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ज़बरदस्ती शादी कराने को पीछे पड़े हैं || आचार्य प्रशांत, आर. डी. वी. वी. के साथ (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
23 min
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, जैसे आप मध्य भारत की बात कर रहे थे, तो वहाँ पर हमारे समाज में ये होता है कि लड़कियों की शादी अठारह साल में आपको करना ही करना है, इतने साल में बच्चे होने चाहिए, फिर इतने साल में ये-ये, वो हमने तय किया है। तो आचार्य जी, वो सारी चीज़ें जो समाज तय करता है, उसको हम कितना स्वीकार कर सकते हैं, कितने परसेंट (प्रतिशत) तक स्वीकार कर सकते हैं?

आचार्य प्रशांत: इसमें परसेंट कैसे बताऊँ मैं?( हँसते हुए कहते हैं)

प्र: आचार्य जी, मैं उस समाज की इसलिए बात कर रही हूँ, क्योंकि उन्हीं की सीख में शादी हुई। जो-जो कहता गया हमारा समाज, हम उधर उतने आगे बढ़ते गये। आज जब उसी शादी में प्रॉब्लम (परेशानी) हुई तो वही समाज साथ में नहीं है। वो समाज ये कहता है कि तुम फिर भी साथ में रहो। मैं पढ़ाई करने आयी अभी, मेरी उम्र पैंतीस की है, मैं पीजी करने आयी तो उनका कहना है कि अब पढ़ाई करके क्या करोगी। तो अब समझ में ये नहीं आता कि मैं उस समाज को कितना स्वीकार करूँ।

आचार्य: देखिए, बहुत कम लोग होते हैं जो निस्वार्थ प्रेम में जीते हैं, बहुत कम लोग होते हैं। हम पहले कुछ मूलभूत बातें समझना चाहते हैं, तो ध्यान से सुनिएगा।

बहुत कम लोग होते हैं जो निस्वार्थ जीते हैं, जिनका दूसरे से सम्बन्ध इस भाव से होता है कि तेरा भला हो। ज़्यादातर लोग तो रिश्ता इसीलिए बनाते हैं — किसी से भी, इंसान से ही नहीं जानवर से भी, किसी जगह से भी — किसी भी चीज़ से वो रिश्ता इसलिए बनाते हैं कि इससे मुझे कुछ लाभ हो जाए, है न? ऐसा ही है न? तो ये तो दुनिया का नियम है कि यहाँ पर प्रत्येक व्यक्ति स्वार्थी है। मानती हैं न? आप कुछ महान अपवादों को छोड़ दीजिए तो उनके अलावा तो सब स्वार्थी ही हैं।

अब एक लड़की होती है, अगर उसके पास कुछ ऐसा नहीं है, न गुण, न बल, न ज्ञान, न विद्या, न कौशल, न अनुभव कि वो किसी के काम आ सके, कि उससे किसी को कोई लाभ हो सके, तो उसके प्रति कोई क्यों अच्छा व्यवहार करेगा?

सुनने में बड़ा गन्दा सा लगेगा लेकिन थोड़ा सा आप उदाहरण लीजिएगा। हमारे सब पशु होते हैं दूध देने वाले दुधारू पशु, आपने देखा है न, उनके साथ क्या व्यवहार करा जाता है। कुछ अपवादों को छोड़ दीजिएगा, कोई कहे कि नहीं, हमारे यहाँ ऐसा नहीं होता, हमारे गाँव में नहीं होता, तो मैं आपकी बात नहीं कर रहा। मैं साधारण सामान्य बात कर रहा हूँ कि अगर बछड़ा या पड़वा पैदा होता है तो तत्काल ही उसको या तो बेच देते हैं या मार देते हैं क्योंकि वो बहुत कम काम का होता है। कई बार तो उसी की खाल में भूस भरकर उसको भैंस या गाय के आगे खड़ा कर देते हैं कि उसको देखकर वो दूध दे देगी।

बछिया बड़ी करी जाती है। जब तक वो दूध देती है तब तक ठीक, जब दूध नहीं देती तो उसको सड़कों पर आवारा छोड़ देते हैं। वो बुढ़ापे में लाठी-डंडा खाती है, आवारा पशु कहलाती है और बहुत सारे लोग तो सीधे-सीधे उनको कसाई को बेच देते हैं। क्यों? भाई, जब तक तुम्हारा कुछ उपयोग करा जा सकता था हमने करा, जब तुम्हारा कोई उपयोग नहीं करा जा सकता तो हमने तुमको अपने घर से निकाल दिया। उसके बदले में हमें कुछ लाभ हो जाएगा, तुम्हें निकालने से।

इंसान स्वार्थी है भाई! जब लड़की कुछ दे ही नहीं सकती किसी को — हमने कहा — न ज्ञान, न बल, न धन, न कौशल, तो कोई क्यों उसको सम्मान देगा, बताइए न। तो ऐतिहासिक रूप से जानती हैं क्या होता आया है? बहुत खेद की बात है, ये बोलते हुए मुझे कोई प्रसन्नता नहीं हो रही है, पर सच है तो बोला जाना चाहिए। ऐतिहासिक रूप से ये होता है कि इंसान के लिए सब लोग संसाधन मात्र हैं क्योंकि हम स्वार्थी हैं, ठीक है? हम सब क्या हैं? संसाधन मात्र, उपयोगी संसाधन मात्र।

अब पुरुष क्या-क्या पैदा करता रहा है? पुरुष अन्न पैदा करता रहा है, पुरुष युद्ध लड़ता रहा है तो ज़मीनें जीतता रहा है। पुरुष ने ही ज्ञान पर अपना कब्ज़ा रखा है, तो उस ज्ञान से वो नयी-नयी वस्तुएँ पैदा करता रहा है, है न? पुरुष हज़ार तरीक़े की चीज़ें पैदा करता रहा है, बनाता रहा है, निर्मित करता रहा है। ठीक! मन से, ज्ञान से, बाहुबल से पुरुष ने बहुत कुछ है जो उत्पन्न करा।

स्त्री के पास न ज्ञान रहा है, न बाहुबल रहा है, तो स्त्री के पास बस एक ही चीज़ पैदा करने की सामर्थ्य रही है, वो है बच्चे। तो अगर एक फ़ैक्टर ऑफ़ प्रोडक्शन (उत्पादन के कारक) की तरह लें, एक उत्पादक संसाधन की तरह देखें, तो पुरुष बहुत कुछ है जिसका उत्पादन कर सकता है। फ़ैक्ट्रियाँ बनाएगा, ये करेगा, ज्ञान का उत्पादन करेगा, किताबें लिखेगा, न जाने क्या-क्या करेगा पुरुष। और स्त्री किस चीज़ का उत्पादन करती आयी है, बस स्त्री उत्पादन करती आयी है बच्चों का।

स्त्री किसका उत्पादन करती आयी है? बच्चों का। तो अब वो अठारह साल की होती नहीं कि समाज बोलता है कि भाई, ये जिस चीज़ का उत्पादन कर सकती है, उसमें अब इसको जल्दी से लगा दो न। क्योंकि पुरुष तो पढ़ा-लिखा है और पुरुष को शिक्षा दी गयी है और पुरुष को यही संस्कार दिये गए हैं कि तुम्हें ऐसा करके दिखाना है, वैसा करके दिखाना है, तुम्हें दुनिया जीतनी है।

स्त्री को तो बताया यही गया है, संस्कार यही दिया गया है कि बेटा, तुम तो जाओ घर में झाड़ू-पोछा करो, बच्चे पैदा करो, खाना बनाओ। तो जब एकमात्र चीज़ जो आप पैदा कर सकती हैं वो है बच्चे, तो समाज ने कहा कि फिर बच्चे जल्दी-जल्दी पैदा करो न और ज़्यादा-से-ज़्यादा पैदा करो।

भई, आप कोई संसाधन, कोई रिसोर्स अपने पास रखती हैं, आप कोई चीज़ बाज़ार से लेकर आती हैं, आपने उसमें पैसे ख़र्च करे हैं, तो आप यही चाहेंगे न कि उसमें से अधिक-से-अधिक आप प्रोडक्टिविटी (उत्पादकता) निकाल पायें। तो वैसे ही स्त्री के ऊपर समाज ने पैसे तो कुछ ख़र्च करे ही हैं उसके पालन-पोषण में। तो कहता है अब जल्दी से तू प्रोडक्टिविटी निकाल। तो इसलिए उसकी जल्दी से शादी कर दी जाती है कि अब जल्दी से बच्चे पैदा कर, यही तो उसकी प्रोडक्टिविटी है।

पुरुष की प्रोडक्टिविटी क्या है, दोहराइएगा। वो किताबें लिखेगा, वो फ़ैक्ट्रियाँ डालेगा, वो जाकर कहीं लड़ाई लड़ेगा, वो राजनीति करेगा, है न? वो नये-नये तरीक़े के उद्योग और व्यापार स्थापित करेगा। ये पुरुष की प्रोडक्टिविटी है।

और स्त्री की कुल प्रोडक्टिविटी क्या बता दी गयी? यू प्रोड्यूस बेबीज़, दैट इज़ योर प्रोडक्टिविटी (आप बच्चे पैदा करो, यही आपकी उत्पादकता है)। और अगर बेबी प्रोड्यूस करने हैं, तो उसकी पैंतीस साल में शादी करोगे तो थोड़े ही कर पाएगी। तो बेबी वो ज़्यादा प्रोड्यूस कर पाये, इसलिए कहा गया इसको अब जल्दी से लगाओ, जल्दी से इसको लगाओ। अठारह में ही इसको लगा दो ताकि ये ज़्यादा-से-ज़्यादा बेबीज़ पैदा करे।

और उन बेबीज़ को पैदा करना आवश्यक क्यों रहा है? क्योंकि पहले जो अर्थव्यवस्था थी वो कृषि-प्रधान थी और कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था में जो ऊर्जा का स्रोत था, सोर्स ऑफ एनर्जी, वो क्या था? मस्कुलर एनर्जी (बाहुबल)। बाहुबल के लिए ज़्यादा लोग चाहिए न, जितने लोग होंगे उतने बाहु होंगे। ज़्यादा लोग कहाँ से आएँगे, स्त्री पैदा करेगी तभी तो आएँगे।

तो कहा गया कि स्त्री को जल्दी से पैदा करने के काम में लगा दो ताकि वो ज़्यादा-से-ज़्यादा लोग पैदा कर सके ताकि उन्हें खेतों में डाला जा सके। क्योंकि तब लोग कम थे, ज़मीन ज़्यादा थी। आज चीज़ उल्टी हो चुकी है, आज ज़मीन कम है, लोग ज़्यादा हैं। पहले लोग कम थे, ज़मीन ज़्यादा थी तो ये था कि जितने लोग बढ़ेंगे उतना अच्छा होगा। हम जंगलों को काटेंगे, खेती के लिए नयी ज़मीन तैयार करेंगे, और अन्न पैदा करेंगे; और अन्न का मतलब होगा खुशहाली।

तो ये वहाँ से परम्परा चल पड़ी कि लड़की की जल्दी से शादी करो। और वो परम्परा चली ही आ रही है। लोगों ने सोच लिया कि यही तो हमारी संस्कृति है। लोगों ने सोचा यही तो धर्म है हमारा, जल्दी से लड़की की शादी कर दो। वो ये नहीं समझ रहे हैं कि वो परम्परा जब शुरू हुई थी तब स्थितियाँ अलग थीं।

आज की स्थितियाँ बिलकुल अलग हैं। वो परम्परा आज नहीं चल सकती कि लड़की की जल्दी से शादी करो। अठारह में तो बच्ची होती है वो। अठारह माने बारहवीं की लड़की हुई न, बारहवीं या फिर फ़र्स्ट इयर (प्रथम वर्ष) की। आप बारहवीं की लड़की की शादी की बात कर रहे हैं, आप बिलकुल पागल हैं! उसके माँ-बाप हैं या उसके दुश्मन हैं, क्या हैं आप?

अठारह तो छोड़ दो, अगर वो इक्कीस की भी है तो भी उसकी शादी की बात करना हिंसा है, अत्याचार है। अभी उसने दुनिया नहीं देखी। अभी उसे कोई ज्ञान नहीं, कोई कौशल नहीं, कोई अनुभव नहीं। उसको ज्ञान इत्यादि देने की जगह आप उसको गर्भ दे रहे हो, इससे बड़ी हिंसा क्या हो सकती है? जिस उम्र में उसे शिक्षा लेनी चाहिए, अनुभव लेने चाहिए, जगत के प्रयोग करने चाहिए, किताबें पढ़नी चाहिए, उस उम्र में वो गर्भवती होकर बैठ जाएगी, इससे बड़ी हिंसा क्या हो सकती है? अभी वो ख़ुद बच्ची है और तुम उससे कह रहे हो, ‘बच्चे पालो’, ये अत्याचार कैसे नहीं है?

बात समझ में आ रही है?

अब सवाल ये है कि हम इसका करें क्या। क्योंकि लोग तो स्वार्थी हैं, हमने शुरुआत ही ये कहने से करी है। लोग तो ऐसा करेंगे ही, लोग ऐसा तब तक करते रहेंगे जब तक स्त्री के पास एक ही प्रोडक्टिविटी है — वुम्ब (गर्भ) की। अगर स्त्री समाज को सिर्फ़ एक चीज़ दे सकती है, बच्चे, तो समाज उसका उसी दिशा में इस्तेमाल करेगा न, बोलिए।

समाज तो स्वार्थी है और स्त्री से अगर उसको सिर्फ़ बच्चे मिल सकते हैं — बच्चे मिल जाएँगे और घर के काम मिल जाएँगे — तो उसका अब वही तो इस्तेमाल करोगे, यही तो करते हो न आप?

भई, आपने वो सब देखी होंगी जो गृहकार्य में सहायता देने के लिए बाई लोग आती हैं, आप चाहो भी तो उनके आते ही क्या आप उनको कंप्यूटर पर बैठा सकते हो? नहीं न? उन बेचारियों को तो जीवनभर जो प्रशिक्षण ही मिला है, वो झाड़ू-पोछे का मिला है और चूल्हा-बर्तन का, यही मिला है न उनको? तो वो आती हैं, आप उनको तत्काल बोलते हो, ‘उधर कपड़े साफ़ कर दो और वहाँ किचन चले जाओ, वहाँ पर गंदे बर्तन हैं, साफ़ कर दो।’ यही करते हो न? तो जब आपको आता ही कुल इतना है तो कोई आपसे और क्या करवाए?

अगर स्त्री को बच्चे पैदा करने और झाड़ू-पोछा करने और बिस्तर लगाने और रसोई लगाने के अलावा कुछ आता ही नहीं है तो समाज उससे और क्या काम कराएगा? क्योंकि समाज तो हमने कहा, क्या है? दोहराइए।

प्र: स्वार्थी है।

आचार्य: स्वार्थी है, ठीक। तो समाज स्वार्थी है और आपके सामने एक महिला खड़ी है, वो अठारह की भी हो सकती है, पच्चीस की हो सकती है, पैंतीस-पैंतालीस की भी हो सकती है, उसे कुछ आता ही नहीं, क्योंकि उसको कभी कुछ सिखाया ही नहीं गया। और वो भी पगली थी, अज्ञानवश उसने स्वयं भी कभी प्रयास करके कुछ सीखा नहीं।

उसे कुछ नहीं आता, उसे बस यही चीज़ें आती हैं — मुझसे बच्चे पैदा करा लो, बच्चों को नहला दूँगी, बच्चों को धुला दूँगी, बच्चों के पोतड़े बदल दूँगी, बच्चों की कंघी कर दूँगी, बच्चों को तेल लगा दूँगी, पति का साथ दे दूँगी बिस्तर पर और पति के लिए भोजन परोस दूँगी। इतना ही कुल आता है उसको। तो आप उससे फिर वही काम कराते भी हो। क्या ये बात बिलकुल सीधी नहीं है?

अगर ये स्थिति बदलनी है तो फिर क्या करना पड़ेगा? ये करना पड़ेगा कि स्त्री को अन्य विद्याओं में सक्षम बनाना पड़ेगा, सीधी सी बात। अगर उसको और काम करने भी आ जाएँगे तो फिर समाज उससे नहीं बोलेगा कि बस तुम बच्चे पैदा करने का काम करो और जब तक उसे सिर्फ़ बच्चे ही पैदा करना आता है, तब तक समाज उससे सिर्फ़ बच्चे ही पैदा कराएगा।

घर की लड़की अगर सौ करोड़ के व्यापार की मालकिन हो जाए, उसने ख़ुद खड़ा करा और व्यापार की मालकिन हो गयी। मान लीजिए, वो बीस-इक्कीस में पढ़कर निकलती है और आजकल ऐसा होता है कि एकदम जो नये-नये पढ़कर निकले छात्र होते हैं, वो अपनी ही स्टार्टअप शुरू कर देते हैं। कोई लड़की अपनी शुरू कर दे स्टार्टअप इक्कीस की उम्र में। और ऐसा होता है कि तीन-चार साल में कई लोग हैं उनके स्टार्टअप सौ-सौ करोड़ के पहुँच जाते हैं। वो पच्चीस की उम्र में सौ करोड़ वैलुएशन (मूल्यांकन) का स्टार्टअप लेकर बैठ गयी है। अब भी क्या उसके माँ-बाप उस पर उतना दबाव बनाएँगे कि तू बच्चे पैदा कर?

बोलिए!

माँ-बाप कहेंगे, ‘कुछ नहीं, लड़की बढ़िया निकली है, सौ करोड़ का एसेट (संपत्ति) खड़ा कर दिया है। अब माँ-बाप दबाव नहीं बनाएँगे क्योंकि उसने बच्चा पैदा करने की जगह कुछ और बहुत बड़ा पैदा कर दिया है। अब नहीं कोई उस पर कोई दबाव बनाएगा। दबाव इसलिए बनाया जाता है क्योंकि वो सिर्फ़ बच्चे ही पैदा करना जानती है, तो दबाव बनाते हैं कि कर बच्चे पैदा। जब तू सिर्फ़ यही कर सकती है तो तू यही कर।

समझ में आ रही है बात आपको?

अब महिला प्रधानमंत्री हुई हैं उपमहाद्वीप में ही, भारत में भी हुई हैं, श्रीलंका में भी हुई हैं, बांग्लादेश में, पाकिस्तान में। उनसे कोई कहने जाता है क्या कि अगला बच्चा कब पैदा कर रहे हो? किसी की हिम्मत थी कि उन पर कोई दबाव बनाएगा? बस यही तो बात है फिर।

जब तक स्त्री अपने भीतर — दोहरा के बोल रहा हूँ, दोहरा के ही नहीं कितनी बार बोला — ज्ञान, गुण, कौशल नहीं पैदा करेगी, जब तक वो नहीं समझेगी कि वो भी एक चेतना है जिसका लक्ष्य है आत्मज्ञान, आत्मबल, मुक्ति, तब तक समाज उसका शोषण करता ही रहेगा। ठीक वैसे जैसे दुधारू गाय का किया जाता है। पूजा भी जाता है न, हम कहते हैं गौमाता, लेकिन अगर आप पास जाकर देखेंगे तो आपको बड़ा दुख होगा, हम गाय के साथ कितना अत्याचार करते हैं।

ठीक वैसे ही हम स्त्री को देवी बोल देते हैं लेकिन उसके साथ कितना अत्याचार करते हैं। वजह एक ही है, साझी वजह है — हम स्वार्थी लोग हैं। जिस किसी के पास भी बल, ज्ञान, गुण, कौशल नहीं होगा, हम उसका शोषण करेंगे-ही-करेंगे।

तो मैं बार-बार बोला करता हूँ लड़कियों से कि ये रूमानी कल्पनाओं में मत बह जाओ। पहले तो ये होता था कि माँ-बाप पीछे पड़ते थे कि शादी कर लो। वो सोलह-अठारह-बीस की हो गयी, उसको कहीं बाँध देते थे। अभी आजकल दूसरा ज़माना है, वो बारह-चौदह की होती है, वो उसी समय से फ़िल्मी पंख पसारना शुरू कर देती है।

पढ़ाई-लिखाई छोड़कर के वो 'बेबी' बन जाती है। सब उसने छोड़-छाड़ दिया है और वो बारह की उम्र में ही अपनेआप को किसी की पत्नी समझने लग गयी है और कहने को वो मॉडर्न (आधुनिक) है। छठी-आठवीं की लड़कियाँ जानू-जानू कर रही हैं और उनको कोई मतलब नहीं कि तुम कोई एंट्रेंस एग्ज़ाम क्लियर (प्रवेश-परीक्षा पास) करोगी कि नहीं करोगी, डॉक्टर, इंजीनियर, सीए, लॉयर, कुछ बनोगी कि नहीं बनोगी। वो क्या कर रही हैं? वो रिश्तेबाज़ी कर रही हैं।

तो इतनी बार लड़कियों को बोला करता हूँ, ये रिश्तेबाज़ी से बचो। अपनी प्रतिभा का विकास करो, अपनी ताक़त बढ़ाओ। ताक़त नहीं बढ़ाओगी तो ये समाज कहीं का नहीं छोड़ेगा तुमको। और ये सब प्रेम वग़ैरा, ये काल्पनिक छिछोरी बातें हैं। जिसको तुम अपना प्रेमी समझ रही हो उसको तुम्हारे शरीर का स्वार्थ है बस, इतनी सी बात है। और जिस दिन उसके शरीर का स्वार्थ निकल जाता है उस दिन पहने हुए कपड़े की तरह तुम्हें उतारकर कहीं छोड़ देता है, और फिर रोती रहती हो।

यही काम लड़कियाँ भी करती हैं। लड़कों को भी वो उसी तरह छोड़ देती हैं। सब पर लागू होता है क्योंकि हमने कहा मनुष्य ही स्वार्थी है। मनुष्य माने स्त्री-पुरुष दोनों, दोनों ही स्वार्थी हैं।

बात समझ में आ रही है?

तो रूप, सौंदर्य, इसको नहीं बहुत महत्व देना है। महत्व ताक़त को देना है, बल को। कोई ऐसी चीज़ होनी चाहिए आपके पास जो सिर्फ़ आपकी है, जो आपसे कोई नहीं छीन सकता। उसके बाद देखिए आपको सम्मान मिलता है कि नहीं, फिर मिलेगा सम्मान। फिर आपके साथ कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं कर सकता।

ज़ोर-ज़बरदस्ती तो कमज़ोरों के साथ ही करी जाती है। आप क्यों कमज़ोर बनी बैठी हैं? दुनिया की क्यों सुननी है? ये दुनियावाले तो अपने स्वार्थ के लिए कहते-सुनते हैं, ये आपको क्या दे देंगे? ये आते हैं आपका दुख बाँटने? आपके काम दुनिया नहीं आनी है, आपके काम आपकी अपनी ताक़त आनी है, उसका विकास करिए।

ये माँ-बाप जो अठारह साल में शादी करके फेंक देते हैं, वहाँ पर उसका शोषण होने लगे, पति पिटाई करने लगे, सास अत्याचार करे, मैरिटल रेप (वैवाहिक बलात्कार) भी होना शुरू हो जाए, जब वो अपने पिता के घर लौटकर आती है तो ऐसा बहुत देखा गया है कि पिता बोलता है, ‘अब तुम मेरी ज़िम्मेदारी नहीं हो। मैंने तुमको ब्याह दिया, मैंने दहेज दे दिया, अब तुम जानो, तुम्हारा काम जाने।’ और ये कितनी अजीब बात है! ये इतने आतुर हो रहे थे लड़की को कहीं बाँधने के लिए, और अब जब वो बँध गयी है तो कोई भी ज़िम्मेदारी लेने से इनकार करते हैं। अपवाद होंगे कुछ, अपवादों की बात नहीं कर रहे, पर सामान्यतया यही देखा गया है।

ये समझ में आ रहा हो तो ठीक है नहीं तो आप प्रतिप्रश्न कर सकती हैं।

प्र: प्रश्न तो वही है कि ज्ञान, गुण और कौशल की जो बात की गयी तो हम जब अठारह साल के थे, उसके पहले भी वो शुरू करने नहीं दिया गया ये बोलकर कि आप घर की बड़ी लड़की हैं।

आचार्य: तो लड़िए, भिड़ जाइए। भिड़ जाइए न। पता है आप क्यों नहीं भिड़ पायीं? क्योंकि उसमें भी आपको संस्कारित ये किया जाता है कि लड़की का काम है सौम्य रहना, मृदुल रहना, शांत रहना। लड़की है तो ज़रा कोमलता से बात करो न, आवाज़ ऊँची मत करो। लड़ना तो लड़की को कभी सिखाया नहीं जाता।

मैं चाहता हूँ, ज़रा भारत की लड़कियाँ लड़ाका बनें। और मैं उनकी नहीं बात कर रहा हूँ जो फ़ालतू की चीज़ों के लिए लड़ती हैं। तो मेरी बात को उल्टा मत समझ लीजिएगा। मैं उन लड़कियों की बात कर रहा हूँ जो बेचारी आज भी, और करोड़ों हैं ऐसी लड़कियाँ जो आज भी दबी-कुचली-सहमी ज़िन्दगियाँ बिता रही हैं।

मैं उनसे कह रहा हूँ, आवाज़ ऊँची करना सीखो, अपने हक़ के लिए खड़े होना सीखो। घरवाले अगर ऐसा कर रहे हैं कि भाई को अच्छी शिक्षा दिलवा रहे हैं और तुमको अच्छी शिक्षा नहीं दिलवा रहे, तो करो घर में उपद्रव, क्योंकि ठीक जैसे उन्होंने तुम्हारे भाई को पैदा करा वैसे ही तुमको भी पैदा करा। तुम्हारे भाई के प्रति माँ-बाप का जो कर्तव्य है, तुम्हारे प्रति भी वही कर्तव्य है। तो वो ऐसा कैसे कर रहे हैं कि भाई को तो ऊँची शिक्षा दिलवा रहे हैं और तुमसे कह रहे हैं कि साधारण कहीं चली जाओ कॉलेज में।

लड़ो, लड़ना सीखो, आवाज़ उठाओ। आवाज़ नहीं उठाओगी तो कोई साथ नहीं देगा। अपनी ताक़त ही अपना साथ देती है। ये माँ-बाप भी तुम्हें कहीं फेंककर के चले आएँगे।

प्र: ठीक है, धन्यवाद आचार्य जी। हम एक डिमोटिवेशन की तरफ़ जा रहे थे कि मुझे लड़ना नहीं है। जैसा आपने कहा, हमें लड़ना नहीं सिखाया गया था, हमें सौम्य रहना सिखाया गया था हमेशा। आज हम अपनी बात किसी से कह नहीं पाते हैं। अन्दर-ही-अन्दर उसको लिए रहते हैं कि नहीं, अगर हम बोलेंगे तो सामने वाले कहीं-न-कहीं हर्ट (आहत) होंगे, कहीं-न-कहीं थोड़ा सा उनको तकलीफ़ होगी। तो ये सब सोचकर हम बोलते नहीं हैं।

आचार्य: देखिए, कुछ जो ग़लत बातें सिखा दी गयीं न स्त्री को, वो ये है कि संतोष ही परम सुख है। सबको खिलाने के बाद जो थोड़ा-बहुत बचे, वो खा लो। दूसरे का दिल मत दुखाओ, भले ही अपने सीने में कितनी भी चोट लगी हो। ये सब बातें पीछे छोड़ने का वक़्त बहुत पहले आ गया था। और दुनियाभर की महिलाओं ने ये बातें बहुत पीछे छोड़ भी दी हैं। भारत में भी जो समझदार महिलाएँ हैं, जो सोच-समझ सकती हैं, जो शिक्षा ले चुकी हैं, वो इन बातों से आगे आ चुकी हैं।

लेकिन खेद की बात है कि आज भी करोड़ों भारतीय महिलाएँ यही बात लेकर के चल रही हैं कि हम पर अत्याचार भी हो रहा हो तो भी हमें आवाज़ नहीं उठानी है। और आवाज़ उठाने का मतलब चिल्लाना मात्र नहीं होता। आवाज़ उठाने का मतलब होता है जो सही है उस पर अडिग रहना — नहीं हटेंगे पीछे।

सत्य से पीछे हटने का मतलब होता है अपनी आत्मा के ही प्रति अनिष्ठा दिखाना। सच्चाई से बेवफ़ाई स्वीकार नहीं करी जा सकती न। और किसी को भी छोड़ा जा सकता है, सच को कैसे छोड़ दें! सच पर अडिग रहना, ये सीखना पड़ेगा सबको, लड़की को भी, लड़के को भी।

और वो सब बातें कि पुरुष की सेवा में ही और परिवार की सेवा में ही स्वर्ग है, हटाइए ये सब। इंसान सत्य की सेवा के लिए पैदा होता है। परमात्मा परमात्मा होता है, न पिता परमात्मा हो सकता है, न पति परमात्मा हो सकता है, न पुत्र परमात्मा हो सकता है। परमात्मा एक होता है। ये इतने सारे पारिवारिक परमात्मा कहाँ से पैदा हो गये?

तो जो परमात्मा है, जो सच्चा है, उसके प्रति निष्ठा रखिए। उससे वफ़ा निभाइए। बाक़ी ये सब झूठे-मूठे परमात्मा, घरेलू, अगर ये कुछ काबिलियत दिखाएँ तो इनको सम्मान देना है। ये क़ाबिलियत नहीं दिखा रहे हैं तो व्यर्थ का सम्मान देने की कोई ज़रूरत नहीं है।

प्र: आचार्य जी, जैसे इससे पहले वाले प्रश्न में बात हो रही थी कि समाज ने हमेशा से स्त्रियों को सिर्फ़ बच्चे के प्रोडक्शन के रूप में देखा है और उसमें आगे बढ़ाया है। पर अभी जैसे अगर हम पढ़ाई की बात को अलग रखकर ये भी समझें कि जब कोई स्त्री या पुरुष अगर अध्यात्म या और क्षेत्र में आगे बढ़ने की कोशिश भी करता है, तो उसे समाज से अलग क्यों समझा जाता है? उसका मज़ाक क्यों बनाया जाता है?

आचार्य: किसके द्वारा बनाया जाता है? जिनके द्वारा बनाया जाता है वो कितने होशियार हैं? हमेशा बात ये होती है न कि आपको अगर कोई दो बातें बोल रहा है तो वो कौन है? आपको दो बातें बोलने महात्मा बुद्ध आ जाएँ और आपको दो बातें बोलने बग़ल का झुन्नूलाल आ जाए, आप दोनों बातों को बराबर का महत्व तो नहीं देंगे न। तो आपको जब कोई दो बातें बोले तो ये पूछना पड़ता है कि वो दो बातें किसने बोली हैं। किसने बोली हैं?

किसी श्रेष्ठ व्यक्ति द्वारा बोली गयी एक बात भी बहुत मायने रखती है। और दस हज़ार मूर्खों द्वारा बोली गयी दस हज़ार बातें भी कोई महत्व नहीं रखती हैं। तो पूछिए अपनेआप से कि मैं किसके बोलने को इतनी गंभीरता से ले रही हूँ।

भई, हम बात कर रहे हैं, इस वक़्त भी आपकी ओर से ध्वनियाँ आ रही हैं न। हम क्या करें — उन ध्वनियाँ को उत्तर देना शुरू कर दें या मैं आपको उत्तर दूँ? मैं उत्तर दूँगा आपको। ठीक है न? वो ध्वनियाँ कहीं से आ रही होंगी, उनका क्या महत्व है! मुझे क्या लेना-देना? ये भी हो सकता है कि मैं जहाँ आपसे बैठकर बात कर रहा हूँ इसके आसपास कुछ कुत्ते हैं जो भौंकना शुरू कर दें, तो मैं ये वार्तालाप छोड़ करके कुत्तों पर ध्यान देना शुरू कर दूँ क्या?

ये सबके लिए एक सूत्र है — जब भी लगे कि मुझे लोग ऐसा-ऐसा बोलते हैं तो पूछिए कौन हैं ये लोग। सिर्फ़ ये नहीं कि लोग हैं, ये भी पूछना पड़ेगा कि वो कौनसे लोग हैं। जैसे वो फ़िल्मी डायलॉग है न, 'कौन हैं ये लोग? कहाँ से आते हैं?' तो वेदान्त भी यही पूछता है, 'कौन हैं? कौन हैं ये लोग? कहाँ से आते हैं?'

हर किसी की बात को महत्व नहीं दिया जाता और मूर्खता की बात को महत्व देना बुद्धिमत्ता का अपमान होता है। अगर आप झुन्नूलाल की बात को महत्व देने लग गयीं, तो ये कृष्ण का और बुद्ध का अपमान हो गया।

प्र: जी सर।

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