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लेख
माया दो प्रकार की || (2018)
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
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अहंशब्देन विख्यात एक एव स्थित: पर:। स्थूलस्त्वनेकतां प्राप्त: कथं स्याद्देहक: पुमान्।।

“ ‘अहं’ शब्द से प्रसिद्ध परमात्मा एकमात्र स्थित है, अर्थात् वह अनेक तत्वों का संघात नहीं है। फिर जो स्थूल है और अनेक भावों को प्राप्त हो रहा है, वह देह पुरुष कैसे हो सकता है?”

~अपरोक्षानुभूति (श्लोक ३१)

आचार्य प्रशांत: अपरोक्षानुभूति से श्लोक है, श्लोक कहता है कि “‘अहं’ शब्द से प्रसिद्ध परमात्मा एकमात्र स्थित है...” जिसको ‘मैं’ शब्द से इंगित करते हो, वही है एकमात्र जो स्थित है, जिसकी हस्ती है, सत्ता है, उपस्थिति है। “...अर्थात् वह अनेक तत्वों का संघात नहीं है...” अर्थात् वह अक्षुण्ण है, अटूट है, एलिमेंटल है, उसको तोड़ा नहीं जा सकता। “...फिर जो स्थूल है और अनेक भावों को प्राप्त हो रहा है, वह देह पुरुष कैसे हो सकता है?”

प्रश्नकर्ता: ‘अहं’ शब्द यहाँ पर किस संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है, आत्मा के या अहंकार के?

आचार्य: आत्मा कभी बोलने नहीं आती कि “मैं हूँ”, अहंकार बोलने आता है कि “मैं हूँ।” और अहंकार ही बोल सकता है कि “मैं हूँ”, क्योंकि अहंकार सीमित है। समझना बात को।

(पानी का गिलास उठाते हुए) ये कहे कि “मैं हूँ”, तो इसका कहना जायज़ है, क्योंकि कहीं पर इसकी हस्ती शुरू होती है और कहीं पर ख़त्म होती है, तो ये अपनी सीमाओं के संदर्भ में दावा कर सकती है कि “मैं हूँ।” इसका ये कहना कि “मैं हूँ”, इस बात पर निर्भर करता है कि ये नहीं भी है। यहाँ पर ये है, तो फिर ये खुल कर कह पाती है कि “मैं हूँ।”

(पूरे कमरे की ओर इशारा करते हुए) यहाँ पर क्या-क्या है? यहाँ क्या-क्या है?

प्र: पंखा।

आचार्य: और बोलो क्या-क्या है?

प्र: लाइट , पर्दे।

आचार्य: वही सब बोल रहे हो न जो है, जो कहीं शुरू हो रहा है, कहीं ख़त्म भी हो रहा है? यहाँ कुछ ऐसा भी है जो न शुरू हो रहा है, न ख़त्म हो रहा है, उसे आकाश कहते है, उसकी ओर ध्यान गया किसी का? किसी ने बोला कि “यहाँ स्थान भी है?” बोलो! स्थान आकाश नहीं होता, पर फिर भी इशारे के लिए, किसी ने कहा? नहीं कहा न। तो “मैं हूँ”, या “है” का सम्बोधन हम रखते ही हैं सीमित और क्षुद्र के लिए। अहंकार कह सकता है, “मैं हूँ।”

“मैं हूँ” कहने के लिए कितने चाहिए? दो। तो ये (गिलास) चाहिए और ये (गिलास के चारों ओर परिधि) चाहिए, कितने हुए? दो। कम-से-कम कितने होने चाहिए?

प्र: दो।

आचार्य: कुछ आपको ऐसा मिल जाए जो शुरू ही न होता हो और ख़त्म ही न होता हो, उसको कैसे बोलोगे कि “है”? कुछ ऐसा मिल जाए जिसकी कोई सीमा, कोई परिधि, कोई बाउंड्री नज़र ही न आती हो, उसको बोलोगे कि “है”? वो इधर भी है, उधर भी है, “जित देखूँ तित तू,” अब बताओ कैसे कहोगे कि “वो है”?

तो जिसको लगे कि “मैं हूँ”, सो अहंकार। आत्मा क्या, उसकी बात क्यों करनी, क्योंकि हमें तो हर समय लगता ही रहता है कि “हम हैं” बस। अहंकार क्या है ये जान लो, जानने की जो शक्ति दे उसका नाम आत्मा। आत्मा को जानने की कोशिश मत करना, तुम अहंकार को जान गए इतना बहुत है। आध्यात्मिकता का अर्थ ये नहीं है कि परमात्मा को जानने निकले हैं, आध्यात्मिकता का अर्थ है – अहंकार को जानना है। राम को क्या जानना, राम कोई वस्तु हैं जानने की? तुम रावण को जान लो ये बहुत है। अकसर जो लोग राम की तलाश में होते हैं, उन्हें पता ही नहीं होता कि वो रावण की क़ैद में हैं, और वहाँ राम की कोई तलाश हो नहीं सकती। तुम ये देख लो तुम किसकी क़ैद में हो, बहुत है। जिसकी क़ैद में हो तुम, उसकी क़ैद में रहते राम की कोई तलाश संभव नहीं; रावण को जान लो, इतना बहुत है।

आ रही है बात समझ में?

तो तुम जिसको ‘मैं’ कहते हो, वो सदा अहंकार ही है। जब तुम्हारा कहना-सुनना सब थम जाता है, तब जिसकी सत्ता व्याप्त होती है उसे कहते हैं ‘आत्मा’। व्यावहारिक अर्थों में ये समझ लो कि जब तुममें व्यक्तिगत स्वार्थ, व्यक्तिगत भावनाएँ, व्यक्तिगत लक्ष्य, सीमित अर्थ नहीं घूम रहे होते, उस वक़्त तुम अहंकार से मुक्त होते हो। जो कुछ भी छोटा है तुम्हारे बारे में, तुम्हारे जीवन में, वही अहंकार है। और छुटपन की निशानी क्या? तुमने अपने-आप को किसी छोटी चीज़ से जोड़ रखा होगा; तुमने अपने-आप को किसी ऐसी चीज़ से जोड़ रखा होगा जिसकी सीमाएँ हैं, जिसकी शुरुआत है, जिसका अंत है, जो टूट सकती है, जो छिन सकती है, जो मिट सकती है।

“मैं अमीर” – अहंकार है क्योंकि अमीरी छिन सकती है। “मैं गरीब” – अहंकार है क्योंकि गरीबी अनित्य है। “मैं लंबा” – अहंकार है क्योंकि शरीर?

प्र: अनित्य है, मिट सकता है।

आचार्य: “मैं नाटा” – अहंकार है, क्योंकि शरीर? बोलो ज़ोर से!

प्र: अनित्य है।

आचार्य: “मैं सामर्थ्यशाली” – अहंकार है, क्योंकि?

प्र: वो क्षणिक है।

आचार्य: “मैं सामर्थ्यहीन” – ये भी अहंकार है क्योंकि?

प्र: सदा ऐसा नहीं रहेगा।

आचार्य: “मैं समझदार”, “मैं नासमझ", “मैं बहुत कुछ”, “मैं कुछ नहीं", हाँ? ये भी अहंकार है? समझाओ-समझाओ! “मैं कुछ नहीं”, ये अहंकार है या नहीं है?

प्र: है।

आचार्य: जितना बड़ा अहंकार है कहना कि “मैं बहुत कुछ”, उतना ही बड़ा अहंकार है कहना, “मैं कुछ नहीं।” दो जने कह रहे हों, “मैं कुछ नहीं”, और दूसरा बोल दे, “मैं भी कुछ नहीं”, तो पहले वाला बोलेगा, “मैं तुझसे बड़ा ‘कुछ नहीं'!”

(श्रोतागण हँसते हैं)

तो ये तो गड़बड़ हो गई न! ‘मैं’ का नाम लिया नहीं कि गड़बड़ हो गई। ‘मैं’ को अच्छा बोला तो भी गड़बड़ हो गई, बुरा बोला तो भी गड़बड़ हो गई। ‘मैं’ को पूर्ण बोला तो भी गड़बड़ हो गई, शून्य बोला तो भी गड़बड़ हो गई। अब क्या करें? छोड़ ही दो न उसको, उसको छोड़ ही देने का नाम समर्पण है, वही अध्यात्म का केंद्र है, कि कौन इस चिड़-चिड़ में पड़े। पेड़ पेड़ है, शरीर शरीर है, आँख आँख है, बुद्धि बुद्धि है, ‘मैं’ का क्या काम? ‘मैं’ का क्या काम? वक्ता वक्ता है, शब्द शब्द है, काहे को घोषित करें कि “मैं बोल रहा हूँ”? वक्ता है, और शब्द हैं, और संवाद है, और श्रवण है, और मनन है, और समाधि है, और आनंद है, बताओ ‘मैं’ का क्या काम? बोलो, ‘मैं’ का क्या काम? क्योंकि उधर तो गड़बड़ है, उधर गए नहीं कि फँसे। उसको बोला काला तो? फँसे, और बोला सफ़ेद तो?

प्र: फँसे।

आचार्य: फँसे। तो भाई उसे कुछ बोलो ही मत! अब बनी बात!

आत्मा को कोई उपाधि दे देना ही अहंकार कहलाता है।

जिसको कभी चर्चा में उतारना नहीं चाहिए, उसकी चर्चा करना ही अहंकार कहलाता है। ‘मैं’ शब्द अस्पृश्य होना चाहिए। अस्पृश्य इसलिए नहीं कि हीन है, अस्पृश्य इसलिए कि हमारी पहुँच से बाहर का है, हम उसे स्पर्श कर ही नहीं सकते। ‘मैं’ का नाम ही नहीं लेना चाहिए, उसके सामने तो बस पूजा के लिए झुक सकते हैं। जब उसका नाम लेना शुरू कर दिया, जब छोटी-छोटी बातों पर “मैं, मैं, मैं” करना शुरू कर दिया, तो इसको कहते हैं?

प्र: अहंकार।

आचार्य: और हर बात छोटी ही बात होती है, तो भला ये है कि ‘मैं’ करो ही मत।

किसने सुना? कान ने सुना। समझा किसने? बुद्धि ने। याद किसको हो गया? स्मृति को। इस पूरी प्रक्रिया में मेरी ज़रूरत थी ही नहीं। मैं आ कर के इन छोटी-छोटी चीज़ों को करता नहीं, मैं वो हूँ जिसकी मौजूदगी से ये सब छोटी-छोटी चीज़ें अपना काम सुचारु रूप से स्वयं करती हैं। मैं क्यों कहूँ कि “मैं वक्ता”, मैं वक्ता नहीं हूँ, मैं वो माहौल हूँ जिसमें एक खाली आकाश से शब्द उठते हैं और फिर प्रस्फुटित भी हो जाते हैं। मैं क्यों कहूँ कि “मैं बोला”? बोलना तो छोटा काम है, बड़े का छोटे से संबंध क्यों बैठाना?

हम जिसको ‘मैं’ कहते हैं वो अनावश्यक है, उसको हटा दीजिए। कोई आफ़त नहीं टूट पड़ेगी, उसके बिना काम और ज़्यादा सुचारु रूप से होंगे।

ठीक है?

लिङ्गं चानेकसंयुक्तं चलं दृश्यं विकारि च। अव्यापकमसद्रूपं तत्कथं स्यात्पुमानयम्।।

“सूक्ष्म देह भी अनेक तत्वों का संघात, चलायमान, दृश्य, विकारी, अव्यापक और असत्स्वरूप है, वह भी पुरुष कैसे हो सकता है?”

~अपरोक्षानुभूति (श्लोक ३९)

आचार्य: (प्रश्न पढ़ते हुए) बैंगलोर से, कह रहे हैं, “श्री आचार्य जी प्रणाम। धन्यभागी हूँ, आपके रूबरू दर्शन से जीवन में बहुत बदलाव महसूस कर रहा हूँ। आचार्य जी, श्लोक-संख्या जो उपर्युक्त है- देह और मन में चलते हुए चलायमान दृश्य, विकारी और अव्यापक के विचार के पार परम-पुरुष की तरफ़ इशारा कर रहे हैं। उस परम-पुरुष की ओर कैसे यात्रा करें, कैसे प्राप्त करें? कृपा कर के प्रकाश डालें।”

श्लोक कहता है, “सूक्ष्म देह भी अनेक तत्वों का संघात, चलायमान, दृश्य, विकारी, अव्यापक और असत्स्वरूप है, वह भी पुरुष कैसे हो सकता है?” बड़ा प्रचलित धोखा है, उसकी ओर इशारा है। समझिएगा।

अध्यात्म में जो यात्रा करते हैं, उन्हें इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि पदार्थ धोखा है, पदार्थ इंद्रियों का खेल है। पदार्थ स्थूल है और पदार्थ की ओर से सतर्क हो जाना भी ज़रा आसान है। फिर वो कहते हैं कि “भाई! आदमी-औरत की ओर बहुत आकर्षित नहीं होना है। पैसे की ओर बहुत आकर्षित नहीं होना है। दृश्यों की ओर बहुत आकर्षित नहीं होना है। संगीत की ओर बहुत आकर्षित नहीं होना है। बड़े घर, भवन, दूसरे देश, यात्राएँ, रोमांच - इनकी ओर बहुत आकर्षित नहीं होना है।” स्थूल पदार्थों की ओर से तो वो सचेत हो जाते हैं, दिख जाता है, लेकिन सूक्ष्म पदार्थ से वो अभी-भी ग्रस्त रहते हैं। सूक्ष्म पदार्थ होता है विचार, मन की गति। अब वो ये तो कहने लग जाएँगे, कि “बेटा, पैसा परमात्मा नहीं होता।” ठीक है, स्थूल से उन्होंने परमात्मा का संबंध काट दिया, लेकिन सूक्ष्म से परमात्मा का संबंध वो अभी-भी नहीं काट पाएँगे, प्रमाण इसका ये है कि वो परमात्मा का ‘विचार’ करते रहेंगे।

जब आप परमात्मा का विचार कर रहे हो तो आपने उसका संबंध किससे बना रखा है? मन से, सूक्ष्म से। कबीर इसी को कह गए हैं कि “मोटी माया सब तजें, झीनी तजी न जाय।” (पानी का गिलास उठाते हुए) ये मोटी माया है, और झीनी माया क्या है? कि मन में परम-सत्ता की छवि घूम रही है। लोग मेरे पास आते हैं, कहते हैं, “शांति का अनुभव करना है, समाधि का अनुभव करना है” – ये झीनी माया है। कोई आता है, वो कहता है कि चटनी का और पकोड़े का अनुभव करना है। ये कौन-सी माया हुई? ये मोटी माया है। वो कह रहा है, “जीभ में अनुभव कराओ, जीभ में।” और दूसरा आ रहा है, वो कह रहा है कि समाधि का अनुभव करना है। उसे कौन-सी माया पकड़े हुए है?

प्र: झीनी माया।

आचार्य: उसी के विरुद्ध आदिशंकर यहाँ पर चेता रहे हैं, कह रहे हैं कि “देखो! सूक्ष्म देह भी अनेक तत्वों का संघात, चलायमान, दृश्य, विकारी, अव्यापक और असत्स्वरूप है, तो वह भी पुरुष कैसे हो सकता है?” पुरुष से आशय यहाँ पर आत्मा है।

पदार्थ-भर से बचने से काम नहीं चलेगा, विचार से बचो, मन की गति से बचो। मन, जो अपने-आप को ही धोखा देने के लिए कल्पनाओं का और मिथों का जाल खड़ा करता है, उससे बचो। अन्यथा तुम्हारी हालत ऐसी है कि तुमने घर के बाहर के दुश्मन के खिलाफ़ तो बाड़ लगा दी, और जो दुश्मन घर के भीतर ही बैठा हुआ है उसको तुम पोषण दे रहे हो और सम्मान दे रहे हो। यही कारण है कि मैंने पाया है, आम संसारी को शिक्षित करना, समझाना आसान होता है, क्योंकि उसने अगर संबंध अपना जोड़ भी रखा होता है तो मोटी चीज़ों से जोड़ रखा होता है; और चीज़ जितनी मोटी होगी, उसकी निस्सारता को सिद्ध करना उतना आसान होगा। कोई ऐसा आदमी आ जाता है जिसने कभी कोई ग्रंथ नहीं पढ़ा, जो सिर्फ़ एक सामान्य मध्यम-वर्गीय जीवन जीता रहा है, उसकी शिक्षा भी वैसी ही हुई है जैसी कि प्रचलित शिक्षा-व्यवस्था में होती है — पैसे हेतु शिक्षा, नौकरी हेतु शिक्षा, भौतिक-कौशल्य हेतु शिक्षा — आध्यात्मिक-शिक्षा उसकी हुई नहीं; उसको बता पाना, समझा पाना आसान होता है। और जो लोग थोड़ा ग्रन्थों इत्यादि का अध्ययन कर गए होते हैं, उनको समझाना बहुत मुश्किल हो जाता है, क्योंकि अब उन्होंने झीनी माया पकड़ ली है। उनके पास वस्तुएँ नहीं हैं, अब उनके पास सिद्धान्त हैं, उनके पास विचार हैं; और विचार भीतर बैठ गए हैं, विचारों से उन्होंने साझा कर लिया है।

शंकर चेता रहे हैं यहाँ पर, कि “देखो! तुम जो भी कुछ सोच रहे हो वो वो नहीं है जो तुम चाहते हो। समझो, कि जो तुम्हें वास्तव में चाहिए वो तुम्हें सोच-सोच कर नहीं मिलेगा।” पर सोचने से तुम बाज आते नहीं, तुम्हें सबसे ज़्यादा भरोसा अपनी सोच पर है। तुम्हें लगता है कि “मेरे करे ही तो होगा, और मेरा करना उत्कृष्ट तब होगा जब वो विचार से जनित हो।” अब फँसे! फिर समझना। जो तुम्हें वास्तव में चाहिए वो तुम्हें तुम्हारी सीमित सोच से नहीं मिलेगा। तो क्या करें, सोचें नहीं? नहीं, सोचो, पर उसके बारे में नहीं जो तुम्हें चाहिए, उसके बारे में जिसके बारे में तुम सोचते ही आए हो और जिसमें तुम फँसे ही हुए हो। बेशक़ सोचो, उसके बारे में जिसके बारे में सोचा जा सकता है। जो तुम्हें चाहिए, उसके बारे में सोचा जा नहीं सकता, उधर दौड़ लगा कर के क्यों व्यर्थ सोच को मलिन करते हो, सोच को थकाते हो?

विचार की अपनी उपयोगिता है, पर विचार की उपयोगिता उसके सम्यक दायरे के भीतर है। ठीक वैसे जैसे कि कार की उपयोगिता होती है, कार की उपयोगिता है अगर आपको सड़क से कहीं जाना है। जिन्हें उड़ना हो वो काहे कार दौड़ा रहे हैं? विचार आपको ले जाएगा, पर उसी तल पर जिस तल पर आप पहले ही मौजूद हैं। ज़मीन पर हो, ज़मीन पर ही कहीं और जाना है तो कार का और विचार का उपयोग कर लो। पर जिन्हें ज़मीन से ऊपर आसमान की यात्रा करनी है, वो कार बहुत दौड़ाएँगे, बहुत दौड़ाएँगे तो भी कार टेक-ऑफ़ (उड़ान भरना) नहीं कर जाने वाली। तुम बहुत सोचोगे, बहुत सोचोगे तो भी सोच के पार नहीं निकल जाओगे। और जो सोच के पार नहीं निकल गया, जिसका सोचना थम नहीं गया, शांत नहीं हो गया, उसको चैन कहाँ! उसका दिमाग तो चक्करघिन्नी की तरह घूम ही रहा है। दौड़े जाओ बच्चू!

हम प्रयत्न बहुत करते हैं लेकिन नासमझी में करते हैं, यही कारण है कि हमारे प्रयत्न हमें सिर्फ़ थकाते हैं, कहीं पहुँचाते नहीं। दोनों बातें चाहिए – साधना भी, और समझ भी। श्रम करो, पर बोध के साथ, फिर उसमें फल लगते हैं। निन्यानवे-प्रतिशत लोग जितनी मेहनत करते हैं उससे बहुत-बहुत कम मेहनत में उनका जन्म सार्थक हो गया होता। बड़ी करुण स्थिति रहती है, उनको देखना। जीवन-भर उन्होंने मेहनत ही करी है, और जीवन-भर की मेहनत उनके चेहरे पर छपी हुई है निराशा बन कर, झुर्रियाँ बन कर, अवसाद बन कर। क्यों करी इतनी मेहनत, इतनी मेहनत की तो ज़रूरत भी नहीं थी, इसके तो दसवें-हिस्से में तुममें पंख लग जाते, तुम बुद्ध हो जाते, तुम उड़ जाते। पर तुम्हारी मेहनत वैसी ही कि जैसे किसी को चाँद पर जाना हो और वो कार दौड़ाए। बच्चे करते हैं ऐसा। रातों में चाँद अकसर यात्रा करता प्रतीत होता है, देखा है? और बच्चे दौड़ रहे हैं चाँद के पीछे। कई बार चाँद यात्रा नहीं भी कर रहा होता, उसके ऊपर बादल यात्रा कर रहे हैं, लगता ये है कि चाँद चल रहा है। और मैंने देखा है, मैदान हो अगर खाली तो बच्चे दौड़ पड़ते हैं, कहते हैं, “चाँद जा रहा है”, जैसे कोई गुब्बारा चला जा रहा हो, जैसे कोई पतंग कट कर चली जा रही हो, हमें उसका पीछा करना है।

कितना भी दौड़ोगे तुम थल पर, अपने तल पर, कहाँ मिलेगा चाँद? और चाँद तो तुम्हें चाहिए ही। यहाँ ऐसा कौन है जो चाँद का आशिक़ नहीं? और दौड़ कहाँ लग रही है? मिट्टी पर। लगाए जाओ! ऐसों को ही शंकर चेता रहे हैं, वो कह रहे हैं, “बेटा! तुम दो तरह की ग़लती करते हो – पहली तो ये कि ज़मीन पर दौड़ लगाई, और दूसरा ये कि जब चाँद मिला नहीं तो शायरी बजाई।” अब चाँद नहीं है तो कमी कैसे पूरी की जा रही है? चाँद की उपमा से, चाँद की छवियों से। कल्पनाएँ की जा रही हैं, और कल्पना कर-कर के अपने-आप को सुख दिया जा रहा है, जैसे कि असली चीज़ मिल गई। “मैंने पूछा चाँद से कि देखा है कहीं मेरे यार-सा हसीं, चाँद ने कहा चाँदनी की क़सम, नहीं।” न तुमने चाँद से पूछा, न चाँद ने जवाब दिया, किसको उल्लू बना रहे हो? पर ये सारे लक्षण उनके हैं जिन्हें चाँद मिला नहीं। जो तुम्हें मिल ही सकता था, उसकी क्यों कल्पना करते हो? उसकी कल्पना कर-कर के तो तुम अपने-आप को गिरा रहे हो।

और आध्यात्मिक कल्पनाओं की कमी नहीं, अध्यात्म के बाज़ार में कल्पनाएँ ही ज़्यादा बिकती हैं। लोग आते हैं, कहते हैं, “ध्यान में बैठता हूँ, ऐसा लगता है रिमझिम फुहार पड़ रही है।” अच्छा!

(श्रोतागण हँसते हैं)

एक बोले कि “बैठता था हमेशा, लगता था नीचे से करंट-सा उठ रहा है।” मैंने बोला, “किस तरफ़ उठता था, दाएँ कि बाएँ?” वो भी बता दिया उन्होंने, बोले, “इसी तरफ़ उठता है।” डॉक्टर को दिखाते, अध्यात्म की क्या बात है इसमें? किसी के मसूढ़े में दर्द हो जाता है, किसी को सपने आ जाते हैं, किसी के चक्र खुलने शुरू हो जाते हैं, “उठ रहा है।” कल्पनाओं की कोई कमी है! झीनी माया। “मोटी माया सब तजें, झीनी तजी न जाय। पीर, पैगंबर, औलिया, झीनी सबको खाय।” देख लो किनका नाम लिया है झीनी के साथ – पीर, पैगंबर, औलिया। जो आध्यात्मिक लोग हैं उन्हीं को ज़्यादा खाती है झीनी माया, क्योंकि वही सबसे ज़्यादा करते हैं, कि “बस आज उतरा है, अस्सी-प्रतिशत हो गया डाउनलोड , थोड़ा अब बचता है बस।

(श्रोतागण हँसते हैं)

इन तमाशों से बचना! विचार करना ही है तो तथ्यों के बारे में करो। विचार करना ही है तो जो विचारणीय वस्तु है उसके बारे में करो। और विचार करने के लिए बहुत है जीवन में, हम सोचते ही नहीं। और सोचना बहुत-बहुत आवश्यक है, इतनी बातें हैं जिनके बारे में हमें और-और सोचना चाहिए। हम बड़े अविचार में जीते हैं। हमें बहुत लोग चाहिए जो विचारशील हों, खूब विचार करें, पर विचार वहाँ करें जहाँ विचार हो सकता है, चाँद का विचार न करें। ठीक है?

ये दोनों ग़लतियाँ हैं। जिसका विचार करना चाहिए था वहाँ करा नहीं, वहाँ बह गए। कोई आया, बोला, “चलो पीते हैं”, तुमने कहा, “चलो दोस्त!” विचार ही नहीं करा, रुके ही नहीं, और विचार वहाँ होना चाहिए था। जीवन में न जाने कितने ऐसे निर्णय हमने यूँ ही ले लिए हैं। उसने कहा, “दोगे?” हमने कहा, “दिया।” विचार ही नहीं किया, अब जीवन-भर पछता रहे हैं, देते ही जा रहे हैं। विचार किया करो; बस सत्य को ले कर, आत्मा को ले कर, ‘मैं’ को ले कर कोई विचार न करना। ‘मैं’ को ले कर तुमने विचार किया तो वो विचार यही होगा कि “मैं को बचाऊँ कैसे, मैं को बढ़ाऊँ कैसे, सुरक्षित कैसे रखूँ,” इत्यादि-इत्यादि। अपने-आप को ले कर कभी विचारशील मत हो जाना। विचार समस्या को सुलझाने का इंतज़ाम है, तुम कोई समस्या नहीं हो कि अपने-आप को ले कर विचार कर रहे हो। तुम माने आत्मा, आत्मा का विचार मत करना। अपनी ख़ैरियत का विचार मत करना, तुम्हारी ख़ैरियत है। भविष्य का विचार मत करने लग जाना, “कल मेरा क्या होगा?” ये मूर्खतापूर्ण बातें हैं।

ठीक है?

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