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वासना: गलतियाँ और ग्लानि || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं असम, गुवाहाटी से आया हूँ, मेरा प्रश्न कामवासना से लेकर है। सर, मैं कामवासना से इतना ग्रस्त हूँ कि सारा दिन मुझे यही सोच आते रहते हैं कि क्या है ये और क्यों है। कामवासना के कारण मुझसे कुछ साल पहले बहुत बड़ी ग़लती हो गयी थी, जिसके कारण मैं अपनी रिश्तेदारी का लिहाज़ करना भूल गया। तब से तो मैंने सीख नहीं ली, अभी भी वही चल रहा है मेरा। लेकिन वह चीज़ जब याद आता है तो मुझे ऐसे लगता है कि कुछ क्रिमिनल हूँ मैं मेरे हिसाब से। लेकिन बदल नहीं पा रहा हूँ मैं।

आचार्य प्रशांत: अभी यहाँ पर आग लग जाए, कामवासना याद रहेगी क्या?

प्र: नहीं सर।

आचार्य: नहीं रहेगी न। अभी बारिश हुई है बहुत, बाहर टहलने निकलो, वही देखो कि एक साँप निकल पड़ा है पीछे, कामवासना याद रहेगी क्या?

प्र: नहीं सर।

आचार्य: तो आग लगी हुई है और साँप सामने खड़ा हुआ है ज़हरीला, बस दिख नहीं रहा है। दिख नहीं रहा है इसलिए फिर अपनेआप को छूट दे देते हो, मौका दे देते हो कि अभी तो समय खाली है, कुछ करने को नहीं है, कोई समस्या नहीं है, कोई ख़तरा नहीं है, चलो मौज करते हैं। ये मौज वग़ैरा सब छू-मंतर हो जाए अगर तुमको आग दिख जाए, धुआँ दिख जाए, साँप दिख जाए, काल दिख जाए। हमारा दोस्त, भैंसे वाला, वह दिखायी नहीं पड़ता न। है वह लगातार, दिखायी नहीं पड़ता। आदमी मानता है कि अभी तो हम जवान हैं, जीने के लिए अभी बहुत साल बचे हुए हैं, कोई समस्या है नहीं, चलो मटरगश्ती करते हैं।

समस्या बहुत बड़ी है। तो इन सब उपद्रवों का जो इलाज़ होता है वह ज्ञान ही होता है। अपनी हालत को ग़ौर से देखो तो और दुनिया की हालत को देखो और उनको देखने के बाद सारा फितूर उतर जाएगा, सब भूत-प्रेत हवा हो जाते हैं। आदमी किसी भी तरह के विलासिता में रह सके उसके लिए बेहोशी बहुत ज़रूरी होती है। विलासिता माने अय्याशी कह लो। तो अय्याशी और नशा, ये दोनों हमेशा साथ चलते हैं।

इसीलिए आप जब अय्याशी करना भी चाहते हो तो उसमें नशा बहुत ज़रूरी हो जाता है, शराब मौजूद होनी चाहिए। क्योंकि अगर होश बचे हुए हैं तो सच्चाई को बुला करके अपनेआप को नवाबी करने की छूट दे ही नहीं पाओगे। यह काम तो एक बेहोश आदमी ही कर सकता है न कि साँप सामने बैठा हो और वह कहे कि मुझे तो मौज मारनी है? कोई होशमंद तो कर नहीं पाएगा या कर लेगा? किसी भी तरह का नशा हो सकता है, शराब का हो, कुछ और हो, सत्ता का नशा भी हो सकता है। कोई भी आपने व्यसन पकड़ रखा है, उसका नशा हो सकता है।

क्या करते हो? कोई नौकरी?

प्र: जी सर, नौकरी करता हूँ।

आचार्य: क्या नौकरी?

प्र: कोर्ट में करता हूँ सर।

आचार्य: कितना उसमें समय देते हो?

प्र: साढ़े दस ग्यारह बजे से पाँच बजे तक।

आचार्य: यही तो समस्या है, ग्यारह से पाँच की नौकरी माने कुल छः घंटे। और जवान आदमी हो, दिन में हैं चौबीस घंटे। कुछ आश्रित लोग हैं या बस अपना कमाना-खाना है?

प्र: शादी नहीं है, अभी मम्मी-पापा के साथ रहता हूँ।

आचार्य: तो घर मम्मी-पापा का होगा। तो किराया भी नहीं देना पड़ता होगा, खाना भी वहीं दे देते हैं।

प्र: जी।

आचार्य: तो यही तो बात है कुल मिलाकर। क्या उम्र है?

प्र: चौंतीस।

आचार्य: चौंतीस के हो, शादी करी नहीं है, किराया देना नहीं होता। और माता-पिता के साथ रहते हो, मकान उनका है, तो इसका मतलब ठीक-ठाक पृष्ठभूमि से हो। माता-पिता ने मकान तो बना ही रखा है।

प्र: पिताजी भी नौकरी करते थे।

आचार्य: पिताजी भी नौकरी करते थे, तो उन्होंने बचाकर भी रखा होगा?

प्र: जी सर।

आचार्य: वह बचाया हुआ तुम्हारे लिए है, यह भी तुम जानते हो?

प्र: बचपन से ज़िम्मेदारी ली भी नहीं।

आचार्य: बचपन से ज़िम्मेदारी भी नहीं, भाई-बहन कितने हैं?

प्र: एक बहन थी, उसकी शादी हो गयी।

आचार्य: बहन की शादी हो गयी तो अब घर में बहन है नहीं। तो अब तुम्हीं हो और माँ-बाप हैं बस।

प्र: जी।

आचार्य: बहुत बढ़िया, तो अब और करना क्या है ज़िंदगी में।

प्र: सर, छोड़ने की भी बहुत कोशिश करता हूँ।

आचार्य: छोड़ना नहीं होगा, उठाना होगा। ज़िम्मेदारी उठाओ और ज़िम्मेदारी नहीं उठाओगे तो मैं तुम्हें कुछ भी बता दूँ, तुम बड़े-से-बड़ा ग्रंथ पढ़ लो, कोई भी और उपाय लगा लो, कुछ काम नहीं आएगा। और इस पूरी स्थिति में तुम्हारी कोई विशेष ग़लती भी नहीं है। तुम्हारी ही स्थिति में यदि सौ जवान लोगों को डाल दिया जाए तो उनमें से अस्सी-नब्बे की वही हालत हो जाएगी जो तुम्हारी है। बात किसी एक विशेष व्यक्ति की स्थिति की नहीं है, बात उस विशेष स्थिति की है जिसमें यह व्यक्ति फँसा हुआ है। वह स्थिति ऐसी है कि उसमें तुम किसी को भी डालोगे, उसमें कोई-न-कोई नशा का चाहे कामवासना का हो, कुछ और हो या कोई दूसरी अय्याशी हावी हो ही जाएगी।

छः घंटे कुल जाना है और वापस आना है, खाने-पीने को मिल जाता है, घर अपना बना हुआ है पुश्तैनी। अपनी पत्नी, अपने बच्चे हैं नहीं कि ज़िम्मेदारी उठानी है और कहीं पर कोई समय लगना है। जीवन में कोई लक्ष्य, कोई मिशन पकड़ नहीं रखा है। घर में जब अकेला बच्चा होता है तो माँ-बाप और ज़्यादा ममत्व दिखाते हैं। माँ भी कहती है यही तो बचा है लाडला तो उसको और देसी घी के पराँठे खिलाती है। और वह देसी घी के पराँठे खा-खाकर शरीर में जो ऊर्जा भभकेगी, उसका तुम क्या करोगे? कोई सार्थक काम तो कर नहीं रहे हो और जवान हो बिलकुल भरपूर, खाना-पीना मस्त चल रहा है। तो समय कहाँ लगाओगे, ऊर्जा कहाँ लगाओगे? बात तुम्हारी नहीं है।

प्र: सर, नौकरी में भी सरकारी नौकरी है, ज़्यादा टाइम खाली ही रहता।

आचार्य: ये क्या तुम सपना-वपना दिखा रहे हो जो बाक़ी जवान लोग यहाँ बैठे हैं? लोगों को ईर्ष्या उठ रही होगी तुमसे। यही तो पूरे जवान हिंदुस्तान का ऊँचे-से-ऊँचा सपना होता है। सरकारी नौकरी जिसमें कुल छः-आठ घंटा काम करके चल जाए, पुश्तैनी घर, माँ के हाथ के पराँठे, पिता की दौलत, जवान शरीर, बस। क्या मैं सलाह दूँ तुमको! किस शहर में रहते हो?

प्र: गुवाहाटी।

आचार्य: तो चलो गुवाहाटी में तुम कुछ और काम धंधा जल्दी नहीं ढूँढ पा रहे हो, कुछ खेलने-कूदने के लिए भी नहीं है?

प्र: सर, आपका वीडियो देखने के बाद मैं सुबह में अब जल्दी उठता हूँ तो टाइम नहीं रहता। दौड़ता हूँ सुबह।

आचार्य: और दौड़ा करो न।

प्र: आकर थोड़ा किताब पढ़ता हूँ तो सुबह का टाइम निकल जाता है, बीच में खाना-वाना बनाना भी शुरू किया था।

आचार्य: वह तो करना ही चाहिए, माता जी को मुक्ति दो, खाना तुम बनाया करो घर का। घर में कुछ काम वाले लगे होंगे सहायक?

प्र: हाँ।

आचार्य: उनको भी सबको निकालो, सफ़ाई करो।

प्र: सर, मैं सोचता हूँ कि हमलोग के वहाँ पर बंदर बहुत हैं तो उनको खाने का मतलब कुछ कमी हैं, पेड़-वग़ैरा कुछ है नहीं, तो वह काम भी थोड़ा पकड़ लूँ तो।

आचार्य बंदरों को खाने को कम मिलेगा तो वह भाग जाएँगे, वह अपना देख लेंगे। पशु ऐसी जगह पर टिकते ही नहीं जहाँ उनके खाने-पीने को कम हो, वो उस जगह से हट जाते हैं। और जहाँ उनके खाने-पीने की सामग्री उपलब्ध होती है उस जगह पर उनकी तादाद अपनेआप बढ़ जाती हैं। तो वह तुम्हें कुछ नहीं करना है। और बड़े सामाजिक, वैश्विक काम हो सकते हैं उसमें डूब सकते हो। लेकिन इतनी जल्दी तुम उन कामों को पकड़ पाओगे या नहीं, ये पता नहीं।

कम-से-कम अपनी देह का ही ख़याल करना शुरू करो। एकदम जो काम तुरंत हो सकता है। जब इतना समय उपलब्ध है तो सबसे पहले तो समय खेलों में लगाओ। जब थक जाओगे, कामवासना वग़ैरा अपनेआप पीछे हटेगी थोड़ा।

देखो, हम सब दरिंदे होते हैं। तुम जब पैदा होते हो न उसी समय पर प्रकृति तुमको एक काम निश्चित देकर भेजती है। तो एक काम तो तय है जो तुम्हें करना-ही-करना है, क्यों करना है? क्योंकि पैदा हो गए हो। और वह काम यही है — कामवासना। तुम जीवन में और कुछ करो-न-करो, प्रकृति जन्म के समय से ही इतना निश्चित कर देती है कि यह काम तो तुमको करना-ही-करना है, यह तो करोगे-ही-करोगे।

अब इसके अलावा अगर करने को चार-पाँच कुछ अच्छे काम हों तो इस काम को तुम जो अपने जीवन में महत्व और स्थान देते हो वह सीमित हो जाएगा। मान लो तुम्हारे पास सौ यूनिट ऊर्जा है, ठीक है? अगर करने को एक ही काम है, तो सारी-की-सारी ऊर्जा कहाँ जाएगी? सौ की सौ चली जानी है वासना में और वासना वाला काम तो तुम्हें करना ही पड़ेगा, क्योंकि वह माता जी का आदेश है। कौनसी माताजी? जिन्होंने जन्म दिया है, माने घर वाली माता जी नहीं, यह जो जन्मदात्री प्रकृति है उसका आदेश है कि वह तो करना ही पड़ेगा तुमको। उसके आदेश की उपेक्षा कोई नहीं कर सकता। कामवासना हर स्त्री-पुरुष के देह में बैठी ही हुई है।

तुम इतना कर सकते हो कि उस एक काम के अलावा, जो प्रकृति ने पहले से ही निर्धारित करके भेजा है, उस एक काम के अलावा तुम कोई चार-पाँच और अच्छे और ऊँचे काम पकड़ लो। उससे यह होगा कि वह जो पहला वाला काम है, डिफॉल्ट काम (पूर्व निर्धारित काम), उसको तुम जो जगह देते हो और समय देते हो उसका प्रतिशत, उसका अनुपात जो है वह कम हो जाएगा। और अगर तुमने दूसरे काम बहुत भारी और बहुत महत्वपूर्ण पकड़ लिए हैं तो वह जो डिफॉल्ट काम है, पूर्व निर्धारित, अनिवार्य, उसका प्रतिशत और भी कम हो जाएगा। बस यह हो सकता है।

तो जो लोग जीवन में कोई अच्छा, ऊँचा, सार्थक लक्ष्य नहीं रखते उनको सज़ा यह मिलती है कि उनको फिर जानवर की ज़िंदगी जीनी पड़ेगी। कुछ नहीं होगा करने को तो और कुछ नहीं करोगे, यही करोगे — स्त्रीगमन, स्त्री विचार, अपने ही विचारों और वीर्य में लोट रहे हो कहीं पर लथपथ। पशुता और क्या होती है? जानवर और क्या कर रहा होता है? उसको कुछ है ही नहीं जीवन में लक्ष्य।

बंदर की बात करी, किसी बंदर का होता है लक्ष्य? वह भी यही करता है, खाता है और बंदरिया खोजता है। या वह यह कहता है कि एक नये तरीक़े का बगीचा लगाऊँगा, वानर वन, और उस पर सब बंदरों की सत्ता चलेगी। ये इंसानों ने सारी ज़मीन ले लिए हैं और अपने देश बना लिए हैं, हम भी तो कुछ करें। किसी बंदर ने कुछ विचार किया, कुछ क्रांति करी, कोई सिद्धान्त बनाया? ऐसा तो कोई बंदर करता नहीं। खाने-पीने से जैसे ही उसको शांति मिलती है, तत्काल वह देखता है कि प्रजनन कैसे कर दिया जाए।

और बंदर फिर भी ठीक है, प्रजनन उसके लिए एक शारीरिक क्रिया होती है। इंसान की भारी दुर्गति है, क्योंकि बंदर के लिए अनिवार्य है देहभाव में जीना, इंसान दैहिक से ज़्यादा मानसिक होता है। तो इंसान जब देह से वासना नहीं कर पाएगा तो फिर वह मन से करता है। बंदर को अगर बंदरिया उपलब्ध नहीं है तो वह बैठा-बैठा विचार नहीं करेगा। वह यूँही कुछ और कर लेगा, कूद-फाँद करने लग जाएगा, देखेगा कहाँ है, अमरूद किधर है, केला किधर है। वह कुछ भी और करेगा या कुछ उसके साथी मित्र होंगे उनसे अपना लड़ाई-वड़ाई कर लेगा। कुछ भी कर लेगा, बंदर है।

इंसान क्या है? इंसान के पास एक ख़तरनाक उपकरण है यहाँ पर (मस्तिष्क की ओर इशारा करते हुए)। जब वह शरीर से सेक्स नहीं कर सकता, तब फिर वह मन से सेक्स करता है। और यह सज़ा है, यह सज़ा है। हम सोचते हैं कि अगर बिना मेहनत किये खाने को मिल रहा है, पीने को मिल रहा है और भोगने को मिल रहा है तो यह हमारा सौभाग्य है। जैसे लोग आकर कहते हैं न, वाह बेटा! सही ज़िंदगी चल रही है तुम्हारी, ज़्यादा मेहनत-वेहनत करनी नहीं पड़ती और छक कर खा-पी रहे हो, दूसरे ऐसे ही कहते हैं न जब देखते हैं किसी की ज़िंदगी को?

उन्हें कुछ पता नहीं, जो व्यक्ति बिना मेहनत के छक कर खा-पी रहा है, भोग रहा है और लग रहा है कि ऐश कर रहा है वह व्यक्ति वास्तव में बड़ी दुर्दशा में है। यह दुर्भाग्य है उसका कि उसको ऐसी ज़िंदगी मिल गयी जहाँ पिताजी ने छत दे दी और विरासत दे दी, माता जी ने हलवा-पूड़ी दे दी और सरकार ने नौकरी और पैसा दे दिया। इससे बड़ा दुर्भाग्य नहीं हो सकता। इससे बड़ा दुर्भाग्य हो सकता है, वह यह है कि हिंदुस्तान की नब्बे प्रतिशत जवान आबादी ऐसी ही एक स्थिति को आदर्श मानती है। यह है इस स्थिति से भी बड़ा दुर्भाग्य।

दस में से नौ जवान लोग, उनसे अगर दिल की बात पूछी जाए, कहा जाए कोई सुनेगा नहीं, हम किसी को बताएँगे नहीं, बस हमारे-तुम्हारे बीच में है, कान में फुसफुसा दो, किस तरह की ज़िंदगी के सपने लेते हो? तुम्हारी ड्रीम लाइफ क्या है? वह कहेंगे यही तो है। तुम तो फिर भी छः घंटे दफ़्तर जाते हो, हमारे जवान लोग चाहते हैं कि दो घंटे में ही निपट जाए। दो घंटे में निपट जाए और सिर्फ़ तनख्वाह ही न आये, साथ में घुस भी ख़ूब आये। जितना कम काम करना पड़े और कम-से-कम काम के साथ जो अधिक-से-अधिक भोग संभव हो पाये वो हिंदुस्तानी युवाओं का आदर्श बन चुका है।

और जब यह तुम्हारा आदर्श बनेगा और तुम्हारी बदकिस्मती इतनी हो कि तुम्हारा यह आदर्श साकार भी हो जाए तो फिर तुम्हें इसकी सज़ा यही मिलेगी, ज़िंदगी नशे में डूब जाएगी। अभी जवान हो तो कह रहे हो कि वासना का नशा है, दस-बीस साल बाद वासना का नशा उतना नहीं रहेगा तो दूसरे नशे करोगे, क्योंकि यह सरकारी नौकरी भाई साठ-पैसठ तक चलनी है न। तो भाँति-भाँति के नशे करने का तुमको अवसर मिलेगा।

कृपा करके इस तरह की हालत को अपना सपना, लक्ष्य, आदर्श न बनने दें कि मौज तो उसकी है जो कुछ करता-धरता नहीं। कहते हैं वाह! क्या किस्मत लेकर के आया है। हाँ, सच में क्या किस्मत लेकर के आया है। सौभाग्य उनका है जो दिनभर हाड़ बजा-बजाकर मेहनत करते हैं, इसलिए नहीं कि किसी के ग़ुलाम हैं और उनसे मज़दूरी करवायी जा रही है; इसलिए कि उन्हें कुछ सार्थक मिल गया है, प्रेम हो गया है उनको। और प्रेम अब उनसे काम करवा रहा है, बल्कि प्रेम अब उनसे नृत्य करवा रहा है।

संतों ने अपने भजनों में, क़ाफियों में इस तरह की बात ख़ूब कही है, कि पागल ही हो गया हूँ मैं, सिरफिरा। लोगों ने मुझे पहचानने से इनकार कर दिया और मैं दिनभर क्या करता हूँ? मैं मालिक के धुन पर नाचता हूँ और दिनभर नाचता ही रहता हूँ मालिक के धुन पर। यह होता है सौभाग्य कि पूरा दिन ऐसे बीत रहा है कि मलिक नचा रहा है। कौनसा मालिक? अरे राज्य सरकार या भारत सरकार वाला मालिक नहीं या दफ़्तर में बॉस वाला मालिक नहीं, किस मालिक की बात हो रही है?

श्रोता: उस मालिक की।

आचार्य हाँ, उस मालिक की (आसमान की ओर इशारा करते हुए)। उस मालिक से गहरा नाता जुड़ गया है और जिनका मालिक से नाता जुड़ जाता है न, संतों के कहा है कि मालिक बड़ा बेदर्द है, बड़ा बेरहम है, निर्मम है बिलकुल। जो उसके प्यार में पड़ जाता है मालिक उसको कहीं का नहीं छोड़ता, मालिक उसको दिन-रात नचाता है, कहता है यही मेरा प्यार है, अब नाचो। और नाचो माने क्या? नाचो माने यह नहीं कि बाहर निकल कर नाचने लग गए। नाचने का मतलब है सार्थक कर्म, अब तुम काम करोगे।

कुरुक्षेत्र में अर्जुन का तरकश से बाण निकालना, प्रत्यंचा खींचना, लक्ष्य साधना और विद्युत गति से बाण वर्षा करना, यह नृत्य है। और कौन नचा रहा हैं अर्जुन को? कृष्ण नचा रहे हैं। जो मालिक के हो जाते हैं, मालिक उनको ऐसे ही जो सर्वोच्च और सर्वाधिक आवश्यक युद्ध होता है उसमें डाल देता है और कहता है अब नाचो। जिनसे लड़ रहे हो और जो लड़ रहा है माने तुम, दोनों का ख़ून बहेगा, इस ख़ून के बीचों-बीच लथपथ होकर नाचो। और अठारह दिन तक समझ लो अर्जुन नाच ही रहे हैं।

वह अठारह दिन अर्जुन को कामवासना का ख़याल आया होगा? और अर्जुन, अर्जुन सा व्यक्तित्व, वह तो जहाँ जाते थे उनको नारियाँ उपलब्ध हो जाती थीं। स्वयं आकर निवेदन करती थीं, महाभारत में कितने ही उल्लेख हैं। अर्जुन के पास आयीं, भीम के पास आयीं। अर्जुन को कोई सुध? अर्जुन को एक क्षण का भी ख़याल यह सब बातें, कामवासना या कोई और नशा या कोई और उपद्रव? कोई मतलब इन बातों से? नहीं। क्यों नहीं मतलब? कृष्ण नचा रहे हैं, अर्जुन नाच रहे हैं, यहाँ किसको याद आएगी अपनी देह की और नारी देह की।

समझ में आ रही है बात कुछ?

अब एक दूसरी नौकरी खोजो, दूसरी माने यह नहीं कि पहली छोड़नी है, रखे रहो पहली। पहली तो जो नौकरी है वह नौकरी है ही नहीं, छः घंटे में क्या होता है, छः घंटे में कोई नौकरी होती है। नौकरी होनी चाहिए दिन में कम-से-कम सोलह घंटे की। तुम्हें मिली है छः घंटे की, तो दस घंटे की एक दूसरी नौकरी खोजो। यही तुम्हारा उपचार है, दस घंटे की एक दूसरी नौकरी खोजो और वह नौकरी मालिक की होनी चाहिए। समझ रहे हो कुछ बात को?

प्र: जी सर।

आचार्य और जान लगा कर उसमें डूबो। एक तो तुम्हें बड़ी-से-बड़ी सज़ा मिली यह जो तुमने कहा कि तुम्हें ग्लानि रहती है, पीछे कुछ ऐसे काम कर दिये थे उसकी याद रहती है। एक तो तुम्हें बड़ी सज़ा यह मिल रही कि दुनिया की आधी आबादी महिलाओं की है। तुम इनसे सहज रिश्ते नहीं रख सकते, तुम स्वस्थ तरीक़े से किसी महिला की ओर देख नहीं सकते। यह कोई छोटी सज़ा है कि कोई साधारणतया भी कोई स्त्री आ रही है तुम्हारी ओर और तुम असहज हो जाओगे।

कामी की यही स्थिति होती है, साधारणतया तुम बाज़ार में घूम रहे हो, बस में चल रहे हो, कहीं कुछ है सड़क पर या घर पर ही अपने कोई महिला आ गयी। चाहे वह पचास ही साठ साल की क्यों न हो और चाहे वह बारह-चौदह साल की लड़की ही क्यों न हो, आपका मन व्यथित हो जाएगा। और अब न तो आप ख़ुद शांत-सहज रह करके अपना कोई काम कर सकते हैं, न वह जो आ गयी है बेचारी, उसको शांत रहने दोगे। घर में ऐसा माहौल — या जहाँ कहीं भी है, सड़क बाज़ार जो भी — वहाँ ऐसा माहौल बना दोगे कि दोनों ही पक्ष असहज हो जाएँ, दिमाग हिलने लग जाए कि यह क्या चल रहा है, कुछ तो हो रहा है। यह छोटी सज़ा है? और हम कह रहे हैं दुनिया की आधी आबादी, जहाँ जाओगे वहीं दिखायी देंगी, बच तो सकते नहीं हो।

प्र: सर, मुझे डर भी लगने लगा है।

आचार्य डर भी लगेगा, भीतर से चोरी का भाव भी रहेगा, अपराधी अनुभव करते रहोगे। और कभी कोई तेज़-तर्रार मिल गयी तो थप्पड़ भी मार देगी।

प्र: हाँ-हाँ ।

आचार्य हाँ-हाँ क्या बोल रहे हो, यह कोई बड़ी अच्छी बात है। (श्रोतागण हँसते हैं) तो यह दुर्दशा करा रहे हो प्रतिदिन, तुम दूसरी नौकरी खोजो जल्दी से। ठीक है?

प्र: जी।

आचार्य आलस बहुत उठेगा, अभी सामने बैठे हो तो हाँ-हाँ बोल रहे हो और अभी पीछे जाकर ही कहोगे बेकार की बात, एक नौकरी कर रहे हैं, दूसरी क्यों खोजें! घर पर भी पता चलेगा माँ-बाप को तो कहेंगे, 'अरे लाडला, सुकुमार, सुकोमल हमारा सबकुछ ठीक चल रहा है, बाबे ने फँसा दिया। बेचारा नाज़ुक-नाज़ुक हमारा छौना।

तो कोई इस बात का समर्थन नहीं करने वाला जो यहाँ हम कर रहे हैं, दूसरे भी नहीं करेंगे, तुम स्वयं भी नहीं करोगे। इरादा पक्का करना पड़ेगा, ठीक है?

प्र: सर, नौकरी मतलब कुछ सर्विस , सेवा करना?

आचार्य नौकरी माने तुमसे कुछ ऊँचा, उसकी सेवा में समर्पित होकर जुट जाना। गुवाहाटी में हो, कोई बड़ा लक्ष्य पकड़ो। पहले तो खोजना पड़ेगा क्या-क्या ऐसे काम हैं जो कर सकते हो और फिर उनमें एकदम तन्मय होकर के घुस जाओ। और उसको उतना ही ज़रूरी मानो जितना रोटी को मानता है आदमी। जब रोटी खाने को नहीं मिलती तो नौकरी कितनी व्यग्रता से ढूँढते हो, याद है? दिन-रात इसी में लगे रहते हो, नौकरी मिले, नौकरी मिले। अब यही मानो कि तुम्हारे पास रोटी नहीं है खाने को तो उतनी ही बैचेनी से नौकरी ढूँढो अपने लिए दूसरी। ठीक है?

प्र: जी, धन्यवाद आचार्य जी।

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