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उसके लिए प्राण भी जाएँ, तो कोई बात नहीं || श्रीरामकृष्ण परमहंस पर (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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कथा: पम्पा सरोवर में नहाते समय राम और लक्ष्मण ने सरोवर के तट की मिट्टी में धनुष गाड़ दिए। स्नान करके लक्ष्मण ने धनुष निकलते हुए देखा, धनुष में ख़ून लगा हुआ था। राम ने देखकर कहा, "भाई, जान पड़ता है कि कोई जीव पर हिंसा हो गई है!" लक्ष्मण ने मिट्टी खोदकर देखा तो एक बड़ा मेंढक था, वह मरणासन्न हो गया था। राम ने करुणापूर्वक कहा, "तुमने आवाज़ क्यों नहीं दी? हम लोग तुम्हें बचा लेते। जब साँप पकड़ता है, तब तो ख़ूब चिल्लाते हो।" तो मेंढक ने कहा, "राम, जब साँप पकड़ता है तब मैं चिल्लाता हूँ – 'राम, रक्षा करो! राम, रक्षा करो!’ पर अब देखता हूँ राम स्वयं मुझे मार रहे हैं, इसलिए मुझे चुपचाप रह जाना पड़ा।"

प्रश्नकर्ता: सांसारिक दुःख कैसा? आध्यात्मिक दुःख कैसा? दोनों में से कौनसा दुःख शुभ है?

आचार्य प्रशांत: दो तरह के दुःख होते हैं - एक जो संसार देता है, एक जो सत्य देता है। जब संसार दुःख दे तो बलपूर्वक विरोध करो, बुलाओ सत्य को, "आओ, रक्षा करो! आओ, रक्षा करो।" लेकिन जब सत्य ही दुःख दे, तो चुप रह जाओ बिलकुल। और सत्य ख़ूब दुःख देता है। राम की तरफ़ चलोगे, राम ख़ूब दुःख देंगे।

जब दुःख राम से मिल रहा हो, तो शोर नहीं मचाना चाहिए। जब दुःख संसार से मिल रहा हो, तो प्रतिकार करना चाहिए।

और जब दुःख सीधे-सीधे सच से ही मिल रहा हो, राम से ही मिल रहा हो, तो शिरोधार्य है। तब कहो, "ठीक है। आपने दिया है तो ठीक होगा। दुनिया देती तो हम बर्दाश्त नहीं करते, पर आप दुःख दे रहे हैं तो बिलकुल ठीक होगा।"

और मेंढक को तो छोटा-मोटा दुःख नहीं मिला है, वो तो मरने ही वाला है अब; धनुष ही गाड़ दिया उसके सिर पर, पर वो कह रहा है, "आपका धनुष है न! आपके हाथों मृत्यु अगर मिल रही है तो ठीक ही होगा।"

ये बात समझ में आ रही है?

अध्यात्म दुःख से मुक्ति का विज्ञान है, लेकिन अध्यात्म ख़ुद बहुत दुःख देता है, इसीलिए तो लोग अध्यात्म से पीछा छुड़ाकर भागते हैं। अध्यात्म है तो इसलिए कि जीव जिन दुःखों में लिपटा पड़ा रहता है और त्रस्त रहता है, उनसे मुक्त हो जाए—है तो अध्यात्म इसलिए, पर किसी भी आध्यात्मिक साधक से पूछो, किसी भी ऐसे व्यक्ति से पूछो जिसने कहा हो कि सच्ची ज़िंदगी जीनी है, वो आपको बताएगा कि सच्ची ज़िंदगी जीने में बहुत दुःख मिलता है।

जब सच्ची जिंदगी जीने में दुःख मिले, तो वो दुःख शुभ है।

वो दुःख शुभ है, उसका वरण करो, उसके सामने झुक जाओ, कहो, "ठीक!”

इसी बात को मैं कहा करता हूँ कि -

जीवन दुःख तो है ही, तुम सही दुःख का चयन करो। एक दुःख वो है जो संसार देता है, और दूसरा दुःख वो है जो सच देता है; दुःख तो दोनों ही तरफ़ है। तुम वो दुःख चुनो जो तुम्हें मुक्ति दिला देगा।

संसार जो दुःख देता है, तुम उसको चुनोगे, तो वो दुःख क्रमशः बढ़ता ही जाएगा, और वो तुम्हें अपनी गिरफ़्त में और लेता जाएगा। सच्चाई तुम्हें जो दुःख देती है, उसको चुनोगे, तो धीरे-धीरे दुःख कम होता जाएगा, दुःख से मुक्त होते जाओगे।

तो कोई ये शिकायत करने न आए कि - "हम जब दुनियादारी में थे तो दुःख पाते थे, तो साहब हम चले अध्यात्म की ओर, लेकिन जब से अध्यात्म में आए हैं, हालत और ख़राब हो गई है, दुःख और बढ़ गया है!" जो कोई कहे, "हालत ख़राब हो गई है,” "दुःख बढ़ गया है,” मैं कहूँगा कि ज़्यादा लग रहा हो तो उधर ही लौट जाओ जहाँ से आए हो! तुम्हें ये वादा किया किसने था कि अध्यात्म में दुःख नहीं मिलेगा? अध्यात्म में दुःख मिलता है। कई बार संसार में जो दुःख मिल रहा होता है, उससे ज़्यादा दुःख मिलता है अध्यात्म में। मुक्ति के आकांक्षी हो तो झेलो, और नहीं झेला जा रहा हो, तो जाओ!

तो इस तरह की बेहूदी बातें अकसर करी जाती हैं कि, "देखो, वो जो दुनिया वाले लोग हैं, वो हमसे तो कम दुःख झेल रहे हैं न! हमें अध्यात्म में आकर क्या मिला?” ऐसों के लिए एक ही जवाब है, क्या? जाओ! वही दिशा तुमको बहुत अच्छी लग रही है, जाओ!

अध्यात्म उनके लिए है जो सच की राह पर मिलने वाले दुःख को प्रसाद समझकर ग्रहण करें, चूँ भी न करें। मुस्कुराएँ, जैसे मेंढक। बोला ही नहीं कुछ, मौत आ रही है, चुप रहा। कह रहा है, "ये मौत कौन दे रहा है? राम दे रहे हैं न? ठीक है। ये जो पूरा दुःख है, कौन दे रहा है? राम दे रहे हैं न। हाँ, साँप ने मुझे ये दुःख दिया होता तो मैं बहुत चिल्लाता। साँप कौन होता है मुझे दुःख देने वाला? पर राम अगर दुःख देंगे तो बिलकुल नहीं चिल्लाऊँगा।"

इन उम्मीदों के साथ अध्यात्म की ओर मत आइएगा कि जल्दी से ही आनंद-उपवन में भ्रमण करने लगेंगे। लोगों के ख़याल कुछ ऐसे ही होते हैं, कि —हमारे चेहरे पर एक दैवीय मुस्कान होगी, आँखों में नूर होगा, आभामंडल होगा पीछे, प्रकाश उत्कीर्ण हो रहा होगा; हम ज़मीन पर नहीं, ज़मीन से छह इंच ऊपर चल रहे होंगे, और जिधर जा रहे होंगे, उधर सब बोलेंगे, "वाह! हरि बोल!” ऐसी उम्मीदें लेकर लोग आते हैं, फिर जब वो उम्मीदें पूरी नहीं होतीं, जो हो ही नहीं सकतीं, तो उनको बड़ा झटका लगता है। वो कहते हैं, "यार, इससे भले तो पहले थे, ठीक-ठाक काम-धंधा चल ही रहा था, ये कहाँ की बला पाल ली!”

प्र: आपने जो कहानी पढ़ी, उसमें राम ख़ुद कह रहे हैं कि तुमने आवाज़ क्यों नहीं दी, हम तुम्हें बचा सकते थे।

आचार्य: वो राम 'अवतार' हैं, करुणा से भरे हुए। अवतार रूप में राम बहुत सारी ऐसी बातें करेंगे जो बिलकुल मानवीय होंगी। अवतार रूप में तो राम भरत के वियोग में भी रोते हैं, सीता के वियोग में भी रोते हैं, लक्ष्मण को बाण लग जाता है, तो भी, "लक्ष्मण! लक्ष्मण!” ख़ूब रोते हैं। तो मेंढक को चोट लग गई है, तो भी उन्हें दुःख हो रहा है।

मैं किस 'राम' की बात कर रहा हूँ? मैं 'अवतार' राम की बात नहीं कर रहा हूँ; मैं 'सत्य' राम की बात कर रहा हूँ। अवतार राम का तो काम है आपके दुःख को अनुभव करना और आपके दुःख में दुखी भी हो जाना। जटायु को देखते हैं कि बहुत चोट लग गई है, राम के दुःख का पारावार नहीं है। अवतार रूप में तो अगर वो आपके दुःख के प्रति संवेदना न रखें, तो आपके काम ही नहीं आएँगे।

प्रश्न ये नहीं है कि राम क्या कह रहे हैं, प्रश्न ये है कि मेंढक का क्या कर्तव्य है। मेंढक का कर्तव्य है कि— "अगर चोट राम ने दी है, तो चूँ नहीं करूँगा।" राम अपना धर्म निभा रहे हैं, मेंढक अपना धर्म निभा रहा है। राम का धर्म है कहना कि, "अरे, आवाज़ दे देते तो मैं तुम्हें बचा लेता," और मेंढक कह रहा है, "आवाज़ दूँ क्यों?” राम का धर्म है मेंढक से कहना कि —"तुम बोलते तो तुम्हें बचा लेता," और मेंढक का धर्म है कहना कि —"आप अगर मौत भी देंगे, तो भी स्वीकार है।"

प्र२: मैं फ़र्क़ नहीं देख पा रहा हूँ कि सांसारिक दुःख किसको समझें, और आध्यात्मिक दुःख किसको समझें। कृपया बताएँ।

आचार्य: सांसारिक दुःख है संसार को पकड़ कर रखने में। संसार को पकड़ कर रखना दुःख की बात होती है न? और आध्यात्मिक दुःख है वो सब छोड़ने का दुःख, जो मूल्यहीन है, पर जिससे हमें मोह है। जो मूल्यहीन है, उसको पकड़कर रखने में दुःख है न? पर जो मूल्यहीन है, पर मोह-वश पकड़ा हुआ है, उसे छोड़ने में भी बड़ा दुःख है। अंतर समझ गए, सांसारिक-आध्यात्मिक दुःख का?

मूर्खता में दुःख है, पर मूर्खता में मज़े भी तो हैं। तो एक दुःख है मूर्खता करने का, और एक दुःख है जो होता है मूर्खता छोड़ने में; मूर्खता छोड़ने में जो दुःख होता है, वो आध्यात्मिक दुःख है। कई बार मूर्खता करने में जो दुःख होता है, उससे ज़्यादा दुःख हो जाता है मूर्खता छोड़ने में। हो जाता है न? खासतौर पर अगर मूर्खता थोड़ी रंगीन हो। फिर पता होता है कि ये जो कर रहे हैं, ये चीज़ बेवकूफ़ी की है, अंदर-ही-अंदर दुःख लगता है कि बेवकूफ़ी क्यों कर रहे हैं, पर उसे छोड़ने की तो बात भी न करें। "भाई साहब! उसे छोड़ने में महा दुःख है! छोड़ कैसे दूँ?"

आध्यात्मिक दुःख आपको कितना ज़्यादा अनुभव होगा, वो इसपर निर्भर करता है कि आपमें मोह कितना है। और सांसारिक दुःख आपको कितना अनुभव होगा, वो इसपर निर्भर करता है कि आपमें विवेक कितना है।

विवेक आपमें ख़ूब है, और फिर भी आप संसार से लिप्त हैं, तो आपको बड़ा दुःख होगा। और मोह बहुत है आपमें, फिर भी आप संसार की मूर्खता छोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, तो बहुत दुःख होगा। मोह बड़ी चीज़ है!

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