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लेख
अहंकार से नुकसान क्या?
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
12 मिनट
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम अपने अहंकार को जीतने क्यों देते हैं? जैसे आपने अभी बताया हम लोगों को कि हमको अपने मन की गंदगी देखना ज़रूरी है, ये अभी हमको पता चल गया कि ये सही चीज़ है, फिर भी क्यों हम भूल जाते हैं? अहंकार क्यों पनपता है, बढ़ता ही चला जाता है। भूल जाते हैं फिर अपने हिसाब से चलने लगते हैं।

आचार्य प्रशांत: क्योंकि तुम उसको अहंकार नहीं बोलते न, तुम उसको 'मैं' बोलना शुरू कर देते हो।

तुम्हारे हाथ पर गंदगी लगी हो और तुम्हें प्यार आ गया किसी पर, तुम उसके गाल सहला रहे हो, तो अपनी समझ से तो तुम अपने हाथ से उसका गाल सहला रहे हो, ठीक? तुम्हारी बुद्धि तो यही कह रही है कि तुम्हारा हाथ है, उसका गाल है। और बीच में क्या बैठी है? गंदगी। और तुमने उसके गाल पर भी क्या मल दी? गंदगी। अहंकार का ऐसा ही है। तुम उससे जुड़ गए हो नाहक, और ऐसा जुड़ गए हो कि गंदगी को 'गंदगी' बोलना भूल गए हो। कहते हो, "ये तो मेरा हाथ ही है।" उसे तुम कोई बाहरी चीज़ समझते तो तुमने उसे कब का छोड़ दिया होता। उसे तुम बाहरी समझते नहीं न। तुमने उसे अपना नाम दे दिया है। और डर तुम्हें ये है कि अहंकार से पृथक तुम्हारा कोई अस्तित्व भी नहीं है।

तुम ये थोड़े ही कहते हो कि, "हाथ है, हाथ से मैल उतर जाएगा, तो भी हाथ तो बचा ही रहेगा न?" तुम्हारे मन में नमूना दूसरा है। तुम्हें लगता है कि बात कहीं प्याज़ के छिलकों जैसी न हो जाए कि एक छिलका उतारा तो दूसरा मिला, फिर तीसरा उतारा, और सारे छिलके उतार दिए तो फिर कुछ बचा ही नहीं। डर तुम्हें बिल्कुल यही है कि परत-दर-परत तुम अहंकार ही हो, और अगर सारी परतें अहंकार की उतार दीं तो तुम गायब हो जाओगे। तुम कहते हो, "भाई, अगर ख़ुद बचे रहना है तो अहंकार को भी बचाए रखो।"

इन परतों का मतलब समझते हो? तुम परत-दर-परत किसी चीज़ से जुड़े हुए हो, अपने-आपको उससे जोड़कर ही देख पाते हो। और तुम्हें लगता है कि जिससे तुम जुड़े हुए हो अगर वो हटा तो सिर्फ़ वो नहीं हटेगा, तुम ही हट जाओगे, तुम ही गायब हो जाओगे। इसलिए तुम उसे हटने नहीं देते जिससे तुम जुड़े हुए हो। इसी को 'अहंकार' कहते हैं।

हमारा अहंकार अपूर्ण अहंकार है, अपूर्णता से उठता हुआ, इसलिए वो जुड़ना चाहता है। पूर्ण अहंकार वो होता है जिसे जुड़ने की ज़रूरत नहीं। अहंकार ख़राब नहीं होता, अपूर्ण अहंकार ख़राब होता है।

पूर्ण अहंकार तो कहता है कि, "क्या करना है? ठीक है। हाथ, हाथ है, उसे गंदगी से जोड़ने की ज़रूरत क्या?" गंदगी कभी आ भी गई तो उसे आसानी से धोया जा सकता है। धोते हुए भी रोओगे थोड़े ही कि, "हाय! हाय! हाथ धुल गया!" और गंदगी बही जा रही है और उसको देखकर छाती थोड़े ही पीटोगे कि, "हाथ बह गया!"

हमारा तो ऐसा ही है, मेकअप पोछो तो कहेंगे, "देखो मुँह बह गया!” खाने के बाद रुमाल से मुँह पोछा तो किसी ने पूछा, "रुमाल में क्या लगा है?," तो तुम कहोगे, "होंठ लगे हैं मेरे।" ये थोड़े ही बोलते हैं कि, "जूठन है, गंदगी है।" पहले तो तुम्हें वो गंदगी बचा के रखनी है, उसके बाद रुमाल भी बचाकर रखोगे क्योंकि उस रुमाल में तो तुम्हारे होंठ लिपटे हुए हैं न। हर चीज़ बचा के रखो क्योंकि हर चीज़ से तुम्हारा कोई नाता है, जैसे कि उस चीज़ के बिना तुम बचोगे ही नहीं।

अहंकार बोझ होता है। वो तुमसे कहता है, "इसको ढोओ और उसको ढोओ क्योंकि इनको नहीं ढोओगे तो तुम्हें ख़तरा हो जाएगा।" ऐसे ही एक आदमी भागा जा रहा है, सर पर चार बोरे रखे हुए हैं, एक इस हाथ में पकड़ा है, एक इस हाथ में पकड़ा है, पाँच-दस पीठ पर लाद रखे हैं, दो-चार गले से लटका रखे हैं, वो उन सब से जुड़ा हुआ है। सोचो कैसे जी रहा है वो? एक-एक कदम उसका कैसे पड़ रहा है? कैसा जीवन है उसका? भारी! इसी तरीक़े से तुम्हारा अहंकार जितना सघन होगा, जीवन उतना भारी होगा।

किसी भी चीज़ की कोई इच्छा नहीं है कि तुम्हारे साथ जुड़ी रहे। तुम नाहक और ज़बरदस्ती जुड़ते हो। तुम डरते हो। प्रमाण इस चीज़ का ये है कि जब वो चीज़ छूटती है तो वो चीज़ नहीं रोती, रोते तुम हो। तुम्हारी इज़्ज़त छूटी, इज़्ज़त रोती है, या तुम रोते हो? तुम ही पीछे पड़े हुए थे इज़्ज़त के और तुम्हारी ज़िंदगी में जो चैतन्य वस्तुएँ भी हों—लोग, रिश्ते-नाते—यकीन मानो, जिस हद तक तुमने उन्हें अहंकारवश पकड़ रखा है, तुमसे मुक्त होकर वो आज़ादी ही मनाएँगे। तुम रो लोगे, वो आज़ादी मनाएँगे। जैसे कि तुमने किसी जानवर को बाँध रखा हो और तुम ख़ूब उसकी सेवा इत्यादि करते हो, पर सेवा इत्यादि कैसे करते हो? उसे पिंजरे में रख के, उसे बाँध के। जिस दिन वो तुमसे छूट गया, तुम रोओगे, वो ख़ुशी मनाएगा। ऐसे ही संबंध होते हैं हमारे। और कहते हम ये हैं कि, "ज़िम्मेदारी हमें बहुत है। देखो, वो जानवर है, उसको बाँध रखा है, उसकी सेवा करनी है, दाना-पानी डालना है, नहलाना है, चिकित्सक के पास ले जाना है। बहुत ख़र्चा करते हैं हम उसके ऊपर।" और वो इंतज़ार कर रहा है कि, "तुम एक दिन खुला तो छोड़ो, फिर हम बताएँ तुमको!"

अहंकार तथ्य हो नहीं सकता क्योंकि अस्तित्व में कुछ भी दूसरे पर ऐसे नहीं आश्रित है कि उसकी हस्ती ही दूसरे से उठती हो। अहंकार अकेला है जिसका दावा है कि उसकी हस्ती दूसरे के बिना है ही नहीं। साथ-ही-साथ अहंकार ये भी सुनिश्चित करता है कि वो दूसरे से कभी पूरी तरह एक नहीं होगा। इसीलिए तो कहा जाता है 'जुड़ाव’; 'विलय' थोड़े ही होता है अहंकार में।

अटैचमेंट (जुड़ाव) होता है न, डिज़ोल्यूशन (विलय) थोड़े ही होता है?

अटैचमेंट कैसा होता है? कि लोहा और चुंबक जुड़े हुए हैं। जुड़े तो हुए हैं, लेकिन कभी भी अलग भी हो सकते हैं। जुड़े तो हुए हैं लेकिन जुड़कर भी उन्होंने अपनी-अपनी व्यक्तिगत हस्ती बरकरार रखी है। अभी-भी एक चुंबक है और लोहा है, और तुम्हें दिख रहा है कि ये अलग हैं। और ये अलग हैं, भले ही बाहर से जुड़ाव है, अंदर-अंदर अभी-भी अलग हैं। ये अटैचमेंट है।

और विलय क्या होता है? डिज़ोल्यूशन क्या होता है? कि ऐसे मिल गए जैसे दूध और पानी, कि जैसे पानी और पानी, कि अब तुम बता ही नहीं पाओगे कि दूध कहाँ और पानी कहाँ। अब बता ही नहीं पाओगे कि पहले वाला पानी कहाँ और दूसरा वाला पानी कहाँ। संगम हो गया, अब गंगा और यमुना को अलग नहीं कर पाओगे। लेकिन लोहे और चुंबक को तुम कभी भी अलग कर सकते हो। अहंकार अटैच (जुड़ना) होना जानता है, डिजॉल्व होना नहीं जानता है।

प्रेम में भी तुम किसी से जुड़ते हो पर ऐसे नहीं जुड़ते जैसे लोहा चुंबक से। लोहे और चुंबक का तो ऐसे ही है जैसे बाहर-बाहर से जुड़े हुए हैं। और ज़्यों ही चुंबकत्व ख़त्म हुआ, त्यों ही तुम अलग, हम अलग। और अब हम अलग होकर के अपना अलग जीवन जीने के लिए स्वतंत्र हैं, क्योंकि हम मिटे तो कभी थे नहीं तुम्हारी संगत में। जब हम तुम्हारे साथ भी थे तब भी हमने अपनी स्वतंत्र हस्ती तो बरकरार ही रखी थी, जैसे लोहा रखता है।

लेकिन नदी मिल गई एक बार सागर से तो वो अब अलग नहीं हो पाएगी। हम ऐसे कहाँ मिलते हैं किसी से प्रेम में? हम तो मिलते भी हैं तो भी बीच-बीच में बाड़ लगाए रहते हैं। एक आँख हमारी यही देखती रहती है कि कहीं हम मिट तो नहीं रहे, कहीं सामने वाले में घुले तो नहीं जा रहे।

और मिल गया कोई ऐसा जिसका प्रभाव कुछ ऐसा हो, जिसमें घुलनशीलता कुछ ऐसी हो कि वो तुम्हें अपने में सन्निहित कर लेता हो, तो तुम डर जाते हो। तुम उसके साथ होना नहीं चाहते, तुम बल्कि उसके विरुद्ध खड़े हो जाते हो। तुम कहते हो, "देखो, तुम्हारे साथ तो चलेंगे लेकिन तुम में समाकर मिट नहीं जाएँगे।"

हमारा प्रेम मिटना नहीं जानता, हमारा प्रेम बस जुड़ना जानता है।

जुड़ने और मिटने में अंतर ख़ूब समझ लेना। साँस भीतर जाती है, उस साँस का एक हिस्सा भीतर ही रह जाता है। वो शरीर बन गया, वो माँस बन गया, वो ख़ून बन गया। और उसी साँस का एक हिस्सा भीतर गया था और फिर भीतर जाकर वापस भी आ जाता है। हम साँस का वो वापस आ जाने वाला हिस्सा हैं, जो जुड़ता तो है पर जुड़ कर भी जुड़ा नहीं; जो भीतर तो गया, पर भीतर रहकर भी उसकी हठ यही थी कि, "हम तो अलग रहेंगे!" भीतर गया, सारे चक्कर मारे, फेफड़ों में गहराई तक गया, लेकिन उसके बाद भी अकड़ पूरी थी कि, "घुलेंगे नहीं, मिटेंगे नहीं। यहीं रह नहीं जाएँगे। हम तो जो हैं, वहीं को वापस जाएँगे।"

एक साँस में भीतर गया था और दूसरी साँस में फिर बाहर आ गया। और बाहर आकर के खुशी मना रहा है, कह रहा है, "प्रेम भी हमारा कुछ बिगाड़ नहीं पाया। हमारा हठ ज्यों-का-त्यों है। हमारी अकड़ पूरी-की-पूरी है। हम तो प्रेमी के सामने भी कवच ही पहने रहे, पूरा बंदोबस्त किया कि कहीं वो हमें मिटा न दे। जो भी क्षण आया मिटने का, उस क्षण में हम बिल्कुल चाक-चौबस्त रहे।" और उसी साँस का एक हिस्सा होता है जो भीतर तो जाता है और फिर कभी बाहर नहीं आता। खत्म! जो हिस्सा बाहर आता है उसकी दृष्टि से देखो तो जो भीतर रह गया वो ख़त्म हो गया। और जो भीतर रह गया उससे पूछो, "तेरा क्या हुआ?" वह बोलता है, "मैं प्राण बन गया। पहले साँस भर था अब भीतर हूँ, मुझमें जीवन आ गया, मैं जीव हो गया। हवा था पहले, अब जीव हो गया! प्राण आ गए मुझ में!"

जो मिट जाता है, उसे प्राण मिल जाते हैं; तुम मिटना नहीं चाहते। तुम प्रेम में भी अपनी अकड़ पूरी बनाए रखते हो।

तुम कहते हो, "देखो, हमारा सब अलग-अलग ही चलेगा, अटैचमेंट चलेगा लेकिन पूरा। अटैचमेंट होना चाहिए।" अटैचमेंट न हो तो तुम्हें गुस्सा आता है। तुम कहते हो, "जुड़ो न। हम से जुड़ो न।" 'हम से' जुड़ो न! मतलब 'हम' भी कायम हैं, 'तुम' भी कायम हो, लेकिन जुड़े हुए हैं। वजूद दोनों का है, हस्ती दोनों की है, लेकिन जुड़े हुए हैं। (अपने हाथों को जोड़ कर दिखाते हुए) जैसे यूँ दो हाथ जब जुड़ते हैं तो दोनों हाथ कायम हैं, और साथ-ही-साथ ये भ्रम भी हो रहा है जैसे कि जुड़ गए हैं। जुड़ क्या गए हैं? (दोनों हाथों को अलग करते हुए) लो!

तो लोग पूछते हैं, "आसक्ति में, जुड़ाव में क्या बुराई है?” यही बुराई है कि ऐसा है (अपने हाथों को जोड़कर) , और फिर ऐसा है (अपने हाथों को अलग करते हैं)। और प्रेम में क्या अच्छाई है? कि साँस ली और उसमें से कुछ था जो कभी वापस नहीं आया। वहाँ पर जुड़े तो फिर जुड़ ही गए। अब मौत भी जुदा नहीं कर सकती। जो साँस तुम्हारे शरीर से जुड़ गई, क्या मौत भी उसे तुमसे अलग कर सकती है? अब तो जो होगा, दोनों का एक साथ होगा। इनको, इनको (अपने दोनों हाथों को फिर से अलग करके दिखाते हुए) तो कोई भी अलग कर सकता है। इधर वाले को खुजली लग गई, वो अलग हो जाएगा।

अपनी हस्ती को बचाए रखने की इतनी चाहत मत रखो। सुरक्षा की माँग ही अहंकार है। झुकना सीखो, मिटना सीखो। दर्द मिले, धोखा मिले, सब बर्दाश्त कर लो। धोखे खाने में कोई बुराई नहीं, लेकिन अगर तुम सख़्त हो गए, अगर तुम अकड़ गए तो बहुत बुरा हो गया।

एक दफ़ा मैंने कहा था कि, "दस दफ़े धोखा खाना बहुत बुरा नहीं है लेकिन अगर ग्यारहवीं बार तुमने यकीन करना छोड़ दिया तो बहुत बुरा हो गया।" धोखा खाते चलो, यकीन करते चलो। पानी की तरह रहो। पानी पर कोई कितने भी लठ मार ले, उसके कितने टुकड़े होते हैं? बहती धारा है, उसको पत्थर मारना, उसको डंडा मारना, क्या कर लोगे उसका? थोड़ी देर को उसमें लहर उठेंगी, ज़रा-सी देर को उसपर कुछ अंतर पड़ेगा, फिर सब ठीक। ऐसे रहो न।

सख़्त रहोगे काँच की तरह, तो चोट पड़ेगी तो चूर-चूर हो जाओगे। नर्म रहोगे पानी की तरह, तो चोट पड़ेगी, अगले ही क्षण सब ठीक हो जाएगा। अकड़ मत जाना, सख़्त मत हो जाना। और सख़्त होने के पीछे तर्क अक्सर यही दिया जाता है, "सख़्त होना ज़रूरी है, नहीं तो धोखे हो जाएँगे।" अरे, होने दो न धोखे, खाओ चोटें। तुम बहुत मजबूत हो, खा सकते हो, और खाओ।

इस भय से कि कहीं एक चोट और न पड़ जाए, जीवन के विरुद्ध कवच मत पहन लेना, प्रेम के ख़िलाफ़ कवच मत पहन लेना। चोट खा ली, कुछ बुरा नहीं हो गया। लेकिन लठ लेकर खड़े हो गए जिरह-बख्तर धारण करके, तो बहुत बुरा हो गया।

तुम लचीले ही रहो, तुम नरम रहो, तुम पनियल रहो। सौ बार दिल तुड़वाओ, और फिर एक बार और तुड़वाने के लिए तैयार रहो।

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