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लेख
पत्नी से सम्मान नहीं मिलता? || आचार्य प्रशांत (2020)
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
17 मिनट
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा मेरी पत्नी से कोई लगाव वगैरह कुछ नहीं है। बस सामाजिक दबावों से उसके साथ हूँ। तलाक से डरता हूँ। डर लगता है कि तलाक हुआ तो पता नहीं क्या-क्या देखना पड़ेगा। पत्नी से सम्मान की इच्छा रहती है, मिलता बस अपमान है, लेकिन मैं चाहता हूँ इज़्ज़त मिले। मेरी अध्यात्म में भी गहरी रुचि है।

आचार्य प्रशांत: (व्यंग्य करते हुए) और एफ-वन रेसिंग में भी रुचि होगी, एनबीए में भी रुचि होगी, आउटर-स्पेस एक्सप्लोरेशन (ब्रह्माण्ड की खोजबीन) में भी रुचि होगी। और यह सब जो रुचि वाले काम होते हैं यह हम महीने में पाँच मिनट के लिए कर लेते हैं। यह क्या सवाल है! क्या उम्मीद है आपकी, मैं क्या बोलूँ इस पर?

“पत्नी से मेरा कोई लगाव नहीं है। सामाजिक कारणों से उसके साथ हूँ।" सभी का यही होता है, इसमें नई बात क्या है? “तलाक से भयभीत हूँ। डर लगता है कि तलाक हो गया तो क्या-क्या देखना पड़ेगा। पत्नी से सम्मान की इच्छा रहती है, मिलता नहीं है।"

तो यह सब पहले तय कर लेना था न कि, "तू इतना सम्मान दिया करेगी मुझे साढ़े सात सौ ग्राम और बदले में मैं तुझे कुछ और दूँगा पाँच-छः ग्राम।" कुछ बातें यह सब नाप-जोख कर करनी थी।

जब प्रेम का रिश्ता नहीं है तो फिर तो कोई व्यापारिक रिश्ता ही है। और व्यापार में जब अनुबंध करे जाते हैं, करार, एग्रीमेंट तो वहाँ पर छोटे-से-छोटा बिंदु भी छलनी से छान कर अंतिम किया जाता है। वहाँ पर तो हर बिंदु पर दिमाग लगाया जाता है कि इसमें कितना लिखना है, कितना नहीं, ठीक-ठीक कौन से शब्द का प्रयोग करना है। हर बात भाई साफ-साफ होनी चाहिए, नहीं तो आगे जाकर के झमेला-झंझट होगा। तो यह सब तब काहे नहीं करा?

जब एक जवान आदमी अपनी कल्पनाएँ रचता है कि अब जीवन में एक स्त्री आएगी तो इमानदारी से बताना, अपने ख्वाबों में क्या वह यह देख रहा होता है कि वह आकर के इसको सम्मान के फूल चढ़ा रही है? यह है तुम्हारी फेंटेसी कि वह आएगी बिलकुल अप्सरा बनी हुई और तुम्हें देख कर के कहेगी, "प्रणाम! हे महर्षि।" यह है?

इसका आधा भी हो गया, तो तुम्हारी सारी उत्तेजना ढह जाएगी। तुम्हारी उत्तेजना के महल के खड़े हुए खंभे भी गिर जाएँगे। कुछ बचेगा नहीं। कौन है ऐसा इंसान बताओ मुझे, जो सम्मान की खातिर लड़कियों के पीछे जाता है? बताना भाई। यहाँ भी जवान लोग बैठे हैं। जब लड़कियों के पीछे जाते थे तब यह सोचकर जाते थे कि, "आज मुझे इज़्ज़त नवाजी जाएगी"? और तुम जा रहे हो और वह मुड़कर कहे, "हे पुरुष श्रेष्ठ! हे नरोत्तम!" तो ऐसे वहाँ से चंपत होवोगे कि दोबारा नजर नहीं आओगे। मिल गई कभी दोबारा तो कहोगे, "बहन जी क्षमा कीजिएगा।"

अब माँग रहे हो कि पत्नी से सम्मान मिले। और जब पत्नी मिली थी तब उसके साथ जितनी जलील हरकतें कर सकते थे, करी। वही जलील हरकतें करने के लिए तो विवाह होता है।

कुतर्क मत करना। मेरी बात काटना आसान है, काटनी है तो काट लो। समझ सकते हो तो समझ लेना। मैं तुम्हारे आदर्शों और सिद्धांतों की बात नहीं कर रहा हूँ, मैं बिलकुल ज़मीनी बात कर रहा हूँ। तुम आदर्श जानते होओगे, मैं ज़िंदगी जानता हूँ।

जाओ किसी भी आम लड़के से पूछ लो वह किसलिए विवाह करता है। सम्मानजनक काम करने के लिए तो वह विवाह करता नहीं। वह काम सारे ऐसे ही करता है जो अगर वह विवाह के बिना कर दे तो तुम कहोगे — जलील, लुच्चे, लफंगे गायब हो जा यहाँ से।

तो तुम अपना जो सबसे जलील रूप हो सकता है वह पत्नी के सामने नंगा करते हो। करते हो न? दुनिया में और किसी को भले ही तुम्हारे बारे में गलतफहमी हो कि तुम बड़े सम्माननीय आदमी हो, तुम्हारी पत्नी को तो गलतफहमी नहीं हो सकती। उसने तुम्हारा निरा पशु रूप देखा है, जो न माँ ने देखा है, न बाप ने देखा है, दोस्त-यारों ने भी नहीं देखा।

हमारी जो हैवानियत हमारे जीवन की स्त्रियाँ देखती हैं, हमारे सेक्सुअल पार्टनर देखते हैं वह और कोई देखता है क्या? और उसके बाद तुर्रा यह कि साहब को इज़्ज़त चाहिए। सब काम-धाम निपटा कर खड़े हो गए हैं, डकार मारी और कह रहे हैं — अब हमें सम्मान से प्रतिष्ठित करो न।

सम्मान चाहिए तुम्हें! कुछ करा है ऐसा कि सम्मान देगी तुम्हें? और अगर तुम वास्तव में सम्मान के अधिकारी होते तो तुम्हें भूख क्यों बची होती सम्मान पाने की? सम्मान का जो पात्र होता है, यह उसका अनिवार्य लक्षण है कि वह किसी से भी सम्मान माँगना बंद कर देता है। उसे फर्क ही नहीं पड़ता कौन उसे सम्मान दे रहा है, कौन नहीं दे रहा है।

वह कहता है, "हम खुद को जानते हैं, हम खुद अपना निर्णय कर सकते हैं। इतनी ईमानदारी है हममें कि हम अपने-आपको ही साफ-साफ अपनी आँख से ही देख लें। जितना हमें पता है अपने बारे में, उतना दूसरे को तो नहीं पता होगा हमारे बारे में। दूसरे के सामने तो हम कुछ क्षणों के लिए आ जाते हैं, अपने साथ तो हम चौबीस घण्टे रहते हैं। तो हम कितने पानी में हैं, दुनिया में और किसी से ज़्यादा बेहतर हमें ही पता है अपने बारे में। तो हम निर्णय करेंगे न कि हम सम्मान योग्य हैं कि नहीं हैं। और अगर हमने निर्णय कर लिया कि हम हैं सम्माननीय तो दूसरे से क्या सम्मान माँगना?"

आमतौर पर दूसरे से सम्मान माँगने की ख्वाहिश यही दर्शाती है कि आप खुद को सम्मान नहीं देते और वह भी सम्मान किस से माँग रहे हो, पत्नी से! पागल, आज तक किसी पति को पत्नी से सम्मान मिला है? वह भी कहती है, "इतना कुछ तुमने ले लिया हमसे, अब यह आखिरी चीज़ है यह मत ही माँगो, यह तो नहीं देंगे।"

हर तरह की दरिंदगी उसको दिखाते हो, हर तरह की क्षुद्रता उसको दिखाते हो। हमारा जो सबसे विकृत-विभत्स-निकृष्टम रूप होता है, वह पत्नियों के आगे प्रकट होता है। फिर तुम उनके सामने क्या बन कर खड़ा होना चाहते हो, भारत रत्न? ऋषि मनीषी हो तुम? खड़े हो गए वहाँ पर, हरिओम बोलते हुए।

अभी घण्टे भर पहले उसने तुमको देखा है, तुम्हारे पैशाचिक अवतार में, वो कैसे इज़्ज़त दे देगी तुमको?

कामवासना हमारी गहरी-से-गहरी वृत्तियों में से होती है और जो वृत्ति जितनी गहरी होगी उसमें उतनी सड़ांध होगी और वह जिसके सामने प्रदर्शित हो जाएगी, उद्घाटित हो जाएगी वह कैसे तुमको इज़्ज़त देगा भाई? इसीलिए पत्नी से तुमको ममत्व मिल सकता है, सेवा मिल सकती है, सुरक्षा मिल सकती है, सम्मान नहीं मिलेगा।

चूँकि पत्नी से यह सब नहीं मिलता इसीलिए पुरुषों ने फिर बड़ी एक खुफिया व्यवस्था बनाई। बोले, "ऐसा करते हैं, विवाह के समय पत्नी की उम्र थोड़ी तीन-चार साल कम रखते हैं और यह नियम बना देते हैं कि वह परमेश्वर मानेगी, आप करके बात करेगी, पति के चरण स्पर्श करेगी।" यह सब तरीके हैं ज़बरदस्ती सम्मान उगाहने के।

तुम यह सब परम्पराएँ ना रखो, कोई स्त्री नहीं सम्मान देगी अपने पति को। पति भी नहीं देगा पत्नी को। यह रिश्ता ही ऐसा नहीं है जिसमें परस्पर सम्मान दिया जा सके। इसकी बुनियाद ही नहीं रखी गई थी सम्मान पर। इसकी बुनियाद ही कामवासना पर रखी गई थी।

तुम एक ऐसी चीज़ से सम्मान की उम्मीद कर रहे हो जो सम्मान को केंद्र में रखकर या सम्मान को लक्ष्य बनाकर बनी ही नहीं है। तो फिर आयोजन किया गया कि चलो स्त्री से ज़बरदस्ती सम्मान लिया जाएगा। उसको यह सब बातें बता दी गई कि पति को ऐसे इज़्ज़त दो, वैसे इज़्ज़त दो। नाम भी मत लो पति का, "पिंटू के पापा!" अच्छा!

भगवान तक का नाम लिया जा सकता है, यह जो पिंटू का पापा है, लुच्चा, इसका नाम नहीं लिया जा सकता। यह सब इसीलिए है।

और यह बातें मैं उनसे नहीं कह रहा हूँ जो कामवासना के अतिरिक्त किसी और लक्ष्य के कारण विवाह करते हों। पर ऐसे लोग होंगे ही लाख में एक। लाख में से निन्यानवे-हज़ार-नौ-सौ-निन्यानवे लोग अगर अपना दिल टटोलेंगे तो उन्हें पता चलेगा कि प्रमुख कारण विवाह करने का एक ही होता है — कामवासना की पूर्ति, शारीरिक सुख का लक्ष्य।

और पीछे-पीछे तुम दो-चार कारण और गिना सकते हो, गिनाने हों तो गिना लेना, मैंने अपनी बात कह दी। वह जो पीछे के कारण तुम गिनाओगे, वह पीछे ही वाले हैं, वह प्रमुख कारण नहीं हैं। प्रमुख कारण एक ही है। और मेरी बात जाँचनी हो तो अभी मैं तुम्हें एक प्रयोग बताए देता हूँ, वह कर लो।

जो लोग आएँगे और कहेंगे, "नहीं नहीं, वह तो हमारी प्यारी गुलबहार है दिल-ओ-जान है। उससे हमने कोई कामवासना के लिए थोड़े ही शादी की है।" उनसे मैं कहता हूँ, यह प्रयोग करके देख लो — विवाह के समय पर अगर लड़के-लड़की को बता दिया जाए कि एक-दूसरे के साथ जैसे रहना है रहो, जो करना है करो, पूरी छूट है। बस सेक्स नहीं कर सकते। तो तुम यह बताओ कितने विवाह होंगे? कम-से-कम लड़कों की तो कोई रुचि नहीं रह जाएगी फिर विवाह करने में।

वह बिलकुल दिल-ओ-जान से फिदा हुआ जा रहा होगा, निछावर हुआ जा रहा होगा और तभी तुम उसके कान में जाकर बता दो, "वह नहीं मिलेगा!" वह तुरंत उचक कर खड़ा हो जाएगा और कहेगा, "अरे, हटाओ यह सब आडंबर, शादी-वादी हमें करनी ही नहीं है। क्योंकि असली चीज़ तो एक ही थी जो चाहिए थी।"

तो भाई आप अपने वैवाहिक जीवन में यह सब जो समस्याएँ झेल रहे हैं, उनके मूल में यह जो विवाह नाम की संस्था है उसकी संरचना ही है। बिना इस बात की शिक्षा दिए कि तुम कौन हो, पुरुष होने का या स्त्री होने का, लिंग पर आधारित देह पाने का अर्थ क्या होता है, बिना इन सब चीज़ों की शिक्षा दिए आपकी किसी के साथ गाँठ बाँध दी जाती है और कह दिया जाता है कि अब जन्म भर इसके साथ रहो तो फिर उस रिश्ते में टकराव, मनमुटाव, इनके अलावा और क्या होगा?

कोई बहुत गहरी बात मैं नहीं बोल रहा हूँ, जो बोल रहा हूँ वह बात बिलकुल स्पष्ट, प्रत्यक्ष सामने की है। आप समझिए तो सही न।

यह जो लड़का है शादी कर रहा है छब्बीस-अट्ठाइस साल का है, इसी उम्र की लड़की है पच्चीस-छब्बीस साल की, यह दोनों कितने होशियार हैं? इन्होंने जीवन को कितना समझा है? यह आत्मा-मन-शरीर को कितना जानते हैं? यह कुछ भी जानते हैं? बस आपने पकड़कर, “अरे रजुआ की उम्र हो गई है, चलो रे तुम भी।” रजुआ और रिंकिया की आपने करा दी।

न रजुआ कुछ जानता है, न रिंकिया कुछ जानती है, दोनों निरे बेवकूफ, जीवन के बारे में। हो सकता है डिग्रियाँ हासिल कर ली हों। हो सकता है कि अब यह स्नातक हो गए, परास्नातक हो गए, डॉक्टरेट ही हो गए। यह भी हो सकता है कि बड़ी नौकरियाँ भी हासिल कर ली लेकिन जहाँ तक जीवन शिक्षा की बात है, दोनों अभी बिलकुल जाहिल हैं, निरक्षर हैं।

दोनों कुछ नहीं जानते अपने बारे में। और आपने उन दोनों को एक साथ बाँध दिया। और क्यों साथ बाँध दिया? इसलिए साथ बाँध दिया क्योंकि आप को डर है कि अगर एक औरत लाकर नहीं दी तो रजुआ कुछ ही दिन में बेलगाम हो जाएगा बिलकुल। शहर-कस्बे की बेचारी बाकी लड़कियों को खतरा हो जाएगा। तो आपने कहा चलो इसको रिंकिया के साथ बाँध देते हैं।

रिंकिया भी खुश कि बाकी दीदी लोगों की तो बीस-बाईस साल में हो गई थी, हम पच्चीस के हुए जा रहे हैं, हमारी भी अब हो जाए तो बढ़िया है। अब यह दोनों को आपने एक साथ कर दिया। यह दोनों खुद नहीं जानते यह एक साथ क्यों आए हैं। हाँ, एक दूसरे को चीरना-फाड़ना यह शुरू कर देंगे पहली रात से ही।

और कुछ सामाजिक रस्में बता दी गई हैं, अब ऐसे करो, अब वैसे करो, यह कर दो वह कर दो, दूध का गिलास ले आओ, यह देवर है यह ननंद है, यह सास है, यह फलानी चीज़ है, ये सब। ऐसा है वैसा है। वह भी बिलकुल एकदम झनझना जाते होंगे।

शादी करके यह जो जोड़ें बनते हैं, बेचारे एकदम संट हालत में रहते होंगे, “यह हो क्या गया हमारे साथ अचानक से।" अब वह लड़की है, पच्चीस की ही तो है, पच्चीस कोई बहुत ज़्यादा तो होता नहीं। बड़े शहरों में, मेट्रो में यह जो पच्चीस वाली होती हैं यह तो बेबी-बेबी बनकर घूमती हैं, यह तो कुचु-कुचु होती हैं। अभी छोटी सी है बिलकुल एकदम। वह पच्चीस की है, पच्चीस में लड़की ही है। उसको आप बोल रहे हो⁠, "ले यह सिंदूर है, इसको माँग में भरा कर।"

आपके बाल में कोई कहे कि रोज़ रंग भरना है, आप भर लोगे? चलो वह रोज़ भर लेती है लेकिन यह तो सोचो कि वह मानसिक रूप से कितना छितरा जाती होगी कि अब यह सब करना पड़ रहा है।

अचानक उसको किसी दूसरे घर में पहुँचा दिया। वह कुछ नहीं जानती — क्यों पहुँचा दिया, कहाँ पहुँचा दिया, क्या खेल है। वहाँ पर एक औरत खड़ी हो गई है, मोटी सी नाटी सी, कुरूप सी और यह सास है, सास भी नहीं यह सासू-माँ है। और सासू-माँ को गठिया है और यह जो नई-नवेली आई है इसको बोला गया है कि रोज़ सासू-माँ के घुटनों और जाँघों पर सरसों का तेल मला करो, और गंधाती है सासू-माँ।

अरे भाई मैं किसी रोगी की सेवा करने के खिलाफ नहीं बोल रहा हूँ लेकिन रोगी की सेवा भी वही कर सकता है न जिसके मन में पहले आपने करुणा जागृत करी हो। तभी तो सेवाभाव आएगा।

रिंकिया को जीवन में कुछ समझाया, लिखाया-पढ़ाया नहीं। मैं औपचारिक शिक्षा की बात नहीं कर रहा हूँ, स्कूल-कॉलेज की बात नहीं कर रहा, मैं जीवन शिक्षा की बात, अध्यात्म की बात कर रहा हूँ। उसे आपने कुछ बताया नहीं और एकाएक आप उससे कह देते हो कि, "यह जो सामने हैं गौ-माता, यह तुम्हारी सास है और चलो रे इनके घुटने मलो।" वह बिलबिला जाएगी बिलकुल रिंकिया, "यह क्या हो गया हमारे साथ!"

यही हाल उसके पति देव का, उसको भी नहीं पता हमारे साथ क्या हो गया। उसकी जैसी ज़िंदगी बीती है, वह दूर-दूर से ही निहारता, तकता रहता था लड़कियों को, औरतों को, और अचानक उसको लाकर के एक बिलकुल संपूर्ण महिला गोद में दे दी गई है कि, "यह लीजिए यह आपके बिस्तर पर ही सोएगी बिलकुल बगल में।"

वह बावला हो गया। उसको समझ में ही नहीं आ रहा है कि, "यह अचानक मुझे मिल क्या गया! अभी तक तो यह था कि एक इतने बड़े डंडे से भी, मैं दूर से भी, किसी स्त्री को स्पर्श नहीं कर सकता था, स्त्रियों के जगत में मैं परित्यक्त था, स्त्रियों के जगत का शुद्र अतिशुद्र था, वह अपनी छाया भी मुझ पर नहीं पढ़ने देती थीं। ज़रा सन्निकट पहुँच जाऊँ तो ऐसे सू सू सू करके भगाया करती थीं। अब उन्हीं में से एक को लाकर के बिलकुल गिफ्ट-रैप करके मुझे दे दिया गया है।"

आपके बिस्तर पर एक गिफ्ट-रैप लाकर रख दिया गया है कि, "यह लीजिए यह आपका बंडल है, आप इसे खोलिए, फीता काटिए फीता।" वह भी बिलबिलाया हुआ है कि, "यह क्या हो गया मेरे साथ, यह क्या हो गया!"

ऐसे तो फिर जीवन आगे बढ़ता है और इसी बिलबिलाहट में एक-आध-दो साल में एक सुपुत्र या सुपुत्री अवतरित हो जाते हैं।

इतने दिनों बाद अब आपको पता चल रहा है कि यह सब हो गया है। इस पूरी समस्या के मूल में आपका अज्ञान है। तलाक से बात नहीं बनने वाली। विवाह आपने बेहोशी में करा, अभी जो आप तलाक वगैरह की बात कर रहे हैं वह भी उतनी ही बेहोशी की बात है।

अपनी समस्या के मूल में जाइए और मूल में बैठा हुआ है ⁠— अपने प्रति अज्ञान। मैं कौन हूँ, यह पत्नी कौन है जिसके साथ मैं दस साल से या पच्चीस साल से रह रहा हूँ, मेरा इसका नाता क्या है⁠ — इन विषयों पर गंभीरता से विचार करिए। इस गंभीरता से ही आत्मज्ञान के साथ-साथ थोड़े प्रेम का उदय होगा। उसके बाद आदमी-औरत का रिश्ता पशुता का नहीं रह जाएगा। उसके बाद दो लोग इंसानों की तरह आपस में बात कर सकेंगे, व्यवहार कर सकेंगे।

हो सकता है आपने मुझसे कोई जादुई समाधान चाहा हो, आपने सोचा हो कि मैं आपको कोई ‘बाबा जी की बूटी' यहाँ से कुरियर कर दूँगा या कोई सिद्धि बता दूँगा या कोई वशीकरण मंत्र दे दूँगा कि यह सब चीज़ है, जब बीवी सो रही हो तो उसके कान में जाकर फूँक देना या उसके दो बाल काट लेना और जाकर के किसी श्मशान में गाढ़ आना, तो उस तरह से तुरंत कुछ जादुई अंतर पड़ जाएगा। नहीं, वैसा कुछ नहीं होने का।

आपकी समस्या वही है जो सदा से आदमी की रही है — अपने प्रति अपरिचय। हम नहीं जानते स्वयं को। तो फिर समस्या का समाधान भी वही है जो हमेशा से रहा है।

आप कह रहे हैं आपकी अध्यात्म में रुचि है। आपके सवाल से ऐसा लग नहीं रहा। पर अध्यात्म में रुचि नहीं भी है तो अब जागृत करिए, आगे बढ़िए। एक कदम आपने बढ़ा ही लिया है मुझसे यह सवाल पूछ करके, कदम आगे बढ़ाते ही रहिए। वह सब ग्रंथ आपके लिए ही लिखे गए हैं। दुनिया भर का सारा आध्यात्मिक साहित्य आपके लिए ही रचा गया है। उससे जुड़े रहिए। गहराई से उसमें प्रवेश करिए।

आप इंसान ही दूसरी हो जाएँगे। उसके बाद वह इंसान बहुत पीछे छूट जाएगा जिसका बीवी से मनमुटाव होता है, झगड़ा होता है, तलाक की नौबत आ जाती है। आप कुछ और हो जाएँगे। जीवन जैसे एक नया ताज़ा अवसर दे देगा कि लो अब दूसरी पारी खेलो, पत्नी से दूसरा रिश्ता बनाओ।

और एक बात और समझिएगा — आप जब दूसरे हो रहे होंगे तो आपके परिवर्तन का प्रभाव आपकी पत्नी पर भी निश्चित रूप से पड़ेगा। उसे भी बदलना ही होगा, झक मार कर बदलना होगा। पर शुरुआत आपसे होगी क्योंकि सवाल आपने पूछा है।

आप शुरुआत करिए, बहुत चीज़ें फिर अपने-आप होंगी। और यह तलाक वगैरह से कुछ होने वाला नहीं है, आप चाहे तो ले लीजिए तलाक लेकिन तलाक लेने के बाद भी आप परेशान उतने ही रहेंगे जितने अभी हैं। हाँ, हो सकता है परेशानी की वजह दूसरी हो जाए।

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