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कृष्ण कौन हैं? अर्जुन कौन हैं? कृष्ण आपके पास कब आते है?
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
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आचार्य प्रशांत: श्रीमद्भगवद्गीता चौथा अध्याय, ज्ञानयोग, प्रथम श्लोक।

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत।।४.१।।

श्री कृष्ण कहते हैं कि मैंने इस योग को कभी विवस्वान (सूर्य) से कहा था, सूर्य ने फिर अपने पुत्र मनु से कहा था और मनु ने फिर इक्ष्वाकु को बताया था।

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक १

कृष्ण कहते हैं, ‘मैंने इस अव्यय — अव्यय अर्थात् जो नष्ट नहीं होता — मैंने इस योग को कभी विवस्वान से, माने सूर्य से कहा था। सूर्य ने फिर अपने पुत्र मनु से कहा था और मनु ने फिर इक्ष्वाकु को बताया था।’

विचित्र बात है! ऐसा लग रहा है जैसे समय की धारा में कोई ऐतिहासिक सी बात बतायी जा रही हो। मैंने उसको बताया, उसने उसको बताया, उसने उसको बताया।

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। स कालेनेह महता योगो नष्ट: परन्तप।।४.२।।

और इस तरह परम्परा से ये जो मेरी बात है, यह बात राजा, ऋषि और विद्वान जानते रहे, ज्ञान की एक परम्परा चलती रही लेकिन अभी इस लोक में मेरी वो बात, वो योग नष्ट हो गया है।

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक २

और इस तरह परम्परा से ये जो मेरी बात है, ये बात राजा और ऋषि और विद्वान जानते रहे। राजा, ऋषि, विद्वान ये लोग ये बात जानते रहे, एक-दूसरे को बताते रहे। एक इसको बताता रहा, इसको बताता रहा, इस तरह ज्ञान की एक परम्परा चलती रही। लेकिन अभी इस लोक में मेरी वो बात, वो योग नष्ट हो गया है। ये दूसरा श्लोक है।

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः। भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्योतदुत्तमम्।।४.३।।

लेकिन तुम मेरे भक्त हो और सखा हो और इसलिए वो जो पुरातन योग है आज मैं तुम्हें बता रहा हूँ। क्योंकि यही मेरी बात उत्तम गुप्त रहस्य माने मूल तत्व है।

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ३

“लेकिन तुम मेरे भक्त हो और सखा हो और इसलिए वो जो पुरातन योग है आज मैं तुम्हें बता रहा हूँ। क्योंकि यही मेरी बात उत्तम गुप्त रहस्य माने मूल तत्व है।”ठीक है?

तो ये पहले तीन श्लोकों में क्या कह गये कृष्ण? कह रहे हैं, ‘देखो, मैंने ही बताया था विवस्वान को। उसने बता दिया था मनु को, उसने बता दिया इक्ष्वाकु को और फिर इस तरह से परम्परा के सूत्र से ये बात आगे राजाओं, ऋषियों, विद्वानों में आगे बढ़ती रही। पर आज-कल खो सी गयी है। आज-कल खो गयी है लेकिन तुम मेरे मित्र हो और भक्त हो, देखो! मैं तुम्हें बताये देता हूँ क्योंकि बात ये सबसे ऊँची है।’

अब मित्र को कोई नीची बात तो बतायी नहीं जाएगी। तो ‘अर्जुन! जो सबसे ऊँची बात है, जो उत्तम रहस्य है, उसका मैं तुमको वर्णन कर रहा हूँ।’ ये क्या कह रहे हैं कृष्ण? आगे खुलेगा। अर्जुन प्रश्न पूछेंगे, उसके उत्तर में कृष्ण स्वयं ही समझा देंगे कि क्या कह रहे हैं। तो अर्जुन क्या पूछ बैठते हैं? अर्जुन कह रहे हैं, ‘लेकिन आप तो अभी पैदा हुए हैं।’ मैं श्लोक पढ़े देता हूँ।

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः। कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति।।४.४।।

अर्जुन कहते हैं - लेकिन आपका जन्म तो बाद में और सूर्य बहुत पहले से है। तो ये मैं कैसे मान लूँ कि आप जो अभी सामने हैं, आपने सूर्य को उपदेश दिया था?

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ४

अर्जुन कहते हैं, 'लेकिन आपका जन्म तो बाद में और सूर्य बहुत पहले से है। तो ये मैं कैसे मान लूँ कि आप जो अभी सामने हैं, आपने सूर्य को उपदेश दिया था?' अब कृष्ण क्या बोल गये? 'मैं ही हूँ जिसने आज तक सबको बताया है। ज्ञान की ये जो पूरी परम्परा चल रही है, धारा चल रही है, इसने इसको बताया, इसने इसको बताया, इसने इसको बताया, उसका उद्गम मुझसे है। उसका आदि कारण मैं हूँ। और फिर आगे लोग एक-दूसरे को बताते रहे। और बताते-बताते हुए प्रकृति की धारा बह रही थी, वो सूख भी गयी। सूख गयी, कोई बात नहीं। मैंने तब शुरू करी थी, मैं दोबारा शुरू करे दे रहा हूँ। लो, अर्जुन तुम्हें मैं फिर बताये दे रहा हूँ। तब भी किसने बताया था? मैंने ही बताया था। फिर वहाँ से बात चलती रही। बहुत शताब्दियों तक चली। फिर संयोग ऐसे बने कि वो जो ज्ञान है, वो विलुप्त हो गया। तब भी मैंने आरम्भ करा था, अब मैं फिर आरम्भ कर रहा हूँ। तुम्हें बता रहा हूँ, तुम व्यक्ति बढ़िया हो। रहस्य उत्तम है, और तुम सुपात्र हो इस ज्ञान को प्राप्त करने के, तो तुम्हें मैं ये ज्ञान दे रहा हूँ।’

तो अर्जुन चकरा गये। बोले, ‘ये क्या बोल दिया? आप तो मेरे साथ खाने-खेलने वाले। हम दोनों साथ जाते हैं, टहलते हैं, जंगल घूमते हैं।’ अब अर्जुन की दृष्टि में कृष्ण कौन हैं? कह रहे हैं, ‘देखो! ये जब सुभद्रा हरण करना था, तो इन्होंने बिलकुल मेरे दोस्त की तरह, मित्र की तरह मेरी सहायता करी थी। ये तो मेरे बिलकुल समकक्षी हैं न! मेरे ही जैसे हैं।'

ये बातें मित्रों में चलती हैं न! भई, एक मित्र का प्रेम-प्रसंग है, उसमें दूसरा आकर के सहायक हो जाता है। जब दूसरा सहायक हो जाता है तो उसको मित्र की तरह ही देखा जाता है। कहते हैं, ‘बड़ा घनिष्ठ मित्र है।’ उसको भगवान की तरह थोड़े ही देखने लगते हो? घनिष्ट मित्र हो गया। और मित्रता जितनी गहरी होती जाती है, मित्र से तादात्म्य उतना बढ़ता है। आप मित्र को बिलकुल अपनी छवि में देखना शुरू कर देते हो। आप कहते हो, ‘मैं और ये अभिन्न हैं।’ अभिन्न हैं, तो मतलब अब अन्तर नहीं है। अन्तर नहीं है, तो फिर वो भगवान कैसे हो सकता है? क्योंकि आप तो भगवान हो नहीं।

अब अर्जुन का इसलिए सिर चकरा रहा है। अर्जुन कह रहे हैं कि ये क्या बोल रहे हैं आप कि आपने जाकर के सूर्य को बताया था, ये सब किया था। अरे! मैं आपकी उम्र जानता हूँ। मुझे अपनी उम्र पता है, और मुझसे पाँच साल ऊपर-नीचे आपकी उम्र है। और आप बोल रहे हो मैंने ये किया, मैंने वो किया। क्या हो गया है? मैं कैसे मान लूँ इस बात को?

हम जैसे होते हैं, सामने कोई भी खड़ा हो, हम उसको वैसे ही देखना शुरू कर देते हैं। तो अर्जुन भी कृष्ण को कैसे देख रहे हैं? कि ये मेरे सम्बन्धी हैं, रक्त-सम्बन्ध भी था। और मेरे सखा हैं क्योंकि दोनों का व्यवहार आपस में मित्र का रहता था। कृष्ण गीता घटित होने से पहले तक अर्जुन के गुरु बने नहीं थे पूर्ण, सखा ही थे।

तो कृष्ण मुस्कुरा रहे हैं। अर्जुन ने प्रश्न ही ऐसा पूछा है कि आप कैसे गये थे सूर्य को उपदेश देने, ‘कब की घटनाएँ बता रहे हो, हज़ार साल पहले की! यहाँ सामने खड़े होकर कह रहे हो हज़ार साल पहले वाले को मैं बताकर आया हूँ। कैसे किया?’ तो देखिएगा, अभी कृष्ण का चेहरा देखिएगा, जब उनसे ऐसा प्रश्न किया जाएगा तो क्या बोलेंगे।

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।।४.५।।

श्रीकृष्ण कहते हैं, हे अर्जुन! मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म बीत गये हैं, मैं उन सबको जानता हूँ, तुम नहीं जानते।

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ५

तो बोलते हैं, 'बेटा अर्जुन! पार्थ! तुम जानते नहीं, पर मेरे और तुम्हारे न जाने कितने जन्म बीत चुके हैं। अन्तर बस ये है कि तुम अपनेआप को समय की धारा में, एक सीमित कालखंड में देखते हो। तुम कहते हो, अर्जुन वो हैं जो इस विशेष क्षण में पैदा हुआ और एक दूसरे विशेष क्षण में मर जाएगा। तो पूरी धारा बह रही है उसमें तुमने इतना सा उसका एक हिस्सा, एक खंड पकड़ लिया और उसको क्या नाम दे दिया है? ये अर्जुन का जीवन काल है। ठीक है? इस दिन, इस माह, इस पल जन्म लिया और इस दिन, इस माह, इस पल विदा हो गया।’

‘तो तुम अपनेआप को ये जानते हो, ये तुम्हारा अज्ञान है। मैं अपनेआप को कुछ और जानता हूँ। मैं आत्मज्ञानी हूँ। मैं नहीं कह रहा हूँ कि प्रकृति की धारा में मेरा कुल इतना सा अस्तित्व है। मैं वो हूँ जो प्रकृति की धारा के पार खड़ा हुआ है। मैं वो देह नहीं हूँ अर्जुन, जो तुम देख रहे हो अभी। और तुम्हारी दृष्टि से देखूँ तो तुमने ठीक ही कहा, पार्थ! ये जो देह अभी तुम्हारे सामने है जिसको एक दिन मृत्यु आ ही जानी है, ये देह नहीं गयी थी विवस्वान को उपदेश देने। तो अपनी जगह तुम बिलकुल ठीक कह रहे हो, अर्जुन। ये देह नहीं गयी थी इस सूर्य को उपदेश देने।’

तो फिर कौन गया था?

‘ये देह तो वैसी ही है जैसे तुम्हारी है। लेकिन मैं ये देह नहीं हूँ। तुम तुम्हारी देह हो क्योंकि तुममें देहभाव है। मैं कौन हूँ? ये प्रकृति की धारा बह रही है, मैं उस धारा के किनारे खड़ा हुआ हूँ। मैं उस धारा से अलग खड़ा हुआ हूँ। मैं बोधमात्र हूँ। मैं सत्य मात्र हूँ।’

‘जो भी व्यक्ति आज तक ऐसा रहा है जो देहभाव नहीं बोधभाव में जीता है, वो मैं हूँ अर्जुन। तो मैं तब भी था, मैं आज भी हूँ और आने वाले समय में भी मैं रहूँगा। हाँ, तब भी मेरे पास वो देह नहीं थी जो तुम देख रहे हो, अर्जुन। और आने वाले समय में भी मेरे पास वो देह नहीं होगी जो अभी आज अपने सामने तुम देख रहे हो। देह बदलती रहेंगी, बोध कैसे बदल जाएगा, बोध तो एक ही है न!’

तो सूर्य को जिस बोध ने उपदेश दिया था, उसका नाम कृष्ण है। कृष्ण ने अपनी पहचान बता दी। कृष्ण कौन हैं, कृष्ण ने बता दिया। इन्हीं चार श्लोकों में बता दिया। कृष्ण वो देह नहीं हैं जो मोर-पंख धारण करती है, जो मुरली धारण करती है, वो देह नहीं हैं कृष्ण। कृष्ण कौन हैं? कृष्ण वो बोध हैं जो कालातीत है, जो जगत की उत्पत्ति के समय भी था। ‘सूर्य को उपदेश देने से आशय यही है कि जब जगत उत्पन्न हुआ था, उस पहले क्षण में भी जो बोध था, वो मैं हूँ।’

आज वो बोध एक विशिष्ट रूप लेकर तुम्हारे सामने खड़ा हुआ है। उस विशिष्ट रूप का नाम है माधव, केशव, मधुसूदन। तब उसका नाम कुछ और रहा होगा पर वो भी कृष्ण ही था। हर वो व्यक्ति कृष्ण है जो बोध में जी रहा है। अर्जुन के सामने जो कृष्ण खड़े हुए हैं, वो कृष्ण का बस एक विशेष रूप है। ये उत्तर है।

कृष्ण कौन है? अर्जुन के सामने जो कृष्ण खड़े हुए हैं, वो कृष्ण का एक विशेष रूप है। वो रूप तो चला जाएगा। जैसे अर्जुन की देह मरनी है वैसे ही कृष्ण की वो विशेष देह भी मरेगी। मरी थी न? हाँ, आप जिनको कृष्ण कहते हैं, वो कृष्ण के अनन्त रूपों में एक रूप है जो अर्जुन के सामने था। फिर से समझिए। हम जिनको कृष्ण कहते हैं, वो कृष्ण के अनन्त रूपों में एक रूप है जो अर्जुन ने देखा। मोर मुकुट वाले कृष्ण, वो कृष्ण का एक रूप है।

और कृष्ण अपने बारे में क्या कह रहे हैं, कि मैं वही रूप हूँ पार्थ जिसको तुम देख रहे हो? ‘अर्जुन! तुम मुझे नहीं जानते। मैं वो रूप मात्र नहीं हूँ जो तुम्हें दिख रहा है। मैं वो हूँ जो रूप से कहीं आगे का है। मैं बोध मात्र हूँ। मैं बोध मात्र हूँ, इसका क्या प्रमाण? मैंने बोध दिया।’ अभी तो बता रहे था पिछले श्लोक में, 'मैं वो हूँ जिसने ये उत्तम रहस्य विवस्वान को दिया था।’

तो कृष्ण कौन हैं? जो बोध दे सके। अब बोध देने के लिए सबसे पहले बोध होना चाहिए, तो कृष्ण बोध स्वरूप हैं। यही गीताज्ञान है। गीता में स्वयं कृष्ण अपनी पहचान उजागर कर देते हैं। इसके बाद संशय की कोई सम्भावना नहीं। किसी भी तरह के भ्रम में कभी पड़िएगा मत।

मान लीजिए एक बार को कल्पना करके कि सूर्य कोई व्यक्ति है। ठीक? महाभारत काल से एक हज़ार साल पहले का कोई व्यक्ति है सूर्य। और मान लीजिए वो जो व्यक्ति है सूर्य, उसको किसी कृष्ण नामक व्यक्ति ने उपदेश दिया, वही ज्ञान जो गीता में है। यही तो उपदेश देंगे। कृष्ण जब भी उपदेश देंगे, गीता ही बताएँगे और क्या बताएँगे! तो गीता का उपदेश हज़ार साल पहले सूर्य को दिया गया। वो जो कृष्ण होगा, वो कैसा दिखता होगा? विवस्वान के सामने जो कृष्ण खड़े हैं, वो कैसे दिखते होंगे? वो कैसे दिखते होंगे? और कृष्ण स्वयं बोल रहे हैं, ‘मैं ही हूँ वो जिसने हज़ार साल पहले भी विवस्वान को उपदेश दिया था।’

अगर विवस्वान कोई व्यक्ति है और उसको उपदेश दिया गया है, तो उस व्यक्ति के सामने जो कृष्ण खड़े होंगे, वो कैसे दिखते होंगे? कैसे दिखते होंगे? मुरली होगी? मुकुट होगा?

श्रोता: नहीं।

आचार्य: यही भाषा होगी? यही भाव होंगे? क्या यही प्रकृति होगी?

श्रोता: नहीं।

आचार्य: बिलकुल भिन्न होंगे न? पर फिर भी वो कृष्ण होंगे। क्यों होंगे कृष्ण? क्योंकि बोध है।

रूप-रंग पर मत चले जाइएगा। बात व्यक्तित्व की नहीं है, बात चेहरे की नहीं है, शरीर की नहीं है। बात बोध की है। कृष्ण ने बता दिया, ‘तुम अर्जुन समझते नहीं क्योंकि तुम्हारा वास्ता सिर्फ़ और सिर्फ़ पड़ता है देह से।’ ये बात वो अर्जुन को नहीं समझा रहे, ये बात आप सब अर्जुनों को समझा रहे हैं कि तुम मुझे भी बस एक चेहरा माने बैठे हो। ‘अरे! मैं चेहरा नहीं हूँ, बाबा। मैं चेहरे से बहुत आगे का हूँ। मेरे न जाने कितने चेहरे हो चुके हैं!’

‘हर बोधवान चेतना का चेहरा, हर प्रबुद्ध चेहरा मेरा ही चेहरा है, अर्जुन। और चेहरे तो सब प्रकृति पर आश्रित होते हैं। आज मैं एक चेहरा लिये हुए हूँ, ये प्रकृति की देन है, कल मैं दूसरा चेहरा ले लूँगा। तुम मेरे इसी चेहरे पर रुक मत जाना। अर्जुन, तुम्हारा सौभाग्य है तुम्हें ये चेहरा मिला। आने वाली पीढ़ियों को वो चेहरा नहीं मिल सकता जो अर्जुन को मिला था। आने वाली पीढ़ियों को चेहरा दूसरा ही मिलेगा। ठीक वैसे जैसे विवस्वान को चेहरा दूसरा ही मिला था। पर वो कृष्ण ही थे जिन्होंने विवस्वान को भी उपदेश दिया था। और वो कृष्ण ही होंगे आगे भी जो कभी भी कोई सही उपदेश दे पायें।’

ये कृष्ण की पहचान है — न देह, न रूप, न नाम, न काल, न गुण। बोध मात्र, बोध मात्र, बोध मात्र।

समझ में आ गयी बात? कभी भी संशय हो कृष्ण कौन हैं, तो चौथे अध्याय के इन आरम्भिक श्लोकों पर वापस आ जाइएगा। स्पष्ट हो रही है बात?

प्रकृति की धारा में चेहरे उठते हैं और गिरते हैं। हर चेहरे को हम हर एक चेतना भी बोल सकते हैं। ठीक? सब साथ चल रहे हैं? प्रकृति की धारा में चेहरे उठते हैं, गिरते हैं। अब मैं चेहरे के लिए दूसरा शब्द प्रयोग करूँगा — चेतना। क्योंकि हर चेहरा क्या है? चेतना। प्रकृति की धारा में चेतना उठी। उसी चेतना को तुम चेहरा बोल देते हो, व्यक्ति बोल देते हो। प्रकृति की धारा में चेतना उठी — क्योंकि जन्म हुआ भई, बच्चा पैदा हुआ — प्रकृति की धारा में चेतना उठी और फिर गिर गयी। चेतना आयी, चेतना गयी। चेतना आयी, चेतना गयी।

चेतना का एक दूसरा नाम है जो बार-बार बताता हूँ क्या? ‘च’ से ही शुरू होता है। चेतना का ही एक दूसरा नाम है जो ‘च’ से शुरू होता है। अरे, बोलिए (श्रोता से पूछते हुए)।

श्रोता: चैतन्य।

आचार्य: चैतन्य! (नकारते हुए) हिन्दी का संस्कृत बना दोगे, तो कुछ और हो जाएगा?

‘चुनाव’। चेतना वो जो चुने। जो चुन नहीं सकता वो चैतन्य नहीं है। चेतना उठी प्रकृति की अनन्त धारा में। समय की धारा माने प्रकृति की धारा। प्रकृति की धारा बह रही है, उसमें एक चेतना उठी, माने एक बच्चा पैदा हुआ। बस इतनी सी बात। चेतना उठी माने कुछ ऐसा नहीं हो गया दैवीय। अब वो चुन सकती है।

दो ही चुनाव हैं जो करे जा सकते हैं। एक ये कि ये जो धारा बह रही है, इसमें बड़ा मज़ा आ रहा है, डूबेंगे, उतराएँगे, छपक-छपक करेंगे पानी में। धार बह रही है। बच्चा पैदा हुआ, उसको बड़ा मज़ा रहा है। क्या करने में? छप-छप-छप-छप। यही हम सब जीवन भर करते रह जाते हैं। क्या? ये जो जीवन की नदी बह रही है, इसमें छप-छप-छप-छप और ये करते-करते एक दिन उसी में डूब मरते हैं।

तो चेतना उठी और चेतना गिर गयी। काहे कि उठे इसलिए थे कि नदी से पार निकल जाओ लेकिन बच्चे की बालक बुद्धि! करने क्या लग गये? छप-छप-छप-छप! और उसी में फिर डूब मरे। ये आम अंजाम है।

वही चेतना ये चुनाव भी कर सकती है कि वो तटस्थ हो जाए। वो धार छोड़कर तट पर लग जाए।

अगर वो धार के बीचों-बीच रहेगी, तो वो अर्जुन रहेगी। और जितने भी सब धार में हैं, उन सबका एक साझा नाम हो गया 'अर्जुन’। और अगर वो तट पर लग गयी, तो उसका साझा नाम हो गया 'कृष्ण’। तो बस दो ही वास्तविकताएँ हैं — एक अर्जुन की और एक कृष्ण की। जो धार में फँसा हुआ है, उसका नाम अर्जुन। जो किनारे लग गया उसका नाम कृष्ण।

हाँ, जो किनारे लग गया है, याद रखना, उसका कोई चेहरा नहीं है। बताओ क्यों? क्योंकि सारे चेहरे तो?

श्रोतागण: धार में हैं।

आचार्य: धार में हैं। और वो कहाँ लग गया?

श्रोतागण: किनारे। तो उसका कोई चेहरा बचा क्या? इसी को ऐसे भी कह सकते हैं कि धार में उसके अब अनन्त चेहरे हो गये। उसका कोई चेहरा नहीं बचा। चेहरे तो सब धार में थे। चेहरे छोड़कर वो किनारे लग गया। उसका चेहरा कहाँ हैं अब! तो एक चेहरे को कृष्ण मत समझ लेना।

या अगर तुम्हें चेहरे को ही कृष्ण समझना है तो ये भी याद रखना कि कृष्ण का एक चेहरा नहीं होता। या तो ये मान लो कि कृष्ण का कोई चेहरा नहीं होता या ये मान लो कि कृष्ण के कई चेहरे हो सकते हैं। पर ये मत समझ लेना कि कृष्ण का चेहरा होता है और सिर्फ़ एक चेहरा होता है। वो भूल हो जाएगी। बात समझ में आ रही है?

बेहतर तो यही है कि कह दो कि कोई चेहरा नहीं होता। निराकार है, अरूप है, अरूप। कोई रूप नहीं है उनका। पर हमारे लिए ये कहना मुश्किल होता है, क्योंकि भैया, हम तो साकार हैं, हम तो सरूप हैं। तो ये निराकार, अरूप क्या होता है? ये ज़रा हमें समझ नहीं आता। तो फिर ये कह दो कि बोध का जो भी रूप है, वो कृष्ण का रूप है। जहाँ कहीं भी बोध है, वो जो भी रूप धरे हुए है, वो कृष्ण का ही रूप है।

और वही बात कृष्ण यहाँ कह रहे हैं। कह रहे हैं, 'अर्जुन! मेरे और तुम्हारे बहुत जन्म हो चुके हैं। क्योंकि बोध एक रूप में नहीं, न जाने कितने रूपों में सामने आया है। समय की धार है। गीता बताने वाला कोई मैं पहला थोड़े ही हूँ। विवस्वान को भी किसी ने गीता बतायी थी न। जिसने भी बतायी थी, उसी का नाम कृष्ण है। किसी को किसी ने पहले कुछ समझाया था असली बात, जब भी किसी ने किसी को कोई असली बात समझायी, कृष्ण ने अर्जुन को ही समझायी।

तो कृष्ण और अर्जुन विशिष्ट व्यक्तित्व नहीं हैं। स्पेसिफिक पर्सनैलिटिज़ (विशेष व्यक्तित्व) नहीं हैं। जो भी समझाये वो?

श्रोतागण: कृष्ण।

आचार्य: जो समझे वो?

श्रोतागण: अर्जुन।

आचार्य: बस ये बात। कुल इतनी बात। कृष्ण का परिचय मिल गया? मिल गया? ठीक। आगे और साफ़ करे देते हैं। छठा श्लोक।

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया।।४.६।।

मैं जन्म रहित, मैं अविनाशी, मैं अव्यय आत्मा हूँ। मैं वो हूँ जो मिट नहीं सकता। बीतने का सारा कार्यक्रम तो यहाँ चल रहा है प्रकृति की धारा में। यहाँ तो सब बीते ही जा रहा है।

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ६

“मैं जन्म रहित हूँ।” मैं जन्म रहित क्यों हूँ, अब जल्दी से बताइएगा। क्योंकि जन्म और मृत्यु दोनों कहाँ होते हैं?

श्रोतागण: प्रकृति में।

आचार्य: प्रकृति की धारा में। और एक चेतना होती है जो चुनाव कर लेती है कि मुझे तो?

श्रोतागण: प्रकृति के पार जाना है।

आचार्य: तो अब उसका जन्म होगा? उसकी मृत्यु हो सकती है? जन्म व मृत्यु तो दोनों धार में चल रहे हैं। वो बाहर जाकर बैठ गया। उसका कुछ नहीं होता अब। “कहे कबीर सत्य वो पथ है जहाँ कोई वापस आता नहीं।” एक बार बाहर निकल गये, फिर वापस आते नहीं।

“मैं जन्म रहित, मैं अविनाशी।” जब जन्म नहीं हो रहा, तो मरोगे कैसे, अविनाशी हो गये। “मैं अव्यय आत्मा हूँ। मैं वो हूँ जो मिट नहीं सकता।” व्यय होना माने बीत जाना, ख़त्म हो जाना। मैं बीत नहीं सकता। बीतने का सारा कार्यक्रम तो यहाँ चल रहा है, प्रकृति की धारा में। यहाँ तो सब बीते ही जा रहे हैं।

“मैं सब भूतों का माने सब प्राणियों का नियामक ईश्वर होने पर भी अपनी ही प्रकृति का आश्रय लेकर के, अपनी माया के द्वारा जन्मग्रहण करता हूँ।” मैं ही हूँ जिससे ये धार चलती है। और जिससे ये धार चलती है, वो स्वयं उस धार में कभी-कभी प्रकट हो जाता है। 'ये मेरी माया है।’

भई, हमने अभी तक बात करी प्रकृति की धारा बह रही है। क्यों बह रही है? अगर सत्य सिर्फ़ एक है, तो ये दूसरा वाला कहाँ से आ गया? जो तट पर बैठा है, वो तो सत्य है — अव्यय, नित्य, सत्य। तो ये दूसरी चीज़ कहाँ से आ गयी? लेकिन हम तो कह रहे हैं दोनों हैं। हम कह रहे हैं सत्य है जो तट पर बैठा है और प्रकृति है उस धारा में। अगर एक ही सत्य हो सकता है, नॉन-डुअल है, अद्वैत है, तो ये दूसरे की जगह कहाँ से बन गयी? ये प्रकृति कहाँ से आयी?

एक ही तरीक़ा हो सकता है। क्या तरीक़ा? वो जो पहला है, उसी से आयी। क्योंकि सत्य दो तो हो नहीं सकते। तो अगर प्रकृति है — प्रकृति को ही माया कहते हैं — तो अगर प्रकृति है, तो कहाँ से आ गयी? वो उसी से आयी होगी, जो तट पर बैठा है। वो तट पर ही नहीं बैठा है, वो ऊपर आदि पर भी बैठा है। ये जो गंगा बह रही हैं, उसकी गंगोत्री पर भी वही बैठा है। वो गंगा के तट पर बैठा है बनारस में। और वहाँ ऊपर भी बैठा हुआ है। जैसे शिव, वो दो जगह पाये जाते हैं। कहाँ? वो तट पर मिलते हैं वाराणसी में और ऊपर मिलते हैं वहाँ जहाँ से गंगा फूट रही हैं।

तो बात को समझिए। क्या मतलब है? गंगा उनसे फूट भी रही हैं, उनकी जटाओं से। ये सब संकेत हैं, बड़े प्यारे प्रतीक हैं, समझना होता है। वही हैं जिनकी जटाओं से गंगा फूट भी रही है। गंगा माने किसकी धारा?

श्रोतागण: प्रकृति की धारा।

आचार्य: प्रकृति की धारा। तो उन्हीं से प्रकृति की धारा उद्भूत भी है और उसी धारा के किनारे वो वहाँ जाकर बैठ गये हैं। कहाँ? काशी में। ये क्या हुआ! तुम से आ रही है, तो तुम वहाँ कैसे पहुँचे? तुम तो ऊपर थे। यहाँ नीचे कैसे आये? बोले, 'यही तो है मेरा। ऐसा ही करता हूँ। मुझसे ही निकल रही है और मैं ही इसमें डुबकी मारने पहुँच जाता हूँ। क्यों? मेरी मर्ज़ी।' माया और किसको बोलते हैं?

'मैं वो हूँ जिसने सबकुछ रचा है। ये पूरा खेल चलाने वाला मैं हूँ। खेल माने धार, उसी धार में सारा खेल चल रहा है न। ये जो पूरी धार है, इसका स्रोत में हूँ। और कभी-कभार इस धार के बीचों-बीच भी मैं पाया जाता हूँ। ठीक वैसे जैसे इस कुरुक्षेत्र के बीच भी देखो मैं पाया जा रहा हूँ। ये कुरुक्षेत्र अगर शतरंज का मैदान है, तो इन सारे मोहरों को चलाने वाला भी मैं हूँ और उन मोहरों में एक मोहरा भी मैं स्वयं बन गया। लो, सारथी बनकर मैं भी खड़ा हो गया।' जैसे आप शतरंज खेल रहे हों और मोहरों में एक मोहरा आप स्वयं हो।

ये कुछ समझ में आ रही है बात? ये नहीं समझ में आ रही।

जन्म और मरण दोनों किसमें होंगे? जब समय शुरू होगा, जब समय शुरू होगा तभी तो। कुछ तो होगा न जो समय की श्रृंखला के पीछे होगा। समय किसको बोलते हो? एकदम मूल में जाना पड़ेगा। समय माने क्या? जहाँ घटनाएँ घटे, उसको समय कहते हैं। जहाँ कुछ परिवर्तित हो, उसको समय कहते हैं। ठीक। कुछ परिवर्तित न हो, तो कहोगे क्या कि समय बीत रहा है? अभी जैसा है, दो घंटे बाद भी सबकुछ ही वैसा रहे, तो क्या कहोगे कि समय बीता? समय बीतने के लिए परिवर्तन आवश्यक है। परिवर्तन को ही नापने के लिए समय नाम की व्यवस्था है। ठीक?

परिवर्तन तभी होता है जब परिवर्तित करने वाला कोई हो, कार्य-कारण, *कोजैलिटी*। वरना परिवर्तन नहीं हो सकता। अभी ये रूमाल यहाँ रखा है, परिवर्तित हो गयी इसकी जगह (रूमाल को एक जगह से दूसरी जगह पर हटाते हुए)। कैसे हुई? कोई कारण था। वापस पहुँच गयी (उसी जगह पर वापस रखते हुए), कोई कारण था। ठीक? तो प्रकृति की धारा का मतलब होता है कार्य-कारण की धारा, कॉजेशन की धारा। अच्छा, ठीक है।

तो आ जाते हैं फिर थोड़ा कारण तलाशने पर। हम जानना चाहते हैं कि ये धारा आयी कहाँ से। आप हैं, आपका कारण क्या है होने का? आप क्यों है? कारण बताइए। अरे! क्यों बहुत खुफ़िया कारण खोज रहे हो, सीधे बोलो न, माँ-बाप थे हमारे इसलिए हम हैं। आप हैं, पर आप तो अपनेआप को देह मानते हैं, उस देह का कारण क्या है?

श्रोतागण: माँ-बाप।

आचार्य: माँ-बाप। ठीक है। अरे! मैं समझाने के लिए एक उदाहरण निर्मित कर रहा हूँ, मेरा साथ दीजिए न। मुझे भी पता है कि इधर-उधर इसमें बहुत खोट हैं लेकिन साथ देंगे, तो समझ में आएगी बात।

तो आप हैं क्योंकि माँ-बाप हैं। उनका क्या कारण है?

श्रोतागण: उनके माँ-बाप।

आचार्य: हम कार्य-कारण की श्रृंखला में पीछे जा रहे हैं। हम जानना चाहते हैं कि आदि कारण क्या है। उनका क्या कारण है? उनका क्या कारण है? तो ये तो चलता ही रहेगा ऐसे। कोई तो बिन्दु होगा जहाँ किसी की कोई माँ नहीं, किसी का कोई बाप नहीं? हाँ, तो वो जिसकी कोई माँ नहीं, जिसका कोई बाप नहीं, जो बस अकारण है, जो इसलिए है क्योंकि वो है। उसको सत्य बोलते हैं। उसी को शिव या कृष्ण कह रहे हैं हम।

नहीं तो ऐसे तो पीछे जाते ही जाओगे, जाते ही जाओगे कि इसको बाप ने पैदा किया, उसका बाप, उसका बाप, उसका बाप। तो ऐसे थोड़े ही हो सकता है। विज्ञान भी ‘बिग बैंग’ पर जाकर रुक जाता है, कहता है, समय यहाँ से शुरू हुआ था।

कहीं तो आदि कारण होगा न। वो जो आदि कारण है उसको सत्य कहते हैं। वहाँ से समय की धारा फूटती है। और समय की धारा माने परिवर्तन की धारा और परिवर्तन माने जन्म और मृत्यु। ‘होना और ‘न होना' इसी को परिवर्तन कहते हैं। अभी ये यहाँ पर है, अब ये यहाँ पर नहीं है (एक वस्तु को एक जगह से दूसरी जगह रखते हुए), एक अर्थ में इसका अभी जन्म भी हुआ, मृत्यु भी हो गयी।

ये समझ में आ रही है बात?

तो सत्य क्या है? वो जो कार्य-कारण को विराम दे दे, उसको सत्य कहते हैं। जहाँ घटनाएँ होनी रुक ही जाएँ या जहाँ से घटनाएँ होनी शुरू हो जाएँ उसको सत्य कहते हैं। इसीलिए समझाया जाता है कि मात्र सत्य में आपको आख़िरी विश्राम मिलेगा। नहीं तो जैसे ये कड़ी चल रही थी न, इसका बाप, इसका बाप, इसका बाप, इसका बाप, इसका बाप, ये पीछे को भी चलती है, आगे को भी चलती है। तो ये करा, फिर ये करा, तो ये करा, तो ये करा।

अरे! तो फिर इससे मुक्ति कब पाओगे? वो मुक्ति वहीं मिलेगी जहाँ ये कॉजेलिटी ही रुक जाती है पूरी। उसको सत्य कहते हैं।

'तो क्यों हम मानें कि कहीं-न-कहीं रुकती है?'

अपनी भलाई की ख़ातिर मानो। कोई प्रमाण नहीं है कि कहीं रुकती है। पर अगर कहीं नहीं रुकती है, तो हमारा क्या होगा? ये चक्की फिर चलती रहेगी? इसी श्रृंखला में बचे रह जाओगे क्या? तो सत्य प्रमाणित हो-न-हो, आवश्यक ज़रूर है। प्रमाणित तो तुम कर ही नहीं सकते कि पीछे जाते जाओ, पीछे जाते जाओ, तो कहीं जाकर श्रृंखला रुकती होगी, इसका प्रमाण कहाँ से लाओगे? उसे बोलते हैं अप्रमेय है, प्रमाण कुछ नहीं है। प्रमाण तो नहीं है पर आवश्यक बहुत है। क्योंकि अगर कहीं रुका नहीं, तो हमारा क्या होगा?

हमारी भलाई के लिए आवश्यक है कि सत्य हो। अगर सत्य नहीं है तो फिर जीने का कोई मतलब भी नहीं है। सत्य नहीं है, तो इसका मतलब समझते हो क्या है? ये नदी बह रही है और आप बार-बार, बार-बार, बार-बार बस उसी में कभी आ रहे हो, कभी जा रहे हो, आ रहे हो, जा रहे हो और तड़प रहे हो, छटपटा रहे हो। समझ में आ रही है बात?

तो ये जो नदी है, ये तो आपको पकड़ती ही है। इसमें आप जन्म लेते हो, मृत्यु होती है, फँस जाते हो, छटपटाते हो। जहाँ से ये नदी चल रही है, वो क्या इतना क्रूर है कि उसने आपको फँसा दिया इसमें? आपको उसने जन्म इसीलिए दिया है कि तड़पते रहो? नहीं। वो स्वयं भी उस नदी में मौजूद है और प्रकृति के बीचों-बीच मौजूद है। आपको क्या करना है? ‘च’ से चुनाव। आप चेतना है न, उसने आपको चुनाव दे रखा है। उसने कहा, 'देखो, ये जो धार बह रही है धार, इसी के भीतर किनारा है।' धार के बीचों-बीच किनारा मौजूद है। तुम चुन लो तुम्हें धार चाहिए कि किनारा चाहिए।

ये जो युद्ध होने जा रहा है, इसी के बीचों-बीच कृष्ण मौजूद हैं। तुम चुन लो कि तुम्हें कृष्ण चाहिए कि नहीं। अर्जुन ने चुन लिया, और किसी ने चुना ही नहीं कृष्ण को। बात आपके चुनाव की है।

बात समझ में आ रही है?

किनारा कहाँ हैं? धार के मध्य में। ठीक आप जहाँ बैठे हो, वहीं मुक्ति का मौक़ा है। है भी, नहीं भी है। जो पकड़ ले, उसके लिए है। जिसको नहीं चाहिए, उसके लिए नहीं है। आ रही है बात समझ में? छठा श्लोक स्पष्ट हुआ?

‘मेरी ही माया है और मैं ही इस माया में प्रकट हो जाता हूँ। जन्म भी लेता हूँ, मृत्यु भी पाता हूँ। जैसे हर साधारण मनुष्य जन्म लेता है, मृत्यु पाता है, वैसे ही मैं जब अवतरित हो जाता हूँ इस माया में, तो मैं भी जन्म लेता हूँ, मैं भी मृत्यु पाता हूँ।’

कह रहे हैं, 'मेरी माया है।' माने किसकी माया है? वो जो चेहरे वाले कृष्ण हैं, उनकी माया है? वो जो चेहरे वाले कृष्ण हैं, वो तो उस धार के भीतर के हैं। जब कृष्ण कहते हैं ‘मम् माया’, तो यहाँ कौनसे कृष्ण की बात हो रही है? निराकार या साकार?

श्रोतागण: निराकार।

आचार्य: निराकार। साकार कृष्ण अनन्त कृष्णों में एक हैं। गीता के कृष्ण कृष्णों में एक कृष्ण हैं। और वास्तविक कृष्ण कौन है? जो निराकार है। उन्हीं निराकार कृष्ण का एक रूप हैं महाभारत के साकार कृष्ण। निराकार कृष्ण जो कि ब्रह्म मात्र हैं, सत्य मात्र हैं, उन्हीं का एक रूप हैं गीता के साकार कृष्ण।

समझ में आ रही है बात?

अब अर्जुन के लिए ज़्यादा उपयोगी कौन है? निराकार कृष्ण या साकार कृष्ण?

श्रोतागण: साकार कृष्ण।

आचार्य: अब समझ में आ रहा है कि निराकार साकार क्यों हो जाता है? प्रेम है। किसके लिए आ गया? निराकार के लिए तो सब कुछ निराकार ही है। साकार को तो निराकार ने कह दिया, ‘मेरी माया है वो।’ आप कह रहे हो, 'माया नहीं है, सच है। बताओ आया कैसे?’ आप भी निराकार से जुड़ जाओ, आप भी कह दोगे, 'ये है नहीं, बस ये माया है, प्रतीत होता है, है नहीं।' जब आप कहते हो ये यहाँ से कैसे आया? तो आपका आशय होता है ये यहाँ से सचमुच आया। और कृष्ण कह रहे हैं सचमुच नहीं आया है, बस जो भ्रमित लोग हैं, उन्हें लगता है कि आया है। क्या? ये पूरा संसार आया है। वरना ये है ही नहीं।

जो कृष्ण में है, उसके लिए बस कृष्ण है, संसार है ही नहीं। जो कृष्ण में नहीं है, वो बार-बार पूछेगा, 'ये संसार कहाँ से आया है? संसार कहाँ से आया?' जो कृष्ण में है उससे पूछो ये संसार कहाँ से आया, तो बोलेगा, ‘संसार? संसार? कौनसा संसार? किस संसार की बात कर रहे हो? अरे, संसार होगा तब न हम बताएँगे कहाँ से आया। मुझे तो दिखता ही नहीं संसार, तो कैसे बताऊँ कहाँ से आया?' जिसको दिखता हो संसार, वो बोल दे कि संसार है। फिर उसको ये भी उत्तर देना पड़ेगा कि कहाँ से आया?

जिसको जो दिखे, उसके लिए वो होता है। हमारी पाँच-सात साल पहले की एक फेसबुक पोस्ट है। जब धर्मशाला में शिविर हो रहा था, ‘मिथ डिमोलिशन टूर’ , तो वहाँ मैं बैठा हुआ था और बगल में एक शिव मूर्ति थी इतनी ऊँची (हाथों से आकार बताते हुए), रखी हुई थी। तो उसमें विदेशी लोग ज़्यादा आया करते थे, वही वहाँ बाहर के थे। तो उनमें से एक आते हैं। वो बोलते हैं कि आप तो अद्वैतवाद से आते हैं, तो फिर आपने ये मूर्ति क्यों रखी हुई है बगल में? मेरे मुँह से निकल गया कि मूर्ति है कहाँ। तुम्हें दिख रही है। तुम्हारे लिए शिव-मूर्ति है, मेरे लिए शिव हैं। अद्वैत का मूर्ति से हो सकता है झगड़ा, शिव से थोड़े ही कोई झगड़ा है? मूर्ति तुम्हारे लिए होगी, मेरे लिए शिव हैं। जिसको मूर्ति दिखे, उसके लिए मूर्ति जिसको शिव दिखें उसके लिए शिव।

एक शब्द आता है यहाँ पर, उस पर थोड़ा विचार कर लेते हैं — ‘ईश्वर’। ईश्वर माने क्या? वेदान्त में ईश्वर माने क्या? हम बार-बार बात कर रहे हैं सत्य की, प्रकृति की, माया की, निर्गुण-सगुण की। ईश्वर माने क्या?

श्रोता: प्रेम।

आचार्य: ये सब तो आप साधारण संस्कृति पर आ गये बिलकुल, ’गॉड इज़ लव’ वगैरह। प्रकृति है, यहाँ तक स्पष्ट है? प्रकृति है माया का बहाव। प्रकृति की अपनी एक व्यवस्था है। ठीक है? चूँकि ये व्यवस्था है या हमें वो व्यवस्था प्रतीत होती है कि एक व्यवस्था है। तो दिखता तो है ही। चाँद-तारे अपनी कक्षा नहीं छोड़ते। पत्थर ऊपर उछालो तो नीचे ही आता है। एक व्यवस्था तो चल ही रही है। तो यह माना जाता है कि कोई व्यवस्थापक भी होगा। एक सिद्धान्त है, एक मान्यता है, उसको ईश्वर कहते हैं।

तो ईश्वर और प्रकृति एक ही बात है। ईश्वर और प्रकृति एक ही बात है और वेदान्त में दोनों माया हैं। वेदान्त में जैसे प्रकृति माया है, वैसे ही ईश्वर भी माया है, क्योंकि ईश्वर का सम्बन्ध सत्य से नहीं है, ईश्वर का सम्बन्ध प्रकृति से है। प्रकृति के नियामक को ईश्वर कह दिया। और अगर ये मान लो कि प्रकृति स्वयं ही अपनी नियामक है तो प्रकृति ही ईश्वर है। अगर हम प्रकृति के भीतर भी दो फाड़ करना चाहें, दो भेद कि प्रकृति एक व्यवस्था है और कोई बैठ के उस व्यवस्था को चला रहा है, तो हम कह देते हैं ईश्वर है, ऐसे कह सकते हो। और अगर ऐसे कहना चाहते हो कि नहीं, प्रकृति की जो व्यवस्था है, व्यवस्था मात्र है। व्यवस्थापक कोई नहीं है, तो फिर प्रकृति ही ईश्वर है। ईश्वर सत्य नहीं है।

धर्म ईश्वर को पूजता है, अध्यात्म सत्य की खोज करता है। दोनों में बहुत अन्तर है। धर्म ईश्वर को खोजता है और ईश्वर प्रकृति में है। और प्रकृति में जो कुछ होता है, वो भौतिक होता है, स्थूल होता है। तो एक तरह से ईश्वर की पूजा भी भौतिकता है, मेटिरियलिज्म है। अध्यात्म का ईश्वर से कोई ताल्लुक़ नहीं। अध्यात्म का सम्बन्ध है असत्य के नकार और सत्य को समर्पण से। सत्य और ईश्वर पर्यायवाची नहीं हैं। आत्मा और ईश्वर में कोई सम्बन्ध नहीं है। आम संस्कृति ईश्वर को पूजती है, अध्यात्म में ईश्वर का कोई विशेष स्थान नहीं है। समझ में आ रही है बात?

अध्यात्म में तो वास्तव में जो आम तरह का धार्मिक पूजन है, उसके लिए भी कोई विशेष स्थान नहीं है, क्योंकि पूजा करना माने किसी को अपने से ऊपर समझना। मैं कौन हूँ? मैं अहंकार हूँ। मुझसे ऊपर कौन है? वो एक ही है उसको सत्य कहते हैं। सिर्फ़ उसी के सामने सिर झुकाते हैं। तो पूजा का वहाँ एक ही अर्थ होता है — अहंकार का नमित हो जाना। पूजा के जो बाक़ी अर्थ हमने कर लिये हैं, प्रचलित धार्मिक संस्कृति में, उन अर्थों का अध्यात्म में कोई स्थान नहीं।

चूँकि इतना भेद है अध्यात्म में और धर्म में इसीलिए अक्सर ये होता है कि जो धार्मिक वर्ग है वो अध्यात्म पर आक्रमण बहुत करता है। वो अध्यात्म को अपने लिए ख़तरा समझता है। वास्तव में अध्यात्म को ज़्यादा बड़ा ख़तरा नास्तिक आदि लोगों से नहीं होता है। अध्यात्म को सबसे बड़ा ख़तरा धार्मिक लोगों से होता है।

धार्मिक आदमी से अध्यात्म बर्दाश्त नहीं होता, क्योंकि हम जिसको धर्म कहते हैं, वो कुछ नहीं है, वो हमारी मान्यताओं का, एज़म्प्शन्स का, हमारे क़िस्से-कहानियों का एक संकलन भर है। और अध्यात्म किसी क़िस्से, किसी कहानी को मानता ही नहीं। वहाँ तो सवाल हैं, तीखे सवाल, निर्मम जिज्ञासाएँ और उन जिज्ञासाओं के आगे धर्म कहीं ठहर नहीं पाता। जब धर्म ठहर नहीं पाता, तो धार्मिक लोग बहुत आग-बबूला हो जाते हैं। वो कहते हैं, 'ये देखो! ये हमारे ईश्वर पर, हमारी मान्यताओं पर, हमारे कर्मकांड पर, हमारी पूरी धारणाओं और व्यवस्थाओं पर चोट कर रहे हैं।’ तो धार्मिक आदमी फिर बहुत तिलमिलाता है।

तो हमने कहा कि कृष्ण समझा रहे हैं कि मैं प्रकृति की धारा के स्रोत पर बैठा हूँ और मैं उस धारा के बीच में भी बैठा हूँ। बीच में तुम मुझे पाओगे या नहीं पाओगे, ये तुम्हारा चुनाव है। वो चुनाव किन स्थितियों में, किन हालात में होता है, वो बात कृष्ण अगले श्लोक में स्पष्ट कर रहे हैं।

श्लोक क्रमांक सात,

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।

हे भारत! हे भरतवंशी! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म का अभ्युदय होता है, अधर्म सिर चढ़कर बोलता है, तब-तब मैं उस धारा से अपनेआप को प्रकट करता हूँ।

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ७

हे भारत! हे भरतवंशी! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म का अभ्युदय होता है, अधर्म सिर चढ़कर बोलता है, तब-तब मैं उस धारा से अपनेआप को प्रकट करता हूँ। तो मैं उस धारा में ही हूँ पर छुपा रहता हूँ। मैं प्रकट कब होता हूँ? जब अधर्म बहुत बढ़ जाता है, दुख बहुत बढ़ जाता है, तब मैं प्रकट होता हूँ। तो प्रकट होना क्या कृष्ण का फ़ैसला है? नहीं-नहीं, कृष्ण का नहीं है। कृष्ण तो हैं। वो प्रकट होंगे या नहीं होंगे, ये आपका फ़ैसला, आपका चुनाव है। हाँ, आप वो चुनाव तभी करोगे जब दुख आपका बहुत बढ़ जाएगा। नहीं तो आप कृष्ण को क्यों याद करोगे? आप छप-छप कर रहे हो, 'छप-छप करने में बड़ा मज़ा आया। क्या लुत्फ़ है!’

लेकिन जब आ जाता है धारा बीच अरे! धारा में ये भी तो होता है। क्या?

श्रोतागण: तूफ़ान।

आचार्य: तब कहते हो, ‘अरे! अरे! अरे! ये क्या हुआ? हम तो सोच रहे थे कि इस धारा में सुख-ही-सुख है। यहाँ तो कुछ और है ज़्यादा।' तो फिर चिल्लाते हो, ‘अरे, अरे, अरे, अरे, कोई बचाओ, कोई बचाओ।’

जब तुम चिल्लाते हो, तो तुम्हारा चुनाव बदल गया न? अभी तक किसको याद कर रहे थे? जो कुछ भी तुम्हें सुख देता हो उसको। और जब दुख आता है सुख के साथ, सुख के फलस्वरूप, तब तुम्हें विवश होकर किसी और को याद करना पड़ता है और तब कृष्ण प्रकट होते हैं। हमारा ही अधर्म कृष्ण को प्रकट करता है, वरना कृष्ण के पास कोई कारण नहीं साकार स्वरूप हो जाने का। सत्य रूप धारण करता नहीं। हाँ, जब आपकी चीख-पुकार, आपकी आहें आपका चुनाव बदल देती हैं, तो सत्य प्रकट हो जाता है। ये फ़ैसला सत्य ने नहीं किया प्रकट होने का, ये फ़ैसला आपने करा।

जब आपको दिख जाएगा कि अधर्म बहुत बढ़ गया है, तो आप कृष्ण को प्रकट करवा देंगे। जब आपको दिख जाएगा आप बहुत ग़लत जीवन जी रहे हो, तो आप कृष्ण को प्रकट करवा देंगे। कृष्ण का इसमें कोई योगदान नहीं है। इसमें कृष्ण का कहीं कोई चुनाव या फ़ैसला नहीं है। तो अगर आप ये पायें कि कृष्ण नहीं दिखाई पड़ते आपको, तो इसमें दोष उनका है या आपका है?

लोगों ने प्रश्न पूछे हैं मुझसे कई बार कि वो तो बोल गये हैं, “यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।” ‘जब-जब धर्म की हानि होगी, ग्लानि होगी, तब मैं आ जाऊँगा।’ तो आते काहे नहीं है? अभी तो दुनिया में बिलकुल त्राहि-त्राहि मची हुई है, आते क्यों नहीं है?

तुम बुलाओगे तो आएँगे। जब तक तुम्हें लग रहा है कि तुम ही बहुत अभी होशियार हो, ज़बरदस्त हो, ताक़तवर हो, तब तक नहीं आते। उनका आना या न आना उन पर नहीं, आप पर निर्भर है।

आपको जब अपनी सीमाएँ दिख जाएँगी, आपको अपनी क्षुद्रता दिख जाएगी, आपको दिख जाएगा कि आप से नहीं होगा, तब आपका समर्पण कृष्ण को आमन्त्रण बन जाता है। जब आपका सिर झुक जाता है, तो कृष्ण अवतरित हो जाते हैं। जब तक आपका सिर नहीं झुकेगा, वो होते हुए भी नहीं होंगे। सामने होंगे, पर प्रकट नहीं होंगे। समझ में आ रही है बात?

तो कृष्ण कहाँ से आएँगे? आपका सिर झुक गया, तो क्या होगा? अचानक ऐसे प्रकाश-पुंज जाएगा और झुन-झुन-झुन-झुन होगा और कृष्ण ऐसे सामने आ जाएँगे जैसे आप टीवी सीरियल में देखते हैं, ऐसे आएँगे? कैसे आएँगे? कहीं बाहर से नहीं आएँगे। कहाँ से आएँगे? भीतर से आएँगे। आपका बोध जग गया, कृष्ण प्रकट हो गये। आप ही के भीतर से आएँगे। किसी दूसरे के भरोसे मत रहिएगा।

अवतारवाद ने भारत का बड़ा नुक़सान किया है। लोग कहते हैं कि हम क्या करेंगे, एक युग में हमें बचाने राम आये, एक युग में बचाने कृष्ण आये, अब कलयुग में भी हमें बचाने कोई आएगा। हमने गीता समझी ही नहीं न। वो ख़ुद बता गये हैं कि वो कहाँ से आएँगे। वो भीतर से उठते हैं। आपका अपना कृष्णत्व ही कृष्ण का अवतरण है। आपका बोध जग गया, कृष्ण अवतरित हो गये। जिसमें बोध जग गया, वो कृष्ण की परम्परा की अगली कड़ी हो गया।

समझ में आ रही है बात ये?

और ‘जग गया’ माने क्या? अपनेआप जगेगा, झटके से जगेगा, संयोग से, अकस्मात्? नहीं। ज़िम्मेदारी से जगता है। कृष्ण एक शक्ति हैं बहुत बड़ी। वो उसी की जगती है जो ज़िम्मेदारी उठाये। जिसके पास कर्तव्य नहीं, उसके पास शक्ति क्यों हो? अर्जुन को बड़ा भारी युद्ध लड़ना है इसलिए अर्जुन को गीता दी जा रही है। जिसको युद्ध लड़ना ही नहीं, गीता उसको ज़िन्दगी में कभी मिलेगी ही नहीं।

आपके पास कोई है बड़ी लड़ाई? आपने करा है चुनाव कि बहुत एक बड़ी चुनौती है जिसको स्वीकारता हूँ? जिस दिन आप बहुत बड़ी चुनौती स्वीकार कर लेंगे, आप पाएँगे कृष्ण आपके सारथी बन गये हैं। आप पाएँगे गीता आप पर उतरने लगी है। जिसको कोई लड़ाई लड़नी ही नहीं, वो गीता का करेगा क्या? आपकी सबसे बड़ी लड़ाई अगर यही हो कि पडोस के बंटी को झापड़ मारना है, तो उसके लिए गीता चाहिए क्या? हमारी तो ऐसी ही लड़ाइयाँ होती हैं। सबसे बड़ी चुनौती क्या है ज़िन्दगी में? पान वाले ने दो रुपये लौटाये नहीं, उससे वसूलने हैं। अब इस महायुद्ध के लिए आपको क्या भगवद्गीता की ज़रूरत पड़ेगी?

गीता क्या हुई फिर आपका? चुनाव। कृष्ण नहीं मिल रहे, गीता समझ में नहीं आ रही, सारा खेल आपकी मर्ज़ी का है। ‘मैं इतना दुखी क्यों हूँ? मैं इतना दुखी क्यों हूँ?’ आप जानिए। किसी और ने तो किया नहीं। बाहर जो कुछ चल रहा है, वो प्रकृति की धारा है। उसमें चलते रहते हैं संयोग-वियोग। लेकिन भीतर जो कुछ चल रहा है, वो तो चुनाव है। दुख बाहर तो होता नहीं। दुख तो भीतर होता है। भीतर आपके जो कुछ भी चल रहा है, वो आपकी मर्ज़ी है, आप जानिए। कोई इसका उत्तर नहीं दे सकता कि क्यों चल रहा है। आपने चाहा है इसलिए चल रहा है।

तो गीता फिर क्या है? पूरी गीता जैसे एक प्रेम-पत्र है जो कह रही है, ‘कृपा कर दो, कृष्ण को चाह लो,’ प्रेम-पाती भेजी है कृष्ण ने। कह रहे हैं, ‘मैं तो बहुत चाहता हूँ तुमको। तुम चाह सकते हो क्या मुझको?’ यही है भगवद्गीता।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आचार्य जी, जो बिलकुल प्रथम ही श्लोक था जहाँ पर वो कहानी बताते हैं श्रीकृष्ण कि मैंने पहले सूर्य को ज्ञान दिया, उन्होंने इसको दिया, फिर उन्होंने इसको दिया। तो एक तो इसमें मुझे संशय ये आता है कि ये कहानी जैसे आपने समझायी बात कि इसका मतलब ये है, इसका मतलब ये है, तो स्पष्ट है। तो प्रश्न ये है कि यह कहानी कही क्यों गयी? जैसे आपने स्पष्ट रूप से समझायी वैसे क्यों नहीं बता दी?

आचार्य: मैंने वैसे समझायी जैसे आप समझ सकते हो। कृष्ण ने वैसे समझायी जैसे अर्जुन समझ सकते थे। कृष्ण वैसे थोड़े ही समझाएँगे जैसे आप समझ सकते हो। कृष्ण के सामने कौन है? ये प्रश्न भी बहुत बार आता है, 'आचार्य जी, अगर इन प्रतीकों का वही अर्थ है जो आप बताते हो, तो फिर इन बातों को वैसे ही साफ़-साफ़ क्यों नहीं बताया गया जैसे आप साफ़-साफ़ बता रहे हैं?' पागल! जिनको बताया गया उनको वैसे ही समझ में आनी थी, तो उनको वैसे बताया गया। आपको मैं वैसे बता रहा हूँ जैसे आपको समझ में आ रही है।

प्र: लेकिन आचार्य जी, इससे एक संशय ये भी उठता है कि जैसे अभी एक सज्जन किसी संस्था का नाम ले रहे थे और वहाँ पर वो कहते हैं कि मेरे कई जन्म हो चुके हैं, तुम्हें याद नहीं है, मुझे याद है, वैसा। तो एक मन में कहीं-न-कहीं ये सन्देह भी आता है कि ये हो सकता है कि हमारी व्याख्या हो। जैसे किसी संस्था में ये बोलते हैं कि सच में ऐसा ही होता है कि आत्मा निकलती है। तो वो भी एक व्याख्या की सम्भावना वहाँ होती है न कि वो भी सत्य हो सकता है?

आचार्य: उसके लिए वेदान्त का समग्र अध्ययन कर लो, तो समझ जाओगे कि एक-एक श्लोक किस तरफ़ को बोल रहा है। गीता भी एक उपनिषद् ही है। तो जो उपनिषदों के मूल सिद्धान्त हैं, गीता उनके विरुद्ध तो नहीं जाएगी न। जब बहुत सारे उपनिषदों को पढ़ लोगे, ब्रह्मसूत्र को समझ लोगे, तो फिर गीता के जो भी श्लोक होंगे, अगर तुमको लगेगा कि उनके दो सम्भव अर्थ हैं, तो जान जाओगे कि कौनसा अर्थ है जो उपनिषद्-सम्मत है। और तुम जान जाओगे कि दूसरा अर्थ तो इसका हो नहीं सकता।

भई! बड़ी हँसी-खुशी का, प्यार-मोहब्बत का माहौल है। और उसमें कभी कोई तुम्हें बोले, ‘मर जा।’ अब ठीक उसी वक़्त कोई तुम्हारे घर में आया है। उसे पूरा माहौल नहीं पता। उसके पहले क्या बात हुई थी, वो भी नहीं पता। जो बातचीत चल रही है पिछले आधे घंटे से, उसने सुनी नहीं। पूरा माहौल उस वक़्त कैसा है, वो जानता नहीं। वो ठीक उस समय तुम्हारे घर में क़दम रखता है जब ये शब्द कोई किसी से कह रहा है। क्या? ’मर जा’। तो उसको निश्चित रूप से वही संशय हो सकता है जो तुम्हें हो रहा है कि ‘मर जा’ का मतलब यही तो नहीं है कि कोई किसी को मार डालना चाहता है। लेकिन जिन्होंने पूरा जाना, उनको पता है कि ये जो ’मर जा’ कहा जा रहा है, इसका वास्तविक मतलब क्या है। ये तो प्रेमियों की आपस की चुहल है, ‘जा, मर जा।’

तो पूरी चीज़ जान लो फिर शब्द किधर को इशारा कर रहे हैं, वो भी समझ जाओगे। तुम पूरा नहीं भी जानना चाहते, तो जो दस-बीस महावाक्य हैं वेदान्त के, तुम उनको ही समझ लो। ज़रूरी नहीं कि तुम पाँच सौ, हज़ार श्लोक पढ़ो। तुम दस-बीस श्लोक, जो महावाक्य हैं, सिर्फ़ उनको समझ लो, तो भी समझ जाओगे कि गीता पूरी किधर को बात कर रही है।

प्र: शुक्रिया।

आचार्य: देखो, क्या होता रहा है। गीता का नाम बहुत रहा है। ठीक है? तो जितने भी तमाम तरह के पंथ रहे हैं, समुदाय रहे हैं छोटे-छोटे — भारत इतना बड़ा है और इतना पुराना है कि उसमें जगह-जगह पर छोटे-छोटे पंथ, समुदाय और नये-नये सम्प्रदाय पैदा होते रहे हैं — तो अब वो सम्प्रदाय कैसे साबित करें कि वो भी जायज़ हैं, वैध हैं? कैसे साबित करें?

मान लो कोई सम्प्रदाय है जो सिर्फ़ पाँच-सौ, सात-सौ साल पुराना है। ठीक है? लेकिन वो भी ये साबित करना चाहता है कि मैं सही हूँ और मैं असली हूँ। वो कैसे साबित करेगा? कैसे करेगा? वो क्या करता है कि वो गीता को पकड़ लेगा और कहेगा देखो हम जो कुछ कह रहे हैं, वो बहुत पहले से गीता में लिखा हुआ है। तुम अभी नये-नये नहीं आ गये। हम जो बात बोल रहे हैं, वो कोई नयी नहीं है। वो बहुत पुरानी और बड़ी मौलिक, बड़ी ओरिजनल बात है। वो तो गीता में बहुत पहले से लिखी हुई है।

लेकिन गीता में जो बात लिखी हुई है, वो तो कुछ और ही है। तो ये जो नया सम्प्रदाय है फिर इसके लिए बड़ा ज़रूरी हो जाएगा, इसकी मजबूरी हो जाएगी कि गीता को तोड़ो-मरोड़ो और जो उसकी अपनी धारणाएँ हैं, जो उसकी अपनी मान्यताएँ हैं भले ही वो मान्यताएँ बिलकुल एकदम कचरा हों, पर ऐसा दिखाओ जैसे उसकी जो मान्यताएँ हैं, वो गीता में पहले से लिखी हुई हैं। ऐसे साबित करो, ऐसे दर्शाओ कि हम नये-नये ये बातें नहीं लेकर के आये, ये बातें तो कब से लिखी हुई हैं।

अब एक बड़ा मतलब हास्यास्पद सा उदाहरण है। अभी आजकल एक पंथ चला हुआ है। कबीर साहब का और मेरा रिश्ता क्या है, वो आप भलीभाँति जानते हैं। और उस रिश्ते के कारण ही उनके नाम को लेकर खिलवाड़ हो, ये बात मुझे भाएगी तो नहीं। अब उनके नाम को लेकर खिलवाड़ एक इस तरीक़े से भी हो सकता है कि जो बात उन्होंने कही भी नहीं, वो बात भी उनके ऊपर थोपी जाए, आरोपित की जाए।

तो वो क्या बताते हैं? वो कहते हैं कि देखो! वेदों में भी कबीर साहब का उल्लेख है। वो कहते हैं वेद में एक जगह लिखा हुआ है ‘कविर’। भाई! वो संस्कृत है और वहाँ कविर का मतलब होता है कवि से, कवि का, कवि द्वारा। वो 'कबीर' थोड़े ही है। पर अब आप अपनी एक नयी कहानी लेकर आ रहे हो और लोगों को ऐसा लगे कि आप जो कहानी ला रहे हो, वो नयी नहीं है बल्कि आदिकालीन है, बहुत पुरानी है तो आप जाकर के उसके प्रमाण वेदों से उठाकर लाते हो। तो वेद में अगर ‘कविर’ लिखा है, तो आप कहते हो वेद में लिखा हुआ था ‘कबीर’। अब इस तरह की गुस्ताखियाँ की जाती हैं। अब कोई क्या करे?

लोग भ्रमित हो जाते हैं। भ्रमित होने का सबसे बड़ा कारण ये है कि लोगों ने ख़ुद पढ़ा ही नहीं है कभी। किसी ने गीता को, वेदान्त को इतना सम्मान, इतना प्रेम दिया नहीं है कि समय लगाकर के बैठकर पढ़े। और बहुत ज़्यादा समय लगना नहीं है।

देखो, वेदान्त के मूल तत्वों से परिचित होना हो, एकदम सफ़ाई के साथ, बिना विचलित हुए इधर-उधर, तो अष्टावक्र गीता पर्याप्त है। बिलकुल सीधी-सीधी उसमें गणित जैसी बात है, मैथेमेटिकल बिलकुल। भ्रमित तुम हो ही नहीं सकते वहाँ पर। उसको पढ़ लो, बात एकदम साफ़ हो जाएगी और इस तरह के संशय नहीं उठेंगे, वो जीवात्मा और ये और वो जो भी है।

एक सलाह है। अमला रुइया ने अष्टावक्र गीता को हिन्दी में गाया है। वो यूट्यूब पर उपलब्ध है। अष्टावक्र गीता हिन्दी में गा ही दिया है उसको। संस्कृत को हिन्दी में गीत बना दिया है, पूरा एक-एक श्लोक को। ठीक है? तो उसको आप लगा दें वो एक-एक जो श्लोक है, वो हिन्दी में फिर बजता रहेगा। आप लोगों का कोई ग्रुप वगैरह है? एक मिनट रुकिए। नहीं, नहीं भेज ही देंगे न आपको लिंक। कैसे भेज सकते हैं सबको? शेयर कर देंगे। लिंक ही भेज देंगे। तो वो जो आपको वो रहता है कि असली बात क्या है, वो वहाँ पर स्पष्ट हो जाएगी बिलकुल।

प्र: प्रणाम आचार्य जी। मेरा प्रश्न यह है कि बहुत सारे संस्था, बहुत सारे समुदाय या धर्म का आधार उपनिषद् या वेदान्त या सत्य के आधार पर होता है। जैसे कि मैं भी जुड़ा, वहाँ पढ़ा और उनके पास भी गया। और अभी मैं ख़ुद पढ़ रहा हूँ। तो इन सभी लोगों का कहीं-न-कहीं आधार है कि कृष्ण को, गीता को या सत्य को जानें। तो कोई एक विशेष चीज़ को लेकर जानना अच्छी बात होता है या सभी को जानते हुए हमें आगे बढ़ना होता है?

आपके पास आने से मुझे जो स्पष्टता और जो गुणवत्ता मिली जिसकी वजह से मुझे आत्मबल या हिम्मत आयी है। वो मुझे और बाक़ी चीज़ों में दिखी नहीं है। तो किस तरह इस चीज़ की ओर जाना चाहिए या लेना चाहिए? बाक़ी चीज़ों को देखते रहना चाहिए या कोई एक चीज़ को पकड़कर हमें आगे बढ़ना चाहिए?

आचार्य: सब इस पर निर्भर करता है कि अपनेआप से कितना प्यार है। नहीं तो समय है, जहाँ लगाना चाहो लगा दो। क्या उत्तर दें इसका! अभी सारी बात हो रही है कि प्रकृति की धारा है, उसमें छप-छप करने के न जाने कितने मौक़े, कितने तरीक़े, कितनी विधियाँ हैं। अब तुम पूछ रहे हो छप-छप करें कि नहीं करें या सीधे ही बाहर को आ जाए। तो तुम पर निर्भर करता है। छपछपाते रहो।

प्र: जो चीज़ करने को सोच रहे हैं, वो मुक्ति के लिए कर रहे हैं। लेकिन आप बता रहे हैं कि वो छपछपाहट है इसलिए। लेकिन मुझे ये है कि मुक्ति मिले इसलिए कर रहे हैं। शायद मार्गदर्शन न मिला या स्पष्टता नहीं है, हम जीवन में इसलिए इस तरह का करते हैं कुछ?

आचार्य: देखो, एक बिन्दु आता है जब मार्गदर्शन नहीं चाहिए होता, संकल्प चाहिए होता है। अक्सर हम कहते हैं कि कमी मार्गदर्शन की है। मार्गदर्शन मिल गया, जो जानने वाली बात थी वो बता दी, आगे का काम तुम्हारे संकल्प का है, फिर श्रम का है। अब वो तुम्हें करना है कि नहीं करना, ये तुम जानो। मार्गदर्शन दिया जाता है, कन्धे पर उठाकर मार्ग पर चला नहीं जा सकता न। रोशनी डाली जा सकती है रास्ते पर, पर रास्ता तय तो आपको ही करना है। तो मैं इसमें कुछ नहीं बोलूँगा कि पचास चीज़ें पढ़नी हैं कि नहीं पढ़नी हैं, देखना है कि नहीं देखना है, तुम जानो।

प्र: लेकिन उनका आधार अगर वेदान्त, उपनिषद् या सत्य हो, तो उसको लेकर चलना चाहिए या कोई विशेष चीज़?

आचार्य: वो आधार है या कहा जा रहा है? ज़्यादातर बार तो होता ही नहीं। और कई बार तो कह भी नहीं रहे होते कि होता है। बहुत सारे तो उनमें से ऐसे हैं जो कह रहे हैं कि हमने वेद ही नहीं पढ़े, तो उनकी बात का आधार वेदान्त कैसे हो जाएगा, भाई? तुम किस सपने में हो? जो खुलेआम कहते हैं कि हमें वेदों से ही कोई मतलब नहीं, उनकी बात का आधार वेदान्त हो जाएगा? अब ये तुम जानो। तुम्हारी बुद्धि, तुम्हारा चुनाव है। मैं इसमें कुछ नहीं बोलूँगा।

प्र: नहीं, अभी आपसे जब से जुड़ा हूँ, मुझे स्पष्ट हो रहा है कि अगर उससे मुझे उत्तर मिल जाता तो शायद मैं कहीं-न-कहीं रुक जाता। मुझे उत्तर नहीं मिला या मैं उससे सन्तुष्ट नहीं हुआ शायद इसीलिए मैं आगे बढ़ते-बढ़ते आपके पास आया। और अभी आपको जान रहा हूँ, पढ़ रहा हूँ, देख रहा हूँ, तो मुझे इस बारे में और रुचि बढ़ रही है और समझ बढ़ रही है।

आचार्य: तो फिर समस्या क्या है?

प्र: समस्या कुछ नहीं है। बाक़ी जो चीज़ें हैं, वो चीज़ को भी लेकर चलना चाहिए?

आचार्य: तुम लेकर चल लो, मैं काहे को मना करूँगा! जब अभी तुम्हें एक निष्ठा बन ही नहीं पा रही, तो मेरे कुछ कहने या मना करने का कोई अर्थ होगा भी नहीं। तुम सबकुछ लेकर ही चलो। मैं अपने ऊपर ज़िम्मेदारी नहीं लूँगा कि आपने कहा था, ‘सब छोड़ दो,’ तो मैंने छोड़ दिया। ये तो भैया, तुम अपना देखो। चाह तुम यही रहे हो कि आचार्य जी बोल दें, 'नहीं-नहीं, तुम सबको छोड़कर आ जाओ, आ जाओ, आ जाओ।’ मैं काहे को बोलूँ कि आ जाओ, तुम्हारा अभी काँटा उधर ही फँसा हुआ है तो फँसाये रहो।

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