आचार्य प्रशांत आपके बेहतर भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं
लेख
मन किसे नहीं जान सकता?

यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम्।

यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव ते मन्ये विदितम् ॥

(केनोपनिषद, अध्याय 2, श्लोक 1)

जिसने भी ये सोच लिया कि वो जानता है, उसके लिए ये बात तय है कि वो नहीं जानता।

प्रश्नकर्ता: जैसे कहा गया था की मैं जनता हूँ कि मैं कुछ नहीं जनता।

आचार्य प्रशांत: सुकरात ने कहा है ये। पर जानने वालों ने सुकरात को भी कहा है कि तुम्हें इतना भी कैसे पता कि तुम्हें नहीं पता। एक गहरी विनम्रता चाहिए ये कहने के लिए कि कुछ ऐसा है, कुछ है जरूर, और जो मैं ही हूं, पर जिसे जानने का उपकरण मन नहीं है, जो हुआ जा सकता है, पर जिसको मानसिक तौर से जाना नहीं जा सकता, जिसको जिया जा सकता है, जो मैं हूं ही, मेरी होना। 'हुआ जा सकता है' पर जिस को मानसिक तौर से न जाना जा सकता है, ना व्यक्त किया जा सकता है। थोड़े-बहुत इशारे डाल दिए जाए वो अलग बात है।

प्र: ऐसा क्यों है?

आचार्य जी: आप ज़मीन पर चल रहे हो। आपके हाथ में एक सर्च लाइट है। आपकी एक गाड़ी में चल रहे हो। गाड़ी में हेडलाइट लगी हुई है। हेडलाइट हमेशा किधर को फेकेगी रोशनी? x-y प्लेन में ही। आसमान में उड़ रही है मुक्त चिड़िया। हेडलाइट के द्वारा उसे देख लोगे?

मन एक डायमेंशन के भीतर काम करता है। x-y प्लेन में कुछ भी हो रहा हो, उसे देखने के लिए तुम्हें कहां होना पड़ेगा? ये xy-प्लेन है मान लो इसको हम क्यों देख पा रहे हैं? क्योंकि हमारी कुछ ऊंचाई है, हम z प्लेन में हैं इसीलिए आंखें इसे देख पा रही हैं। कुछ भी देखने के लिए उस प्लेन से बाहर होना पड़ता है, अलग होना पड़ता है। अब आपका जो उपकरण है, जिसके द्वारा आप जानते हो, xy-प्लेन में है। वो सिर्फ xy-प्लेन देख पाता है। उसको देख ही नहीं पता जो z प्लेन में है।

मन को ऑब्जर्व कर लेते हो ना। जो ऑब्जर्व करता है, उसी को तो अपना सब जानते हो कि वही मैं हूं - आई एम दैट विटनेस (मैं वो साक्षी हूं)। तो तुम कहां पर हो x-y में या z में? z में। और जिस मन को ऑब्जर्व करते हो वो कहां पर है? x-y में। अब ये जो xy वाला है, ये z को कैसे देख लेगा। मन है xy-प्लेन में, तुम मन के विटनेस कर पाते हो, ऑब्जर्व कर पाते हो। हम कर चुके हैं इसके प्रयोग, जाना जा सकता है। मन जो xy-प्लेन में है, जब तुम इसे जानते हो, तो इसका अर्थ है कि तुम कहां पर हो? तुम्हें z में ही होना पड़ेगा। तुम z में हो, मन x-y में है। मन जब x-y में है, तो क्या z को जान सकता है? तुम मन को जान सकते हो पर मन तुम्हें नहीं जान सकता। वही तो कह रहे हैं कि जिसके द्वारा मन को ताकत मिलती है पर जिसे मन नहीं जान सकता।

दूसरा है, वो और बड़ी पहेली है। मुझे तो दिख रहा है कि जो ये कह रहा होगा, वो कह भी रहा होगा और मुस्कुरा भी रहा होगा कि बुद्धू बनाया। बढ़िया पहेली डाली है।

नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च।

यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च॥

(केनोपनिषद, अध्याय 2, श्लोक 2)

मन नहीं जान सकता, लेकिन फिर भी वो अनजाना नहीं है। जो इस बात को समझता है, वो जानता है कि वो अनजाना नहीं है।

मन नहीं जान सकता, लेकिन फिर भी वो अनजाना नहीं है। तो निराश मत हो जाना कि यार मन, यानी मैं, जिससे मेरा तादात्म्य है, वो x-y में घूम रहा है। जो स्रोत है, जो असली है, वो z में है। तो फिर तो मेरी जिंदगी ऐसे ही बीत गई। मुझे कभी पता ही नहीं चलेगा कि वो असली क्या है। आपके लिए पेश है अगली लाइन जो कह रही हैं कि मन भले ही नहीं जान सकता, लेकिन फिर भी वो अनजाना नहीं है।

जो इस बात को समझता है, वो जानता है कि वो अनजाना नहीं है। अनजाना तो बहुत, बहुत दूर का शब्द हो गया, वो मैं ही हूं। अनजाना तो ऐसा लगता है जैसे कोई पास की बात हो—जाना और आनजाना। ये तो अधिक से अधिक करीबी और दूरी दर्शा सकते हैं। जो मैं ही हूं, उससे दूरी का सवाल कहां पैदा होता है?

अभी हमने कहा कि एक ज़िंदा आदमी की आंख और एक ताज़ा मुर्दे की आंख में कोई विशेष अंतर नहीं होता है। एक ज़िंदा आदमी और एक ताज़ा मुर्दे में भी क्या अंतर होता है सिवाय इसके कि एक जान सकता है और एक नहीं जान सकता। दोनों में बोध का ही तो अंतर है। दोनों में इस जानने का ही तो अंतर है। तो तुम क्या हो? अगर तुम शरीर होते, तो शरीर तो मुर्दा होने पर भी बचा हुआ है। तो तुम क्या हो? मुर्दे के पास क्या नहीं है?

बोध।

तो इसी को तो अष्टावक्र गीता कहती है कि बोधोहम्। बाकी सारे उपकरण एक से हैं, सिर्फ वो बौद्ध की कमी है। बाकी सारे उपकरण एक से हैं। मुर्दा और ज़िंदा व्यक्ति के उपकरणों में कोई अंतर नहीं आ गया है। उनके कंफीग्रेशन बदल नहीं गए हैं। ताज़ा मुर्दा जो है, उसके कंफीग्रेशन और एक ज़िंदा व्यक्ति के कंफीग्रेशन नहीं बदल गए हैं। बोध का अंतर है, सिर्फ बोध का अंतर है। उसके भीतर जानने वाला नहीं रहा। अब मतलब मैं ज़िंदा हूं या मुर्दा ये बात सिर्फ इस पर निर्भर करती है कि मैं जान सकता हूं कि नहीं।

इससे एक सवाल और खड़ा होता है। उन लोगों के बारे में क्या कहेंगे जो शारीरिक तौर पर तो ज़िंदा है पर जो जिंदगी बिना जाने बिना समझे गुजार रहे हैं? उन्हें ज़िंदा करें या मुर्दा ही कह दे सीधे-सीधे? उन्हें कोई हक है अपने आपको ज़िंदा कहने का? जीवित मुर्दा है। चल रहे हैं, फिर रहे हैं, ऐसा लग सकता है कि जीवित है, पर जीवित हैं क्या वो? ऐसा लग सकता है कि ज़िंदा है, पर ज़िंदा है क्या? अगर ज़िंदा होने का अर्थ है जानना, पूर्ण जागृति में जिंदगी बिताना। और उस जानने के कई प्रकार होते हैं। एक जानना ये भी है कि कौन-सा बटन क्या करेगा, इसमें कौन-सा तेल डाला है, किसका फोन आ रहा है, ये सब भी जानना ही है, ठीक है। इससे ऊंचे जानना भी है, उससे ऊंचे जानना भी है, पर जानना तो जानना है ना। जिसके जीवन में इस जानने की कमी है, वो ज़िंदा कहां है? या फिर ये कह सकते हैं कि हम उसी अनुपात में ज़िंदा है जिस अनुपात में हम...

प्र: जानते हैं।

आचार्य जी: जानते नहीं हैं। जानने की उत्सुकता रखते हैं। नॉलेज नहीं नोइंग—जानने की उत्कंठा है।

प्र: ये तो प्रोसेस है।

आचार्य जी: प्रतिपल। बस इतना ही हम ज़िंदा हैं, वरना ज़िंदा नहीं है। फिर लग सकता है कि चल फिर रहे हैं, वो एक अलग बात है। वो तो बड़ी मैकेनिकल-सी चीज़ है। हमारे जैसे रोबोट बनाएं जा सकते है, जो बिल्कुल चलेंगे ऐसे ही। जो जानता है, वो जानता है कि वो अनजाना नहीं है। कैसे जानता है इस बात को? विचार के तौर पर जानता है?

कैसे जानता है?

जो असली ज्ञानी है, जिसका ज्ञान ध्यान से निकला है, वो जानता है कि जिस स्त्रोत की, जिस उद्गम की, जिस प्रथम की अभी तक बात हो रही है, वो अनजाना नहीं है। वो उस बात को कैसे जानता है? और वो इतनी गहराई से जानता है कि तुम पूरी कोशिश कर लो, तुम उसको कन्विंस नहीं कर पाओगे, तुम उसको डिगा नहीं पाओगे। कैसे जानता है वो?

प्र: शायद एक ना एक पल ऐसा था कि वो..

आचार्य जी: अतीत का पल था?

प्र: उसका प्रतिपल का बोध है, जीवित है। उसी बोध पर वो अपना जीवन गुज़ारता है। किसी पल मुर्दा नहीं होता।

आचार्य जी: इसी का नाम श्रद्धा है। मैं नहीं जानता कि मैं क्यों जानता हूं, पर मुझे पक्का है कि ऐसा ही है। इसी का नाम श्रद्धा है।

प्र: तो सर जो लोग कहते हैं कि कोई क्षण ऐसा आया था। अटेंशन के क्षण होते हैं...

आचार्य जी: अतीत के अटेंशन से क्या कर लोगे? स्मृति उसकी तुम्हें ज़िंदा रख लेगी? एक क्षण आया था, तो वो अपना काम कर गया तब। अब क्या करोगे? उसकी स्मृति पर चल लोगे?

प्र: क्या अभी भी जीवित हो? प्रश्न तो अभी का है ना। मैं अतीत में जीवित था परंतु अभी मुर्दा हूं।

आचार्य जी: वो श्रद्धा कहां से आएगी? उसी श्रद्धा का नाम अमृत्व है। क्योंकि जहां वो श्रद्धा होती है, वहां पहला काम ये होता है कि डर गायब हो जाता है। अब कोई डर ही नहीं रहता कि मैं गलत हो सकता हूं। यही तो डर है ना। अब कोई डर ही नहीं हो सकता कि कुछ उल्टा-पुल्टा हो जाएगा। ये उस गहराई से जानने का परिणाम है।

प्र: डर नहीं होता। कनफ्लिक्ट(दुविधा) अगर हो जाए तो?

आचार्य जी: कनफ्लिक्ट क्या है कोई भी कनफ्लिक्ट बिना डर के होता है क्या? आप खड़े हो चौराहे पर—इधर जाऊं या उधर जाऊं—किधर भी चले जाओ। क्यों नहीं किधर भी जा पाते? डर है कि वो गलत होगा रास्ता।

प्र: श्रद्धा वाली बात समझ में नहीं आई।

आचार्य जी: श्रद्धा समझने की बात ही नहीं है। श्रद्धा का अर्थ होता है कि मैंने अपना दायरा जाने लिया और ये भी जान लिया कि मेरा दायरा आखरी नहीं है, उसके आगे भी कुछ है। ये श्रद्धा है। क्या है, ये नहीं जान सकता, पर है।

प्र: सर इसमें 2 पॉइंट और कवर हो रहे हैं: सिंपलीसिटी और इंक्वायरी।

आचार्य: अभी फैथ(श्रद्धा) को जानो।

प्र: उसी श्रद्धा में समर्पण संभव है।

आचार्य जी: समर्पण नहीं है तब तक तो आप खड़े ही रहेंगे ना मन के दायरे के भीतर कि यही सब कुछ है। उसका जो पूरा अहंकार है, उसमें खड़े रहेंगे आप।

प्र: तो एक तरफ हम जान भी नहीं सकते और दूसरी तरफ हम समर्पण भी कर रहे हैं।

आचार्य जी: किसको समर्पण कर रहे हैं ये भी नहीं पता। अब मन कैसे मान जाए? बड़ी खतरनाक बात है।

प्र: कोई गोल ही नहीं है, तो फुटबॉल कहां मारोगे? गोल पोस्ट कहां है?

आचार्य जी: ये ऐसा ही है कि जाकर सब कुछ समर्पित कर दो। किसको? ये नहीं पता। अब देखो दिक्कत क्या है इसमें। समर्पित तो तुम कर ही रहे हो। समर्पित करने का क्या मतलब होता है? मैंने छोड़ दिया। पर छोड़ते वक्त भी मेरे लिए ये जानना जरूरी है कि किसके सामने छोड़ दिया ताकि?

प्र: अहंकार बना रहे।

आचार्य जी: अरे! कभी साल-दो-साल बाद पता चले कि आदमी झूठा था, तो वापस भी तो ले लें। ठीक है, मैं अपना सारा रुपया-पैसा किसी के दरवाजे छोड़ रहा हूं, पर उस मकान का नंबर तो नोट कर लो। पता तो हो ये आदमी कौन है। तुमने छोड़ा क्या? वास्तव में छोड़ा? जो समर्पण करेगा, वो तो दरिया में डालता है। उसका नाम पता कैसा? बह जाएगा। किससे वापस मांगोगे? क्या कहोगे किसको दे दिया? समर्पण वही है जो शून्य में किया जाए। इसीलिए गुप्त दान को ही दान कहा गया है। समर्पण वही है जो किसी के भी सामने ना किया जाए।

फिर से शब्दों पर जाइएगा:

जो जानता है वो जानता है कि वो अनजाना नहीं है।

वो प्राणों का प्राण है, वो आंखों की आंख है, वो वाणी की वाणी है, तो अनजाना कैसे हो सकता है? और इसमें बड़ा समर्पण है, बड़ी दीनता है, एक गहरा अहोभाव है। मैं जिस घर में घूम रहा हूं, खेल रहा हूं, मौज कर रहा हूं, अपने आपको जीवित मान रहा हूं, उस घर का आधार हो। तुम हट जाओ, वो घर है ही नहीं। तुम हट जाओ, ये आंख अभी अंधेरी हो जाए। देखिए इस बात को। इस आंख की रोशनी हो तुम। तुम हट जाओ, अंधेरा, अंधेरा। तुम हट जाओ, ऐसी ही ज़बान बैठी रहेगी और शब्द न निकलेंगे। तुम हट जाओ शरीर ऐसा ही पड़ा रहेगा, श्वास गायब हो जानी है। तुम हट जाओ, मन ऐसा ही रहेगा, विचारणा की शक्ति खत्म हो जाएगी—कोई विचार नहीं उठाएगा। ये श्रद्धा है। इसीलिए वो जो लाइन है, पता नहीं कब बोली गई थी, कैसे बोली गई थी, पर मुझे बड़ी पसंद है। "तेरे जमाल से रोशन है कायनात मेरी।" किस गाने की है?

प्र: तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है।

आचार्य जी: वो जो उसमें एक लाइन आती है कि तेरे जमाल से रोशन है कायनात मेरी। कायनात मेरी है, पर उसमें जमाल तेरा है। जमाल जानते हो क्या है? तेरी महफिल है। मुझे लग सकता है मेरी महफिल है पर है तेरी। तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है। बिल्कुल जिंदगी में कण-कण में समाया हुआ है। जिसको अकबर इलाहाबादी ने कहा था कि हर ज़र्रा चमकता है नूर-ए-इलाही से। यही अर्थ है उस बात का। एक-एक धूल का कण भी उसी के नूर से चमक रहा है। अब आएगी श्रद्धा, अब सर झुकेगा, अब दिखाई पड़ेगा। ये सर ऐसे नहीं झुका है कि डर में झुका है। ये प्रेम में झुका है, ये समर्पण में झुका है। अपने ही सामने तो झुका है, कोई अलग है वो? और किस के सामने झुका है?

प्र: अपने।

आचार्य जी: ये भी मत कहो अपने सामने झुका है—बस झुकना जरूरी है। कोई इस बात का विशेष महत्व नहीं है कि तुम क्या नाम दे रहे हो, किसके सामने झुक रहे हो। ना झुकता हो, तो कोई ऑब्जेक्ट पकड़ लो। ठीक है, मूर्ति के सामने झुका दो। बहुत अहंकारी मन हो, तो कोई ऑब्जेक्ट पकड़ लो कि ठीक है, शुन्य समर्पण नहीं कर सकते, तो एक व्यक्ति के सामने कर देंगे, एक मूर्ति के सामने कर देंगे, एक ग्रंथ के सामने कर देंगे, कोई बात नहीं। शुरुआत इसी से कर लो। झुकना जरूरी है। वो कहते हैं ना कि जहां हमने सर झुका दिया...

प्र: वही काबा बना दिया।

आचार्य जी: अब ये थोड़ी कह रहे हैं कि पहले काबा जाओ और फिर सर झुकाए। सर का झुकना जरूरी है काबा अपने आप बन जाएगा और कब झुकना जरूरी है दिन में? 1 बार? 5 बार?

प्र: हर पल।

प्र: वो अहोभाव की भावना होना चाहिए हमेशा।

आचार्य जी: और जो अहोभाव में है वो उदास नहीं रह सकता, मुरझाया हुआ नहीं रह सकता। आप दोनों काम एक साथ नहीं कर सकते कि एक तरफ तो कह रहे हो कि "आहा, बहुत कुछ मिला है। बिना मांगे मिला है। मैंने थोड़ी ही दी थी आंखों को रोशनी।" तुमने कुछ करा है आंखों को रोशनी देने के लिए? अपने आप ही कहीं से आ रही है। ये अहोभाव है, और जब तुम्हें लगातार याद है, किलस रहे हो, चिढ़ रहे हो, इरिटेटेड(चिड़चिड़े), और तभी ये याद आ जाए की आंख को रोशनी मैंने नहीं दी है, मैंने कमाई नहीं है, मेरे अहंकार ने उसको कमाया नहीं है, मुफ्त मिली है। तो तब क्या गुस्से में रह सकते हो? तब क्या चिढ़े-चिढ़े रह सकते हो? रह सकते हो क्या?

श्रद्धा और आनंद बिल्कुल साथ चलते हैं। जिसका सर श्रद्धा में जो हो गया, वो उसी समय आनंद को उपलब्ध हो गया क्योंकि अहोभाव में आप उदास नहीं रह सकते। अहोभाव में आप शिकायत नहीं कर पाओगे, या कर पाओगे? "ग्रिटीट्यूड तो बहुत है, लेकिन देखिए, थोड़ा और दे दीजिए। ग्रिटीट्यूड तो बहुत है, पर देखिए, अच्छा हुआ नहीं हमारे साथ।" तो जो जानता है, वो जानता है कि वो अनजाना नहीं है। तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है। जहां भी जाऊं ये लगता है तेरी महफ़िल है। तू अनजाना कहां है, तू तो जिंदगी में बिल्कुल समाया हुआ है लगातार। तो अनजाना कहां है, साथ ही चल रहा है मेरे। मैं अपने जितने साथ हो सकता हूं, तू उससे ज्यादा साथ है। पहेली पर पहेली। और मज़ेदार है तीसरा। इन्हीं सब चीजों के लिए तो संस्कृत सीखना थोड़ा जरूरी हो जाता है। ओरिजिनल का मजा लो।

यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः।

अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्॥

(केनोपनिषद, अध्याय 2, श्लोक 3)

जो कहते हैं कि जान लिया, उनका पक्का है कि नहीं जाना। जो नहीं जानते वो जानते हैं, और जो जानते हैं वो नहीं जानते।

प्र: क्या जानते हैं और क्या नहीं जानते?

आचार्य जी: नहीं बताया जाएगा। क्योंकि ये बता दिया गया, तो तुम जान ही जाओगे, और अगर तुम जान गए, तो पक्का है कि तुम नहीं जानते। तो तुम्हारे दुश्मन थोड़ी है जो तुम्हें बता देंगे। यही सवाल एक बार और भी तुमने रविवार को पूछा था, "क्या जान गए?" मैंने कहा था ये बताने की बात नहीं है। जो जानता है उसका पक्का है कि नहीं जानता। अहंकार की तो बिल्कुल चटनी बन गई। जो कह दे कि कुछ भी जानता हूं, वो उसी समय सतर्क हो जाए कि गड़बड़ हो रहा है। कुछ नहीं जानता, इसमें भी सूक्ष्म अहंकार है। ज्ञात, अज्ञात, अज्ञेय। गहरा अहंकार होता है ये कहने में कि ज्ञात है। उस सूक्ष्म अहंकार होता है ये कहने में कि अज्ञात है मुझे। अहंकार की हालत खराब होते हैं जब कहते हो अज्ञेय हैं—जाना ही नहीं जा सकता।

प्र: विज्ञान तो ये मत नहीं रखता है ना। अज्ञेय वाली बात पर तो विज्ञान समर्पण नहीं करना चाहता।

आचार्य जी: दंभ है। जान कर दिखाऊंगा। हमारे कैलेंडर में भी है ना:

‘रहिमन’ बात अगम्य की, कहनि-सुननि की नाहिं।

जे जानत ते कहत नहिं, कहत ते जानत नाहिं॥

प्र: शिव सूत्र में भी ये बात है कि एक जाना जा सकता है, एक नहीं जाना जा सकता, और एक जो जानने से परे है। इसी में तो विस्मय का बहुत ज्यादा...

आचार्य जी: ये पूरा विस्मय है। सामने विस्मय ही रखा हुआ है हमारे। और ये भी मत कहिएगा कि इसमें से ज्ञान के दरवाजे खुलते हैं। ज्ञान वगैरह कुछ नहीं, विस्मय ही है।

ज्ञान मत बोलो। विस्मय से ये तो हो सकता है कि तुम्हें मिल जाए, पर तुम पाओगे नहीं, तुम अपने आपसे कमओगे नहीं। तुमने अर्जित नहीं करा है। कृपा हो सकती है। और वो जानना वास्तव में ज्ञान नहीं है। एक तरह का समर्पण है, ज्ञान से संबंधित है, पर ज्ञान तो बिल्कुल नहीं है।

तो जो इस चक्कर में नहीं फंसते हैं कि जान लेना है, मन में कैद कर लेना है, वो जान जाते हैं।

अविज्ञातं विज्ञानतां।

इस सूत्र को तो चाहो तो अपनी किताबों पर लिख लेना। जो इस बात में संतुष्ट हैं कि नहीं जानता, वो जान जाएगा, और उनका जानना वही होगा जैसा कहा गया: कृपा के कारण। उनकी अपनी हरकतों से, उनके अपने कृतियों से नहीं होगा। उसमें उनका कर्तत्व कहीं भी शामिल नहीं है। ऐसे ही बने रहना है हमेशा। कैसे? अविज्ञातं। अविज्ञातं मने? बालक। बस यही बने रहना है। मत चढ़ कर कहो कभी कि मैं देने आया हूं। थोड़ा विनीत रहो: मेरे माध्यम से हो रहा है। कुछ कह रहा हूं, कहने में मेरा सुख है। हो सकता है आपको भी मिल जाए।

प्र: क्या हो रहा है कैसे हो रहा है कह नहीं सकता लेकिन आनंद मिल रहा है।

आचार्य जी: बस यही। कुछ कह रहा हूं, कहने में मुझे बड़ा अच्छा लग रहा है, और तुम्हें भी अच्छा लग सकता है। इतना ही जान सकता हूं। तुम ईमानदारी से बताओ, तुम्हारे सामने जितने बैठे रहते है, उनमें सामर्थ्य ही ना हो समझने की, तो उनको समझा पाओगे? तो समझा कौन रहा है? तुम्हारे शब्द या उनकी अपनी आंतरिक सामर्थ्य है? उस सामर्थ्य को भी नमन करा है?

प्र: कितने डाक्यूमेंट्स हमने उठाए हैं, उनमें सबसे पहले विद्यार्थी के लक्षण बताए गए हैं। अधिकारी है या नहीं पात्र है या नहीं।

आचार्य जी: कभी करा है ये? जाते हो सेशन लेने, कभी जो उसके भीतर समझने वाला बैठा है, उसको प्रणाम करा है? करा है? और नहीं करा, तो ये बताओ कि अगर वो समझने वाला मौजूद ना हो, तो तुम लाख सब सर पटक लो, समझा पाओगे? तुम्हारा पूरा कर्ताभाव अपने पूरे जोर के साथ भी कुछ भी डिलीवर कर पाएगा? तो ये अहंकार है।

और अब दूसरी बात भी है। वो लाख समझने को तैयार बैठे हो, और तुम्हारे भीतर जो समझाने वाला है, वो सो जाए, तो अब कुछ हो पाएगा? कई उपनिषदों का शांति पाठ है। उसमें गुरु और शिष्य मिलकर कहते हैं कि हमें आशीर्वाद दो, तभी हमारे बीच कोई घटना घट पाएगी। गुरु और शिष्य मिलकर प्रार्थना करते हैं क्योंकि ना गुरु समझाता है, न शिष्य समझता है। ये तो बस दिखता है ऐसा कि एक से दूसरे को जा रहा है। ना कोई है, ना कोई दूसरा है। ये सब एक कृपा है जिसके कारण हो रहा है। इसका है या नहीं पता नहीं शांतिपाठ। लेकिन कई उपनिषदों का यही शांति पाठ है। सामवेद में जितने हैं, उनका है यही। ये भी सामवेद से ही है। आपका पसंदीदा टॉपिक फिर आ गया: अमरत्व। ये शांति पाठ है देखिए इसका:

ॐ सह नाववतु।

सह नौ भुनक्तु।

सह वीर्यं करवावहै।

तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

ये शिष्य गुरु से नहीं कर रहा प्रार्थना। ये दोनों एक साथ उस से प्रार्थना कर रहे हैं क्योंकि अगर ये ना हो, तो काहे का शिष्य और काहे का गुरु।

प्र: मुझे लगता है कि शिष्य के समक्ष अगर आप इस भाव के साथ जाते हैं तो उसका प्रभाव पड़ता है।

आचार्य जी: हाँ, देखिए जिंदगी में जहां कहीं भी वो बेखुदी का भाव होगा ना कि मैं कर तो रहा हूं पर अपने आप को बहुत सीरियसली नहीं ले रहा। लगेगा ऐसा ही कि मेरे करने से हो रहा है, पर मुझे पता है की हो ना तो किसी और चैनल से ही है, वहां पर जिंदगी भी मस्त हो जाएगी, रिजल्ट के प्रति आपकी घबराहट होती है कि रिजल्ट क्या आएगा काम का, वो कम हो जाएगा, और बड़े अनापेक्षित परिणाम आएंगे—वही अज्ञेय वाले। जब भी कभी बिल्कुल बेखुदी के भाव से डूब जाओगे करने में—जब सिर्फ जो हो रहा है, वही बचेगा, आगे-पीछे की कैलकुलेशन खत्म हो जाएगी—तब उसमें परिणाम बहुत अनापेक्षित आएंगे, ये पक्का है। जैसे ही ये भाव मन से निकलेगा कि मैं करके दिखाऊंगा, वैसे ही कुछ ऐसा होने लग जाता है जो तुम करके दिखा ही नहीं सकते—जो वास्तव में अनापेक्षित है, अपेक्षा के परे हैं। जैसे अज्ञेय है वैसे ही अनापेक्ष्य है।

प्र: करने वाला है वो तो मन है, और मन सीमित है, तो वो जो कार्य करेगा वो भी सीमित ही होगा।

अचार्य जी: अभी भी लगेगा ऐसा ही जैसे हो मन के द्वारा ही रहा है क्योंकि अपने हाथ से ही करोगे।

प्र: पर ये सारे उपकरण है।

आचार्य जी: हां, उपकरण फिर उपकरण रहेगा। होगा इन्हीं हाथों से, बोलोगे इसी मुंह से, सोचेंगे इसी दिमाग से, पर कुछ बड़ा गुणात्मक अंतर आ जाएगा। फिर घबराहट नहीं रहेगी। जैसा हमने कहा था अभी: श्रद्धा और आनंद एक साथ चलते हैं—जहां श्रद्धा वो आनंद। और उल्टा भी बिल्कुल सही है: श्रद्धा नहीं, तो आनंद की सोचना भी मत, या ये कहो कि जहां श्रद्धा नहीं है, वहां आनंद के बारे में सिर्फ सोच हो सकती है—सोचते रहो आनंद के बारे में। श्रद्धा नहीं है, तो आनंद नहीं मिलेगा।

प्र: सोच रहे हो तो मतलब श्रद्धा नहीं है।

आचार्य जी: अहंकार और आनंद एक साथ नहीं चलते। और जब अहंकार विलीन होता है, उसी का नाम क्या है? श्रद्धा। कोई कारण नहीं होता है श्रद्धा का। कैल्कुलेट नहीं कर पाओगे कि श्रद्धा का पल आ गया या नहीं आ गया। बिल्कुल बेवकूफी की होती हैं श्रद्धा, बिल्कुल बेअकेली की। उस समय अगर कोई कहे कि "क्यों?" तो नहीं समझा पाओगे। इसीलिए जो जानने वाला होता है और जो बिल्कुल पागल आदमी होता है, उनमें कोई विशेष अंतर होता नहीं। बाहर-बाहर से तो बिल्कुल ही नहीं दिखाई देता। दोनों ही बड़े नासमझी के काम करते हैं। समझा नहीं पाओगे। लोग पूछेंगे, नहीं बता पाओगे। हल्का-सा इशारा दे रहा हूं, जैसे तुम्हारा सिद्धार्थ, कबीर इन कॉर्पोरेट का। लोग पूछेंगे, वो समझा नहीं पाएगा, पर मौज है उसकी। समझ रहे हो बात को? अकारण। कारण सारे होते हैं किसके भीतर? मन के भीतर। और श्रद्धा क्या है? ये जान लेना कि मन की सीमाएं हैं। ये मन ही जानता है। याद रखना, वहां तक मन ही काम आएगा क्योंकि मन की सीमाएं मन ही बताएगा। मन का काम ही ये है। मन का जो उचित काम है वो यही है की अपनी सीमाएं जान ले। विचार पूरा करो, पूरा विश्लेषण, पूरा कैलकुलेशन करो, ये जानने के लिए कि मैं कैलकुलेट कितना कर सकता हूं। और एक बार अपनी सीमाएं जान लो, वही रुक जाओ। ठीक है, इतना कुछ है जो विश्लेषण के दायरे में आता है। बहुत कुछ है जो विश्लेषण के दायरे में आता है। वहां कर लो विश्लेषण, कोई दिक्कत नहीं है। जो आता है विश्लेषण के दायरे में उसको बिल्कुल कर लो।

प्र: उसका विश्लेषण ही कर ले?

आचार्य जी: और कुछ कर भी नहीं सकते। वहां श्रद्धा थोड़े ही लगाओगे। कल किसी शेयर का मूल्य कितना बढ़ सकता है, कितना घट सकता है, इसके लिए तो तुम्हें इंफॉर्मेशन पर ही चलना पड़ेगा, मानसिक सूचना पर चलना पड़ेगा। वो नहीं है क्षेत्र श्रद्धा का। और वो बहुत छोटा क्षेत्र है जहां पर विश्लेषण और गणना चलती है। उसके बेयोंड (परे) जो है, वो बहुत, बहुत बड़ा है। उसी बेयोंडनेस (परे होने) को बिल्कुल जान जाना। याद रखना, परे होने की डिटेल नहीं जान रहे हैं। क्या जान रहे हैं? ये कि लिमिट है, और लिमिट के आगे कुछ है जरूर।

प्र: लिमिट है, इसका मतलब यही है कि उसके आगे कुछ और भी है।

आचार्य जी: बहुत बढ़िया। आंख देख सकती है, मतलब आंख के पीछे कुछ है जरूर। क्या है, ये नहीं जान सकते। कुछ है जरूर। यही श्रद्धा है। अनरीज़नेबल। वो जिस की डिटेल्स नहीं पता पर ये पता है कि है जरूर। क्या है, ये नहीं पता। कोई पूछेगा, "बताओ, क्या है?" तो नहीं बता पाओगे। बताना जरूरी भी नहीं है। हंस लेना, बताना नहीं। सिद्ध नहीं कर पाओगे। ये बातें सिद्ध करने की नहीं है। अगर बहुत सिद्ध करने की इच्छा उठे, तो अहंकार ही है कि "भाई तूने पूछा है, तो अब मेरे लिए सिद्ध करना जरूरी है, नहीं तो मैं छोटा हो जाउंगा।" अहंकार है। अपने आप ये एहसास बना रहे कि कि सब ठीक है—ऑल इज़ वेल। यही श्रद्धा है। इसी में आनंद है।

प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते ।

आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम्।।

(केनोपनिषद, अध्याय 2, श्लोक 4)

जब ये ऐसे प्रत्यक्ष बोध के द्वारा जाना जाता है जो ‘इसे’ प्रतिबिम्बित करता है, तभी व्यक्ति 'इसका’ विचार बना पाता है, क्योंकि उससे व्यक्ति को अमृतत्व की उपलब्धि होती है; उपलब्धि के लिए व्यक्ति को आत्मा से वीर्य (शक्ति) प्राप्त होता है तथा विद्या से अमृतत्व की प्राप्ति होती है।

जब उसकी कारगुज़ारियों को देखोगे, तो उसके बारे में विचार उठेगा। जब उसकी छवियों को देखोगे, जब उसकी छाया को देखोगे, तो उसके बारे में विचार ही उठ सकता है। याद रखना, उसको नहीं देखा, उसकी हरकतों को देखा—कारण को नहीं देखा, कारण के प्रभाव को देखा—तो उसके बारे में क्या उठेगा? विचार। पेड़ को देखोगे, तो विचार ही कर सकते हो। कर लो। इस बोतल को देखोगे, इस रोशनी को देखोगे, ध्वनि को देखोगे, ये सब क्या है? कायनात। तेरे जमाल से रोशन है कायनात मेरी। कायनात को देखोगे और अगर कायनात पर ही रुक गए, तो किस पर रुक गए? विचार पर रुक गए। विज्ञान और क्या करता है? पूरा विज्ञान विचार पर ही चलता है ना। कायनात को देखता है और कायनात के बारे में विचार करता है।

क्योंकि उससे व्यक्ति को अमृतत्व की उपलब्धि होती है; उपलब्धि के लिए व्यक्ति को आत्मा से वीर्य (शक्ति) प्राप्त होता है तथा विद्या से अमृतत्व की प्राप्ति होती है।

नॉलेज शब्द का अर्थ यहां संकलित ज्ञान नहीं है। वो नहीं देता अमरता। जो उपकरण दिया है उसने, उस उपकरण के माध्यम से जानोगे, और जब जान गए, पूर्णतया जान गए, तो उसी का नाम है अमर हो जाना—अमृत मिल गया। जो पूरा इसका बहाव है, उसको फिर से देख लो ध्यान से।

उसकी इस पूरी योजना को जब देखोगे, इस कायनात को जब देखोगे, उसके द्वारा रची गई सृष्टि को जब देखोगे, तो विचार उठेगा। इस विचार का उठना परम आवश्यक है। यही विचार कहता है, "केन?" और फिर एक बिंदु आएगा जहां पर अब ये विचार काम नहीं देगा। उस बिंदु पर तुमने क्या पा लिया? अमृतत्व—अमर हो गए। बात सीधे-सीधे ऑब्जरवेशन की है। कुछ और देखना नहीं है, कुछ और जानना नहीं है, कहीं और जाना नहीं है, यही जो सब कुछ है चारों तरफ—क्या? वस्तुएं, पूरी कायनात—इसी को देखो और मुफ्त मन से इसको जानने का कौतुहल रहे। एक आ जाएगा बिंदु जब ये सब कुछ जो आता है जाता है, जो समय के भीतर कैद है, जिसमें प्रकट होना और विलीन हो जाना है, जिसमें सारा द्वैत समाया हुआ है—और सबसे बड़ा द्वैत कोन सा है? जीवन और मृत्यु, आना और जाना। एक समय आएगा जब इस द्वैत के पार हो जाओगे। शुरुआती इसी द्वैत से करोगे, इसी को समझने से करोगे। शुरुआत असत्य को असत्य देखने से ही करोगे, पर श्रद्धा रखो कि सिर्फ जो नकली है उसको काटते-काटते एक दिन असली तक पहुंच जाओगे, और उसी असली तक पहुंचने का नाम है अमर हो जाना। तो बहुत सवाल मत करो कि अमर हो जाना क्या है। ये मत पूछो कि अमर हो क्या है। सिर्फ जो नकली है, उसको काटते चलो। ध्यान से देखो और वही ध्यान, जो कुछ नकली है, उसको काटता रहेगा, कटता रहेगा, कटता रहेगा। कोई उत्तर नहीं दिया गया है। समझाया गया ही नहीं है। देखो ना, सारी बात होती रही होती रही और आखिरी में कह दिया विन्दतेऽमृतम्। ये क्या बात हुई? कोई लॉजिक ही नहीं है। नकली को काटते-काटते मैं अमर कैसे हो जाऊंगा? कोई तुक बनता है? कोई तुक नहीं बनता। लेकिन यही कहा गया है कि जो मर्त्य हैं, जिसको जानना ही है, उसको समझ लो। मर्त्य को समझ लिया, अमृत प्राप्त हो जाएगा। कैसे हो जाएगा? हम कोई जवाब दे नहीं सकते। कोई जवाब है ही नहीं।

प्र: और ये समझ प्रतिपल बनी रहना चाहिए।

आचार्य जी: लगातार। इसलिए कहा था कि नॉलेज उस अर्थ में मत समझिएगा।

प्र: ये संकलित ज्ञान नहीं है।

आचार्य जी: ये संकलित ज्ञान नहीं है।

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति।

न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः।

भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः।

प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति॥

(केनोपनिषद, अध्याय 2, श्लोक 4)

यदि व्यक्ति यहीं (इसी लोक में) उस ज्ञान को प्राप्त कर लेता है तो व्यक्ति का अस्तित्व सार्थक है, यदि यहीं उस ज्ञान की प्राप्ति नहीं की, तो महाविनाश है। ज्ञानीजन विविध भूत-पदार्थों में 'उस' का विवेचन कर, इस लोक से प्रयाण करके अमर हो जाते हैं।

देखिएगा, जब दूसरा अंश समाप्त होने को है, तब कहा गया है, इतना कुछ कह सुनने के बाद—कह भी लिया, सुन भी लिया, ये सब करने के बाद—अगर तो ध्यान को, श्रद्धा को, जानने को उपलब्ध हो गए, तो सब पा लिया—अमृत पा लिया। ध्यान दीजिएगा, शब्द अमृत। जिसको आप अमृत भी बोलते हैं, वो क्या है? अ + मृत। अगर तो पा लिया, तो सब कुछ पा लिया। और अगर अब भी नहीं पाया, तो सब बर्बाद ही है। उससे शब्द इस्तेमाल किया गया है विनष्टि। इससे खतरनाक दुख और कोई दूसरा नहीं है। क्यों नहीं है? क्योंकि वो जो आपके लिए मुक्ति का दरवाज़ा बन सकता था, एक बड़ी बड़ी उम्मीद था आपके लिए, आप ऐसे चमत्कारी निकले कि आपने उसे भी हरा दिया। अगर ये भी आपको वहां तक नहीं ले जा पाया, क्या बचा है? आपके लिए क्या बचा है? जिसने ये यात्रा कभी शुरू ही नहीं की थी, उसके लिए ये उम्मीद तो है ना कि शुरू होगी।

जिन्हें कैंसर होता है उनके लिए कहा जाता है कि या तो कीमोथेरेपी काम करती है या नहीं करती। तो जिसने भी कीमोथेरेपी अभी शुरू ही नहीं कि उसके लिए उम्मीद है। पर जिसकी ने कर ली और काम नहीं करी कीमोथेरेपी, अब वो सिर्फ मरेगा। क्योंकि आप क्या उम्मीद है? एक ही दवाई है: कीमो। वो भी अगर काम नहीं करे तो क्या करोगे। तो एक ही दवाई है और ये भी अगर काम नहीं करे, तो अब क्या बचा तुम्हारे लिए? कब नहीं करेगी ये काम? और ये सवाल हम सबके लिए बड़ा महत्वपूर्ण है क्योंकि हम बहुत दवाइयां कई तरह की दवाइयां—भारतीय, यूनानी, चीनी, जापानी, आयुर्वेदिक—आज़माते ही रहते हैं। हर तरह की दवाइयां यहां पर, अलग-अलग प्रकार से, घुट्टियाँ रहती हैं। तो ये दवाइयां कब नहीं काम करेगी?

प्र: जब आप ज्ञान इकट्ठा करते जा रहे हो और पांडित्य बढ़ता जा रहा है कि मैंने ये भी जान लिया, वो भी जान लिया।

आचार्य जी: मैं इसको थोड़ा दूसरे तरीके से लेता हूं। मुझे बड़ी दवाइयां दी गई है, मुझ पर कोई काम नहीं करती। बताइए क्यों? दवाई देने वाला मुझे बताता है कि इतना-इतना डोज़ हफ्ते में इतनी-इतनी बार इस समय पर लेनी है। मैं लेता ही नहीं। उसने मुझे कुछ पथ्य भी बताए हैं। क्या होते है पथ्य? पथ्य होते है कि क्या खाना है, किस तरह का भोजन करना है इस दवाई के साथ—डाइट। डाइट क्या होती है? क्या आंखों से जा रहा है, क्या काम से जा रहा है, क्या सभी इंद्रियों से जा रहा है। तो मुझे मेरे डॉक्टर ने एक शेड्यूल बताया है, मैं उसका पालन नहीं करता। मुझे मेरे डॉक्टर ने कुछ पत्ते बताए हैं कि इनका सेवन करना, मैं उनको लेता नहीं। मुझे मेरे डॉक्टर ने कुछ परहेज़ भी बताया है—हर दवाई के साथ होते हैं—कि बेटा ये सब मत खाना, और मैं वही सब खाता हूं, तो मुझ पर कौन सी दवाई काम करेगी? तो अभी 9:00 बजे ये खत्म होगा और उसके बाद ना पथ्य हैं, ना परहेज है, ना दवाई है, तो तुम सिर्फ डॉक्टर का ही नाम खराब कर सकते हो, और वही होता है। "हमने तो डेढ़ साल तक करके देखा, हमारा तो सिर्फ कंफ्यूजन बढ़ गया है।"

प्र: मैंने सब पढ़ लिया पर कुछ नहीं मिला।

आचार्य जी: कुछ नहीं मिला, कुछ नहीं मिला। सब कर लिया। अरे तुमने तो आज ज्वाइन किया है, हम ढाई साल से हैं यहां पर, हमें कुछ नहीं मिला। तो ऐसे में तो सिर्फ वैद्य नाम खराब होता है। जो फिर अच्छा डॉक्टर होता है ना, वो ऐसे पेशेंट को कुछ दिन बाद भगा देता है। कहता है कि तू रहेगा, पक्का मरेगा, और मरेगा, तो मेरा नाम खराब करेगा। जब ना तुझे मेरी बताई दवाई लेना है, ना पथ्य लेना है, ना परहेज लेना, जो मैंने कहा वो तुझे मानना ही नहीं है, तो तू काहे का मरीज है? तुझे तो अपनी मनमर्जी करनी है। कर फिर। या फिर ये है कि उसको एडमिट कर दो। अस्पताल में जब पेशेंट बहुत सीरियस हो जाता है, तो वो क्या करते हैं?

प्र: एडमिट।

प्र: आईसीयू में वो भी।

आचार्य जी: वो भी आईसीयू में। बाहर का कोई घुस नहीं सकता समझ रहे हो ना पूरा? पैरेलल समझ रहे हो ना? कि बाहर का कोई भी आदमी अब तुम्हारे संपर्क में आएगा नहीं, जो हम देंगे वही खाओगे, जिस मात्रा में देंगे उतना ही खाओगे, और जो-जो कहेंगे वो करना पड़ेगा। तो या तो ये है कि फिर एडमिट कर लिया जाए। यहीं रहो, और जो कहा जाए वो पढ़ो, और उसके अलावा कुछ करना नहीं। रोज रात में घर भागोगे, और वहां जाकर बढ़िया चिकन फ्राई चलेगा। चिकन फ्राई मैं ये नहीं कह रहा हूं कि मुर्गे की टांग ही है। हर प्रकार का चिकन फ्राई है।

प्र: यहां सात्विक, वहां जाकर एकदम पूरा तामसिक।

आचार्य जी: हां। ये जो थ्री काइंड्स ऑफ बिकमिंग (तीन प्रकार का होना) बोला है, ये बिकमिंग नहीं है, तीन प्रकार के दुख हैं जिनको वेदांत मानता है—ये कैटेगरी बनाई है। तीन प्रकार के दुख होते हैं: आधिभौतिक, आधि दैविक, और एक और नाम देते हैं। इसका अर्थ यही है कि कुछ ऐसी घटनाएं जो बिल्कुल ही बाहरी है, जिनका आप से कोई संबंध नहीं; कुछ ऐसी जो अपने प्रारब्ध के कारण भोग रहे हो कि तीर छूट गया है, अब आप जान भी जाओ कि गलत छूट गया है, तो निशाने पर लगेगा ही लगेगा; और कुछ ऐसी घटनाएं है जो घट ही नहीं रही है, कल्पनिक है, पर आप उनके कारण दुख भोग जरूर रहे हो, जैसे कि सपना नाइटममेयर। सपना है ही नहीं, पर फिर भी जब नाइटममेयर होता है, तो कैसी हालत होती है? पसीने छूट रहे होते हैं, और चीखें निकल जाती है। तो ये कहा गया है कि जो ये त्रय संताप है—तीन तरह के संताप माने गए हैं—इनसे मुक्ति मिल जाएगी। जो आदमी ये सब जान जाता है, उसे हर प्रकार के दुख से मुक्ति मिल जाती है।

इसके आगे जो है—ये तीसरे और चौथे हिस्से—ये उपनिषद कम है, अब ये पुराण ज्यादा है. तीसरा और चौथा हिस्सा, उपनिषद कम है, पुराण ज्यादा है। अर्थ इसमें भी है, गूढ़ अर्थ है। ठीक है? पर अब यहां पर इसको दूसरे मन से समझना पड़ेगा। अब एक कहानी शुरू होती है, उस कहानी में से अर्थ निकालने पड़ेंगे। पर मेरी दृष्टि जहां तक जाती है, जो इसका सत्व था— रस पूरा—वो पहले और दूसरे हिस्सों में था, वो हमने पी लिया हैं। तीसरा और चौथा देख सकते हैं, कीमत उसकी भी है, पर जो असली मामला था वो हमने जान लिया है, और हम उसको स्टोर कर लेंगे।

प्र: नॉलेज हो गई।

आचार्य जी: नॉलेज पूरी हो गई है।

प्र: कई बार देखा है कि जो असुर होता है, उसे भी वरदान शिवजी नहीं दिया होता है ।

आचार्य जी: बहुत बढ़िया बात है। वो असुर भी उसी आदि से निकला है। सच तो ये है—पता होगा हमें, पौराणिक कथा भी यही है—कि देवों की और असुरों की माता भी एक ही है। दे कंप्लीमेंट ईच अदर। जहां देवता होंगे, वहां असुर होंगे ही होंगे। जब मंथन होता है, तो वो बड़ी मजेदार घटना है। मंथन जब दिखाया जाता है, तो वो समय एक तरफ कौन खड़े होते हैं?

प्र: एक तरफ़ देवता दूसरी तरफ़ असुर।

आचार्य जी: पूरा द्वैत सामने हैं आपके। तो क्या हुआ है? कहानी दोहराईए।

प्र: अहंकार प्रबल हो उठा है।

आचार्य जी: अहंकार देवताओं का प्रबल हो उठा है क्योंकि सोच रहे हैं कि हमारा कर्तत्व है—हमने जीता। विचार उठा है कि हमने जीता। जीता है उसने, और देवों को लग रहा है जीता हमने। जहां देवों को लग रहा है जीता हमने, तहां वो आदिशक्ति किस रूप में प्रकट हो गई? दानव के रूप में प्रकट हो गई। होना ही था। हमारे साथ भी वैसा ही होगा।

पुराण का अर्थ ये नहीं है कि जो हो चुका। पुराण का अर्थ है: जो हमारा स्वभाव है सदा से। पुराण मने पुराना। स्वभाव मने वैसा स्वभाव नहीं जिस अर्थ में हम मूल स्वभाव कहते हैं, मन का स्वभाव। मन पुराना है ना। पुराण मने मन ही है। पुराण मने क्या है? हममें पुराना क्या है। पुराना मने जो अतीत से आ रहा है, हम में क्या आ रहा है अतीत से? मन। तो जो भी पौराणिक कथा है, वो किसकी कथा है? हमारे मन की कथा है। हमारे मन की कहानी बयां करती है।

प्र: ये कह सकते हैं जो हमारा फ्हैयान, वो है हमारी अहम वृत्ति।

आचार्य जी: बिल्कुल, बिल्कुल।

तीसरा: परमेश्वर ने अग्नि देव से कहा कि "चूंकि हर जन्म में ली गई वस्तु के तुम ज्ञाता हो, तो इस दिव्य यज्ञ का भी पता लगाओ।" और अग्निदेव ने उनकी आज्ञा स्वीकार की।

ठीक है, तो कहानी आगे बढ़ रही है। देवता अग्नि के पास जाते हैं और कहते हैं कि ये क्या बला सामने आ गई। जा भाई अग्नि, थोड़ा पता कर ये क्या बला सामने आ गई। वो नहीं जान रहे हैं कि ये बला किसने पैदा करी है—खुद उन्होंने पैदा करी है। और कब पैदा हुई है? पहले पर वापस जाइएगा। क्या लिखा हुआ है? "हमारी जीत है, हमारी महानता है।" जिस क्षण ये विचार आया, उसी क्षण आपके सामने एक राक्षस खड़ा होना पक्का है। ठीक है? तो अब अग्नि के पास गए हैं, कह रहे हैं कि भाई पता करके आ ये क्या आफत हो गई। तो अब क्या होगा आगे?

तो अग्नि उस प्रथम के पास जाती है, उस शाश्वत के पास जाती है, और अपना परिचय देती है कि मैं वो हूं जो सब को जानती है जो आज तक पैदा हुआ है। ये अग्नि का क्या है? अहंकार। निश्चित टूटेगा, निश्चित कुछ ऐसा होगा जो अग्नि को ठिकाना लगाएगा क्योंकि अग्नि ने कह दिया है कि सब कुछ ज्ञात है, और मैं वो ज्ञाता हूं। बड़ी बात कह दी है। अब देखिए क्या होता है।

दिव्य यक्ष ने अग्नि से कहा: तुझमें क्या सामर्थ्य है?

अग्नि ने कहा: मैं सर्वज्ञाता हूं और यदि चाहूं तो पृथ्वी पर सब कुछ जलाकर भस्म कर दूं।

वो शाश्वत अग्नि से क्या सवाल करता है?

प्र: शक्ति क्या है?

आचार्य जी: इशारा डाल रहा है कि अग्नि, शायद तेरी अकल ठिकाने आ जाए। क्या इशारा डाला है? "तुम्हारे पीछे कौन सी शक्ति है? कहां से आई तुममें शक्ति ये?" पर अग्नि को बात समझ में नहीं आ रही है। क्या जवाब देता है अग्नि? सब भस्म कर दूंगा। अग्नि का अहंकार बड़ा है। अब कुछ होगा, क्योंकि उस शाश्वत ने अग्नि को मौका भी दे दिया कि भाई अग्नि, ठीक है, तू कह रहा है मैं सब को जानता हूं, तो ये तो बता दे वो सामर्थ्य जानने की कहां से आई तेरी।

उस दिव्य यक्ष ने अग्नि के समक्ष एक तिनका रखकर कहा कि इसे जला दो। अग्नि पूर्ण शक्ति से उस दिन के पर टूट पड़ा, किंतु उसे जला ना सका। अग्नि देवताओं के पास लौट गया और उसने अपनी असमर्थता बता दी। अग्नि का अग्नित्व लुप्त हो गया, शक्ति का स्त्रोत परमेश्वर ही तो है।

तो उसने क्या कहा अग्नि से? ले भाई, ये तिनका है, तू इसी को जलाकर दिखा दे। और अग्नि ने पूरी कोशिश कर ली, जला नहीं पाई। सांकेतिक बात है। इसमें ये सवाल ना करिएगा की आग तिनका क्यों नहीं जला पाएगी। जो कहा जा रहा है वो इशारा है। क्या है इशारा? उसकी बैंकिंग ना हो, तो तुम्हारी पूरी ताकत एक तिनका न हिला पाएगी। उसका ज़ोर ना हो तुम्हारे पीछे, तो तुम होंगे कितने भी प्रबल, इतना-सा कुछ नहीं कर पाओगे।

अग्नि को लेकिन बात अभी भी समझ में आई नहीं है। अग्नि बस रोते-चिल्लाते भाग लिया है कि मुझे नहीं मालूम, हाय-हाय। भाग गए, गायब हो गए।

प्र: नॉलेजेबल मने जो हर प्रश्न को वहीं पर मार देता है।

आचार्य जी: हाँ, तो भाई अग्निदेव भाग लिए हैं, तो किसी और को भेजा जाए शायद। देखिए अब क्या होगा।

देवताओं ने वायुदेव से दिव्या यक्ष का बदला लगाने को कहा, और उन्होंने आज्ञा स्वीकार की।

तो आप वायुदेव लाए गए। देवताओं में से एक का नंबर लगाया जा रहा है। अग्नि का नंबर लगाया गया। अब पवन देव आ रहे हैं। अब पवन देव क्या हरकत करते हैं?

दिव्य यक्ष ने वायु से कहा: तुम कौन हो?

वायु ने गर्व से कहा: मैं वायु हूं। मैं मातरिश्वा हूं।

बाप रे!

प्र: जान की जान।

आचार्य जी: बिल्कुल ठीक कहा आपने। जो वो है नहीं, वो होने का अहंकार पाल रखा है: मदर ऑफ ऑल थिंग्स (सभी चीज़ों की मां)। तुम हो मदर ऑफ ऑल थिंग्स? तो अब इनका भी कुछ ना कुछ इलाज होगा जरूर। क्या इलाज होता है इनका?

दिव्य यक्ष ने वायु से उसका सामर्थ्य पूछा, तो भाइयों ने उत्तर दिया, "यदि मैं चाहूं तो पृथ्वी पर जो कुछ भी है, उसको आकाश में उड़ा दूं।"

ये सब जितना है, ये सब खत्म कर सकता हूं। मेरे ही दम से चल रहा है सब कुछ। मूवर एंड शेकर हम ही हैं। अब होगा क्या वायु का दिख रहा है?

उस दिव्य यक्ष ने वायु के समक्ष एक तिनका रखकर कहा कि इसे उड़ा दो आयु पूर्ण शक्ति से उस दिन के पर टूट पड़ा किंतु उसे उड़ा ना सका वायु देवताओं के पास लौट गया और उसने अपनी असमर्थता बता दी वायु की शक्ति का स्रोत परमेश्वर ही तो है।

ये तिनका उड़ा दे, भाई।

प्र: आचार्य जी, तब भी वो सिर्फ चले जा रहे हैं। उनको बात समझ में नहीं आ रही है।

आचार्य जी: नहीं समझ में नहीं आ रही है।

प्र: जो अग्नि के साथ है वही वायु के साथ है।

आचार्य जी: फिर याद रखना: ना अग्नि है, ना वायु है—हमारे मन की कहानी है। संकेत आए, पर हमने माना नहीं। अहंकार बार बार टूटता है, पर हम उसे खड़ा कर देते हैं फिर से।

प्र: औचित्य।

आचार्य जी: हाँ, तो अब वायु देव भी निकल लिए। अब अगला नंबर किसका लगा है?

सब देवो ने देवराज इंद्र से कहा- आप ही पता लगाइए कि ये यक्ष कौन है? इंद्र दौड़कर यक्ष की ओर गए, किंतु यक्ष अंतर्धान हो गया।

एक पता नहीं किसका उद्धरण है कि: हमारी जिंदगी में जितने भी राक्षस है, वो असल में राक्षस है है नहीं; वो सुंदर राजकुमारियां है जो हमारे प्रेम पूर्ण स्पर्श का इंतजार कर रही है। उन राक्षसों को अगर जान लिया, समझ लिया, तो दिख जाएगा कि वो भयानक है ही नहीं। यहां भी आप देख रहे हैं क्या हो रहा है? जो परम सत्ता है, जो प्रेम है, जो आनंद है, वो रूप किसका लेकर आया है?

प्र: यक्ष का।

आचार्य जी: आज भी फेसबुक पर एक उद्धरण डला है कि निडरता का राज है डर के बीचो-बीच खड़े होना। ये जो राक्षस है डर, इसी में निडरता छुपी है। यही संदेश तो ये कहानी दे रही है। दिख रहा है राक्षस, और है क्या वो? वो शाश्वत, सर्वशक्तिमान है। उस राक्षस को समझो। वही काम कौन नहीं कर पा रहा है? ना अग्नि कर पा रहा है, ना वायु कर पा रही है। मन हमारा नहीं कर पा रहा है।

प्र: अग्नि और वायु लॉजिक है मन के।

आचार्य जी: हाँ, बस मन के दो हिस्से हैं, मन के दो तरीके हैं।

प्र: ये मन को बार-बार डरा है और मन बार-बार उससे...

आचार्य जी: मन डर रहा है। मन जिसको राक्षस समझ रहा है, वो बात ही कुछ और है वहां पर। तो भाई, अब इंद्र आए।

सब देवो ने देवराज इंद्र से कहा- आप ही पता लगाइए कि ये यक्ष कौन है? इंद्र दौड़कर यक्ष की ओर गए, किंतु यक्ष अंतर्धान हो गया।

बाकियों से तो उस शाश्वत ने बात भी कर ली, इंद्र को दिखाई ही नहीं पड़ा। अदृश्य हो गया। इतना गहरा अहंकार कि सत्य सामने खड़ा था और दिखाई ही नहीं पड़ा। तो अब किसके पास गए?

इंद्र ने आकाश में ही यक्ष के स्थान पर हिमाचलकुमारी उमा को देखा, तथा उनके पास पहुंचकर पूछा, "ये यक्ष कौन था?"

अब प्रार्थना की जा रही है उमा से—वो जो पर्वत पर रहती है, वही जिसका नाम पार्वती भी है। ठीक है? कि भाई, जाओ, तुम पता करके आओ। यहां चौथा खंड शुरू होगा क्योंकि अब कुछ नया घटेगा।

उमा ने इंद्र से कहा कि वास्तव में वो दिव्य यक्ष ब्रह्म ही था। इंद्र ने समझ लिया था कि साक्षात ब्रह्म ही यक्ष के रूप में प्रकट हुआ था। एक मात्र ब्रह्म ही समस्त शक्तियों का स्त्रोत है। उसकी शक्ति के बिना देव और मनुष्य कुछ नहीं कर सकते।

इंद्र ने उमा से प्रार्थना करी है कि आप बताइए, हम नहीं जान पाए। ठीक है? उमा प्रतीक है किसकी? उमा उसकी प्रतीक है जो हमेशा सत्य के साथ रहे—शिव की अर्धांगिनी। शिव सत्य है, सत्य की सहचरी है उमा। सत्य की सहचरी होने का अर्थ है वो जो सत्य को तुरंत पहचान जाए। जितने ये देवता थे, वो नहीं पहचान पाए, उमा पहचान गई। और ये बात भी बड़ी प्रतीकात्मक है कि देवता किस रूप में दिखाए गए हैं? पुरुष रूप में, और उमा क्या है?

प्र: स्त्री।

आचार्य जी: 'स्त्री' होने का क्या अर्थ है? रिसेप्टिव होना। उमा पहचान गई। जो पुरुष दंभ है, वो नहीं पहचान पाया। अब क्या होता है?

उमा ने इंद्र से कहा कि वास्तव में वो दिव्य यक्ष ब्रह्म ही था। इंद्र ने समझ लिया था कि साक्षात ब्रह्म ही यक्ष के रूप में प्रकट हुआ था। एक मात्र ब्रह्म ही समस्त शक्तियों का स्त्रोत है। उसकी शक्ति के बिना देव और मनुष्य कुछ नहीं कर सकते।

वो ब्रह्म है, और मात्र वही ब्रह्म नहीं है। वो जो राक्षस है, वो ब्रह्म है, और मात्र वो राक्षस ही ब्रह्म नहीं है, कौन ब्रह्म है? ये सारे देवता, तुम, मैं, सब ब्रह्म है, क्योंकि सब उसी के द्वारा प्रेषित है। यही तो कहा गया था ना अग्नि से, कि जला के दिखा दो मेरे बिना। मेरा ही स्पर्श है जो तुम्हें जलाने की शक्ति देता है। और यही तो कहा गया था ना वायु से, कि उड़ा कर दिखा दो मेरे बिना। मेरा ही स्पर्श है जो तुम्हें उड़ाने की शक्ति देता है। तो उमा ने कहा वो ब्रह्म है, और मात्र वही ब्रह्म नहीं है, तुम, मैं, सभी—कुछ ऐसा नहीं है जो ब्रह्म ना हो।

देवराज इंद्र अन्य देवों की अपेक्षा वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ हैं, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर को उमा देवी के शब्दों द्वारा सर्वप्रथम जानकर स्पर्श किया। उसी ने अन्य देवों से पूर्व जाना कि ब्रह्म समस्त शक्तियों का स्त्रोत है।

वही बात आगे बढ़ाई जा रही है। अग्नि हो, वायु हो, इंद्र हो, सब उसी—तेरे जमाल से रोशन है कायनात मेरी—सब के पीछे वही खड़ा है। मन की कोई भी गतिविधि हो, उसको ताकत कहां से मिल रही है? उसी से। अग्नि, वायु, इंद्र, ये सब मन की अलग-अलग छवियां हैं, मन के अलग-अलग प्रकार हैं। देवता और कुछ नहीं है मानसिक कृतियां ही तो हैं। आगे फिर क्या होता है?

यह 'उसी' का निर्देश है... जैसे विद्युत् का चमकना हो अथवा जैसे पलक का झपक जाना हो, वैसा ही अधिदैव-भाव है।

हर ज़र्रा चमकता है नूर-ए-इलाही से। बिजली का कड़कना, पत्ते-पत्ते का हिलना, घास पर ओस की बूंद का बैठना, दिल की एक-एक धड़कन, सब कुछ कहां से आ रही है? बस उससे। बड़े से बड़ा और छोटे से छोटा, सब का स्रोत क्या है? वही एक।

अब अध्यात्म-भाव यथा इस मन की गति 'उस' (परतत्त्व) को प्राप्त करती प्रतीत होती है एवं तत्पश्चात् उससे चिन्तनगत संकल्प निरन्तर 'उसका’ स्मरण करता है।

विचार वही, जो अपनी सीमा जाने। शब्द वही, जो निशब्द की ओर ले जाए। जैसे कुछ भजन होते हैं जिनमें कहा जाता है कि पांव वही, जो मंदिर तक ले जाए; मुंह वही, जो उसकी वंदना कर सकें। मन के इस पूरे चक्कर-घनचक्कर का आखरी प्रयोजन है वो। हमें ये बात समझ में भले ही नहीं आती है। मन की एक-एक इच्छा उसी की ओर जा रही है। आखरी, अंतिम लक्ष्य है वो। ये बात हमें समझ में नहीं आती। ऐसा लगता है आकर्षण का केंद्र कोई दूसरा है। ऑब्जेक्ट्स है, उनकी ओर जा रही है डिज़ायर। नहीं उनकी ओर नहीं जा रही। उसी आदि की ओर, प्रथम की ओर जा रही है।

प्र: आचार्य जी, क्या इसका मतलब ये है कि वो कह रहा है कि अभी तो आंख खुलेगी ही। कर लो जितना चालूपन करना है, कभी ना कभी तो तुम्हें दिख ही जाएगा। वो ग्रेस होगी कि तुम्हें कब दिखेगा।

आचार्य जी: उसका नाम आगे आ रहा है, पढ़ो।

‘उस' (परतत्त्व) का नाम है ''वह आनन्द'', 'उस आनन्द' के रूप में ही 'उसकी' उपासना करनी चाहिये। जो 'उसे' इस रूप में जानता है सभी प्राणी उसे विशेष रूप से चाहते हैं।

क्या नाम है उसका? आनंद। और हमने क्या कहा था, आनंद क्या है? श्रद्धा। ये जो पूरी बात कही गई है, जो तुम्हारी ईगो वाली एक्टिविटी है, केनोपनिषद वही है पूरा। समर्पित कर दो उसको, और तुम उस आनंद को उपलब्ध हो जाओगे। कौन-सा आनंद है, ये भी नहीं कहा गया है।

प्र: ये भी नेति-नेति का उदाहरण है।

आचार्य जी: हां, वो आनंद। ये इशारा बस: वो आनंद।

प्र: आचार्य जी, एक सुंदर लाइन है - सभी प्राणी उसे विशेष रूप से चाहते हैं।

आचार्य जी: जो ऐसा हो जाता है, वैसा होने के लिए सभी प्राणी उत्सुक रहते है। सभी उसके सामने समर्पित होते है। सभी की कामना है वैसा हो जाने की। अस्तित्व मतलब सभी प्रकार का जीवन।

प्र: हर चीज़ का सार है उस में।

आचार्य जी: पूरी कायनात उस जैसा होने के लिए आतुर है।

तुमने कहा- ''उपनिषद् का प्रवचन कीजिये''; तुम्हारे लिए उपनिषद् का प्रवचन कर दिया है।

निश्चित रूप से यह ब्राह्मी (ब्रह्मज्ञान सम्बन्धी) उपनिषद् है जिसका हमने उपदेश दिया है। उपनिषद् का तात्पर्य है अन्तरज्ञान, वह ज्ञान जो परम सत्य में प्रवेश करता है और उसमें प्रतिष्ठित हो जाता है।

गुरु कह रहा है शिष्य से। शिष्य ने प्रार्थना करी होगी गुरु से, कि आज उपनिषद सुनाओ। तो गुरु ने कहा, "तुमने कहा कि बताओ उपनिषद, तो हमने उपनिषद बता दिया।" लेकिन जो अगली बात है, वो ज्यादा महत्वपूर्ण है: बताया हमने, सुना तुमने, लेकिन है किसका? उसका। तुमने कहा उपनिषद बताओ, हमारे मुख से तुमने उपनिषद सुन लिया, पर कहा हमने, सुना तुमने, है किसका? उसी का। ये बात भूल गए, तो हम बन जाएंगे अग्नि, और तुम बन जाओगे वायु—दोनों बन जाएंगे बेवकूफ।

ब्रह्मविद्या को पाने के लिए तप और दम आवश्यक होते हैं, और निष्काम भाव से कर्म करना चित्र की निर्मलता के लिए आवश्यक होता है।

तप और दम इन दोनों की बात की गई है—तपस्या की और दम की। दम उस अर्थ में दमन नहीं है जिस अर्थ में हम समझते हैं। दम का अर्थ सप्रेशन नहीं है, कुछ और है। उसकी बात किसी और दिन करेंगे। वेदों से भी यहां अर्थ कि नहीं ग्रंथ से नहीं है, वेद से अर्थ है जानना—विद् धातु है। तपस्या और दम आचरण की बात नहीं है, और वेद कोई शास्त्र नहीं है। ये तीनों बहुत आत्मिक बातें है कोई बाहरी चीज नहीं है। बड़ी आत्मिक, अंदरूनी बातें हैं ये—स्वभाव के बातें हैं। तप, दम और वेदना यानी जानना, ये तीनों ही बड़ी अंदरूनी बातें हैं।

जो ब्रह्म विद्या को भलीभांति समझ लेता है, वो समस्त पाप समूह को नष्ट करके, सदा के लिए अनंत, श्रेष्ठ आनंद में प्रतिष्ठित हो जाता है।

पा गया अपना आधार, पा गया अपना स्रोत, जो इस सत्य को जान गया। जो इस सत्य को जान गया, वो अपने आधार को उपलब्ध हो गया, अपनी फाउंडेशन, अपनी बुनियाद को पा गया, अपने स्रोत को—वहीं जहां से शुरुआत हुई थी। पहला प्रश्न यही था ना कि क्या है मेरा स्रोत। जिसने इस सत्य को जान लिया, उसने अपने स्रोत को पा लिया। वो अब अपने स्रोत में डूब गया। जिसने इस सत्य को जान लिया, अब वो अपनी स्त्रोत के साथ एक हो गया। बूंद समुद्र में समा गई।

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