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लेख
जब अपने मन और जीवन को देखकर डर लगे || आचार्य प्रशांत (2020)
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
17 मिनट
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प्रश्नकर्ता: जब अपने मन को, विचारों को देखता हूँ तो डर जाता हूँ। हाथ-पाँव तक काँपने लगते हैं। मन को और अपनी वृत्तियों को देख पाने का साहस कैसे आएगा?

आचार्य प्रशांत: देखो, मन मलिन है, कोई शक नहीं। वृत्तियों में विकार है, कोई शक नहीं। और बात घाटे की है, कोई शक नहीं। तुमको अगर बताया जाए कि तुमको दस लाख का नुक़सान हो गया है, तो झटका खाओगे; जैसे यहाँ लिखा है न हाथ-पाँव तुम्हारे काँपने लगेंगे। लेकिन तुमको बताया जाए कि दस लाख का नुक़सान हुआ है और पचास लाख का फ़ायदा, तो तुम खुशी मनाओगे। क्यों खुशी मना रहे हो? दस लाख का नुक़सान तो दोनों ही स्थितियों में हुआ है न?

जहाँ तक मन की और वृत्तियों की बात है, वो तो घाटे का ही सौदा है। जो शरीर लेकर पैदा हुआ है, जो शरीरगत वृत्तियाँ लेकर पैदा हुआ है, जो मन और उससे सम्बन्धित सारे भाव, सारे विकार लेकर पैदा हुआ है, वो तो पैदा ही घाटे में हुआ है। तो घाटा तो रहेगा ही रहेगा। दस लाख का घाटा लिखा होता है हर बच्चे के माथे पर, जब वो पैदा होता है। उस घाटे का मतलब समझ रहे हो न? एक घाटे की ही चीज़ पैदा हो गयी है। जो वो लेकर आया है अपने साथ वो क्या है? घाटा-ही-घाटा। तो वो तो रहेगा ही रहेगा। वो तयशुदा है। हमारे साथ कुछ ऐसा पैदा होता है, जो हमें बड़ा घटाकर रखता है। जो हमें क्षुद्र करके रखता है। जो चीज़ तुम्हें घटाकर रखे वही चीज़ घाटे की। घाटा वहीं से आता है न? जो तुम्हें घटाकर — घटाकर माने छोटा करके, सीमित करके रखे उसी को कहते हैं घाटा। ठीक है?

तो वो घाटा तो है ही है। वो सबके साथ लगा हुआ है। दस लाख डूबे! अब सवाल ये नहीं है कि दस लाख डूबे कि नहीं, सवाल ये है कि पचास लाख वाला मुनाफ़ा तुमने जीवन में कमाया कि नहीं कमाया। दो आदमियों में अन्तर ये नहीं होता कि एक को घाटा लगा दूसरे को नहीं लगा। घाटा तो दोनों को लगा है। हर बच्चा बिना किसी अपवाद के — हर बच्चे के माथे पर खुदा हुआ है घाटा, पैदा होते ही।

तो फिर वो जो बच्चा वयस्क होता है, अपनी पूरी ज़िन्दगी जीता है, उन दो इंसानों में अन्तर क्या होता है? उन दो इंसानों में अन्तर ये होता है कि एक घाटा लेकर आया था और घाटा ही लेकर चला गया, और दूसरा घाटा लेकर आया था लेकिन उसने उसमें बहुत सारा मुनाफ़ा जोड़ दिया। दस लाख के घाटे में उसने पचास लाख का मुनाफ़ा जोड़ दिया। तो कुल मिलाकर बात मुनाफ़े की हो गयी। समझ रहे हो?

तो ये वृत्तियों से सम्बन्धित तुम्हें जो भी विक्षेप-विकार दिखाई देते हैं, वो सही ही दिखाई देते हैं। उनपर तुम्हारे हाथ-पाँव काँपते हैं, तो बिल्कुल सही बात है। अचानक किसी का दस लाख तुम लूट लो, तो उसके हाथ-पाँव तो काँपेंगे ही। इसमें कुछ ग़लत नहीं हो गया। सवाल ये है कि पचास लाख कहाँ है भाई? वो क्यों नहीं कमाया अभी तक?

अहंकार तो चीज़ ही ऐसी है कि उसको देखो तो कँपने लग जाओ, पसीने छूट जाएँ। इसीलिए तो उसको देख पाने की ताक़त बहुत कम लोगों में होती है। वहाँ पर तुम्हारी पूरी ज़िन्दगी की बर्बादी लिखी हुई है। तुम्हारी सब हारें लिखी हुई हैं। तुम्हारे पूरे जन्म का एकदम व्यर्थ चला जाना लिखा हुआ है। हममें कितनी पशुता भरी हुई है, ये लिखा हुआ है। हम कितनी चोरी का और कितने झूठ का जीवन जी रहे हैं, सब लिखा हुआ है वहाँ पर। उससे कैसे तुम आँखें मिलाओगे? अपने भीतर जो भी देखता है, अगर वो ज़रा ईमानदार आदमी है, तो उसको यही सब दिखाई देगा। क्या? अपनी चोरियाँ, अपने झूठ, अपनी कमज़ोरियाँ, साहस की कमी, प्रेम की कमी, विकार, वासनाएँ। और क्या दिखाई देगा भीतर जब झाँकोगे! तो अच्छा किया भीतर देखा, ये सब तुमने पाया।

मेरा सवाल ये है कि यही सब क्यों पाया? इसके अलावा भी तो एक चीज़ पाने की हो सकती थी। वो क्यों नहीं कमायी आजतक? उसको कमा लोगे फिर तुम इस दस लाख के घाटे को झेल जाओगे। नहीं तो जानते हो तुम क्या करोगे? तुम पाखंड करोगे। एक आदमी है, जिसने पचास लाख कमाया है और दस गँवाया है। वो हँसते-हँसते बता देगा, दूसरों के सामने भी स्वीकार कर लेगा, कि दस लाख का घाटा हुआ। क्यों? क्योंकि कुल-मिलाकर उसे फ़ायदा हुआ है। कुल मिलाकर उसे फ़ायदा हुआ है, तो वो बता लेगा। लेकिन जिसको सिर्फ़ घाटा-ही-घाटा हुआ है, वो फिर पाखंडी हो जाता है। वो मानना ही बन्द कर देता है कि उसको घाटा हुआ है। क्योंकि उसके पास कुल-मिलाकर क्या है? सिर्फ़ घाटा। और जिसको घाटे के साथ मुनाफ़ा भी हुआ है, वो फिर ईमानदारी से मान लेता है, उसको घाटा हुआ है। क्योंकि उसके पास घाटे के अलावा मुनाफ़ा भी है। बात समझ में आ रही है?

तुम बच्चे थे, तुम्हारी परीक्षा के बाद जाँची हुई कॉपियाँ, उत्तर पुस्तिकाएँ बँट रही थीं। ठीक है? होता था न? परीक्षा खत्म हो जाती थी, उसके हफ़्ते भर बाद से क्या शुरू होता था? कि आज इन दो चीज़ों की जाँची हुई उत्तर पुस्तिका बँटेगी, फिर इनकी बँटी। और आप दिल पर हाथ रखकर इंतज़ार करते थे, कि अरे आज मैम (शिक्षिका) आ गयीं, आज गणित की आंसरशीट्स (उत्तर पुस्तिका) आ गयी हैं। और फिर वो अपना बैठकर के देती थीं कि देखो तुम्हारे इतने नम्बर, तुम्हारे इतने नम्बर। फिर आप जाते थे, अपनी कॉपी लेते थे। तो आज बँटी हैं, गणित की और अंग्रेजी की। दो बच्चे हैं, दोनों के गणित में बड़े कम नम्बर आये हैं। मान लो सौ में से बस साठ-पैंसठ आये हैं। लेकिन जो दूसरा है, उसके अंग्रेज़ी में भी कम आये हैं, पचास ही नम्बर। और एक के अंग्रेज़ी में आ गये हैं पचासी।

ज़्यादा सम्भावना यही है कि ये जो बच्चा है, जिसके गणित-अंग्रेज़ी दोनों में कम आये हैं, ये घर जाकर के अपनी कॉपियाँ दिखाएगा नहीं, ये छुपा जाएगा। ये झूठ बोल जाएगा, ये पाखंड करेगा, ये छुपा जाएगा। और वो जो बच्चा है, जिसके एक विषय में कम है लेकिन दूसरे में भरपूर हैं, वो घर जाकर के दोनों कॉपियाँ ईमानदारी से रख देगा। क्योंकि उसको पता है एक जगह कम हैं, तो दूसरी जगह मैंने भरपाई कर ली है। वो बता देगा।

तो अपना झूठ स्वीकार करना, अपनी चोरी भी स्वीकार करना, अपनी कमज़ोरी भी स्वीकार करना उसी के लिए सम्भव हो पाता है, जिसने जीवन में कुछ ऊँचा अर्जित भी किया हो। इसीलिए आप पाएँगे, जिन लोगों ने जीवन में वाकई ऊँचाईयाँ छुई, वो बड़ी आसानी से अपनी कमज़ोरियाँ भी स्वीकार कर लेते हैं। सन्त लोग गाते हैं, "मो सम कौन कुटिल खल कामी।" अजीब बात है! सन्त कह रहा है, "मेरे जैसा कुटिल कौन, मेरे जैसा खल, धूर्त कौन, मेरे जैसा कामी कौन।" ये सन्त गा रहा है। सन्त को ये स्वीकार करने में कोई दिक्क़त नहीं है कि वो कुटिल है, खल है और धूर्त है, कामी है।

आम आदमी कहता है, 'अरे साहब! हमसे ज़्यादा पाक-साफ़ कौन होगा? हमसे ज़्यादा सच्चा और निष्काम कौन होगा?' आम आदमी की मजबूरी है, उसके पास सिर्फ़ घाटा-ही-घाटा है। उसका दिल टूटता है ये स्वीकार करने में कि उसकी पूरी ज़िन्दगी घाटे का सौदा रही है। वो कैसे स्वीकार कर ले सबके सामने? वो कैसे बर्दाश्त कर ले? तो फिर उसे झूठ बोलना पड़ता है, कि नहीं-नहीं हम तो बड़े अच्छे आदमी हैं।

सन्त कहता है, 'मैं तो अपनी एक-एक कमज़ोरी गिन-गिनकर बताऊँगा। मैं तो अपना एक-एक नुक़्स खोल-खोलकर, उघाड़-उघाड़कर दिखाऊँगा। क्यों? क्योंकि जब मैं बता लूँगा कि मेरा यहाँ भी घाटा है, मेरा यहाँ भी घाटा है, मैं यहाँ भी कमज़ोर हूँ, मेरी ये भी ग़लती है, मेरी वो भी ग़लती है, ये सब बताने के बाद मैं कहूँगा, इन सब ग़लतियों के बाद भी, इन सब ग़लतियों के बावजूद और इन सब ग़लतियों से बड़ा कुछ है मेरे पास।' और वो जो बहुत कुछ उसके पास बड़ा है, उसके आगे वो सारी ग़लतियाँ फिर बहुत छोटी हो जाती हैं।

याद रखिएगा वो जो ग़लतियाँ हैं, वो जो घाटा है, वो जो कमज़ोरियाँ हैं, वो सबके पास होती हैं। छोटे आदमी, बड़े आदमी में अन्तर ये नहीं होता कि बड़े आदमी में कमज़ोरियाँ नहीं हैं। भारत इस मामले में कितना अनूठा रहा है। हमने तो अपने अवतारों में भी सब मानवीय कमज़ोरियाँ दिखायीं। दिखायीं कि नहीं दिखायीं? हमारे अवतार लोग भी मानवीय कमज़ोरियों से परिपूर्ण थे। तो फिर उनमें और साधारण आदमी में अन्तर क्या है?

राम हैं, कृष्ण हैं और एक साधारण आदमी है, उनमें क्या अन्तर है? अन्तर ये नहीं है कि साधारण आदमी की कमज़ोरियाँ राम और कृष्ण में नहीं थीं। भई! जब वो मानव देह लेकर अवतरित हुए हैं, तो फिर जो साधारण मानव वृत्तियाँ हैं, उनका प्रदर्शन भी उन्हें करना ही पड़ेगा न? तो वो करते हैं। लेकिन उनके पास सिर्फ़ वो कमज़ोरियाँ मात्र नहीं थीं। उनके पास उन कमज़ोरियों के आगे भी कुछ था। उनके पास बस वो दस लाख का घाटा ही नहीं था, उनके पास पचास लाख का मुनाफ़ा भी था। ये अंतर होता है।

तो कभी भी किसी सन्त आदमी को या किसी ऊँचें या किसी ज्ञानी को, इस आधार पर मत आँक लीजिएगा कि, अरे! इसमें भी देखो तृष्णा है या कामना है या क्रोध है। साहब निश्चित रूप से उसमें भी तृष्णा है, कामना है, क्रोध है लेकिन उसके पास और भी कुछ है, जो शायद आपने नहीं कमाया। और तृष्णा, कामना, क्रोध तो उसमें होगी ही, क्योंकि ये बात देखो शरीर की है, पैदा होने की है। हमने कहा न हर बच्चा पैदा होता है अपने माथे पर खुदवाकर के घाटा, तो जो भी कोई व्यक्ति आपके सामने है, देह रूप में उसमें ये सब चीज़ें रहेंगी। आप ये बताइए, आपने असली चीज़ क्यों नहीं कमायी? और जब असली चीज़ कमा लोगे, तो फिर ये सब जो वृत्तियाँ-विकार हैं, इनको देख लेने का, इनकी अभिस्वीकृति करने का और फिर इनका उल्लंघन कर जाने का साहस आपमें अपनेआप आ जाएगा। आप कहोगे, 'चीज़ ही छोटी हो गयी, कहाँ दस का आँकड़ा कहाँ पचास का आँकड़ा।' फिर आप इस दस के आगे चौंक जाओगे, कूद जाओगे। फिर आपको शर्म नहीं आएगी इस दस की बात करने में, फिर आप खुले आम बात करोगे।

और ये जो सवाल है आपका, इससे मुझे थोड़ा आश्वासन मिल रहा है, कि आप अपनी वृत्तियों का उल्लंघन करने को तैयार हो। क्योंकि इन वृत्तियों की खुलेआम चर्चा कर रहे हो। झूठे-बेईमान आदमी की निशानी यही होती है कि वो अपनी कमज़ोरियों की चर्चा ही नहीं करना चाहता। वो ऐसा नाटक करता है जैसे कि उसमें कमज़ोरियाँ हों ही नहीं।

जो असली आदमी है, वो सबसे पहले अपनी कमज़ोरियों को पकड़ेगा, स्वीकारेगा, प्रदर्शित करेगा ताकि उनके आगे जा सके। शब्दों पर ध्यान दीजिएगा। मैंने ये नहीं कहा, वो अपनी कमज़ोरियों को मिटा सके; अपनी कमज़ोरियों के आगे जा सके। देखिए, किसी चीज़ के अतीत चले जाना एक बात होती है, किसी चीज़ के बियॉन्ड चले जाना एक बात है, अतिक्रमण कर जाना एक बात है। और किसी चीज़ की सफ़ाई करना, किसी चीज़ पर विजय पाना बिल्कुल दूसरी बात है। हम अक्सर ये गलती कर जाते हैं कि हमारी जो सब क्षुद्रताएँ हैं, कमज़ोरियाँ हैं, विकार वगैरह जो भी चीज़ें हैं, जो हमें पता है भीतर अच्छी नहीं लगती, हम उनसे लड़ने बैठ जाते हैं।

नहीं, उनसे लड़ना नहीं होता भाई। वो तो चाहती हैं कि आप उनसे लड़ो, उन्हीं में उलझे रहो, जूझ जाओ। आपको उनके होते हुए भी उनकी उपेक्षा करनी है। वो तो आपको आकर्षित करती हैं। कभी आपको लुभाकर, कभी आपको चुनौती देकर। आपको क्या करना है? आपको कहना है, 'तुम अपना खेल अपने पास रखो; न हम तुमसे गले मिलना चाहते हैं, न लड़ना चाहते हैं। हमारे पास और बहुत कुछ है करने को भाई, ऊँचा काम है, सही चीज़ है, वो करेंगे। तुमसे थोड़े ही आकर के लिपट जाएँगे।'

लिपटना भी दो तरीके का है, समझ ही गए होंगे न? एक तो ये है कि जाकर के मोह में लिपट गये और दूसरा ये है कि पहलवान की तरह लिपट गये। पहलवान भी तो एक-दूसरे से लिपटते रहते हैं। काहे को लिपटते हैं? वो एक-दूसरे को पछाड़ने के लिए लिपटते हैं, एक-दूसरे को हराने के लिए लिपटते हैं। पर जो भी किया, चाहे प्रेम में लिपटे — प्रेम माने तथाकथित प्रेम — चाहे अपने साधारण प्रेम में लिपटे और चाहे पहलवानी में, कुश्ती में, बैर में लिपटे, लिपट तो गये न? लिपटना नहीं है, आगे बढ़ जाना है।

इस मान्यता से तो आप बिल्कुल ही बाहर आ जाइए कि जब तक आप जी रहे हैं, तब तक आप अपनी वृत्तियों को जीत सकते हैं। नहीं भाई, नहीं होना ऐसा! इसीलिए जो उचित शब्द दिया गया मुक्ति को भारत में, वो जीवन-मुक्ति था, वृत्ति-विजय नहीं कहा गया। जीवन मुक्ति! जीवन चलता रहेगा, आप जीवन से मुक्त रहेंगे। और जीवन माने जीव की कहानी।

जी-व-न — जीव की कहानी। और जीव की कहानी और क्या होती है? जीव की कहानी, तो यही होती है — खाया-पिया, डकार मारी, इससे लड़े, उससे उलझे, उससे तार जोड़ दिये, उससे बैर लगा लिया। यही तो है। तो ये सब कहानियाँ चलती रहेंगी। ये शरीर का धन्धा है, भाई ये लगा रहेगा। आप इसके अतीत होएँ, आप इसके आगे बढ़ जाएँ; उलझना नहीं है।

लेकिन इसके आगे जाने की आपमें हिम्मत तब आये न, जब इसके आगे का आपने कुछ अर्जित किया हो। इसके आगे जाना उन्हीं के लिए सम्भव है, जब शरीर से आगे की कोई चीज़ आपको उपलब्ध हुई हो। वो उपलब्ध तब होती है, जब आप क़ीमत चुकाते हो। उपलब्ध ही नहीं हुई है तो फिर तो यही जो शारीरिक चीज़ें हैं, इन्हीं में अटककर रह जाओगे। क्योंकि यही हैं आपके पास; और तो आपने कुछ कमाया ही नहीं।

शरीर से आगे का कुछ कमाइए, वो इतना प्यारा होगा, इतना मूल्यवान होगा कि फिर ये जो रोज़मर्रा का लफड़ा-तफड़ा लगा रहता है, देह का, मन का, आपको फुर्सत ही नहीं रह जाएगी इसमें उलझने की। आकर्षक ही नहीं लगेगा। कहेंगे, 'क्या इनका तो रोज़ का यही चलता रहता है, कौन उलझे। और चीज़ हैं।'

मैं समझ रहा हूँ कि ये पूरी बात सुनने के बाद, आप बड़ी बेचैनी से क्या सोच रहे होंगे। आप सोच रहे होंगे, 'क्या है, क्या है? वो पचास लाख क्या है? शरीर के आगे क्या है? ये भी तो बताइए। इतनी सांकेतिक बात ही करते रहेंगे क्या आप, कि शरीर से आगे निकल जाओ? वो कुछ है जो अतीत है, वो क्या है, क्या है?'

अरे बाबा! शरीर से आगे निकलना ही आतीतत्य है। वो क्या है माने वो कोई वस्तु नहीं है। वो चीज़ यही है। वो यही बोध है कि शरीर से आगे निकला जा सकता है और शरीर से आगे निकलने में ही बुद्धिमानी है। क्योंकि शरीर तो एक जंगली उत्पाद है। शरीर तो पशुओं की कोटि की एक व्यवस्था है! आप कहाँ तक उसी में फँसे रहेंगे? उसमें फँसकर आपकी चेतना को चैन तो मिलता नहीं।

आप कहाँ यही सोचते रहेंगे कि पैदा इसीलिए हुए हैं ताकि बढ़िया बिस्तर मिल जाए, बढ़िया खाना-पीना मिल जाए, पैसा कमा लें, तो बड़ा वाला एसी लगवा लें और ऐसी जगहों पर घूमें, जहाँ पर आँखों को बड़ा रस मिले। ये सब आप करते भी रह जाएँगे, तो चैन कहाँ मिलना है। तो अपनी चेतना की पुकार को सुनना, ये जो भीतर बेचैनी है, ये आपसे वास्तव में क्या चाहती है, इसको पहचानना, यही है पचास लाख की बात।

आप अपने शरीर को देखिए, कितनी भी सुख-सुविधा दे दीजिए, आपकी चेतना बड़ी हठी है। वो मानती नहीं है। हाँ, कुछ शारीरिक सुविधाएँ हैं, जो चाहिए। नहीं तो शरीर को आप बहुत ज़्यादा पीड़ा में रखेंगे, तो वही बात चेतना के लिए भी पीड़ा की हो जाती है। वो बात भी ठीक है। मैं सहमत हूँ उससे। और उसके लिए आपके पास जीवन में थोड़ी सुविधा, थोड़ा पैसा होना चाहिए।

भई, अगर आपको खाने-पीने को ही नहीं है या आपके पास कपड़े ही नहीं हैं पहनने को, तो फिर चेतना इन्हीं बातों में मजबूर होकर के व्यस्त हो जाएगी, कि 'अरे! कपड़ा कहाँ से लायें और खाने का क्या प्रबन्ध करें।' वो सब आप कर लीजिए। लेकिन उतने भर से चेतना मानेगी नहीं। वो आवश्यक तो है, पर पर्याप्त नहीं है। हमें वो दोनों काम करने पड़ेंगे। जो काम आवश्यक है, वो भी करने पड़ेंगे और वो काम भी करने ज़रूरी हैं, जो जीवन को एक पर्याप्तता देंगे, एक पूर्णता, एक फुलनेस (परिपूर्णता) देंगे।

जैसी दुनिया है, इतिहास हमको अर्थव्यवस्था के जिस मुकाम पर ले आया है, उसमें हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति हो चुकी है। बड़े आराम से हो रही है। एक न्यूनतम स्तर की भौतिक उपलब्धि ज़रूरी होती है। कोई आपको जंगल में छोड़ दिया जाए, वहाँ आपको मच्छर काट रहे हैं और तमाम तरह के कीड़े आपको लग रहे हैं और जंगली जानवरों का खतरा है; तो आप ध्यान नहीं कर सकते। आप जीवन के सत्य की बात नहीं सोच सकते।

क्योंकि आपकी सारी ऊर्जा इसी में जा रही होगी कि मच्छर ने काटा, कीड़े ने काटा। वो साँप लटक रहा है, अजगर पछिया रहा है, यही सोचते रह जाएँगे। तो एक न्यूनतम स्तर की भौतिक उपलब्धि चाहिए, पर दुनिया उस स्तर की भौतिक उपलब्धि को अब कब का पा चुकी है। हाँ, कुछ प्रतिशत लोग हैं, अभी दुनिया में, जिनको अभी वो नहीं मिली है, उनको भी मिल जाएगी जल्दी ही।

तो अब आवश्यकता और ज़्यादा आर्थिक या भौतिक प्रगति की है ही नहीं। हमने कहा था, दो चीज़ें चाहिए, एक जो आवश्यक है और दूसरी जो जीवन को पर्याप्त बनाएगी, जिनसे चेतना को पर्याप्त पूर्णता मिलेगी। वो जो दूसरी चीज़ है, वो पाइए, वो पचास लाख की है।

समझना पड़ेगा कि स्वयं का सत्य क्या है। समझना पड़ेगा ये चेतना कहाँ से उठती है, कहाँ को जाना चाहती है। और समझना पड़ेगा कि हम जैसे जी रहे हैं, हमने जो ढर्रे बना रखे हैं, जो व्यवस्थाएँ और जो रिश्ते बना रखे हैं, क्या उनमें हमें चैन मिलना है। यही जो समझने की चीज़ है, यही जो बोध है, ये पचास लाख की चीज़ है। आशा करता हूँ, मैंने स्पष्ट करके कह दिया होगा।

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