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उत्कृष्टता का स्रोत है आनंद || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2012)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: अ फ़्री विल (मुक्तेच्छा) माने उसका कर्म उसकी समझ से निकलता है। ही अंडरस्टैंड्स एंड फ़्रॉम दैट अंडरस्टैंडिंग, हिज़ एक्शंस अराइज़। एंड देन, देअर इज़ नो क्वेश्चन ऑफ़ लैक ऑफ़ कॉन्सेंट्रेशन, देअर इज़ नो क्वेश्चन ऑफ़ टाइम मैनेजमेंट। (वो समझता है और उसका कर्म उसकी समझ से निकलता है। और फिर वहाँ एकाग्रता की कमी को लेकर कोई सवाल नहीं रहता, समय प्रबन्धन को लेकर कोई सवाल नहीं रहता।)

व्हेयरएज़ अ स्लेव एक्ट्स अकॉर्डिंग टु द इन्फ़्लुएंसेस ऑन हिम ऑर हर। उसके (ग़ुलाम) ऊपर समाज के, परिवार के, बाहरी शक्तियों के क्या प्रभाव हैं, वो उसके मुताबिक़ काम करता है। इसी कारण वो कुछ भी पूर्णता से नहीं कर सकता, उसे कुछ भी करने में आनन्द नहीं आता, वो कहीं पहुँच नहीं पाता।

देखिए, एक्सीलेंस कम्स फ़्रॉम एन्जॉयमेंट (उत्कृष्टता आनन्द से आती है)। अगर आज हम ये पाते हैं कि हम न सिर्फ़ एकेडमिकली मीडियोकर (शैक्षणिक रूप से औसत दर्जे के) हैं — हममें से ज़्यादातर लोग जो यहाँ बैठे हैं, ईमानदारी की बात की जाए — जो हमारा एकेडमिक रिकॉर्ड (शैक्षिक अभिलेख) है, पचास पर्सेंट से पचहत्तर पर्सेंट के बीच का है। दसवीं, बारहवीं, यूनिवर्सिटी में वैसा ही है। पचास से पचहत्तर का जो रेंज है, उसी में हैं हम सब। तो एकेडमिकली हम मीडियोकर्स हैं। इतने बुरे भी नहीं हैं कि फ़ेल ही फ़ेल होते रहे हों और इतने अच्छे भी नहीं हैं कि एक्सीलेंस (उत्कृष्टता) मिल गयी है। इसी को मीडियोक्रिटी (औसत दर्जे का होना) कहते हैं।

बात समझ में आ रही है?

इसी तरीक़े से स्पोर्ट्स में ले लीजिए, तो वहाँ भी हम मीडियोकर्स हैं। मैं बिलकुल समझता हूँ, यहाँ कोई ऐसा नहीं बैठा होगा जिसके पास स्टेट लेवल या इस तरह का कुछ हो। होगा भी तो डेढ़ सौ में कोई दो जन होंगे, हद से हद! कल्चरली (सांस्कृतिक रूप से) भी हमने कुछ ऐसा कभी नहीं कर लिया, डांस, ड्रामा, थिएटर, डेक्लेमेशन (भाषण प्रतियोगिता), कुछ भी नहीं। लेखन में भी हमने कभी कोई तीर नहीं चला लिया, वहाँ भी एक्सीलेंस हमें हाथ नहीं लगी है।

कारण क्या है? कारण ये है कि एक्सीलेंस कम्स फ़्रॉम एन्जॉयमेंट। और एक स्लेव (ग़ुलाम) कभी वर्तमान को एन्जॉय नहीं करता, वो जो भी कर रहा होता है, उसे वो मजबूरी के कारण कर रहा होता है, किसी और की इच्छास्वरूप कर रहा होता है। न वो एन्जॉय करता है, न वो एक्सेल (उत्कृष्टता हासिल करना) कर पाता है। सिर्फ़ वही एक्सीलेंट हो सकता है जो अपना मालिक हो, जो वो कर रहा हो जो करने में उसे आनन्द आता है। और आनन्द तब आएगा जब आप वो कर रहे हों जो आपकी समझ से निकला हो।

चूँकि हम समझते नहीं हैं, इसीलिए हम एक बड़ी उदास सी ज़िन्दगी बिताते हैं, जो दूसरों के इशारों पर नाचती है, जाने या अनजाने, कॉन्शियसली या अनकॉन्शियसली। और उसमें हमारा अपना कुछ नहीं होता। मूल स्थिति वो है, उस स्थिति का एक सिम्प्टम है, एक लक्षण है लैक ऑफ़ टाइम मैनेजमेंट (समय प्रबन्धन की कमी)। टाइम मैनेजमेंट को समस्या मत समझना, वो सिर्फ़ एक लक्षण है। वो एक लक्षण है कि कोई गहरी बीमारी है। अन्तस में कोई गहरी बीमारी बैठी हुई है और वो गहरी बीमारी यही है कि मैं जीवन को जान नहीं रही हूँ, बस जिये जा रही हूँ। वही हम सब की कहानी है।

फिर इसके ये सब छोटे-छोटे लक्षण पैदा होते हैं। उसके लक्षण आपको बता देता हूँ। अगर आप पायें कि आप दिन में अक्सर बोर रहते हैं, पहला लक्षण। अगर आप पायें कि खुशी, वास्तविक जॉय (आनन्द) आपसे दूर-दूर रहता है, अगर आप पायें कि आप किसी भी काम में एक्सीलेंट नहीं हैं, अगर आप पायें कि आपके मन में अक्सर एक डर या ख़ौफ़ की भावना रहती है, तो इस सब का अर्थ यही है कि आप जीवन को बिना समझे जिये जा रहे हैं। ये सब लक्षण हैं, ये अपनेआप में कोई बीमारियाँ नहीं हैं, ये लक्षण हैं।

मूल बीमारी सदा एक होती है — जीवन को न जानना। और जानते हम क्यों नहीं हैं, इसका भी कारण बड़ा हास्यास्पद है। हम जानते इसलिए नहीं हैं क्योंकि हमने जानकारी उधार ले ली है। जिसने पहले ही ये मान लिया कि मैं जानता हूँ, वो कैसे जान पाएगा! बचपन से ही आपको जीवन के बारे में जानकारी उधार दे दी गयी है। माँ-बाप, समाज, परिवार, शिक्षा, मीडिया , कॉरपोरेशंस (व्यापारसन्ध), धर्म, फ़िलोसॉफ़ी (दर्शन) इन सबने आपके मन में जीवन का एक चित्र खींच दिया है, जिस कारण आपको ये भ्रम हो गया है कि जीवन क्या है वो हम जानते हैं।

आप कहेंगे, 'जीवन क्या है? जीवन रेस्पॉन्सिबिलिटी (ज़िम्मेदारी) है। जीवन और क्या है? जीवन बड़ों को आदर देना है। जीवन और क्या है? जीवन अपने दायित्वों का पालन करना है। जीवन और क्या है? जीवन अच्छा नागरिक बनना है। जीवन और क्या है? जीवन सचरित्र होना है। जीवन और क्या है? जीवन सुशीलता है। जीवन और क्या है? जीवन कड़ा श्रम है। आपने जीवन के बारे में ये सब धारणाएँ उधार ले ली हैं। तो ये सब आपको बचपन से पढ़ाया गया और आपने बस कहा कि हाँ, बड़े लोग हैं, अच्छे लोग हैं। आप कर भी क्या सकते थे, छोटे थे इतने, निर्भर थे उन पर।

और जो आपको बता रहे थे, उनकी भी ग़लती नहीं थी, वो ख़ुद नहीं जानते। वो बेचारे ख़ुद नहीं जानते! अन्धे दूसरों को राह दिखा रहे हैं! (आचार्य जी व्यंग्य करते हुए)

(श्रोतागण हँसते हुए)

और वो आपको बताते गये और आप जीवन के बारे में ये सब धारणाएँ अपने मन में पालते गये। नतीजा ये है कि जो जीवन स्पष्ट है, सामने है, आप उसको भी नहीं देख पाते। बस एक दिन लगाइए, एक दिन, और सुबह से शाम तक अपने जीवन पर ध्यान दीजिए, आपको दिख जाएगा जीवन क्या है। उसके बाद ये सारी बातें समझ में आ जाएँगी और उसके बाद उन सब बातों की बेवकूफ़ी भी दिखायी दे जाएगी जो हम मन में पाले बैठे रहते हैं। बातें समझ में आ रही हैं?

जीवन कोई बहुत दूर की चीज़ तो नहीं है जो जाकर समझनी है। जीवन का अर्थ तो वही है जो अभी हो रहा है, इसी समय। पर हम इसकी ओर ध्यान नहीं दे पाते, क्योंकि हमें ये बता दिया गया है कि दोस्त बहुत प्यारी चीज़ होती है और दोस्त का अर्थ है वो जो, जब लेक्चर चल रहा हो तो हमें डिस्ट्रैक्ट (विचलित) होने में मदद करे। ये तुम नहीं बोल रहे हो। तुम कठपुतली मात्र हो। ये तुम्हारी परवरिश बोल रही है जिसने तुम्हें सिखाया है। तुम मूवीज़ देखने जाते हो, उसमें तुम्हें दिखाया जाता है कि जो हीरो है — ये कौनसी मूवी में होता है कि हीरो बड़ा मेधावी छात्र है जो ध्यान से सुन रहा है — हर मूवी में यही होता है कि हीरो जो है, वो कॉलेज का गुंडा है, जो कॉलेज में इसलिए आता है क्योंकि उसे अपनी पत्नी की तलाश है।

(श्रोतागण ज़ोर से हँसते हुए)

तुम्हारे मन में धारणाएँ बैठ गयी हैं कि मैं स्मार्ट तब कहलाऊँगा जब मैं कॉलेज में आऊँ और बिलकुल कॉलर-वॉलर ऐसे करके घूमूँ और लड़कियों के बीच में बिलकुल प्रसिद्ध हो जाऊँ। ये आये कैसाब्लांका (कासानोवा)! और हैं क्या कैसा ब्लांका , वो सब जानते हैं, एक घुड़की दो तो वहीं पर बिलकुल!

(श्रोतागण हँसते हुए)

तुम्हारी ग़लती नहीं है, तुमने पिक्चरें ही ऐसी देखी हैं। ये सब जो मन की कंडीशनिंग (संस्कार) होती है न, वो इन्हीं सब प्रभावों से होती है। तुम क्या देख रहे हो, क्या सुन रहे हो, कहाँ उठ-बैठ रहे हो, किस समाज से आये हो, क्या कहानियाँ तुम्हारे कान में पड़ रही हैं, क्या तुम अख़बारों में पढ़ रहे हो, क्या तुम टीवी पर देख रहे हो, इन्हीं सब से हमारे मन का निर्माण हो जाता है और हम सोचते हैं यही जीवन है। और हम समझने की कोशिश भी नहीं करते कि अपनी दृष्टि से एक बार साफ़-साफ़ देखें तो कि क्या ये जीवन है। हम सोचते हैं हम मस्त हैं। अगर हम मस्त होते तो हम ऐसे होते! एक आईना लेकर अपनी शक्ल देखने की बस ज़रूरत है। बुझी हुई आँखें! डरे हुए चेहरे! ये आनन्दपूर्ण जीवन की पहचान है?

एक बार ऐसे ही एक जगह था, तो एक बुज़ुर्ग मेरे साथ आये इंट्रोड्यूस कराने के लिए। बड़े स्कूल से थे पोस्ट ग्रेजुएट। तो उनका सूफ़ियाना अन्दाज़! इतनी लम्बी उनकी दाढ़ी! तो देखते हैं स्टूडेंट्स को ऐसे ही, बोलते हैं, ‘क्या चुसे हुए आम जैसी शक्ल बना रखी है!’ आम देखा है चुसा हुआ? चुसा हुआ आम देखा है कभी, जिसका सारा रस निचोड़ लिया गया हो? वैसी शक्ल है हमारी।

किसने निचोड़ लिया रस? कोई और नहीं उत्तरदायी है, हमारी धारणाएँ जिनको हम पवित्र मानकर बैठे हुए हैं। 'ये मुझे मेरे परमपूज्य परिवार ने, समाज ने, शिक्षा ने, धर्म ने बताया है या कि वो लोग जिनके पास बड़ी ताक़त है, पावर है, मीडिया , कॉरपोरेशंस , इन लोगों ने बताया है, तो इसलिए ये सच होगा ही।' उन सब बातों को हम मन में बैठाये हुए हैं।

प्रश्नकर्ता: डिस्ट्रैक्शंस (विचलन) से कैसे बचें?

आचार्य: पहली बात, ये कितने लोगों का प्रश्न है? कितने लोग ये पाते हैं कि अक्सर जीवन में कुछ सोच रहे होते हैं और पता भी नहीं चलता कि कब एक लहर आती है और हमें बहाकर ले जाती है? फिर बाद में लगता है, ओ शिट! मैं डिस्ट्रैक्ट (विचलित) हो गया था! ऐसा कितने लोगों के साथ होता है? तो मतलब सिर्फ़ एक का नहीं, कम-से-कम पचास लोगों का प्रश्न है। ठीक है? तो सब ऐसे ही सुनेंगे जैसे उन्होंने ही पूछा हो।

देखो, डिस्ट्रैक्शन पर हमने जो बोला था, पहले वाली बात कि एक नहीं, अनेक मालिक हैं हमारे, उसको ही अगर ठीक से समझ लिया जाए तो डिस्ट्रैक्शन समझ में आ जाएगा। डिस्ट्रैक्शन का अर्थ ही यही है कि मैं एक काम करने निकलता हूँ, कोई और प्रभाव आता है और वो मुझे उस काम से विमुख कर देता है। समझ रहे हो?

अगर मैं अपना मालिक हूँ, तो क्या ऐसा हो सकता है कि मैं जो करने निकला हूँ, कोई आये और मुझे उससे खींचकर कहीं और को ले जाए? ये नहीं हो सकता। पर ये होता है, होता इसलिए है क्योंकि हम जो कर रहे होते हैं, हमें उसकी पूरी समझ ही नहीं होती। हम वो सिर्फ़ किसी और के इशारे पर कर रहे होते हैं।

अगर तुम कोई काम बिलकुल डूबकर कर रहे होते हो, ध्यान में एकदम — कभी तो कुछ ऐसा करते होगे न, पूरी तरह से अपने लिए करते होगे आनन्द में — खेलते होगे, मान लो। कितने लोग हैं जिनको खेलना अच्छा लगता है कुछ-न-कुछ, क्रिकेट, फ़ुटबॉल या कुछ भी? जब तुम खेल रहे हो और पूरी तरीक़े से खेल में डूबे हुए हो, ठीक है? मान लो, एक मैदान है, उसमें पूरी तरह खेल में डूबे हुए हो और मैदान के बगल में एक रोड जाती है, रोड पर भैंसें घूम रही हैं और भें-भें कर रही हैं, तो कितने लोग डिस्ट्रैक्ट हो जाते हो? सुनायी भी पड़ता है? क्या सुनायी भी पड़ता है?

दूसरा सवाल, आठ से पाँच तक कॉलेज में रहते हो, मान लो, और पाँच से छ: फ़ुटबॉल खेल रहे हो, वास्तव में एनर्जी किस प्रोसेस में ज़्यादा लगती है, इस दस घंटे के प्रोसेस में जब कॉलेज में हो या उस एक घंटे में जब खेल रहे हो फ़ुटबॉल ?

श्रोतागण: जब खेल रहे हैं फ़ुटबॉल।

आचार्य: जब खेल रहे हो तब ज़्यादा एनर्जी खर्च करते हो, पर क्या थकान अनुभव होती है? क्या बोलते हो कि अरे! थकान बहुत हो रही है, डिस्ट्रैक्ट हो रहा हूँ?

श्रोतागण: नहीं।

आचार्य: बीच में दर्द उठा या खेलते-खेलते अचानक देखा है कि फ़ुटबॉल लेकर तेज़ी से दौड़ते हुए जा रहे हैं, सामने गोल है, रुक गये, क्यों? खुजली हुई, डिस्ट्रैक्ट हो गये! पहले खुजा लें, उसके बाद गोल करेंगे! ऐसा हुआ है कभी? पर अभी क्लास में बैठे हो तो अपने भी खुजली कर रहे हो, पड़ोसी के भी खुजला रहे हो।

(श्रोतागण हँसते हुए)

ये क्या है, ये कहाँ से आ गया डिस्ट्रैक्शन ? अपने मन पर ध्यान दो, अपना ही जीवन है, मुझे नहीं खुजली हो रही, अपने जीवन पर ध्यान दो। ये डिस्ट्रैक्शन कहाँ से आया? ये डिस्ट्रैक्शन यहाँ से आया कि तुम जो कर रहे हो, उसमें पूर्णता में नहीं हो। जब गोल करने जा रहे हो न, तो सिर्फ़ गोल है, तो इसलिए खुजली हो, चाहे पाँव में ख़ून भी निकल रहा हो डिस्ट्रैक्ट नहीं होते हो। खेलते समय कभी ऐसा हुआ है, चोट लग गयी है, बाद में पता चला है कि अरे! चोट लग गयी थी? ऐसा भी होता है कि ख़ून तक निकल आता है और ध्यान नहीं देता आदमी। बाद में जाता है, बोलता है, ‘अरे यार! ख़ून निकल रहा है, उँगली छिल गयी।’ होता है कि नहीं होता है? तब क्यों नहीं डिस्ट्रैक्ट होते, जबकि ख़ून निकल आया है? और अभी किसी एक के ख़ून निकल आये तो पूरी क्लास डिस्ट्रैक्ट हो जाएगी, 'ख़ून!' (आचार्य जी विस्मय में चिल्लाते हुए)

(श्रोतागण हँसते हुए)

बच्चे खेल रहे होते हैं, उनके यहाँ-वहाँ मोच लगी है, ख़ून निकल रहा है, कोई कुछ नहीं कहता, क्योंकि वो जीवन जीने का एक तरीक़ा है। जब तुम खेल रहे हो, वो जीवन जीने का एक तरीक़ा है जिसमें आनन्द है, उल्लास है। जो कर रहे हो, उसमें पूरी तरह उतरे हुए हो, डूबे हुए हो। अगर पूरा जीवन ही ऐसा बिता सको जिसमें वर्क (काम) प्ले (खेल) बन जाए, अगर जीवन ही ऐसा बीत सके जिसमें वर्क प्ले बन जाए, देन लाइफ़ बिकम्स प्लेफ़ुल एंड देन देअर आर नो डिस्ट्रैक्शंस (फिर जीवन एक खेल जैसी हो जाती है और वहाँ कोई भटकाव नहीं रहता)। देन लाइफ़ बिकम्स प्लेफ़ुल। तब आप जीवन जीते नहीं हो, तब आप जीवन को ढोते नहीं हो, तब आप जीवन के साथ खेलते हो। क्या करते हो? खेलते हो।

इसका ये मतलब नहीं है कि जीवन बर्बाद कर लेते हो। खेलने का मतलब वो नहीं है कि "पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब, और खेलोगे-कूदोगे तो बनोगे ख़राब," ये सब मूर्खता की बातें हैं, "खेलोगे-कूदोगे तो होगे ख़राब!" नवाब वास्तव में वही बनते हैं जो जीवन के साथ खेलना जानते हैं, और आज तक वही बने हैं जिन्होंने जीवन को बहुत सीरियसली (गम्भीरता से) नहीं लिया है, जिन्होंने जीवन को आनन्द समझा है, क्रीड़ा समझा है। वही हैं जिन्होंने जीवन में वास्तव में कुछ पाया भी है, चाहे साइंस में, चाहे टेक्नोलॉजी में, चाहे धर्म में, ज्ञान में, किसी भी क्षेत्र में।

बात समझ में आ रही है?

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