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तीन धोखे जो सब खाते हैं (और तीसरा खतरनाक है) || आचार्य प्रशांत, बातचीत (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल है कि अगर अध्यात्म हिंसा की दवा है और हर तरह की दुख निवृत्ति की। तो क्यों जब हमारा देश — अब मैं ग़लत भी हो सकती हूँ, पर मैंने जो सीखा, समझा है कि — हमारा देश बहुत बड़ा सेंटर (केंद्र) है पूरे विश्व में, सिन्धु है, जहाँ इतने सारे रिलिजन (धर्म) और इतने आध्यात्मिक गुरु हमें मिले हैं।

फिर भी हमारी आबादी या जो हम डेमोग्राफिकली (भौगोलिक रूप से) हैं अभी भी हिंसक हैं, गंदगी में हैं। बहुत सी चीज़ें अप टू एक्सपेक्टेशन (अपेक्षा अनुसार) नहीं हैं, जो अध्यात्म देता है। अभी भी बहुत कमियाँ हैं। तो ऐसा क्यों है?

आचार्य: अध्यात्म कोई हवा में तो है नहीं भारत की कि बच्चा पैदा हुआ है यहाँ और साँस लेगा तो आध्यात्मिक हो जाएगा। अध्यात्म के लिए सीधे-सीधे ग्रंथों, किताबों तक जाना पड़ता है। सिर्फ़ हम भारत देश में पैदा हुए हैं तो उससे आध्यात्मिक थोड़े ही हो जाएँगे। यहाँ कौन है जो ग्रंथो को पढ़ रहा है? बहुत कम, न के बराबर। तो बस बात वहीं ख़त्म हो जाती है, कौन पढ़ रहा है?

प्र: अज्ञानता ही है मतलब।

आचार्य: अभी हम यहाँ पर हैं। कल यहाँ पर ही बहुत अच्छी बुक शॉप (किताबों की दुकान) है रामकृष्ण मिशन की। तो हमारे यहाँ के कुछ लोग गये वहाँ पर किताबें लीं। पुस्तक प्रेमी हैं संस्था में, लोग जाते हैं, देखते हैं किताबें तो लेते हैं।

तो मुझे बाद में बताया अभी सुबह कि गये वहाँ पर हमने कहा यूपीआई पेमेंट ले लीजिए। बोले यूपीआई तो है नहीं। बोले आज के समय में यूपीआई नहीं लेते? बोले ये बम्बई है यहाँ लोग इतने आते ही नहीं हैं किताबें खरीदने। तो हमारा काम कैश, कार्ड से ही चल जाता है।

श्रोता: और वो भी ऐसी किताबें।

आचार्य: और ये बात हो रही है 'रामकृष्ण' और 'विवेकानंद' की पुस्तकों की। तो सिर्फ़ इसलिए कि आप भारत देश में पैदा हुए हो या मान लीजिए बंगाल में भी पैदा हो गये हो, आध्यात्मिक थोड़ी हो जाओगे?

पैदा तो सब जानवर ही होते हैं। आप कहीं भी पैदा हों, जानवर ही तो पैदा हुआ है। उसको इंसान तो बड़ी मेहनत से बनाना पड़ता है। आप न किताब पढ़ोगे, किताब के नाम पर वही किताब पढ़ोगे जिससे रोटी कमा सको। हमारी जो पूरी शिक्षा व्यवस्था है वो रोटी की व्यवस्था है बस। आपको वही-वही बातें बताई जाती हैं जिससे आप रोटी कमा लोगे। और सबसे ऊँचे कॉलेज भी वही माने जाते हैं जिससे सबसे ज़्यादा ऊँची रोटी मिलती है — प्रोफेशनल एजुकेशन (व्यवसायिक शिक्षा)। प्रोफेशनल एजुकेशन और कोई एजुकेशन नहीं चाहिए, आर्ट्स (कला) की नहीं चाहिए, सिर्फ़ प्रोफेशनस की चाहिए कि मैं किसी रोजगार, किसी धंधे, किसी व्यवसाय में लग जाऊँ।

इनर एजुकेशन (स्वयं की शिक्षा) की तो बात ही बहुत दूर की है। उसका तो कोई संस्थान होता ही नहीं है।

श्रोता१: उसका ज़िक्र ही नहीं।

श्रोता२: कोई स्कूल में फिलोसॉफी नहीं पढ़ाते।

आचार्य: फिलोसॉफी नहीं पढ़ाते। हम हैं क्या, इसकी तो बात ही नहीं है। ऐसी हम पर गरीबी छायी हुई है भीतरी कि हमें बस एक चीज़ दिखती है — पैसा।

श्रोता: न्यूट्रीशन भी नहीं पढ़ाया जाता, जैसे आपके सेहत के लिए क्या अच्छा है, आपको कैसे जीना चाहिए। फिलोसॉफर्स में तो सिर्फ इंडियन नहीं वेस्टर्न फिलोसॉफर्स भी इतने अच्छे हैं।

आचार्य: बहुत ऊँचे-ऊँचे प्रोफेशनल इंस्टीट्यूशन से निकले हुए लोग घोर अंधविश्वासी हैं। क्योंकि उनको मन और जीवन के बारे में कुछ बताया नहीं गया है।

आपको जानकर आश्चर्य होगा, जो देश के शीर्ष, तथाकथित शीर्ष संस्थानों से निकले हुए लोग हैं उनमें से भी बहुतों को विगनिजम (शुद्ध शाकाहार) की अच्छी जानकारी नहीं है। उनमें से बहुतों को तो ये जो पूरा पर्यावरण का संकट है इसकी भी अच्छी जानकारी नहीं है।

बस वो कहीं पर अपना जा करके सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन गये हैं, आगे बढ़ गये हैं, वहाँ अपना कोडिंग वग़ैरह करी, फिर कंपनी में कुछ बन गये या किसी बैंक में जाकर के, इन्वेस्टमेंट बैंक में अमेरिका में बैठ गये हैं। वहाँ कुछ उनका चल रहा है, लंदन में बैठे हुए हैं।

लेकिन उनको न अपना कुछ पता है न दुनिया का कुछ पता है। उनको कुल जो पता है वो एक छोटे से अपने व्यवसायिक क्षेत्र के बारे में पता है। हाँ, उससे उनको पैसा अच्छा मिल जाता है।

प्र२: लेकिन एक चीज़ है जो मैंने नोटिस की है कि जब कोई वीगन बनता है तब वो एटलीस्ट धीरे-धीरे बदलाव तो लाना चालू करता है, कंजूमरिज्म (उपभोग) की तरफ़ भी। स्लोली (धीरे-धीरे) वो एनवायरनमेंट (पर्यावरण) के लिए भी, फैशन इंडस्ट्री को जानेगा कि इसमें कितना पोलूशन (गंदगी) हो रहा है, कितना एक्सप्लौइटेशन (शोषण) हो रहा है। उधर भी अपना जितना हो सके शायद कुछ तो कम करेगा। सिर्फ़ एनिमल्स (जानवर) की तरफ़ नहीं, इंसान की तरफ़ भी कुछ तो बदलाव लाता है। तो कोई शुरुआत नहीं हुई?

आचार्य: नहीं बिलकुल हुई, शुरुआत कैसे नहीं हुई, सौ प्रतिशत हुई। इसलिए तो उस शब्द को ही घर-घर तक पहुँचाने के लिए कोशिश कर रहे हैं। आपसे पहले भी बात हुई है। आज फिर बात हो रही है, आगे भी होती रहेगी।

तो वो चीज़ तो ज़रूरी है, अच्छी ही है कि शुरुआत हो। बात तो पहुँचे कि क्या है। लेकिन बहुत सारे पढ़े-लिखे लोग भी हैं जिन तक अभी यह बात भी नहीं पहुँची है। उन्हें कुछ नहीं पता। एक आईआईटीअन हो सकता है ऐसा कि विगनिज्म और इनवायरमेंटल क्राइसिस (पर्यावरण आपदा) और क्लाइमेट कैटेस्ट्रॉफी (जलवायु विध्वंस) ये सब तो छोड़ दीजिए, उसने ज़िंदगी में दो ढंग की किताबें न पढ़ी हों, एक ढंग की किताब न पढ़ी हो, ऐसा भी हो सकता है। और वो कहने को होगा आईआईटीअन , उससे पूछ लीजिए अभी आप के भारत के या दुनिया के दो-चार अच्छे ऑथर्स (लेखक) का नाम बता दो, उसको नहीं पता होगा।

प्र२: तो सोसाइटी में क्या ऐसा चेंज लाना चाहिए कि लोग ज़्यादा जागरूक हो इसके बारे में जैसे आप बोल रहे हैं कि हम अभी भी जानवर हैं।

आचार्य: पुरानी कहानी फिर से याद करनी पड़ेगी। हम क्यों निकले थे जंगल से, उस बात को लगातार याद रखना पड़ेगा। हमें जिस चीज़ की मूल तलाश है, उससे क्यों भटक रहे हैं हम?

बच्चा घर से निकाला है बाज़ार से कुछ लाने के लिए लेकिन इधर-उधर की रंग-ढंग और रौनक देख कर के वो भटक गया है, बहक गया है। उसको याद दिलाना पड़ेगा तू घर से क्यों निकला था। उसे कुछ याद नहीं है उसको अभी ये दिख रहा है कि यहाँ फ़लाना खिलौना मिल रहा है, यहाँ पर चिकन मिल रहा है, यहाँ मनोरंजन मिल रहा है, वो यही देख रहा है अभी बस। न उसको अपने घर का कुछ याद है न अपने लक्ष्य का कुछ पता है। बाज़ार में अंधा बनकर भटक रहा है।

प्र३: मुझे बस एक बात का टोटल अवेयरनेस (जानकारी) हुआ है कि आप से मिलना मेरे लिए थोड़ा भी अच्छा नहीं है।

आचार्य: मैं अपने लिए अच्छा नहीं हूँ, मैं किसी और के लिए कैसे अच्छा होऊँगा?

प्र१: उसके बाद क्या? वो कहानी एक बार दोहराने के बाद कि मुझे याद करना है कि हम सब क्यों निकले थे, मैं क्यों निकाली थी जंगल के बाहर या फिर इंसान क्यों निकले थे जंगल के बाहर, फिर?

आचार्य: फिर जो होना होता है अपनेआप हो जाता है। आप भूल गयी हैं आप घर से क्यों निकली थी, मैं आपको याद दिला दूँ। फिर क्या होगा? फिर आप मुझसे पूछेंगी आगे का बताओ?

प्रश्नकर्ता: हाँ, फिर मैं क्या करूँ फिर?

आचार्य: एक आदमी बेहोश पड़ा हुआ है। ठीक है? कुछ बड़बड़ा रहा है, पगला है, सड़क पर पड़ा हुआ है। आप उसे होश में ले आए। अब उसे क्या करना है, इसकी आपको क्या फ़िक्र है? वो होश में आ गया तो जो करना है स्वयं करेगा।

श्रोता: तो हमारे एक्शन अपनेआप चेंज हो जाएँगे।

आचार्य: फिर का प्रश्न ही नहीं है। हम क्या कर रहे हैं? वही बात, नशे की हालत में हम अपनेआप को बोल रहे हैं कि अगर नशा उतर भी गया तो फ़ायदा क्या।

ये सवाल ही किस चीज़ से उठ रहा है? यह सवाल ही इस चीज़ से उठ रहा है कि मैं घोर नशे में हूँ और नशे में मैं कह रहा हूँ — अजी साहब, ज़िंदगी ऐसी है, बिलकुल फिलोसॉफी झाड़ रहा हूँ ज़बरदस्त। नशे में फिलोसॉफी ख़ूब और ये-वो, दुनियादारी, 'मैं दुनिया समझता हूँ, जी हमने ये देखा है, हमारा ये अनुभव है,' सब अपना पूरा बता रहा है। किस्से बता रहा है कि आशिकी हुई थी एक बार। सब बता रहा है। और कोई कह रहा है कि 'बहुत पी ली है।' तो कह रहा है नशा उतर भी गया तो क्या होगा।

ये जो वक्तव्य है 'नशा उतर भी गया तो क्या होगा' ये कहाँ से आ रहा है?

श्रोता: इस अवेरनेस से कि ज़िंदगी के बारे में उसको कुछ नहीं पता है।

आचार्य: मैं नशे की हालत में जो कुछ भी बोल रहा हूँ वो कहाँ से आ रहा है?

श्रोता: नशे से।

आचार्य: तो 'नशा उतर भी गया तो क्या होगा' ये बात भी कहाँ से आ रही है?

श्रोता: नशे से।

आचार्य: तो इस बात का जवाब दूँ या नशा उतारूँ?

श्रोता: नशा उतारो।

आचार्य: अगर मैं जवाब दे भी दूँगा तो वो जवाब आप किस हालत में सुनोगे?

श्रोता: नशे की हालत में।

आचार्य: लेकिन जब तक आप नशे की हालत में हो आप यही सवाल पूछते रहोगे "नशा उतर गया तो क्या होगा?"

भाई, उतार तो दे, उसके बाद भी अगर तू ये सवाल पूछेगा तो मैं जवाब दे दूँगा लेकिन बात ये है कि जब नशा उतर जाता है तो ये सवाल भी उतर जाता है।

हम यह मानते ही नहीं कि हम नशे में हैं। हम कहते हैं, "नहीं, पहले इस सवाल का जवाब दो, हमें संतुष्ट करो, तब हम नशा उतारेंगे।"

जब तक आप नशे में हैं इस सवाल का कोई जवाब आपको संतुष्ट करेगा ही नहीं क्योंकि आप संतुष्ट होना चाहते ही नहीं क्योंकि आप नशे में हो।

इसलिए जो चीज़ हमें सबसे ज़्यादा रोकती भी है न वो ये है कि "अच्छा ये बात अगर सारी ठीक भी है तो फिर आगे क्या होगा?" यह सवाल मत पूछिए, यही मेरी सलाह है। ठीक है? और ये और ख़तरनाक सलाह है। यह और ख़तरनाक है, ये मत पूछा करिए आगे क्या होगा। जो ग़लत है उसको रोकिए।

मैं बताऊँ "आगे क्या होगा?" क्यों नहीं पूछना चाहिए? क्योंकि आगे आप वो इंसान ही नहीं रहोगे जो आज इस चिंता में है कि आगे क्या होगा। ये चिंता किसको है कि आगे क्या होगा?

श्रोता: इस इंसान को।

आचार्य: जो व्यक्ति ग़लत है। ये इंसान बदल गया तो क्या ये चिंता भी बचेगी?

श्रोता: नहीं।

आचार्य: तो चिंता क्यों कर रहे हो? तुम बदल जाओ ना। चिंता ही नहीं बचेगी।

श्रोता: बिलकुल।

आचार्य: हम बहुत मेहनत कर-करके ख़ुद को बर्बाद करते हैं।

श्रोता: और फिर आप कह रहे हैं छोड़ के बदलो।

आचार्य: नहीं, मत छोड़िए। कोई ज़रूरी नहीं है न छोड़ना। हमें क्या पता। आगे अगर हम अभी छोड़ने की भी बात कर रहे हैं तो किस हालत में बात कर रहे हैं?

श्रोता: नशे की।

आचार्य: तो कौन कह रहा है कि ये हालत बनाए-बनाए छोड़ दो।‌ वो तो पुराने तरीक़े का धर्म हो गया कि त्यागो, रिनेंसिएट। रिनंसिएशन कर रहे हो और भीतर से नशे में ही हो, तो उस त्याग से क्या लाभ हो जाएगा? और क्या पता कि जितनी चीज़ें आपके पास है उसमें से क्या त्यागना ज़रूरी है, क्या नहीं त्यागना है। कौन सी चीज़ हो सकता है त्यागने की जगह और अर्जित करने की ज़रूरत हो। यह भी तो हो सकता है। बात है नशा हटाओ।

प्र३: आपने वो वर्ड (शब्द) इस्तेमाल किया तो मैं भी करता हूँ। जब हम नशे में रहते हैं तो ये हम अपनेआप के साथ ही हिंसा कर रहे हैं?

आचार्य: बहुत बढ़िया! और दूसरों के प्रति हम जो भी हिंसा करते हैं वो सर्वप्रथम अपने प्रति हिंसा है। आप दूसरों के प्रति हिंसक हो ही इसीलिए क्योंकि आप अपने प्रति हिंसक हो, बहुत दुख में हो।

जो आदमी आनंद में है, वो दूसरे की बुराई नहीं करता। ग़ौर करिएगा, जब आप बिलकुल तृप्त, संतुष्ट हो पाये कुछ पलों को भी तो क्या तब दूसरे के अहित का ख़्याल आया था? तब तो दूसरे ने अगर आपका बुरा भी कर दिया हो तो बदला लेने की भावना हट जाती है। कहते हो माफ़ करो यार, मौज करो। अच्छा लग रहा है, सब बढ़िया है, सब अच्छा है।

श्रोता: वो हिंसा वहीं से चालू होती है न, ख़ुद से पहले। जैन धर्म में ये है क्षमापना का, कि हर साल जब हमारा प्रयूषण होता है तब क्षमापना माँगते हैं।

तो मुझे लगता है उसका सबसे बड़ा कारण है कि जब हम क्षमापना देते हैं तो सबसे पहले अपने अंदर से जो भी है वो निकालते हैं।

तो वो क्षमापना दे कि नहीं दे, एटलिस्ट आई एम हैप्पी (कम-से-कम मैं तो खुश हूँ), मैंने निकाल दिया। सो दैट अहिंसा टूवर्ड योर सेल्फ इस सो इम्पोर्टेंट (तो वो अहिंसा ख़ुद की तरफ़ बहुत महत्वपूर्ण है)

आचार्य: देखिए, थोड़ा-बहुत असर तो हर चीज़ का पड़ता है, बिलकुल पड़ता है। अगर हम ये कह रहे हैं कि एक घटिया सी फ़िल्म देख करके आदमी का मन थोड़ा और गन्दा हो जाता है। अभी हम बात कर रहे थे न। और एक अच्छी फ़िल्म देख करके कुछ तो सफ़ाई होती है।‌ हम फ़िल्म इंडस्ट्री की बात कर रहे थे।

उसी तरीक़े से साल में एक दिन भी अगर आप थोड़ा अपनेआप को बेहतर बनाते हैं उससे थोड़ा तो अंतर पड़ता है। लेकिन उसमें भी अभी एक और पूँछ जुड़ी हुई है बात में। वो ये है कि नीयत अगर ख़राब हो आदमी की तो आदमी उस एक दिन का इस्तेमाल कर सकता है बाक़ी तीन सौ चौसठ दिन बुरा ही बने रहने के लिए। और कह सकता है कि मैं अच्छा आदमी हूँ, मैंने उस दिन अच्छाई कर दी न। और बाक़ी साल मैं जैसा हूँ उसमें क्या हो गया? मुझे लाइसेंस और मिल गया। जैसी मेरी ज़िंदगी चल रही थी उसको वैसा चलाने का। तो ले-देकर के अपनी नीयत पर निर्भर है।

जो हमारे पर्व-त्यौहार आते हैं ये एक नयी शुरुआत भी दे सकते हैं हमको और जैसी ज़िंदगी चल रही है उसी को पूर्ववत, यथावत चलाये रखने में भी वो एकमात्र सहयोगी हो सकते हैं।

श्रोता: आपने जैसे कहा ज्ञान से करो या अज्ञान से करो। वो ही चीज़ है।

आचार्य: नीयत की बात है। चाहिए क्या? नीयत ठीक कर दो। बता दो इंसान को वो कहाँ पर खड़ा हुआ है; सब अपने काम अपनेआप ही कर लेंगे क्योंकि हर आदमी अपनी भलाई चाहता है न। ऐसा कौन है जो चाहता है कि तकलीफ़ में, दुख में, अंधेरे में जिये, लड़खड़ाता रहे, ठोकर खाये, कोई नहीं चाहता है। तो इंसान को अगर जगा दिया, एक बार वो सही केंद्र से आँख खोलकर देखने लग गया उसके बाद वो अपने सब निर्णय ख़ुद करेगा, ठीक करेगा; नीयत आ जाती है न फिर उसमें। इनकी इंडस्ट्री (फ़िल्म उद्योग की बात कर रहे) का रोल उसमें बहुत अहम है, बहुत ज़्यादा। क्योंकि नशे को बनाये रखने में मनोरंजन एक प्रमुख साधन है, नशा कायम रहे।

आदमी दिन भर गंदी ज़िंदगी जीता है, उसका उसको तनाव उठता है। और वो तनाव वास्तव में परिवर्तन का माध्यम होना चाहिए। मैं बहुत घटिया तरीक़े का जीवन जी रहा हूँ जैसे हर आम आदमी जीता है तो उसका अंज़ाम क्या होगा? एक भीतरी क्लेश, ग्लानि, तनाव, चिंता कुछ चीज़ है वो कलेजे को बिलकुल काटेगी; ऐसा होगा न? तो इससे क्या होगा, जो तनाव उठेगा ये क्या करेगा? ये कहेगा कुछ बदलना ज़रूरी है। ये तनाव एक चेंज एजेंट (परिवर्तन का माध्यम) बनेगा। लेकिन मनोरंजन क्या करता है, वो उस तनाव को न्यूट्रलाइज (शून्य) कर देता है। मनोरंजन तनाव के दाँत तोड़ देता है। तो फिर आदमी नशे में रहा आता है।

मनोरंजन का नशा, बहुत घातक नशा है यह। एक फॉल्स रिलीफ़ (झूठी राहत) मिल जाती है न। आप भर गये हो बिलकुल गुब्बारे की तरह तनाव से, विस्फोट अब हो जाए, क्रांति हो ही जाए, मज़ा आ जाए बिलकुल। जैसी ज़िंदगी चल रही है, एक विस्फोट हो जाए, अभी हो जाए। लेकिन फिर मनोरंजन आ जाता है। उसमें आपको एक फॉल्स रिलेक्सेशन मिल जाता है, एक झूठी राहत। ये झूठी राहत बहुत बड़ी ईविल (दानवी) चीज़ है।

हम सब मिल करके अपनेआप को ही मूर्ख बना रहे हैं।

श्रोता: पहले तो अपनेआप को ही बना रहे हैं।

आचार्य: सब। इस पूरी व्यवस्था का उद्देश्य ही यही है कि मैं भी मूर्ख बना रहा हूँ और तू भी नशे में रह।

श्रोता: लेकिन इस हर चीज़ में चॉइस (चुनाव) रहती है। और वह चुनाव हमें बुद्धिमत्ता से करना चाहिए।

आचार्य: प्रोवाइडेड दैट यू आर नौट टॉट दैट यू डू नॉट हैव चॉइस (अगर आपको यह नहीं सिखाया गया है कि आपके पास चुनाव नहीं है)। अगर आपकी शिक्षा व्यवस्था, आपका मनोरंजन, आपकी पारिवारिक व्यवस्था, सामाजिक प्रभाव सब इस तरीक़े के हैं जो आपको बोलते हैं "साहब, इसका कोई विकल्प नहीं है। ऐसे ही सब जीते हैं तुम भी जीओगे।" माँ-बाप बच्चों से बात-बात में क्या बोलते हैं, "अच्छा, तू ही बड़ा लाट साहब है, तू ही कुछ अलग काम करेगा, ये देखो साहब ये अलग निकल के आये हैं।"

ये क्या बोल रहे हैं हम उसको? हम कह रहे हैं यू डू नोट हैव चॉइस, टोअ अवर लाइन (तुम्हारे पास चुनाव नहीं है, हमारे रास्ते पर चलो)। जैसे हम जिये वैसे तू भी जिएगा। अलग चलने की कोशिश मत कर, मारा जाएगा।

श्रोता: हम उधर ही हिंसा करते हैं।

आचार्य: हिंसा तो है। थोड़ा समझना पड़ेगा। हिंसा करने में नहीं होती, हिंसा होने में होती है। हमने बार-बार ऐसे अपनेआप को यकीन दिला दिया है कि हिंसा किसी कृत्य में है, किसी एक्ट में है। हिंसा एक्शन (कर्म) में नहीं बीईंग (होने) में होती है। आप अज्ञानी हो तो ये हिंसा है। उसके बाद आप कुछ करो, न करो; कुछ भी करो, कुछ भी न करो; सब हिंसा है। तो ये नहीं है कि मैंने हिंसा कर दी, मैं हिंसक हूँ; बीईंग, अस्तित्व। मैं ग़लत बन कर बैठा हुआ हूँ, यही हिंसा है। उसके बाद मैं अपनी ओर से कोई अच्छा काम भी करूँगा वो भी हिंसक होगा।

इतने तो दुनिया में सब अच्छे ही काम कर रहे हैं न लोग। अच्छा क्या है उसमें, हिंसा-ही-हिंसा है।

मुझसे कोई कह रहा था—जैन धारा की बात हो रही है तो—मोर के पंख का इस्तेमाल होता है न, करते हैं न। इतनी आसानी से मोर के पंख मिलते नहीं हैं तो वो मोरों से नोचे जाते हैं। अब ये साधुता है कि मोरों से पंख नोचे जा रहे हैं? ज़िंदा पक्षी से उसका पंख नोचा जा रहा है ताकि साधुता का प्रदर्शन चलता रहे। और उन पंखों से शायद मार्ग बुहारा जाता है, सड़क साफ़ की जाती है। वो आ रहे हैं, साफ़ करते चलो, वो आ रहे हैं; ऐसा ही होता है?

श्रोता: मुझे दिगंबर का इतना पता नहीं है, लेकिन वो लोग यूज करते हैं वो पता है मुझको। लेकिन वही बात है जो धर्म, पूरा जैन धर्म अहिंसा पर है और बहुत क्लियरली लिखा हुआ है कि जिधर आपको हिंसा लगे उससे दूर रहो, उससे बचो। लेकिन आज हम वो सोचते नहीं हैं, जो ट्रेडिशन (परंपरा) चला आ रहा है और ट्रेडिशन्स बदलते रहते हैं। ऐसा नहीं है कि पहले से मतलब 'महावीर' के समय से आ रहा है। ट्रेडिशन्स बदलते गये हैं और हम वही ट्रेडिशन से चल रहे हैं। उसमें सोचते नहीं है कि यह सही है यह ग़लत है, यह कैसे आ रहा है, इसमें हिंसा है कि नहीं है।

और मैं सोचती हूँ कि हिंदुइज्म और जैनिज्म दोनों प्राचीन धर्म हैं, दोनों में अहिंसा का बहुत बड़ा रोल है। लेकिन फिर भी दोनों धर्मों में इतनी हिंसा देखी जाती है तो क्या कारण है?

आचार्य: आपने कहा न पहली बात कि हिंसा से बचो ऐसी मुनियों की और ऋषियों की सीख रही है। सुनने वालों ने सोचा हिंसा कहीं बाहर है उससे बचना है, 'हिंसा से बचो रे, वो रही हिंसा उससे बच कर रहना।' हिंसा से बचने का मतलब है स्वयं से बचना। मैं ही हिंसक हूँ। अहंकार ही प्रथम हिंसा है, अहंता, मेरा होना, मेरी हस्ती, मेरा अस्तित्व।

जिस क्षण मैं कहता हूँ "मैं हूँ," हिंसा हो गई। मैंने जब कहा "मैं हूँ," उसी क्षण हिंसा हो गई। तो हिंसा से बचने का मतलब होता है अपनेआप से बचना माने सबसे पहले तो ख़ुद से दूरी बना कर के रखो, 'ये बंदा ठीक नहीं है, ये जानवर है, ये वनमानुष शर्ट पहन करके घूम रहा है, इससे ज़रा दूर रहो।' मार नहीं देंगे इसको, पर याद रखेंगे कि है ये जानवर ही है।

भाई, मुझे कोई वनमानुष मिलेगा, अच्छी बात है, भली बात है। मैं थोड़ा उसी के साथ खेलकूद लूँगा, अगर मेरे हाथ में केला है तो उसको दे दूँगा खा ले भाई। लेकिन मैं ये थोड़ी करूँगा कि ज़िंदगी के निर्णय वनमानुष से पूछ कर लूँ? तो आप भी अपनी ज़िंदगी के निर्णय ख़ुद से पूछ के मत लिया करिए। हम वनमानुष हैं।

क्या आपको पसंद है? पपी, डोगी या किटन, बिल्ली का बच्चा, चूहे का बच्चा, कुछ भी। आपको जो भी पसंद आता है। अब आपको क्या नौकरी करनी है ये उससे पूछ कर करोगे क्या? वो बहुत प्यारा है, आप उसे गोद में खिला लो अच्छी बात है, उसको टोपी पहना दो, जो करना है करो।

लेकिन आपको प्रेम करना है कि नहीं करना है, किससे करना है, जीवन में किधर जाना है, कहाँ बसना है, कौन सा ग्रंथ पढ़ना है, ये सब आप बिल्ली और चूहे से पूछ कर करोगे क्या? जब बिल्ली से, चूहे से पूछ कर नहीं करोगे तो अपनी ज़िंदगी के निर्णय भी ख़ुद से पूछ कर क्यों करते हो?

हम कौन हैं? हम बिल्ली हैं, चुहा हैं, हम वनमानुष हैं। जो भी करो, ख़ुद से पूछ कर मत करो। स्वयं से सावधान। जो कुछ भी करने का मन कर रहा हो, सबसे पहले उसको मानो ये वनमानुष का है। ये वनमानुष है।

हाँ, जो चीज़ें चाहने का उसका हक़ है वो उसको दे दो। उसको केला चाहिए केला दे दो। तो भीतर से अगर भोजन की माँग उठ रही है वो ठीक है, वो तो पूरी कर दो। अब साँस लेनी है, उसको बैठना है उसको खुला स्थान चाहिए। उसको पेड़ पर चढ़ना है, थोड़ी ही उसको रोक दोगे, जा चढ़ जा पेड़ पर, अच्छी बात है।

लेकिन अब बच्चे पैदा करने हैं या नहीं, ये वनमानुष थोड़े ही बताएगा? लेकिन हमारे तो सारे बच्चे हमारा वनमानुष ही पैदा करता है।

हमारे भीतर एक मुनि भी बैठा है, एक वनमानुष भी बैठा है। हमारे बच्चे हैं ये किसकी औलाद हैं? मुनि की या वनमानुष की?

श्रोता: वनमानुष की।

आचार्य: ये क्या बात हो गई, बताइए। सोचिए, आप सोच रही हैं कि फैमिली आगे बढ़ानी है कि नहीं और सामने बैठा हुआ है लेब्राडोर , (कुत्ते की एक नस्ल) आप उससे पूछ रही हैं बच्चा पैदा करूँ या नहीं करूँ। और वो जवाब भी दे रहा है और आप पालन भी कर रहे हैं। ये कैसा लग रहा है?

वनमानुष ठीक है, लैब्राडोर तो फिर भी लगता है कुछ होशियार आदमी होगा। बनमानुस बैठा हुआ केला खा रहा है, और हम उससे पूछ रहे हैं बता आगे क्या करना है।

प्र१: आचार्य जी, ग्रंथों से लेकर मेरा एक सवाल है। अब जैसे कि मैं मुंबई की पली-बढ़ी हूँ। और ऐसा है कि मैं बहुत टाइम से गीता पढ़ना शुरू करना चाह रही थी। कभी कभार पढ़ा। ये मेरे ख़्याल से बहुत ही कॉमन क्वेश्चन (आम सवाल) होगा, मैं जानना चाहूँगी कि अगर मुझे अपनी किसी रुचि के लिए, किसी अपनी जिज्ञासा के लिए गीता पढ़ने का बहुत मन है तो कैसे शुरुआत की जाए, या क्या हो सकता है?

आचार्य: कल आ जाइए एक बजे कल यहीं पर गीता का पूरा सत्र है।

प्र: जी। ठीक है। मैं उसके बारे में पूछूँगी।

आचार्य: और मैं उसके बारे में क्या बोलूँ। वरना तो गीता के इतने भाष्य और उन सबके भी अलग-अलग संस्करण मौजूद हैं। मैं कह सकता हूँ कि कहीं जा कर उसको ले लीजिए। हमारी भी गीता की प्रतियाँ आती हैं, आप उनसे भी कर सकते हैं।

पर जो कार्यक्रम है यहाँ पर वो तो लाइव ही होने जा रहा है, गीता की बात है। कल भी हुई थी, आज नहीं है, कल भी होगी। उसका हिस्सा बनें।

श्रोता: उसमें विस्तार से सुन पाऊँगी।

आचार्य: सुन भी पाएँगी, बात कर पाएँगी, पूछ पाएँगी। गीता मोनोलॉग (जहाँ केवल एक बोलने वाला हो) है क्या कि कृष्ण बस बोले जा रहे हैं, बोले जा रहे हैं?

गीता एक जीवंत, एक लाइव इवेंट (जीवित घटना) है न। दो आमने-सामने बैठे हैं। उपनिषदों की जो पूरी बात है। गीता भी एक उपनिषद् है, वो इसी तरह की है कि दो आमने-सामने बैठेंगे। फिर जो उसमें से ताजी-ताजी, नवीन, मौलिक, जीवंत चीज़ निकलेगी, उसको उपनिषद् बोलते हैं। ठीक है?

श्रोता: ये जो आपने बात कही न मुझे बहुत अच्छा लगा कि अग्रेशन इस नॉट इन द एक्ट, इट्स इन द बीईंग (हिंसा कर्मों में नहीं हिंसा अपनेआप के होने में हैं)।

तो जब तक आप अंदर से अहिंसक न हों, शांत न हों; रोक ही नहीं पाऊँगा।

आचार्य: और आँखें देख पाती हैं सिर्फ़ जो आउटर, मटीरियल (बाहरी, भौतिक) चीज़ है उसको। भीतर हिंसा है, वो आँखें देख नहीं पातीं। और बाहर से आप बहुत एक करुणापूर्ण सा, लिपा-पुता, प्यारा सा चेहरा बना सकते हो, ऐसा लगता है दयानिधान हो आप बिलकुल। भीतर घोर हिंसा भरी हुई है।

और ख़ुद को ही धोखा हो जाता है, हमें लगने लग जाता है कि 'नहीं-नहीं, हम तो प्रेमपूर्ण और अहिंसक आदमी हैं।' जबकि भीतर हिंसा बहुत होती है, बजबजा रही है हिंसा।

श्रोता: शायद वो भी ज़्यादा बेचैनी करे।

आचार्य: सब तरह की बीमारी है। दिक्क़त ये नहीं है कि हम बीमार हैं; दिक्क़त ये है कि बीमार होने के बाद हम हॉस्पिटल की जगह ब्यूटी सैलून में बैठे हैं। बीमार हो गए, कोई गुनाह नहीं हो गया। बीमार तो हम पैदा ही होते हैं जन्म से। लेकिन बीमार होने के बाद हम बीमारी का इलाज़ कराने की जगह बाहर की लीपा-पोती कर रहे हैं, ये है गुनाह।

श्रोता: बेचैनी बढ़ती जाती है इस सबमें।

आचार्य: बेचैनी भीतर से बढ़ती है और बाहर से शांति का और वेलफेयर (अच्छापन) का प्रदर्शन बढ़ता है। मेरी ज़िंदगी में सब कुछ अच्छा चल रहा है, चिल, कूल , सब बढ़िया। "कैसा चल रहा है?" "सब चंगा।"

अगर हम वैसा ही जीना शुरू कर दें न जैसे हम भीतर से हैं, तो बहुत बढ़िया हो जाएगा। हम भीतर से बिलकुल एक पागल वनमानुष हैं। अगर हम सचमुच उसका प्रदर्शन करना शुरू कर दें तो बहुत बढ़िया हो जाएगा। आसान हो जाएगा, दिख तो जाएगा कि वास्तविक हालत क्या है। फिर कुछ सुधार हो सकता है। अभी दिक्क़त ये है कि भीतर तो बजबजा रही है हिंसा और बाहर ऐसे हैं, "जी, नमस्ते। आप कैसे हैं? बहुत अच्छा हूँ। कभी हमारे घर आइए। रिंकी कैसी है? पपलू की शादी हो गई?" ये सब बातें चलती हैं।

और भीतर जानवर बैठा हुआ है, वो इसी ताक में है कि कब किसका गला पकड़ लूँ। बाहर से भी सबको वैसे हो जाना चाहिए जैसे हम भीतर से हैं। चार लोग मिले तो लगे एक-दूसरे को जूता मारने। सड़कों पर ख़ून बह रहा हो एकदम ज़बरदस्त। फिर सब ठीक हो जाता है।

इसीलिए शायद प्रतीकात्मक तौर पर पुराने लोगों ने कहा था कि कलयुग बीतता है तभी सतयुग आता है। तो कलयुग भी जब प्रचंड हो जाए, घोर हो जाए, प्रकट हो जाए फिर सब ठीक हो जाता है। अभी सब छुपा-छुपा है। जो छुपा-छुपा है न, रंग-रोगन है ये बड़ी गड़बड़ चीज़ है।

आपकी नीयत ख़राब है, अरे दिखा दो न यार की नीयत ख़राब है। छुपा के क्यों इतना बैठते हो? हमारी भी ख़राब है, आपकी भी ख़राब है; ये हम गले क्या मिल रहे हैं?

श्रोता: बीमारी इतनी ज़्यादा है कि हमें भी नहीं पता। छुपा कहाँ रहा हूँ मैं, मुझे ही नहीं पता। छुपाऊँ तो तब न जब पहले पता हो।

आचार्य: ऐसा नहीं है कि नहीं पता। पता रहता है। पता रहता है, हम बस माहिर कलाकार हो गये हैं जाने हुए को भी अनजाना बनाने में, देखे हुए को भी अनदेखा करने में। मैं एक प्रमाण दे दूँ कि पता है? आप भलीभाँति जानते हैं न कि किन लोगों से कौन सी बात नहीं करनी है; जानते हैं न?

तो बस पता है न?

श्रोता: पता है क्या आएगा, क्या चाहिए।

आचार्य: हमें सब पता है पहले से। इसीलिए उन मुद्दों को हम छेड़ते ही नहीं। इनसे एक बात होगी जो आप नहीं करेंगे। एक बात होगी जो अपने बच्चों से नहीं करेंगे। एक बात होगी जो पत्नी से नहीं करेंगे। एक बात होगी जो बॉस से नहीं करेंगे। वो सब बातें कर दी तो रिश्ते ही टूट जाएँगे। हम भी जानते हैं कि रिश्ते खोखले हैं। कुछ बातें हैं जो खोल दी, उन पर चर्चा कर दी तो रिश्ता वहीं चरमरा जाएगा।

हम सब जानते हैं कि मामला गड़बड़ है। हम बस, मैं कह रहा हूँ, बहुत दक्ष हो गये हैं स्वयं से ही सच्चाई को छुपाए रखने में या ऐसा नाटक करने में कि जैसे हमें पता नहीं, 'हमें पता नहीं, मुझे क्या पता!'

मुझे मीठे की लत लगी हुई है, कई तरीक़े की मिठाइयाँ सजी हुई हैं। तभी आप आकर के पूछें, 'हाँ, भई आज कितना था आपका शुगर?' तो मैं क्या बोलूँगा?

श्रोता: कम था।

आचार्य: नहीं, पता नहीं। आज नापा नहीं। जलेबी इधर दो पहले, इससे पहले कि और कुछ पूछे। कुछ बातें ऐसी हैं जिनको जानना ख़तरनाक होता है तो हम जान-बूझकर के उनको जानने से इनकार कर देते हैं। अगर जान लिया की अभी कितनी चल रही है शुगर तो जलेबी फिर मुश्किल पड़ जाएगी। जलेबी चाहिए, तो जानने पर पर्दा डालो।

श्रोता: जैसे मैंने कहा, आपसे मिलना ख़तरनाक है।

प्र१: मेरा असमंजस और बढ़ गया है।

आचार्य: बोलिए, बताइए यदि समय हो तो।

प्र१: पर वो कहानी मेरे साथ रहेगी। अब मैं ये कोशिश करूँगी। एक बार किसी चीज़ को हम आइडेंटिफाई (पहचान) कर लें कि मैं रोगी हूँ तो वह कहानी मुझे होश में ला सकती है।

आचार्य: शहर को जब भी देखिए, जंगल याद कर लीजिएगा।

ये ट्रैफिक, ये दुकानें, ये दफ्तर, यह मत सोचिएगा कि ये सभ्यता की निशानियाँ हैं; ये जंगल के विकृत रूप हैं। ये सभ्यता के प्रतीक या उत्पाद नहीं हैं। वो जो हरा जंगल है वो तो फिर भी प्राकृतिक है। ये जो हमने जंगल खड़ा करा है ये बहुत ख़तरनाक है। लोगों को ऐसे मत देखिए कि इंसान है। किसी भी इंसान को देखिए तो उसमें जानवर को देख लीजिए।

श्रोता: आचार्य जी, मुझे संकेत मिला है। आपसे बात तो करते रह सकते हैं सर और अच्छा ही लगेगा। पर जितनी बातें आपने कहीं, थैंक यू वेरी मच (धन्यवाद), बहुत गहरी थीं। मेरे साथ रहेंगे, दर्शकों के साथ रहेंगे, सबके साथ रहेंगे। सो थैंक यू वेरी मच सर।

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