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लेख
कर्तव्य और डर || आचार्य प्रशांत (2017)
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
11 मिनट
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प्रश्नकर्ता: कुछ दिनों से क्लासेज में ऑब्जर्व कर रही हूँ, बच्चे ख़ुद आ रहे हैं और कोई भूत-प्रेत के सीरियल (धारावाहिक) हो जाते हैं तो उन पर बात मुझसे पूछी जा रही है। तो मैंने साफ़-साफ़ ज़मीनी तौर पर रखने की कोशिश की है कि भूत माने पास्ट (अतीत)। मुझे भी डर है इन चीज़ों से और मैं अभी भी रात को डर जाती हूँ। रात को बचपन से कभी अकेले नहीं जा पाती थी।

अभी छः महीने में जो घर बदला है, घर के बिलकुल सामने एक क़ब्र है, वो देखते-देखते हर एक दिन मैं देख रही थी कि डर बढ़ता जा रहा है। कोशिश हो रहा है ताकि वहाँ से हट जाऊँ। धीरे-धीरे सत्र फिर ज़्यादा होने लगे, कबीर स्टूडियो जॉइन किया, तब से थोड़ा-थोड़ा जितना भजन गा रही हूँ तो यही देख पा रही हूँ कि डर शरीर का ही है। फिर भी वो डर अपनेआप नहीं जा रहा है, कर नहीं पाती हूँ।

बहुत कुछ काम ऐसे हो जाते हैं जिनमें मन लगता है पर शरीर साथ नहीं दे रहा है। अब एक और डर है कि मुझे अगर ये डर शरीर की नाक़ाबिली से हो रहा है, जैसे कि खाना बनाना थोड़ा ज़रूरी हो जाता है, इसका शरीर पर असर पड़ रहा है। तो लगता है कि मेरे होने से इसको नुक़सान हो रहा है।

आचार्य प्रशांत: मेरी एक पुरानी गाड़ी है फ़ीएट सीएमएफ। वो पन्द्रह साल की हो रही है। मैं उससे जुड़ा हुआ, मैं उसको अभी भी रखे हुए हूँ। वह घिसती जा रही है, घिसती जा रही है, तमाम मरम्मत के बाद भी। बहुत मरम्मत माँगती है वो। अभी भी यहाँ बैठे है तो यह सन्देश आया है कि ये वर्कशॉप (कार्यशाला) में खड़ी है और बहुत सारा उसमें पैसा लग रहा है। मैंने कहा, करवाओ। और साथ-ही-साथ अब दिल्ली में नियम आ गया है कि पन्द्रह साल से पुरानी गाड़ियाँ चल ही नहीं सकतीं। ये गाड़ी अगले साल पन्द्रह साल की हो जाएगी।

अब पता है कि यह मृत्यु की ओर जा रही है पर अब जितने दिन अभी है, उतने दिन तो चलाना है। तो क्या करवा रहा हूँ? मरम्मत करवा रहा हूँ। जितने दिन है उतने दिन तो चलाना ही है, तो मरम्मत करनी है। साथ-ही-साथ यह पता है कि अन्त काल नज़दीक आ रहा है। जैसे देह का अन्त होता है, वैसे इस गाड़ी का अन्त होना है। तो ये भी कह दिया है कि भाई एक दूसरी गाड़ी भी देखो। अब इसके आगे भी यात्रा है।

इसी तरीक़े से शरीर जब कष्ट देने लगे तो दो बातें हैं। पहली यह कि उसकी मरम्मत ज़रूरी है। जो कुछ भी किया जा सके उसकी मरम्मत के लिए, वो किया जाना चाहिए। और दूसरी बात यह कि इस शरीर से आता कष्ट लगातार एक सुरति की तरह अब बजने लगा है। कहते हैं न कबीर साहब "साँस नगाड़ा कूच का।" जहाँ-जहाँ अब दर्द उठे, उसको जान लो कि अब यह प्रसाद मिला है। क्यों? क्योंकि यह याद दिला रहा है कि शरीर नश्वर है और अब शरीर से आगे की तैयारी करो।

दोनों बातों का ख़याल रखना है। जितनी मरम्मत कर सकते हो करो, शरीर के प्रति यही धर्म है आपका कि उसको स्वस्थ रखो। जितने परहेज़ कर सकते हो, जितनी हिदायतों का पालन कर सकते हो, जितना व्यायाम कर सकते हो, जितनी दवा, सब करो। और साथ-ही-साथ शरीर में आते कष्ट को ऊपर से आता सन्देश समझो कि पदार्थ से, शरीर से, भौतिकता से चिपककर मत रह जाना, इनका तो जाना तय है।

पुराने लोग कहते हैं कि बताने वाला तुमको हज़ार तरीक़े से बताता है कि देखो तुम्हारा अवसर चूक रहा है। मौत यकायक नहीं आ जाती। पहले बाल सफ़ेद होने शुरू होते हैं, ये क्या है? ये इशारा आया है। फिर ज़रा झुर्रियाँ पड़ती हैं, खाल लटकने लगती है, फिर दाँत कँपते हैं, फिर हड्डियाँ कँपती हैं, फिर पीठ झुक जाती है, फिर तमाम तरह की बीमारियाँ, खाना खाना बन्द, पचना बन्द, फिर शरीर पर और बिस्तर पर ही मल-मूत्र त्याग शुरू। ये एक के बाद एक क्या आ रहे हैं? ये सन्देश आ रहे हैं। ये मेमो (ज्ञापन) आ रहे हैं, ये रीमाइन्डर (याद दिलाने वाले) आ रहे हैं।

खटाक से मौत थोड़े ही आ जाती है कि जी रहे थे, जी रहे थे और मौत आ गयी, ऐसा होता है क्या? एक के बाद एक सन्देश आते हैं, ये हमारी मदद के लिए आते हैं। ये आपको याद दिलाने के लिए आते हैं कि "गाफ़िल गोता खाएगा।" "बड़े निहाल”, पूरा करिए!

श्रोतागण: "ख़बर न तन की।"

श्रोतागण: देखो ‘तन’ कहा जा रहा है, तन की ख़बर रखो न। ऐसे ही थोड़े ही ये बाल सफ़ेद हो रहे हैं, ये तुमको बताया जा रहा है कि जागो, समय बीत रहा है। ये हो गयी शरीर वाली बात। क़ब्र पर अब क्या बोलूँ!

प्र: नहीं उस पर तो कबीर साहब ने साफ़ कर दिया है।

आचार्य: आप एक अपार्ट्मन्ट में रहते हैं। अरे! नीचे तो छोड़िए, बगल में क्या है? किसी का घर। तो क़ब्र भी क्या है? वहाँ भी तो कोई रहता ही है। जो बगल में रहता है वो तो फिर भी ख़तरनाक है। आपके बगल वाले फ्लैट में जो रहता है वो तो फिर भी ख़तरनाक है। क़ब्र जिसका घर है, वह बेचारा अब कोई ख़तरा नहीं देगा। किसी के घर से क्या ख़ौफ़? वह वहाँ चुपचाप सोया पड़ा है, वो कुछ नहीं करेगा। जीवनभर उसने उपद्रव करे, अब वह कुछ नहीं करेगा। जितने उपद्रव करने थे वो कर चुका, अब थोड़े ही करेगा। जब ज़िन्दा था तब डरते उससे, अब काहे को डरते हो?

डरना है तो भूत-प्रेतों से नहीं डरो, इंसान से डरो। भूत-प्रेत तो अपने उपद्रव पीछे छोड़ आये। डर और ये सब लगे रहेंगे, आप इनके साथ-साथ आगे बढ़ते रहिए।

प्र: यह अच्छा भी हुआ कि वह दिख गया। ऐसा लग रहा है कि जो बच्चे आगे आकर बता भी रहे है, मौक़ा दे रहे हैं सफ़ाई का। अगर उन्होंने नहीं मौक़ा दिया होता तो मैं देख ही नहीं पाती। ये चीज़ भी चल रहा है मन में।

प्र२: आचार्य जी, मैं कर्तव्य निभाने से हमेशा बचती हूँ, ऐसा क्यों?

आचार्य: जो काम जान जाओ कि सही है, उसको ज़रूर करो। यही कर्तव्य है, यही रिस्पान्सबिलिटी (ज़िम्मेदारी) है। और जो कर्तव्य व्यर्थ ही हो, अनावश्यक, उसको बिलकुल न निभाओ। जो करने लायक़ काम है, वही दायित्व है तुम्हारा, उसके अतिरिक्त कोई दायित्व नहीं। तो बात कर्तव्य की नहीं करो, पहले जानो कि करने योग्य है क्या।

अधिकांश चीज़ें जिन्हें कर्तव्य के नाम पर करते हो, उन्हें करना ही नहीं चाहिए। वह झूठ-मूठ का बोझ है जो तुम्हारे ऊपर डाल दिया गया है, उसकी ज़रूरत नहीं। और जो असली चीज़ है, वो करने से पीछे हटो मत। वो कैसा आदमी है जो जान जाए कि क्या ठीक है, क्या ज़रूरी है, फिर भी उसको न करे? ये आदमी तो कुछ विचित्र ही होगा। सीधी-सादी बात है, आँख खोलकर के देखो कि क्या सही है और एक बार जान जाओ कि क्या सही है तो पीछे हटो मत, बस ख़त्म। और जो सही नहीं है, उसको दुनिया लाख बोले कि करो, वह करो मत।

प्र३: मुझे जब से याद है, तब से मुझे पता है यह चीज़ कि मुझे फियर ऑफ जजमेन्ट (मूल्यांकन का डर) है। मैं जज करता हूँ, इससे दूसरों के जजमेन्ट का फियर आता है मेरे अन्दर। ये शायद समझ हो, कॉन्सेप्ट हो, मुझे पता नहीं क्या है, लेकिन लाइफ में एज़ सच जजमेंट जो है उसके साथ मेरे लिए बड़ा मुश्किल हो जाता है डील करना।

आचार्य: तुम्हें कहीं-न-कहीं ये लगता है कि तुम्हारे जजमेन्ट से दूसरों का कुछ बिगड़ जाता है। तुम्हें ऐसा लगता है कि तुमने किसी को जज कर दिया अच्छा तो उसका कुछ बढ़ गया और तुमने किसी को जज कर दिया बुरा तो उसका कुछ घट गया। इसीलिए तुम्हें फिर यह भी लगता है कि दूसरे तुम्हें कैसा जज कर रहे हैं, इससे तुममें भी कुछ घट-बढ़ जाएगा।

तुम्हारे जजमेन्ट से किसी को दो ढेले का अन्तर नहीं पड़ता, इस बात को समझ लो। फिर दूसरों के जजमेन्ट से भी तुम्हें दो ढेले का अन्तर नहीं पड़ेगा। और तुम्हारे भीतर ये भावना है कि तुम कुछ हो और तुम दूसरों को क्या जज कर रहे हो, इससे उनकी हैसियत का निर्धारण हो रहा है। यह व्यर्थ की बात है।

तुमको जो सोचना है, सोचो। ये पहाड़ है, इसको गाली दे दो, इसका क्या जाता है! और जो गड्ढा है, उसकी तारीफ़ कर दो, वो गड्ढा तो तब भी है। तुम समझो तो भी चीज़ें अपने मूल स्वभाव में हैं, तुम उन्हें कुछ और समझो तो भी चीज़ें जो हैं वही हैं, तुम्हारे जजमेन्ट से क्या बदल गया?

प्र३: मैं अपने फियर ऑफ जजमेन्ट की बात कर रहा था।

आचार्य: मैं उल्टा पकड़ रहा हूँ, मैं कह रहा हूँ, 'तुम दूसरों को जज करते हो न, उसके पीछे क्या वृत्ति है वो समझो।' जो दूसरों को जज नहीं करेगा, उसे अपने ऊपर किसी जजमेन्ट का भी भय नहीं रहेगा। ठीक यही तो क्राइस्ट की उक्ति है। क्या?

प्र३: जज दायसेल्फ बिफोर यू जज अदर्स (दूसरों का मूल्यांकन करने से पहले स्वयं का मूल्यांकन करें)।

आचार्य: नहीं, यह नहीं। क्राइस्ट कह रहे हैं, “जज नॉट लेस्ट ही शैल बी जज्ड“ (मूल्यांकन मत करो, ऐसा न हो कि तुम्हारा मूल्यांकन किया जाए)। दूसरों को जज करोगे तो यह डर पैदा हो जाएगा कि दूसरे तुम्हें जज कर लेंगे।

मैं इसको थोड़ा सा अलग तरीक़े से कहता हूँ, मैं कहता हूँ, “विवेक के साथ संसार को देखो, आत्मा की दृष्टि से संसार को देखो, पूर्वाग्रह मुक्त होकर संसार को देखो। जिस आँख से संसार को ठीक-ठीक देख लोगे उसी आँख से अपनेआप को भी ठीक-ठीक देख लोगे। फिर तुम्हें इस बात की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी कि कोई तुम्हें बताये कि तुम क्या हो और कैसे हो।“

अपनी हक़ीक़त जानना और संसार की हक़ीक़त जानना कोई दो अलग बातें हैं? जो अपने को समझता है, वह दुनिया को भी समझता है। जो दुनिया को समझता है, वह अपने को भी समझता है। इफ यू केन राइटली जज द वर्ल्ड, यू हेव ऑल्सो राइटली जज्ड योरसेल्फ (अगर तुम संसार का सही मूल्याकंन कर सकते हो, तो तुम स्वयं का भी सही मूल्यांकन कर सकते हो)।

तो मैं जजमेंट की ख़िलाफ़त नहीं करता, मैं जजिंग फ्रॉम द रॉन्ग सेंटर (ग़लत केन्द्र से मूल्यांकन) की ख़िलाफ़त करता हूँ। जजिंग तो ज़रूरी है, बट राइट जजमेंट , सम्यक् निर्णय, उचित निर्णय। अगर उचित तरीक़े से तुमने संसार को देख लिया तो तुमने अपनेआप को भी सही जान लिया। जब अपनेआप को जान ही लिया तो तुम्हें क्या फ़र्क पड़ेगा कि कोई तुम्हारे बारे में क्या बोल रहा है, क्या सोच रहा है। उन्हें बोलने दो, उन्हें सोचने दो।

ज़मीन पर आकर दुनिया को देखो, अपने सिद्धान्तों के पीछे से नहीं। पिकिंग देम ऑफ वन आफ्टर द अदर, देन यू मे नो देट दिस इज़ द वर्क ऑफ द राइट सेंटर। द राइट सेन्टर इज़ नॉट नोन एक्सेप्ट थ्रू इट्स वर्क। जस्ट एज़ गॉड इज़ नॉट नोन एक्सेप्ट थ्रू हिज़ क्रिएशन (उन्हें एक के बाद एक हटाते चलो। तब आप जान सकते हैं कि यह सही केन्द्र का काम है। सही केन्द्र को उसके कार्य के बिना नहीं जाना जाता है, जैसे ईश्वर को उसके रचना के बिना नहीं जाना जाता है)।

ह्वाट इज़ द वर्क ऑफ द राइट सेन्टर? (सही केन्द्र का क्या काम है?)

प्र३: टू एलिमनेट द रॉंग सेन्टर्स (ग़लत केन्द्र को हटाना)।

आचार्य: टू एलिमनेट द रॉंग सेन्टर्स। ह्वेन यू फील दैट यू आर करेजियस इनफ टू गेट रिड ऑफ रबिश इन लाइफ, देन यू मे नो दैट इट इज़ द राइट सेन्टर एट वर्क (जब आपको लगे कि आप जीवन में कूड़े-कचरे से छुटकारा पाने के लिए पर्याप्त साहसी हैं, तब आप जान सकते हैं कि काम सही केन्द्र से हो रहा है)।

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