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ये पागल इच्छाएँ
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: लोग पूछते हैं, “अध्यात्म की ज़रूरत क्या है?"

तुम अगर आध्यात्मिक नहीं हो तो ऐसा नहीं है कि तुम्हारे साथ कुछ अच्छा घटेगा, कुछ बुरा घटेगा। हमारे साथ जो तय है होना, जो डिफ़ॉल्ट (अकारण) है, वो प्राकृतिक है; और वो हमारे लिए अच्छा नहीं है। ये बात बिलकुल अच्छे तरीके से समझ लो, सीने में जमा लो। तुम अगर होश में नहीं हो तो भी तुम्हारी ज़िंदगी की गाड़ी तो चलेगी ही, क्योंकि प्रकृति का काम है चलना; तो तुम्हारी गाड़ी रुकने नहीं वाली। वो तुम्हारे होश का इंतज़ार नहीं करेगी; तुम होश में हो, तुम बेहोश हो, तुम ब्रह्मज्ञानी हो, तुम अज्ञानी हो; गाड़ी तो चलेगी ही। कैसे चलेगी? धक्के खा-खाकर, ठोकरें खा-खाकर चलेगी।

हमारी सड़कों पर जो गाड़ियाँ चलती हैं वो तो फिर भी कम अभागी होती हैं, उनको एक बार ज़ोर की टक्कर लग जाएगी तो वो वहीं पर रुक जाती हैं, है न? गाड़ी है, बेहोश चली जा रही है, जाकर किसी पेड़ से भिड़ गई। चलो जो हुआ सो हुआ; गाड़ी को चोट लगी, जो भीतर बैठा था उसको चोट लगी, हो सकता है भीतर बैठने वाले की मृत्यु ही हो गई हो। पर जो भी हुआ, गाड़ी के चोट खाने का सिलसिला यहीं पर रुक गया। आदमी की दुर्दशा और गहरी है; हमारी ज़िंदगी की गाड़ी को रुकने की तो अनुमति ही नहीं है, वो चलती रहती है। एक पेड़ से भिड़ेगी, फिर दूसरे पेड़ से भिड़ेगी, तीसरे पेड़ से भिड़ेगी। कोई रहम नहीं करने वाला, कि, “इसने ज़िंदगी में बहुत ठोकरें खालीं, अब कृपया इसे ठोकरें न दी जाएँ।“ न; यही बदा हुआ है, यही लिखा हुआ है: गाड़ी चलती रहेगी, गाड़ी पिटती रहेगी, गाड़ी चलती रहेगी, पिटती रहेगी; क्योंकि प्रतिपल जीवन में तुम्हें क्या करने हैं? चुनाव।

गाड़ी तो चलाना ही है, गाड़ी को चलाना ही तो चुनाव है न? सीधी चलानी है, दाएँ काटनी है, बाएँ काटनी है; गति बढ़ानी है, गति रोकनी है, करना क्या है। तुम कोई चुनाव अगर नहीं कर रहे हो तो वो भी एक चुनाव है, और वो बेहोशी का चुनाव है; कि, “मैं तो अभी बेहोश पड़ा हूँ, मैं चुनाव करने की स्थिति में ही नहीं हूँ।" गाड़ी तो तब भी चलेगी, कैसे चलेगी? ठीक वैसे ही चलेगी जैसे एक सोते हुए ड्राइवर * (चालक) की गाड़ी चलती है। गाड़ी चल रही थी, * ड्राइवर सो गया; गाड़ी रुक जाती है क्या? गाड़ी तो चलती है न? हाँ, सांसारिक गाड़ी हो और ड्राइवर सो गया है तो शायद दो-चार किलोमीटर में रुक जाएगी; कोई एक्सेलरेटर देने वाला नहीं बचा, धीरे-धीरे अपना गति कम होती जाएगी तो कहीं जाकर रुक जाएगी।

जीवन की गाड़ी ऐसी नहीं होती। तुम सो रहे हो तो भी वो पूरी गति से चलेगी; भिड़ती चलेगी, मारती चलेगी, खुद भी चोट खाएगी, दूसरों को चोट देगी। तुम जो भीतर बैठे हो उसका तो कहना ही क्या; उसको चोटें लग रही हैं और बेहोशी में लग रही हैं, उसको पता भी नहीं उसको कितनी चोटें लग रही हैं। दर्द भी तो उसको तब महसूस होगा न, जब वो होश में आएगा? हमारी बेहोशी के साथ एक बड़ी विडम्बना है ये; बेहोश आदमी को चोट दो, उसे दर्द भी नहीं पता चलता। ज़्यादातर लोग तुमको ये जो हँसते-खिलखिलाते दिखते हैं, ये इसीलिए है। ऐसा नहीं है कि इनको जीवन ने घाव नहीं दिए हैं, इनको तो जीवन ने घावों से भर दिया है; इनके पास शरीर नहीं है, इनके पास शरीर में बस घावों का एक छत्ता है।

मधुमक्खी का छत्ता देखा है? उसमें कहीं छत्ता नज़र आता है? सिर्फ़ और सिर्फ़ क्या होती हैं? मधुमक्खियाँ। हममें से ज़्यादातर लोगों की हस्ती ऐसी ही होती है, छत्ते जैसी; उसमें छत्ता कहीं नही है, घाव ही घाव है, मधुमक्खियाँ हैं, सिर्फ़ मधुमखियाँ; घाव-घाव-घाव। हम ऐसे हैं। लेकिन फिर भी, हम नाच रहे होते हैं, उत्सव मना रहे हैं, पिक्चर देखने जा रहे हैं, इधर-उधर की बातें कर रहे हैं, पता कर रहे हैं दुनिया में क्या-क्या चल रहा है; ये है, वो है। बल्कि कहीं पर कोई दुर्घटना हो गई है तो अफ़सोस ज़ाहिर कर रहे हैं, “अरे! उस बेचारे के साथ बहुत बुरा हो गया।" जैसे कि हमारे साथ कुछ कम बुरा हो रहा है।

ये सब कैसे संभव हो पा रहा है? ये सब इसीलिए संभव हो पा रहा है क्योंकि हम आतंरिक रूप से गहरी बेहोशी में हैं, हमें हमारे घोर दुःख का कुछ पता ही नहीं। अब तुम समझ पा रहे हो कि ज़्यादातर लोग होश में आने से, माने अध्यात्म से इतना घबराते क्यों हैं? क्यों घबराते हैं? होश में आए नहीं, कि बहुत ज़ोर का दर्द उठेगा। इसीलिए आम जनमानस सदा से अध्यात्म से दूर भागता रहा है। दूर की बात है कि अध्यात्म से आनंद मिलता है; सच्चिदानंद वगैरह हटाओ, वो आखिरी बात है, पहली चीज़ क्या है? बहुत गहरा दुःख। हर किसी ने इतना संकल्प करा ही नहीं होता है दुःख झेलने का। हर किसी ने ये तय ही नहीं करा होता है कि, “जो भी हो, सच्चाई तो चाहिए, होश तो चाहिए।“ जब उनको बताया जाता है कि, “सच पता चल जाएगा, होश में आ जाओगे, आँख खुल जाएगी; लेकिन पीड़ा बहुत होगी,” तो कहते हैं, “हमें होश में आना ही नहीं।”

तो ऐसे चल रही है दुनिया की गाड़ी; बेहोशी में पार्टी चल रही है। और ये जितने लोग हैं, ये भीतर से सब ज़बरदस्त रूप से शोकाकुल हैं, और ऊपर-ऊपर आपको हँसते-खिलखिलाते चेहरे दिखेंगे। क्या गड़बड़ करी थी इन्होंने? क्यों इनको इतना दुःख झेलना पड़ रहा है? इन्होंने उपनिषदों की नहीं सुनी; जब ऋषिवर बता रहे थे कि निर्णय हमेशा ब्रह्म के पक्ष में करना, तो इन्होंने ऋषिवर की उपेक्षा कर दी। इन्होंने किसके पक्ष में निर्णय कर लिया? प्रेयता के पक्ष में; जो चीज़ प्यारी लग रही थी वहीं लोट गए, एकदम लोट गए। कुछ आकर्षक लगा नहीं कि; जैसे कुत्ता, थोड़ा मौसम अच्छा हो गया, किसी ने दुलरा दिया, तो वो चारों पैर आसमान की ओर करके सड़क पर लोट जाता है। उसकी ख़ुशी देखो।

उसकी ख़ुशी में तो फिर भी एक मासूमियत है, क्योंकि वो कुत्ता है; उसको मौसम अच्छा लगा, उसको तुमने थोड़ा सहला दिया, वो प्रसन्न हो गया, वो पीठ के बल लेट गया, पूँछ हिलाने लग गया। इंसान को नहीं शोभा देता, क्योंकि तुम कुत्ते नहीं हो; कोई कुत्ता किसी आतंरिक दुःख से विह्वल नहीं होता, हम होते हैं। कभी सुना है किसी कुत्ते को अवसाद में जाकर आत्महत्या करते हुए, सुना है? न तो कुत्ते एक सीमा से ज़्यादा शोक का अनुभव कर सकते हैं, न उनमें मुक्ति की तड़प उठती है। हममें उठती है न, तो इसलिए हमारे लिए आवश्यक है कि वो सब कुछ जो हमें प्राकृतिक रूप से आवाज़ें देता है, खींचता है, उससे थोड़ा बचें; वो तुमको दो-चार पल का झूठा, खोखला सुख दे देगा, और पीछे दुःख की बड़ी लम्बी श्रृंखला छोड़ जाएगा।

ये तुम्हारे साथ पहली बार हो रहा होता तो फिर भी सलाह दे दी जाती, कि, “चलो, अभी बच्चे हो, नए-नए टपके हो आसमान से। एक-दो बार प्रयोग करके देखलो कि सुख की तरफ़ जाओगे और बहुत सारा दुःख पाओगे, तुम्हें इस बात का अनुभव हो जाए। अनुभव हो जाएगा, कुछ सीख लोगे।” पर बच्चे नहीं हो तुम, तुम्हारे साथ ये चीज़ पहली बार नहीं हो रही है। असंख्य बार हम इन्हीं अनुभवों से गुज़रे हैं, और झूठ है ये कि हमें वो अनुभव बिलकुल भी याद नहीं। विस्मृत हो गया है बहुत कुछ, लेकिन विस्मृत होने से पहले वो अपनी छाप छोड़ गया है हमारे रेशे-रेशे में। याद हमें सब है। पूछोगे अगर अपने मन की गहराई से, तो वो तुम्हें बताएगी कि ये तुम्हारे साथ पहले भी हो चुका है। याद है न, क्या कह रहे थे ऋषि हमसे? “ क्रतो स्मर कृतं स्मर : ये तुमने पहले भी किया है और भोगा है; याद करो, याद करो, याद करो।“ इसे एक पूरा श्लोक ही समर्पित है यही कहने को (ईशोपनिषद्, श्लोक १७) : “याद करो, याद करो, याद करो, अपने पुराने कर्मों को याद करो। तुम ये पहले भी कर चुके हो और भुगत चुके हो, तुम क्यों अपने लिए दलदल तैयार कर रहे हो?"

समझ में आ रही है बात?

प्रेयता धोखा है। श्रेयता तुमको अनाकर्षक भी लगती है, कड़वी भी लगती है तो सिर्फ़ इसलिए क्योंकि तुमने आदतें बुरी डाल ली हैं। जैसे किसी को मीठे की बहुत आदत लग जाए तो फिर ज़रूरी नहीं है कि उसे बुरा लगाने के लिए तुम उसे कुछ कड़वा खिलाओ। किसी को आदत लग गई है कि वो चाशनी ही चाशनी पिएगा तो ज़रूरी नहीं है कि तुम उसे करेला दो तभी उसको बुरा लगेगा; तुम उसको अगर साधारण स्वाद वाला कोई फल भी दे दोगे तो उसे रुचेगा नहीं। सेब भी तो मीठा होता है न? पर जिसको रसगुल्ले की आदत लग गई हो, उसको तुम सेब दोगे तो वो क्या बोलेगा? “फीका है।“ हम ऐसे हो गए हैं। श्रेयता सेब जैसी है; फीकी नहीं है, उसमें एक नैसर्गिक मिठास निश्चित रूप से है, पर श्रेयता हमको कड़वी लगती है प्रेयता की चाशनी की तुलना में।

बात समझ में आ रही है?

तो लोग कहते हैं न, “साधना बड़ी मुश्किल है। अध्यात्म का पथ कंटकाकीर्ण है।" ये झूठी बात है। ये सब बातें तुम खुद को केंद्र बनाकर बोल रहे हो। ये सब बातें तुम अपने अनुभवों और आदतों और अपनी वृत्तियों को आधार बनाकर बोल रहे हो। तुम कह रहे हो, “मुझे तो साहब रसगुल्ला ही पसंद है। मेरे लिए तो जो रसगुल्ले की चाशनी है, वही पैमाना है, वही मापदण्ड है। तो मेरे लिए तो सेब और अंगूर भी क्या हैं? फीके हैं, फीके।" केला भी लेकर के जाओ, बढ़िया मीठा केला, तो आदत अगर उसको लगी हुई है चाशनी की, तो केले को भी क्या बोलेगा? “फीका है, फीका।“ हम ऐसे हैं।

तो सत्य, ब्रह्म कोई अपने-आपमें फीके नहीं हैं, उनमें भी बड़ा रस है; सत्य को सरस भी कहा गया है। आगे चलकर हम लेंगे, उपनिषद् सत्य के बारे में ही कहते हैं, “रसो वै सः" वह रस जैसा है। सत्य को कहा गया है रस जैसा। पर हमें उसमें कोई सरसता, कोई माधुर्य प्रतीत ही नहीं होता। सत्य को मत दोष देना, तुम्हें जो लत लगी हुई है चाशनी चाटने की उसको दोष देना; उसके कारण लोग ग्रंथों से दूर भागते हैं, उसी के कारण लोग अध्यात्म से दूर भागते हैं। उसी के कारण कोई आ जाए दो-चार खरी बातें बताने, उससे दूर भागते हैं, कहते हैं, “ये उतना मीठा तो बोल ही नहीं रहा है जितना वो चाशनीबाज़ बोलता है।" तो फिर ऋषि भी आश्चर्य कर रहे हैं, वो कह रहे हैं, “हमें तो ये पता था कि सबसे मीठा सत्य ही होता है, ये सत्य से भी ज़्यादा मीठा क्या आ गया!"

माया वहाँ कोने में खड़ी मुस्कुरा रही है, वो कह रही है, “चाशनी मेरा नाम।" सच्चिदानंद बेचारे बैठे ही रह गए, चाशनीबाई मैदान मार ले गई; ऋषिवर हमको बताते ही रह गए कि वहाँ पर (ब्रह्म में) सत् है, चित् है, आनंद है। अरे! आनंद अगर वहाँ है तो पूरी दुनिया दूसरे छोर पर क्यों नज़र आ रही है? अगर ब्रह्म में आनंद है, तो बाकी लोग आंनद बोतलों में और बाज़ारों में क्यों खोज रहे हैं भई? ये तुम्हारे कौतूहल का विषय नहीं है? हमको तो कहा गया कि मुक्ति भी वहाँ है, आनंद भी वहाँ है, सौंदर्य भी वहाँ है, शिवत्व भी वहाँ है। जो कुछ तुम माँग सकते हो, वो तुमको बताया गया कि वो सब कुछ ब्रह्म के द्वार है। अगर जीवन में जो कुछ पाने लायक है वो सब ब्रह्म के द्वार है, तो सारी दुनिया दूसरे द्वारों पर कतार बाँधकर क्यों खड़ी है? क्योंकि ब्रह्म मीठा नहीं लग रहा, आदत गलत पड़ गई; और ये मानने को भी राज़ी नहीं हैं कि हमारी आदत गलत है।

क्या कह रहे हैं (प्रश्नकर्ता को इंगित करते हुए), “ये ग्रंथों की भाषा बड़ी क्लिष्ट होती है, कुछ मज़ा नहीं आता।" ये नहीं मानोगे कि तुम्हारी भाषा बर्बाद हो चुकी है; ग्रंथों की भाषा को ख़राब बता देंगे।

“आचार्य जी, आपके वीडियो बड़े लम्बे होते हैं। अभी-अभी एक वीडियो देखा, वो पूरे ग्यारह मिनट का था। ग्यारह मिनट! झेल ही नहीं सकते हम।“

“आचार्य जी, एक मिनट से कम की वीडियो बनाया कीजिए।"

मेरा वीडियो लम्बा है, मैं नीचे आ जाऊँ, तुम ऊपर नहीं उठोगे? मेरे पास तो चाशनी नहीं है न, कि तुमको अट्ठावन सेकंड में चटा दूँ।

“आचार्य जी आप इतना रुक-रुककर क्यों बोलते हैं? मैं तो वन पॉइंट फाइव एक्स (डेढ़ गुना वीडियो की गति बढ़ाकर) पर सुनता हूँ। तेज़ बोला कीजिए, तेज़, ऐसे-ऐसे (दौड़ने के अंदाज़ में)।"

मैं ये करूँ? तुम जीवन में और श्रवण में थोड़ी स्थिरता नहीं ला सकते? मधुमेह के रोगी हो तुम, और मुझसे उम्मीद कर रहे हो कि मैं तुम्हें और चाशनी चटाऊँगा? तुम्हारा दुश्मन होता भाई तो तुम्हें चटा भी देता। समझ में आ रही है बात? कि मैं क्यों और नीचे नहीं आ सकता? मैं क्यों और तेज़ नहीं हो सकता? मेरे और नीचे आने का, मेरे और तेज़ होने का, या मैं बात को और ज़्यादा अगर मिश्रित करके बोलने लगूँ, पनियल करके बोलने लगूँ, डाइलूट् (फीका) करके, तो उसका मतलब यही होगा कि मैं मधुमेह के रोगी को चाशनी चटा रहा हूँ। तुम्हारी जो हालत ख़राब है वो चाशनी ही चाट-चाटकर हुई है, और तुम मुझसे भी अपेक्षा कर रहे हो कि मैं तुम्हें चाशनी चटाऊँगा। जिस दिन बिलकुल मैं भी आसुरी हो गया, और दुनिया से दुश्मनी निकालने की सोचने लगा, उस दिन मैं भी यही करूँगा, क्या? तुम मुझसे इतनी उम्मीदें करते हो, मैं वो सब पूरी कर दूँगा।

ब्रह्म को चुनना माने अपने विरुद्ध जाना।

वो आखिरी स्थिति होती है जहाँ तुम ऐसे हो जाते हो कि तुम्हारी कामनाएँ सब ब्रह्म-रंगी हो जाती हैं, फिर तुम अपनी कामना के साथ भी चलो तो ब्रह्म तक ही पहुँचते हो; वो बहुत आखिरी बात होती है। ये बिलकुल लिखकर रख लो कि साधना की, जीवन की बहुत उच्चतर स्थिति तक ब्रह्म को चुनने का एक ही और बिलकुल सीधा मतलब है: स्वयं को न चुनना; और कुछ भी नहीं। तुम इस चक्कर में पड़ोगे कि, “ब्रह्म कहाँ है, ब्रह्म कहाँ है, हम चुनना चाहते हैं ब्रह्म को, आज ब्रह्म को वरमाला डालनी है, ब्रह्म कहाँ है?” तो ब्रह्म कहीं नहीं मिलेगा। न कोई व्यक्ति है, न वस्तु है, न विचार है, न इकाई है, न छवि है, न कल्पना है; ब्रह्म कहाँ से मिल जाएगा भाई! तुम ब्रह्म को चुनना चाहते हो, ब्रह्म ढूँढे नहीं मिलेगा। लेकिन ब्रह्म का चुनाव करने का सीधा और स्पष्ट तरीका है कि स्वयं को न चुनो; बात खत्म। अपने खिलाफ़ चले जाओ। जिधर को बिल्कुल लुढ़कने को तैयार हो, वहाँ लुढ़कने से बचो। श्रम करना पड़ेगा। क्योंकि ढलान पर लुढ़कना तो बहुत आसान है न? कोई श्रम लगता है? न लुढ़कने के लिए श्रम करना पड़ेगा।

जहाँ बिलकुल लोट जाने का मन कर रहा हो, कि, “आहाहा! क्या सौंधी सौंधी, शीतल कीचड़ है, यहीं लोट जाते हैं बिलकुल; भीनी खुशबू उठ रही है, थोड़ा चाटेंगे भी,” वहाँ अपने-आपको नकेल डालनी पड़ेगी, “नहीं, ये नहीं करना है, यहाँ नहीं लोट जाना।" अब तुम्हारे चेहरों पर प्रश्नचिन्ह बना हुआ है, कह रहे हैं, “हम इतने बुरे हैं? जो भी हमारी इच्छा हो रही है, हम उसके खिलाफ़ ही जाएँ?" जी, यही समझ लो कि ग्रंथों का आधा सार यही है; जो इतनी-सी चीज़ सीख ले, वो जीवन में बहुत आगे जाएगा, इतना आगे चला जाएगा कि फिर उसे अपना विरोध करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी; यही लालच है।

अगर चाहते हो कि तुम्हारी इच्छाओं की पूर्ति हो, तो अपनी इच्छाओं का तब तक विरोध करते रहो जब तक इच्छाएँ इस लायक न हो जाएँ कि उनकी पूर्ति की जा सके।

इच्छा में कोई बुराई नहीं है, ‘तुम्हारी इच्छाओं' में बुराई है, ‘तुम्हारी इच्छाएँ' गन्दी हैं। तो इच्छा-पूर्ति का अधिकार तुमको निश्चित रूप से है, पर तुम उस अधिकार का उपयोग सिर्फ़ तब करना जब तुम्हारी इच्छाएँ साफ हो गई हों, शुद्ध हो गई हों; और इच्छाओं को साफ़ और शुद्ध करने का तरीका क्या है? इच्छा के खिलाफ़ जाना।

इच्छा को साफ़ करना है तो क्या करना होगा?

प्रश्नकर्ता: इच्छाओं के खिलाफ़ जाना होगा।

आचार्य: हाँ। इच्छा कैसी है? इच्छा पायदान जैसी है। पायदान जानते हो क्या होता है? जो डोरमैट या जो डोररग होता है। उसको साफ़ करने का तरीका क्या होता है? उसको पीटो; इच्छा ऐसी ही है, उसको जितना पीटोगे, उतना स्वच्छ होकर निकलेगी। और उसको जितना तुम चाटोगे, उतना तुम पाओगे तुम्हारा ही मुँह कीचड़ जैसा हो गया है।

आते-जाते लोग क्या कर रहे हैं पायदान का? उस पर अपनी धूल, अपना मल, अपना कीचड़ छोड़ते जा रहे हैं, यही कर रहे हैं न? तो ये जो दुनिया भर के पाँव की कीचड़ है, वो जिस पायदान पर बैठ जाती है उसका नाम है मन। और मन पर ये जो कीचड़ बैठ गई है, इसका नाम है इच्छा। हमारा मन ऐसा ही है; इस पर से पूरी दुनिया गुज़रती है और इस पर अपना कीचड़ पोंछती जाती है। उसको हम सोचते हैं, “ये तो हमारे मन की सामग्री है," कभी हम कह देते हैं, “मेरी स्मृति है," कभी अनुभव कह देते हैं, कभी, “ज्ञान है मेरा।" ज्ञान नहीं है, वो तुम्हारे मन पर दुनिया के पाँवों की कीच है। उसकी सफ़ाई करनी है तो क्या करना पड़ेगा? डंडा लेकर पीटना पड़ेगा। चाटना नहीं है, क्या करना है? पीटना है। लिखो: चाटना नहीं पीटना है।

मुझे दिखाओ कोई जिसने पायदान को चाट-चाटकर साफ़ कर लिया हो? प्रेमियों का क्या करें, उनको लगता है कि कीचड़ को चाटेंगे तो साफ़ हो जाएगी। उसे चाटा नहीं जाता; पहले तो उसको बिलकुल कड़क धूप में रख दिया जाता है, ताकि वो सूख जाए, और जब सूख जाए तो फिर उसको दे दना दन, दे दना दन। क्या इसका मतलब ये है कि हम दुश्मनी निकाल रहे हैं? शत्रुता है? नहीं, उससे शत्रुता नहीं है; सफ़ाई से प्यार है।

तो अध्यात्म कामना का विरोधी है? नहीं।

अध्यात्म मूर्खतापूर्ण कामना का विरोधी है; अध्यात्म आत्मघाती कामना का विरोधी है।

ऐसी कामना मत करो जो कामनाकार को ही भारी पड़ जाए। कामना तुम कर रहे हो ताकि तुमको संतुष्टि, तृप्ति, आनंद मिले; और तुम्हारी कामना का परिणाम हुआ अगर कि तुमको दुर्गति मिल गई, तो क्या कामना करी!

अध्यात्म तुम्हें कला सिखाता है सही कामना करने की। और सही कामना करने के लिए तो ज़रूरी है कि मूर्खतापूर्ण कामनाओं को पहले विदा दी जाए।

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