहेगी, भाई के आश्रित रहेगी, पति के आश्रित रहेगी और जब उसकी बहुत ही उम्र बढ़ जाए तो कहा जाता है अब तू पुत्र के आश्रित हो जा। उसे क्यों आश्रित रहना है आपके?

आपका भाई होने के नाते और भाई के प्रेम के नाते जो कर्तव्य है वो ये है कि आप अपनी बहन को ऊँची-से-ऊँची शिक्षा दिलाएँ। उसको इस क़ाबिल बनाएँ कि अपने जीवन के निर्णय वो स्वयं कर सके। यहाँ तक आपका योगदान, आपका रोल , आपका किरदार है। इसके आगे दख़ल देने का आपको कोई अधिकार नहीं है। न आपके जीवन में दख़ल देने का आपकी बहन को अधिकार है।

और यही तो प्रेम की बात है न, दूसरे को बड़ा करना और बढ़ा करके उसे खुले आकाश के लिए मुक्त छोड़ देना। प्रेम मुक्ति देता है, प्रेम बन्धन नहीं देता। दूसरे के प्रति प्रेम होता है उसको विकास देने में, उसको पंख देने में। उसकी जो अंदर की संभावना है उसको साकार करने में उस व्यक्ति के प्रति प्रेम होता है।

बहन को साहसी बनाएँ। बहन को साहसी बनाएँ। वधु होना बाद की बात है, पहले वीर होना ज़रूरी है। पंजाबियों में भाई को कहते हैं वीर जी, और इन भाइयों के लिए ज़रूरी है कि अपनी बहनों को वीर बनाएँ। पर भाई लोग बहन को वीर बनाने की जगह उसे वधु बनाने पर उतारू रहते हैं, ये क्या बात है? उसे वीर बनाएँ, उसे विदुषी बनाएँ। विदुषी समझते हैं? ज्ञानी। तो बहन में साहस और ज्ञान दें। वीरता और विद्वत्ता। वधु वगैरह वो बाद में बन लेगी, अपनेआप बन लेगी। कहिए।

प्र: सर, थैंक यू।

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