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लेख
असफल होने पर यदि हिम्मत टूटने लगे
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
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प्रश्नकर्ता: सर, जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ आती है जब अपने लक्ष्य के लिए पूरी मेहनत करने के बावजूद सफलता नहीं मिलती, हिम्मत पूरी तरह से टूट जाती है। ऐसे में कुछ भी करने का मन नहीं करता, कोई मोटिवेशन काम नहीं आता। ऐसी परिस्थिति से बाहर कैसे निकलें?

आचार्य प्रशांत: दो अलग-अलग स्थितियाँ हैं ये जिनकी आपने चर्चा करी है। एक तो बात ये हो सकती है कि जो आपने लक्ष्य उठाया है, जिस काम में असफलता मिली है, वो काम ही ऐसा नहीं था कि उसमें आपको सफलता भी मिल जाती तो आप पर वास्तव में कोई बड़ा फर्क पड़ जाता। और दूसरा हो सकता है कि आपने जो काम उठाया है वो काम वाकई बहुत कीमती, बहुत ऊँचे दर्जे का था।

तो सवाल सफलता-असफलता को, और निराशा को ले करके है। मैं इस सवाल को और थोड़ा पीछे ले जा रहा हूँ। मैं यहाँ पर ले जा रहा हूँ कि, "किस काम में मिली है सफलता या असफलता?" मेरे समझ से वो प्रश्न ज़्यादा ज़रूरी है पूछना।

सफल हुए, असफल हुए ये थोड़ा बाद की बात है। ज़्यादा पहले की बात ये है कि किस काम में सफल हुए या असफल हुए। तो कौन-सा काम चुना था और कैसे चुना था इस पर गौर करो। पूछो अपने-आपसे।

तुम्हें कैसे पता कि तुम जिस काम में लगे थे, जिस लक्ष्य के पीछे लगे थे वो करने लायक था ही, ये तुम्हें कैसे पता? क्योंकि अगर करने लायक होता है कोई काम तो इंसान उसको छोड़ नहीं सकता। वो उस काम के आगे मजबूर हो जाता है। तुम्हें करना ही पड़ेगा। वो एक तरीके से नहीं हो रहा है, तुम दूसरे तरीके से करोगे। तुम्हें जीवन भर भी असफलता मिलती रहे, तो भी तुम लगे रहोगे। तुम अपना मन, बुद्धि, सारी ताकतें लगा दोगे रास्ता खोजने के लिए कि "कैसे आगे बढ़ता रहूँ? कैसे आगे बढ़ता रहूँ! हो सकता है अंत तक नहीं पहुँच पाऊँ, तो भी आगे बढ़ता रहूँ।" ये सही काम की निशानी होती है।

सही काम में सफलता-असफलता बहुत ज़्यादा मायने नहीं रखती। मैं ये नहीं कह रहा कि सफलता से कोई फर्क नहीं पड़ता अगर कोई काम सही है और असफलता से मन नहीं टूटता अगर काम सही है। सफलता-असफलता से फर्क तो पड़ता ही है इंसान पर, लेकिन एक सीमा के अंदर पड़ता है अगर काम सही चुना है।

अगर काम सही चुना है, जिस प्रोजेक्ट में, जिस अभियान में तुम लग रहे हो वो वाकई ज़रूरी है, वो तुम्हारे विवेक से निकला है, वो निर्णय तुमने बहुत समझदारी से किया है तो सफलता से तुम बहुत ज़्यादा फूल नहीं जाओगे और असफलता से बहुत घबरा नहीं जाओगे।

अधिकांशतः हमारे साथ अब होता क्या है ये समझना। अधिकांशतः हमारे साथ ये होता है कि हमने जो लक्ष्य चुनें होते हैं, हम जिन कामों में लगे होते हैं, वो काम सिर्फ भेड़ चाल के कारण हमने चुने होते हैं। वो लक्ष्य वास्तव में हमारी अपनी समझ से निकले ही नहीं होते। हर आदमी एक काम कर रहा है तो हमने कहा हम भी वो काम कर लेते हैं या इधर-उधर के प्रभाव पड़ गए हमारे मन पर तो हमको लगा फलाना काम करने लायक है, हम भी करते हैं।

अब ऐसे में होता क्या हैं? ऐसे में ये होता है कि पहली बात जो तुम करने जा रहे हो उसमें भीड़ बहुत है क्योंकि काम ही भेड़चाल का है तो उसमें भेड़-ही-भेड़ भरी हुई है। तो जब भीड़ बहुत है तो उसमें सफलता मिलना ऐसे ही मुश्किल हो जाता है। दूसरी बात क्योंकि वो काम तुम्हारे अपने अंतस से नहीं निकला है इसीलिए तुम उस काम को अपनी पूरी ऊर्जा भी नहीं दे पा रहे क्योंकि दिल तो है नहीं उसमें। तो तुम कुछ करके ज़बरदस्ती अपने-आपको ठेल रहे हो कि, "चलो हम भी कर लेते हैं, हम भी कर लेते हैं।"

वो कोई भी काम हो सकता है। वो काम ये हो सकता है कि तुमने कोई नया व्यापार शुरू कर दिया है, वो काम ये हो सकता है कि तुम किसी नए सम्बन्ध की तलाश में हो, ये भी हो सकता है कि तुम किसी नौकरी की तैयारी कर रहे हो। वो कोई भी काम हो सकता है पर अगर उस काम का चयन तुम्हारे विवेक से, तुम्हारे बोध से नहीं हुआ है तो उस काम में तुम अपनी पूरी ऊर्जा डाल ही नहीं पाओगे। और मैंने कहा कि उस काम में भीड़ भी बहुत रहेगी, प्रतिस्पर्धा भी बहुत रहेगी क्योंकि पूरी दुनिया ही भेड़चाल में वही काम करने को उतारू है। तो सफलता तुम्हें, ज़ाहिर सी बात है, कम ही मिलेगी।

जब असफलता मिलेगी, जैसे कि ज़्यादातर लोगों को मिलती है, तो तुम पाओगे कि तुम्हारे भीतर से अब कोई प्रेरणा ही नहीं उठ रही है, कोई इंस्पिरेशन , कोई ऊर्जा ही नहीं उठ रही है तुम्हारे भीतर से कि, "मैं उस काम में आगे लगूँ।" क्यों? क्योंकि तुम खुद भी निश्चित नहीं हो कि वो काम करने लायक है।

फिर तुम इधर-उधर जाकर के कहीं से मोटिवेशन इकट्ठा करते हो। कोई तुमने मोटिवेटिंग किताब पढ़ ली या किसी मोटिवेशनल स्पीकर को सुन लिया। इन तरीकों से तुम अपने-आपको धक्का देने की कोशिश करते हो। बिलकुल ठंडे पड़ रहे हो, बाहरी आग जला करके किसी तरह अपने-आपको गर्म करने की कोशिश करते हो।

सोचते हो कि, "चलो अब ये काम कर ही लें।" पर मूल बात ये है कि वो काम तुम्हारे करने लायक है ही नहीं क्योंकि तुम जानते नहीं हो कि वो काम क्या है। तुम क्यों नहीं जानते कि वो काम क्या है? क्योंकि तुम ये नहीं जानते कि तुम कौन हो, तुमने अपने मन को समझने की कोशिश नहीं करी है, न तुमने साहस के साथ ये जानने की कोशिश करी है कि तुम्हें ज़िंदगी में करना क्या चाहिए, क्या उचित है तुम्हारे लिए।

जो आदमी साहस के साथ अपने लिए एक सही लक्ष्य, सही काम, सही अभियान खोज लेता है वो आदमी फिर बहुत मुश्किल से रुकता है। और रुकेगा भी तो पल-दो-पल को रुकेगा, हफ्ते-दो-हफ्ते को रुकेगा, महीने-दो-महीने को रुकेगा। वो कमर कसकर फिर आगे बढ़ जाएगा। हो सकता है वो आगे बढ़ रहा हो फिर गिर जाए। एक बार गिरे, पाँच बार गिरे, हो सकता है गिर जाए चोट लग जाए, कुछ समय तक गिरा पड़ा रहे लेकिन वो धूल झाड़कर फिर खड़ा हो जाएगा। और फिर आगे बढ़ेगा। तो ऐसा होता है सही काम का बल।

सही चुनाव की ताकत ऐसी होती है। सही चुनाव करो न! उसके बाद ये नहीं होगा कि, "अरे! हार गए तो क्या होगा?" उसके बाद एक तरह की निर्विकल्पता आ जाती है, * चॉइसलेसनेस * । तुम कहते हो, “हार भी गए तो हो क्या जाएगा? काम तो यही करना है। अब सफलता मिले कि असफलता मिले, लगे तो इसी में रहना है।"

इसका ये नहीं मतलब है कि एक सीध में चलते जाना है। इसका ये मतलब है कि सीध में चलकर काम नहीं हो रहा तो थोड़ा-सा बाएँ मुड़कर काम कर लेंगे, नीचे से कर लेंगे, ऊपर से कर लेंगे, कुछ और तरीके से कर लेंगे पर मोटे तौर पर ये निश्चित हो चुका है कि काम तो यही करना है।

उदाहरण के लिए लोग कहते हैं, “हम फलनी नौकरी की तैयारी कर रहे थे, प्रवेश परिक्षा में असफलता मिल गई।" भाई, तुम वो नौकरी किस उद्देश्य के लिए करना चाहते थे पहले ये बताओ न। अगर उद्देश्य बिलकुल ही छोटा-सा है एकदम, यही कि पैसा मिल जाएगा, घूस मिल जाएगा, शादी हो जाएगी, तो ज़रूर तुमको बड़ी निराशा हो जाएगी असफलता से। और इतना ही नहीं, तुम उस निराशा से शायद उबर भी न पाओ क्योंकि तुम किसी बड़े काम में लगे ही नहीं थे न।

छोटे काम पर तो छोटी निराशा भी हावी हो जाती है, बड़े काम पर कोई छोटी निराशा हावी नहीं हो सकती। बड़ा काम ऐसा होता है कि तुम सब छोटी निराशाओं को परे रख देते हो, "काम इतना बड़ा है हम कैसे निराश पड़े रहे? हम कैसे उदास हो कर सोने लगे जाएँ?" काम करना ही पड़ेगा।

हाँ, जो तुम करना चाह रहे हो वो काम बड़ा है और उसमें असफलता सामने आ रही है तो तुम कहोगे, "ये तरीका ठीक नहीं है मुझे तरीका दूसरा खोजने दो। ये जो काम करना है अगर इस नौकरी के माध्यम से नहीं हो पा रहा तो मैं नौकरी दूसरी खोजूँगा, नौकरी दूसरी नहीं मिल रही तो कोई और काम शुरू करूँगा, धंधा शुरू करूँगा, अपना व्यवसाय।" फिर मैं ये थोड़े ही कहूँगा कि, "अरे, अरे, अरे! मैंने चार बार एक तरीके से कोशिश करके देख लिया, ये प्रवेश परीक्षा देने की कोशिश करके देख ली"—या मैं जिंदगी में जो भी काम करता हूँ; मैं वैज्ञानिक हूँ, मैं इन्वेंटर हूँ, मैं कुछ भी हो सकता हूँ, मैं खिलाड़ी हो सकता हूँ, मैं राजनेता हो सकता हूँ, कोई भी हो सकता हूँ।

भाई, सबके सामने चुनौतियाँ होती हैं सबको सफलता-असफलता मिलती है। उस सफलता-असफलता के प्रति तुम्हारा रव‌ईया क्या होगा वो निर्धारित इसी बात से होता है कि तुमने जो काम चुना है वो बिलकुल तुम्हारे केन्द्र से, तुम्हारे कोर से निकल रहा है या नहीं निकल रहा है।

और अगर वो काम तुम्हारे केंद्र से निकल रहा है तो कोई असफलता तुमको हरा नहीं सकती। और दुःख की बात ये है कि जो काम तुम ज़िंदगी में कर रहे हो अगर वो तुम्हारे केंद्र से नहीं निकल रहा है तो कोई भी सफलता तुम्हें कुछ दे नहीं सकती। तुम हो जाओ जितना सफल होना है तुम्हें, तुम्हारा मन फिर भी सूखा-सूखा रहेगा जीवन रुखा-रुखा रहेगा। कोई फायदा है ऐसे?

तो बेहतर ये है कि भेड़ चाल में मत चलो, दुनिया का मुँह मत देखो, ये मत देखो कि सब लोग क्या कर रहे हैं, किस दिशा जा रहे हैं। अपने लिए सही काम चुनो। कुछ ऐसा चुनो अपने लिए जिसको जीवन भर बहुत रस के साथ, बड़े मौज़ और आनंद के साथ कर सको।

सफलता मिले असफलता मिले, पैसा मिले पैसा ना मिले! तुम कहो, “पैसा नहीं मिल रहा तो भी काम इतना मस्त है कि हम करे जाएँगे। पैसा चाहिए किसको? बिना पैसे के भी काम हो जाएगा। बहुत कम पैसों में भी काम हो जाएगा!"

समझ में आ रही है बात?

अब कैसे असफल हो सकते हो तुम? अगर तुमको हार में भी जीत दिख रही है तो तुम्हें हरा कौन सकता है फिर?

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