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उमरिया धोखे में बीत गयो रे || (2017)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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उमरिया धोखे में खोये दियो रे पाँच बरस का भोला भला, बीस में जवान भयो। तीस बरस में माया के कारण, देश-विदेश गयो। उमर सब धोखे में… चालीस बरस अंत अब लागै, बाढ़ै मोह गयो। धन धाम पत्र के कारण, निस दिन सोच भयो।। बरस पचास कमर भई टेढ़ी, सोचत खाट परया। लड़का बहुरी बोलन लागे, बूढ़ा मर न गयो।। उमर सब धोखे में… बरस साठ-सत्तर के भीतर, केश सफ़ेद भयो। वात-पित्त-कफ घेर लियो है, नैनन नीर बहो।। न हरि भक्ति न साधो की संगत, न शुभ कर्म कियो। उमर सब धोखे में… कहै कबीर सुनो भाई साधो, चोला छूट गयो।।

~ संत कबीरदास

आचार्य प्रशांत: ‘उमरिया’ बड़ा लम्बा अंतराल हो जाता है समय का तो आदमी को छुपने का बहाना मिल जाता है। पहली बात तो उमरिया अभी बीती नहीं पूरी, दूसरी बात, इतना लम्बा है कि अब उसकी जाँच-पड़ताल कौन करे कि धोखा हुआ है कहीं।

उससे ज़्यादा अच्छा ये रहता है कि समय का छोटा सा खंड उठाइए और उसको देख लीजिए कि धोखे में बीता है कि नहीं बीता। दस मिनट, आधा घण्टा, एक घण्टा, आधा दिन – वहाँ ज़्यादा साफ़ हो जाता है कि धोखे में बीता है कि नहीं बीता।

जो कुछ भी पूर्णता से करे जाने पर और बेहतर हो सकता था, और ज़्यादा तृप्ति दे सकता था, लेकिन पूरे तरीके से नहीं किया गया, तृप्ति नहीं मिली। समझ लीजिए, वहीं धोखे में अवसर गँवा दिया। अब ये भी हो सकता है कि भजन की तैयारी की, और डूबा जाता उसमें, नहीं हो सकता? “भजनवा धोखे में बीत गयो रे” (गाते हुए) “गौरव नींद में सोई गयो रे”।

उम्र और क्या होती है, यही समय के जो छोटे-छोटे टुकड़े हैं, यही मिल कर उम्र बन जाते हैं न। दो घण्टे यहाँ गँवा दिए, दो घण्टे वहाँ गँवा दिए, कुल मिला कर? पूरा जन्म गँवा दिया – दो घण्टे यहाँ गँवाए, दो घण्टे वहाँ गँवाए। अभी हम एक फ़िल्म देखने गए थे, “जग्गा जासूस”। उसमें एक डॉयलाग था, उसके बाद उसी पर एक हल्का-फुल्का गाना था, रोंगटे खड़े कर देने वाला था। वो सिर्फ इतना सा था गाना, एक लाईन थी उसमें, उसको बार-बार दोहरा रहे थे – “सारे खाना खा के दारू पी के चले गए, सारे खाना खा के दारू पी के, चले गए”। (मुस्कुराते हुए) मतलब समझ रहे हैं इसका? “उमरिया धोखे में बीत गयी रे; सारे खाना खा के दारू पी के, चले गए रे”। समझ रहे हैं? खाना खाया पेट के लिए, दारू पी दिमाग के लिए, और चले गए। सारे खाना खा के दारु पी के, चले गए। (ऊपर की ओर इशारा करते हुए।)

(गुनगुनाते हुए) उमरिया धोखे में बीत गई रे, बसवा धोखे में छूट गई रे, माया धोखे से जीत गयो रे। अब तीन दिन का कैंप है, एक दिन बीत गया, कुछ लोगों ने अभी तक मुँह ही नहीं खोला है। कैम्पवा चुप्पी में बीत गया रे। (गुनगुनाते हुए) कैम्पवा चुप्पी में बीत गया रे, कैम्पवा चुप्पी में बीत गया रे।

ऐसे बीतती है उमरिया। कोई बोल कर थोड़े ही बीतती है, कि मैं उमरिया हूँ, और मैं जा रही हूँ। ऐसे ही बीतती है।

ग़ालिब का है, ठीक-ठीक शेर याद नहीं आ रहा, पर ऐसा है कि, “चार दिन लाए थे ज़िन्दगी के, दो आरज़ू में कट गए, दो इंतज़ार में”। तीन दिन का कैंप है, इसको धोखे में नहीं बिता देना है। जैसे तीन दिन ज़िन्दगी होती है न, वैसे ही। पता नहीं चलेगा और विदाई हो जाएगी।

सोते हमेशा हो, यहाँ ज़रा कम सो लो। इधर-उधर मन हमेशा भागता है, अभी ज़रा उसका भागना थोड़ा नियंत्रित कर लो।

अच्छा, आठ से दस तुम्हारा पेपर (परीक्षा) हो और दस ही बजे नींद खुले तो कैसा लगता है? तो वैसे ही जब बहुत देर हो चुकी हो, और होश आए तो कैसा लगेगा? पर लगेगा बहुत ज़ोर का, “आह, लगा।” बचेगा तो कुछ नहीं, पर लगेगा बहुत ज़ोर का। कौन-कौन चाहता है कि ऐसा हो उसके साथ? कि जब समय पूरा बीत चुका हो, तब पता चले कि अरे, बर्बाद हो गए।

प्रश्नकर्ता: सर, बच्चे तो ऐसे कहते हैं, “ओह! दस बज गया, एग्ज़ाम छूट गया, चलो अब छूट ही गया है तो थोड़ा और सो ही लेते हैं।” मुश्किल से पाँच मिनट के लिए अफ़सोस होता है।

आचार्य: जो आपको प्यारा हो, उसका देख लीजिए। परीक्षा आपको नहीं प्यारा है, कुछ और प्यारा होगा। ऐसा कोई नहीं होता जिसे ज़िन्दगी ना प्यारी हो। और प्रमाण उसका यह है कि जैसे ही ज़िन्दगी छिनने की ज़रा सी भी बात होती है, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं, इधर-उधर भागने लग जाते हैं। छुपने लग जाते हैं। परीक्षा नहीं प्यारा है, ज़िन्दगी तो प्यारी है? कोई है ऐसा जिसको ज़िन्दगी ना प्यारी हो?

और ज़िन्दगी के आख़िरी पड़ाव पर आ कर पता चले कि पूरी ज़िन्दगी बिलकुल बर्बाद कर ली है, तो कैसा लगेगा? और धोखे में ही रह आए, सोचते रहे, "वाह! वाह! वाह! सब ठीक-ठाक चल रहा है। इसी को तो जीवन कहते हैं।" और फ़िर धीरे-धीरे पता लगना शुरू हो, भेद खुलना शुरू हो। क्या? “उमरिया धोखे में बीत गयो रे।” तो कैसा लगेगा?

कुछ-कुछ वैसा लग रहा है अभी?

एक-एक पल जिसको गँवा रहे हो, उसको सौ प्रतिशत निचोड़े बिना, इसी को कहते हैं, उमरिया को धोखे में गँवा देना। कितने मौके, कितने कैंप, कितने दिन, कितने गीत, जो अनजिए, अनगाय, गुज़र गए। ये लौट कर थोड़े ही आएँगे। आगे फ़िर कुछ और आता है। आगे आते हैं क्या? हिलते दाँत, सफ़ेद बाल, घरघराती आवाज़, मौत की आहट। किसी की उमर पैंतालीस से पैंतीस होते देखी है?

प्र: पचपन सीधा।

आचार्य: पैंतालीस से तो पचपन ही होती है।

किसी के बिलकुल सफ़ेद बाल काले होते देखे हैं?

जैसे किसी को गाड़ी चलाते हुए झपकी आ गई हो, और एक्सीडेंट (दुर्घटना) से ठीक आधे सेकंड पहले उसकी नींद खुली, क्या होगा? कैसा लगेगा? वो आधा सेकंड कैसा होता है? कैसा होता है? आधे सेकंड पहले नींद खुल भी गई, और आपको पता है अब आप कुछ कर नहीं सकते। ट्रक ठीक सामने है, आप अस्सी पर हो, ट्रक सौ पर है। कुछ कर नहीं सकते और नींद भी खुल गई है। अब? जब कुछ कर सकते थे तब आप?

प्र: सो रहे थे।

आचार्य: बहुत नींद आती है, बहुत नींद आती है! मौत सारी नींदें खोल जाती है, लेकिन? बहुत देर होने के?

प्र: बाद।

आचार्य: कहानियाँ हैं जो कहती हैं कि ज़्यादातर लोगों को मौत के क्षण में पता चल जाता है कि ज़िन्दगी बर्बाद कर ली। और यही कारण है कि फ़िर उनका पुनर्जन्म होता है ताकि दूसरा जन्म बर्बाद ना करें। तो आप ज़िन्दगी भर अपने आप से कितना भी झूठ बोल लो, कि, "नहीं, मेरा तो जीवन बहुत अच्छा चल रहा है, मैं तो बहुत मस्त हूँ, बड़ा प्रसन्न हूँ", मौत के क्षण में राज़ खुल ही जाता है, पर्दाफ़ाश हो जाता, पता चल जाता है कि?

“उमरिया धोखे में बीत गयो रे।”

इसीलिए कहते हैं कि मरता आदमी कभी अपनी मौत देखता नहीं है, उसे इतनी ज़ोर का झटका लगता है अपने व्यर्थ गए जीवन का, कि वो मरते-मरते बेहोश हो जाता है। होश में कोई नहीं मरता। मरने से थोड़ी देर पहले सब बेहोश हो जाते हैं। इतनी ज़ोर का झटका लगता है। अब ये सब बताने के तरीके हैं, पर क्या बताया जा रहा है, इशारा समझिए। एक-एक पल जो आपने जीवन का व्यर्थ गुज़ारा होता है, वो लौट कर के आता है उस समय और सवाल पूछता है, कि, "मुझे बर्बाद क्यों किया? ये मौका चूके क्यों? ये पल व्यर्थ क्यों जाने दिया? क्यों सोते रहे? क्यों मेहनत नहीं करी? क्यों होश में नहीं रहे?"

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