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उठया यार ओ यार पुकार || आचार्य प्रशांत, संत बुल्लेशाह पर (2017)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: मुझे बचपन से सच्चे प्रेम की तलाश थी। मैंने कई आध्यात्मिक ग्रन्थ पढ़े। ख़ुद के साथ बैठने का प्रयास किया और जाना भी कि सच्ची शान्ति अपने में ही है। मैंने अलग-अलग दर्शन, अलग-अलग आध्यात्मिक साधना, थॉटलेस अवेयरनेस (निर्विचार जागरूकता) साइलेंस (मौन), नथिंग इज़ रियल (जगत मिथ्या), अनकंडिशनल लव (बेशर्त प्रेम) के विषय में जाना। मुझे महसूस होता है कि आध्यात्मिकता का अपना एक रस होता है।

पर फिर मेरा मन संसार की तरफ़ भी डोलता है। घर, ऑफिस और रिश्तों में ख़ुद को एलियन (अन्य लोकवासी) जैसे महसूस करती हूँ। लगता है कि सबसे कट ही जा रहे हैं तो ऐसी आध्यात्मिकता का क्या लाभ! और फिर थॉटलेस अवेयरनेस और अनकंडिशनल लव कहने मात्र को अच्छे लगते हैं, उनमें हमेशा रहा तो नहीं जा सकता। लगता है अभी शादी नहीं हुई इसलिए समझ नहीं आ रहा, कभी लगता है ऑफिस छोड़ दूँ। और फिर घरवाले भी इन सबको गड़बड़ ही बताते हैं। समझ नहीं आ रहा क्या करूँ। कभी लगता है अध्यात्म ठीक है, कभी लगता है घरवाले ठीक हैं। बस ऐसे ही ज़िन्दगी कट रही है।

आचार्य प्रशांत: भीतर और बाहर अलग नहीं होते, बस प्रकट और अप्रकट होते हैं। जो आंतरिक दुनिया होती है, जिसमें आप कभी ध्यान की चेष्टा करते हैं, कभी प्रेम की बात, कभी कुछ, कभी कुछ — क्या-क्या आपने बोला: थॉटलेस अवेयरनेस , साइलेंस , पीस (शान्ति) और लव और मेडिटेशन (ध्यान)…। तो ये सब जो अन्दर की बातें हैं, इन्हीं का प्राकट्य होता है, मेनिफेस्टेशन (अभिव्यक्ति) होता है बाहर की दुनिया में। भीतर अगर इश्क़ है तो वो बाहर आपकी ज़िन्दगी में दिखायी देगा।

”जिसदे अन्दर वसया यार, उठया यार ओ यार पुकार।“

~ बाबा बुल्लेशाह

अब ‘यार’ अगर भीतर है तो ज़बान पर भी फिर ‘यार’ होगा। तो भीतर है तो सुनायी नहीं देगा और ज़बान पर है तो सुनायी देगा। तो अलग-अलग थोड़े ही हैं। भीतर भी क्या है?

प्र: यार।

आचार्य: और ज़बान पर भी क्या है?

प्र: यार।

आचार्य: तो भीतर क्या है, उसकी तो बात बहुत की नहीं जा सकती, बताओ क्यों? न आँखों को वो दिखायी देगा, मन के भीतर बैठा हुआ है तो मन उसको सोच नहीं सकता। वो मन के नीचे है कहीं। वो मन का विषय होता तो मन उसको सोच वगैरह लेता, उसके बारे में कुछ कह देता। अब या तो वो मन के केन्द्र में है — कोई कहता है मन के बुनियाद में है, कोई कहता है मन के परे है। जैसे भी बोल लो। ये पक्का है कि मन के क्षेत्र से, मन के अधिकार क्षेत्र से कहीं अलग है।

तो भीतर का क्या चल रहा है मामला, उसका तो कुछ प्रत्यक्ष पता नहीं चल सकता, प्रत्यक्ष पता सिर्फ़ किसका चल सकता है? जैसी ज़िन्दगी चल रही है; जो बाहर का मामला है। बाहर का मामला अगर सधा हुआ है, बाहर का मामला अगर ठीक है तब हम विश्वास के साथ कह देते हैं कि इसके भीतर भी शायद परमात्मा उतर आया है। जीवन तुम्हारा तुम्हारे भीतर के सत्य का, परमात्मा का, शुद्धि का प्रमाण होगा।

मात्र जीवन ही मूल्यवान है, कसौटी है, प्रमाण है, उसके अलावा कुछ भी नहीं। आपने लाख किताबें पढ़ी होंगी, मुझे ज़िन्दगी बताइए। ज़िन्दगी में क्या हो रहा है? आपको बहुत व्याख्या आती होगी। आपने कहा अनकंडिशनल लव , बेशर्त इश्क़, मैं नहीं जानता वो क्या है। मुझे तो ये बताइए कि पड़ोसी से क्या रिश्ता है आपका? सड़क के कुत्ते से क्या रिश्ता है? अखबार में छपी ख़बर से क्या रिश्ता है? अपने शरीर से क्या रिश्ता है? दूसरे के शरीर से क्या रिश्ता है? बाज़ार में सजी, टँगी वस्तुओं से क्या रिश्ता है? ये बताइए न। उसके अलावा कोई अहमियत नहीं है।

थॉटलेस अवेयरनेस , क्या? आप जाइए उसमें और जितना आप जाएँगे उतना आपको पता चलेगा कि आप सोच रहे हैं। कोई अर्थ नहीं है इन मुहावरों का, ये जुमले हैं जुमले। ये उछाल दिये गये हैं और लोग इन्हें चबा रहे हैं — सत्य, शान्ति, मौन। ज़िन्दगी बताओ। वहाँ तो मुँह पर बारह बजे हुए हैं!

और अगर चेहरा खिला हुआ है तो हटाओ न सत्य को, हटाओ न शान्ति को, क्या करना है! क्या करना है? ध्यान पर भी क्यों बैठना है? जीवन खिला है कि नहीं? जीवन भरपूर है, वही आत्मा का नूर है और नूर है तो आत्मा होगी ही। बिना सूरज के प्रकाश कहाँ से आएगा? अब जीवन में प्रकाश है नहीं और सूर्य की उपासना कर रहे हो, मैं कहूँगा, ‘भक्क!’ ये सूर्यभक्त हैं और ज़िन्दगी में क्या है? अंधेरा। ये कौनसी भक्ति है?

मैं फिर बोल रहा हूँ, बुल्लेशाह पूज्य इसलिए नहीं हैं कि उन्होंने बढ़िया-बढ़िया लच्छेदार बातें बोलीं, बुल्लेशाह पूज्य इसलिए हैं क्योंकि गुरु के प्रति उनमें अनन्त श्रद्धा थी, क्योंकि उनका जीवन गवाही है उनके सन्तत्व की। तुम्हारे जीवन में कुछ नहीं है और बातें तुमने उछाल रखी हैं। ये सब हटाओ! ज़िन्दगी बताओ, ज़िन्दगी।

कहाँ काम करते हो, बताओ। क्यों काम करते हो? क्यों पगार लेते हो? दिनभर वहाँ क्यों घुसे रहते हो? वो एक जगह है — हटाओ अपनी धारणाओं को — एक जगह है जहाँ तुम रोज़ पहुँच जाते हो, आठ घंटे, दस घंटे बैठते हो। फिर दरवाज़ा खोला जाता है तो भागते हो, और जब बाहर आते हो तो, ‘आह’ (ठंडी साँस लेने का अभिनय)।

और अगले दिन फिर पहुँच जाते हो अपने ही पाँव चलकर। ऐसा भी नहीं कि कोई पट्टा डालकर खींचता हो, ख़ुद ही पहुँच जाते हो, बताओ क्यों? मुझे नहीं पता टोटल अवेयरनेस (सम्पूर्ण जागरूकता) क्या होती है, मुझे तो ये पूछना है कि तुम सुबह दफ़्तर क्यों जाते हो? ज़िन्दगी बताओ न!

अभी एक बहुत प्रचलित सन्तजन हैं, तो उनका एक वीडियो मेरे सामने आ गया। मैं देख रहा हूँ, वो बैठे हुए हैं। ऐसी उनकी कुर्सी थी (अपनी कुर्सी को दिखाकर), ऐसे ही तो बस प्रकार में थी और बहुत सुसज्जित, ये-वो, तमाम था। वहाँ, यहाँ नीचे, एक प्रौढ़ महिला, अधेड़ उम्र की रही होंगी, और वो रो रही हैं सन्तश्री के चरणों पर अपना मस्तक रखकर। और इतनी मोटी, महँगे कपड़े पहन रखे हैं, और कानों में ये बड़े-बड़े। और आध्यात्मिक जिज्ञासा रख रही हैं, कह रही हैं, ‘ये होता है, वो होता है, ऐसा है, आपकी छवि पर ध्यान करती हूँ तो नीला प्रकाश उद्भूत होता है।‘ सन्तश्री गम्भीरता से सिर हिलाकर कह रहे हैं, ‘देखो, ....।'

अब मैं ज़िन्दगी देख रहा हूँ, मैं कह रहा हूँ कि सबसे पहले तो इसका कान नोचो! तू ये झूमर डाल के काहे को आयी है? नहीं, तेरी बात सुनूँ कि ये, क्या है ये (कानों के आभूषणों की ओर इशारा करते हुए)? और इतनी मोटी क्यों है तू? नहीं, मुझे बताओ। ये ज़्यादा पूछने की बात है या महोदया के वक्तव्यों पर ध्यान दिया जाए? और वक्तव्य उनके क्राइस्ट (ईसा मसीह) और कृष्ण से नीचे के नहीं हैं, मोटी इतनी हैं कि कस्टमाइज्ड क्रेन (अनुकूलित क्रेन) लाती है उन्हें। वहाँ जितने हैं सब ऐसे ही हैं, वहाँ बैठे हुए हैं। सब एक-से-एक, चेहरे पर लिखा हुआ है कि हम मूर्खता के नमूने हैं। और कोई ज़िन्दगी नहीं पूछ रहा, वहाँ सिद्धान्त चर्चा चल रही है — देहम्, कोहम्, सोऽहं, नाहम्।

ये नहीं। प्रत्यक्ष को प्रत्यक्ष रखो। परमात्मा प्रत्यक्ष है, इसका अर्थ ही यही होता है कि परमात्मा प्रत्यक्ष को समझने की दृष्टि देता है। कहा गया है न, 'कण-कण में भगवान', इसका मतलब समझते हो क्या है? कि अगर भगवत्ता है तो कण-कण को पहचानोगे। और जीव हो तुम तो तुम्हारे सामने कण-ही-कण हैं, पदार्थ और क्या होता है? उनको अगर पहचान पाते हो तो यही है भगवत्ता में आपूरित, भगवत्ता से आपूरित जीवन जीना। ज़िन्दगी समझ में आती नहीं और ग्रन्थों का अनुवाद लिये घूम रहे हो।

ऐसे थोड़ी है। दफ़्तर बताओ, शादी बताओ, पैसा बताओ। ये चीज़ें जो मन पर चलती रहती हैं, उनका हाल बताओ न। एक संसारी जीव को, एक साधारण स्त्री को यही सब बातें तो चलती रहती हैं — कहाँ काम कर रही हूँ? कहाँ शादी होगी? घरवाले क्या बोल रहे हैं? समाज का क्या हिसाब-किताब है? ये बताओ न, इनके प्रति क्या रुख़ है? और वो रुख़ ठीक नहीं है तो तुम पन्द्रह गीताएँ पढ़ लो। आते हैं ऐसे भी, वो, ‘दफ़्तर में बैठा-बैठा गीता पाठ करता हूँ।'

हमें तो ये पता है कि कोई था जिसने एक बार सुनी थी गीता और उसके बाद लगातार युद्धरत रहा। कितनी बार सुनी थी उसने? एक बार सुनी थी। और उसके बाद उसने क्या किया? या वो बार-बार बैठकर पढ़ रहा था? कि रिकॉर्डिंग चलाओ रे! लड़ूँगा नहीं, रिकॉर्डिंग सुनूँगा’, जवाब दो। जिसने एक बार सुन ली वो क्या करता है फिर?

प्र: संघर्ष।

आचार्य: वो फिर संघर्ष करता है, वो जीवन में उतरता है, वो उचित कर्म में उतरता है। उचित कर्म कहीं दिखायी नहीं दे रहा, ये कौनसा अर्जुन है जो गीता-गीता कर रहा है और लड़ने से इनकार कर रहा है? गीता अगर तुमने सुनी है तो उसका प्रमाण होंगे तुम्हारे तीर। तुम्हारे जीवन में युद्ध कहीं है नहीं, तीर कहीं है नहीं, धूर्तता का, झूठ का विरोध कहीं है नहीं। बाल घुटा लिया है और चिकनी मुंडी के साथ, ‘हरे कृष्णा, हरे कृष्णा’। और अभी तुम्हें ज़रा सा भू! (डराने का अभिनय) कर दें तो भगोगे बहुत ज़ोर से। ये तुम कौनसे अर्जुन हो?

देखा हुआ है भाई मैंने। आँखों-देखी बता रहा हूँ। एक बारी घूम रहे थे वहाँ पर, सड़क पर, वहाँ सांड आ गया। एक दो बार तो उसको ‘हरे कृष्णा, हरे कृष्णा’ बोला। सांड के भीतर तो साक्षात कृष्ण हैं, वो काहे को सुनेगा ये बकवास! उसने दौड़ा लिया। प्रेम में ही दौड़ा रहा होगा, कह रहा होगा, ‘मेरे भक्त हैं।‘ और गीता-वीता छोड़कर भागे, एक-आध की धोती गिरी।

गीता से ऊँचा कुछ नहीं। तुम मुझे ये बताओ, तुम्हारे जीवन में ऊँचाई क्यों नहीं आयी? ऊँचाई इसलिए नहीं आयी कि कृष्ण के वक्तव्य में कोई कमी है? ऊँचाई इसलिए नहीं आयी क्योंकि तुम अभी अर्जुन भी नहीं हो। गीता दुर्योधनों को नहीं बोली जाती। गीता शिखंडियों को नहीं बोली जाती। तुम पहले अर्जुन के स्तर तक तो आ जाओ, तो गीता तुम्हारे उपयोग की हो।

अर्जुन होने का मतलब जानते हो क्या है? कम-से-कम तुम दुनियावी कामों में कुछ तो श्रेष्ठता, उपलब्धता अर्जित करो। अर्जुन कौन था? कैसा धनुर्धर? सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर। अरे! सर्वश्रेष्ठ हटाओ, तुम कहीं श्रेष्ठ तो हो जाओ।

तुम कहीं श्रेष्ठ नहीं, तुम दुनिया में हर मामले में फिसड्डी, तुम दुनिया में हर जगह से परित्यक्त। तो तुम जाकर कहते हो, ‘मुझे तो गीता पढ़नी है।’ क्यों? क्योंकि गणित पढ़ी नहीं, भूगोल पढ़ा नहीं, कुछ कभी समझ में आया नहीं, तो अब लगा कि इन सबसे निचले स्तर की तो गीता है। कुछ और न समझ में आता हो तो गीता समझ में आ जाएगी। अधिकांश लोग जो आध्यात्मिकता की तरफ़ उन्मुख होते हैं, वो ऐसे ही तो होते हैं।

कहीं के नहीं हैं तो उपनिषद् उठा लिये कि ये सबसे सरल हैं; 'अहम् ब्रह्मास्मि' कोई लम्बी-चौड़ी बात ही नहीं है, इससे सरल कुछ नहीं हो सकता, ये आ गया समझ में। उनसे पूछो, 'क-ख-ग समझ में आता है?’ उन्हें नहीं आता है, उन्हें 'अहम् ब्रह्मास्मि' सबसे पहले समझ में आ गया।

कुछ दुनिया की ख़बर कर लो, अपने जीवन को थोड़ा देख लो, ये जो तमाशा है, इसपर कभी ग़ौर करो। ये देश क्या है? ये संस्थाएँ क्या हैं? ये राजनीति क्या है? ये खेल क्या है? ये उपद्रव क्या है? ये भीड़ क्या है? ये अर्थव्यवस्था क्या है? जानो न कि जिसे तुम जगत कहते हो और जिससे मुक्ति की बात करते हो वो जगत प्रथमतया है क्या? किससे आज़ाद होना चाहते हो?

उसका कुछ पता नहीं। तुम कहते हो, *‘थॉटलेस अवेयरनेस’*। मैं कह रहा हूँ, सिर्फ़ थॉटलेसनेस (विचारहीनता) है, अवेयरनेस (जागरूकता) नहीं है। और जहाँ अवेयरनेस के बिना थॉटलेसनेस है, वो थॉटलेसनेस बड़ी गड़बड़ है। वो निर्विचार नहीं है वो अविचार है। आप चैतन्य भी नहीं रहे, आप जड़ हो गये हो, जड़ पदार्थ विचार भी नहीं कर सकता। विचार तो करो कम-से-कम, निर्विचार की बाद में देखना।

प्रतिपल ध्यान दीजिए — क्या खा रहे हैं, क्या पहन रहे हैं, क्या ख़रीद रहे हैं, रिश्ते क्यों चाहिए, संरक्षण किसी का क्यों चाहिए, किसी की संगत, साथ क्यों चाहिए, धन क्यों चाहिए, सोहबत क्यों चाहिए, किसी संस्था के साथ नाम क्यों जोड़ना है, इन बातों पर ध्यान दो न, यही अध्यात्म है। थॉटलेस अवेयरनेस और क्या-क्या था? जो भी है, ये नहीं है अध्यात्म।

ऋषिकेश में एक मिला था, बैठे, हू ऍम आइ (मैं कौन हूँ), हू एम आइ? करे, कैफ़े (जलपानगृह) में था। पीछे से किसी ने आवाज़ दी, ’जेम्स, योर कॉफ़ी इज़ रेडी’ (जेम्स, आपकी कॉफी तैयार है), वो तुरन्त मुड़कर गया, कॉफ़ी उठा ली। अभी बोल रहा था, ‘हू एम आइ?’ , अभी उसने पीछे से बोला, ‘जेम्स योर कॉफ़ी इज़ रेडी’ तो ये जेम्स हो गया।

क्या खाते हो, कैसा जीते हो, कहाँ पर साँस लेते हो, क्यों, इस गोरख धन्धे पर ग़ौर करो। क्या डरा जाता है, क्या आकर्षित करता है, इन बातों पर ग़ौर करो। ये होती है ख़ालिस आध्यात्मिकता, ख़ालिस। ज़मीन की बात। लफ़्फ़ाज़ी नहीं, हवा-हवाई नहीं, सीधी ज़मीन की बात। लोग आते हैं, कहते हैं संस्था से जुड़ना है, फाउंडेशन से। हम सबसे पहले उनको कहते हैं, ‘जाओ, छ: घंटे वहाँ कैनोपी (पुस्तक विक्रय हेतु बनाया गया मंडप) पर खड़े हो जाओ, सारा अध्यात्म साफ़ हो जाएगा।‘

बहुत आये, उनका यही हुआ। एक-से-एक भक्त थे, ज्ञानी। दो-चार तो पेशेवर समाधिवास थे। एक ने कहा, ‘पुश्तैनी है मेरा तो। माँ मेरी समाधि में थी जब मैं पैदा हुआ और जब मैं पैदा हुआ तब मैं समाधि में था।‘ इनको सबको ले जाकर वहाँ बाज़ार में खड़ा कर देते हैं कि लो, यहाँ खड़े हो जाओ, और ये किताबें हैं और वो लोग हैं, लोगों को लेकर के आओ, किताबें दिखाओ, और दिखानी भर नहीं है, देनी है। समाधि भंग हो गयी! ये क्या हो गया?

अरे! अगर कुछ मिला है वास्तव में, जाना है, सीखा है, कोई शुद्धि उठी है भीतर, तो प्रकट भी तो हो। ऐसा सूरज तो हमने देखा नहीं कि जिसमें ताप न हो, जिसमें तेज न हो। तुम्हारे भीतर कौनसा सूरज है जो भीतर ही रह गया?

तुम सुनने वाले अर्जुन बनकर मत रह जाना; तुम लड़ने वाले अर्जुन बनना। हम यहाँ बात इसलिए नहीं करते हैं कि मेरे मुँह में खुजली है और तुम्हारे कान में। तो आपसी खुजलाहट की जा रही है, पात्र अभिनीत किये जा रहे हैं, आओ-आओ, खेलें-खेलें, मैं गुरु बनूँगा और तुम चेला। ये यहाँ बात की जा रही है, ये बात रणभेरी जैसी हैं, ये बात शंखनाद जैसी हैं। और शंखनाद के बाद क्या होना चाहिए? युद्ध।

अब शंखनाद तो हो गया पूरा, और फिर अर्जुन गया सो! कृष्ण ने बजाया शंख, उधर से अर्जुन का बजा खर्राटा, ये कौनसी आध्यात्मिकता है? इधर शंख बजे, उधर तीर चले, तब बात है। यहाँ इन बातों को सुनते हो उसके बाद बाहर संघर्ष भी दिखाओ। समाधि और संघर्ष अगर साथ नहीं हैं तो झूठे हैं।

बुद्ध को थोड़ा पता चला तो उन्होंने राज्य छोड़ा, बुद्ध को पूरा पता चला तो वो कर्मरत हो गये, मुखर हो गये, गाँव-गाँव घूमने लगे। तुम बताओ, तुम्हें अगर थोड़ा भी पता चला है तो वो तुम्हारे जीवन में कब उतरेगा? और मुझे कोई एक उदाहरण बता दो जहाँ पता चला और जीवन में नहीं उतरा, बताओ। कबीर को पता चला तो वो आजन्म पोंगा-पंडितों से, रूढ़ियों से, अधर्म, अविद्या से संघर्षरत रहे कि नहीं रहे? पचास बार उन्हें मारने की कोशिश की गयी।

बुल्लेशाह युद्धरत रहे। सिक्ख गुरुओं को देखो — एक ओर आदिग्रन्थ है, दैवीय वाणी है और दूसरी ओर हाथ में तलवार है। और क्या हक़ है तुम्हें किसी को उपदेश देने का अगर तुम्हारे हाथ में तलवार नहीं? और कैसे श्रोता हो तुम, कैसे शिष्य हो तुम अगर सिर्फ़ सुने जाते हो, तलवार नहीं उठाते? वो तो कहते थे कि सिक्ख होने का मतलब, शिष्य होने का मतलब ही यही है कि कृपाण होनी चाहिए। जिसके पास कृपाण नहीं, वो सिक्ख नहीं।

तुम कैसे श्रोता हो? कौनसा अध्यात्म पढ़ा है? कौनसा साहित्य? कैसे गुरु? कर्म कहाँ है? कृपाण कहाँ है?

मैं बहुत स्पष्ट करना चाहता हूँ, मुझे दो लोग सुनें कि दो-लाख लोग सुनें, ये सब तो भाग्य की बातें हैं। न इनपर किसी का वश है, न इनके विषय में बहुत विचार। पर जो भी सुने उसे उठना होगा, जो भी सुने उसे आरोहित होना होगा। नीचे बैठने भर से काम नहीं चलेगा, ऊपर उठना भी तो दिखाओ।

ऊपर उठ नहीं रहे तो नीचे बैठे क्यों हो? ये हमने गपशप का अड्डा नहीं बनाया है। ये आश्रम है, यहाँ प्रार्थना का मतलब होता है रणभेरी। हो सकता है दुनिया से भागकर, बचकर आये हो तुम यहाँ पर, पर यहाँ से जब निकलो तो भगोड़े की तरह नहीं निकलोगे, सूरमा की तरह। आये कैसे, तुम जानो। पर जाओगे कैसे, ये जवाब देना पड़ेगा। दुमछल्लों की फ़ौज थोड़े ही बनानी है। कुछ और करने को नहीं था तो चलो सत्संग करते हैं, प्राइम-टाइम स्पिरिचुअलिटी (मुख्यकाल आध्यात्मिकता), आठ से दस।

“जो घर जारे आपना, चले हमारे साथ।"

~ कबीर साहब

तुम यहाँ से निकलकर फिर खरगोश की तरह जाकर उन्हीं सुरंगों में घुस जाओ, बिलों में घुस जाओ। कुछ शब्द ऐसे हैं जिन्हें ज़बान पर लाने से पहले बड़ी क़ीमत देनी पड़ती है; वो क़ीमत नहीं दी तो उन शब्दों को ज़बान पर मत लाइए। कोई बातें ऐसी हैं जो बोली ही नहीं जानी चाहिए जबतक पूरा मूल्य न चुकाया। इतनी आसानी से मत कह दीजिए, 'अहम् ब्रहास्मि', 'पैसिव अवेयरनेस' (निष्क्रिय जागरूकता)।

ये बहुत-बहुत श्रद्धेय शब्द हैं। ये शब्द ही नहीं हैं, ये पूरे जीवन का रस हैं, ये अमृत हैं। जीवन निचोड़ना पड़ता है तब जो आख़िरी बूँद गिरती है, वो कहती है, ‘अहम् ब्रह्मास्मि’। आख़िरी बूँद, उसके बाद कुछ शेष नहीं रह गया। जीवन अभी निचोड़ा नहीं, श्रम किया नहीं, तपस्या की नहीं, बातें उड़ानी हैं।

और इतना मैं आश्वासन दे सकता हूँ — जीवन में उतरने में जो मौज आएगी, वो जीवन के विषय में बतियाने में नहीं है। एक मौज होती है न जिसमें रोंगटे खड़े हो जाते हैं, बिलकुल लहर उठती है, वैसी आएगी। जैसे कोई बड़ी ऊँचाई से पानी में कूदा हो, बिलकुल साफ़ पानी में। क्या हो रहा है, ये सोचने का समय ही न मिले — जो हो रहा है वो इतना तीव्र, इतना सघन, इतना द्रुत है — फिर मौज है। मौज तब नहीं है जब सोच रहे हो मौज है। मौज तब है जब जीवन इतना सघन है, इतना तेज़ है, इतना छाया हुआ है कि मौज शब्द भी दिमाग में नहीं आ रहा। मौज शब्द अभी दिमाग में आ गया तो अभी मौज नहीं है।

बिलकुल नहीं कह रहे तुम कि मैं मौज को जी रहा हूँ। तुम ये भी नहीं कह रहे कि तुम जी रहे हो, कहने की फ़ुर्सत किसे है। एक गीत है हिन्दी फ़िल्म का। वैसे तो ऐसे ही है, पर उसको अगर साफ़ कानों से सुनें तो ऐसा लगता है कि गीतकार को पता ही नहीं था, वो क्या बोल रहा है। दो-चार उसकी पंक्तियाँ हैं —

“अभी साँस लेने की फ़ुर्सत नहीं है कि तुम मेरी बाँहों में हो।"

सोचने की बात भी नहीं है, साँस लेने की भी फ़ुर्सत नहीं है। सोचना तो फिर भी ऐसा लगता है कि उसमें कुछ कर्तृत्व शामिल है, कि चाहा तो सोचा, नहीं चाहा तो नहीं सोचा। यहाँ तो बात साँस लेने तक पहुँच चुकी है। कि साँस ही थम गयी, और साँस यदि अभी नहीं थमी तो अभी बाँहों में नहीं आये। साँस थमना तो छोड़ो, विचार थमना भी छोड़ो, ज़बान ही नहीं थमती। हाथ चलाओ, भेजा कम चलाओ और ज़बान उससे भी कम।

अठारह अध्याय श्रीकृष्ण से मुखरित हुए, उन्नीसवाँ था तीर की टंकार में, प्रत्यंचा की हुंकार में। उन्नीसवाँ अर्जुन को तब उद्घाटित होता था जब तीर आकर उसकी छाती में लगता था। उन्नीसवाँ अध्याय है अठारह दिन का युद्ध।

उस अठारह दिन के युद्ध के बिना गीता के अठारह अध्याय पूर्ण नहीं हैं, कि हैं? मात्र अठारह अध्याय हों और फिर अठारह दिन का युद्ध न हो, तो कहोगे कि गीता पूरी हुई, सार्थक हुई? उन्नीसवाँ अध्याय, याद रखना वो अन्तिम है और अन्तिम का अर्थ होता है — चरम, आख़िरी, सर्वोच्च।

जो तीर आकर लगता होगा छाती में वो समझना कि उन्नीसवें अध्याय का श्लोक है एक। उसमें से भी तो आवाज़ उठती होगी न। उन्नीसवें में पहले सब अठारह समाहित हैं। जिसे उन्नीसवाँ मिल गया, उसे ही मिले पहले अठारह।

जीवन में ऐसे डूब जाओ कि वाक़ई साँस लेने की फ़ुर्सत न मिले। तुम कहते हो कि व्यस्तता तुम्हारी परेशानी है। मैं कहता हूँ व्यस्तता नहीं है तो कुछ नहीं है। कोई ऐसा परम उद्देश्य मिल जाए तुम्हें कि वो तुम्हें पूरा ही घेर ले, तुम्हें पूरा ही खा ले, चबा ले, फाड़ दे, मरोड़ दे, निचोड़ दे। और जब तक तुम्हें वैसा परम उद्देश्य नहीं मिला है जो तुम्हारे पल-पल पर छा जाये, तुम्हारी साँस-साँस पर छा जाये, तब तक जी नहीं रहे हो तुम।

मैं उद्देश्यों से मुक्ति की बात नहीं करता, मैं परम उद्देश्य में डूब जाने की बात करता हूँ। परम उद्देश्य में डूबे नहीं तो इन छिट-पुट उद्देश्यों से मुक्ति तो तुम्हें वैसे भी नहीं मिलेगी। उस बड़े धन्धे में तुम अगर रत नहीं हुए तो छोटे-मोटे धन्धों में फँसे रहोगे। छोटे-मोटे धन्धों से मुक्ति का एक ही उपाय है — बड़ा वाला धन्धा पकड़ लो, वो गोरख धन्धा है। जो उसमें फँसा, वो फँस ही गया, वो साबुत बाहर नहीं आता, उसी में फँसो तुम।

और ये सब बातें बड़ी बचकानी लगती हैं मुझे कि व्यस्तता का त्याग करना है, विचार का त्याग करना है, शहर का त्याग करना है, घर का त्याग करना है, समाज का त्याग करना है। इनसे मल त्याग तक तो होता नहीं ठीक से, बाक़ी सारे त्याग क्या करोगे। उसके लिए तो तुम कभी गोलियाँ माँगते हो, कभी पहाड़ा पढ़ते हो, कभी उठक-बैठक लगाते हो। हटाओ त्याग वगैरह! भिखारी को शोभा देता है त्याग की भाषा में बात करना!

तुम पाओ और लुटाओ। लुटना बड़ी बात है पर लुटने का हक़ तो पहले अर्जित करो। भिखारी कह रहा है, ‘हाय! मैं लुट गया, हाय! मैं बर्बाद हो गया।‘ एक लगाओ (थप्पड़ का इशारा)। तेरे इतने बड़े भाग्य नहीं है कि तू लुट सके।

यही बात मैं उन लोगों से बोलता हूँ, जो मुझसे मिलने आते हैं। जो मिलने आते हैं, वो यही आकर कहते हैं कि मैं लुट गया हूँ, मुझसे कुछ छिन गया है, मैं बर्बाद हो गया हूँ। मैं कहता हूँ, इतने तो तुम सौभाग्यशाली लग नहीं रहे कि तुम लुट सको, तुम्हारे पास है क्या लुटने के लिए? जिनके पास कुछ नहीं होता है उन्हें ही सबसे ज़्यादा लगता है, लुट गया रे! वो बड़े आशंकित भी रहते हैं, ‘देखिए साहब!’

कोई मोबाइल है? देना ज़रा। याद आ गया। बाक़ी पंक्तियाँ और इधर-उधर का जो भी है, आलाप वगैरह, उसपर ध्यान मत दीजिएगा। वो जो, दो-चार लफ़्ज़ हैं, वो क़ीमती हैं, बस उनको सुनिएगा।

गीत...

अभी साँस लेने की फ़ुर्सत नहीं है कि तुम मेरी बाँहों में हो। अभी साँस लेने की फ़ुर्सत नहीं है कि तुम मेरी बाँहों में हो। कि कुछ देखने की ज़रूरत नहीं है तुम-ही-तुम निगाहों में हो। अभी साँस लेने की फ़ुर्सत नहीं है कि तुम मेरी बाँहों में हो। कि कुछ देखने की ज़रूरत नहीं है तुम-ही-तुम निगाहों में हो।

कितना प्यारा-प्यारा है समाँ प्यासे दिल की धड़कन है जवाँ। जाने कैसा छाया है नशा यूँ न मुझको छेड़ो दिलरुबा। छोड़ो-छोड़ो जाने-जाना तुम ऐसे सरमाना, कि अब सोचने की इजाज़त नहीं है कि तुम मेरी बाँहों में हो, अभी साँस लेने की फ़ुर्सत नहीं है कि तुम मेरी बाँहों में हो।

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