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ये आग किसने बुझाई है, ये जवानी क्यों बेच खाई है? || आचार्य प्रशांत (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: अपने आसपास की दुनिया को जब आप देखेंगे, तो दो बातें आपको प्रतीत होंगी। पहली ये कि दुनिया की हालत ठीक नहीं है। और दूसरी ये कि जो लोग जितना कामना-लोलुप हैं, वो उतने ही ज़्यादा ऊर्जावान दिखाई देते हैं। जो विध्वंस को जितना आतुर है वो उतना ही ज़्यादा उत्साही दिखाई देता है। और आप ये भी पाएँगे कि जो लोग विध्वंसात्मक नहीं हैं, कामना-प्रेरित नहीं है, वो थोड़े कम उत्साही, बल्कि बहुत कम उत्साही और उदासीन से प्रतीत होते हैं।

अब इन दोनों बातों को ज़रा मिलाइएगा। एक तो ये कि दुनिया की हालत हमें ख़राब दिखाई देती है और दूसरी ये कि दुनिया में सबसे ज़्यादा उत्साही, उर्जावान, सक्रिय लोग वही हैं जो चेतना के निम्न तलों से संचालित होते हैं। जिनके पास पूरी करने को अपनी क्षुद्र क़िस्म की आकांक्षाएँ हैं। जो किसी के कल्याण के लिए नहीं, अपने स्वार्थ के लिए काम करते हैं। यही लोग हैं जो दुनिया में सबसे आगे-आगे दिखाई देते हैं, सबसे ज़्यादा सक्रिय रहते हैं, सबसे ज़्यादा उत्साही रहते हैं, सबसे ज़्यादा श्रम करते हैं। तो इन दोनों बातों में जो सम्बन्ध है वो एकदम प्रत्यक्ष है।

दुनिया की ख़राब हालत है ही इसलिए क्योंकि दुनिया में कर्म करने की सारी ज़िम्मेदारी ग़लत लोगों के हाथ में चली गयी है। जो व्यक्ति जितना गिरा हुआ है, वो उतनी सक्रियता से कर्म कर रहा है। जो स्वार्थ, छोटे लाभ और विनाश के लिए काम कर रहा है। वो पूरी तत्परता से काम कर रहा है। उसके पास आलस नहीं, आवेग है। और जो लोग दुनिया को थोड़ा समझना शुरू कर देते हैं, जिनके स्वार्थ थोड़े कम पड़ जाते हैं, वो कर्म के प्रति भी उदासीन हो जाते हैं। तो नतीजा वही निकल रहा है जो हमारे सामने है। जगत विनाश की ओर तेज़ी से उन्मुख है। दुनिया की हालत किसी भी दृष्टि से अच्छी नहीं है।

कल एक छोटा सा आँकड़ा मैं पढ़ रहा था कि दुनिया भर में और विशेषकर भारत में पिछली शताब्दी के अन्तिम दस वर्षों में भी कुल मिलाकर वनों का उतना नाश नहीं हुआ था जितना अभी पिछले पाँच वर्षों में हो गया है। और पिछली शताब्दी भी अब समाप्त हुई है तो दुनिया में वन बहुत कम थे। जितने होने चाहिए उससे बहुत कम। लेकिन हमने क्या किया इस शताब्दी में? हमने ये किया कि वनों के विनाश की दर दूनी कर दी। वन पहले ही कम थे और उनके विनाश की दर हमने और बढ़ा दी। तो दुनिया की स्थिति बहुत मामलों में जितनी आज ख़राब है, इतनी ख़राब कभी नहीं रही। बहुत मामलों में आज दुनिया बहुत अच्छी और बड़ी सुखद भी प्रतीत होती है। लेकिन अगर आप थोड़ी विहंगम दृष्टि लेंगे, थोड़ा बिग पिक्चर देखेंगे, तो यही दिखाई देता है कि मामला ख़राब ही है।

ये मामला ख़राब कैसे हो गया? ये मामला ऐसे ही ख़राब हो गया कि विश्व की कमान, विश्व का नेतृत्व हमने ऐसे लोगों को दे दिया जो कहीं से भी सही केन्द्र से संचालित होने वाले लोग नहीं हैं। कितनी अजीब बात है! जो ग़लत है, उसके पास उत्साह है, प्रेरणा है, ऊर्जा है, लक्ष्य है, गति है, भाव है; और जो थोड़ा ज्ञानी है, जो दुनिया को समझता है, जिसमें विध्वंस की आकांक्षा कम है वो जगत के प्रति उपेक्षा का थोड़ा भाव रखकर उदासीन हुआ पड़ा है या आलस में पड़ा हुआ है। तो वही होगा फिर जो होना है, जो हमारे सामने है।

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत। कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्।।

हे अर्जुन! कर्म में आसक्त होकर अज्ञानी लोग जिस तीव्रता से कर्म करते हैं, ज्ञानी को अनासक्त रहकर जगत के कल्याण हेतु उसी तीव्रता के साथ कर्म करना चाहिए। ~ श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय ३, श्लोक २५)

बहुत महत्वपूर्ण श्लोक है आज का, श्रीमद्भगवद्गीता तीसरा अध्याय, पच्चीसवाँ श्लोक। कृष्ण कुछ पूछ रहे हैं आज हमसे। वो प्रश्न एक अर्जुन से नहीं, सब अर्जुनों से हैं। कृष्ण पूछ रहे हैं कि ये बताओ कि जो लोग आसक्ति के केन्द्र से काम करते हैं, जब वो इतना लगकर, इतनी मेहनत से एक तरह से इतनी निष्ठा और समर्पण से काम कर लेते हैं, तो तुमसे कर्म क्यों नहीं किया जाता भाई? ‘अर्जुन, दुर्योधन को देखो, उसके सारे इरादें कितने ग़लत हैं, कितने अकल्याणकारी हैं, कितने अमंगलकारी हैं। लेकिन इसके बाद भी वो इतनी अक्षौहिणी सेना लेकर के खड़ा हो गया है। युद्ध को तैयार हैं। एकदम आतुर है कि कब शंखनाद हो, तीर चलें और दूसरी ओर तुम हो अर्जुन, जो युद्ध से भागने को तैयार हो। तो फिर हस्तिनापुर का क्या होगा? भारत का क्या होगा? पूरे विश्व का क्या होगा ये तो तय ही हो गया न?’

दुर्योधन जैसे लोग जगत पर छा जाने को, सत्ता और बल पा जाने को एकदम तैयार हैं। उनके उत्साह की कोई सीमा नहीं और अर्जुन जैसे लोग युद्ध के क्षण में किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं, धर्म-अधर्म की बात करते हैं, युद्ध से भागने का बहाना खोजते हैं। तो फिर ये जगत किसके हाथों में चला जाएगा इसमें क्या प्रश्न बचा? और जब दुर्योधन जैसों के हाथ में जगत जाता है तो घोर अमंगल होता है। क्योंकि उसको अपनी सकामता के कारण प्रजा की फ़िक्र नहीं है। उसको बस अपना स्वार्थ साधना है। सकामता का यही मतलब होता है न? ‘मैं किसी तरह सुख भोग पाऊँ। भले ही इसके लिए पूरे जगत में मुझे आग लगा देनी पड़े।’ यही सकामता है।

अर्जुन से आज एक सवाल करा है कृष्ण ने, सलाह दी है, उस सलाह को सवाल समझिएगा। सवाल यही है — ‘वो अपने स्वार्थ के लिए इतना कुछ कर सकता है, तुम निस्वार्थ होकर क्यों नहीं कर सकते? वो व्यक्तिगत कामना हेतु इतना कुछ कर सकता है, तुम जगत-कल्याण हेतु कुछ क्यों नहीं कर सकते? उसका केन्द्र तो अहंकार का है न अर्जुन और अहंकार आत्मा से बहुत छोटी चीज़ होता है। तुम्हारा केन्द्र तो आत्मा का है, तो फिर ये अनहोनी कैसे घट रही है अर्जुन? कि जो अहंकार की केन्द्र से संचालित हो रहा है, जिसकी ऊर्जा का स्रोत छोटा है, वो ऊर्जा में और उद्देश्य में पगा हुआ दिखाई देता है और जो आत्मा से संचालित हो रहा है, जिसकी ऊर्जा का केन्द्र बहुत बड़ा है, वो निरुत्साही है, दुर्बल है, द्वंद्व में फँसा हुआ है। किंकर्तव्यविमूढ़ता ने उसकी ऊर्जा छीन ली है। तमाम तरीक़े की अपनी मान्यताओं को और सुनी-सुनाई बातों को वो सत्य के विरुद्ध खड़ा कर रहा है। ये क्या हो रहा है अर्जुन? हमने तो यही जाना था कि अहंकार आत्मा के सामने बड़ा छोटा होता है। तो फिर अहंकारी के पास इतनी ऊर्जा क्यों और आत्मस्थ इतना ऊर्जाहीन क्यों?’

और मैंने आपसे कहा, ‘ये प्रश्न एक अर्जुन से नहीं करा गया है। सब अर्जुनों से करा गया है।’ सब अर्जुनों से यही प्रश्न है। देखो, उन सबको जो पापी हैं, अत्याचारी हैं, भोगी हैं, कामी हैं। देखो, वो कितनी व्यवस्था से, कितने श्रम से, कितने अनुशासन से, कितना डटकर काम कर रहे हैं? देखो, उन सबको और अपनेआप को देखो। तुम अच्छी तरह जानते हो, तुम्हारे पास एक ऊँचा लक्ष्य है और उसके बाद तुम अपनेआप को देखो। तुम्हारे अपराध की कोई क्षमा है?

कोई किसी घटिया जगह पर किसी घटिया स्वार्थपूर्ण उद्देश्य के लिए काम कर रहा हो और वो अपने काम में बेईमानी करे, कामचोरी करे तो माफ़ी है और बात समझ में भी आती है क्योंकि वो काम ही इतना घटिया है। वो काम ही इतना घटिया है कि आप घड़ी तकते हो, कि कब काम का समय ख़त्म हो, घर भाग जाएँ, कब थोड़ी चोरी करने का मौक़ा मिले और आप चोरी कर लें। समझ में आता है, वहाँ पर अगर आप आलस दिखाते हो, काहिली करते हो। समझ में आती है बात और उस चीज़ की कुछ माफ़ी हो भी सकती है।

लेकिन उल्टा होता है, क्योंकि वहाँ तो आपको पता है कि कुछ करोगे आप तो तत्काल उससे लाभ मिलेगा और वो सारे काम आपको क्षुद्र लाभ दिखाकर ही करवाये जाते हैं। चलो, इतने जानवर मार दो, चलो, इतने पेड़ काट दो, चलो, इतने ग्राहकों को बेवकूफ़ बना दो, तुम्हें इतना पैसा दे देंगे। और जब ऐसा कोई सौदा आपके सामने रख दिया जाता है, तो तुरन्त आपमें उत्साह का संचार हो जाता है।

दुनिया के ज़्यादातर लोगों के काम-धन्धे, नौकरियाँ इसी तरीक़े के हैं। दूसरों को बेवकूफ़ बनाओ, इस बात के पैसे मिलेंगे किसी-न-किसी तरीक़े से, कहीं बहुत ज़्यादा बेवकूफ़ बनाया जाता है, कहीं कम बनाया जाता है। पर ले देकर बनाया ही जाता है। और वो सब लोग अपना व्यापार, अपना कारोबार, अपना काम बड़ी निष्ठा से, बड़े अनुशासन से, बड़े श्रम से करते हैं। अपना काम आगे बढ़ाते हैं। उनकी आप तरक़्क़ी देखिए। पूरी दुनिया वही लोग चला रहे हैं।

और दूसरी ओर अर्जुन जैसे लोग होते हैं। जिनको कृष्ण की कृपा से एक धर्मयुद्ध मिल गया होता है। बहुत बड़ी बात है कि आपको धर्मयुद्ध उपलब्ध हो पाया। ज़्यादातर लोगों को धर्मयुद्ध उपलब्ध ही नहीं होता। उनका अभाग ये है कि उनको गली-मोहल्ले के झगड़े, राडों से आगे का कोई संघर्ष कभी नसीब ही नहीं होता। कहे, ‘बड़ी ज़बरदस्त लड़ाई में उलझे थे।’ क्या लड़ाई थी? ‘एक तरफ़ चाचा थे, एक तरफ़ ताई थी। ये लड़ाई थी और ये घोर युद्ध चल रहा था, और हम इसमें उलझे हुए थे।’ ज़्यादातर लोगों की यही ज़िन्दगी है।

क्या लड़ाई थी? ‘आसपास की दूसरी बिल्डिंग वाले लोग आ गये थे। और जो पानी का पाईप आता है, उसको लेकर विवाद हो रहा था कि कौनसी बिल्डिंग में पानी ज़्यादा जाना चाहिए और कितने बजे जाना चाहिए। हम पूरे दिन उलझे रहे हैं। अन्त में जीत के आये हैं। अब हमें आधा घंटा ज़्यादा पानी मिला करेगा।’ ज़्यादातर लोगों को इसी प्रकार के संघर्ष नसीब हो पाते हैं।

तो अर्जुन भाग्यवान हैं कि उनको कुरक्षेत्र में खड़े होने का मौक़ा मिल रहा है। उनको धर्म को विजयी बनाने का मौक़ा मिल रहा है। ऐसे स्थान, ऐसी हालत में हो पाना है, जहाँ आप धर्म के लिए कुछ कर सको, जहाँ एक सच्चा जीवन जी सको। ये बहुत बड़ी बात है। ये नहीं बड़ी बात है कि वो धर्मयुद्ध अर्जुन जीतेंगे या नहीं जीतेंगे, वो छोटी चीज़ है। बड़ी चीज़ ये है कि अर्जुन उस मैदान में उपस्थित हैं। हममें से ज़्यादातर लोग कुरुक्षेत्र में उपस्थित ही नहीं होते। जहाँ धर्म की लड़ाई चल रही होती है। उससे बहुत दूर कहीं बाल्टी-लोटे की लड़ाईयाँ लड़ रहे होते हैं। हमारे लिए वही बहुत बड़ी बात है। यहाँ अर्जुन और भीष्म भिड़े हुए हैं।

ऐसा थोड़े ही है कि पूरे संसार, पूरी प्रजा का एक-एक इंसान आकर के वहाँ युद्ध में खड़ा हो गया था। ठीक उस वक़्त जब भारत का इतिहास बदला जा रहा था। बहुत सारे लोग अपनी छोटी-छोटी चीज़ों में मग्न थे। कोई मगन था इसी बात में कि आज बाज़ार से अमरुद ख़रीदने हैं, सबसे सस्ता कहाँ मिलेगा और उसके लिए दुनिया की वही सबसे बड़ी चीज़ थी।

सबसे पहली बात तो ये, कि अर्जुन का सौभाग्य कि कुरुक्षेत्र में खड़े होने का अवसर मिल रहा है। और उसके बाद बहुत बड़ा सवाल कि वहाँ सामने दुर्योधन खडा है। और उसके बाजू और उसकी माँसपेशियाँ फड़क रही हैं। वो कह रहा है, ‘मैं तो भिड़ जाना चाहता हूँ,’ और अर्जुन, तुम कह रहे हो, ‘मैं भग जाना चाहता हूँ’। वो भिड़ जाना चाहता है, तुम भग जाना चाहते हो।

जो ग़लत काम में लगे हुए हैं, उनके पास कोई अन्तर्द्वंद्व नहीं है, उन्हें कोई आत्मसंशय नहीं है। वो आत्मविश्वास से भरपूर हैं और जो लोग सही काम में लगे हुए हैं, उनमें आलस खोजो तो आलस मिलेगा, बेईमानी खोजो तो बेईमानी मिलेगी, आत्मसंशय खोजो तो आत्मसंशय मिलेगा, अन्तर्द्वंद्व खोजो तो अन्तर्द्वंद्व मिलेगा, अनिष्ठा खोजो तो अनिष्ठा मिलेगी, झूठ खोजो तो झूठ मिलेगा। ये क्या माया है?

पहली बात तो ज़्यादातर लोग झूठ की तरफ़ ही खड़े होते हैं। देखो, दुर्योधन का पक्ष कितना बड़ा है! कहते हैं — कौरवों की थी सात अक्षौहिणी और उधर थी ग्यारह, तो डेढ़ गुनी बड़ी। कह रहें हैं — कौरवों का बल तुमसे डेढ़ा संख्या बल। और उसके बाद उनका उत्साह भी तुमसे दूना। कर्ण वहाँ शिविर में बैठा एकदम क्रुद्ध है, कुपित है, अधीर है। क्यों? क्योंकि उसे युद्ध में आने को नहीं मिल रहा। भीष्म ने शर्त रख दी थी जब तक मैं हूँ तब तक कर्ण नहीं आएगा। और कर्ण वहाँ शिविर में बैठा फनफना रहा है। कह रहा है कि मुझे आने क्यों नहीं दे रहे।

कर्ण इसलिए फन-फना रहा है कि उसे युद्ध लड़ने को नहीं मिल रहा और अर्जुन तुम कह रहे हो कि तुम्हारे हाथ-पाँव काँप रहे हैं और तुम्हारा तन-मन सब जला जा रहा है, क्योंकि तुम्हें युद्ध में आने को मिल गया है। ये क्या विडम्बना है? ये क्या माया है? और ऐसे में तो खेल का नतीजा पहले से ही तय हो गया न? ग़लत बाज़ी खेलने वाले सब संख्या में भी ज़्यादा हैं, मनोबल में भी ज़्यादा हैं और सही खेलने वाले सब कमज़ोर, निराशा से भरे हुए, सन्देह से भरे हुए, पूर्वाग्रह से भरे हुए, दुराग्रह से भरे हुए, भय और मोह से भरे हुए। कौन जीतेगा, स्पष्ट ही है।

जो लोग दुनियादारी में लिप्त हैं, उनकी चाल देखो, उनकी चपलता देखो, उनकी चालाकियाँ देखो, उनकी होशियारियाँ देखो और जो लोग दुनियादारी से आगे बढ़कर, श्री कृष्ण यहाँ कह रहे लोकसंग्रह। और जो दुनियादारी से आगे बढ़कर लोकसंग्रह माने जन-कल्याण के लिए काम कर रहे हैं, उनकी उतरी हुई सूरतें देखो, उनकी बुझी हुई आँखें देखो, उनके दिलों में पलती बेईमानियाँ देखो। अब क्या होगा?

कृष्ण ने यहाँ बड़ा ही विचित्र काम कर डाला है इस श्लोक में। अभी पहले ही, पिछले ही श्लोकों में कृष्ण ने स्वयं को उदाहरण बनाकर प्रस्तुत किया था न। अब देखिए, यहाँ जो होने जा रहा वो कितना हृदय विदारक है, कितना मार्मिक है! पिछले श्लोकों में कृष्ण अर्जुन के सामने खड़े होते हैं उदाहरण बनकर के; अर्जुन, मुझे देखो, मुझे कुछ अप्राप्त नहीं, मुझे कुछ पाना नहीं। लेकिन मैं क्या अपना कर्म कभी रोकता हूँ? और मैं यदि अपना कर्म रोक दूँ, तो जगत विसंगतियों से भर जाएगा, जगत दुख से भर जाएगा। कृष्ण अपनेआप को उदाहरण बनाकर खड़े कर रहे थे। अर्जुन को बात जँची नहीं। अर्जुन को समझ में नहीं आया।

कृष्ण अर्जुन का चेहरा पढ़ रहे हैं। और कृष्ण मुस्कुराते हैं और कहते हैं ठीक। अभी तुम उस स्थान पर हो ही नहीं अर्जुन, जहाँ तुम्हारे सामने मैं उदाहरण बनकर खडा हो सकूँ। तुम्हारे उदाहरण तो दूसरे ही लोग हैं। ठीक वैसे ही, जैसे अभी थोड़ी देर पहले तुम कह रहे थे कि अरे! मेरे गुरु लोग सब उधर खड़े हैं। जैसे तुम्हारे गुरु सब उधर कौरवों के पक्ष के हैं, वैसे ही तुम्हारे उदाहरण भी कौरवों के पक्ष के ही आएँगे। तो श्री कृष्ण इस पच्चीसवें श्लोक में अपनेआप को पीछे खींच लेते हैं। वो कहते हैं, ‘मैं तुम्हारे लिए उदाहरण भी नहीं बन पाऊँगा, तो तुम्हें तो उदाहरण भी उसी दिशा से आएँगे।’

अर्जुन से कहते हैं, ‘अर्जुन देखो, जितने कामी और लालची हैं। ये कैसे, किस वेग से, किस गति से, किस भावना से, किस संकल्प से और दृढ़ता से काम कर रहे हैं! अर्जुन, तुम उन्हीं का उदाहरण ले लो न। और जैसे वो अपने लक्ष्यों के लिए काम करते हैं, बेटा तुम भी करो।’ बहुत मार्मिक बात है। हृदय पर चोट करने वाली बात है ये। कृष्ण अपनेआप को पीछे खींच लेते हैं। कृष्ण कहते हैं, ‘मैं उदाहरण नहीं बन पाऊँगा। मैं तुम्हें उन्हीं का उदाहरण दिये देता हूँ, दूसरों का, मेरा उदाहरण नहीं चलेगा अभी।’

तो कह रहे हैं, ‘देखो, कर्मों में आसक्त जो लोग हैं अर्जुन, वो किस त्वरा से काम कर रहे हैं, किस तेज़ी से काम कर रहे हैं! क्या गर्मी है! क्या आँच है! क्या संकल्प है! मन क्या केन्द्रित हुआ है उनका अपने लक्ष्य की ओर! तुम उन्हीं को आदर्श बना लो, अर्जुन। तुम उन्हीं से तो कुछ सीखो अर्जुन, अगर मुझसे नहीं सीख पा रहे।

और बताओ अगर वो लोग इतनी दृढ़ता, संकल्प, अनुशासन से काम कर लेते हैं बिना किसी विचलन के। उनको और कोई विचार नहीं आता। वो नहीं सोचते कि हम ग़लत काम कर रहे हैं, क्या नतीजा होगा। वो कहते हैं, ‘हम जो कर रहे हैं, बिलकुल ठीक कर रहे हैं। और सही नतीजा होगा’ और ये करके उन्होंने पूरे जगत को जीत लिया है। जगत को उन्होंने जीत लिया है, तो तुम उन्हीं से थोड़ी प्रेरणा लो अर्जुन। और जैसे वो दृढ़ता से काम कर रहे हैं, वैसे ही तुम काम कर लो। बस अन्तर ये है कि वो आसक्त होकर काम कर रहे हैं अपने स्वार्थ के लिए। तुम अनासक्त होकर के काम कर लो जन-कल्याण के लिए।’

समझ में आ रही है बात ये?

बहुत बार ऐसा होता है कि आप जिसको समझा रहे हैं। वो सीधे-सीधे आपकी बात नहीं मानेगा। और आप उदाहरण बनकर खड़े हो जाएँगे, तो उस उदाहरण का वो सम्मान भी नहीं करेगा। तब आपको अपनेआप को पीछे करके, उस व्यक्ति के सामने वो उदाहरण रखने पड़ते हैं जिन उदाहरणों को वो मान पाये, जिन उदाहरणों से वो सीख पाये, जिन उदाहरणों से वो सम्बन्ध बना पाये। आप उसको कह दो, ये बात मेरी है। वो उस बात को स्वीकारेगा ही नहीं। कहेगा, ‘आपकी बात है क्या स्वीकारें? आपमें ऐसा क्या ख़ास है?’ आप जब कहते हो, ‘ये बात उन लोगों की है देखो, जो सफल हैं, जो ऊँचे हैं, जो सक्रिय हैं।’ तो फिर उस उदाहरण को कुछ सम्मान मिल जाता है, स्वीकृति मिल जाती है।

कई बार भले ही आप स्वयं उदाहरण बनने में सक्षम हो। लेकिन फिर भी आपको उदाहरण उसका देना पड़ता है जिसका उदाहरण सफल हो पाएगा। आप भले ही अपनी मौलिक बात कहने में सक्षम हों। लेकिन आपको अपनी बात उसके शब्दों में कहनी पड़ती है, जिसके नाम को स्वीकृति मिल पाएगी। बात भले आपकी हो, लेकिन नाम आपको उसका लेना पड़ता है जिसका नाम स्वीकारा जाएगा। वही काम यहाँ पर कृष्ण कर रहे हैं। और ये सवाल मैं कह रहा हूँ, आज अर्जुन के सामने नहीं है, आप सबके सामने है। आप बताइए जो कुछ नहीं जानते, उनके पास इतनी गर्मी है, इतनी तेज़ी है और इतना आत्मविश्वास है, वो पूरी जान से लगे हुए हैं अपने लक्ष्यों को पाने में। और आप कहते हो, ‘आपको ज्ञान हो गया है’ और आप हिचकिचाते रहते हो। आपके भीतर सन्देह, संशय लगातार बना रहता है। तो फिर क्या होगा?

एक सूत्र है यहाँ पर, समझिएगा। हमें कहा गया — “सत्यमेव जयते”, वो बात बिलकुल ठीक है। लेकिन पूरी नहीं है। क्योंकि सत्य किसको परास्त करेगा? सत्य तो असंग और अद्वैत होता है। सत्य के सामने तो कोई दूसरा है ही नहीं उसको चुनौती देने के लिए। तो सत्य हराएगा भी तो किसको? तो “सत्यमेव जयते” का कोई अर्थ ही नहीं है। सत्यमेव सत्य ही है। जब सत्य ही है तो सत्य के अलावा जीतेगा कौन? तो वो बात बहुत महत्व की हुई नहीं। हालाँकि बात बहुत सुन्दर है, बहुत ऊँची है। और बिलकुल सही बात है वो। लेकिन उससे ज़्यादा उपयोगी कदाचित् एक दूसरी बात है।

उससे ज़्यादा उपयोगी बात ये है कि अगर प्रेम है सत्य के लिए, तो आप अपनी ज़िन्दगी में सत्य को जिता लोगे। लेकिन अगर आपमें कामना है प्रकृति के लिए, तो आप अपनी ज़िन्दगी में तो प्रकृति को ही जीता लोगे। किसी पूर्ण तल पर, एब्सोल्यूट स्तर पर सत्य सदा विजयी होता होगा। लेकिन आपकी ज़िन्दगी में तो माया जीत जाएगी, तो बात बड़ी गजब की है समझिएगा। “सत्यमेव जयते” जो बात है वो बिलकुल आख़िरी बात है। वो ज़िन्दगी की बात नहीं है, वो मुक्त पुरुष की बात है। वो आम ज़िन्दगी की बात है ही नहीं।

वो मुक्त पुरुष है जिसके जीवन में सत्य आख़िरी जीत हासिल कर चुका है और अब कुछ बचा ही नहीं। तो सत्य ही है वहाँ पर। तो “सत्यमेव जयते” कहना भी जैसे कुछ अतिशयोक्ति हो गयी। सत्य ही है तो सत्य के अलावा कुछ है ही नहीं। ये मुक्त पुरुष की बात है। हमारे जीवन में तो सत्य और असत्य दोनों होते हैं। होते हैं न? ये तीन हैं (आत्मा-अहम्-प्रकृति), आप कौन हैं इसमें से? बीच वाले। आप बीच वाले हैं न। आपके लिये तो दोनों ही हैं। सत्य भी अभी मौजूद है और असत्य भी मौजूद है। आप दोनों में किसी भी दिशा में जा सकते हैं। जा सकते है न?

आप चाहें तो सत्य को जिता दें, आप चाहें तो असत्य को जिता दें। जहाँ तक आपके जीवन का प्रश्न है। कोई आवश्यक नहीं है आपके जीवन में कि “सत्यमेव जयते”। बिलकुल आवश्यक नहीं है। एकदम अनिवार्य नहीं है। हज़ार में से नौ-सौ-निन्यानवे लोगों के जीवन को अगर देखोगे तो वहाँ “सत्यमेव जयते” बिलकुल लागू नहीं होता। वहाँ तो झूठ ही जीता हुआ है। आख़िरी जीत सत्य की होती होगी। लेकिन आपके जीवन में सत्य जीतेगा या असत्य जीतेगा, ये आप पर निर्भर करता है, आपके चुनाव पर। आप चाहोगे, आप चुनोगे तो सत्य जीतेगा। आप चुनोगे तो असत्य जीतेगा। यही बात इस श्लोक में सामने आ रही है।

ज़्यादातर लोग चूँकि अपनी कामना को जिताने के लिए जीते हैं। इसलिए इस जगत में तो कामना का ही साम्राज्य है। और अगर तुम चाहते हो कि इस जगत में करुणा का साम्राज्य हो, कल्याण का साम्राज्य हो। तो जितना मोह एक झूठे आदमी को अपनी झूठी कामना से होता है, उससे ज़्यादा प्रेम एक सच्चे आदमी को अपनी सच्चाई से करना पड़ेगा। यही बात तय करेगी कि जीतेगा कौन? “सत्यमेव जयते” कोई तयशुदा बात नहीं है आपके जीवन में। आपके जीवन में तो अगर आपको प्रकृति से, माया से कामना होगी, तो माया ही जीत जाएगी। आपके जीवन में सत्य तभी जीतेगा जब आप, माया की तरफ़ आपका जो मोह है उससे ज़्यादा बड़ा प्रेम सत्य की ओर दिखाएँ।

आपके जीवन में कौन जीतेगा वो इस पर निर्भर करता है कि प्रेम बड़ा है या स्वार्थ। आपके चुनाव की बात है — आपने किसको चुना। प्रेम जिताता है और यदि प्रेम क्षीण है तो कामना जीत जाएगी। ज़्यादातर लोगों के साथ ये होता है। आज जगत में प्रेम बहुत क्षीण है। इसलिए कामना हर तरफ़ जीत रही है। प्रेम तो सिर्फ़ सच्चाई से ही हो सकता है न? बाक़ी तो सब मोह-माया और कामना-वासना का खेल होता है। तो माने सत्य के काम में जो लोग लगे हैं, वो बड़ी छोटी निष्ठा के लोग हैं। इसीलिए जगत की दुर्दशा है। और झूठ के काम में जो लोग लगे हैं, वो बड़े दृढ़, बड़े संकल्पी, बड़े निश्चयी लोग हैं। आप ऐसे उदाहरण लेकर के देख लीजिए।

आपके घर में कोई लड़का या लड़की बड़ा प्रतिभाशाली पैदा होता है। बड़ा होने लगता है। आपके घर में, आपके सबके घरों में बच्चे होंगे, तो बड़ी प्रतिभा वाली संतान है। वो बड़ी हो रही है। आप तुरन्त उसको लेकर के मन में क्या सपने, क्या इरादे करते हैं? आप यही कहते हैं न — ‘ये बड़ा बढ़िया जा रहा है। इसकी गणित बहुत अच्छी है। सीधे आईआईटी जाएगा। कम्प्यूटर साइंस करेगा और उसके बाद जाकर गूगल में जॉब करेगा।’ यही कहते हो न? लड़की बड़ी हो रही है। ‘ये केमिस्ट्री और बायोलॉजी में बड़ी तेज़ है। देश की, दुनिया की टॉप डॉक्टर बनेगी ये।’ यही कर रहे हो न?

आपको क्या कभी भी ये ख़याल आता है कि घर में अगर प्रतिभा है, तो उसको सच्चाई की लड़ाई वाले मैदान में भेज देना चाहिए? आता है क्या? तो जिन लोगों के पास संकल्प है, अनुशासन है, तमाम तरीक़े के सद्गुण हैं। वो सब तो दुर्योधन की ओर भेज दिये जाते हैं न। वो बच्चा पैदा होता है और उसमें आपको ज़रा सी प्रतिभा दिखी नहीं कि आप उसको दुर्योधन की तरफ़ भेज देते हैं। क्यों? क्योंकि दुर्योधन तनख्वाह अच्छी देता है। दुर्योधन अपने ग़ुलामों को माल बढ़िया बाँटता है।

आप लोग यहाँ बैठे रहते हैं, कहते हैं, इस वक़्त हज़ारों लोग आप गीता समागम में सम्मलित हैं। आप बिलकुल आ जाते हैं करबद्ध होकर। बड़ी अच्छी बात है। आप मेरी बात को सुनते हैं, आप गाते हैं, आप समझते हैं। क्या आप अपने बच्चे संस्था को देना चाहेंगे? अगर आचार्य जी इतना ही अच्छा काम कर रहे हैं, तो आचार्य जी के युद्ध में अपने परिवार वालों को भेजो न! ‘नहीं, नहीं, नहीं, नहीं; वो नहीं, वो नहीं।’ बस इसीलिए दुनिया की हालत इतनी ख़राब है। क्योंकि जो लोग ग़लत दिशा में खड़े हैं, उनके पास सबकुछ है। संकल्प भी है और संसाधन भी है। और जो सही दिशा में खड़े हैं, उनके पास बस डर है, हिचक है, संशय है।

होता तो ये है कि कोई जवान लड़का या लड़की अगर संस्था में आ जाए, तो उसके घरवाले पीछे से शोर मचा देते हैं। कभी बल प्रयोग करते हैं, कभी पीछे से साजिश करते हैं किसी तरह से इसको यहाँ से उठा ले जाएँ। तभी तो फिर कृष्ण को कहना पड़ता है कि मैं आऊँगा। “परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम”।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम। धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।

साधुओं का उद्धार करने, दुष्टों का विनाश करने तथा धर्म की फिर से स्थापना करने के लिए मैं हर युग में प्रकट होता हूँ। ~श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय ४, श्लोक ८)

‘मैं आऊँगा। हर युग में आना पड़ता है मुझे।’ “संभवामि युगे युगे”। हर युग में आना पड़ता है। क्यों आना पड़ता है? क्योंकि सच का पलड़ा हमेशा हल्का ही रहता है भाई! तो कृष्ण को आना पड़ता है। कहते हैं, ‘इनको, इनके मत्थे छोड़ दिया तो ये रोज़ हारेंगे। सच की लड़ाई को अगर सच के पक्षधरों के भरोसे छोड़ दिया तो सच तो रोज़ हारेगा। दुनिया नर्क बन जानी है।’

क्योंकि पहली बात तो सच की तरफ़ खड़े होने वाले लोग कम। जो लोग खड़े हैं उनमें प्रतिभा, संकल्प, शक्ति कम और उनमें संशय कूट-कूटकर के भरा रहता है। तो कृष्ण कहते हैं कि ये तो बड़ी असन्तुलित बात हो गयी। बड़ी बेमेल लड़ाई हो गयी। तो फिर कहते हैं कि मैं ही आकर के ठीक करूँगा भाई। बेटा, तुमसे तो न हो पाएगा। तुम्हारे मत्थे छोड़ दिया तो पृथ्वी पर तो सच्चाई रोज़ हारेगी। उपनिषद् भले ही बोल गये हों “सत्यमेव जयते”। वो होगी सत्यलोक की बात, जहाँ “सत्यमेव जयते”। मृत्युलोक में तो मृत्यु ही रोज़ जीतेगी। मृत्यु माने असत्य। असत्य ही रोज़ जीतेगा।

मृत्युलोक में जब असत्य रोज़ जीत रहा होता है, क्योंकि सबसे शानदार लोग असत्य की तरफ़ ही खड़े होते हैं। एक-सौ-चालीस आईक्यू है, वो आपको लोक-कल्याण के लिए काम करते दिखाई देगा क्या? न। वो आपको दिखाई देगा अपनी प्रतिभा को पैसों में तब्दील करता हुआ। वो कहेगा, ‘एक-सौ-चालीस आईक्यू है अब इसको भूनाऊँगा न!’

तो ले देकर बेचारे सत्य की ओर खड़े होने वाले लोग कौन होते हैं? ज़्यादातर वो लोग होते हैं जिन्हें दुनिया के बाज़ार में बहुत क़ीमत होती नहीं। फिर भी पूरा श्रेय है उनको कि वो खड़े तो हुए सच्चाई की लड़ाई के लिए। खड़े भले ही हो जाते हैं, लेकिन वो अपने अवगुणों से मजबूर रहते हैं। सच के लिए खड़े हो गये हैं, सेहत है दो हड्डी। झूठ फूँक भी मार दे तो ये सच के सिपाही सब उड़ जाएँ। और सच के लिए खड़े इसीलिए हुए क्योंकि दो हड्डी हैं बेचारे। तो उन्होंने कहा, ‘हम सच की तरफ़ ही चले चलते हैं।’ बल तो हमने पूरा अपना ही किसको दे रखा है? झूठ को।

आप कितने खुश होते हैं, आपके घर के बच्चे की सॉफ्टवेयर में कहीं जॉब लग जाती है! उसके बाद आप पूछने जाते हो क्या कि किस क्लाइन्ट के लिए कोड लिख रहे हो बेटा? और ज़्यादातर जिन क्लाइंट्स के लिए कोड लिखा जाता है, ये वही लोग हैं जो पृथ्वी की बर्बादी कर रहे हैं। तो आप स्वयं ही अपना सारा बल विनाशकारी ताक़तों को देते हो। आप अपनी बुद्धि, अपनी प्रतिभा सबकुछ आपने विनाश की सुपर्द कर रखी है। उसके बाद आप चाहते हो कि सत्य जीत भी जाए। कैसे जीत जाएगा?

अब कहते हो, ‘नहीं, आचार्य जी, हम आपके साथ खड़े हैं। आप तो कुछ कर रहें हो। बाक़ी लोग तो आप थोड़ा-बहुत तो कुछ कर ही रहें न।‘ आप क्या मेरे साथ खड़े हो? आपने अपनी पूरी ताक़त देखो, किसको दे रखी है। आपने अपनी पूरी जिन्दगी किसको दे रखी है? सबकुछ किसी और को दे आने के बाद आप यहाँ आकर खड़े हो जाओ, तो आपकी पूजा करें क्या?

और रुपये-पैसे से ज़्यादा धर्मयुद्ध को प्रतिभा की ज़रूरत होती है। ऐसे लोगों की ज़रूरत होती है, जो वक़्त पर सोकर उठ सकें। अर्जुन की सेना में दुनिया भर के आलसी और काहिल और निकम्मे खड़े हो जाएँ, तो हो चुकी लड़ाई! और ऐसे ही होता है। फिर हम कहते हैं — “सत्यमेव जयते”। सुबह-सुबह युद्ध शुरू हुआ। अर्जुन ने कहा, ‘आक्रमण!’ देखा कोई हिला नहीं। पीछे देखा तो तीन सो रहे हैं, तीन ग़ायब हैं, एक ऊँघ रहा है। जो ऊँघ रहा है उसको उठाया कि चलो, बाक़ियों को उठाओ। बाक़ियों को उठाने गया बोले, ‘महाराज एक तो ग़ायब है, वो रात में ही घर भाग गया अपने।‘

कहाँ है वो गुण? कहाँ है वो प्रतिभा? सारी प्रतिभा तो दुर्योधन की ओर खड़ी है। और भूले-भटके प्रतिभा अगर सत्य के पक्ष में खड़ी भी हो जाए तो पीछे से वहाँ युद्ध चल रहा है, बीच में एक आ गया संदेशवाहक; कहते हैं, ‘तुम बेटा घर चलो।‘ ‘क्या हुआ?’ ‘वो तुम्हारे घर में फ़लाना बीमार पड़ा है। जल्दी घर चलो।’ और भारत में एक बड़ी परम्परा रही है। ख़ासतौर पर स्त्रियों में, दादियों वगैरह में कि लड़का कोई ठीक काम करने निकल जाए, तो खट्ट से बीमार पड़ जाती हैं। क्यों? लो, कर लो लड़ाई।

सच की लड़ाई में जो सामने खड़े हैं न, उनको तो फिर भी झेला जा सकता है। मान लीजिए, कौरव-पांडव पक्ष आमने-सामने हैं। तो पांडवों के सामने कौन खड़े हैं? कौरव। पांडव सेना कौरवों को तो फिर भी झेल ले। सामने वालों को तो झेल ले। जो हमारे पीछे खड़े हैं, उनको झेलना बड़ा मुश्किल होता है। हमारे पीछे कौन खड़े हैं? वही सब लोग जिनके पास से उठकर हम धर्मयुद्ध में आये हैं। वो हमारे पीछे खड़े हैं। वो हमें पीछे से हरा रहे हैं। वो हमें पीछे से हरवा रहे हैं। हराने का काम तो ऐसा लगा कि सामने वालों ने करा, कोरवों ने करा। पर हरवाने का काम ये पीछे वाले करते हैं। वो सब लोग जो हमसे सम्बन्धित हैं। कहने को हमारे समर्थक हैं। वो हरवाते हैं।

समझ में आ रही है बात?

तुम झूठ का सौभाग्य तो देखो। क्या कह रहे हैं अर्जुन से?

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत। कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्।।

हे अर्जुन! कर्म में आसक्त होकर अज्ञानी लोग जिस तीव्रता से कर्म करते हैं, ज्ञानी को अनासक्त रहकर जगत के कल्याण हेतु उसी तीव्रता के साथ कर्म करना चाहिए। ~ श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय ३, श्लोक २५)

भारत में जितने भी ये आसक्त लोग हैं, जो कर्मफल में आसक्त हैं, अज्ञानी हैं सारे-के-सारे। देखो, ये कितने जतन से काम कर रहे हैं ग़ज़ब! और कृष्ण का मन इस वक़्त कैसा हो गया होगा? पुरुष ही हैं, अवतार ही हैं। अभी वो ब्रह्म बनकर के नहीं बोल रहें, व्यक्ति बनकर बोल रहे हैं। और व्यक्ति को तो चोट लगती है न? और कृष्ण को कितनी चोट अभी लग रही होगी कि उन्हें देखो उदाहरण के तौर पर भी किसको खड़ा करना पड़ रहा है। ‘देखो, इन सब अज्ञानियों को क्या इनकी शान है। देखो, अर्जुन, सीखो इनसे कुछ।’ कैसा लग रहा होगा कृष्ण को कि कहना पड़ रहा है, ‘अर्जुन, अज्ञानियों से सीखो। देखो, वो कैसे काम करते हैं, उनकी व्यवस्था देखो, उनका जोश देखो और अपनी निराशा देखो, अपनी कुंठा देखो, अपना झूठ देखो।’

घर में बीमार पड़ जाए कोई और घर के दो लड़के हों या दो लड़कियाँ हों। उनमें से एक बैंगलोर में काम करता हो मोटी तनख्वाह पर, किसी प्राइवेट बैंक में, कंसल्टेंसी में, सॉफ्टवेयर में किसी चीज़ में। उसको कभी नहीं कहा जाएगा कि अपनी नौकरी छोड़कर के या छुट्टी भी लेकर घर आओ, नहीं कहा जाएगा। और अगर वो अमेरिका में काम कर रहा हो, तब तो कहने का सवाल ही नहीं है। उसको नहीं कहा जाएगा। उनकी शान देखो। उनको सब कर्तव्यों से मुक्त कर दिया जाता है। क्यों? क्योंकि वो दुर्योधन के पक्ष में खड़े हैं न! वो दुर्योधन की तरफ़ खड़े हैं। उनका इतना सम्मान है कि उनको कहा जाता है कि तुम्हारे ऊपर अब कोई कर्तव्य नहीं बचा, तुम तो अब बस दुर्योधन की सेवा करो।

और घर का ही अगर कोई किसी सार्थक काम में लगा हो। मान लीजिए, वो संस्था में ही काम करता है, तो तुरन्त उसकी गर्दन पकड़ ली जाएगी कि तुम आ जाओ, घर आ जाओ। अब घर में ये काम है, चलो हाथ बटाओ। पूछा जाएगा कि अरे! वो उसका बड़ा भाई भी तो है उसको क्यों नहीं बुलाया? छोटा भाई भी तो है। वो वहाँ है उसको क्यों नहीं बुलाया? ‘अरे, उसको क्या बुलाएँ, वो बड़ी नौकरी करता है न? तुम आओ।’

क्या शान है झूठ की! झूठ जिधर को जाता है इज़्ज़त पाता है, दहेज भी पाता है। और सच बेचारे की हालत इतनी ख़राब रहती है कि कृष्ण भी उसके समर्थन में खड़े हैं, तो भी वो नहीं जीत पा रहा। काहे का “सत्यमेव जयते”? ख़ुद कृष्ण आकर खड़े हो गये हैं पांडवों के साथ। सच तब भी नहीं जीत पा रहा है। और झूठ लगभग पूरा ही जीत चुका था। वो तो कृष्ण ने बाज़ी ख़राब कर दी। नहीं तो झूठ तो जीता जिताया है। सबको झूठ की तरफ़ ही जाना है। सच को जिताना जैसे कृष्ण के लिए भी टेढ़ी खीर है। कृष्ण अपना पूरा बल, अपनी पूरी प्रतिभा लेकर, अपना पूरा ज्ञान लेकर, अपना पूरा कौशल लेकर खड़े हुए हैं, तो भी लग रहा है कि पांडव जीत तो नहीं पाएँगे। ये तो युद्ध शुरू होने से पहले ही हार रहे हैं। अर्जुन कह रहा है, ‘मैं भाग रहा हूँ।‘

दुनिया में ग़लत लोग जीते हुए नहीं हैं। आपने उनको जिताया है। क्योंकि उनको जिताने में आपके भी स्वार्थ हैं। शिकायत तो करा मत करिए। आपका एक-एक आदर्श, आपकी एक-एक कामना उन्हीं से सम्बन्धित है जो इस दुनिया के बोझ हैं। जो साँप की तरह दुनिया को डस रहे हैं। और जिन्होंने अजगर की तरह दुनिया को जकड़ लिया है। आप उन्हीं के साथ खड़े हुए हैं। उनके साथ कौन नहीं खड़े हुए? जो कहीं खड़े होने लायक़ ही नहीं है। कृष्ण सत्य के पक्ष में खड़े होने वालों को उनकी गरिमा याद दिला रहे हैं।

कृष्ण कह रहे हैं, ‘देखो, झूठ की तरफ़ जो खड़ा है अगर वो दो दिन भूखा रह सकता है, तो तुम चार दिन भूखे रहकर दिखाओ। झूठ की तरफ़ जो खड़ा है अगर वो आठ बार चोट खा सकता है, तो तुम बारह बार चोट खाकर दिखाओ। अरे, वो तो अहंकार पर चल रहा है न! अहंकार को तो छोटी चीज़ होना चाहिए। वो जो भी कुछ कर सकता है, तुम उससे ज़्यादा करके दिखाओ न अर्जुन! या “सत्यमेव जयते” बस किताबी बात बनकर के रह जाएगी?’

वो दस की गति से दौड़ सकता है, तो झूठ की तरफ़ वाले को हराने के लिए, सच वाले को बीस की गति से दौड़कर दिखाना होगा। तुम कहोगे, ‘मैं तो आज तक दो की गति से ज़्यादा दौड़ा ही नहीं। वो जो झूठ वाला है, वो मेरा पड़ोसी था। वो बचपन से ही दस पर दौड़ता था और मैं बचपन से ही दो पर दौड़ता था।‘

वो दस पर दौड़ता था इसीलिए तो झूठ ने उसको ख़रीद लिया है अब। और खूब पैसे दे रहा है दस पर दौड़ने के। कह रहा है, ‘दस की चाल पर दौड़ता है बढ़िया आदमी है खूब दौड़ता है। आ जा मेरी तरफ़ टॉप रनर है तू। तुझे पैसे बढिया दूँगा आ जा।‘ वो झूठ की ओर से नियुक्ति पत्र पाकर बैठा हुआ है।

‘अब मैं तो देखिए बचपन से ही ऐसा ही था। मैं तो दो की गति से दौड़ता रहा हूँ बचपन से। दो की गति से दौड़ता रहा हूँ इसीलिए तो झूठ ने मुझे नियुक्त नहीं किया। झूठ की फ़ौज में मुझे दाखिला नहीं मिला, तो मैं सच की ओर आकर खड़ा हो गया हूँ। मैं सच की ओर आकर इसलिए नहीं खड़ा हुआ हूँ, क्योंकि सच से मुझे बड़ा प्रेम है। इसलिए खड़ा हुआ क्योंकि झूठ की फ़ौज में मुझे नियुक्ति नहीं मिली, तो मैं सच की ओर खड़ा हूँ।’

कृष्ण कह रहे हैं, ‘कोई बात नहीं। सच की ओर खड़ा है न? अब बीस से दौड़कर के दिखा।’ कह रहें हैं, ‘अरे! मैं कैसे? मैं तो दो की गति से दौड़ता हूँ। सच का मतलब ही यही है कि अब ‘मैं’ नहीं दौड़ेगा, ‘मैं’ नहीं चलेगा। जो सच की ओर आ जाते हैं, उनका ‘मैं’ चलना बन्द हो जाता है। जब तक तेरा ‘मैं’ चलता था तेरी गति दो की थी। सच की ओर आने का मतलब है — तू पीछे हट। अब सच दौड़ेगा और अब भी इसकी गति आएगी।’

‘तू पीछे हट’ से आशय क्या है कृष्ण? ‘आशय ये है कि तू अपनी कामनाओं को, अपने पूर्वाग्रहों को, अपनी चालाकियों को, अपनी मूर्खताओं को पीछे कर। इन्हीं सबका नाम तो ‘मैं’ है। इनको पीछे कर और चुपचाप जैसा मैं कह रहा हूँ, वैसा कर। तू बीस पर कैसे दौड़ेगा? ऐसे दौड़ेगा कि मैं कहूँगा दौड़ और तू दौड़ेगा। तू अपनेआप को बीच में लाएगा तो दो का अधिक-से-अधिक तीन कर पाएगा। तू अपने को हटा।’

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।

सम्पूर्ण धर्मों का आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर। ~ श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय १८, श्लोक ६६)

मैंने कहा बीस, तू बोल बीस और दौड़। और तू बीस पर दौड़ेगा। सिर्फ़ यही तरीक़ा दस वाले को हराने का। मैं कहूँ, बीस तो बीस। फिर गिनती नहीं करनी है। गिनती नहीं करनी और गिनती करनी भी है तो फिर बीस से शुरू करके गिनती करनी है। कृष्ण बोले, बीस तो मैं गिनती शुरू करूँगा बीस से। आपने बोला बीस तो मैं इक्कीस, बाईस, तेईस, चौबीस तक जा सकता हूँ। गिनती पीछे को नहीं आएगी लेकिन। आपने कहा बीस तो उन्नीस नहीं हो सकता। हाँ! आगे को जा सकते हैं। आपने कहा बीस, हम चौबीस तक जाएँगे। यही तरीक़ा है दस वालों को हराने का। नहीं तो तुम तो हारे ही हुए हो। तुम तो बचपन से हारे हुए हो। वो बचपन से दस वाला था। तुम बचपन से दो वाले थे। तुम्हारे भरोसे सच कैसे जीतेगा? कौनसा सत्यमेव?

समझ में आ रही है बात ये?

ये आपकी अजीब चाल है। सारा बल, सारी सम्पदा, सारे संसाधन, सारी प्रतिभा, सारी योग्यता झूठ की तरफ़ खड़ी कर दो और फिर जब सच हुआ दिखाई दे, तो कहो, ‘च्-च्-च्! अव्यवहारिक था। हमें तो पता ही है कि दुनिया झूठ से चलती है। देखो, इसीलिए हम शुरू से ही झूठ के साथ थे। देखा, सच हार गया न?’ सच हार नहीं गया। सच जीत सकता था। तुमने सच को सक्रिय रूप से साजिश करके हरवाया है। और जब वो हार रहा है, तो तुम ढोंग करते हो। ऐसे जताते हो जैसे सच का हारना तो कोई नियम हो। कोई नियम नहीं है। सच जीत भी सकता था। लेकिन तुमने सबकुछ अपना ले जाकर के झूठ के पक्ष में खड़ा कर दिया। तुमने हरवाया है सच को। अब कह रहे हो, ‘देखो, सच को तो हारना ही होता है।’ उसे हारना ही नहीं होता है। तुम साथ देते तो वो जीत सकता था। ये प्रश्न मैं आप सबके सामने रख रहा हूँ। ग़ौर से सोचिएगा।

अगर आत्मा सचमुच अहंकार से बड़ी होती है, तो जो लोग अहंकार पर जी रहे हैं, उन्हें छोटा होना चाहिए न आत्मा पर जीने वालों की तुलना में? अगर अहंकार आत्मा से छोटा है, तो अहंकार पर चलने वाले की उपलब्धियाँ छोटी होनी चाहिए न, आत्मा पर चलने वाले से? सीधा गणित है न? तो फिर ऐसा क्यों हो रहा है कि जो अहंकार पर चल रहे हैं, वो बड़े और बड़े ही होते जा रहे हैं। और जो आत्मा पर जी रहे हैं, वो दर-दर की ठोकर पा रहे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है? नहीं होना चाहिए न ऐसा। पर ऐसा होगा क्योंकि इस जगत में कुछ निश्चित नहीं है। ये जगत तो आपके चुनाव पर चलता है।

यहाँ अगर आप कौरव को जिताना चाहें, तो कौरव जीत जाएगा। एक महाभारत के युद्ध की बात थोड़ी है। दुनिया में इतनी बड़ी-बड़ी लड़ाईयाँ हुई हैं, उन सब लड़ाईयों में हमेशा क्या धर्म ही जीता है? ज़्यादातर तो अधर्म ही जीता है किसी भी लड़ाई में। दस लड़ाईयाँ हों तो धर्म जीतेगा एक बार-दो बार, अधर्म तो आठ बार जीतता है। वही जीतेगा जिसके पक्ष में आप खड़े हो जाएँगे। मैं आपसे कह रहा हूँ, ‘आप बहुत ग़लत फ़ैसले ले चुके हैं। आप अपना सबकुछ अधर्म के पक्ष में खड़ा कर चुके हैं। और फिर आप यूँ दर्शाते हैं जैसे चाहते आप ये हैं कि धर्म जीते।‘

लोग आते हैं मेरे सामने खड़े होते हैं, कहते हैं, ‘बड़ी इच्छा है आचार्य जी कि आपका काम फले-फूले, सफल हो, आगे बढ़े।‘ तुम्हारी इच्छा से मेरा काम आगे बढ़ेगा? तुमने क्या किया है मेरे काम के लिए? इच्छाओं से दुनिया नहीं चलती। अपनी शुभेक्षा अपनी जेब में रखो। मुझे काम करने वाले लोग चाहिए। मुझे योद्धा चाहिए। इच्छा माने क्या होता है? सपना। सपनों से जंग नहीं जीती जाती। मुझे हथियार चाहिए और योद्धा चाहिए। और आकर सामने खड़े हो जाते हैं। मुस्कराते हैं; कहते हैं, ‘हमारी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं।’ मत दो तुम्हारी शुभकामनाएँ, मुझे बोझ की तरह हैं, अपने साथ वापस लेकर जाओ। मुझे जो चाहिए, वो तुमने दुर्योधनों को दे रखा है। और मुझे देने के लिए शुभकामना लेकर आ गये हो? शुभकामना भी दुर्योधन को ही दे दो।

आज अभी शाम को श्लोक को देखा। आमतौर पर कृष्ण के प्रति आदर का भाव उठता है। आज करुणा का भाव उठा। सहानुभूति सी उठी। कृष्ण को किसी की सहानुभूति! कितनी अजीब बात है! कोई कृष्ण के प्रति सहानुभूति रखे! सुनने में ही विचित्र है। पर आज मैं उनकी असफलता देख रहा था, बुरा सा लगा।

जिनके बारे में कृष्ण को कहना चाहिए कि अर्जुन ये तो हमेशा के हारे हुए लोग हैं। ‘थूक दो इनके ऊपर और थूको भी नहीं, बस उपेक्षा कर दो इनकी।’ कृष्ण की मजबूरी देखी मैंने, कि कृष्ण उन घटिया लोगों को अर्जुन के सामने लगभग उदाहरण बनाकर खड़ा कर रहे हैं। कृष्ण कह रहे हैं कि देखो, वो सब अज्ञानी लोग, कितनी तत्परता से अपनी आसक्ति में काम कर रहे हैं, तो अर्जुन तुम तो ज्ञानी हो न? तुम भी थोड़ा काम कर लो। कृष्ण भलीभाँति जानते हैं कि ये अज्ञानी लोग कैसे हैं, लिख भी रहे हैं, श्लोक ख़ुद कहता है — वो अज्ञानी और आसक्त लोग हैं। अज्ञानी और आसक्त लोगों के लिए तो हमारे पास बस उपेक्षा होनी चाहिए। जिसकी उपेक्षा करनी चाहिए, उसकी हम उपमा दे रहे हैं? उसको हम आदर्श की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं? वो भी कृष्ण को ऐसा करना पड़ रहा है, दुख हुआ और ये सदा का खेल है।

जो देश के शीर्षस्थ संस्थान हैं। उनमें से, कुछ में मुझे पढ़ने का मौक़ा मिला और एक में मैं नियुक्त होकर पहुँचा, तो उसको भी अन्दर से देख पाया और मैंने देखा है प्रतिभा किसको बोलते हैं। मैंने देखा है ऐसे लोगों को, कि जिनकी बुद्धि और जिनका अनुशासन, जिनका संयम और जिनका संकल्प कितना ज़बरदस्त है कि वो इस दुनिया में जो चीज़ चाहें कर सकते हैं।

सिर्फ़ प्रतिभा से नहीं होता। प्रतिभा के साथ-साथ संयम, अनुशासन, संकल्पबद्धता ये सब भी चाहिए होता है। ये सब जब किसी में होता है, तब वो उन जगहों पर पहुँचता है जिन जगहों की मैं बात कर रहा हूँ। ये सब संस्थान वही हैं जिनको कहा जाता है कि इनमें प्रवेश पाना दुनिया में सबसे मुश्किल काम है। भारत में नहीं दुनिया में सबसे मुश्किल काम है। तो वो सब लोग जो वहाँ पहुँचते हैं। उनमें ये सब विशेषताएँ तो होती ही हैं न?

उसमें सिर्फ़ यही नहीं होता कि ब्रेन पावर है और भी व्यक्तिगत गुण होते हैं, पर्सनल क्वालिटीज़ जो उनमें होती हैं। किसी में कम, किसी में ज़्यादा, पर होती हैं। तो मैंने उन लोगों को देखा है, छ: साल तो वहाँ कैंपस में ही रहा हूँ। उसमें, फिर उसके बाद यूपीएससी में भी जाकर देखा, वहाँ जो चयनित लोग थे उनको। तो मैंने देखा है प्रतिभा को। मैंने देखा है कि लोग कितना डटकर काम करते हैं और कितना कॉन्सन्ट्रेटेड (केन्द्रित) होकर एकनिष्ठा के साथ। और फिर मैं ये देखता हूँ कि वो किसके लिए काम कर रहे हैं।

एक तरफ़ मैं देखता हूँ उनकी कर्मनिष्ठा को, उनकी दृढ़ता को, उनकी संकल्पबद्धता को, उनकी बुद्धि की प्रखरता को और फिर मैं ये देखता हूँ, किसके लिए काम कर रहे हैं; और दिल डूब सा जाता है। मैं कहता हूँ, ‘जितनी प्रतिभा उधर लग गयी है, उसकी एक प्रतिशत भी अगर कल्याण के पक्ष में खड़ी हो जाए, तो ये जगत ही स्वर्ग बन जाए।

लोग शुरू करते हैं अपना कोई काम। क्या काम शुरू करा है? काम ये शुरू करा है कि आप अपने घर में बैठे-बैठे माँस मँगाओ, तो हम आपको शहर के ही किसी कसाई की दुकान से बिलकुल ताज़ा माँस घर में लाकर देंगे। ये सब अभी शुरू हुआ है। पैकेज़्ड नहीं, जैसे आप जब खाना मँगाते हो, ये सब ज़ोमेटो वगैरह चलता है तो वो ताज़ा माल तैयार करके ले आते हैं न आपके लिए। आपके लिए किसी रेस्तरां से खाना बनवाएँगे और घर ले आएँगे।

वैसे ही शुरू हुआ है कि आप माँस मँगवाओगे तो आपके लिए ताज़ा-ताज़ा कटवाएँगे और एक घंटे के भीतर या आधे घंटे के भीतर आपके घर पर आपको दे जाएँगे। कह रहे हैं, ‘हमने ये ऑन्त्रप्रन्योरशिप शुरू करी है। और ये उसी संस्थान से निकले हुए लोग हैं जिसकी मैं बात कर रहा हूँ। जहाँ से मैं पढ़ा हुआ हूँ। इन्होंने ऑन्त्रप्रन्योरशिप शुरू करी है। अच्छी बात है।

और इसके लिए इन्होंने कई राउंड्स की फंडिंग उठायी है। और वो फंडिंग मिलती गयी पाँच करोड़, बीस करोड़, पचास करोड़, डेढ़-सौ करोड़ मिलता गया। ऐसे कामों के लिए संसाधनों की कोई कमी ही नहीं है। बताओ, कितनी फंडिंग चाहिए? वेंचर कैपिटल तैयार बैठी है। मिलेगा पैसा, मिलेगा, काम बताओ। और ये सारे वही है सकाम कृत्य। इन सकाम उद्यमों के लिए आप जितना पैसा उठाना चाहो, आपको बाज़ार देगी।

और पैसे का अर्थ होता है, युद्ध में हथियार। सारे हथियार तो कौरवों की तरफ़ खड़े हैं। एक इक्कीस-बाईस साल का छोकरा निकलकर के अपनी स्टार्टअप शुरू करता है। वो मार्केट में जाता है और बड़ी आसानी से दस-बीस करोड़ वो उठा लेता है। उसको देने के लिए लोग तैयार खड़े हैं। ‘हाँ, हाँ! लो, बिलकुल मिलेगा।’ तो जिधर को तुम दे रहे हो उसी दिशा से फिर तुम पाओगे भी। यही तो कर्मफल का सिद्धान्त है न?

जब इस देश ने, इस दुनिया ने, इस समाज ने ये तय ही कर लिया है कि अपना बल और अपना संसाधन कौरवों की तरफ़ ही देना है। तो फिर तुम्हें आश्चर्य क्यों होता है कि तुम्हारा चीरहरण हो रहा है? दुर्योधन जब सिर्फ़ युवराज था या राजकुमार था, तो इतना ही कर पाया था कि भरी सभा में द्रौपदी को निर्वस्त्र कर रहा है, चीर खींच रहा है। और तुमने अपना सारा बल दुर्योधनों को दे डाला। अब अगर इस पूरी पृथ्वी का ही बलात्कार हो रहा हो, तो आश्चर्य क्या है? सकामता सबको प्यारी है।

चलो, मैं आपसे एक सवाल करता हूँ। आप यहाँ बैठे हुए हो। आपके सामने दो व्यक्ति आते हैं। एक सकाम, एक निष्काम। दोनों आपसे सहायता माँगते हैं। दोनों आपसे आग्रह करते हैं कि हमारे पक्ष में आ जाओ। दोनों ही आपसे कहते हैं, ‘आओ हमारे साथ खड़े हो जाओ।’ क्योंकि जीवन में चुनाव तो यही करना पड़ता है न या तो सत्य को चुनो या असत्य को चुनो। सकामता को चुनो या निष्कामता को चुनो। ये ही चुनाव होते हैं। तो सकामता भी आ गयी है, निष्कामता भी आ गयी है और दोनों आपके सामने खड़ी हो गयी हैं।

और ये दोनों व्यक्ति आपसे कह रहे हैं, हममें से किसी एक को चुन लो। आप सकामता को ही चुनोगे। बताओ क्यों? वो दोनों आपसे कह रहे हैं, ‘हममें से किसी एक को चुन लो।‘ माने हममें से किसी एक को समर्पित हो जाओ। हममें से किसी एक के पक्ष में अपनी सेना खड़ी कर दो।’ जैसे जब जाते थे न अर्जुन और दुर्योधन सब राजाओं के पास। तो कहते थे, ‘हम दोनों में से किसी एक को चुन लो। और जिसको चुन लोगे, तुम्हें अपनी सारी सेना, अपने सारे संसाधन उसको दे देने पड़ेंगे।‘ ऐसे ही होता था न?

कोई राजा है, युद्ध से पहले अर्जुन भी गये उसके पास और दुर्योधन भी। और दोनों उस राजा से कहते थे, ‘हम दोनों में से एक को चुन लो। और जिसको चुन लोगे उसके पक्ष में अब तुम्हें खड़ा होना पड़ेगा। अपनी पूरी सेना उसके पक्ष में तुम्हें खड़ी करनी पड़ेगी। तुम्हें अपनेआप को उसके पक्ष में समर्पित करना पड़ेगा, जिसको चुन लोगे।‘ ठीक है?

आपके सामने सकामता भी आकर खड़ी हो गयी और निष्कामता भी आकर खड़ी हो गयी। मैं आपसे कह रहा हूँ, ‘निश्चित सी बात है कि आप सकामता को चुनोगे।’ बताओ क्यों? आपके सामने सकामता-निष्कामता दोनों खड़े हो गये हैं। आपसे कहा गया है, हममें से किसी एक को चुन लो। और चुनने का मतलब है कि तुम्हें अपना सारा बल, अपनी प्रतिभा, अपना संसाधन उसको दे देना पड़ेगा। तुम सकामता को चुनोगे। बताओ क्यों? नहीं दे पा रहे उत्तर? अब यहाँ तो आज कम ही लोग बैठे हैं। तो उत्तर भी कैसे आएगा? उधर जो पीछे बैठे हैं हज़ारों वो भी पता नहीं उत्तर दे पा रहे हैं कि नहीं। चलिए मैं आपको इशारा दिए देता हूँ।

कमलेश, दो लोग आते हैं तुम्हारे पास (एक सदस्य को सम्बोधित करते हुए)। ये चाचा (सदस्य) और ये संजय (सदस्य)। और तुम्हारे पास सौ रुपया है। चाचा कहते हैं, ‘मुझे सौ रुपया दे दो। मैं उससे जाकर के कमज़ोरों को मज़बूत बनाऊँगा।’ और पहाड़ी कह रहा, ‘मुझे सौ रुपये दो, मैं उसको धन्धे में लगाऊँगा। सौ का दो सौ बनाऊँगा।’ चाचा ने कहा, ‘सौ रुपये मुझे दो, मैं सौ रुपये जाकर के कमज़ोरों को मज़बूत बनाऊँगा, गिरे हुओं को उठाऊँगा, हारे हुओं को जीताऊँगा, जिन पर ज़ुल्म हो रहा है उनको बचाऊँगा।’ चाचा ने इसलिए माँगे।

और ये पहाड़ी कह रहा है, ‘मुझे सौ रुपये दे दो। मैं जाकर के उसको दुकान में लगाऊँगा। सौ का दो-सौ कर दूँगा।’ किसको दोगे सौ रुपये? पहाड़ी को दोगे। क्यों दोगे पहाड़ी को सौ रुपये? क्योंकि चूँकि वो ख़ुद सकाम है। इसीलिए तुम उसे जो कोई कुछ भी दोगे। वो तुम्हें सूद समेत लौटाएगा। तुम्हारे प्रिंसिपल (मूल) को वो इंटरेस्ट (ब्याज) के साथ तुमको लौटाएगा। जो सकाम व्यक्ति है। वो तुम्हारा भी मुनाफ़ा कराएगा।

और ये जो निष्काम आ गये थे खड़े होने कि मुझे पैसा दे दो। मैं उससे जाकर के सताये हुओं की मदद करूँगा। उसके साथ तुम्हारे सौ रूपये का क्या होगा? पूरा डूब गया। तो इसलिए जगत का हर व्यक्ति सकाम ताक़तों की ही मदद करता है। आप सब लगातार प्रतिदिन सकाम ताक़तों की ही मदद कर रहे हो क्योंकि जो सकाम है, वो अपनी सकामता के चलते आपका पैसा बढ़ाएगा। वो अपने स्वार्थ के चलते ख़ुद भी मुनाफ़ा कमाएगा और आपको भी मुनाफ़े में कुछ हिस्सा लौटाएगा।

पहाड़ी को सौ रुपये देना माने आपने सौ दिया, तो आपको डेढ़-सौ लौटकर के आएगा और चाचा को सौ देना माने सौ दे दिया अब कुछ नहीं आएगा। भजन करो। सौ रुपया दे दिया, अब क्या करें? अब भजन करो। भजन करो! पता नहीं किया क्या सौ रुपये का? कौनसे ग़रीब की मदद करी? सबसे ग़रीब तो मुझे ये ख़ुद ही लगते हैं। सौ रुपया ले गये अपनी ही मदद कर ली है इन्होंने। ये टी-शर्ट कहाँ से लाये चाचा नयी? और कितने की है? हमें लग रहा है सौ ही रुपये की है। सारा पैसा खा गये।

आ रही है बात समझ में?

अब समझ में आ रहा है कि जगत में सत्य क्यों नहीं जीत सकता? क्योंकि सत्य चलता है निष्कामता के साथ। असत्य चलता है सकामता के साथ और दोनों में जीतेगा वही जिसकी आप मदद करोगे। क्योंकि जगत तो आपके चुनाव पर चलता है। ब्रह्म आपके चुनाव पर नहीं चलता। वहाँ अनिवार्य रूप से “सत्यमेव जयते”। पर जगत तो आपके चुनाव पर चलता है। यहाँ तो वही जीतेगा जिसकी आप मदद करोगे और आप हमेशा मदद करोगे सकाम ताक़तों की।

सकाम ताक़तें अपनी भी कामना पूरी करेंगी और आपकी भी कामना पूरी करके दिखाएँगी, तो आप कहते हो, ‘चलो इसी को लगाते हैं। इसी के साथ आगे बढ़ते हैं।‘ आप अपना पूरा बल सकामता के पक्ष में खड़ा कर देते हो। तो दुनिया में फिर सकामता जीतती है, क्षुद्रता जीतती है, स्वार्थ जीतता है। आ रही न बात समझ में?

और मैं आपसे कह रहा हूँ, ‘आप कितना भी इन गीता सत्रों को सुन लीजिए। अपनेआप से पूछकर देखिएगा। कल ही सुबह आपके पास ये दो लोग आते हैं, पहाड़ी और चाचा, और सौ रुपया माँगते हैं। आपका पैसा पहाड़ी की तरफ़ जाता है। आप उसी की तरफ़ देते हैं जो ख़ुद भी कामना रखता है और आपकी कामनाओं को पूरा करने में भी सहायक होगा।

अर्जुन ज्ञान है अगर तुम्हें, तो ज्ञान तो मुक्ति देता है न? उपनिषदों ने कहा है कि ज्ञान के समान बन्धन को जला देने वाली आग दूसरी नहीं होती। और सबसे बड़ा बन्धन होता है अपनी ही क्षुद्रता का, अपने छुटपन का। तुम्हें अगर ज्ञान है, तो तुम्हारे तो सब बन्धन कट जाने चाहिए न? जिसके बन्धन कट जाते हैं, वो तो खुलकर लड़ता है। इसका मतलब अर्जुन, तुम्हारा ज्ञान ही अभी अधूरा है। इसीलिए तो मैं तुम्हें गीता ज्ञान दे रहा हूँ। यहाँ तो कह दिया है कि जो असक्त है, उसे लोकसंग्रह हेतु काम करना चाहिए। पर असक्त का मतलब होता है ज्ञानी। जो ज्ञानी है सिर्फ़ उसी को आसक्ति नहीं रहती।

अर्जुन, अगर ज्ञानी होते ही तो युद्ध कर ही रहे होते। अर्जुन युद्ध नहीं कर रहे माने ज्ञानी नहीं है। इसीलिए गीता का उपदेश है। तो जो सत्य के पक्ष में खड़े हैं, वो क्यों हार रहे हैं? क्योंकि वो खड़े तो अपनी ओर से भले ही सच्चाई की तरफ़ हैं, पर ज्ञानी नहीं हैं। क्यों? गीता में मन नहीं लगता। फिर तो गीता का सत्र भी देखने के लिए जब पाँच लोग धक्का देते हैं, तीन लोग कोचतें हैं। तब जाकर के ऑनलाइन आते हैं। अभी सत्र ख़त्म होगा राघव भाई कम-से-कम दस बार कहेंगे कि अरे! हाथ जोड़ते हैं, पाँव जोड़ते हैं। आकर के बता दो सीख क्या थी? तब तो बड़ी मुश्किल से पर्दे पर आएँगे। और पर्दे पर आ भी जाएँ, तो ऐप पर जाकर कुछ लिखेंगे नहीं। क्योंकि बन्धन बहुत है, मुक्ति नहीं है।

ज्ञान का काम होता है बन्धन काटना। बन्धन कट जाता है, तो व्यक्ति सही काम करने के लिए खुल जाता है। आप अगर सही काम करने के लिए खुल नहीं पा रहे हो, तो इसका मतलब आपके पास अभी ज्ञान है नहीं और ज्ञान क्यों नहीं है? क्योंकि ज्ञान भी तभी होता है जब ज्ञान का चुनाव करो। ज्ञान तो तब होगा न जब गीता सत्रों का चुनाव करो।

यहाँ तो ऐसे-ऐसे लोग आते हैं जो कहते हैं अब तीन महीने से गीता सत्र सुन रहें हैं, एक महीने का ब्रेक लेंगे फिर सुनेंगे। साँस लेने से भी ब्रेक ले लो एक महीने का, खाने से भी ब्रेक ले लो एक महीने का, घर में घुसने से भी ब्रेक ले लो एक महीने का, तुम्हारी ही हड्डी-हड्डी ब्रेक न कर दी जाए तो बात करना। ‘गीता से ब्रेक लेना है।’ अच्छा! गीता से ब्रेक लेना है, ठीक है।

ज्ञानी हमेशा अज्ञानी पर भारी पड़ेगा, पर पहले वो ज्ञानी हो तो सही! जगत में अगर ज्ञानी हारता हुआ दिखाई दे रहा है, तो इसलिए क्योंकि वो ज्ञानी है ही नहीं। और ज्ञानी वो कैसे होगा? क्योंकि पैदा जो बच्चा होता है। उस बच्चे का ही नाम होता है अज्ञान। तो ज्ञान तो फिर अर्जित करना पड़ता है न? पैदा होने से तो ज्ञान नहीं आता। ज्ञान गीता से आना है और गीता से आपको दूर भागना है। तो ज्ञान कहाँ से आ जाएगा? ज्ञान नहीं आएगा तो फिर भले ही तुम सच्चाई के पक्ष में खड़े रहो। सच्चाई हारेगी। तुम्हारे सच्चाई के पक्ष में खड़े होने भर से सच्चाई थोड़े ही जीत जाती है? कृष्ण यही कह रहे हैं न? ‘तुम अनासक्त होकर लोकसंग्रह, माने जन-कल्याण के लिए काम करो।’

अनासक्ति आएगी कैसे अगर ज्ञान ही नहीं है? ज्ञान कैसे आएगा जब अनुशासन के साथ गीता को, उपनिषदों को, अष्टावक्र को सुनना ही नहीं है? दूसरे कामों में पूरा अनुशासन है। बताओ, ज़रा अपने दफ़्तर पहुँचने में कितनी बार देर कर देते हो, बताओ? एक आये, बोले, ‘क्या आप बात कर रहे हैं, दफ़्तर पहुँचने में देर? मैंने सिर्फ़ दो बार देर करी दफ़्तर पहुँचने में। सिर्फ़ दो बार।‘ आप कह रहे हो, ‘दफ़्तर पहुँचने में बार-बार देर होती है। मुझे देखिए मैंने सिर्फ़ दो बार देर करी।’ तो मैंने पूछा, ‘ग़ज़ब हो गया! दफ़्तर आजतक बस दो बार ही देर से पहुँचे!’ बोले, ‘हाँ, क्योंकि तीसरी बार में निकाल दिये गए।’ यही नियम होता है दफ़्तर का। तीसरी बार देर करोगे तो निकाल दिये जाओगे।

अब गीता सत्र चल रहा है उसमें हज़ारों लोगों ने अगर एनरोल करा है, तो सैकड़ों लोग उसमें से अभी ग़ायब भी होंगे। वो सो रहे होंगे। ये काम अपने दफ़्तर में भी करके दिखाओ न कि जब काम चल रहा है तब सोकर दिखाओ। अपने चुनाव की बात होती है न? गीता को जब वो सम्मान ही नहीं दे रहे जो अपनी रोज़ी-रोटी को और अपनी कामना को देते हो। तो ज्ञान कहाँ से आएगा, और जब ज्ञान नहीं आएगा तो सच जीतेगा कैसे?

अच्छे से समझ लीजिए, आत्मा अहंकार से हमेशा जीतेगी। सौ बार अगर होगा कुरुक्षेत्र तो सौ बार आत्मा ही जीतेगी। लेकिन ये बात अहंकार और अहंकार की लड़ाई के बारे में नहीं कही जा सकती। कौनसी तरह का अहंकार जीतेगा। अभी जो स्थिति है उसमें एक तरफ़ दुर्योधन का अज्ञान है और दूसरी तरफ़ अर्जुन का अज्ञान है। इसमें कुछ नहीं कह सकते कौन जीतेगा? ऐसी स्थिति में अगर अर्जुन हार जाए तो ये नहीं कहना चाहिए सत्य हार गया। क्योंकि सत्य तो अभी दोनों तरफ़ में से किसी तरफ़ था ही नहीं। उस तरफ़ भी अहंकार और अज्ञान था और इस तरफ़ भी अहंकार और अज्ञान था। लेकिन लगेगा ऐसे, जैसे अर्जुन सच की लड़ाई लड़ रहे थे। फिर हम कहते हैं, ‘सच तो ऱोज हारता है।‘ नहीं! सच नहीं हारता। आप सचमुच सच के साथ खड़े हो जाइए फिर देखिए कि आपका हारना असम्भव होता है कि नहीं।

आप अगर हार रहे हैं तो अभी आप सच से दूर हैं। आप अगर हार रहे हैं जिन्दगी की लड़ाई, तो आप सच से दूर हैं। सच ही जीतता है। ऋषि ग़लत नहीं बोल गये थे — “सत्यमेव जयते”। जीतता तो सच ही है। पर सच होना तो चाहिए न सच के जीतने के लिए? सदा सच ही जीतता है।

अब दो लंगूर लड़ गये हैं आपस में, उसमें थोड़े ही बोलोगे — “सत्यमेव जयते”। उसमें तो दोनों में कोई भी जीते तो लंगूर ही जीतेगा। “लंगुर्मेव जयते”। वहाँ थोड़े ही कहोगे कि देखिए आचार्य जी, आप बोले थे “सत्यमेव जयते”, ‘पर यहाँ तो लंगूर जीत गया।’ अरे! भाई वहाँ तो सच, दोनों में से किसी भी तरफ़ नहीं था न? जो भी पक्ष जीतता तो लंगूर ही जीतता तो “लंगुर्मेव जयते”। आप सच वाले हो तो जाओ। फिर देखते हैं दुनिया वाले आपको कैसे हराते हैं।

और सच वाले होने का मतलब होता है कि चुनूँगा। मुँह ज़बानी बात नहीं करूँगा। ज़बान हिलाना बहुत आसान है। सचमुच चुनूँगा। अपने पसीने, अपने रक्त की आहुति देकर चुनूँगा। अपना जीवन, अपना श्रम सब अर्पित करके चुनूँगा। फिर देखो तुम्हें कौन हरा सकता है।

और अगर लंगूर और लंगूर की लड़ाई होनी होती है। तो इस लड़ाई में जानते हो कौन जीतेगा? जिस लंगूर के पास ज़्यादा मोटी कामना होगी। इसलिए आपको दुनिया में सकामता जीतती हुई दिखाई देती है।

दो लंगूर लड़ रहे हों, इसमें जो लंगूर ज़्यादा आतुर होगा जीतने को, वो जीत जाएगा। दो लंगूरों की लड़ाई हो रही है किसी बात को लेकर — केला है, या कि ज़्यादा बड़ा पहलवान कौन कहलाएगा, या लंगूरी है, उसको लेकर दो लंगूर भिड़ गये हैं। इन दोनों में से कौन जीतेगा? जो जीतने को ज़्यादा आतुर होगा वो जीतेगा। तो लंगूर और लंगूर की लड़ाई में “सत्यमेव जयते” नहीं होता। वहाँ तो यही होता है कि जो ज़्यादा जज़्बा रखता है वो जीत जाएगा। जो ज़्यादा मोटिवेटेड है वो जीत जाएगा। इसीलिए आप पाओगे कि कामना की दुकान जैसे से बढ़ती है, वैसे ही मोटिवेशन की पूरी इंडस्ट्री भी बढ़ती है। क्योंकि कामना की मूर्खता को ज़िन्दा रखने के लिए मोटिवेशन का उद्योग बहुत ज़रूरी है।

लंगूर और लंगूर जब आपस में लड़ रहे हों और एक लंगूर हार जाए तो ये नहीं कहना चाहिए कि सच हार गया। सच वो था ही नहीं। और मैं आपसे कह रहा हूँ — अगर आप पूरी तरह सच के साथ खड़े हो जाएँ तो कौनसा लंगूर, कौनसा इंसान, कौनसा देव, कौनसा दानव, यक्ष, गंधर्व, किन्नर — जो भी तब बताये जाते हैं — एलियन, ज़ोम्बी; कौन आकर के आपको हरा लेगा? आप अगर हार रहे हो, तो आप उन दो लंगूरों में से कोई एक लंगूर हो। और जो आपसे जीत गया, वो आपसे ज़्यादा मोटिवेटेड लंगूर था इसलिए जीत गया। जिस दिन आप लंगूर नहीं रह गये। जिस दिन आप सच के सेनानी बन गये। उस दिन मैं कह रहा हूँ, ‘लंगूर क्या, आपको कोई देवता भी नहीं हरा सकता।‘

कोई आकर के बोलेगा भी — अरे, तुम्हारी स्थितियाँ तो बड़ी ख़राब है! तुम्हारा जन्म ख़राब हुआ है। ये, वो, ऐसा, वैसा। उस दिन वो आकाशवाणी पर प्रहार वाला गाना था न। “हथेली पर रेखाएँ हैं सब अधूरी, किसने लिखी हैं नहीं जानना है...” जानना भी नहीं है। ये भी नहीं कह रहे हैं कि ये हथेली पर मेरे किसने गड़बड़ छाप दी है। ‘अरे, भाई प्रिंट ग़लत निकल गया। ठीक कर दो। कुछ नहीं, जो है हमें मतलब ही नहीं। हथेली पर जो लिखा है, ये अधूरा है। इसको पूरा कौन करता है? मेरा चुनाव, मैं। देवता भी मेरी क़िस्मत का फ़ैसला नहीं करेगा। कौनसा प्रारब्ध? कुछ नहीं। मैं! ये सब कहाँ से आया है। मुझे जानना भी नहीं है। जानकर के क्या करूँगा? असली चीज़ तो मेरा काम है न? पीछे जो हुआ उसमें रखा क्या है? हटाओ।

मनुष्य अकेला है जो पैदा नहीं होता, निर्मित होता है। कितनी अजीब बात! जानवर सब पैदा होते हैं। मनुष्य का निर्माण होता है, तो जानवर मजबूर हैं। वो तो पैदा होते हैं। जानवर, जानवर ही पैदा होता है। और मजबूर है और जानवर ही पैदा होगा। कोई विकल्प ही नहीं उसके पास। मनुष्य अकेला है जो निर्मित होता है। किसके द्वारा? देवता के द्वारा, भाग्य के द्वारा, अतीत के द्वारा, समाज के द्वारा? नहीं। मनुष्य अकेला है जो स्वयं द्वारा निर्मित होता है। कोई जानवर अपना निर्माण नहीं कर सकता। मनुष्य अकेला है जिसे ज़िम्मेदारी दी गयी है और अधिकार दिया गया है कि वो अपना निर्माण स्वयं करेगा। हमें अपना निर्माण करना होता है।

माँ की कोख से हम पैदा नहीं होते। माँ की कोख से तो एक देह पैदा हो जाती है। उसके बाद जो होता है वो असली चीज़ है। उसके बाद हम अपना निर्माण करते हैं। कोई कुत्ता अपना निर्माण नहीं करता। कुत्ता पैदा हो गया, हो गया बात ख़त्म हो गयी, हो गया पैदा। लेकिन जो बच्चा पैदा हुआ है, कोई बड़ी बात नहीं। अभी तो बस शुरुआत हुई है। अब निर्माण का काम शुरू होगा वो असली चीज़ है। आगे असली चीज़ है।

आ रही बात समझ में?

हमें न जाने किसने बचपन से ही हारना सिखा दिया है। हम सिनिकल हो गये हैं। हम यही नहीं कहते कि हम हार गये। हम कहते हैं, ‘जीता जा ही नहीं सकता।’ हम यही नहीं कहते है कि हम हार गये। हम कहते हैं, ‘जीत सम्भव ही नहीं है, तो हम कभी भी फिर कृष्ण और निष्कामता के पक्ष में खड़े ही नहीं होते।‘ हम लंगूरों की लड़ाई में एक लंगूर को हारता देखते हैं। हम कह देते हैं, ‘देखा, सच हार गया न?’ हम समझते ही नहीं हैं कि अरे, वो सच होता तो हारता क्यों? सच नहीं हारता है। आप सही चुनाव तो करो सच नहीं हारेगा। और अगर आपने सही चुनाव नहीं करा है, तो सच नहीं हारा, लंगूर हारा है। तो ले देकर दोनों ही स्थितियों में सच तो नहीं हारा न?

आप कहेंगे, ‘विरोधाभासी बात हो गयी। अभी शुरू जब हुआ था सत्र तो कहा था कि इस दुनिया में तो सच रोज़ हारता है। आप कह रहे हैं सच हार नहीं सकता।’ मैं कह रहा हूँ, ‘इस दुनिया मे जो रोज़ हारता है, उसको सच मत समझ लेना। वो लंगूर है जो पैदा हुआ था।‘ सच का स्वभाव ही यही है कि वो अपराजेय है, अजेय है। उसको नहीं जीत सकते। जीतना तो छोड़ दो, उसके खिलाफ़ युद्ध भी नहीं कर सकते। जिसके खिलाफ़ युद्ध भी नहीं कर सकते न, उसी को ‘राम’ कहते हैं।

इसीलिए कहते हैं, ‘वो अयोध्या से आये थे। उसके खिलाफ़ युद्ध भी नहीं हो सकता। अयोध्या! ये तो छोड़ो की तुम उसको हरा लोगे। तुम उसके खिलाफ़ खड़े भी नहीं हो सकते।‘ लेकिन वो सब तब हो न जब हम उसको चुने। और चुनने का क्या मतलब होता है? अपनेआप को पूरे तरीक़े से उसके साथ एलाइन कर देना, न्यौछावर कर देना अपनेआप को। जो यज्ञ से आशय है। अपनी आहुति ही दे देना। ये होता है चुनाव का अर्थ।

चुनाव का अर्थ ये नहीं होता कि बाज़ार गये थे, वहाँ पर एक बढ़िया दिखाई दी शर्ट वो चुन ली। ये नहीं चुनाव होता। अध्यात्म में इसको चुनाव नहीं बोलते। ये तो कामना का चुनाव है। सच को ऐसे नहीं चुना जाता। सच को ऐसे नहीं चुनते हैं, जैसे शर्ट चुनी जाती है। सच को जब चुना जाता है तो शर्ट की तरह सच को घर नहीं लाया जाता। जब आप शर्ट को चुनते हो तो शर्ट को घर ले आते हो और जब आप सच को चुनते हो, तो सच को अपना घर बना लेते हो। ये अन्तर होता है।

सच को चुनने का मतलब होता है — सच मुझसे बड़ा हुआ। शर्ट को चुनने का मतलब होता है — मैं शर्ट से बड़ा हुआ।

जानते हो सच को चुनने से लाभ क्या है? जब सच आप से बड़ा हो जाता है, तो आपकी सब सीमाएँ अब सच के हवाले हो जाती हैं। वो तोड़ेगा न? वो उदाहरण याद करो जिसमें हमने कहा था — आप बचपन से ही दो वाले थे और कोई दस वाला था। वो जो दस वाला था, वो जाकर के खड़ा हो गया दुर्योधनों की तरफ़। आप दो वाले थे, सच को चुन लिया अगर इस दो वाले ने, तो वो दो वाला नहीं रहा न। उसने अपने दो को क्या कर दिया? सच को दे दिया। उसने अपने दो वाले दो को सच को दे दिया। अब वो अपने दो-पने से खाली हो गया। दो-पना माने छुटपन, क्षुद्रता। वो जो अपना उसने छुटपन था उसकी आहुति दे दी। किसको दे दिया? सच को दे दिया। अब वो खाली हो गया है। अब वो खाली हो गया है। मतलब अब सम्भावना बन गयी है कि वो बीस भी हो सकता है। अगर वो दो रहता तो कभी बीस हो सकता था? नहीं।

उस दो को उसने क्या किया? दे दिया। बोला, “तेरा तुझको सौंपते, क्या लागत है मोर” तुम अपना ये जो दो-पना ये पकड़कर बैठे हुए हो। तुम्हारी द्वि, द्वैत। पकड़कर बैठे हो दो, दो, दो, दो। छोड़ते ही नहीं जैसे बहुत बड़ा खज़ाना अपने हाथ में हो। छुपाते हो, धोखा और देते हो। सामने लाकर के परोस देने की जगह, रख देने की जगह, समर्पित करने की जगह उसको गाँठ में बाँधकर घूम रहे हो। जैसे न जाने कौनसा खज़ाना है तुम्हारे पास। ये नहीं समझते कि तुमने उसको गाँठ में बाँध भी लिया तो गाँठ में है कुल कितना? दो। उस दो को छोड़ो, तो दस वाले को हरा पाओगे। नहीं तो दो तुम्हारे पास अगर रहेगा भी तो दस वाले तुम पर हमेशा भारी पड़ेंगे।

उस दो को छोड़ो तब बीस की क़ाबिलियत आएगी। तब होता है कि “सवालख से एक लड़ाऊँ” और एक फिर सवा लाख पर भारी पड़ता है। क्योंकि उस एक ने अपना एक होना छोड़ दिया। फिर चिड़िया भी बाज को तोड़ देती है। नहीं तो चिड़िया और बाज जब भी उलझेंगे नतीजा पहले से तय है। अगर प्रकृति पर ही चलोगे और तुम चिड़िया बनकर पैदा हुए हो। तो माफ़ करना तुम्हारा खेल शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गया। तुम हो एक छोटी सी गौरैया। पैदा हुए हो न, पैदा? पैदा तो गौरैया हुए हो। निर्माण तुमने कुछ किया नहीं। गौरैया पैदा हुए, गौरैया ही रह गये। और उधर बाज पैदा हुआ खेल तो तुम्हारा ख़त्म है पहले से ही। और तुम सब गौरैया ही पैदा हुए हो। तुममें से बाज कोई नहीं है। बाज हैं सब वही पृथ्वी पर छाये हुए हैं।

जानते हो पृथ्वी की पूरी सत्ता, दौलत, मीडिया इस वक़्त बस कुछ दर्जन लोगों के हाथों में है। वो हैं असली बाज। हमें पता भी नहीं है। लेकिन पूरे तरीक़े से हमारे दिमाग में जो संस्कार भरे जा रहे हैं, जिस तरीक़े की हमारी व्यवस्था चलायी जा रही है समाज की, यहाँ तक कि परिवार और धर्म की भी। वो पूरी दुनिया में मुश्किल से दस-बीस लोग हैं। वो निर्धारित कर रहे हैं। उन्हीं के हाथ में पूरी ताक़त है। वही हैं बाज और हम हैं सब छोटी-छोटी गौरैया। क्या हमारी उम्मीद है? क्या सम्भावना? कुछ नहीं होने वाला हमारा। लेकिन धर्म ये कर देता है कि “चिड़ियन ते मैं बाज तुडाऊँ”। ये धर्म कर देता है।

लेकिन धर्म के सामने आकर के चिड़िया को अपना चिड़ियापना सौंप देना पड़ता है। कहते हैं, ‘जो कुछ मेरे पास है, ये छोटे-छोटे पंख और ये छोटी सी चोंच ये सब आपको दे दिया। अब जो बोलो आप वैसा चलेगा। मेरी नहीं तेरी मर्ज़ी।’ फिर अब ये चिड़िया, चिड़िया नहीं रही न। अब ये बाज को तोड़ देती है। और बहुत बार जानते हो क्या होता है? अगर चिड़िया देख लेती है कि बाज उसको हराता ही है, हराता ही है तो सब चिड़िया आपस में मिलकर क्या फ़ैसला करती हैं? चलो! बाज की सेवा में लग जाते हैं। बाज की नौकरानियाँ बन जाते हैं। ये होगा कि नहीं होगा?

गुरु तो है नहीं जो चिड़िया को समझा सके कि तू बाज को तोड़ सकती है। कृष्ण से तो बहुत दूरी है, तो ये सब चिड़िया आपस में मिलकर के प्रत्यक्ष सी बात है। एक ही फ़ैसला करेंगी कि हम सब बाज के पक्ष में खड़े हो जाते हैं। बाज की चाकरी कर लेते हैं। और यही होता है फिर बाज शासन कर रहे हैं। सब चिड़िया उनकी चाकरी कर रही हैं। और बाजों का जब मन करता उन चिड़ियों में से किसी को उठाकर के। बाक़ी चिड़िया कहती हैं हमारा सौभाग्य आज हमारा नम्बर नहीं लगा न? साहब पीछे से मुस्कुराते हैं कहते हैं — “फूले-फूले चुन लिए काल तुम्हारी बार”। आज वो गयी है, कल तुम जाओगे। लेकिन तुम्हें बहाना मिल जाता है — ‘आज तो हम नहीं गये न!’

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