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वो बात बिल्कुल याद नहीं आती? || आचार्य प्रशांत, श्री रामचरितमानस पर (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: पिछले बाईस वर्षों से मैं एक साधना कर रहा था। अब ऐसा लगता है कि मैं ग़लत रास्ते पर साधना कर रहा था। तो इस संबंध में एक चौपाई आयी है कि शिव जी कहते हैं कि,

उमा कहूँ मैं अनुभव अपना।

सत हरि भजन जगत सब सपना।।

आचार्य जी, मैं आपसे प्रार्थना करूँगा कि इसमें जो 'भजन' और 'सपना' है, उसका अर्थ मुझे समझा दीजिए। उसको हम अपने जीवन में कैसे ढालें? कैसे उसको अपने जीवन में अपनाएँ? इस समय मैं कोई साधना नहीं कर रहा हूँ और बिल्कुल खाली हूँ, और मैं चाहता हूँ कि आप मेरा मार्गदर्शन करें ताकि मैं अपने जीवन में हरि भजन और जगत के स्वप्नवत होने की बात को जी सकूँ।

आचार्य प्रशांत: मनुष्य कौन है और उसको अध्यात्म की, चाहे हरि की, चाहे राम की, या फिर चाहे संसार की, चाहे प्रकृति की, चाहे माया की ,कुछ भी ज़रूरत ही क्या है?

बहुत आख्याएँ सुनी हैं हमने, और अभी एक छंद कह दिया, उसकी व्याख्या करने से पहले संदर्भ तो स्पष्ट होना चाहिए।

क्यों शिव उमा को कोई उपदेश दें, कुछ अनुभव बताएँ? कौन हैं उमा? और उन्हें आवश्यकता क्या है शिव के साथ की या शिव के ज्ञान की? उत्तर इसका हमें पुस्तकों से मिल सकता है, लेकिन अगर किताबी होगा इस शुरुआती प्रश्न का उत्तर ही, तो आगे की भी हमारी सारी प्रेरणा किताबी ही होगी, आत्मिक नहीं। हरि, राम, अध्यात्म – इनकी हमें आवश्यकता क्या है, इसका उत्तर हमें किताबों से नहीं, अपने अनुभव से मिलना चाहिए। ध्यान रखिए, मैंने अभी ये नहीं कहा कि उस आवश्यकता की पूर्ति कैसे होगी इसका अनुभव हो सकता है, या इसका उत्तर हमें अपने अनुभवों से मिल सकता है। अनुभव हमारे आवश्यक हैं हमें ये बताने के लिए कि हम कौन हैं, और इसीलिए हमें चाहिए क्या।

अनुभवगत ही कुछ होता है जो हमें – चाहे प्रकृति और माया की और चाहे अध्यात्म और राम की दिशा में भेजता है। अनुभवगत क्या होता है ऐसा? अनुभवगत एक विभाजन होता है, दूरी होती है। वहाँ से ही सारी प्रेरणा आरंभ होती है।

तो इस प्रसंग में तो शिव-पार्वती संवाद का उल्लेख भर देख लिया आपने, और उससे पहले का और उसके आगे का कुछ याद है कि कैसे जब उमा के पास शिव नहीं थे तो बालिका होकर भी वो शिव को याद करती थीं? कथा के मर्म को समझिए। कहते हैं, उन्होंने आँखों से कभी देखा नहीं था शिव को, कानों से कोई कथा भी नहीं सुनी थी, फिर भी वो जानती थीं कि जहाँ पैदा हुई हैं, उन राजा-रानी का घर सही जगह नहीं है उनकी। थोड़ी-सी आयु परिपक्व होते ही उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि, "है एक, भोला पशुपति, उसी के साथ जाना है, उसी से ब्याह होना है, उसी से ब्याह हो चुका है मेरा।" और फिर एक अवस्था आती है जब पाती हैं कि अब शिव से गठबंधन पर आँच आ रही है तो अग्नि में कूदकर प्राण दे देती हैं।

इन कहानियों का मर्म समझिएगा। इनको समझ गए तो जान जाएँगे कि उमा को शिव की और इंसान को राम की ज़रूरत क्या है।

जीवन हमारा ऐसा है ज्यों हम पैदा ही होते हों कुछ पाने के लिए। बच्चा-बच्चा आतुर है, कोई ऐसा नहीं जिसने आगे की ओर हाथ पसार न रखे हों; सबको कुछ चाहिए। पार्वती विशिष्ट इसलिए हैं क्योंकि उन्हें शिव चाहिए, सीधे शिव। शिव की कृति नहीं, शिव का संसार नहीं, शिव का क्षेत्र नहीं, दायरा नहीं शिव का, छवि नहीं, परछाई नहीं शिव की; शिव मात्र। इस अर्थ में कोई भी मनुष्य उमा से भिन्न नहीं कि पाने और चाहने में वो उतना ही उद्विग्न और आतुर है जितनी उमा। इस अर्थ में कोई भिन्नता नहीं।

और इस अर्थ में बहुत भिन्नता है कि जो विषय माँगा जा रहा है, उसका बोध कितना है, उसका प्रेम कितना है। माँगना हर मनुष्य ने है।

हमने आज के सत्र की और इस शिविर की शुरुआत करी यह पूछकर के कि, "मनुष्य कौन है?” मनुष्य एक माँग है। माँगना सबको है, उमा भी माँगती ही हैं। इस अर्थ में साधारण मनुष्य हों कि ऋषि हों, कि योगी हों, महापुरुष हों, मुक्त पुरुष हों, और चाहे पार्वती हों, सब आपस में अभिन्न हैं – सब एक माँग हैं। और अगर कोई कहता है कि उसका जीवन माँग से रिक्त है, तो या तो झूठ बोल रहा है, या अपने प्रति अनभिज्ञ है।

हम सब एक माँग हैं। उस माँग के प्रति जब बोध होता है, जब प्रेम होता है, तो माँगे जा रहे विषय का नाम हो जाता है — कभी शिव, कभी राम। और जब बिना प्रेम के और बिना समझे, बिना किसी बोध के माँगते हो, तो जिसको माँगा जा रहा है, उसका नाम हो जाता है — प्रकृति और माया।

माँगोगे तो है ही, माँगने के लिए ही तो पैदा हुए हो न? झोली खाली न होती तो पैदा क्यों होते? अपूर्णताओं के अतिरिक्त और क्या है जो जन्म लेता है? जो पैदा हुआ है, उसे माँगना पड़ेगा। जो पैदा हुआ है, पैदा होने के बाद अगर वो ये दावा करे और दंभ करे कि उसे कुछ चाहिए नहीं, तो वो कुछ जानता नहीं, या जानकर मानता नहीं।

माँगी जा रही विषय-वस्तु के प्रति हमने कहा कि दो तरह का संबंध हो सकता है – प्रेम का और बोध का। इन दोनों को थोड़ा-सा समझ लेंगे। हम माँगते तो ज़रूर हैं, ख़ूब माँगते हैं, जीवन भर माँगते हैं, पर हम जिन विषयों को, जिन वस्तुओं को, जिस चीज़ को माँग रहे होते हैं, उसके प्रति भी हमारी कोई निष्ठा होती नहीं है। हम ऐसे जैसे सड़क का भिखारी, कि एक आदमी से सिक्का न मिला तो दूसरे की ओर मुड़ जाएँगे, और दस रुपए नहीं मिले तो पाँच सही, और पाँच नहीं मिले तो एक रुपया ही सही। और कहीं एक रुपया भी न मिलता हो, कोई कुछ खाने को दे दे, तो वो भी सही।

माँगते तो हम ख़ूब हैं, पर कैसा है ये माँगना कि कभी अड़कर नहीं माँगते, क्योंकि जो माँग रहे हो उससे प्रेम नहीं है। तो अजीब बात है, अगर प्रेम नहीं है तो माँग क्यों रहे हो? गौर करिएगा! आपने जीवन में क्या कभी कुछ भी ऐसे माँगा है कि नहीं मिला तो जिऊँगा ही नहीं, और आग में कूदकर प्राण दे दूँगा पार्वती की तरह? कुछ माँगा है ऐसा क्या? तो माने जिस चीज़ को माँगा, उस चीज़ को कभी आपने ही मूल्य नहीं दिया। अच्छा, माँगी हुई चीज़ को मूल्य तो दिया नहीं, तो फिर जीवन भर माँगते ही क्यों रहे? मूल्य किसको दिया? गड़बड़ हो गई न?

जो वस्तु माँगी, उसको मूल्य नहीं दिया, 'माँगने' को ही मूल्य दे दिया। माँगना है भई, माँगना है! कभी इससे माँगना है, कभी उससे माँगना है, कभी ये चीज़ माँगनी है, कभी वो चीज़ माँगनी है। कुछ यदि है जो नहीं बदल रहा, तो वो है 'माँगना'। माँगी जा रही वस्तु तो लगातार बदल रही है। उस वस्तु से हमारी कोई निष्ठा नहीं। उस वस्तु के प्रति कोई हमारा अटूट प्रेम नहीं। ये नहीं मिल रहा तो कोई बात नहीं, बगल वाला चलेगा। एक सपना टूट गया, कोई बात नहीं, दूसरा खड़ा करो। एक दरवाज़े पर बात नहीं बनी, कोई बात नहीं, दूसरा खटखटाओ। हमारा माँगना ऐसा है।

हमें पता भी नहीं चलता कि कब हम 'वस्तु' के प्रार्थी होना छोड़कर 'माँगने' के प्रशिक्षार्थी हो जाते हैं। अब हमारी प्रार्थना ये नहीं रहती कि जो माँग रहे हैं वो मिल जाए, हमारा प्रशिक्षण हो जाता है कि हम माँगते ही रह जाएँ। ये ग़लत घटना घट गई न? अब हमारी प्रार्थना ये नहीं है कि एक चीज़ माँगी है और वही मिले। और वहाँ किसी तरह का कोई समझौता, कोई ऊँच-नीच संभव नहीं है, क्योंकि बहुत कुछ माँगा ही नहीं है, एक चीज़ माँगी है। वो हम भूल ही जाते हैं; ज़िन्दगी की यात्रा में, अनुभव में और अभ्यास में, हम प्रशिक्षित हो जाते हैं मात्र माँगते रहने के लिए। अब माँगना आवश्यक हो गया है, पूरी निष्ठा किसके प्रति हो गयी है? माँगने के लिए। अब माँगना तो है ही, तो कुछ-न-कुछ विषय भी तलाशना पड़ेगा माँगने के लिए।

बाप रे, कितना उलट हो गया! कहाँ तो शुरुआत ऐसे हुई थी कि जो चाहिए, उसकी प्राप्ति का साधन है, माध्यम है माँगना, तो हमने माँगा; और मुद्दा पलटकर कुछ ऐसा हो गया कि मुझे माँगना है, अनिवार्यतः माँगना है। माँगना अब मेरी नीयत बन गयी है। माँगना अब मेरी फितरत बन गयी है। माँगना ही अब मेरा अभ्यास और मेरा केंद्र बन गया है। तो माँगते रहने के लिए फिर मुझे किसी-न-किसी विषय का आविष्कार करना है जो माँगा जा सके।

अगर माँगना है, और तुम कहो कि, "माँगने को कुछ नहीं है, मात्र माँगना है," तो बात बड़ी हास्यास्पद और फ़ूहड़ लगेगी न? तो हम कुछ भी उल्टा-पुल्टा, अंड-बंड विषय ढूँढ लेते हैं माँगने के लिए क्योंकि विषय तो अब प्रमुख रहा ही नहीं। प्रमुख क्या हो चुका है? माँगना। तो कुछ भी दिख गया, कहते हैं, “वो चाहिए, वो वस्तु चाहिए।" वास्तव में हमें कुछ नहीं चाहिए, हमें बस 'माँगना' है।

बड़ा अभ्यास हो गया, पूरी तरह से प्रशिक्षित हो गए बस माँगने में। वो दशा तो बहुत पीछे छोड़ आए जब कभी याद था कि किससे प्रेम है, तब माँगने से मतलब नहीं था। जिससे प्रेम है अगर वो बिना माँगे मिल जाता तो हम कहते, “बहुत बढ़िया, माँगना कौन चाहता है? माँगना तो बस एक तात्कालिक उपाय था पाने के लिए, कि जो चाहिए उसको पाने के लिए माँगना थोड़ी देर के लिए, कुछ दूर तक के लिए ज़रूरी है, तो माँग लो।" अब भूल ही गए, बिल्कुल भूल गए। अब हम माँगते रहते हैं जीवन भर, माँगते रहते हैं जीवन भर।

यही समझाया जा रहा है उस श्लोक में, जो आज उद्धृत किया गया है। जब भूल जाओ कि किसको माँगा था और बस माँगना याद रह जाए, विधियाँ याद रह जाएँ, तौर-तरीके याद रह जाएँ, माध्यम और साधन याद रह जाएँ, साध्य को भूल जाओ, तो जान लो सपने में जी रहे हो, जैसा कि श्लोक में वर्णित है। यही 'सपना' है। साधन याद हैं, दुनिया भर के सब प्रपंच; साध्य भूल गया! और साधन चूँकि याद हैं अब अनगिनत, तो बहुत सारे अब नकली साध्य खोज लिए जाते हैं – कभी ये चाहिए, कभी वो चाहिए, कभी ज्ञान चाहिए, कभी प्रतिष्ठा चाहिए, कभी सम्मान चाहिए, कभी रुपया-पैसा चाहिए, कभी कुछ, कभी कुछ, कुछ भी।

माँगने में प्रेम होना चाहिए। प्रेम उत्कट होता है, प्रेम निर्विकल्प होता है। जिसको हम अपना साधारण प्रेम कहते हैं, वो कभी निर्विकल्प हो नहीं सकता।

एक पुरानी कोई फ़िल्म है, मैं समझता हूँ 'मुगलेआज़म' का गीत है। इसकी शुरुआत कुछ ऐसे होती है कि, "इंसान किसी से दुनिया में एक बार मोहब्बत करता है, एक दर्द को लेकर जीता है, एक दर्द को लेकर मरता है।" ये बात बिल्कुल सही कही गयी है, लेकिन दुनिया में ये बात नहीं चलेगी, चल सकती ही नहीं है। दुनिया में तो आपको जब भी प्रेम होता है तो एक बार नहीं होता, दस बार होता है। आप किसी को नहीं ढूँढकर ला सकते जो कह दे कि एक ही प्रेम हुआ है उसे, और उसके अलावा कुछ नहीं उसके पास। ऐसा निर्विकल्प प्रेम आपको दुनिया में नहीं मिलेगा।

पर ऐसा निर्विकल्प प्रेम जो दुनिया के लिए सिर्फ़ एक दूर का तारा है, आदर्श मात्र है, अध्यात्म की केंद्रीय वस्तु है। जिस चीज़ को दुनिया बस एक उदाहरण, एक आदर्श भर की तरह देख सकती है, और जानती है कि वैसा कभी व्यवहार में संभव नहीं होना, वो वस्तु अध्यात्म के लिए पहली और, आख़िरी, और एकमात्र है। और अध्यात्म कहता है, "इसको 'आदर्श' बना लिए तो फिर जी क्यों रहे हो? ये आदर्श नहीं होना चाहिए; ये तुम्हारे दिन-प्रतिदिन का, श्वास-दर-श्वास का व्यवहार होना चाहिए। तुम्हें इसी में जीना होगा। एक मोहब्बत, एक दर्द, उसी में जीना, उसी में मरना, कोई दूसरी, तीसरी, चौथी बात नहीं।"

बात समझ में आ रही है?

हमारी तो चौथी–पाँचवीं क्या, चालीसवीं-पचासवीं भी हो जाती है। अब जो भी पैदा होगा, उसके पास ये दो विकल्प होंगे, कि या तो माँगते रह जाओ हज़ारों को, या थमो, गौर करो कि माँग ही क्यों रहे हो, ताकि जो माँगने लायक है बस उसको माँग सको।

हमने कहा – या तो प्रेम होना चाहिए, या बोध।

प्रेम का अर्थ होता है एक उत्कट आकर्षण, जिसका आप प्रतिरोध नहीं कर सकते, जिसपर आपका कोई अधिकार नहीं होता। वो अजेय है, आप उससे लड़ नहीं सकते। वो आपका मालिक हो जाता है, वो आपको खींचे लिए जाता है। अब है प्रेम तो है! बोध का अर्थ होता है जानना, कि उस एक के अतिरिक्त ये जो बाकी सब हैं, ये कितने व्यर्थ हैं। या तो प्रेम हो, या बोध हो – एक ही चीज़ के दो नाम हैं।

प्रेम का अर्थ है – मात्र वही दिखता है, बाकियों का कुछ पता ही नहीं। बोध का अर्थ है– बाकियों की हस्ती का पता है कि इनकी हस्ती निरर्थक है, तो बाकियों की ओर जाना नहीं।

प्रेम का अर्थ है: बाकी दिखते ही नहीं।

बोध का अर्थ है : बाकी दिखते हैं और फ़िज़ूल दिखते हैं, तो उनकी ओर जाना नहीं।

शिव और शक्ति का संबंध इसीलिए अनन्य है। जिस प्रेम में अनन्यता नहीं, वो प्रेम प्रेम नहीं। अनन्यता का अर्थ है – कोई अन्य नहीं हो सकता। निर्विकल्पता का ही दूसरा नाम है अनन्यता – कोई दूसरा नहीं। एक ज़िन्दगी, एक मोहब्बत, एक दर्द, एक लक्ष्य; इधर-उधर की फ़िज़ूल बातें हटाओ। वो जो एक लक्ष्य है, आपने जो श्लोक कहा, उसमें उसका नाम है – 'हरि’, उसका नाम है – 'राम'। और जो इधर-उधर की तमाम व्यर्थ बातें हैं, उनका नाम है – 'सपना'। स्पष्ट हो रही है बात?

तो हरि भजन के भी इसी तरह से दो अर्थ हुए। हरि को भजने का एक अर्थ तो ये है कि कुछ है ऐसा बिल्कुल निर्गुण, निराकार, बिंदुवत, क्या कहूँ उसे नाम, क्या कहूँ उसे आकार, पर पकड़े रहता है, खींचे रहता है – ये हरि भजन हुआ। जैसे कि ज़मीन पर कहीं कोई बड़ी विशाल दावत पसरी हुई हो और उस दावत में उमा भी आमंत्रित हैं, और शोर है, और नाच-गाना है, और सजावट है, और तमाम तरह की रोशनियाँ हैं, धूमधाम है, लोगों का आवागमन है, और उमा आकाश की ओर देख रही हैं।

क्या है आकाश में? कुछ जिसका आकार हो, कुछ जिसका नाम हो, कोई आवाज़ आ रही है वहाँ से। कुछ ऐसा है जिसको छू लोगे हाथ बढ़ाकर के? कुछ नहीं है। पर ये प्रेम है, कि वो मौजूद रहता है दुनिया की हर दावत में, और हर दावत के ऊपर; कहीं भी चले जाएँ, हैं तो आकाश के मध्य ही। किसी भी जगह मौजूद होते हैं, दिखाई हमें वही देता रहता है जो ऊपर है। दाएँ है, बाएँ है, मध्य में है, नीचे है – सब तरफ़ से हमें घेरे हुए है। मौजूद कहीं भी रहें, रहते उसी में हैं। ये प्रेम हुआ। ये हरि भजन है कि दुनिया की दावत के बीचों-बीच बार-बार तुम आकाश की ओर ही देखते हो। जब आकाश की ओर नहीं भी देख रहे तो दिल में आकाश-सा ही स्थान पाते हो– ये हरि भजन है।

आपने कहा आप कई दशकों से भजन आदि क्रियाओं में प्रवृत्त रहे हैं। इस भजन का ज़रा प्रयोग करिएगा।

ये प्रेम वाला भजना हुआ: अगल-बगल दुनिया है, संसार है, लोग हैं, वस्तुएँ हैं, सामान हैं – दिल में बस आसमान है, बस आसमान। कुछ और कितना भी सामान बिखरा हुआ है चारों ओर, दिल में आसमान है।

और बोध वाला भजना क्या हुआ? कि जो भी कोई दिख रहा है, जो भी कुछ प्रकट हो रहा है, अनुभव में आ रहा है, स्नेह से और जिज्ञासा से उसके पास जाते हैं, पूछते हैं, “क्या तुम वो हो? हमें नहीं मालूम वो कौन है।" ये बोध का मार्ग है। "हम नहीं जानते आकाश को, हमारा तो जन्म ही पृथ्वी पर हुआ है, हमें क्या पता आकाश का? न जाने कैसा चमत्कार हुआ था कि उमा जन्म लेते ही जान गयीं थीं कि उन्हें शिव के साथ होना है। हम इतने भाग्यशाली नहीं, हम नहीं जानते। हमारे सामने तो जन्मते ही तुम पड़े हो भाई। क्या तुम वो हो? मैं तुमसे पूछूँगा, मैं आग्रह करके बार-बार तुमसे पूछूँगा। और चूँकि मैं सच्चाई जानना चाहता हूँ, इसीलिए मैं परख-परख कर पूछूँगा। तुमसे भी पूछूँगा, तुमसे भी पूछूँगा, तुमको भी परखूँगा, तुमको भी परखूँगा। क्या पता तुम्हीं में से कोई वो हो, जिसको माँग रहा हूँ मैं। सबसे पूछूँगा, 'क्या तुम वो हो?’”

जिन्होंने पूछा है और जिन्होंने ईमानदारी से परखा है, उन्होंने तो यही पाया है कि जितना भी उन्होंने पूछा, परखा, अपनी झोली को खाली ही पाया। यहाँ कोई नहीं, यहाँ कुछ नहीं ऐसा जो उस माँग को पूरा कर दे जो हर इंसान के जन्म का कारण और जीवन की ऊर्जा होती है। ये हरि भजन हुआ, ये बोधपूर्वक हरि भजन होगा।

प्रेमी मौजूद है किसी भी दावत में, वो गीत गा रहा है आकाश के। और बोधी भज रहा है जान-जान के, परख-परख के, ये उसका हरि भजन हुआ। ये है वास्तव में भजने का, व्यवहार में भजने का तरीक़ा।

और याद रखिए, ये कोई ठोस कोटियाँ नहीं होतीं व्यक्तित्वों के विभाजन की कि हम कह दें, "फलाना प्रेमी है, फलाना बोधी है।" आप कभी ये भी हो सकते हैं, कभी वो भी हो सकते हैं। भजना आवश्यक है। कभी हो सकता है ऐसी हवा चले कि दुनिया की ओर आकृष्ट हो जाएँ, दावत बहुत भाने लगे, आकर्षित करने लगे, तो दावत से जाकर पूछना है बार-बार, “क्या तुम वो हो?” मान ही नहीं लेना है, पूछना है, परखना है। और बार-बार पूछेंगे, परखेंगे, तो अपने-आप निगाहें दुनिया से उठकर आसमान की ओर चली जाएँगी। तब हरि भजन का मतलब हुआ 'उसके' लिए गाना; इधर परखना, उधर गाना।

हरि भजन कोई बँधी-बँधाई क्रिया नहीं है। कुछ पंक्तियों को किसी लय में, किसी विधि से, किसी जगह पर, किसी समय पर दोहराने का और गाने का अनुशासन नहीं कहलाता हरि भजन। हरि भजन जागृत व्यवहार की बात है: या तो जीवन ही भजन होगा, नहीं तो भजन से सर्वथा रिक्त होगा जीवन। भजन कोई शुरू करने और ख़त्म करने की वस्तु नहीं है कि शाम साढ़े-छह बजे भजन शुरू किया और आठ बजे समाप्त कर दिया। अहर्निश एक मूक धुन बजती रहे, तब भजन है।

एक मैं इसमें बात और जोड़ूँगा: अध्यात्म या भजन या हरि या राम या बोध या प्रेम आपको दुनिया से अलग-थलग नहीं करते, ये आपको दुनिया से काटने की विधियाँ और औज़ार नहीं हैं। शुरुआती प्रश्नों पर वापस जाइए। चूँकि इस दुनिया में हमारा अनुभव एक रिक्तता का है, एक माँग का है, परेशानी का है, इसलिए हम अध्यात्म की ओर आते हैं न? तो अध्यात्म की ओर आने की हमारी प्रेरणा भी, हमारा उद्देश्य भी यही है कि जीव का जीवन ज़रा कम दाह में, ज़रा कम दुःख और आँसुओं में बीते। जीव ही तो जाता है न अध्यात्म की ओर? अब जीव तो वही है जिसको जीना है, जीव तो वही है जिसके पास जीवन है, तो निश्चित रूप से अध्यात्म जीवन सुधारने का विज्ञान है। और आप जी कहाँ रहे हैं? संसार में। तो जीवन बिगड़े चाहे सुधरे, जीवन रहेगा तो संसार में ही।

चाहे गर्हित से गर्हित जीवन हो और चाहे पावन से पावन, जीवन बीतना कहाँ है? तो अध्यात्म आपको जीवन से काटने के लिए नहीं होता। वो इसीलिए होता है ताकि आप व्यर्थ और कष्टों से भरा हुआ, और अपने ही लिए और ज़्यादा दुःख का निर्माण करने वाला जीवन न जिएँ।

बहुत साधारण-सी बात है, पर फिर भी बहुत लोगों को इसमें बड़ा संदेह रहता है। उन्हें लगता है कि अध्यात्म का मतलब है कि इंसान दुनिया से कट जाएगा। इंसान दुनिया में कट रहा है, इंसान दुनिया में कट तो रहा ही है।

अध्यात्म इसलिए नहीं है कि आपको दुनिया से काट दे, अध्यात्म इसलिए है ताकि आपका दुनिया में कटना बंद हो जाए।

दुनिया छोड़कर कहाँ जाओगे? जो दुनिया ही छोड़कर चला गया, उसके लिए अध्यात्म क्या अब? जो अब दुनिया में नहीं है, उसको अध्यात्म पढ़ाओगे क्या? सारा अध्यात्म किसके लिए है? दुनिया वालों के लिए ही है, और दुनिया वालों के लिए इसलिए है क्योंकि हम दुनिया में कट रहे हैं।

तो हमने जो भी बात करी कि दावत पसरी हुई है लेकिन निगाहें आकाश की ओर हैं, इन सब बातों का अर्थ ये मत समझ लेना कि दुनिया से बिल्कुल अन्यमनस्क हो जाना है, दुनिया से कोई लेना-देना नहीं रखना है।

वैराग्य का अर्थ दुनिया से दूरी नहीं होता; वैराग्य का अर्थ मूर्खता से दूरी होता है।

वैराग्य का अर्थ ये थोड़े ही हो सकता है कि हमें अब सच्चाई से कोई राग नहीं रहा; वैराग्य का अर्थ होता है कि हमें अब झूठ से कोई राग नहीं रहा। और भाई झूठ से कौन राग रखना चाहता है? कोई है ऐसा? तो कोई कहे कि, "वैरागी और संसारी एक दूसरे के विपरीत हैं," तो ये मूर्खता की बात है। न! वैराग्य का अर्थ संसार से वैपरीत्य नहीं है, वैराग्य का अर्थ है मूर्खता से दूरी। रहना तो संसार में ही है, संसार कहाँ छोड़ के जाना है।

रहना संसार में ही है, और अगर उमा की तरह हो, तो संसार के शिखर पर रहना है, और जो पूरे संसार के अधिपति हैं, उनके साथ रहना है। अब बताओ ये संसार छोड़ने की बात हो रही है या संसार में खुलकर जीने की अपितु संसार पर राज करने की बात हो रही है? बोलो? तो हमने जितनी भी बातें कहीं, उसके अर्थ में कहीं भी ये भावना न आ जाए कि दुनिया की किसी चीज़ को हाथ नहीं लगाना है, किसी से भी कहीं भी कोई संबंध नहीं रखना है, इत्यादि, इत्यादि।

माया के खेल बड़े निराले होते हैं। ऐसा भी हो सकता है कि जब आप बाहर की चीज़ों से और लोगों से संबंध रखना बंद कर दें तो आपका बड़ा संबंध बन जाए अपने ही मनोजगत के साथ। वो भी अपने-आप में पूरा संसार है। अब जो बाहर आदमी-औरत हैं, उनसे आप कोई रिश्ता-नाता नहीं रखते, पर आपके अपने भीतर एक चलचित्र चल रहा है, एक दुनिया चल रही है, आपका वहाँ बड़ा नाता है। अपने सिद्धांतों से, अपनी भावनाओं से, अपने कुछ आदर्श बना लिए हैं, उनसे तो रिश्ता रख लिया न? लो, एक वैकल्पिक संसार तैयार कर लिया।

* * लगातार स्मरण रखना है कि जीवन मूर्खता में नहीं गँवाना है। और जीवन कोई बहुत आगे की और दूर की बात नहीं होती है; जीवन माने अभी, यहीं, जो आप कर रहे हैं। समय माने यही सब क्षण जो अभी आप बिता रहे हैं। इनका निशाना किधर को है, इनका उपयोग किधर को हो रहा है, किसकी भेंट चढ़ गए ये कुछ पल, किसको दे दिया ये सब कुछ, ये स्मरण रखना – यही हरि भजन है। ऊर्जा कहाँ को जा रही है, ध्यान किसपर है, संसाधन किसे समर्पित हो रहे हैं, ये सदा याद रखना – यही हरि भजन है।

"जीवन उत्कृष्टतम तरीक़े से जी रहा हूँ या नहीं?" ये सवाल पूछते रहना, यही हरि भजन है।

तो फिर वो सब क्या हैं भजन-कीर्तन जो सभाओं में, सत्संगों में, मंदिरों में होते हैं? वो अधिक-से-अधिक भजने का एक प्रकार हो सकते हैं। वो भी भजने का एक तरीक़ा हो सकते हैं अगर सत्प्रेरणा से किए गए हैं, अगर सही नीयत, इरादे, उद्देश्य से किए गए हैं। पर कोई ऐसा नहीं है जो चौबीस-घंटे कीर्तन कर सकता हो। वो तो एक बँधी-बँधाई क्रिया है, नहीं करी जा सकती हमेशा। तो कभी वो हो जाए, अच्छी बात। और जब वो हो तब भी पूछना है कि, “क्या इरादा ठीक है? केंद्र ठीक है? उद्देश्य वास्तव में भजने का ही है, या छुपा हुआ इरादा कुछ और है?”

सही उद्देश्य के साथ, सही प्रेरणा के साथ, गीत-संगीत वाला भजन हो जाए, अच्छी बात। पर वो रोज़ नहीं हो पाएगा, लगातार नहीं हो पाएगा। वो नहीं भी हुआ तो भी भजन चलता रहना चाहिए, भजने में कोई अंतराल, कोई व्यवधान नहीं आना चाहिए।

बाहर का भजन कभी-कभार चलेगा, भीतर का भजन अहर्निश चले।

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