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उपलब्धियाँ न प्राप्त कर पाने का दुःख || आचार्य प्रशांत (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरे जीवन में कोई उपलब्धि नहीं है। बड़ा दुःख है, कैसे बाहर निकलूँ? मेहनत ख़ूब  करी है लेकिन नतीजे नहीं मिले। पढ़ाई को भी पूरी ज़िंदगी बहुत महत्व दिया, लेकिन घर वालों ने हमेशा सुनाया ही है। फ़िलहाल मेरी उम्र 32 वर्ष की है।

आचार्य प्रशांत: तुम्हें तकलीफ़ ये है कि तुम्हारा जीवन उपलब्धियों से ख़ाली है, या ये है कि दूसरों के पास उपलब्धियाँ बहुत हैं? तत्काल जवाब मत देना, थोड़ा ग़ौर करना। तुमको बिल्कुल पता ना होता उपलब्धि की धारणा, उपलब्धि के कॉन्सेप्ट के बारे में, तो क्या तब भी तुम तकलीफ़ में जीते? तुम कहीं ऐसी जगशून्य, निर्जन जगह पर रह रहे होते जहाँ किसी ने तुम्हें पढ़ाया ही नहीं होता कि "जीवन का अर्थ है उपलब्धि हासिल करना,” तो भी क्या तुम्हें कोई तकलीफ़ होती?

अभी तुम्हें तकलीफ़ ये नहीं है कि तुम्हें उपलब्धि नहीं मिली क्योंकि सर्वप्रथम उपलब्धि का आत्मा से, तुम्हारे हृदय से कोई ताल्लुक़ होता ही नहीं। अभी तुम्हारी तकलीफ़ ये है कि तुम्हें बता दिया गया है कि जीवन एक दौड़ है, तुम्हें भी दौड़ना है। तुम दौड़ पड़े हो, और तुम पा रहे हो कि दूसरे ज़्यादा तेज़ी से दौड़ गए। ये तुम ग़ौर कर ही नहीं रहे हो कि दौड़ना चाहिए भी था कि नहीं। इस मूल प्रश्न पर तुम आ ही नहीं रहे। ये तुम्हारा भोंदूपन है, कह सकते हो कि भोलापन है। जिन्होंने तुम्हें बताया होगा कि, "चल पठ्ठे दौड़ लगा," वो सब तुम्हारे प्रियजन-स्वजन रहे होंगे, तो तुमने अपने भोलेपन में उनपर विश्वास कर लिया। तुमने ये कभी जाँचने की ज़रूरत ही नहीं समझी कि — दौड़ना आवश्यक भी है क्या?

तुमने इस बात को सत्य का ही दर्जा दे दिया कि दौड़ना तो पक्का है, आवश्यक है, अनिवार्य है। तुमने कह दिया, "ये बात तो बिल्कुल पत्थर की लकीर है कि दौड़ना तो है ही। तमाम तरीक़ों से इसकी पुष्टि होती है। जो लोग मुझसे सबसे ज़्यादा प्रेम करते हैं उन्होंने ही मुझसे कहा है दौड़ने के लिए, उन्होंने ही गवाही दी है। दुनिया में जिधर को भी देखता हूँ उधर मुझे लोग दौड़ते ही नज़र आ रहे हैं।" तो तमाम तरीक़ों से यही पुष्टि होती है कि, "बेटा, दौड़ो।" तो तुम भी दौड़ पड़े, और दौड़ा तुमसे जा नहीं रहा है, क्योंकि दौड़ना स्वभाव तो किसी का है ही नहीं, वो भी तुम जानते ही नहीं कि क्यों दौड़ रहे हो।

अपनी हालत देखो पहले। जीवन जैसे विस्तृत खुला मैदान हो, और उसमें तुम खड़े हो। किधर कौन-सी दिशा है, इसका भी तुम्हें कुछ पता नहीं। बस तुम्हें दिखाई दे रहा है कि दर-पे-दर, टोलियों-पे-टोलियाँ, भीड़-पे-भीड़ दौड़े ही जा रही है, दौड़े ही जा रही है, और तुम्हें भी हाथ दिया गया है। पर भीतर से तुम्हारे कोई प्रेरणा उठती नहीं, इसीलिए बार-बार तुम्हारा लक्ष्य बदलता रहता है। कभी इधर को दौड़ते हो, फिर थोड़ी देर में थक जाते हो, सोचते हो कामचोरी कर लें। और तभी ऊपर से गरजती हुई आवाज़ आती है, "बेटा, ख़ानदान का नाम डुबो रहा है? दौड़! बेटा, दौड़!" और फिर दौड़ पड़ते हो, और फिर थोड़ी देर आगे जाते हो, कहते हो, "दौडूँ? क्या है? किधर को? क्या?" तभी देखते हो कि पाँच-सात आगे निकल गए, तो भीतर से ग्लानि उठती है, अपनी ही नज़रों में गिर जाते हो, फिर दौड़ पड़ते हो। तभी कोई आकर कहता है, "अरे, एक काम करो, ज़रा उधर को दौड़ो," तो दिशा बदल लेते हो। देखा है अपनी दौड़ को? ऐसी ही है कि नहीं?

आज संकल्प लोगे कि दौड़ लगानी है और एक सप्ताह बाद उस संकल्प का क्या होता है? क्या होता है उस संकल्प का?

प्रश्नकर्ता: याद नहीं रहता।

आचार्य प्रशांत: फिर जो तुम्हें आए याद दिलाने कि तुमने कसम खाई थी, तुम उसको खाने लग जाते हो, कि "वैसे तो तुझे कुछ याद रहता नहीं, तू ये याद दिलाने आ गई कि मैंने कहा था कि अब पकौड़े नहीं खाऊँगा। मैंने तो एक दिन ये भी कहा था कि तुझे छोड़ दिया, तो वो भी याद दिला!" देखा है तुमने ख़ुद से कितने वादे, कितने संकल्प किए हैं और ख़ुद ही उन्हें तोड़ा है? एक जनवरी याद करो। क्योंकि तुम्हें कुछ पता नहीं कि कौन-सा वादा करने योग्य है। ये सब कुछ बाहर से आ रहा है कि "चल!"; बाहर से आता है और फिर बाहर को ही विलीन हो जाता है। इसमें भीतरी कुछ नहीं। इसमें आंतरिक, आत्मिक कुछ नहीं। तुम्हें कुछ पता नहीं कि तुम कौन हो, तुम्हें कुछ पता नहीं कि तुम्हें किधर को जाना चाहिए, और जाना चाहिए भी कि नहीं।

पहले पूछो तो अपने आप से कि मुझे तकलीफ़ क्या है, और तकलीफ़ तुम्हें है, मैं इनकार नहीं कर रहा। भागना ही जिसकी तकलीफ़ हो, वो भागते-भागते कहे कि - "बड़ी तकलीफ़ है," तो कुछ बात बनेगी नहीं। थम जाओ, ठहर जाओ, इतना डरो नहीं, और फिर पूछो, "मैं जैसा हूँ, उसमें मुझे क्या चाहिए? वास्तव में क्या चाहिए? ऐसा तो नहीं कि मैं बिल्कुल दौड़ा नहीं, दौड़ा तो ख़ूब हूँ। और अतीत अगर गवाह है, तो जिन तरीक़ों से पहले दौड़ा हूँ, वैसे ही और दौड़ करके कहाँ पहुँच जाऊँगा? क्या पा लूँगा?" फिर हो सकता है कि गति करने को नई दिशाएं, नए आयाम मिलें। और ये भी हो सकता है कि उसके बाद गति की आवश्यकता ही न्यून हो जाए, कौन जाने?

ना गति से ऐतराज़ है मुझे, ना अगति की पैरवी कर रहा हूँ; मुझे प्रेम है हृदय से, सच्चाई से।

तुम्हारा हृदय अगर कहे कि, "दौड़ लगाओ," तो तुम बेशक़ रॉकेट बन जाओ। पर एक बार हृदय से पूछो तो सही कि "भागने से तेरा कोई वास्ता है क्या?" फिर वो कहे, "हाँ", तो तुम दौड़ लगा देना। नहीं तो बड़ी मूर्खता का दृश्य है न, जानते-बुझते कुछ नहीं, दौड़ पड़े! क्या किया? दौड़ पड़े। जैसे आठ-दस पशु कहीं पर बैठे हों, वो सब ख़ौफ़ में कांप रहे हैं, और तभी बादल गरजे और वो सारे-के-सारे दौड़ पड़े। किधर को दौड़ पड़े? कुछ नहीं जानते वो कि किधर को दौड़ पड़े, बस दौड़ पड़े।

हम सबका एक ही गोत्र है: 'दौड़ पड़े'। जीवन में कुछ भी हो, हमारे पास एक उत्तर होता है: 'दौड़ पड़े'। किधर को दौड़ पड़े? काहे को दौड़ पड़े? कब तक दौड़ते रहेंगे? क्या मिल रहा है दौड़ करके? इसका कोई जवाब नहीं। अकेले हो तुम अगर तो ये सब समस्याएँ आऍंगी ही नहीं, क्योंकि अकेलेपन में बोध होता है। बात यह है कि घिरे हुए हो, लोग बहुत हैं अगल-बगल, और वो सारे-के-सारे माहिर हैं दौड़ पड़ने में, तो तुम्हारी हिम्मत जवाब दे जाती है।

तुम कभी-कभार रुकने की कोशिश भी करते हो, तुम कहते हो, "अरे, थमूँ तो!" तभी देखते हो कि इधर से भी दौड़े, उधर से भी दौड़े, और तुम अभी दाऍं-बाऍं देख ही रहे हो कि पीछे से पूरा एक रेला आता हुआ तुम्हें ले के निकल गया। तुम नहीं भी दौड़ पड़े, तो भीड़ तुम्हें उठाके आगे भाग गई।

प्रश्नकर्ता: जैसे बम्बई की ट्रेन।

आचार्य प्रशांत: हाॅं। भीड़ बर्दाश्त नहीं कर सकती कि सब जा रहे हों और बीच में एक पानी के बहाव के मध्य पत्थर की तरह अडिग खड़ा है। ना! भीड़ आगे बढ़ रही हो और तुम बीच में खड़े हो गए, तो भीड़ तुम्हें मुफ़्त सेवा देगी, फ़्री पिक अप।

जिस माहौल में रहते हो, जिस संगत में रहते हो, उससे ज़रा अवकाश लिया करो, दूर हो जाया करो। दूर होने के बाद दूरी से जब देखोगे, तो बहुत कुछ तुम्हें हास्यास्पद लगेगा। और जिस चीज़ पर तुम हंस पड़े, उस चीज़ से तुम आज़ाद हो गए। तुम ग़ुलाम ही तब तक हो जब तक चीज़ों को गंभीरता से ले रहे हो। इसीलिए वो तुम्हारी गंभीरता टूटने नहीं देते, इसीलिए वो ऐसी-ऐसी भारी बातें करते हैं कि तुम ज़रा डरे-डरे रहो। हमारी गंभीरता डर के अलावा और कुछ होती भी नहीं। दूर हो जाओ तो हंसी छूट जाएगी, हंसी छूटी नहीं कि अब फंसोगे नहीं दोबारा।

दिक़्क़त क्या आती है, डरे आदमी को जब डर से मुक्त कराओ तो एक बार को उसे और डर लगता है; तो वो कहता है कि, "पहले वाला डर ही ठीक है क्योंकि वो ज़रा कम डरावना और जाना-पहचाना है।" उसे जब उसके सुपरिचित डरों से आज़ाद करो तो पहली बार, प्रथम दृष्टया उसका डर बढ़ जाता है। और ये बड़ा खेल है माया का कि डर से आज़ादी पाने के लिए तुम्हें डर का साक्षात्कार करना पड़ता है, तुम्हें और ज़्यादा डरना पड़ता है।

इसीलिए डर से आज़ादी हो नहीं पाती क्योंकि तुम तो वो हो जो पहले नन्हे से डर में फंसे हुए थे। तुम तो नन्हे से डर का ही उल्लंघन नहीं कर पा रहे थे न? कोई ऐसा हो जो नन्हे से डर का उल्लंघन नहीं कर पा रहा हो, और उससे कहा जा रहा है कि इस नन्हे से डर का उल्लंघन करने की ताक़त तुम्हें तब मिलेगी जब तुम इससे बहुत बड़े डर को झेल लो, तो कहेगा, "मुझसे इतना तो झेला जा नहीं रहा, और तुम कह रहे हो कि उपाय ही यही है कि तुम इससे बड़े को झेल लो।" इसीलिए लोग डर के बंधक बने रह जाते हैं।

बड़ी अनुकंपा चाहिए डर से आज़ादी के लिए, संगत की बात है। फिर संगत ऐसी चाहिए जो प्रेरणा दे, ढांढस बंधाए, बल्कि जो हाथ ही पकड़ ले। अपने बूते यदा-कदा ही होता है। कोई चाहिए होता है जो हाथ पकड़ के बिल्कुल खींच ले, और एक बार ही खींचना होता है। एक बार बाहर आ गए, दूर आ गए, फिर जैसा मैंने कहा कि - देख लेते हो और मुस्कुरा देते हो।

दूर से देखा और दूर से मुस्कुराए, टाटा बाए!

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