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वेदांत की एक मूल बात
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: देखो जो बिलकुल मूल, फंडामेंटल (मौलिक) बात है वेदांत की, उसको समझो। "सत्य एक है, वह अपनी मर्ज़ी से, अपनी लीला से, अपनी मुक्ति से, अपनी स्वेच्छा से अनेक रूपों में अभिव्यक्त होता है; कोई कारण नहीं है, अकारण ही, यूँ ही।" अभिव्यक्ति उसकी मौज है, इसी तरीके से अन-अभिव्यक्ति भी उसकी मौज है। प्रकट होना उसकी स्वेच्छा है, उसकी मुक्ति है; प्रकट होकर के पुनः अप्रकट हो जाना, ये भी उसकी स्वेच्छा की बात है।

कृष्ण कहते हैं अर्जुन से, "अर्जुन! इतने वर्षों में, इतने कल्पों, इतने कालों में कभी ऐसा नहीं रहा है कि ये राजा लोग न रहे हों जो आस-पास खड़े हैं कुरुक्षेत्र में, या तुम न रहे हो, या मैं न रहा हूँ।“ अच्छा, राजा लोग तो समझ में आता है कि पहले भी थे, अभी भी थे, क्यों? क्योंकि प्रकृति लहरें मारती रहती है, तो ये सब तो प्रकृति के हिस्से हैं। प्रकृति पुनर्जन्म ले रही है ये आशय है, कि ये सब तो हमेशा से थे, क्योंकि वो सब राजा लोग, ये सब क्या हैं? ये प्रकृति के गुणों के पुतले भर हैं; और गुणों के ये पुतले तो आज से पाँच-लाख साल पहले भी थे, आज भी हैं। तो ये राजा तब भी थे, ये आज भी हैं; तीन गुण वाले तब भी पाए जाते थे, तीन गुण वाले आज भी पाए जाते हैं।

ठीक है?

अर्जुन भी वही है तीन गुणों का पुतला मात्र; वो भी तब भी पाया जाता था, वो आज भी पाया जाता है। ये क्यों बोल देते हैं कृष्ण, कि, “अर्जुन तू भी सदा रहा है, हर काल में रहा है, और मैं भी हर काल में रहा हूँ”? कृष्ण को क्या पड़ी है बार-बार हर काल में रहने की भाई? अर्जुन तो मजबूर है हर काल में रहने को, कृष्ण क्यों लगातार पाए जा रहे हैं? "मौज है। हमारा ब्रह्मांड है, हम रहेंगे। हो सकता है रहें, हो सकता है न रहें, मन है, रहेंगे। और रहते इसलिए हैं कि भाई अर्जुन जैसा कोई हमेशा ही होता है, तो हम कहते हैं ठीक है, ये लड़का बढ़िया है, इसकी मदद कर देनी चाहिए।" तो इसलिए रहते हैं।

वो मजबूर, वो विवश होकर नहीं रह रहे, वो राजाओं की तरह नहीं रह रहे। ऐसे ही समझ लो कि सत्य से प्रकृति का निर्वाण है। क्या? मौज है। कोई विवशता नहीं, कोई प्रयोजन नहीं, नहीं भी रहें तो कोई कुछ बिगाड़ नहीं लेगा; कोई उत्तरदायित्व नहीं है, बस यूँ ही।

समझ में आ रही है बात?

तो “जो रूद्र, इंद्र आदि देवताओं को उत्पन्न करने वाला और बढ़ाने वाला है”। ठीक है? उत्पन्न कर दिया, फिर ये बढ़ाने से क्या मतलब है? अब बताओ 'बढ़ने' का क्या मतलब है? ये बहुत खास भाषा है, इसको संस्कृत या हिंदी मत मान लेना, इसको कोड लैंग्वेज (संकेतों वाली भाषा) की तरह पढ़ना पड़ता है। 'बढ़ने' से क्या आशय है? 'बढ़ने' से ये मतलब है कि पैदा करने का अर्थ ही है; जब कहते हो किसी जीव को पैदा किया, या किसी भी इकाई को पैदा किया, चाहे वो देवता हों, कुछ भी हो, पैदा करने का मतलब ही है कि समय पैदा कर दिया; और समय पैदा कर दिया तो समय में गति को ही कहते हैं 'बढ़ना' और 'घटना'। जो कुछ समय में आया है वो कुछ काल के लिए बढ़ेगा, और फिर घटेगा, फिर विलुप्त हो जाएगा। बढ़ेगा,घटेगा; प्रभव फिर प्रलय; आएगा फिर जाएगा। ये समय का काम है।

समय की धारा में और क्या करोगे? कोई भी चीज़ है, उसको शून्य से शुरू होकर शून्य तक ही जाना है, तो बीच में उसे कुछ-न-कुछ बनना पड़ेगा, है न? नहीं बनना पड़ेगा? शून्य से शुरू होकर के शून्य तक ही जाना है तो कुछ-न-कुछ बनना पड़ेगा, सीधी-सी बात है। हवाई जहाज है, उसे एक हवाई अड्डे से दूसरे हवाई अड्डे जाना है तो उसके पास कोई विकल्प ही नहीं है; कुछ काल तक उसे उठना पड़ेगा, कुछ काल तक उसे सीधा चलना पड़ेगा, उड़ना पड़ेगा, और कुछ काल तक उसे नीचे की ओर आना पड़ेगा।

ये काल में मौजूद हर वस्तु का, व्यक्ति का हाल है, कहानी है, विवशता है। तुम आओगे, तुम उठोगे, तुम चलोगे, तुम गिरोगे, तुम मिट जाओगे; बस यही कहानी है।

ठीक है?

ये हैं कौन रूद्र, इंद्र आदि देवता? वास्तव में श्लोक 'देवता' नहीं कह रहा, श्लोक कह रहा है 'देव', “यो देवानां”; 'देव' से अर्थ होता है- ऊँची चेतना का व्यक्ति, ये मौलिक अर्थ है देव का। और 'देवता', आपको सुनकर थोड़ी-सी हैरत होगी, वास्तव में स्त्रीलिंग होता है संस्कृत में। ये तो काल की बात है, भाषा की विकृति है कि धीरे-धीरे चल के 'देव' और 'देवता' एक हो गए, एक-दूसरे के पर्याय बन गए, नहीं तो देव से आशय होता है-ऊँची चेतना। तो आप इंद्रदेव कह सकते हो, आप रुद्रदेव कह सकते हो, आप किसी बहुत ऊँचे व्यक्ति को भी कह सकते हो, “हे देव!”, और 'देवता' स्त्रीलिंग होता है। ठीक है?

देवता से क्या अर्थ होता है? देवता से अर्थ होता है-प्रकृति में मौजूद किसी भी तरह की शक्ति, उसको बोलते हैं देवता। और प्रकृति में तो हज़ार तरह की शक्तियाँ हैं। तुम पलक झपका रहे हो ये भी क्या है? प्रकृति में मौजूद एक शक्ति है, तो पलक झपकाने के नाम से एक देवता का निर्माण किया जा सकता है। निर्माण करने से मेरा अर्थ है एक देवता को प्रतीक तौर पर उसकी प्रतिमा बनाई जा सकती है, कि ये वो देवता हैं जो शरीर को पलक झपकाने की शक्ति देते हैं।

या कि तुम विचार करते हो, और विचार करना प्रकृति में निहित एक शक्ति है। या तुम जन्म देते हो, या तुम चलते हो, या तुम ठहर जाते हो, या तुम्हारे भीतर प्यास उठती है, या तुममें क्रोध उठता है, या तुममें करुणा उठती है; ये सब प्रकृति में निहित शक्तियाँ हैं। या तुम आँख खोलकर के देख पाते हो, या तुम्हें कानों में सुनाई देता है; इन सब के नाम से देवता हो सकते हैं। तो ये हैं देवता।

तो कहा जा रहा है, "जो रुद्र, इंद्र आदि देवताओं को उत्पन्न करता है" माने जो प्रकृति को उत्पन्न करता है; देवता माने प्रकृति। प्रकृति को ही जब इस दृष्टि से देखा जाता है कि, “बाप रे! कितना कुछ कर लेती है प्रकृति, अहं पर कितने तरह के प्रभाव डाल लेती है प्रकृति,” क्योंकि प्रकृति जो कुछ भी कर रही है किसके प्रति कर रही है? कौन है प्रकृति के तमाम प्रभावों का अनुभव करने वाला? अहं। तो अहं जब अनुभव की दृष्टि से प्रकृति को देखता है तो उसको बोलता है 'शक्ति'। प्रकृति अहं को तरह-तरह के अनुभव कराती है, जब इस दृष्टि से अहं देखता है प्रकृति की ओर तो उसको बोल देता है 'शक्ति'। और प्रकृति अहं को तरह-तरह के भ्रम भी देती है, जब इस दृष्टि से अहं देखता है प्रकृति को तो उसको बोल देता है 'माया'।

तो शक्ति कितने प्रकार की हो सकती है? जितने प्रकार के तुम्हें अनुभव हो सकते हैं। ये तुम्हें जितने प्रकार के अनुभव हो सकते हैं, ये सब देवता हैं; प्रकृति तुम्हें जितने प्रकार के अनुभव करा सकती है वो सब देवता हैं। कुछ देवताओं का नामकरण कर दिया गया है, कुछ का नहीं किया गया है। तुम और अगर विस्तार में जाना चाहो तो तुम और भी देवताओं का नामकरण कर सकते हो।

हर अनुभव जो तुम्हें प्रकृति कराती है, देवता उसका प्रतीक है।

बात समझ में आ रही है?

तो जब कहा जा रहा है कि "वो एक परमात्मा मात्र है जिसने इंद्र, रूद्र आदि सभी देवताओं को पैदा किया है”, तो आशय बस यही है कि प्रकृति, माने ये जो द्रष्टा और दृश्य का द्वैतात्मक खेल है पूरा, ये आया है किसी एक अद्वैत से। प्रकृति परमात्मा से आई है इसका अर्थ क्या है, कि द्रष्टा और दृश्य का जो पूरा खेल है इसके आधार में अद्वैत बैठा हुआ है। क्योंकि प्रकृति माने क्या? प्रकृति माने वही सब न, जो तुम कहते हो तुम्हें दिखाई देता है? तो प्रकृति माने, ये जो खेल चल रहा है पुरुष और प्रकृति का।

प्रकृति किसके लिए है? पुरुष के लिए। तो जब भी तुम बोलो, “प्रकृति किसने बनाई?” तो वास्तव में तुम एक बात छुपा गए, क्या? कि, “पुरुष किसने बनाया?” क्योंकि तुम न होते तो कौन पूछता परमात्मा से कि प्रकृति किसने बनाई? प्रकृति क्या खुद कह रही है कि “मैं हूँ”? ये खंभा है प्रकृति, ये खुद कह रहा है “मैं हूँ”? पेड़ है प्रकृति, पेड़ यदि अकेला हो बिलकुल, पेड़ मात्र, तो क्या वो कहेगा कि वो है? सूरज या चाँद किसके होने से हैं, तुम्हारे होने से हैं न? क्योंकि तुम उनके द्रष्टा हो, तुम उनके अनुभोक्ता हो।

तुम विषयेता हो, प्रकृति विषय है। तुम्हें ही कभी पुरुष कह दिया जाता है, कभी कह दिया जाता है पराप्रकृति। विषय को ही कभी प्रकृति कह दिया जाता है, और कभी अपराप्रकृति। तो जब हम कहते हैं, "प्रकृति है। ये दुनिया किसने बनाई? ये ब्रह्मांड है, कहीं से तो आया होगा न, किसने बना दिया? ये ज़मीन, ये आसमान, ये चाँद, ये तारे, ये सब किसने खड़े कर दिए?" तो उसमें हम कौन-सी बात नहीं पूछते? वही बात जो अहंकार अक्सर पूछना भूल जाता है, "मैं कहाँ गया? मैं कौन हूँ?"

वो कहानी याद है न, कि दस जने एक नाव से उतरे हैं, पिये हुए, ठीक है? और अब वो गिनना चाहते हैं कि रास्ते में कोई टपक तो नहीं गया नदी में, तो वो सब गिनना शुरू करते है। जो ही गिन रहा है वो ही कितने गिन रहा है? नौ। अब राघव (सामने बैठे स्वयंसेवी की तरफ़ इशारा करते हुए) को गुस्सा आता है, बोलता है, "तुम सब अनपढ़ हो, मैं आई.आई.टी. (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान) से हूँ, मैं बताता हूँ।" वो गिनता है, बोलता है, “सही गिनती करूँगा,” आते नौ ही हैं। फिर घपला करता है, बोलता है, “नहीं, दस हैं।“ बोलता है, “एक उधर गया झाड़ के पीछे।“

लेकिन तुम चालाकी कितनी भी दिखा लो, गलती तो वही है न जो अहं हमेशा से करता आया है? क्या? खुद को नहीं देखता। तो हम भी जब पूछते हैं, “दुनिया किसने बनाई?” तो ये नहीं पूछते कि, “इस दुनिया की बात करने वाला मैं कौन हूँ, उसको भी तो पूछ लूँ, उसको किसने बनाया?” तो बेटा, तुम दोनों को साथ ही बनाया गया है; दुनिया को और दुनिया को देखने वाले को। यही जोड़ा चल रहा है लगातार, दृश्य और द्रष्टा का; यही जोड़ा चल रहा है। इस जोड़े को जैसे ही एक साथ देखोगे, बिलकुल समझ में आ जाएगा इस जोड़े के आधार में क्या है।

दुनिया समझ में नहीं आती तो वजह सिर्फ़ एक है, दुनिया को देखने वाले को भूल जाते हो दुनिया को देखते वक्त। और दुनिया को समझने का सूत्र भी बस यही है, दुनिया को जब देखो तो दुनिया को देखने वाले को भी उसी समय, तत्क्षण याद रखो; दुनिया पूरी समझ में आ जाएगी, कोई राज़ रहेगा ही नहीं।

दुनिया समझ में आ गई, दुनिया को देखने वाला याद रह गया, तो परम सत्य में प्रवेश कर गए तुम।

फिर ये सब नहीं पूछोगे, कि, “बनाने वाला कौन है? परमात्मा, परमेश्वर कौन है?” ये सब सवाल ही मिट जाएँगे; वो सवाल ही इसलिए आते हैं क्योंकि दुनिया को नहीं समझते।

जो दुनिया को समझ गया, जो संसार को जान गया, वो पूछेगा नहीं कि सत्य क्या होता है। सत्य के बारे में हम इतनी जिज्ञासा करते ही इसीलिए हैं क्योंकि सत्य से पहले हमें संसार का ही कुछ पता नहीं।

कुछ आ रही है बात समझ में?

“खंभा किसने बनाया?” पागल! खंभा है ही नहीं, तू पिये हुए है; तो खंभा ठीक उसी ने बनाया जिसने तुझे पिलाई।

समझ में आ रही है बात?

तुम्हें कैसे पता दुनिया है? वो तो तुम कहते हो, "साहब! हमें दिख रही है तो है ही।" तो ये तो हम बताएँगे ही नहीं कि "व्हाट इज़ द सोर्स ऑफ माय असर्शन?” (मेरे अभिकथन का स्रोत क्या है?) हम कहेंगे, “दुनिया तो है ही, ये तो पूछने की ही बात नहीं है कि दुनिया है या नहीं है।“ दुनिया क्यों है? “हमें दिख रही है।“ तो ये तो सवाल ही नहीं है कि दुनिया दिख रही है, है भी कि नहीं? दुनिया तो है, हमें दिख रही है। अब सवाल बस एक बचता है, क्या? ये बनाई किसने?

तो अब ये पूछ रहे हैं, “बनाई किसने?” कोई जवाब आ नहीं रहा। जवाब जब आ नहीं रहा है तो मनगढ़ंत कहानियाँ उछाल रहे हैं, “वो एक रविवार को गॉड * (भगवान) अकेला बैठा हुआ भुट्टा चबा रहा था, तो कहा कुछ कर लेते हैं, तो * टॉर्च (मशाल) निकाला एक, कुछ किया, फिर बोला, ऐसे कर लें, वैसे कर लें। हड्डी तोड़ दी, दातुन कर लिया उससे। जब दातुन कर रहा था तो थूका तो उससे आदमी पैदा हो गया, उसके बाद जीभ साफ करी, थूकी, तो उससे औरत पैदा हो गई, दोनों नाचने लग गए..." बना लो कहानियाँ।

इन सारी कहानियों को बनाने के पीछे जो मूल अज्ञान है वो किसके बारे में है? 'मैं' के बारे में, 'अहं' के बारे में। और वो अज्ञान नहीं है, वो अहंकार है, जो कह रहा है, "मुझे अपने बारे में कोई जिज्ञासा करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि मैं तो हूँ ही; मेरा होना निर्विवाद है। मेरे बारे में कोई जिज्ञासा की नहीं जा सकती, मेरा मुद्दा सुलझा हुआ है। मेरी फाइल (दस्तावेज) बंद है, मेरा मैटर (मामला) क्लोज़्ड (बंद) है।"

जहाँ सब कुछ पहले से ही तय है, निश्चित है, समाप्त है, जाना हुआ है, ज्ञात है, वहाँ जिज्ञासा ही क्यों की जाए? तो इसीलिए अहं अपने बारे में कभी जिज्ञासा नहीं करता। जब हम कहते हैं न, कि हम अपने बारे में कितना कम जानते हैं, कहते हैं न? नहीं, वो इसलिए नहीं कि हम अपने बारे में वाकई कम जानते हैं, वो इसलिए क्योंकि हमें लगता है कि हम अपने बारे में सब कुछ जानते हैं; जब तुम अपने बारे में सब कुछ जानते हो तो पूछोगे क्यों? फिर तुम दुनिया भर की चीज़ों के बारे में पूछोगे। तुम पूछोगे, “तुर्की में फलाना झरना कहाँ है?” लेकिन ये नहीं पूछोगे कि सोते समय सिर्फ़ बाईं करवट क्यों सोते हो तुम, कारण शारीरिक ही है क्या? पूछना ही नहीं चाहोगे, क्योंकि भीतर कूट-कूटकर ये विश्वास भर लिया है कि, “अपने मुद्दे तो सब सुलझे हुए हैं, अपने बारे में तो मैं सब जानता ही हूँ।“ हो गई न गलती?

“परमात्मा ने प्रकृति को बनाया”, माने? कई बार दोहरा रहे हैं, परमात्मा ने प्रकृति के भीतर जो दोनों चीज़ें हैं उनको बनाया। प्रकृति एक नहीं है, प्रकृति में दो हैं; कौन-कौन दो हैं? जड़ और चेतन। जड़ और चेतन माने? जड़ है दृश्य, चेतन है द्रष्टा; तो परमात्मा ने इन दोनों को बनाया। इन दोनों को बनाया से क्या आशय है? कि दो चीज़ें एकसाथ बन रही हैं, एक बना रहा था, साथ में दूसरा बायप्रोडक्ट (सह-उत्पाद) की तरह बन गया होगा; कुछ ऐसा हुआ है क्या? तो क्या हुआ है? कुछ नहीं हुआ है।

बात सीधी-सी ये है कि, “मैं हूँ जिसे लगता है दुनिया है, और मैं अगर गौर से इस दुनिया को देखलूँ तो मुझे अपने और दुनिया के मध्य जो भेद दिखाई देता है वो भेद दिखाई देना बंद हो जाएगा।“ इस भेद का मिट जाना ही परमात्म अवस्था है।

समझ में आ रही है बात?

ये जिज्ञासा ही किसको है कि प्रकृति है, किसको है? मुझे है। तो सबसे पहले मैं अपने और प्रकृति के संबंध की बात करूँगा, मैं अहं और संसार के संबंध की बात करूँगा; और अगर ये संबंध सुलझ गया तो इस सुलझाव को ही समाधि कहते हैं, इस सुलझाव को ही परमात्मा कहते हैं।

स्पष्ट हो रही है बात?

दोहराओ, अभ्यास करो, बार-बार समझो! “परमात्मा ने प्रकृति को बनाया”, इसका क्या अर्थ है? फिर से, अपने मन में समझने की कोशिश करो बार-बार, बार-बार। इस पूरे प्रसंग में परमात्मा गौण है, परमात्मा की बात कोई विशेष लाभप्रद नहीं; क्या पूछेंगे हम? हम कहेंगे, “परमात्मा ने प्रकृति को बनाया ये तो कल्पना मात्र है। तथ्य ये है कि मुझे प्रकृति दिखाई दे रही है; मुझे प्रकृति दिखाई दे रही है तो मैं कल्पना कर रहा हूँ कि इसको किसी ने बनाया होगा। तो परमात्मा ने प्रकृति को बनाया ये क्या है? कल्पना। मुझे प्रकृति दिख रही है ये क्या है? तथ्य। तो पहले मैं इस तथ्य की खोजबीन तो करलूँ न?” तो जब तुम इस तथ्य की ठीक से छानबीन कर लेते हो तो कल्पना अपने आप मिट जाती है; कल्पना भी मिट जाती है और जो चीज़ तुम्हें तथ्य जैसी लग रही है वो चीज़ भी मिट जाती है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब बोलते हैं, “मैं”, तो कोई और इकाई है जो बोल रहा है, “मैं”। तो वो इकाई क्या है?

आचार्य: उसके पीछे कोई इकाई नहीं है; उसके पीछे शून्य है एकदम, एक विस्तृत आकाश है।

उस आकाश से 'मैं' तो लीला की तरह उद्भासित होता है, पर 'मैं' को ये लगता है कि वो अपने आप में एक निजी, स्वतंत्र, मुक्त इकाई है, व्यक्तित्व है; उस 'मैं' के पीछे कोई और इकाई नहीं है। सब अनुभवों के पीछे 'मैं' है और 'मैं' के पीछे कोई इकाई नहीं है। 'मैं' के पीछे चले गए तो आकाश है, मुक्ति है; पर 'मैं' के पीछे जाना ही 'मैं' के लिए बड़ी चुनौती रहती है।

प्र: तो मुझे जो फ़ील (महसूस) होता है, अनुभव होता है वो किसको होता है?

आचार्य: जिसको आप अपना अनुभव कह रहे हैं वो वास्तव में प्रकृति में, माने आपके विषय में घटती कोई घटना है जिसको आप अपना नाम दे रहे हैं।

तो अहं है, अहं अपने आप में कोई वस्तु तो है नहीं। जब अहं वस्तु नहीं है तो अहं को नहीं दर्द होता। अहं जिन चीज़ों से जुड़ा हुआ है घटनाएँ तो वहाँ घट रही हैं, अहं में कोई घटना नहीं घटती; अहं में बस एक चीज़ चलती रहती है, क्या? तादात्म्य, * आइडेंटिफिकेशन * (पहचान)। तो दर्द भी वास्तव में कहीं और हुआ है; दर्द एक घटना है जो कहीं और घटी है, जिसे अहं ने ले लिया है अपने ऊपर। और जब अहं किसी चीज़ को अपने ऊपर ले लेता है तब अहं की दुनिया में खलबली मच जाती है, या ये कहिए कि तब जहाँ खलबली मच रही होती है वो अहं की दुनिया बन जाती है; अन्यथा अहं के पास कोई दुनिया ही न होती।

और दुनिया में तो हज़ार जगह खलबली मच ही रही है। उस खलबली मचती हुई दुनिया से जब रिश्ता जोड़ लेता है अहं; रिश्ता ही नहीं जोड़ लेता, उसके साथ अपना नाम ही जोड़ लेता है, वही बन जाता है, तो दुनिया की खलबली अहं की खलबली बन जाती है। जो कुछ हो रहा है वो दुनिया में हो रहा है; दुनिया माने प्रकृति, वो वहाँ हो रहा है; दुनिया में होती घटनाओं को अहं मान लेता है कि उसकी घटनाएँ हैं।

प्र: अहं निजी होता है या यूनिवर्सल (सार्वभौमिक)?

आचार्य: आपका है, निजी है, आपका है।

अहं जिस चीज़ के साथ जुड़ा है वही उसकी पहचान है। यूनिवर्सल अहंवृत्ति होती है; कि आपने अपने कुर्ते से अपनी पहचान जोड़ रखी है, उसने अपने कुर्ते से उसकी पहचान जोड़ रखी है। वो जो कुर्ता है वो तो निजी ही है; आपका कुर्ता उसका कुर्ता नहीं हो सकता, लेकिन कुर्ते से पहचान जोड़ने की जो वृत्ति है वो यूनिवर्सल है।

दुनिया में कोई ऐसा जीव नहीं है जो अपने शरीर से पहचान नहीं जोड़े बैठा; और शरीर ही पहला कुर्ता है। एक छोटा चूहा हो, अमीबा हो, आसमान में उड़ता बाज़ हो चाहे ज़मीन पर बैठा इंसान, इन सबने अपनी पहली पहचान किस से जोड़ रखी है? शरीर वाले कुर्ते से। तो कुर्ता तो सबका अलग-अलग ही है लेकिन पहचान जोड़ने वाला काम सभी कर रहे हैं, वो काम साझा है, वैश्विक है।

और कुर्ता भी अलग-अलग बस ऊपर-ऊपर से है। बुल्लेशाह की मानेंगे तो, "बस एक्को रंग कपाईदा।" कुर्ता तो कपास का ही है दोनों का, ठीक वैसे जैसे सबका ये कुर्ता (शरीर की तरफ़ इशारा करते हुए) काहे का है? हाड़-मांस का ही है। ऊपर-ऊपर के अंतर हैं, अंदर-अंदर तो वही है सबका कुर्ता, क्या फ़र्क है? तो ये कुर्ते के ऊपर के रंग हैं; बस इन्हीं से दुनिया दिग्भ्रमित है।

प्र: जैसे जो मेरा अहं है उसी अहं के कारण मेरे को लगता है कि हर किसी का अहं है, ऐसा भी है? नहीं तो अगर वो न हो तो वास्तव में सब तो मिट्टी ही होता है।

आचार्य: नहीं, आपका अहं है इसीलिए आप दूसरों के अहं की वास्तविकता को ठीक से देख नहीं पाते।

अहं की पहचान क्या है? अहं की पहचान ये है कि वो सर्वज्ञ हो सकता था, आत्मा के तौर पर, पर उसने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली है पट्टी से तादात्म्य करके। तादात्म्य माने? *आइडेंटिफिकेशन*। अहं समझ लीजिए ऐसा जिसके हर तरफ आँखें-ही-आँखें, तीन आयाम क्या, जिसकी दस आयामों में आँखें हों; आत्मा उसका स्वरूप है। लेकिन उसने किसी बहुत छोटी-सी चीज़ से बड़ा गहरा लगाव कर लिया है, वो छोटी-सी चीज़ क्या है? ये है (अपने बगल में रखे तौलिए को उठाते हुए)। और उसी से लगाव करके उसे ऐसे बाँध लिया (अपनी आँखों को तौलिए से ढकते हुए), अब उसे कुछ दिखाई नहीं देता। इसीलिए अहं का मतलब होता है अज्ञान; जान ही नहीं पाओगे, दिखाई ही नहीं देगा।

किसी एक चीज़ के इतने निकट आ गए हो कि उस चीज़ ने तुम्हारी देखने की क्षमता ही खत्म कर दी, तो अब दूसरे का अहं आप समझ ही नहीं पाएँगे; आपको दूसरे का अहं अनुभव हो जाएगा अपने अहं के संदर्भ में, पर आप दूसरे के अहं के साक्षी नहीं हो पाएँगे। कैसे? बताता हूँ। दूसरा आकर के क्रोध में आपको गाली देगा, आपको उसके अहं का अनुभव हो जाएगा, क्योंकि आपके अहं को चोट पड़ जाएगी। आपको उसके अहं का कैसे अनुभव हुआ? अपने अहं पर चोट खाकर के। तो आपको उसके अहं का कुछ अनुभव तो होगा, इस तरीके से कि आपके अहं पर चोट पड़ गई इसलिए, पर आप उसके अहं के साक्षी नहीं हो पाएँगे। ये नहीं हो पाएगा कि वो गाली दे रहा है और आप साफ़ देख रहे हैं कि चल क्या रहा है मामला, उधर क्या चल रहा है और इधर भी क्या चल रहा है; नहीं देख पाएँगे।

जैसे कि तुमने पट्टी बाँध रखी है (अपनी आँखों पर फिर से तौलिया रखते हुए), और कोई आकर के पट्टी पर धट से एक धौल मारदे, ऐसे (आँखों के ऊपर रखे तौलिए के ऊपर मारते हुए), तो कुछ अनुभव तो होगा पर क्या हुआ ये समझ पाओगे क्या? ऐसे ही हम जीते हैं। हमें कुछ ऐसे अनुभव तो होते हैं जैसे घने कोहरे में एक साया आया और हमें छूकर निकल गया,ऐसा अनुभव तो होता है, पर वास्तव में हुआ क्या कुछ पता नहीं चलता; हम टटोलते रह जाते हैं, ऐसे, कुछ डरे हुए से, कुछ-कुछ शंकित से। वास्तव में क्या हुआ वो पता नहीं चलता; कुछ हो जाता है।

और यही जो फिर हमारा अज्ञान होता है, हम इसके गीत भी गा लेते हैं- "अजनबी कौन हो तुम? जबसे तुम्हें देखा है सारी दुनिया मेरे आँचल में सिमट आई है।" शुरुआत ही किस बात से हो रही है? कि भाई जिसको देखा है वो अजनबी है, वो है कौन ये समझ में नहीं आ रही है बात। बिलकुल नहीं समझ में आ रही है बात कि कौन है, लेकिन इसी बात के मज़े लिए जा रहे हैं- "अजनबी कौन हो तुम? जबसे तुम्हें देखा है सारी दुनिया मेरी आँखों में उतर आई है।" ये लो, आँखें बंद हैं और दुनिया आँखों में उतर आई है।

ऐसे ही प्यार भी हो जाता है, और कोई पूछता है कि “क्या है? क्या हुआ है?” तो क्या बोलते हो? "वो, कुछ हुआ है, वो बताई नहीं जा सकती बात। प्यार तो चीज़ ही ऐसी है जिसके बारे में कुछ बताया नहीं जा सकता।" माने? भूत-प्रेत से प्यार कर रहे हो क्या कि उसके बारे में कुछ बताया नहीं जा सकता? प्रेम का तो अर्थ होता है- जानना। ये कौन-सा प्यार है जिसमें तुम्हें कुछ पता ही नहीं चल रहा है कि क्या हो रहा है, प्यार है कि नशा?

तो जवाब क्या आता है? "नशा ही तो प्यार है।"

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