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लेख
अंधविश्वास का रामबाण इलाज || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
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प्रश्नकर्ता: मेरा नाम शिवांगी है। मैं आपको लगभग दो वर्षों से सुन रही हूँ। मैं ग्वालियर से हूँ। आपने आपकी साइंस (विज्ञान) से सम्बन्धित वीडियोज़ में कई दफे बताया है कि हमारे कई दुख और अज्ञान, विज्ञान की नॉलेज (ज्ञान) की कमी की वजह से होते हैं। जिसकी वजह से हम भूत-प्रेत में विश्वास, वॉटर मेमोरी (पानी में याददाश्त) इत्यादि अंधविश्वासों में फँस जाते हैं। तो आज के समय में तो फिर भी हमारे पास सूचनाएँ और संसाधन काफी आसानी से उपलब्ध हैं, तो हमें विज्ञान वगैरह की भी जानकारी उपलब्ध है।

पर प्राचीन समय में, जब वैज्ञानिक सूचनाएँ और संसाधन उपलब्ध नहीं थे, तब जन मानस काफी आसानी से भ्रम और अंधविश्वास में फँस जाता होगा, और फलस्वरूप दुख पाता होगा। तो उस ज़माने में संत इत्यादि, जिनके पास वैज्ञानिक संसाधन उपलब्ध नहीं थे और कई के पास फॉर्मल एजुकेशन (औपचारिक शिक्षा) तक भी नहीं थी, वो आम जनमानस को भ्रम, दुख, अंधविश्वास इत्यादि से बाहर निकालने का प्रयास कैसे करते थे? कृपया मार्गदर्शन कीजिए।

आचार्य प्रशांत: तुम्हें, दो तरह की बातें पता हो सकती हैं, ठीक है। दोनों बातें लाभ दे जाएँगी। तुम्हें कोई, उदाहरण दे रहा हूँ, तुम्हें कोई बोले कि बाहर एक जानवर घूम रहा है और, या बाहर एक चीज़ पायी गयी है जो; कोई नाम देना यूँ ही, उटपटांग कोई भी नाम बोलिए? मोनू, ठीक है,(सब हँसते हैं)। बढ़िया! तो तुमसे कहा गया है कि बाहर दुनिया में, संसार में, फिज़िकल यूनिवर्स (भौतिक संसार) में एक चीज़ पायी गयी है जो मैटर (पदार्थ) की, मोनू स्टेट (अवस्था) में है। सॉलिड (ठोस), लिक्विड (तरल), गैस, प्लाज़्मा कुछ नहीं। ‘मोनू’, मोनू स्टेट (अवस्था) में है, ठीक?

यह बात झूठ है। इसको काटने के लिए दो तरह का ज्ञान काम आ सकता है— पहला ज्ञान ये कि तुम्हें फिज़िकल यूनिवर्स (भौतिक संसार) के बारे में पता हो। जिसके लिए मैं कहता हूँ कि तुम्हें साइंस (विज्ञान) पता होनी ज़रूरी है, और फिज़िकल यूनिवर्स (भौतिक संसार) के बारे में तुम्हें पता हो कि भाई, मैटर (पदार्थ) की कोई ‘मोनू’ स्टेट (अवस्था) होती ही नहीं है। तो जब कोई तुमसे कहेगा कि वो बाहर एक मोनू जैसी चीज़ घूम रही है, तो तुम डरोगे नहीं। तुम कहोगे मैंने साइंस (विज्ञान) पढ़ी है— “मोनू ड्स नॉट इग्ज़िस्ट” ,ठीक? “मोनू नहीं हो सकता।” तो तुम्हारी समस्या हल हो गयी।

और मोनू से बचने का दूसरा तरीका यह हो सकता है कि तुम्हें पता है कि तुम्हारे घर में सिर्फ़ सॉलिड (ठोस), लिक्विड (द्रव), गैस ही आ सकते हैं। तुमने अपने घर का निर्माण ही इस तरह से किया है कि उसमें सॉलिड (ठोस), लिक्विड (तरल), गैस के अलावा और कुछ हो ही नहीं सकता। तो भी तुम्हें ‘मोनू’ से डर नहीं लगेगा। तुम कहोगे, ‘मोनू’ होता हो चाहे न होता हो, मुझे साइंस (विज्ञान) नहीं पता, मुझे बाहरी दुनिया का नहीं पता, मुझे फिज़िकल यूनिवर्स (भौतिक संसार) के बारे में नहीं पता, पर मुझे अपने घर का पता है। और मुझे अपने घर का बहुत सफ़ाई से, बड़ी नज़दीकी से पता है क्योंकि ‘मेरा घर’ है भाई! मुझे नहीं पता होगा तो किसको पता होगा।

तो मुझे अपने घर का पता है। बिना किसी मध्यस्थ के पता है। बाहर का तो जो भी पता चलता है उसमें कोई माध्यम होता है, कोई मिडिलमैन (बिचौलिया)। होता है न वो? जो ज्ञान अर्जित करता है, तुम्हें लाकर दे देता है? भीतर का जो पता चलता है, वो स्वयं ही पता चलता है। जब तक स्वयं नहीं पता चलना शुरू हुआ, तब तक भीतरी ज्ञान पूरा नहीं होता। तो भीतर का जो ज्ञान होता है वो ज़्यादा निकट का होता है। ज़्यादा आत्मिक होता है। ज़्यादा इंटीमेट होता है। तुम्हें साफ पता है कि तुम्हारे घर की रचना इस तरीके की है कि उसमें ‘मोनू’ जैसी पदार्थ की कोई अवस्था हो नहीं सकती, तो भी तुम बच गए मोनू से।

लेकिन जिसको न बाहर का पता हो, न भीतर का पता हो वह ‘मोनू’ के चक्कर में फँस जाएगा। वह कहेगा कि अगर बताया जा रहा है कि बाहर मोनू स्टेट (अवस्था) में कोई घूम रहा है, तो (अवश्य) होगा। तो मोनू, कोई बहुत खतरनाक चीज़ लगती है। न ठोस होता है, न तरल होता है, न गैसीअस (गैस) होता है! बहुत ही खतरनाक है, मोनू! पकड़ में ही नहीं आएगा। और वो डरे घूम रहे हैं। कोई बता रहा है– देखो, मोनू न एक देह में घुसता है, दूसरी देह से निकलता है। कोई बता रहा है– मोनू बरगद के पेड़ पर उल्टा लटका होता है। और तुम कह रहे– अरे, बाप-रे-बाप मोनू! मोनू!

अब मान लो तुम वो व्यक्ति हो जिसके पास बाहरी ज्ञान है। और बाहरी ज्ञान उसको ये था कि मोनू जैसी कोई चीज़ होती नहीं है। इस व्यक्ति के फँस जाने की फिर भी थोड़ी संभावना है। बताओ क्यों? क्योंकि बाहरी ज्ञान हमेशा क्या होता है? पहली बात, मौलिक नहीं होता। वो माध्यमिक होता है। किसी और ने बताया होता है, तुमको। जिसने तुमको बताया था, ‘मोनू नहीं होता’, क्या भरोसा है कि वही कल को पलट के यह न कह दे कि ‘मोनू होता है’। तो कभी तुम पूरे तरीके से निश्चित नहीं हो सकते, अशयोर्ड , आश्वस्त नहीं हो सकते कि मोनू नहीं ही होता। क्योंकि, भाई, विज्ञान तो नयी-नयी खोजें करता जाता है न? कल को वो और भी बहुत सारी चीज़ों से इनकार करता था, आज विज्ञान मानता है उन बातों को।

तो क्या पता, आज कह रहे हैं मोनू नहीं होता, वास्तव में होता हो? और मैं वैज्ञानिकों की बातें मान लूँ, बाहर निकल लूँ और मोनू मुझे पकड़ ले और मोनू मेरे अंदर घुस जाए और फिर मैं ऐसे बाल खोलकर ऐसे-ऐसे करने लग जाऊँ, तो जिसके पास बाहरी ज्ञान है, वो हो सकता है फिर भी फँस जाए मोनू के चक्कर में; क्योंकि बाहरी ज्ञान परिवर्तनशील होता है।

विज्ञान की खोजें नयी-नयी होती रहती हैं। पुराने नियम टूटते रहते हैं। लेकिन जिसके पास अंदरूनी ज्ञान है, जिसे अपने घर का पता है, वो कभी नहीं डर सकता ‘मोनू’ से। वो कहेगा मैं अच्छे से जानता हूँ। घर (मैंने) ही बनाया है। किसने बनाया है? घर मैंने बनाया है, मेरा घर है, मैं जनता हूँ, इसमें मोनू जैसी कोई चीज़ हो नहीं सकती।

इतना ही नहीं, वह एक बात और भी जानता है। वह कहता है, मैंने अपना घर जब से जाना है, मैं तब से ये भी जान गया हूँ कि बाहरी दुनिया भी मेरे घर से ही निकलती है। मैंने जब से अपने घर को जाना है, मैंने यह भी जान लिया है कि यह जो भीतर वाली चीज़ है, “घर मेरा” और ये जो बाहर की चीज़ है, “संसार मेरा”, इनमें वास्तव में कोई अंतर है नहीं। बाहरी भी जो कुछ है, वो भीतर से ही प्रक्षेपित होता है। तो मोनू अगर घर में नहीं हो सकता तो? (मतलब बाहर भी नहीं होगा), और बाहर भी तभी दिखाई देगा जब पहले? (भीतर हो)। तो यह जो भीतरी ज्ञान रखने वाला है, यह तो मोनू से कभी नहीं डरेगा। तो संत के पास भले ही ‘विज्ञान’ नहीं था; पर ‘आत्मज्ञान’ था। उसे तुम मोनू-मोनू बोलकर नहीं फँसा पाओगे। वो भूत-प्रेत के चक्कर में नहीं फँसेगा।

वैज्ञानिक भी नहीं फँसेगा। हाँ, जो आम सांसारिक गृहस्थ है, वो इन भूत-प्रेत के चक्करों में फँसा रहता है, और उसे फँसाने वाले भी बहुत हैं। क्योंकि किसी को डरा दो तो उससे पैसे ले सकते हो। किसी को डरा दो तो तुम्हें उसके ऊपर नियंत्रण मिल जाता है। कोई तुम्हारी सुन न रहा हो, उसको डरा दो, वह तुम्हारी सुनने लगेगा। कोई तुम्हें सम्मान न देता हो, उसे डरा दो वह तुम्हें सम्मान देने लगेगा। तुम्हें डराने में बहुतों के न्यस्त स्वार्थ हैं। कुछ समझ में आ रही है बात?

तो अंधविश्वास से बचने के लिए विज्ञान भी उपाय है और अध्यात्म भी उपाय है। लेकिन विज्ञान और अध्यात्म में भी ज़्यादा सफल उपाय अध्यात्म है।

बहुत सारे वैज्ञानिक भी अंधविश्वासी हो जाते हैं। हैं वैज्ञानिक और कह रहे हैं कि नयी प्रयोगशाला का उद्घाटन मुहूर्त देखकर करेंगे। चंद्रयान, मंगलयान ये लॉन्च (प्रक्षेपण) होने हों और क्या देखी जा रही है? (मुहूर्त) और वैज्ञानिकों को एक मूल अंधविश्वास तो सदा होता ही है, क्या? मैं हूँ। ‘अहम् वृत्ति’, वो तो होती ही है।

तो वास्तव में मोनू से बचने का एक ही तरीका है–'आत्मज्ञान’। थोड़ा एक हल्का-फुल्का, सस्ता तरीका है– 'विज्ञान’। और जिसका फँसना बिल्कुल निश्चित है वो कौन है– अज्ञान, जिसमें यह सब चलता है अं...अं...देयर वास दिस, डिस-एम्बॉडिड सोल एण्ड यू नो आई गेव हर सम लिबरेशन थ्रू माई स्पेशल क्रिया (वहाँ वो थी.. देहरहित आत्मा और पता है मैंने उसे अपनी खास विधि से मुक्ति दिलायी!)। तुम्हें बुद्धू बना कर रखने में बहुतों के बहुत मज़े हैं। मज़ा अच्छी बात है, लेकिन दूसरों को बुद्धू बना कर क्या लेना। समझ में आ गयी बात?

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