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लेख
क्या पूर्वजन्म के कर्मों का फल इस जन्म में मिलता है? || (2019)
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
16 मिनट
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। ये पूछना था कि मैंने कई बार देखा है कि बचपन में ही छोटे बच्चे बहुत ही गंभीर हालत में बीमारियों में आ जाते हैं अस्पतालों में, कैंसर हो जाता है, बहुत सी अलग-अलग बीमारियाँ हो जाती हैं। सबका कारण यही दिया जाता है कि ये तो पूर्वजन्मों का कर्मफल है, तो इसमें क्या सच्चाई है? आज की वर्तमान बीमारियों का पिछले जन्म के कर्मों से क्या कोई सम्बन्ध है?

आचार्य प्रशांत: इसकी वज़ह ये है कि हमारी मान्यता में एक इन्डिविजुअल-सेल्फ (व्यक्तिगत मैं) बैठा हुआ है। ग़ौर से समझेंगे तभी बात बनेगी। हम ये मानते हैं कि वो जो बच्चा हमारे पास आया है पाँच साल का, उसका कोई व्यक्तिगत 'मैं' है, उसकी कोई व्यक्तिगत सत्ता है, उसका कोई व्यक्तिगत ' आई ' है। हम कहते हैं उसका कोई व्यक्तिगत ' सेल्फ ' है। अगर उसका व्यक्तिगत सेल्फ है तो फिर उस बच्चे के साथ जो कुछ हो रहा होगा उसके लिए वो व्यक्तिगत सेल्फ ही उत्तरदाई होगा।

तो अब हम देखते हैं उस पाँच साल के बच्चे को कैंसर हो गया। तो हम कहते हैं, "इसको कैंसर हुआ है न, इसको कैंसर हुआ है तो कैंसर की वजह भी इसी से संबंधित होनी चाहिए", क्योंकि हम उस बच्चे को एक आइसोलेटेड , डिवाइडेड , इन्डिविजुअल इकाई मान रहे हैं। हम कह रहे हैं इसका एक व्यक्तिगत सेल्फ है। हम कह रहे हैं इसको कैंसर हुआ है तो उसकी वजह भी इसी बच्चे में निहित होगी। कुछ इस बच्चे के अतीत में होगा जिसकी वजह से इसको कैंसर हो गया। तो फिर हम खोजने की कोशिश भी करते हैं कि इसके अतीत में ऐसा क्या है कि इसको कैंसर हो गया। पर पाते हैं कि उसकी ज़िंदगी ही पाँच साल की है तो फिर हम अनुमान लगाते हैं कि कुछ पूर्वजन्म वगैरह का चक्कर होगा, किसी ऋषि महात्मा ने श्राप दे दिया इसलिए ऐसा हो गया।

ये सारा अनुमान हम लगाते रहते हैं अपनी मान्यता को आधार बनाकर और मान्यता ये है कि ये बच्चा और दुनिया का हर आदमी एक व्यक्तिगत सेल्फ रखता है। कि (सामने के दो श्रोता को इंगित करते हुए) ये व्यक्ति है ' आई ' अलग और ये (दूसरा व्यक्ति) अलग है। ये अलग है और ये अलग है तो इसके (पहले के) साथ कुछ हो रहा है तो इसकी ज़िम्मेदारी और इसके (दूसरे के) साथ कुछ हो रहा है तो कारण इसमें निहित होंगे, ठीक?

हम ये नहीं देख पाते कि हम उलझ इसलिए रहे हैं क्योंकि हमने जो मूल मान्यता रखी है वही ग़लत है। व्यक्तिगत सेल्फ है ही नहीं। उस बच्चे के साथ जो हो रहा है उसके लिए वो बच्चा ज़िम्मेदार है ही नहीं क्योंकि बच्चा कुछ है ही नहीं। बच्चा कोई पृथक इकाई है ही नहीं। वो बच्चा और उसके बगल में जो आदमी बैठा है और उसकी माँ और उसका बाप और पूरी दुनिया एक है। अगर वो बच्चा कोई अलग चीज़ होता तो उसके साथ जो घटना घट रही है उसका कोई खास, इन्डिविजुअल , पर्सनल कारण होता।

उस बच्चे के साथ जो घट रहा है वो वास्तव में एक ऐसी घटना है जो पूरी दुनिया के साथ घटी है, दिखाई बस उस बच्चे में दे रही है। तो उसके कारण भी फिर इन्डिविजुलाइज्ड (व्यक्तिगत) नहीं हैं, उसके कारण भी फिर जनरल (सामान्य) हैं। उन कारणों को उस बच्चे में लोकलाइज़ (स्थानीयकरण) करने की कोशिश मत करिए। उसको जो कैंसर हुआ है उसका कारण उस बच्चे में निहित है ही नहीं। ना कारण उस बच्चे में निहित है, ना कैंसर भी उस बच्चे को ही हुआ है। वो एक जनरल कैंसर है जो अभी इसमें दिखाई दे रहा है कहीं और भी दिखाई देगा। पर ये बात हमारी समझ से बाहर जाती है क्योंकि हम तो लिखते हैं पेशेंट्स-नेम (मरीज़ का नाम)। अब पेशेंट्स-नेम हमने लिख दिया अरुण शर्मा, अरुण शर्मा बच्चे का नाम है, तो हमें लगता है इसी को तो हुआ है। ना, वो सबकी बीमारी है और चूँकि वो सबकी बीमारी है इसीलिए उसके जो कारण हैं वो सार्वजनिक हैं। आप उन कारणों को उस बच्चे के अतीत में मत खोजिए।

मैं बताता हूँ उसे क्यों हुआ है कैंसर। उसे कैंसर इसलिए हुआ है क्योंकि चीन की एक फैक्ट्री है जो बहुत ज़्यादा प्रदूषण कर रही है। पूरी पृथ्वी को कैंसर हुआ है चीन की उस फैक्ट्री से, इस बच्चे में दिखाई दे रहा है। अगर आप ढूँढना ही चाहते हैं कि उत्तरदाई कौन है तो हम सब उत्तरदाई हैं। उस बच्चे को कैंसर इसलिए हुआ है क्योंकि आपकी गाड़ी का इंजन ठीक नहीं है, वो प्रदूषण बहुत करता है। उस बच्चे को कैंसर इसलिए हुआ है क्योंकि आसपास के लोग, सब उसके अड़ौसी-पड़ौसी शोर बहुत करते थे। बच्चा जिस घर में रहता था वहाँ वो बचपन से ही ठीक से सो नहीं पाया, स्ट्रेस (तनाव) से हुआ है कैंसर। और अड़ौसी-पड़ौसी शोर क्यों करते थे? क्योंकि समाज ही ऐसा है।

तो बताओ अब ज़िम्मेदार कौन है उसके कैंसर के लिए? पूरी दुनिया ज़िम्मेदार है। पूरी दुनिया ज़िम्मेदार है और कैंसर भी पूरी दुनिया को ही हुआ है। हाँ मरता हुआ दिखेगा एक बच्चा। और हम हैं आँखों के ग़ुलाम, हमें दिखाई देता है एक बच्चा मरा तो हमें लगता है हम बच गए। और कोई मरा है हम बच गए। हमें ये नहीं समझ आता कि जो उसको हो रहा है वही हमको हो रहा है। अध्यात्म का मतलब ही है ये जानना कि हम सब आपस में गुथे हुए हैं। हम इतने गुथे हुए हैं आपस में कि हम सब एक हैं। एक का दर्द एक का ही दर्द नहीं है दूसरे का भी दर्द है। इसीलिए अध्यात्म में सेवा का ख़ास महत्व है। सेवा का मतलब ही होता है कि मैं अपने-आपको दूसरे से प्रथक, दूसरे से जुदा नहीं समझता। जब मैं दूसरे से जुदा नहीं हूँ तो मेरा हित फिर इसी में है कि दूसरे का हित हो अतः सेवा करनी पड़ेगी।

ये बड़ी बचकानी बातें हैं कि आप पाएँ कि एक छह महीने के बच्चे को कैंसर हो गया है तो आप फिर अनुमान लगाएँ कि ज़रूर इसने पिछले जन्म में कुछ पाप करे होंगे जो इसे कैंसर हुआ। ये पिछले जन्म के कोई पाप नहीं हैं, ये इस पूरी दुनिया की हालत है जिसकी वजह से उसको कैंसर हुआ है। उस बच्चे को एक आइसोलेटेड (अलग) इकाई, एक आइसोलेटेड सेल्फ की तरह ना देखो तो सारी बात स्पष्ट हो जाएगी। पर ये आँखें तो सब आइसोलेशन्स (विभिन्नता) को ही देख पाती हैं। ये आँखें देखती हैं तो हर चीज़ बँटी हुई है। जो कुछ बँटा हुआ है उसे ही आँखें देख पाती हैं तो हम सोचते हैं कि हमारी ज़िंदगियाँ भी बँटी हुई हैं, हम सोचते हैं हमारे दुःख-दर्द भी बँटे हुए हैं। ना, एक को जो हो रहा है उसके लिए पूरी दुनिया ज़िम्मेदार है। यहाँ तक कि एक अगर अपने कुकर्मों की भी सज़ा पा रहा है तो वास्तव में उसके लिए भी पूरी दुनिया ज़िम्मेदार है क्योंकि आप एक सही माहौल में कुकर्म कर ही नहीं सकते। अगर एक आदमी भी कुकर्म कर रहा है तो इसका मतलब माहौल खराब था और माहौल खराब था तो कौन ज़िम्मेदार हुआ? सभी।

तो जब पर्सनल सेल्फ (व्यक्तिगत स्व) ही नहीं होता तो पर्सनल रेस्पॉन्सिबिलिटी (व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी) कैसी? और जब पर्सनल रेस्पॉन्सिबिलिटी नहीं होती तो इसका मतलब ये नहीं होता कि अब आप रेस्पॉन्सिबिलिटी (ज़िम्मेदारी) से मुक्त हो गए। पर्सनल रेस्पॉन्सिबिलिटी नहीं है तो अब आपके ऊपर बहुत बड़ी रेस्पॉन्सिबिलिटी आ गई। पर्सनल रेस्पॉन्सिबिलिटी , व्यक्तिगत दायित्व तो बहुत छोटी बात होती है। व्यक्तिगत दायित्व का मतलब होता है, "मैं ज़िम्मेदार हूँ बस अपनी देखभाल के लिए या अपने घर परिवार की देखभाल के लिए।" व्यक्तिगत दायित्व तो बहुत छोटी बात होती है। जब आपको दिखाई देता है कि पर्सन (व्यक्ति) ही झूठा है तो पर्सनल रेस्पॉन्सिबिलिटी भी झूठी ही होगी तो फिर आपका दायित्व, आपकी रेस्पॉन्सिबिलिटी बहुत बढ़ जाती है, अनंत हो जाती है, सबके प्रति हो जाती है।

बच्चे पर किसी तरीके से ये निष्कर्ष लगाकर के आप अपनी ज़िम्मेदारी से मुँह चुरा लेते हैं। जब आपने कहा कि छह महीने के बच्चे को कैंसर इसलिए हुआ है क्योंकि ये पिछले जन्म का पापी था, तो देखिए कितनी आसानी से और कितनी बेईमानी से आपने अपनी ज़िम्मेदारी को पीठ दिखा दी। आप भूल ही गए हैं कि उसको कैंसर इसलिए नहीं हुआ क्योंकि पिछले जन्म का पापी था, उसको कैंसर इसलिए हुआ क्योंकि आपको चिकन (मुर्गा) खाना बहुत पसंद है। और आपका माँसाहार ज़िम्मेदार है बहुत हद तक क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) के लिए और क्लाइमेट चेंज तमाम तरह की बीमारियों को तेजी से बढ़ा रहा है जिसमें कैंसर भी शामिल है। पर ये लगता ही नहीं न। जब आप बैठकर के चिकन चबा रहे होते हो तो आपको ख्याल ही नहीं आता कि आपने कितने लोगों के लिए कैंसर पैदा कर दिया। सिर्फ़ अपने लिए ही नहीं कितने लोगों के लिए। हत्यारे जैसा लगेगा न। दिखाई देगा कि हाथों पर खून लगा हुआ है और वो जो खून है बस उस बेगुनाह जानवर का नहीं है जिसे चबा रहे हो, पूरी मानवता का खून लगा हुआ है तुम्हारे हाथों पर। तो फिर हम कहते हैं, "नहीं-नहीं-नहीं, उस बच्चे ने ही पूर्व जन्म में कुछ पाप किए होंगे जिसकी वज़ह से उसको कैंसर हो गया है।" ना!

तुम जो कुछ करते हो वो पूरी दुनिया से आता है और तुम जो कुछ करते हो उसका असर भी पूरी दुनिया पर पड़ता है। पर्सनल सेल्फ कैसा? पर्सनल सेल्फ ही तो अहं है, ईगो है। उसी का झूठ दिखाने के लिए तो सारा अध्यात्म है।

प्र२: आचार्य जी इन्होंने जो बात कही वही तर्क ज्योतिष शास्त्र देता है लेकिन वो अपने-आपको फिर एक साइंस (विज्ञान) की लैंग्वेज (भाषा) में बता देता है।

आचार्य: जिसे आप ज्योतिष कहते हो ना वो शास्त्र है, ना वो साइंस है।

प्र२: निराधार है न?

आचार्य: नहीं निराधार नहीं है, आधार है न उसका।

प्र२: क्या?

आचार्य: माया, भ्रम, बेवकूफ़ी।

प्र२: आचार्य जी, ऐसी एक घटना हुई थी कि मेरी दीदी की एक बेटी हुई, फिर वो खत्म हो गई। फिर उन पंडित जी ने कहा कि, "आप चिंता मत करो, एक साल बाद लड़का होने वाला है", फिर वो हो भी गया। फिर उन्होंने बड़े घमंड से कहा, "देखो मैंने बोला था न, इसकी कुंडली में लिखा हुआ था।" तो वहाँ पर मुझे कुछ समझ नहीं आया।

आचार्य: बेटा पढ़े-लिखे होने की एक अनिवार्य शर्त ये होती है कि जब तुम बात करोगे प्रोबेबिलिटी की, संभावना की तो वहाँ तुम सिर्फ़ ये नहीं देखोगे कि तुम्हारी बात सही हुई है या ग़लत हुई है। तुम ये देखोगे कि तुमने कितनी बातें बोलीं, उनमें से कितनी सही हुईं। सौ बातें बोलो तो दो-चार तो किसी की भी सही हो जाती हैं। पर तुम कभी वो बातें याद नहीं रखते जो ग़लत निकलीं। जो सही निकल गईं उनको याद भी रख लेते हो और प्रचार भी कर लेते हो।

सिक्का सौ बार उछालोगे तो चालीस-पचास बार तो चित भी पड़ेगा और चालीस-पचास बार तो पट भी पड़ेगा। पर बस तुम वही सब रिकॉर्डिंग करलो जितनी बार पट आया हो और फिर किसी को दिखाओ कि, "देखो जब भी उछाला, पट आया है।" चित दबा ही गए। इसे कहते हैं दुम-दबाके भागना।

ये सब चीज़ें इसलिए प्रचलित होती हैं क्योंकि हममें श्रद्धा नहीं है। जहाँ श्रद्धा नहीं होता वहाँ श्रद्धा की जगह लेता है अंधविश्वास। तो हम जानबूझकर के इस तरह के अंधविश्वासों को प्रोत्साहान देते हैं। बहुत दुःख से कह रहा हूँ पर तथ्य ये है कि आज के समय का निन्यानवे-प्रतिशत धर्म और निन्यानवे-प्रतिशत अध्यात्म सिर्फ़ अंधविश्वास है। ना वो अध्यात्म है, ना वो विज्ञान है, वो कोरा अंधविश्वास है।

प्र४: एक ये भी समाज में मान्यता है कि जो लोग अच्छे कर्म करते हैं या जीवनशैली अपनी अच्छी जीते हैं उनको ज़्यादा दुःख भोगने पड़ते हैं और जो बुरे कर्म करते हैं उनका कुछ नहीं बिगड़ता है। मतलब ये प्रायः सुनने में आता है।

आचार्य: अब सबसे बुरा कर्म तो यही है कि इस तरह की बातें सुन रहे हो। सत्संग में तो सुनी नहीं होंगी ऐसी बातें, कहाँ बैठ रहे हो आजकल? नहीं! बताओ डॉक्टर साहब। इसलिए इतने-इतने दिनों में दर्शन देते हो ताकि उस तरह की बातें सुन सको। मैं तो बोलता नहीं इस तरह की बातें, कहाँ से सुनकर आए और जहाँ से भी सुनकर आए वहाँ बैठे क्यों?

प्र४: मैंने बहुत पहले सुनी, अभी नहीं।

आचार्य: आह! अभी मुझे देखकर याद गई हैं वो बहुत पुरानी बातें?

समझाने वाले बेचारे समझाते ही रह गए कि सम्यक कर्म अपना फल आप होता है। कि आनंद की स्थिति मेंं ही तुम सम्यक कर्म करते हो और जो सम्यक कर्म रहेगा उसका आनंद उत्तरोत्तर वृद्धि पाएगा। समझाने वाले समझाते ही रह गए। यहाँ एक से बढ़कर एक सिद्धान्त विकसित किए जा रहे हैं कि, "नहीं, जो सही काम करेगा वो दुःख पाएगा, जो ग़लत काम करेगा वो सुख पाएगा।" तुम्हें दिख नहीं रहा कि ये सब सिद्धान्त क्यों गढ़े जा रहे हैं और कौन गढ़ रहा होगा? गढ़ ही वे रहे हैं जिनकी रुचि है पाप करने में। और तुम सुन भी रहे हो, और क्यों सुन रहे हो? उन्होंने कहा, तुमने सुना क्यों? तुम वहाँ मौजूद क्यों थे सुनने के लिए?

केला तक तो खाते हो तो छिलका उतारकर खाते हो और बातें किसी की यूँही समूची निगल लेते हो, बिना देखे कि इसमें क्या लगा है। डॉक्टर हैं, बच्चों को समझाते होंगे सब्जी भी पहले रगड़-रगड़ कर धोना, छिलका उतारना, फिर पकाना और बातें कीचड़ मेंं लथपथ हो तो भी खा जाना। ना उनको धोना, ना परखना, ना जाँचना कि कहीं सड़ी तो नहीं है, कहीं इनमें कीड़े-ही-कीड़े तो नहीं लगे हुए, कैसी भी बातें खा लेते हो।

शरीर की बीमारी की चिकित्सा फिर भी आसान है। गंदा पानी पी लिया, ठीक है, दवा दे देंगे बच जाओगे। गंदी वाणी सुन ली, अब तुम्हें कौन बचाएगा? बहुत सतर्क रहो कि कानों से, आँखों से क्या प्रवेश कर रहा है मन में। दूसरों को तो बस यही बताते रह गए कि पानी उबालकर, छानकर पीएँ; और वाणी, वो तो कैसी भी आती रहे सुने जाओ। कान में क्या शब्द पड़ रहा है इसके प्रति बहुत सतर्क रहो। ये धारणा मत रखना कि, "सुनने में क्या जाता है।" जो मूर्खता के सिद्धांत चल रहे हैं बाज़ार में, उनमें एक ये भी है "सुनो सबकी, करो मन की।" जिस भी पगले ने ये दिया है उसे नहीं पता कि सुनना ऐसी चीज़ नहीं होती जिस पर तुम अपना नियंत्रण रख सको। तुम्हें पता भी नहीं चलेगा सुनते-सुनते तुम कब बह जाओगे। तुम तो यही सोच रहे हो कि तुम बड़े अधिकारी हो, बड़े ताक़तवर हो, तुम तो बस सुन रहे हो।

"हम्म, हम्म, अभी हम सुन रहे हैं!"

तुम जो सुन रहे हो वो तुम्हारे मन पर निरंतर कब्ज़ा भी कर रहा है। तुम जो सुन रहे हो वो तुम होते जा रहे हो। इतना आत्मविश्वास मत रखो, ये अति तुम्हें भारी पड़ेगी।

जैसे ऐसा हो नहीं सकता कि तुम प्रदूषित हवा में साँस लो और तुम्हारे फेफड़ों पर असर ना पड़े, वैसे ही ऐसा हो नहीं सकता कि तुम मैली-कुचैली वाणी सुनो और तुम्हारे मन पर असर ना पड़े। असर पड़ेगा। तो ये सिद्धान्त मत बघारो कि सुनो सबकी। जिसकी सुन रहे हो तुम उसके ग़ुलाम होते जा रहे हो। मत सुनो सबकी। और आगे कह देते हैं करो मन की। अरे! मन की नहीं करनी है, रब की करनी है क्योंकि मन तो बनता ही सुनी-सुनाई बातों से है। जब तुम कह रहे हो, "सुनो सबकी करो मन की", तो वास्तव में तुम कह रहे हो, "सुनो सबकी और जो सुना हो वही कर डालो क्योंकि मन तो वही हो गया जैसा सुना उसने।"

या तो उस स्थिति पर पहुँच जाओ जहाँ अब बोध इतना प्रबल हो गया है और श्रद्धा इतनी अटल हो गई है कि कुछ भी सुनोगे तुम्हें कोई फ़र्क ही नहीं पड़ेगा; पर ऐसे तुम हो क्या? कहिए डॉक्टर साहब, ऐसे हो गए हैं क्या? कि हिमालय हो गए, अब कोई हिलाकर दिखा दे हमें; ऐसे हो गए? ऐसे तो हुए नहीं हो। तुम तो उल्टी-पुल्टि सुनोगे तो मन में पचास तरीके के विकार आ जाएँगे, तो मत सुनो अभी।

प्र५: आचार्य जी आपने बताया कि हम सब एक हैं तो हमें अनेकता क्यों दिखाई पड़ती है?

आचार्य: जिसे अनेकता दिखाई पड़ती है वही तो दुःख भोगता है। वो कहता है, "हम सब अलग-अलग हैं तो मेरा पड़ोसी भले ही तड़प रहा हो, मैं तो सुखी रह सकता हूँ क्योंकि हम सब अलग हैं। जब अलग हैं तो माने इसकी स्थिति अलग है और मेरी स्थिति अलग है तो वो तड़प भी रहा है तो क्या फ़र्क पड़ता है, मैं मज़े में रह सकता हूँ।"

अध्यात्म इस अनेकता को ख़त्म करने के लिए है। अध्यात्म उसी को शांति देने के लिए है, ख़त्म करने के लिए है जो अपने-आपको सबसे पृथक समझता है। उसका नाम है अहम्। वो कहता है: अहम्। अहम् माने ये (शरीर), ये जो हाड़-माँस का बोरा है। खाल का बोरा, उसमें भीतर भर दी गई है माँस, इसका नाम है अहम्। अहम् कहता है, "ये मैं हूँ और इसके बाहर जो कुछ है वो पराया है, पृथक है।" इसी अहम् के इलाज के लिए अध्यात्म होता है क्योंकि ये अहम् पगला है, इसकी मूल धारणा ही ग़लत है।

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