आचार्य प्रशांत आपके बेहतर भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं
लेख
इस चीज़ से बच गए, तो फिर कभी नहीं डरोगे || आचार्य प्रशांत कार्यशाला (2023)
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
35 मिनट
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। कल का सत्र बहुत अच्छा था और जब सत्र में जुड़ने करने के लिए हम आवेदन करते हैं, मेल भेजते हैं, उसमें सबसे पहला सवाल पूछा जाता है कि आपकी अपेक्षा क्या है सत्र में भाग लेने से? मेरी जो अपेक्षा थी, वो पहले दस मिनट में आपने मुझे दे दिया, उसके लिए धन्यवाद। और गीता पर जो सत्र था, वो भी बहुत लाभदायक था। आचार्य जी, मेरा सवाल, अभी जो हम दोहे भज रहे थे, उन पर है।

“बिन सत्संग विवेक न होई, रामकृपा बिनु सुलभ न सोई।”

और बिलकुल ऐसा ही एक आता है,

“हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर।”

तो जब ये मेरे ही अलग-अलग चेतना के स्तर हैं, डिग्रीज़ हैं, तो ये रामकृपा माने किस कृपा की बात हो रही है? किसकी कृपा की बात हो रही है? और हरि रूठे से क्या मतलब है?

आचार्य प्रशांत: "राम ब्रह्म परमारथ रूपा।" ठीक है! इन्होंने (तुलसीदास जी ने) ही कहा है — "राम ब्रह्म परमारथ रूपा।" तो रामकृपा माने क्या हुआ? ब्रह्म की कृपा। अब ब्रह्म कोई व्यक्ति तो है नहीं। ब्रह्म कहीं कोई किसी प्रकार की भौतिक या अभौतिक शक्ति भी नहीं है। अदृश्य है, अलक्ष्य है या अप्रमेय है या अचिंत्य है।

तो रामकृपा से आशय क्या है? रामकृपा से क्या मतलब है, ये जानने के लिए वेदांत की प्रणाली पर वापस जाना पड़ेगा। प्रणाली किसकी है? निगेटिवा की, नेति-नेति की।

अहंकार अपनेआप को इतना बड़ा पहलवान समझता है कि जो कुछ करूँगा अपने हित के लिए, वो या तो मैं करूँगा या फिर कम-से-कम वो मेरी जानकारी से होगा। अगर मेरे अलावा भी कोई और कर रहा है तो जो कर रहा है उसका नाम-पहचान, उसकी प्रक्रिया, ये सब मुझको पता होगी।

आपने ग़ौर करा है, कोई आपका हित करने आये और आपको बिलकुल ये पता न हो कि वो आपका हित क्यों कर रहा है, आप घबरा जाते हो। तुरंत कहते हो, दाल में. . .

प्र: काला है।

आचार्य: यही अहंकार है। वो कहता है, ‘अगर मेरे साथ कुछ अच्छा होना है’, जो भी अपने लिए अच्छा मानता है, सुख-सफलता, जो भी वो कहता है कि मेरे लिए अच्छा है, वो कहता है, ‘या तो मैं करूँगा’, इसी को कर्ताभाव बोलते हैं, ‘या फिर कम-से-कम अगर वो कहीं बाहर से भी हो रहा है, तो मुझे वो बात पता होनी चाहिए कि वो बाहर से कैसा हो रहा है। तो इस तरीक़े से मैं परोक्ष रूप से नियंत्रण में रहूँगा।

‘या तो जो मेरे साथ हुआ वो मैंने स्वयं करा या अगर बाहर से भी हुआ तो मैं उसकी प्रक्रिया के ऊपर बैठा हुआ था। मैं जानता था क्या हो रहा है।’

इसमें गड़बड़ हो जाती है। इसमें आपका भला कभी होने नहीं पाता है क्योंकि इस तरह की बातें होती तो हमेशा आत्मज्ञान के अभाव में ही हैं। अब आत्मज्ञान का जब अभाव है तो आपको कैसे पता कि ‘भले’ की परिभाषा भी क्या है? जब हमें यही नहीं पता हम कौन हैं, तो हमें ये कहाँ से पता चलेगा कि हमारे लिए भला क्या है? तो हम किसी भी उल्टी-पुल्टी चीज़ को अपना हित समझ लेते हैं। हम सोचते हैं ये तो बहुत बढ़िया हो गया मेरे साथ, ये तो बहुत अच्छा हो गया मेरे साथ!

रामकृपा का अर्थ है — तुम्हारे साथ जो अच्छे से अच्छा हो सकता है, वो तुम्हारे नियंत्रण से बाहर की ही चीज़ होगी। वो तुम्हारे क्षेत्र से बाहर की ही चीज़ होगी।

क्यों?

कारण सीधा है, तुम्हारा जो नियंत्रण क्षेत्र है, वही तो नर्क है तुम्हारा। वो जो तुमने अपने लिए सीमा खींच ली है जिसके मध्य में तुम बैठे हो — एक ऐसे दायरा बना लिया है न, उसके मध्य में हम बैठे हैं — तो कह रहे हैं कि यहीं पर तो दुख पा रहे हो तुम पूरा। तो तुम्हारा हित ही इसमें है कि तुमने अपना जो दायरा बना रखा है — अपने ज्ञान का, अपने सम्बन्धों का, अपने नियंत्रण का, अपनी ताक़त का — तुम उस दायरे को टूटने दो। कुछ बाहर का होने दो अपने साथ। वो रामकृपा कहलाती है।

रामकृपा का अर्थ इतना ही है कि तुमने सिर झुका दिया किसी ऐसी चीज़ के सामने जो तुमसे बहुत दूर की है। अहंकार उल्टा चलता है, इसलिए अहंकार को रामकृपा की सीख देनी ज़रूरी होती है। अहंकार जो कुछ भी अपने से दूर का मानता है, तुरन्त उसका विरोध करता है। ‘अगर ये मुझसे भिन्न है, मुझसे अलग है, मैं इसके बारे में जानता नहीं हूँ, तो मैं इसका नियंत्रण नहीं कर सकता न। मुझे इसका विरोध करना है, किसी भी तरीक़े से इसको रोकना है।’

समझ में आ रही है बात?

समझिए कि हम अपनी पूरी ज़िंदगी क्या करने में लगाते हैं। हम पूरी अपनी ज़िंदगी लगाते हैं अपने ही दायरे को और सुदृढ़ करने में। हम अपनेआप को फ़ोर्टिफ़ाई (मज़बूत) करते हैं न। फ़ोर्टिफ़िकेशन (किलेबंदी) समझ रहे हैं? अपने चारों तरफ़ किलों का निर्माण करते हैं और किले की दीवारें ऊँची करते हैं। और दीवारों के आगे हम खाइयाँ खुदवाते हैं, उन खाइयों में पानी भरते हैं, उस पानी में मगरमच्छ छोड़ते हैं।

ये सब किलों में देखा है कि नहीं देखा है? कि पहले तो ऊँचे प्राचीर, फिर ये मोटी-मोटी दीवारें होती हैं! दीवारें इतनी मोटी होती हैं कि उस पर आप क्रिकेट मैच खेल लें दीवार पर चढ़कर, इतनी मोटी दीवार! काहे को? तोप का गोला भी आये तो दीवार टूटनी नहीं चाहिए। फिर उन दीवारों में बीच-बीच में झरोखे बने होते हैं। वो किसलिए बने होते हैं? वहाँ पर आप छोटी तोप या बंदूक लगाते हो कि कोई होगा, बाहरवाला आएगा तो उस पर आक्रमण कर सकें।

वो जो किला है न, वो इंसान का जीवन है समझिए। वो जो किला है, वो एक तरह का प्रतीक है कि अहंकार कैसा होता है। और हम सोचते हैं हम उसके भीतर बैठकर अपना भला कर रहे हैं, हमने अपनेआप को उसके भीतर सुरक्षित कर लिया है। और जो साधारण अनुभव होता है वो इसकी गवाही भी देता है कि हाँ, ऐसा ही तो है, आप उसके भीतर हो तो आप बचे हुए हो। बाहर जो कुछ है वो आपका दुश्मन है, नाश करना चाहता है आपका। नहीं! तथ्य ये है कि हम जिस किले के भीतर हैं वो किला हमारी ऐशगाह नहीं है। क्या है हमारा? काराग्रह है भाई।

कल बात पुर की हो रही थी; किसको याद है? पुर माने?

श्रोतागण: जिसमें पुरुष निवास करता है।

आचार्य: और वो जो पुरुष है, वो अपनेआप को पुर के बीचों-बीच रखकर सोच क्या रहा है? वो अपने में मस्त। वो क्या सोच रहा है? कि मैं तो यहाँ पर सुरक्षित हूँ और क्या मैं यहाँ सुख लूट रहा हूँ! तथ्य क्या है कि वो वहाँ पर?

श्रोतागण: क़ैद है।

आचार्य: क़ैद है। तो प्रकृति-पुरुष का पूरा सिद्धांत यही है। प्रकृति पुर है, जिस किले की आज हम बात कर रहे हैं। किलों के भीतर कई बार पूरा एक नगर ही बसा होता था न टाउनशिप जैसा। किले कोई छोटे-मोटे थोड़ी होते थे, उसमें पूरी आबादी बैठी थी अन्दर। बीच में राजा का महल है; चारों ओर क्या थी? आबादी थी और तमाम तरीक़े की व्यवस्थाएँ होती थीं।

तो प्रकृति पुर है, उसके बीच में जो बैठा है वो पुरुष है और वो सोच रहा है कि वहाँ रहने से उसका बड़ा भला हो रहा है। और उसने ये दीवारें खड़ी करी हैं और खंदकें खोदी हैं और तोपें लगाई हैं। जबकि यथार्थ ये है कि वो उसमें क़ैद है, वो उसमें क़ैद है।

तो रामकृपा का अर्थ ये है कि जो कुछ तुम्हारे किले को तोड़ता है उसको तोड़ने दो। जब तक तुम्हारा बस चलेगा तो तुम तो यही करने वाले हो कि पुर का दरवाज़ा बहुत देख-समझकर ही खुलेगा।

अगर दरवाज़ा तुम्हारी अनुमति से ही खुलना है, तुम्हारे देखे-समझे से ही खुलना है, तो तुम किसको भीतर आने दोगे? वही तो लोग भीतर आएँगे जो तुम्हारे ही तरह के हैं या जिनको तुमने अनुमति दी है। तुम्हारे तरह के हैं माने तुमसे मेल खाते हैं। तुम अपने से अलग किसी भी चीज़ को अपने किले में आने दोगे क्या?

वो किला कहाँ है? मन और जीवन। आप अपने जीवन में किसी ऐसे को कभी प्रवेश करने देते हैं जो बिलकुल भिन्न हो? जो भिन्न है उसको तो देखते ही हम कहते हैं — अरे! अलर्ट, यलगार, दुश्मन। यही करते हैं कि नहीं?

तो रामकृपा फिर क्या हुई? रामकृपा ये हुई कि अहंकार ने कहा, 'ये जो स्वरचित मैंने दीवारें खड़ी करी हैं, इनकी रक्षा करने में रुचि कम होती जा रही है।' ये रामकृपा है।

रामकृपा ये नहीं होती कि आप बैठे रहोगे किले के भीतर और आसमान से आपके लिए फल-फूल, सेब, अंगूर, केला गिरेगा। ज़्यादातर लोग ऐसे ही सोचते हैं न कि कृपा का मतलब ये है कि मेरी जो कामनाएँ हैं, मेरी वर्तमान स्थिति में रहते हुए मैंने जो कामनाएँ कर रखी हैं, मेरी वो कामनाएँ पूरी हो जाएँगी।

कामनाओं के साथ समस्या बस एक छोटी सी है। जो उस तथाकथित किले में — जो वास्तव में कारागृह है — जो उस किले में है वो सारी कामनाएँ कर लेगा। कभी एक कामना है जो करता ही नहीं, कर सकता ही नहीं? वो सारी कामनाएँ करेगा। सारी कामनाओं के मध्य में क्या होगा? कि जो मेरी स्थिति है यहाँ किले के भीतर, वो सुदृढ़ बनी रहे। एक कामना बस वो कभी नहीं कर पाएगा क्योंकि वो कामना की प्रकृति ही नहीं है। क्या? कि किला टूटे। ये कामना वो कभी नहीं कर पाता।

तो जब आप कृपा को कामना से जोड़ते हो तो बड़ी भारी भूल हो जाती है। और हम यही करते हैं न! हम सब अपने-अपने किलों में जी रहे हैं और जब हम चाहते भी हैं कि हम पर कृपा हो तो हम यही चाहते हैं कि किले में धन-धान्य बढ़े, किले में सुख-सुविधा बढ़े। यही तो चाहते हो न! यही चाहते हो न? ये कृपा नहीं है। धर्म का सम्बन्ध कामनापूर्ति से नहीं होता। धर्म इसलिए नहीं होता है कि आपकी कामनाएँ पूरी हो जाएँ।

कृपा का अर्थ होता है — कुछ ऐसा होने दीजिए आपके साथ जो एकदम अपूर्व है, अनूठा है, न्यारा है; आपकी कल्पना, आपकी कामना से बिलकुल अलग है।

अलग से आशय विपरीत नहीं होता। आपकी कामना से विपरीत कुछ है तो वो तो आपकी कामना से सम्बन्धित ही हो गया न। उससे कुछ नहीं होता।

समझ में आ रही है बात?

कृपा का क्या अर्थ है? कृपा का अर्थ है जो मुझसे अनुमोदित नहीं है, अनुमत्त नहीं है, एक्सेप्टेड (स्वीकृत), मैं उसके प्रति भी ज़रा खुलेपन का भाव रखूँगा। अगर आप वही सब कुछ होने देंगे जो आप चाहते हैं तो फिर आप उसी स्थिति में बने भी रह जाएँगे जिस स्थिति में चाहत है। (मुस्कराते हुए)

मुझमें चाहत क्यों है? क्योंकि मैं भूखा हूँ। तो मेरी जितनी कामनाएँ हैं वो मेरी भूख से उठ रही हैं। ठीक है न! मेरी जितनी कामनाएँ हैं, मेरी भूख से उठ रही हैं। और कामनाओं के बारे में एक नियम होता है जिसको हम समझते नहीं हैं। वो जिस स्थिति से उठ रही होती हैं उस स्थिति को ऊपर-ऊपर से बदलती हैं, नीचे-नीचे यथावत् रखती हैं।

कामना जिस स्थिति से उठ रही होती है, वो उस स्थिति को कभी पूरे तरीक़े से ठीक नहीं होने देती; ऊपर-ऊपर से वो उसका इलाज करती है, नीचे-नीचे बीमारी को क़ायम रखती है।

ये आप बात समझ पा रहे हैं कुछ?

कभी ऐसा हुआ है कि आपने अपनी कामनापूर्ति कर ली हो — प्रमाण दे रहा हूँ — कभी ऐसा हुआ है कि आपको जो इच्छा थी, जो चीज़ चाहिए थी, वो आपको मिल गयी और उसके बाद वो चीज़ आपको दोबारा कभी नहीं चाहिए? कुछ ऐसा हुआ आज तक? कभी हुआ क्या?

तो कामना से कामनापूर्ति का विचार आता है और जो कामनापूर्ति का विचार आता है, वो कभी भी कामना को पूर्ति देता नहीं है। बस ऊपर-ऊपर से ऐसा लगता है कि कुछ सतही किसी तरह का क्षणिक इलाज हो गया। लेकिन वो इलाज बस इतना ही करता है कि कुछ समय बाद फिर से वही कामना उठेगी। उसी शक्ल में नहीं उठेगी तो किसी और शक्ल में उठेगी। उसी विषय की नहीं उठेगी तो थोड़ा बदले हुए विषय की उठेगी, पर उठेगी ज़रूर।

भाई, कामना का वास्तविक उपचार क्या होता है? आपको इच्छा उठ रही है और इच्छा को अगर आप एक तकलीफ़ की तरह लें तो उसका वास्तविक उपचार क्या होता?

प्र: इच्छा उठे ही नहीं।

आचार्य: कि ऐसा कुछ मिल गया इलाज कि आगे के लिए कामना उठनी ही?

प्र: बंद हो गयी।

आचार्य: आप बताइए आपने आज तक इतनी कामनाएँ पूरी कर लीं, कभी ऐसा कुछ हुआ कि आगे के लिए कामना उठनी ही बंद हो गयी?

तो हम सोचते हैं कि हमारे साथ बहुत अच्छा हो जाता है जब हमने जो माँगा है वो हमें मिल जाता है। जानने वाले आपको बार-बार यही समझाते रहे हैं कि ये आपके साथ कुछ बहुत शुभ नहीं हो गया अगर आपने जो माँगा था वो आपको मिल गया।

ये कहानी है पुरानी कि एक कोई व्यक्ति था, उसे धोखे से लूट लिया उसके ही साथियों ने। उसे उसके ही साथियों ने लूट लिया। तो वो लुट गया और उसने कोशिश करी होगी बचने की, वो नहीं बच पाया। तो वो जिन्होंने लूटा था, उनसे बोलता है, 'देखो, तुम्हारी सज़ा ये है कि तुम्हारी लूट सफल हो गयी।' तुम्हारी सज़ा ये है कि तुम्हारी लूट सफल हो गयी; अब तुम यही करोगे। अब तुम यही करोगे और बार-बार करोगे।

ये बात कामना पर लागू होती है। वो ऊपर-ऊपर से आपको ये जताती है कि पूर्ति हो गयी है। थोड़ी देर के लिए आपको ऐसा भरोसा सा सुख भी दे जाती है कि हाँ भई, जो चाहा था वो मिला। तो आप वही-वही-वही-वही करते हो। मिल गया होता तो वही-वही काम बार-बार क्यों कर रहे होते?

और कोई अगर कुछ ग़लत करके सफल हो जाए तो सोचिए कितनी बड़ी सज़ा है। इसलिए कहा गया है कि अब किसी को ठगना मत। ख़ुद ठगे जाओ, कोई बड़ी त्रासदी नहीं हो गयी, किसी को ठगना मत। क्योंकि अगर किसी को ठग रहे हो तो फिर ठगते ही रह जाओगे। यही ज़िंदगी बन जानी है तुम्हारी। और काश कि दूसरे को ठगने से या स्वयं को बुद्धू बनाने से कुछ मिल ही जाता; मिलता कुछ नहीं है।

रामकृपा फिर बस उन्हीं पर होती है जो ये अहंकार छोड़ देते हैं कि वो ख़ुद अपने ऊपर कृपा कर सकते हैं। तो रामकृपा आप पर हो सके, उसके लिए एक विनम्रता चाहिए होती है। विनम्रता ये कि भाई, ठोक-बजाकर देख लिया, हम कितने पानी में हैं हमें पता चल चुका है। हमारे करे तो हमारा कल्याण होने से रहा।

हम अपने साथ जो बड़े से बड़ा काम कर सकते हैं वो ये कर सकते हैं कि हम अपनी दीवारें गिरा दें। अगर मेरे पास करने को कुछ है तो बस एक ही काम है पूरे जीवन में, वो ये कि मैं अपनी दीवारें गिरा दूँ। उसके अलावा कुछ भी करने को नहीं मेरे पास जीवन में। क्योंकि अगर दीवारें गिराने के अलावा मैं अपनेआप को कोई काम सौंपता हूँ तो वो काम क्या होगा?

पका रहे हैं दीवारों के भीतर-भीतर कुछ! उससे तो कुछ नहीं होगा न। लेकिन जीवन है पूरा और जीवन है तो कर्म भी है। तो कुछ तो करना है न जीवन में। तो क्या करना है? वो यही करना है कि आपने अपने व्यक्तित्व की जो दीवारें बनाई हैं, आपने अपने किले को जो इतना फ़ोर्टिफ़ाई करा है, गिरा दें उसको। गिराएँ।

तो किसी ने बहुत मस्त तरीक़े से कहा है कि जीने का और उद्देश्य कुछ होता ही नहीं है अपने नाश के अलावा। अब जो ये बात नहीं समझेंगे, वो कहेंगे, 'क्या बेहूदी बात हो रही है कि इंसान इसलिए जी रहा है कि अपना नाश कर दे!' पर समझिए तो, कहने वाला कहना क्या चाह रहा है।

आप इसलिए नहीं हो कि आप जिस जेल के भीतर हो, उस जेल के भीतर ही सजावट कर रहे हो। क्या कहोगे ऐसे आदमी को जो जेल के भीतर बंद है और पूरी ज़िंदगी बस उसने यही करा है कि जेल की सफ़ाई करी है और सजावट करी है?

जब करना ही है, श्रम कर रहे हो, कर्म कर रहे हो, जान लगा रहे हो, तो क्या काम है फिर? बाहर क्या है, हमें कैसे पता चलेगा, हम तो कभी बाहर गये नहीं। हमें नहीं पता। हाँ, हम इतना कर रहे हैं कि ये मुझमें और बाहर में जो अवरोध खड़ा हुआ है उसको गिरा रहे हैं। अवरोधों को गिराना आपका काम है। ठीक है!

रामकृपा जो भी चीज़ होती है, उसको तो ग्रेस बोलते हैं न, वो आपके करे नहीं होगी और वो आपकी कामना से नहीं होगी। आप बस उसके लिए अनुकूल स्थितियाँ तैयार कर सकते हो। अनुकूल स्थिति क्या होती है? दीवार गिरा दी।

इसी को फिर संत कवियों ने ऐसे कहा है कि तुम आ जाओ, हमने सफ़ाई कर दी है, पानी-वानी छींट दिया है, आसन बिछा दिया है और प्रतीक्षा कर रहे हैं, तुम आ जाओ। इससे ज़्यादा हम कुछ कर भी नहीं सकते। हम क्या करें? हमने इतना कर दिया है कि जो चीज़ें तुम्हें आने से रोक सकती थीं उन चीज़ों को हमने हटा दिया है।

बाहर से कोई भीतर आये, उसे क्या रोकता है? दीवारें-दरवाज़े; हमने वो हटा दिए हैं और हम प्रतीक्षा कर रहे हैं। प्रतीक्षा कर रहे हैं। यही काम है, यही स्वधर्म है। अपनी जेल जिसको हम दुर्भाग्यवश अपना दुर्ग समझते हैं, साफ़ करो, हटाओ। नहीं भी हटाओगे तो कुछ नहीं हो जाएगा, जैसे जन्म हो गया जेल के भीतर वैसे मौत भी हो जाएगी, सबकी होती है। कोई फ़र्क नहीं पड़ता। कल गा ही रहे थे, "साधो! ये मुर्दों का गाँव।" कुछ नहीं होता।

पर अगर कुछ ऊँचा, कुछ बेहतर पाना है ज़िंदगी में, तो फिर रास्ता है डेमोलिशन (विध्वंस) का; गिराओ, अपनी ही दीवारें गिराओ। दूसरी चीज़ क्या बोली थी रामकृपा के अलावा? कुछ और भी बोला था?

प्र: "हरि रूठे" का क्या अर्थ है, वो इसी में कवर हो गया। आचार्य जी, एक और प्रश्न है और इसी के कंटिन्युएशन (क्रम) में है। थोड़ी देर पहले हम चर्चा कर रहे थे, मुझे पहले दस-बीस मिनट सब कुछ समझ में आ गया। उसके बाद थोड़ा बोझिल होता चला गया और ऐसी हालत हो गयी कि मैंने देखा सब सिर हिला रहे हैं, सबको समझ में आ रहा है पर मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। फिर धीरे-धीरे सत्र के साथ-साथ चीज़ें स्पष्ट होती चली गयीं। बाहरी परिस्थितियाँ सबकी एक जैसी हैं, समझने की, एब्ज़ोर्ब (आत्मसात) करने की, अपनाने की क्षमता किन फैक्टर्स पर निर्भर करती है? कौन से वो फैक्टर्स हैं जो हमको ज्ञान की, ज्ञान की धारणा की तरफ़ लेकर के जाते हैं?

आचार्य: साहस चाहिए होता है। क्योंकि आप जिस ज्ञान की बात कर रही हैं, वो ज्ञान अपनी प्रकृति से नकारात्मक होता है। नकारात्मक से क्या आशय है? कि वो तोड़ता है। पहले से ही जिस चीज़ को हम ज्ञान समझकर बैठे होते हैं वो उसको तोड़ता है। तो चोट लगती है एकदम, दिल पर चोट लगती है। साहस चाहिए, साहस चाहिए कि उसको स्वीकार करें।

मैं हमेशा कहा करता हूँ कि ये जो यहाँ बात कही जा रही है, ये बात समझने के लिए कोई भारी बुद्धिमत्ता नहीं चाहिए। ज्ञानमार्ग का सम्बन्ध अक्सर लोगों ने बुद्धि से लगा लिया है। लोग कहते हैं कि जो इंटेलिजेंट (बुद्धिमान) होते हैं, पाथ ऑफ नॉलेज (ज्ञानमार्ग) उनके लिए है। ऐसा ही कहते हैं न? फिर कहते हैं जो इमोशनल (भावुक) होते हैं, पाथ ऑफ भक्ति (भक्तिमार्ग) उनके लिए है। ये बिलकुल पागलपन की बात है, ऐसा कुछ भी नहीं है।

ज्ञान हो, भक्ति हो, आप अपनी ओर से जो भी मार्ग का नाम देना चाहें, मेरे देखे तो दो मार्ग होते ही नहीं हैं। मुझे कभी नहीं समझ में आया कि लोग ज्ञान और भक्ति को अलग-अलग कैसे देख लेते हैं। सबका काम एक होता है — आपको आपकी बीमारी से मुक्त करना। ठीक है न! मार्ग अलग-अलग होंगे, आप तो वही हो न।

भई, तरह-तरह के उपचार हो सकते हैं, औषधियाँ हो सकती हैं। आप बोलते हो कि एलोपैथी है, होम्योपैथी है, हो सकते हैं। अरे! होंगे अलग-अलग तरह के उपचार, रोगी तो एक ही है न। या ऐसा है कि अलग-अलग उपचार, अलग-अलग रोगी के लिए है? एक ही आदमी होता है, उसके लिए ये सब अलग-अलग चीज़ें हैं। तो रोगी एक है, रोग एक है।

रोग क्या है? रोगी ही रोग है। दुखी ही दुख है। आपकी हस्ती ही आपका दुख है। जिसको आप 'मैं' कहते हैं और उस 'मैं' के चारों ओर आपने जो व्यक्तित्व की परतें चढ़ा ली हैं, वही तो दुख है न। वही दुख है।

तो होगा कोई भी मार्ग, वो करेगा क्या? कोई भी मार्ग होगा, अगर आप मान भी लो अलग-अलग मार्ग हैं, तो कोई भी मार्ग होगा, वो करेगा क्या? वो परतें हटाएगा। साहस चाहिए न परतें हटवाने के लिए, क्योंकि परतों का नाम क्या है? परतों का नाम 'मैं' है। 'मैं' पर तो चोट पड़ेगी ही।

अरे! आप कोई भी दवाई खा लो, अलग-अलग दवाइयाँ होती हैं एक ही बीमारी की। अगर वो दवाई सफल है तो क्या करेगी? रोग को हटाएगी न या उसमें भी अलग-अलग परिणाम होंगे? कि एक दवाई होती है वो रोग को हटाती है और एक दवाई होती है जो रोग को बढ़ाती है, और एक दवाई होती है जो कुछ नहीं। अरे! भाई तो फिर वो दवाई कहाँ है!

दवाइयाँ विविध हो सकती हैं, उनका आप पर प्रभाव तो एक ही होना है — रोग हटेगा। और रोग क्या है? हमारी मान्यताएँ, हमारा व्यक्तित्व, यही दुख है हमारा। और तो कोई दुख होता नहीं। तो आप कोई भी मार्ग पकड़ लो, उस पर चलने के लिए साहस चाहिए। साहस नहीं होता है, जब कोई कहता है कि आपकी बातें भारी हैं, समझ में नहीं आ रहीं, मैं कहता हूँ, 'भक्क! मैं भारी नहीं हूँ, तेरी लाचारी है।’ बात नहीं भारी है, तेरी लाचारी है।

लेकिन इतनी ईमानदारी नहीं है कि साफ़-साफ़ बोलो कि मैं लाचार हूँ, आपकी बात स्वीकार करता हूँ तो चोट लगती है। तो कह देते हो — अरे! ये तो बड़ी जटिल, गूढ़ बातें बोली जाती हैं ज्ञानमार्ग में, समझ में नहीं आतीं। हाँ, मैं बिलकुल मान रहा हूँ, इतना छोटा बच्चा है, उसको नहीं समझ में आएगा। लेकिन मेरे देखे ग्यारह-बारह साल की उम्र के बाद से ये बातें एकदम समझ में आनी शुरू हो सकती हैं। एकदम हो सकती हैं। क्योंकि इसमें ऐसा कुछ है ही नहीं जिसके लिए आपको एक सौ पचास का आई क्यू चाहिए होता हो।

एक दफ़े बातचीत हो रही थी, मैंने कहा था कि जेईई का जो फिज़िक्स (भौतिकी) का सिलेबस (पाठ्यक्रम) होता है, उसके लिए आपको जितना आई क्यू चाहिए होता है, अगर सिर्फ़ आई क्यू की बात करें, तो वेदांत को समझने में उससे कम ही लगना है, ज़्यादा नहीं। और अगर जो मूल सिद्धांत हैं अध्यात्म के, उसमें किसी को दीक्षित करना है तो एक सेमेस्टर का कोर्स काफ़ी है। छः महीने में सब कुछ बताया जा सकता है।

तो फिर अटकता क्या है? छः महीने में तो सबको मुक्त पुरुष बन जाना चाहिए; अटकता क्या है? साहस अटकता है। फिज़िक्स साहस नहीं माँगती। आप बहुत नालायक और बहुत कमज़ोर और बहुत कायर आदमी होकर भी जेईई टॉप कर सकते हो। बिलकुल कर सकते हो। लेकिन आप वेदांती नहीं हो सकते अगर आप साहसी नहीं हो। क्योंकि जो बात कही जा रही है, समझ में तो आ जाएगी, जियोगे कैसे? समझ में तो आ गयी; जियोगे कैसे?

और ये आदमी मानने को राज़ी होता नहीं है कि समस्या कायरता और कमज़ोरी की है। तो आदमी कहता है, 'नहीं, अभी समझ में नहीं आयी है। नहीं, सोचेंगे अभी, समझ में नहीं आयी।' भक्क! क्या समझ में नहीं आया? क्या समझ में नहीं आया? बताओ तो, क्या समझ में नहीं आया? तो इतने में वो गुस्सा हो जाते हैं, फिर नहीं बताते क्या समझ में नहीं आया।

इसी तरह से दूसरा बहाना होता है — नहीं, समझ में तो आ गया, इंटेरेस्टिंग (दिलचस्प) नहीं है, रुचि नहीं जाग्रत हो रही। अच्छा कौनसी चीज़ तुम्हें अरुचिकर लगी है, ये बता देना। ‘अ-अ-अ-अ!’ इधर-उधर की बातें।

कुल एक बात होती है। उसको अगर मैं थोड़ा सूरता की भाषा में कहूँ तो साहस और अगर मैं उसको थोड़ा सा कोमलता की भाषा में कहूँ तो प्रेम; सब कुछ आकर के उसी एक शब्द पर टिक जाता है — चाहते भी हो कि नहीं? कहे, ‘नहीं समझ में आ रहा’, चाहते हो कि आये समझ में? चाहते हो तो तुरंत आ जाएगा; नहीं चाहते हो तो नहीं आएगा, एकदम नहीं आएगा।

आप अपने घर में जाएँ और बहुत सद्पुरुष, महापुरुष तो सब हमको लगता है हमारे घरों में ही बैठे हैं, वो कहें, 'भैया हमें बातें नहीं समझ में आती तुम्हारी।' बदनीयती है, बहुत बड़ी बेईमानी चल रही है। कुछ ऐसा नहीं है जो समझ में नहीं आएगा।

क्या नहीं समझ में आ रहा? बस समझ गये तो ख़तरा हो जाएगा तुमको। जी नहीं पाओगे जैसे जी रहे हो, चीज़ें बदलनी पड़ेंगी। और क्यों नहीं बदलना चाहते? कुछ नहीं है, सुख-सुविधाएँ जोड़ ली हैं। जिस तरीक़े का ढर्रा चल रहा है ज़िंदगी का, उसके साथ अभ्यस्त हो गये हो बिलकुल। मज़ों की लत लग गयी है। और प्रेम इतना है नहीं कि कहो कि कष्ट झेलने को तैयार हैं मुक्ति की ख़ातिर।

अब यहीं पर आकर फिर रामकृपा की ज़रूरत पड़ जाती है न। किसी में कैसे प्रेम जगाएँ? किसी में कैसे साहस जगाएँ? साहस तो फिर भी आपको लगता है कि जगाया जा सकता है। शौर्यरस के उसको गीत-वीत सुनाओ और घंटा-घड़ियाल बजाओ, मिलिट्री म्यूज़िक , तो सबकी थोड़ी सी उत्तेजना जगती है शरीर में, थरथराहट उठती है और लगता है कि अभी बस तलवार खींचें।

प्रेम कैसे जगाओगे? कामना भी जगाई जा सकती है। कामलोलुप किसी को गीत सुना दो या तस्वीरें दिखा दो, कामना भी जग जाएगी। प्रेम कैसे जगाओगे किसी में? अब यहाँ पर आदमी अटक जाता है। यहाँ तो फिर रामकृपा की बात है, हो रहा है कि नहीं हो रहा है; किसी को मजबूर थोड़ी कर सकते हो प्यार करने के लिए।

समझ में आ रही है बात?

तो सबसे पहले क्या चाहिए? समझ में भी कुछ आये, उसके लिए क्या चाहिए? प्रेम। तो इसलिए रमण महर्षि फरमा गये हैं; क्या? "भक्ति ज्ञान की माता है।" ज्ञान होगा ही नहीं अगर प्रेम नहीं है। हो रहा होगा ज्ञान, आप होते ज्ञान को रोक दोगे अगर प्रेम नहीं है। समझ में आ रही होगी बात लेकिन आप ऐसे करोगे जैसे कुछ समझ में नहीं आ रहा।

मैंने कितनी बार देखा है, मैं बात कर रहा होता हूँ, कर रहा होता हूँ, वो ऐसे सुन रहे हैं। अब वो आये थे विरोध करने को — अब कम होता है पहले ज़्यादा होता था, अब जो विरोध करने वाले हैं, आते नहीं हैं। वो पीछे से काम करते हैं अपना। तो आये थे विरोध करने को लेकिन फँस गये, बैठकर सुनने लगे। वो सुनते जा रहे हैं, सुनते जा रहे हैं और बात ऐसी है कि बात में डूबते जा रहे हैं, डूबते जा रहे हैं, डूबते जा रहे हैं, डूबते जा रहे। अचानक उनको याद आता है कि अरे! ये थोड़े ही करने आये थे (श्रोतागण हँसते हैं)। वो फिर झनझनाकर ऐसे (तनकर) बैठते हैं।

तो तुम्हें समझ में तो तब आएगा न जब तुम समझ को होने दोगे। समझ भी स्वतः नहीं घट सकती। सब कुछ आपकी अनुमति का इंतज़ार करता है। और वो अनुमति के द्वार तो प्रेम में ही खुलते हैं। वो हो गया तो सब समझ में आ जाएगा, नहीं हुआ तो कुछ समझ में नहीं आता है।

समझ मे आ रही है बात?

कैसे समझ में आएगी बात (हँसते हुए)?

जिसको आप प्रेममार्ग बोलते हो उसका मतलब ही है ज्ञानमार्ग और जिसको आप ज्ञानमार्ग बोलते हो, वो हो ही नहीं सकता बिना प्रेम के। तो ये दोनों अभिन्न हैं। ये सब बातें करना कि एक भक्ति की धारा है, एक ज्ञान की धारा है, ये कुछ नहीं होता। क्या धारा-वारा? मैं हूँ, मेरी बीमारी है, उसको ठीक होना है। एक रोग है, उस रोग को मिटाना है। क्या पचास तरह की बातें!

अब समझ में आएगा कि सत्संग की क्यों बात हो रही थी? क्या गा रहे थे भाई लोग? चलो फिर से एक बार गाकर के सुनाओ। (स्वयंसेवक गाते हैं)

बिनु सत्संग विवेक न होई। रामकृपा बिनु सुलभ न सोई।।

साहस जगता है दूसरे साहसियों को देखकर, इसलिए सत्संग चाहिए। संगति का महत्व है। और एक प्रेमहीन, रसहीन जीवन को अपने ऊपर लाज उठती है किसी प्रेमी को देखकर, इसलिए सत्संग चाहिए। संगति, सही संगति।

कुछ आवश्यक नहीं है कि सत्संग से भी हो जाएगा। पर वो एक कैटलिस्ट (उत्प्रेरक) का काम करता है कि क्या पता हो ही जाए। हमने कहा न कि ज्ञान तभी हो सकता है जब पहले क्या हो?

प्र: प्रेम।

आचार्य: और प्रेम को ही हमने दूसरा नाम दिया था साहस। हमने कहा था, उसका कोई फार्मूला हमें पता ही नहीं, वो कहाँ से लाएँ? ज्ञान तो पता है। ज्ञान आपको सूत्र बता दिए जाएँगे। पर ज्ञान आप तक पहुँचें, इसके लिए आवश्यक होता है?

प्र: प्रेम।

आचार्य: और प्रेम का कोई सूत्र होता ही नहीं कि किसी में प्रेम कैसे उठाएँ। तो प्रेम का सूत्र नहीं होता। पर प्रेम का कैटलिस्ट होता है जो उत्प्रेरणा दे सकता है प्रेम को। और उसका क्या नाम होता है?

प्र: सत्संग।

आचार्य: सत्संग। कि कोई आपके सामने आ गया, अब कैसे इन्कार करोगे कि वो नहीं है? कैसे कह दोगे कि तू तो है ही नहीं? उसकी हस्ती ही प्रमाण बन गयी है, अब तो इन्कार कर पाने का रास्ता बंद हो गया न।

भई, साहस जब नहीं होता है तो आप क्या तर्क देते हो? कायरता का तर्क क्या होता है? और अप्रेम का भी क्या तर्क होता है? कायरता का और अप्रेम का तर्क क्या होता है? सम्भव नहीं है, व्यावहारिक नहीं है, ऐसा तो हो ही नहीं सकता, या ऐसा करेंगे तो बड़ा नुक़सान हो जाएगा। ये तर्क होते हैं न?

अब सत्संग का मतलब होता है कि अब आप किसी ऐसे के सामने पहुँच गये जो सप्रमाण अपनी हस्ती को लेकर खड़ा हो गया, कह रहा है, ‘बताओ। बताओ, अब क्या ऑब्जेक्शन (विरोध) है? आपत्तियाँ गिनाओ।’ अब क्या आपत्ति गिनाओगे? आपने कहा कि ऐसा हो नहीं सकता। और वो क्या बोल रहा है, 'हाँ, हम स्वयं प्रमाण हैं, कैसे नहीं हो सकता! हम खड़े हैं न।' अब तर्क इधर-उधर फिर बगलें झाँकने लगता है। अब क्या तर्क दोगे?

वही बात साहस पर लागू होती है। आप बोल रहे हो, 'हें-हें-हें-हें, नहीं-नहीं, दुश्मन बहुत ताक़तवर है।' और दुश्मन यही है (स्वयं को संकेत करते हुए)। और कहीं दुश्मन नहीं होता। 'दुश्मन बहुत ताक़तवर है’, ऐसा हो नहीं सकता।

‘अजी साहब! इंसान हैं, इंसान तो मिट्टी का पुतला है। हम क्या हैं? ग़लतियों का पिंड हैं।' ये सब आप बातें कर रहे हो और ऐसी बातें करके लगता है आप बड़े विनम्र आदमी हो। पर ये विनम्रता नहीं बेईमानी है। ये सब चालाकियाँ हैं ताकि आप साहस के अभाव को किसी तरीक़े से जायज़ ठहरा सको। और वो खड़ा हुआ है आपके सामने; अब कैसे हटोगे पीछे? अब बोलो, अब कैसे हटोगे?

इसलिए, "बिनु सत्संग विवेक न होई।" सत्संग नहीं है तो तर्क रहेंगे। प्रमाण माँगते हैं न, प्रमाण। इसलिए कल साहब ने कहा था, "अलख पुरुष की आरसी साधू की ही देह।" उस देह का महत्व है। उस देह का महत्व है।

इसलिए भारत में ये बात चली थी कि उस देह को भी छू लो, उस देह का महत्व है। देह माने उसके सशरीर होने का महत्व है। क्योंकि वो देह नहीं होगी तो आप कहेंगे, 'किताबी बातें हैं, ऐसा होता थोड़े ही है।' उसकी देह प्रमाण है कि ऐसा होता है।

तुम्हारी बातें किताबी हैं जब तुम कहते हो कि ऐसा नहीं होता है। वो खड़ा तो हो गया, अब बोलो। उसकी ज़िंदगी देखो न। तुम बोल रहे हो, ‘ऐसे तो जिया ही नहीं जा सकता’, उसकी ज़िंदगी देखो न, वो जी रहा है, मस्त है।

तुम कह रहे हो, 'अरे! नहीं, ये चीज़ छोड़ देंगे तो ये हो जाएगा, वो हो जाएगा।' देखो उसको, तुम्हें स्थूल प्रमाण चाहिए था न। जो सूक्ष्म प्रमाण होता है, जो सूत्र प्रमाण होता है, उससे तो काम चलता नहीं। भई, सूक्ष्म प्रमाण ऐसा होता है कि आपको जैसे किसी ने विज्ञान का कोई प्रिंसिपल (नियम) बता दिया और आप प्रिंसिपल भर से मान जाओ कि उससे संबंधित जो टेक्नोलॉजी है वो सम्भव है।

समझ में आ रही है बात?

उदाहरण के लिए, किसी ने आपको ये प्रिंसिपल बता दिया कि एडियाबेटिक कम्प्रेशन (एडियाबेटिक दबाव) जब होता है तो उससे हीट (ऊष्मा) का क्या रिलेशन (सम्बन्ध) होता है। अभी नया-नया किसी ने ये आपको सामने लाकर के दिखा दिया कि साहब, इस तरीक़े से जब कोई गैस कम्प्रेस करी जाती है तो वो हीट इतनी एब्ज़ॉर्ब करती (सोखती) है या इतनी रिलीज़ करती (बाहर छोड़ती) है, ये इसके रहे आपके सामने सूत्र और डायग्राम्स (रेखा चित्र)। और आप उतना देखकर के बोल दो कि फिर एक रेफ़्रिजरेटर जैसी चीज़ हो सकती है या एयर कंडीशनर जैसी चीज़ हो सकती है।

लेकिन हम इतने तो श्रद्धावान लोग होते नहीं कि कोई सूत्र बता दे और उसे मान लें कि जो चीज़ सूत्र में सम्भव है, वो जीवन में हो सकती है। तो हम कब मानते हैं कि एसी (एयर कंडीशनर) हो सकता है? जब एसी होता है (हँसी)। आपको अगर कोई बस थर्मोडायनेमिक्स (ऊष्मा-गतिकी) के प्रिंसिपल्स दिखा दे तो आप नहीं मानोगे कि एसी हो सकता है। नहीं मानते न?

ऐसा होता है क्या कि आपको थर्मोडायनामिक्स के प्रिंसिपल्स दिखाए जाएँ और उसमें आपको एयर कंडीशनर दिखने लगे? ऐसा तो नहीं होता। तो इसलिए फिर सत्संग की आवश्यकता होती है। वो कहता है, आई ऍम द प्रिंसिपल परसोनीफ़ाइड (मैं इस नियम का मानवीकरण हूँ)। प्रिंसिपल में यकीन नहीं था न, तो प्रिंसिपल के परसोनिफ़िकेशन (मानवीकरण) में तो यक़ीन करोगे!

मैं खड़ा हूँ, आई रिप्रेज़ेंट द प्रिंसिपल (मैं इस नियम का प्रतिनिधित्व करता हूँ)। अब बोलो, अब कैसे इन्कार करोगे? थर्मोडायनामिक से इन्कार कर रहे थे, एसी से कैसे इन्कार करोगे? ये लो ठंडा कर रहा है, अब कैसे इन्कार करोगे? कैसे इन्कार करोगे कि देखो यहाँ टेम्प्रेचर (तापमान) गिर रहा है? कैसे इन्कार करोगे कि तुम स्वयं अनुभव कर पा रहे हो उसकी ठंडक का?

तो इसलिए सत्संग का महत्व होता है। और इसीलिए कुसंग विष जैसा होता है; वो आपको उल्टी चीज़ पर आश्वस्त कर देता है। ठीक वैसे जैसे सत्संग, सही संगति आपको जता देगी, आपको बिलकुल आश्वस्त कर देगी कि हाँ, होता है। वैसे ही उल्टी संगति आपको बिलकुल भरोसा दिला देगी कि नहीं होता, नहीं होता, नहीं होता। और अगर स्वार्थ हो तो कुसंग बड़ा मुश्किल हो जाता है।

उदाहरण के लिए, आपका खानदानी पेशा रहा है एयर कूलर बनाने का। खानदानी पेशा रहा है, मुग़लों के ज़माने से। और उससे बड़ी आपने दौलत इकट्ठा करी है। देशभर में आपका नेटवर्क है जिसमें आप कूलर सप्लाई करते हो। आपका स्वार्थ अब किसके साथ जुड़ा हुआ है?

प्र: अपने एयर कूलर से।

आचार्य: और किसी ने आकर आपको बता दिया कि गैस को ऐसे दबाओ, इलेक्ट्रिक पॉवर (बिजली कि शक्ति) से ऐसे दबाओ और फिर उसको रिलीज़ कर दो तो ठंडक होती है। तो क्या आप इस सूत्र को स्वीकार करना चाहोगे?

पर आप थोड़ी बोलोगे कि स्वार्थ पर चोट पड़ रही है। आप क्या बोलोगे? ‘समझ में नहीं आया।’ बेटा समझ में सब आ गया है। ये पता चल गया है कि समझ गये तो दुकान बंद हो जाएगी इसलिए समझना नहीं चाहते। समझ में तो सब आ गया है। कूलर का तुम्हारा पूरा धंधा ठप्प पड़ना है अगर तुमने ये बात समझ ली तो। तो समझना नहीं चाह रहे हो।

समझ में आ रही है बात? (हँसते हुए)

ऐसे ही कहते हैं न कि आचार्य जी, आपकी बात यहाँ तक समझ में आती है, उसके आगे नहीं समझ में आती है। वो सीमा समझ की नहीं, स्वार्थ की है। जिस सीमा पर आकर आप रुक जाते हो, कहते हो इस सीमा के आगे आपकी बातें समझ में आनी बंद हो जाती हैं, वो सीमा आपकी बुद्धि की नहीं है, वो सीमा आपके?

प्र: स्वार्थ की है।

आचार्य: आपको तो सचमुच, जेन्यून्ली ऐसा लगता है न कई बार कि बात समझ में नहीं आई। तुरंत अपनेआप से कहना, 'हें, कहाँ-कहाँ-कहाँ, स्वार्थ कहाँ अटका हुआ है? कहाँ टंगा है मामला?' बस ये है। स्वार्थ हटाओ, फिर देखो कि समझ में आता है कि नहीं।

इसीलिए पुरानी कहानियाँ है कि समझाने की ज़रूरत भी नहीं पड़ी, ख़ासकर बुद्ध से संबंधित ऐसी बहुत कहानियाँ हैं। वो सामने आकर के बैठा और बैठा रहा दो घंटे, चार घंटे। बुद्ध ने उसकी ओर देखा भी नहीं ठीक से और चार घंटे बाद वो उठता है, प्रणाम करता है, बोलता है, ‘सब समझ में आ गया।’ क्योंकि समझ कोई चीज़ थोड़ी होती है कि मिलनी है। समझ तो होती है आपके स्वार्थ का गिर जाना।

स्वार्थ अगर गिर गये तो मौन में भी समझ है। स्वार्थ नहीं गिरे तो कोई होगा विद्वान गुरु, ज्ञानी, वो आपके सामने दस साल तक बैठकर के प्रवचन करता रहे, "नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो:", नहीं समझ में आनी है। नहीं समझ में आनी है।

प्रवचन सुनना और सत्संग में बैठना, बहुत अलग बात होती हैं। आपमें से बहुत लोग होंगे यहाँ जो प्रवचन सुनने आ गये। दो ही चार होंगे जिन्हें सत्संग मिल रहा है। सत्संग बिलकुल अलग चीज़ होती है।

प्रवचन जब आप सुनते हो तो अपने किले के भीतर बैठकर सुनते हो और सत्संग का मतलब होता है — जिससे मिलने आया हूँ, वो मेरे किले में घुसेगा ही नहीं। मेरा किला गंदा! वो घुसता ही नहीं है गंदी चीज़ों में। तो उससे मुझे मिलना है तो मुझे अपने द्वार खोलकर के उसके पास जाना पड़ेगा। वो नहीं आएगा मेरे पास। मुझे अपनी दीवारें गिरानी होंगी, अपने द्वार खोलने होंगे, मुझे जाना होगा बाहर; ये सत्संग होता है।

श्रोता होना आसान है, सत्संगी होना और मुश्किल है। श्रोता होना भी कोई एकदम आसान नहीं है, सुनने में भी जान जाती है। लेकिन सत्संगी होना और ज़्यादा मुश्किल है।

समझ में आ रही है?

कान खोलना ही मुश्किल पड़ता है, हम दिल कैसे खोलें!

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