आचार्य प्रशांत आपके बेहतर भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं
लेख
'बेबी-बेबी' वाला प्यार
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
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प्रश्नकर्ता: यह जो आशिक लोग होते हैं, एक-दूसरे से बेबी-बेबी वाली भाषा में बात क्यों करते हैं? एक दूसरे को बेबी-बेबी , सोना, या चुन्नू-मुन्नू बोलना, यह क्यों होता है?

आचार्य प्रशांत: वजह तो बिलकुल सीधी है। बेबी क्या होता है? बच्चा! बच्चे का मतलब है वह जिसके पास चेतना बहुत कम है, समझदारी बहुत कम है। तो वो क्या है पूरे तरीक़े से? वो एक शरीर है। बेबी माने एक ऐसा जीव जिसके पास कोई समझदारी नहीं है और जिसके पास एक शरीर है और वह शरीर कैसा है? ‘*बेबी सॉफ्ट!*’ मुलायम-मुलायम और उसकी नाज़ुक सी त्वचा। उसके पाँव भी कैसे हैं? छोटे बच्चों के पाँव देखे हैं कैसे होते हैं? बड़ों जैसे नहीं होते। एकदम नरम, मुलायम, गोरे-गोरे, उसके तलवे में भी तुम ज़रा सी ऐसे उंगली छूआओगे तो एकदम लाल सा हो जाएगा तलवा।

अब दो लोग आपस में कह रहे हैं कि प्यार करते हैं एक-दूसरे को। वो प्यार दो तरह का हो सकता है। एक तो यह कि जिसमें तुम दूसरे को छोटे से बड़ा बना दो, बच्चे से उठा कर के उसको परिपक्व कर दो। और दूसरा यह हो सकता है कि जिसमें तुम एक परिपक्व वयस्क को गिरा कर के बच्चे जैसा बना दो।

अब अगर प्यार ऐसा है जिसमें आपकी ख़्वाहिश ही यह है कि सामने वाला ज़्यादा समझदारी न दिखा दे। तो आप क्या चाहोगे कि वो जो आपके सामने खड़ा है वो परिपक्व रहे, वयस्क रहें, प्रौढ़ रहे या अपरिपक्व रहे? अगर मैं चाहता हूँ कि मैं जिससे रिश्ता रख रहा हूँ, वो ज़्यादा समझदारी न दिखा दे, क्योंकि उसने ज़्यादा समझदारी दिखा दी तो मेरे मंसूबों पर पानी फ़िर जाएगा, तो मैं उसको परिपक्व रखना चाहूँगा या अपरिपक्व रखना चाहूँगा? अपरिपक्व रखना चाहूँगा।

कुछ समझ में आ रहा है कि ज़्यादातर लोग रिश्ते बनाते कैसे हैं? हम रिश्ते बनाते ही ऐसे हैं जिसमें दूसरे की समझदारी हम से बर्दाश्त नहीं होगी। बल्कि अगर वो ज़्यादा समझदार हो गया तो हम उससे कहेंगे कि तुम तो बड़े होशियार हो रहे हो, बनेगी नहीं अपनी। यह होशियारी कहीं और दिखाना।

अगर हम चाहते ही हैं कि दूसरा हमारे लिए सिर्फ़ एक देह रहे, तो बहुत ज़रूरी है न कि हम उसको बेबी बनाकर रखें। क्योंकि बेबी क्या होता है? एक बॉडी , एक देह, एक जिस्म। बेबी के साथ कोई अक्ल नहीं होती। और हमारे भी जितने बेबी-बेबियाँ हैं हम चाहते यही है कि वह ज़रा भी अक्ल का इस्तेमाल न कर लें। बेबी के पास कोई अवेयरनेस (जागरूकता), कोई नॉलेज (ज्ञान) नहीं होता। और तुमको भी ज़रा भी अच्छा नहीं लगेगा अगर तुम्हारी बेबी ज्यादा अवेयरनेस व ज़्यादा नॉलेज दिखाना शुरू कर दे। क्योंकि तुम्हारी बेबी के पास अगर ज़्यादा अवेयरनेस और नॉलेज आ गया तो वह तुम्हारे साथ क्यों रहेगा या रहेगी?

तो हालत यह है कि तुमको अगर कोई परिपक्व लड़का या लड़की मिल भी गया प्रेम में, तो तुम पूरी कोशिश कर-कर के उसकी चेतना का स्तर गिराते हो इतना कि वो चार साल का हो जाए बिलकुल। और जब वो चार साल का हो जाता है तो तुमको बहुत प्यारा लगता है। तब तुम बहुत प्यार से उसके पास जाओगे, कहोगे “ ओ...बेबी...बेबी…बेबी !”

इतना प्यार तुम्हें तब आएगा ही नहीं जब सामने वाला इंसान पूरी समझदारी से तुमसे बात कर रहा हो। हजार में से कोई एक होगा जिसके सामने कोई बैठ जाए, जिसका डेढ़ सौ का आईक्यू (बुद्धिमत्ता-स्तर) हो या जिसमें बुद्ध जैसी प्रतिभा हो और उसे ऐसे इंसान पर प्यार आ जाए। कल्पना करके देखो।

तुम्हारे सामने बैठ गया है कोई बुद्ध जैसा और उसकी आँखें बता रही हैं कि वह बिलकुल जान ले रहा है कि तुम्हारे मन में क्या है, तुम्हारे जीवन में क्या है, तुम्हें ऐसे पर प्यार आएगा क्या? नहीं आएगा। तो फ़िर तुम चाहोगी कि ऐसा इंसान अगर तुम्हें मिल भी गया है तो तुम उसको बेबी बना दो। बेबी बनाने का मतलब है मूर्ख बना देना।

जो तुमको बार-बार बोल रहा है बेबी-बेबी , समझ लो वो यही कह रहा है कि मूर्ख-मूर्ख। और उसका स्वार्थ ही इसी में है कि तुमको वो मूर्ख बनाकर रखें। बेबी के साथ सुविधा रहती है न? उसको गोद में उठा लो, बेबी मना ही नहीं कर सकता। उसको बेवकूफ़ बना दो, बेबी मना ही नहीं कर सकता। उसके मुँह में कुछ डाल दो, बेबी मना ही नहीं कर सकता। उसके कपड़े उतार दो, बेबी मना ही नहीं कर सकता।

भई एक वयस्क परिपक्व आदमी होगा, वह यूँ ही नंगा नहीं घूम रहा होगा। पर बेबी तो ऐसे ही अपना नंगा इधर-उधर घूम रहा होता है। अब अगर तुम्हारा रिश्ता ही ऐसा है जिसमें परिपक्वता नहीं चलेगी और ये नंगाई चलेगी, तो ज़रूरी है कि उसको बेबी बनाकर रखो।

ख़ुश मत हो जाना अगर रिश्ते में कोई तुमको बार-बार बेबीयाता हो। उसके इरादें तुम्हारा मानसिक विकृति करने के हैं। वह तुमको मानसिक रूप से दबाकर रखना चाहता है। और खुशनसीब होओगे तुम अगर कोई तुम्हें ऐसा मिले जो तुम्हारी मानसिक उम्र बढ़ा दे, कि उसको मिलने से पहले तुम ऐसे जीते थे, ऐसे व्यवहार करते थे जैसे बारह साल के हो। ज़्यादातर लोग ऐसे ही जीते हैं: शरीर से उम्र हो जाती है बाईस की और दिमाग़ से उम्र होती है बारह की। तुम्हें कोई ऐसा साथी मिल जाए जो तुम्हारी इस बारह की अंदरूनी उम्र को बढ़ा करके बाईस का कर दे, अट्ठाईस का कर दे तो ऊपर वाले का शुक्रिया अदा करना। लेकिन ज़्यादा संभावना यही है कि तुम्हें ऐसा ही कोई मिलेगा कि जिसके सामने अगर तुम पच्चीस की उम्र की खड़ी हो तो उसकी भरसक कोशिश रहेगी कि वह तुमको पाँच का या सात का बना दे।

तुम्हें क्या लगता है प्रेमिजन आपस में जो बात करते हैं, कु-कु, यह कोई बहुत ऊँचे स्तर की बातें होती हैं? उनमें जिंदगी की गहराई होती है? न, वह बातें बिलकुल वैसी ही होती है जैसे पाँच-सात साल के लड़के-लड़कियाँ कर रहे हो।

पाँच-सात साल के लड़के-लड़कियों की बातों में क्या होता है? आवेग, भावनाएँ। अभी जो लग रहा है वो बोलते जा रहे हैं, बोलते जा रहे हैं। कोई छोटी बात ही बहुत बड़ी हो गई। कोई मुद्दा पकड़ कर बैठ गए, “मम्मी ने डाँट दिया, उसने ऐसा कर दिया, तुम मेरे साथ खेलने क्यों नहीं आए? तुम मेरे साथ खेलने की जगह पड़ोस की प्रिया के साथ क्यों खेलने चले गए आज?” यही तो पाँच-सात साल के लड़के-लड़कियों के मुद्दे होते हैं, “तुमने मेरी डॉल (गुड़िया) चुरा ली। वह मेरी गिल्ली उखाड़ के भाग गया।” यही तो मुद्दे होते हैं पाँच-सात साल के लड़के-लड़कियों के। “उसने मेरी बैटिंग ही नहीं दी आज! उसने मेरी शटल तोड़ दी। उसने मेरी बाॅल फोड़ दी।” यही तो चल रहा होता है।

तो ये जो प्रेमी होते हैं ये भी आपस में कौन सी समझदारी की बात कर रहे होते हैं? ये यह बातें कर रहे होते हैं कि फलाने उपनिषद में क्या लिखा है? ये यह बातें कर रहे होते हैं कि मध्य-पूर्व में क्या चल रहा है? ये यह बातें कर रहे होते हैं कि कोविड की जो अलग-अलग वैक्सीन के परीक्षण चल रहे हैं, उनकी क्या स्थिति है? ये जो प्रेमियों की बातें होती हैं, ये क्या होती है? यह परम बेवकूफी की बात होती है। ये ऐसी बात होती है कि ब्रेकअप के बाद जब तुम देखोगे कि तुम कैसी बातें किया करते थे, तो झट से उसको डिलीट मारना चाहोगे कि “छी-छी-छी!, यह मैं इस तरह की बातें करता था।”

इसलिए नहीं कि वह जो तुम बात कर रहे हो, वह कोई कांड है। इसलिए क्योंकि वह जो तुम बात कर रहे हो वो यह साबित करने के लिए काफ़ी है कि तुम्हारा आइक्यू लेवल (बुद्धिमत्ता-स्तर) तेईस दशमलव दो तीन है। इससे ऊपर का नहीं है। इसलिए बेबीयाना ज़रूरी हो जाता है क्योंकि हम प्रेम दूसरे से, दूसरे को बढ़ाने, उठाने, उसके उत्थान के लिए नहीं करते। प्रेम हम दूसरे से करते हैं अपने स्वार्थ के लिए। और अपने स्वार्थ के लिए दूसरे को गिराना ज़रूरी होता है। दूसरे को गिराना माने दूसरे को बेबीया दिया। कि कल तक तुम कौन थे? बलवंत राय! और बलवंत राय अब क्या हो गया है? वो बल्लू, बल्ली, बेबी बन गए। यह किया इश्क ने तुम्हारे साथ।

तो यह कोई प्यारी बात नहीं है। यह कोई निर्दोषता की बात नहीं है कि प्रेम पंछी बैठे हैं साथ में और एक-दूसरे से बेबी टॉक (बचकानी बातें) कर रहे हैं। यह बहुत ख़तरनाक बात है। जब यह हो रही होती है तब ये बहुत मीठी लगती है; आ..हा..हा..हा। क्यूटनेस की इंतेहा हो जाती है बिलकुल; ओ..लू-लू-लू! लेकिन ये चीज़ बहुत ज़हरीली है। इससे बच कर रहना।

फिर याद दिला रहा हूँ कोई ऐसा खोजो जो तुमको मानसिक स्तर पर ऊँचा उठाए। कोई ऐसा खोजो जो तुमको बस जिस्म की तरह न देखे। जो तुमको बच्चा बना रहा है वह वास्तव में तुमको सिर्फ़ एक जिस्म बना रहा है। बेबी माने शरीर। और वह शरीर भी बिना किसी बचाव के, बिना किसी जागरूकता के।

क्या तुम ऐसा शरीर बनना चाहते हो अपने प्रेमी के लिए? नहीं, तो बेबी मत बन जाना किसी की।

प्र: बॉलीवुड गानों में अभी दस-पन्द्रह साल से बेबी शब्द बहुत उपयोग होता है, जैसे, " बेबी डॉल " और " बेबी को बेस पसंद है"। पहले ऐसे नहीं होते थे।

आचार्य: उसका नतीज़ा ये हो रहा है न कि जब आप सौ बार सुनते हो कि कोई आपको बेबीया रहा है, तो आप आंतरिक रूप से भी बेबी ही हो जाते हो। क्योंकि ज़्यादातर लोग ऐसे तो होते नहीं कि उनके पास आत्मा का केंद्र है और वो बस अपनी आत्मा के कहने पर चलते हैं। उनको तो जो चीज़ तुम सौ बार बोल दोगे उनको तो यही लगने लगता है कि हम वही हैं। अब कोई लड़की है, उसको सौ बार बोल रहे हैं और चार लोग बोल रहे हैं बेबी-बेबी-बेबी , तो वो अपनी नज़रों में भी क्या बन जाती है? वो बेबी ही बन जाती है और फ़िर बेबी बनकर ही घूमने लगती है। और उसके बाद अब न उसका मानसिक विकास हो सकता है, न आध्यात्मिक विकास हो सकता है। अब वो बस बेबी है। उसके शक्ल पर ही एक तरह की अपरिपक्वता आ जाती है, बचपना आ जाता है। यह जो बचपना आ गया है इसमें निर्दोषता नहीं है, इसमें अज्ञान है।

और बुरी-से-बुरी चीज़ यह हुई है कि उसे लगने लग गया है कि यह जो बचपना है, यह उसकी संपदा है। और वो संपदा ही नहीं है, अब वो अपने इस बचपने को हथियार बना लेती है। यह एक हथियारबंद संपत्ति है। हथियारबंद संपत्ति समझ रहे हो? यह जो बचपना हैं, यह जो क्यूटनेस है इसका इस्तेमाल हथियार की तरह किया जाता है। कैसे हो गया यह एक हथियार? समझना! जो पुरुष वर्ग है वो खोज ही रहा है किसी ऐसी को जो देह ही देह हो और दिमाग़ से गुल्ल हो। क्योंकि तुम्हें वास्ता ही क्या है? उसकी देह से वास्ता है। ज़्यादातर जो पुरुष हैं या लड़के हैं वो कैसी लड़कीयाँ ख़ोज रहे हैं? जो बहुत बौद्धिक हो, समझदार हो, जागरूक हो?

दुर्भाग्य की बात है कि ऐसी लड़कियाँ कोई नहीं चाहता। ज्यादातर लड़के ऐसी ही लड़कियाँ खोज रहे हैं और इसका उल्टा भी, शायद हो सकता है, लड़कियाँ भी ऐसे लड़के खोज रही हों। ज़्यादातर पुरुष ऐसी ही लड़कियाँ खोज रहे हैं जो शरीर से तो पूरी तरीक़े से जवान हैं, वयस्क हैं लेकिन मानसिक तौर पर एकदम मूर्ख हैं। क्योंकि ऐसी लड़की से अपनी स्वार्थ की पूर्ति करना बहुत आसान है। भई! वो ज़्यादा सवाल नहीं पूछेगी। तुम उसे बेवकूफ़ बना सकते हो। तुम उसके साथ जिस तरह का चाहे खिलवाड़ कर सकते हो। वो ज़्यादा विरोध ही नहीं करेगी। या अगर उसका विरोध आएगा भी तो वो बहुत अनुमानित होगा, आपको पता होगा कि ये किस तरीक़े का विरोध करेगी। चूँकि आपको पता है कैसा विरोध आएगा, तो आपको यह भी पता है कि कैसे उस विरोध को दूर करना है, कैसे उसको जीत लेना है।

तो इसलिए ये सब चलता है कि दूसरे वाले को उसकी ही नज़रों में यह जता दो कि तेरे लिए यही अच्छा है कि तू बेबी बन कर रह और फ़िर वो भी जान जाती हैं कि मुझे अपने बेबीपने को बड़ा करना है, मैंने कहा, हथियारबंद करना है। वो उसका इस्तेमाल फ़िर हथियार की तरह करती हैं। तुम को वही चीज़ उसकी चाहिए, वो वही चीज़ दिखाएगी। और तुरंत वो तुमको जीत लेगी। अब आप पर विजय पा ली गई है। और यह बात, मैंने कहा, दोनों तरफ़ लागू होती है। लड़कों पर भी लागू होती हैं; वो भी इसी चीज़ का इस्तेमाल करते हैं। और यह बहुत गड़बड़ बात है क्योंकि आदमी पर सबसे ज़्यादा असर किसका पड़ना है? साथ का। जो तुम्हारे साथ है वही तुला हुआ है, वही लगा हुआ है कि तुमको उठाने की जगह तुमको बेबी बना देगा, तो अब बताओ तुम्हारे लिए क्या उम्मीद शेष? तो इस चीज़ से बिलकुल बचना।

और आपने बिलकुल ठीक कहा कि ये हिंदुस्तान में तो कभी होता ही नहीं था कि एक-दूसरे को बेबीयाया जाए। यह तो पिछले बीस-चालीस साल में पाश्चात्य भाव है। भारत में इसलिए नहीं होता था क्योंकि भारत में इतनी समझदारी थी कि जिसको प्रेम कर रहे हो, जिसको साथी कह रहे हो अपना, उसका नुकसान नहीं कर देना है। उसको देह ही नहीं बना देना है। उसकी जिंदगी में इसलिए नहीं घुसे हो कि उसको चार साल का खिलौना बना दो।

प्र: आचार्य जी, अभी कुछ समय पहले मैं एक साक्षात्कार देख रहा था यूट्यूब पर। उसमें बताया जा रहा था कि महान पुरुषों की जीवनियों पर आधारित जो टीवी सीरियल्स आजकल आते हैं, जैसे महाराणा प्रताप, तो उनमें ये होता है कि उनको बड़ा ही नहीं होने दिया जाता है। लगातार उनका जो बचपन है, उसी के आसपास कहानी को खींच कर दिखाया जा रहा है। और उनका जो असली जीवन था, जो असली चीज़ उन्होंने की जीवन में, वो अब कभी आ ही नहीं रही है। तो ऐसा क्या है समाज में?

आचार्य: वो झेला नहीं जाएगा न! महाराणा प्रताप ने बड़े होकर जो किया वो चीज़ इतनी ज़बरदस्त थी कि ज़्यादातर लोग उसका मुक़ाबला करना तो छोड़ो, उसका अनुकरण भी नहीं कर सकते। पूरा अनुकरण करना छोड़ो उसका दस-बीस प्रतिशत भी अनुकरण नहीं कर सकते। तो ज़रूरी है कि महाराणा प्रताप को बड़े ही मत होने दो, क्योंकि बड़े हो गए तो ख़तरा बन जाएँगे। छोटे हैं जब तक तो प्यारे लगते हैं। बड़े होकर के कुछ ऐसा करने वाले हैं जिसकी मिसाल तुम अपनी जिंदगी में ला ही नहीं सकते। बल्कि जब वो बड़े हो जाएँगे तो वो तुम्हारे लिए एक अपमान की चीज़ बन जाएँगे। उनका होना तुम्हारे लिए बड़े अपमान की बात हो जाएगी। क्योंकि कहाँ उनकी ऊँचाई, कहाँ उनकी कीर्ति, कहाँ उनकी वीरता और कहाँ तुम्हारा जीवन, डर से लदा हुआ। कहाँ उनकी स्वतंत्रता प्रियता और कहाँ तुम्हारा ग़ुलाम जीवन। तो झेले नहीं जाएँगे महाराणा प्रताप। तो बेहतर है उनको छोटा ही रहने दो।

ठीक यही काम हमने श्रीकृष्ण के साथ भी किया है। बड़े हो गए श्रीकृष्ण तो गीता कह देंगे; खतरा है। इसीलिए हिंदुस्तान ने यह बड़ा अन्याय किया श्रीकृष्ण के साथ कि अगर उनकी गीता एक ने पढ़ी है तो उनकी जो बाल-लीला और बाल-क्रीड़ाएँ हैं, वो सौ को और हजार को पता हैं। इसमें कोई आपत्ति की बात नहीं कि उनकी जो बाल क्रीड़ाएँ हैं या उनका जो बाल रूप है, उसका लोगों को ज्ञान हो। लेकिन यह बहुत भारी आपत्ति की बात है कि ज़्यादातर लोग बस किशन-कन्हैया की बाल सुलभ क्रीड़ाओं तक ही अपने आप को सीमित रखना पसंद करते हैं।

और वो कभी किशन-कन्हैया को श्रीकृष्ण बनने ही नहीं देते; गीता से वो कोई मतलब रखना ही नहीं चाहते। क्योंकि गीता ख़तरनाक है; नन्हा कान्हा सुविधापूर्ण है। नन्हे कान्हा के साथ क्या है? वो ग्वालों के साथ जाता है, गईया चराता है, बाँसुरी बजाता है, मोर आ जाते हैं, मोर नाच रहे हैं, गोपीयाँ आ जाती है, गोपीयाँ नाच रही है, कुछ मीठी बातें हो जाती है। फ़िर वापस आता है तो माँ के साथ कुछ उसकी नटखट नोंक-झोंक हो जाती है। माँ थोड़ा इधर-उधर होती हैं तो वो कभी मक्खन, कभी दही, कभी घी चुरा कर खाता है। इस चक्कर में पात्र फोड़ देता है तो माँ आती हैं, किसी भी अन्य नटखट बालक की तरह कहता है मैं नहीं माखन खायो। अब इन सब बातों में रस भी आ जाता है और क़ीमत चुकानी नहीं पड़ती। तो ज़्यादातर लोग कृष्ण भक्ति के नाम पर बस अपने-आपको इन्हीं चीजों तक सीमित रख लेते हैं।

और मैं फ़िर कह रहा हूँ मेरा आशय ये बिलकुल भी नहीं है कि इन बातों का ज्ञान न हो, या श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का रस न लिया जाए। सुंदर हैं, मीठी हैं उनकी बाल लीलाएँ, ज़रूर उनका आप रस लें। लेकिन मुझे बताइए आप गीता तक क्यों नहीं गए? यदि श्रीकृष्ण आपको वास्तव में प्रिय हैं तो गीता की इतनी उपेक्षा और अवहेलना कैसे कर दी आपने? कहीं ऐसा तो नहीं कि यह आपके मन की आंतरिक साज़िश है? क्योंकि अगर आपने श्रीकृष्ण को बड़ा होने दिया तो निष्काम कर्म भी सुनना पड़ेगा। निष्काम कर्म सुन लिया और जीवन में उसका अनुपालन नहीं किया तो बड़ी बेइज्जती की बात होगी। तो इससे अच्छा यह है कि यह नौबत ही नहीं आने दो कि श्रीकृष्ण के निष्काम कर्म की शिक्षा हमारे कानों में पड़े। ये नौबत ही नहीं आने देंगे। कृष्ण को हम बड़ा ही नहीं होने देंगे। घर में श्रीकृष्ण की प्रतिमा भी रखेंगे तो कितनी बड़ी? वो छोटी सी कि बाल-गोपाल बैठे हुए हैं। बड़ा उन्हें होने ही नहीं देंगे।

मैं फ़िर कह रहा हूँ, श्रीकृष्ण के बाल रूप से किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? बहुत सुंदर है, बहुत रसिक है। लेकिन उस बाल रूप से आगे जाकर के कभी श्रीमद्भागवत गीता तक न पहुँचना, ये बहुत गड़बड़ बात है।

प्र: आचार्य जी, आजकल एक शब्द काफ़ी उपयोग होता है ‘ टॉक्सिक रिलेशनशिप * ’! (ज़हरीला सम्बंध) आमतौर पर जब कॉलेज के दिनों में * रिलेशनशिप (सम्बन्ध) होते थे तो शुरू में बेबी-बेबी वाला खेल शुरू करते थे, क्योंकि लगता था कि इससे काम शुरू होगा। फ़िर थोड़े दिन बाद आपको लगता था जब वो काम हो गया आपका, कामवासना की पूर्ति हो गई, अब जब आप चाहते हैं कि कुछ अच्छी बात भी करें और जब आप शुरू करते थे तो वो बात होती नहीं थी। तो फिर कहते थे, "बकवास! क्या रिलेशनशिप है!" लेकिन फ़िर से वापस कामवासना आती थी फ़िर वही फँस जाते थे। तो एक पूरा दुष्चक्र बनता था कि यहाँ से निकलना भी चाह रहे हैं, लेकिन साथ-साथ आपको कामवासना खींच रही है। मुझे लगता है यही चीज़ शायद टॉक्सिक रिलेशनशिप का पूरा अखाड़ा बनता है। कि एक तरफ़ आप सोचते हैं कि चलो ये करके हम छोड़ देंगे लेकिन वो हो नहीं पाता फ़िर।

अचार्य: करके छोड़ भी नहीं सकते। और जिससे आपने रिश्ते की शुरुआत ही बेबीयाने से करी है उससे फ़िर आप चाहें कि आगे जा कर के आपका रिश्ता किसी ऊँचे स्तर का हो जाए तो बड़ी कठिनाई होती है। क्योंकि जो मूल समझौता है उसके नियम व शर्तें ही यही हैं: तुम बेबी हो, मैं बेबा हूँ। अब तुमने दो-चार महीने बाद उस समझौते को बदलना चाहा, एकतरफ़ा संशोधन करना चाहा तो वो दूसरा पक्ष थोड़े ही तैयार हो जाएगा। वो कहेगा “ठहर जा, तुम कल तक मेरे बेबे थे, आज तुम अचानक से बौद्धिक बन गए। ये तो परिभाषा का उल्लंघन हो रहा है। हमारी तुम्हारी परिभाषा क्या है? मैं तेरी बेबी , तू मेरा बेबा। तू और कुछ कैसे हो रहा है? ये तो नियमों का उल्लंघन हो रहा है न! आपने तो, जो हमारे समझौते के बिंदु है, उन्हीं का उल्लंघन कर दिया।”

तो इससे अच्छा ये है कि जब रिश्ता बनाओ उसी वक्त ज़रा होश रखो और बिलकुल सतर्क हो जाओ, जैसे ही देखो कि कोई तुमको शोना-मोना, सिंगु-चिंगु कुछ बना रहा है। कहो, ये तो मुझे चौबीस से चार का करने की कोशिश की जा रही है। और हम लोग सब प्रभाव की चपेट में होते हैं।

कोई बार-बार तुम्हें चार का बनाएगा तुम बन भी जाओगे, अपनी ही नज़रों में वैसे हो जाओगे। देखते नहीं हो बहुत सारे जो एडल्ट (वयस्क) कपड़े होते हैं, वो बिलकुल वैसे ही होती हैं जैसे एक-दो साल के बच्चों के झबले। एक-दो साल के बच्चों के कपड़े देखे हैं कैसे होते हैं? और बहुत सारे एडल्ट कपड़े बिलकुल वैसे ही होते हैं। ये क्या किया जा रहा है? ये कपड़ों के मामलों में भी, पोशाक के चुनावों में भी, बच्चों की नकल उतारी जा रही है। वो बेबी ही बन गई। उसने कपड़े भी एक-दो साल की बेबी जैसे ही पहनने शुरू कर दिए।

कई बार तो ज़ुबान भी वैसी हो जाती है। तुतलाना शुरु कर दिया और वो बात बड़ी प्यारी लगती है; आ..हा..हा..हा! जो जितना तुतलाए वो उतना ज़्यादा सेक्सी (आकर्षक) हो गया। और ये पाउट (दोनों होंठ) निकालना शुरू कर देते हैं जैसे छोटे बच्चे थुथन निकालते हैं। जाने पाउट है कि स्‍नाउट्‌ है। स्नाउट जानते हो न? सूअर का थुथन। हाँ वही, थाना थाया वाला। तो कोई तुमको ये बनाएगा, तुम वैसे हो भी जाओगे। तुम सही में यह करना शुरु कर दोगे। “मैं तो थाना था रहा था।”

(श्रोतागण हँसते हैं)

अभी हँसी आ रही है, यही बोलते नज़र आओगे।

प्र: आचार्य जी, मेरा सोचना है जो यौन संबंध होता है, उसका कुछ-न-कुछ इस चीज़ से तो बहुत मेल है।

आचार्य: नहीं! देखो ऐसा नहीं है कि यौन संबंध सिर्फ़ दो मंदबुद्धि लोगों में ही बन सकता है। यह बात बिलकुल भी ठीक नहीं है कि जब तक आप दोनों का संयुक्त आईक्यू एकल अंक का न हो तब तक आप आपस में सेक्स कर ही नहीं सकते। नहीं, ऐसा नहीं है। उच्च स्तर के रिश्ते भी हो सकते हैं, और उनमें भी सेक्सुअल डायमेंशन (यौन पहलू) हो सकता है। बस ये है कि वह हमें आमतौर पर दिखाई नहीं देता। ऐसा कोई उच्च स्तर का रिश्ता हमें दिखाई ही नहीं देता, तो हमें लगता है कि यौन संबंध सिर्फ़ बेबी और बेबा में ही बन सकता है। नहीं, ऐसा नहीं है।

कोई यह सोचकर न डर जाए कि अगर मैंने कोई ऊँचा संबंध बनाया तो वह तो फ़िर पूरे तरीक़े से बौद्धिक और आदर्शवादी हो जाएगा। उसमें शारीरिक संपर्क तो होगा ही नहीं। हो सकता है, पर ऊँचे रिलेशनशिप में शारीरिक संपर्क भी फ़िर एक ऊँचाई लिए होगा, उसमें भी एक हलकापन होगा, एक उद्दामता होगी।

वो फ़िर ऐसा नहीं होगा कि पूचू-पूचू करते-करते एक-दूसरे पर हाथ फेरना शुरू कर दिया और बातें ये कर रहे हैं कि तुमने थाना थाया कि नहीं और हाथ टटोल रहे हैं कि इसका बटन कहाँ है, खोल दूँ जल्दी से। यह जो आमतौर के रिश्तों में होता है कि बोलने तो ये गए हैं कि “अले-अले तुम्हें बुखाल तो नहीं हो गया?” और माथा टटोल के भी देख सकते थे कि बुखार है कि नहीं, ये क्या टटोल रहे हो? बुखार होगा तो पूरे जिस्म में होगा। कहाँ हाथ घुसेड़ कर उसका तापमान ले रहे हो?

तो ये सब जाहिल क़िस्म की घटिया रिलेशनशिप्स (रिश्तें) होती हैं। जिसमें दोनों ही पक्ष जानते हैं कि उद्देश्य सिर्फ़ यह है कि किसी तरीके से एक-दूसरे का माँस नोच कर खा लें। एक-दूसरे का जिस्म चबा लें। यही उद्देश्य है। और बाक़ी सब जो ये बचकाना है, और ये सब है, ये उसके आसपास का एक प्रपंच, एक तरह का बहाना मात्र होता है।

प्र: लेकिन मुझे इसमें तो बहुत ज़्यादा समाज का स्वार्थ दिखता है। कि अगर कोई बड़ा होता है, अगर कोई समझदार होता है, अगर आप ऐसे रिलेशनशिप में पड़ गए जिसने आपकी आँखें खोल दी, तो आप वो बहुत सारे काम करना भी छोड़ दोगे जो समाज आप से करवाती हैं। और जितनी भी हमारी फ़िल्म वगैरह हैं, वो बहुत ज़्यादा इस चीज़ को बढ़ा-चढ़ा कर बताती हैं कि आपका जो साथी है उसको होना चाहिए कि वह आपको खाने के लिए पूछ रहा है।

आचार्य: नहीं, खाने के लिए पूछने में क्या बुराई है? लेकिन दो बातों में बुराई है: पहली कि सिर्फ़ खाने के लिए पूछ रहे हो। माने तुम्हारा ताल्लुक सिर्फ़ उसके शरीर की भूख से हैं, उसका मन वास्तव में क्या चाहता है तुम यह नहीं पूछ रहे। तुम पूछ रहे हो थाना थाया कि नहीं। तुम्हें बस इससे मतलब है कि खाना तू खा ले ताकि तेरा शरीर चलता रहे। मन क्या चाह रहा है, दिल की वास्तविक तड़प क्या है, ये तुमने अभी जानने-समझने की कोशिश ही नहीं करी।

एक बुराई ये है और इससे भी बदतर बुराई इसमें है कि तुम शरीर की बात भी सिर्फ़ इसलिए कर रहे हो ताकि शरीर को नोंच-खसोट कर खा सको। उदाहरण के लिए यह कि, "जानू ने खाना खाया कि नहीं खाया?" खाना नहीं खाया और तुमको मौक़ा मिल गया। और झट से एक कटोरे में कुछ लेकर के, वो लेटी हुई है जानू, चढ़ गए उसके बिस्तर पर कि मैं अपने हाथों से खिला देता हूँ। बस हो गया! आप खिलाने के बहाने... थोड़ी देर में कटोरा तो बगल की टेबल पर होगा।

इतनी भी ईमानदारी कहाँ होती है ज़्यादातर लोगों में कि वो कह सके कि मुझे सिर्फ़ और सिर्फ़ शरीर की हवस हैं। शरीर की हवस भी तो इन्हीं बहानों से मिटाई जाती है न? कि तुम्हें बुखार तो नहीं है, तुमने खाना खाया कि नहीं खाया। अरे बहुत प्यारा लग रहा है तू। अच्छा यहाँ आ जा तेरे बाल सेट कर दूँ। तो ये बहुत ही घटिया दर्जे के रिश्ते होते हैं जिनमें ये सब चल रहा होता है।

अब न तो अच्छे साहित्य से परिचय है, न ऊँचे लोगों की आत्मकथाएँ पढ़ी है। तो ऊँचा रिश्ता हो कैसा सकता है, इसकी ज़्यादातर जवान लोगों को कोई कल्पना ही नहीं है। तो उन्हें लगता है कि ऐसा ही होता है। जैसा अभी आप कह रहे थे न कि यौन संबंध का मतलब यही है कि जब दोनों एकदम अपना-अपना स्तर गिरा देंगे तभी यौन संबंध बनेगा। एक उच्च स्तरीय यौन संबंध भी हो सकता है, इसका तो कोई अनुमान भी नहीं है, कोई कल्पना भी नहीं है ज़्यादातर लोगों को, क्योंकि कोई परिचय ही नहीं है। न ऊँचे लोगों से कोई साथ है, संगत है, न पुराने बीते हुए ऊँचे लोगों की कहानियाँ पढ़ी है। और न ही ऊँचे दर्जे का साहित्य पढ़ा है। तो मन को जो कहानियाँ मिल रही है, रोल मॉडल्स (अनुकरणीय व्यक्ति) मिल रहे हैं वो आस-पास के ही गए-गुज़रे लोग हैं सब। उनका ऐसा ही चक्कर है।

प्र: शायद इसीलिए ही ऐसे संबंधों में शादियाँ भी होती हैं तो आजकल तलाक़ दर भी काफ़ी बढ़ गया है।

आचार्य: और ज़्यादा होने चाहिए तलाक़, कोई बुराई थोड़े ही हैं। जिस तरीक़े के ये गठबंधन हो रहे हैं ये सर्वप्रथम होने ही नहीं चाहिए थे। इसमें ताज्जुब क्या है कि तलाक़ हो रहा है? तलाक़ नहीं होगा तो क्या होगा? दो लोग बेवकूफी में मिला दिए गए हों बिना किसी युक्ति के, बिना किसी समझ के तो उनका रिश्ता चल कैसे जाएगा? जैसे तुम्हें बिजली के दस-पंद्रह तार दिख रहे हों और तुम यूँ ही नशे में कोई दो तार उठाओ, बस यूँ ही बेतरतीब ढंग से उनको आपस में जोड़ दो तो आग नहीं लगेगी तो और क्या होगा? बत्ती जलेगी?

प्र: जैसा प्रश्न आया था कि जो युगल होते हैं वो एक तरह की बचकानी बातें करते हैं, एक-दूसरे के बुद्धि-स्तर को गिरा रहे होते हैं। लेकिन इस तरह के रिश्ते भी होते हैं जिसमें बाहर से आप देखेंगे तो बढ़िया बौद्धिक बातें होती हैं और एक तरह की बौद्धिक चर्चा भी होती है। लेकिन फ़िर भी देखकर लगता है कि प्रेम तो उनमें भी नहीं है, बस एक सूखापन है। तो वहाँ क्या कमी रह गई फिर?

अचार्य: वास्तविक प्रेम फ़िर तीसरे तल की बात है। शरीर से नहीं होता प्रेम, इस बात पर मेरा ज़ोर था, जब मैं जवाब दे रहा था। आपने जो मुद्दा उठाया वो यह है कि मन से भी तो नहीं होता है न प्रेम, विचारों से भी तो नहीं होता है न कि एक-दूसरे के विचार मिला रहे हो और विचारों की ऊँची-ऊँची पतंगें उड़ा रहे हैं, उनसे भी नहीं होता। बिलकुल सही बात है। प्रेम विचारों से भी आगे की बात है। वो कोई और बात है। वो क्या बात है? वो उत्तर में बोली है। कुछ ऐसी नियत हो जाना अपनी कि अपने स्वार्थ से कहीं ज़्यादा ज़रूरी लगे दूसरे का हित। हम आमतौर पर ऐसे होते नहीं है कि अपने स्वार्थ से आगे हमें कुछ भी और लगे। अरे हमें अपना ही हित अपने स्वार्थ से बड़ा नहीं लगता तो हमें दूसरे का हित कैसे अपने स्वार्थ से बड़ा लगेगा।

प्रेम का मतलब होता है दूसरे की बेहतरी हो, दूसरे की तरक्की हो। ये चीज़ मेरे लिए ज़्यादा ज़रूरी हो गई है अपनी सुख-सुविधा से, अपने स्वार्थ से। वो फ़िर आत्मा की बात होती है। बिलकुल ठीक कहा कि बिलकुल हो सकता है दो लोग हों जो बहुत बौद्धिकतापूर्ण बातें करते हों, उच्च बौद्धिक जुड़ाव हो आपस में, लेकिन फ़िर भी रिश्ता रूखा हो; बिलकुल हो सकता है। बिलकुल मानता हूँ। बात नियत की है। इरादा क्या है एक-दूसरे के साथ? क्योंकि बौद्धिक जुड़ाव भी आंतरिक रुप से बहुत हिंसक हो सकता है। तो वो प्रेम नहीं कहा जा सकता। आप बहुत ज़बरदस्त बौद्धिक चर्चा कर रहे हैं जिसमें पीछे अहंकार बैठा हुआ है तो फिर प्रेम कहाँ है उसमें? वो बात बिलकुल ठीक है। बात नियत की है, इरादे की है। दूसरा आगे बढ़े तरक्की करें, अपनी हमें परवाह नहीं है। और जो यह कह देता है कि अपनी हमें परवाह नहीं वो वास्तव में वहाँ पहुँच चुका होता है जहाँ उसे किसी परवाह की ज़रूरत है ही नहीं। क्योंकि जब तक तुम ऐसे हो जिसको अभी ज़रूरत है देखभाल की, परवाह की, तुम यह कह ही नहीं पाओगे कि भाई दूसरे का भला होना चाहिए, हमारी फ़िक्र छोड़ो। जो ये कह पाए कि हमारी फ़िक्र छोड़ो, समझ लो कि अब वो कुछ हो ही गया है, कहीं पहुँच ही गया है। वरना उसको यह भाव उठता ही नहीं कि हमारी फ़िक्र छोड़ो। ये प्रेम है। तो यहाँ पर जो सूक्ष्म विरोधाभास है समझ रहे हो?

प्रेम कहता है हमें पीछे रखो, हम छोटे हैं। दूसरे को आगे रखो, दूसरा बड़ा है। दूसरे की बात करो उसका भला हो रहा है कि नहीं हो रहा है। लेकिन वास्तव में प्रेम तब होता है जब तुम बहुत बड़े हो गए होते हो। प्रेम कह क्या रहा होता है? दूसरा बड़ा है, दूसरे की बात करो। लेकिन जो यह कह रहा है कि दूसरा बड़ा है वो यह कह ही सिर्फ तब सकता है जब वो ख़ुद बहुत बड़ा हो गया हो। नहीं तो जो आम आदमी है छोटे दिल वाला, वो तो अपने ही छोटे-छोटे स्वार्थों में फँसा रहता है, दूसरे को बड़ा कह ही नहीं पाएगा। तो नियत की बात है। प्रेम में असली चीज क्या है? नियत।

प्र: आचार्य जी, इस तरह की बातें माता-पिता और बच्चों के रिश्तों में भी दिखाई देती है, जहाँ बच्चे वयस्क हो चुके होते हैं फिर भी माँ-बाप उन्हें छोटे बच्चे जैसे व्यवहार करते हैं।

आचार्य: हाँ, बढ़िया किया कि यह बात उठा दी। ये तीस साल का हो गया है बिलकुल हुड़दंग, कतई हुड़दंग, तीस-बत्तीस साल का है और वो जा रहा है तो उसकी मम्मी उसको ऐसे ही कर रही है जैसे अभी पाँच साल का हो। बहुत सावधान रहने की ज़रूरत है। बहुत सावधान!

अगर पुराने उदाहरण देखोगे तो भारत में संस्कृति, परंपरा ऐसी रही है कि एक उम्र का हो जाने के बाद माँएं भी अपने बच्चों को आप कह कर संबोधित करती थी। या अगर उनके पास कोई पदवी या कोई उपाधि होती थी तो वो उस उपाधि का नाम लेकर संबोधित करती थी, ‘तुम’ भी नहीं। कहते थे कि “एक इसकी उम्र थी जब यह ‘तुम’ ही कहलाने का हक़दार था। इस वक्त इसकी जो उम्र हो गई है—चेतना के तल पर—इसको ‘तुम’ नहीं कहा जा सकता। क्योंकि मैं इसको सिर्फ़ शरीर की तरह नहीं देखती। मैं माँ हूँ, इसकी शुभचिंतक हूँ; मैं इसको देखती हूँ एक चेतना की तरह। और यह जो चेतना है अब वयस्क हो गई है, इसको तुम कैसे बोलूँ मैं?” तो वो अपने बेटे को भी आप कह कर संबोधित कर रही हैं। अपने बेटे से भी एक वयस्क की तरह बात कर रहे हैं; अपने बेटे से भी एक हम-उम्र, एक समवयस्क की तरह बात कर रहे हैं, दोस्त की तरह बात कर रहे हैं। यह एक ज़िम्मेदार माँ का फ़र्ज़ हुआ। ये थोड़े ही कि उसको दुलरा रहे हैं और ये सब कर रहे हैं, नहीं।

असल में प्रेम की हमारी परिभाषा ही बहुत अस्पष्ट और विकृत हैं। कारण उसका सीधा-सीधा ये है कि विज़डम एजुकेशन (बुद्धिमत्ता शिक्षा) हमें दी नहीं गई है। तो जो जिंदगी में शब्द हम सबसे ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं, हमें उन्हीं के बारे में सबसे कम जानकारी हैं। मैं, तुम, प्रेम, संबंध, हँसी, सुख, उदासी, यादें, अतीत, भविष्य यही वो शब्द हैं न जिसका हम सबसे ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं अपनी भाषा में? और यही वो शब्द हैं जिनके बारे में हमें कुछ नहीं पता। और इसकी वजह है हमारी गई-गुजरी शिक्षा प्रणाली। उसमें बदलाव चाहिए।

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