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स्वयं को सीमाओं के परे जानो
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आत्मा ब्रीति निश्चित्य भावाभावी च कल्पिती।

निष्कामः कि विजानाति किं ब्रूते च करोति किम्॥

~ अष्टावक्र गीता

( अध्याय १८ श्लोक ८ )

अनुवाद: आत्मा ही ब्रह्म है और भाव - अभाव कल्पित हैं, ऐसा निश्चय होते ही निष्काम ज्ञानी फिर क्या जाने, क्या कहे, क्या करे?

अचार्य प्रशांत: जो कुछ विस्तृत है वो इंगित होता है ब्रह्म से। जब परम सत्ता को तुम विधायक रूप में प्रस्तुत करना चाहो, तो तुम कह देते हो ब्रह्म; बड़ा, विशाल। और उसी परम सत्ता को जब तुम केंद्रित रूप में, बिंदु रूप में, हार्दिक रूप में, आत्मिक रूप में प्रस्तुत करना चाहो तब तुम कह देते हो आत्मा। आत्मा ही ब्रह्म है। अर्थात् बाहर-अंदर जहां कोई कमी दिखाई देती हो, वो कमी जान लेना तुम ही हो और तुम में कोई कमी हो नहीं सकती। इसीलिए सारे भाव-अभाव कल्पना मात्र है। बाहर जो दिखता हो, कमी तुम्हें सदा बाहर में ही दिखाई दी है ना, आत्मा में तो कभी कोई कमी दिखाई नहीं देती। जहां कहीं भी कमी दिखाई दे परिभाषा यह है कि उसी को बाहरी जानना। शरीर में कमी दिखाई दे शरीर बाहरी हुवा। संसार में कमी दिखाई दे संसार बाहरी हुआ। मन में कमी दिखाई दे, बुद्धि में, ज्ञान में कमी दिखाई दे सब बाहरी हुए हैं। अष्टावक्र कह रहे हैं अरे! वहां कमी कैसे होगी, वो तो तुम ही हो। तुम में कोई कमी है क्या? आप कहो ना हम में तो कोई कमी है नहीं। तो सारे भाव-अभाव कल्पित हुए। आत्मा ही ब्रह्म है। बाहर यदि कमी है तो वो कमी तुमने प्रक्षेपित करी। बाहर यदि बहुत भाव है, प्रचुरता है, सघनता है तो वो तुम्हारी अभिलाषा है। वो तुम्हारी दृष्टि है। बाहर कुछ नहीं है। बिंदु मात्र है आत्मा। शून्य मात्र है आत्मा। केंद्र मात्र है आत्मा। कुछ नहीं है आत्मा।

जब कुछ नहीं है आत्मा तो बाहर क्या है? कुछ नहीं है। जहां कुछ नहीं है, वहां बहुत कुछ कैसे हो सकता है? और जहां कुछ नहीं है, उस कुछ नहीं में कुछ कमी कैसे हो सकती है। कमी दिखाई दे, जान लेना मैंने ही तो कल्पना कर ली। कमी न दिखाई दे तो भी कह देना। यहां भी बड़ी चूक हो जाती है। ये जो सारी बातें होती है ना कि परमात्मा बहुत बड़ा है, विशाल है इत्यादि इत्यादि, ये तब तक तो ठीक है जब तक तुम्हें तुम्हारी हीनता से मुक्ति दिलाती हो। पर जब ये बातें अपने आप में सत्य का पर्याय बन जाए तो ख़तरनाक हो जाती है। ये मैंने भी देखा है।

कॉलेजी लड़कों से मिलता था तो वहां अक़्सर किसी-न-किसी बात को लेकर के हिनता की खूब भावना है, कुंठा में जीते हैं। तो मैं उन्हें कहूं कि तुम छोटे नहीं हो। तुम में अनंता है। अपने आप को नन्हा-मुन्ना, सीमित, बौना मत मान लेना। अमिट हो तुम, दीर्घ हो तुम। वो नतीजा ये हुआ कि उन्होंने इसी को अपना परिचय बना लिया कि हम तो बहुत बड़े है। सर बता कर गए हैं कि हम अनंत है, विशाल है। हम छोटे थोड़े ही हैं। अब वो इसी में चौड़े हो के घूम रहे हैं कि हम तो आत्मा है और आत्मा अनंत होती हैं। मैंने कहा और कुछ है तुम्हारा जो अनंत है? बाकी जितना है वो तो सब सेंटीमीटर, मिलीमीटर और इंच वाला है। दो-चार और चीज़ बता दो अपनी जो अनंत है। नहीं, आत्मा हमारी है और अनंत है।

ब्रह्म हो की आत्मा हो, छोटे तो नहीं ही है ये। बड़े भी नहीं है। कोई सा भी मत बना लेना। ये न हो कि आंख बंद करी और कहा ब्रह्म। और बाहर बड़ा सुदूर, विस्तृत अंतरिक्ष फैल गया। ये भी होता है कि ब्रह्म माने - आहा-हा-हा। वो सब कुछ और नहीं है, वो तुम छोटे थे तो टीवी सीरियल में देखा था। उसमें दिखाते थे कि अंतरिक्ष यान है एक, जा रहा है और वहां चारों तरफ दूर-दूर तक चमकते तारे फैले हुए हैं। और उसमें कुछ तरंगे है और दूर शनि ग्रह हैं और शनि ग्रह के छल्ले हैं। तो तुम जब ब्रह्म कहते हो तो वही कल्पना बचपन की तुम्हारी आंखों के सामने आ जाती है। तुम्हें लगता है ब्रह्म पकड़ लिया। ये ब्रह्म नहीं है।

ये जब तुम तीसरी कक्षा में थे तो शक्तियान, शक्तिमान और मंगल ग्रह के गुंडे नाम का टीवी सीरियल आते थे। अब ये तुम्हारा ब्रह्म बन गया है। ये तुम्हारी आध्यात्मिकता है कक्षा तीन वाली। सारी आध्यात्मिकता और कैसी होती है कि आंख बंद करो तो कुछ-न-कुछ वही तैर रहा होता है। तो पीछे से हूँ हूँ की हुंकार आ रही है। तुम्हें लगता है ये ॐ है। तो ये ॐ ॐ और कुछ नहीं है। वो रिकॉर्डिंग में गड़बड़ आ जाती है कई बार तो गूंज आ जाती है। कई बार हमारे वीडियोस में भी रहती है।

एक सज्जन आए थे बोले आपकी वीडियो सुनते हैं तो लगता है पीछे से कोई ॐ ॐ बोल रहा है। मैंने कहा वो शुभंकर का काम है। उसको ईको रिडक्शन नहीं आता। तो वैसे ही तुमको जब तुम ब्रह्म कहते हो तो पीछे से हूँ हूँ तो वो भी हो सकता है कि रिकॉर्डिंग में पीछे कूलर चल रहा था, ए.सी. चल रहा था या कोई खर्राटे मार रहा था। तो गुरुर-गुरुर आ गई है। तुम्हें लग रहा है ज़रूर ये परमात्मा की गुप्त आवाज़ है। हमें ही संदेह दे रहा है ख़ासतौर पर व्यक्तिगत रूप से; कुछ भी हो सकता है। जैसा आपने आज शुरू में ही कहा और भी है।

सारी कल्पनाएं मात्र कल्पनाएं हैं। उनके साथ कोई विशेषण भी मत लगाना। ये भी न कहना कि अच्छी है या बुरी है। बस ये कहना कि कल्पना ही तो है। मानसिक ही तो है, मन ही तो है। इससे बड़ा कोई सूत्र होता नहीं। क्या? मन ही तो है। छोटा है या बड़ा है, मन ही तो है। विस्तीर्ण है या संकुचित हैं, मन ही तो है। खट्टा है या मीठा है, मन ही तो है। बस मन ही तो है और क्या है? मन है, नहीं तो फ़िर मंगल ग्रह के गुंडे।

कामना किसकी? जो पूरा हो वो कामना क्या करेगा इसलिए निष्कामता। क्या जाने, क्या कहे, क्या करें? जानने के लिए दो होने चाहिए। क्योंकि जानना हमेशा चेतना में होता है। क्योंकि ज्ञान हमेशा द्वैतात्मक होता है। कोई ज्ञानी हो, कोई ज्ञाता हो और कोई ज्ञेय वस्तु हो, तब तो होगा ज्ञान। क्या जाने, क्या कहे कहने के लिए कोई होना चाहिए सुनने वाला। कहने के लिए कोई जगह हो जहां तुम्हारा कहा हुआ पहुंचे। जिस जगह पहुंचेगा तुम्हारा कहा हुआ, वो जगह भी तुम ही हो। क्या करें? कोई धैय बचेगा नहीं।

अष्टावक्र को सुनोगे उसके बाद हल्के हो जाओगे, गिर जाओगे। तुम्हें हो सकता है असल में जीवन ही समाप्त हो गया। और भला हो जो ये जीवन समाप्त हो गया। फ़िर कहीं और प्रवेश पा जाते हो। वहां जहां तुम पहले से ही थे। और मात्र उसी जगह प्रवेश पाना शुभ है जहां तुम पहले ही मौजूद हो। जहां तुम हो ना, वहां तुम जाना मत। ये सूत्र है। जहां तुम ना हो, वहां जाना मत। जा तुम पहले से हो वहां बार-बार जाना। जीसस इसी बात को कह गए हैं कि जिसको होता है उसे और-और मिलता है। और जिसे नहीं होता है, उसे कुछ नहीं मिलता। उसी बात को तुम से कह रहा हूं जहां हो पहले से तुम, वहां बार-बार जाना। जहां नहीं हो उधर क़दम मत बढ़ाना।

अयं सोऽहमय नाहं इति क्षीणा विकल्पना।

सर्वमात्मेति निश्चित्य तृष्णीभूतस्य योगिनः॥

~ अष्टावक्र गीता

( अध्याय १८ श्लोक ९ )

अनुवाद: सब आत्म ही है ऐसा निश्चय करके जो चुप हो गया है, उस पुरुष के लिए यह मैं हूँ, यह मैं नहीं हूँ इत्यादि विकल्पनाएं शांत हो जाती है। अद्वैत!

आचार्य प्रशांत: निश्चय से निष्कर्ष मत समझ लेना। हमारे निश्चय मानसिक होते हैं। तुम निश्चय में मत बैठ जाना। निश्चय हम भी ख़ूब करते हैं। निश्चय कर लेते हो ना कि आज जाऊंगा तैरने फ़िर जाते हो? तुम्हारे निश्चय तो ऐसे होते हैं। निश्चय तो कर लेते हो कि आज से कम खाऊंगा, फ़िर? निश्चय तो कर लेते हो कि आज से ज़रा तमीज़ से जीऊंगा, फ़िर? ये उस निश्चय की बात नहीं हो रही। ये बात हो रही है छोड़ने की और इस बात को बिल्कुल गांठ बांध लो। अध्यात्म में कभी भी कहा जाए कि कुछ करो तो उसका अर्थ होगा जो कर रहे हो, उसको करने से बाज़ जाओ। जब कहा जाए संकल्प करो तो अर्थ होगा पहले से ही पूर्वमान संकल्प है उनसे ही मुक्त हो जाओ। तो जब बात होगी निश्चय करके तो अर्थ होता है बाक़ी निश्चयों से मुक्ति।

अध्यात्म की भाषा वास्तव में कभी भी कर्तानिष्ठ, विधायक, सकारात्मक हो नहीं सकती। उसको तो हमेशा मुक्ति की ही भाषा होना है। और जो मुक्त है उससे कुछ कहा नहीं जाता। और कहा हमेशा उससे जाता है जो अमुक्त हैं। और जो अमुक्त है उससे हमेशा यही कहा जाएगा ना कि छोड़ दो। क्योंकि जो तुमने पकड़ रखा है उसी को कहते हैं बंधन। तो कभी तुम ऐसा पढ़ो भी की कृष्ण तुम से कह रहे हैं, अष्टावक्र तुम से कहे कि ये करो। क्योंकि गीता अगर पढ़ोगे, कुछ हफ्तों पहले ही जब हम कृष्ण से रूबरू हो रहे थे गीता में, तो उन्होंने अभ्यास की बड़ी अनुशंसा की थी। याद है तुमको? अभ्यास ऐसे, अभ्यास वैसे। और यहां पर अभी-अभी अष्टावक्र ने कहा कि अभ्यास क्या करना, ये तो बच्चों वाली बात हुई। तो कृष्ण कहे कि अभ्यास करना है तो उसका अर्थ यही जानना कि अभ्यास से मुक्ति। ये सूत्र की तरह पकड़ लो। कृष्ण हो, अष्टावक्र हो, कबीर हो, नानक हो, कृष्णमूर्ति हो ये जब भी कुछ करने को कहे तो उसका अर्थ समझना न करना। उसका अर्थ समझना करने से मुक्ति। क्योंकि एक ही चीज़ है जो करने लायक है। क्या? करने को जान लेना और करने से ज़रा अल्हदा खड़े हो जाना।

तो क्या कह रहे हैं सब आत्मा ही हैं, ऐसा निश्चय करके जो चुप हो गया है, अर्थात् अनात्मा के भाव से जो मुक्त हो गया है। दूरी के भाव से जो मुक्त हो गया है। पराए भाव से जो मुक्त हैं। हम अनात्मा के भाव में बहुत जीते हैं। अनात्मा माने ये मैं नहीं हूं। आप कहते हो ना वो दीवार मैं नहीं हूं, वो दुःख मैं नहीं हूं। आप जब भी अपने ऊपर कोई आपदा पाते हो तो आप कहते हो आपदा का कारण मैं नहीं हूं।

आप तो संसार में यकीन रखते होना। आप कहते हो संसार है जो मुझ पर हावी होता है। आप कहते हो संसार से मैं उठा हूं। संसार तो मेरे उत्पत्ति का कारण भी है। न, अष्टावक्र कह रहे है इस भेद से बाज़ आओ। संसार तुमसे अलग नहीं है। ये जो पूरी द्वैतवादी मानसिकता है यही तुम्हारे दुःख का दूसरा नाम है। जितने तुमने संकल्प पाल रखे हैं, जितने तुमने निश्चय उठा रखें है, जितने तुमने कारण ख़ोज रखे हैं; यही सब दुःख है तुम्हारे। और जब इन से मुक्त हो जाते हो तब अपने बारे में बोलने के लिए कुछ नहीं बचता। तब तुम यूं ही बोलते हो जैसे हवाएं सरसराती हैं।

अष्टावक्र कह रहे हैं ये वो पुरुष मैं हूं, ये मैं नहीं हूं इत्यादि विकल्पनाएं शांत हो जाती हैं। निश्चय होकर चुप हो गया है इसका अर्थ यह नहीं है कि वो मूक हो गया है। इसका अर्थ ये नहीं है कि बेज़ुबान हो गया है। इसका अर्थ ये नहीं है कि बोल नहीं फूट रहे। इसका अर्थ ये है कि अब अपने बारे में कुछ नहीं कहता। क्योंकि अपने बारे में कुछ कहेगा तो मैं को सीमित करना पड़ेगा न। कहता है कि मैं भूखा हूं, तो इसको ये कहना पड़ेगा कि मैं हूं, भूख है और भोजन है। और तीनों अलग-अलग चीज़ें हैं, तो इसीलिए वो जो कुछ कहता है वो टुकड़े-टुकड़े हिस्से-हिस्से के बारे में कह देता है?

अपने बारे में कोई ख़्याल ही नहीं रखता। जो कोई अपने बारे में कोई ख़्याल रखेगा, वो दुःख में रखेगा। तुम जब भी अपने बारे में कुछ कहोगे तुमने जो कुछ कहा वह तुम्हारे दुःख का ही वक्तव्य होगा। जो कोई अपने बारे में सोचता है वो मात्र दुःखी होता है। अष्टावक्र कह रहे हैं अपने बारे में ख़्याल करना ही बंद करो। क्योंकि तुम जिसको अपना कह रहे हो, जिसको मैं कह रहे हो, वो अहम् मात्र हैं, वो झूठा है। इस अहम् का ख़्याल ही मत करो। वो अहम् ख़्याल से ही पोषण पाता है। कभी कहो ही मत कि तुम्हारी हालत क्या है? अपने बारे में कुछ मत कहो। शरीर की स्थिति के बारे में कुछ कहना है; कह दो। मन की स्थिति के बारे में कुछ कहना है; कह दो। अपने बारे में कुछ मत कहो। व्यापार की स्थिति के बारे में कुछ कहना है; कह दो। अपने बारे में कुछ मत कहो। व्यापार की स्थिति के बारे में कुछ कहना है; कह दो। व्यापार को घाटा हो गया, ये मत कह देना कि तुम्हें घाटा हो गया। मन को दुःख लगा, ये मत कह देना कि तुम्हें दुःख होगा। ये जो पुरानी परिपाटी है ना वो इसीलिए थी।

गुरु इत्यादि ये सदा से सिखाते आए हैं कि बेटा टांग पर चोट लगे तो यही कहना टांग पर चोट लगी, ये मत कहना कि मुझे चोट लगी है। अभी यह बात अध्यात्म से बड़ी घिस गई है। इसका दुरुपयोग होने लगा है। अहंकार ने इसको अपने में शुमार कर लिया है। पर ये बात है बड़ी सटीक और बड़े काम की। मूक हो जाने से, चुप हो जाने से अर्थ ही यही है कि अब अपने बारे में कुछ नहीं कहना। मैं अकथनीय हूं। मैं किसी वक्तव्य का विषय नहीं हो सकता। मैं चिन्तय हूं। मैं अकल्पनीय हूं। मेरा क्या अनुमान? मेरा क्या वक्तव्य? मुझे कौन सुनेगा? दुनिया की बात करिए, अपनी बात मत करिए। कोई पूछे कैसे हो? मौसम अच्छा है। अपने बारे में कुछ बोलिएगा ही मत। अपने बारे में बोला नहीं कि अपना अपमान किया। ये भी मत कहिएगा कि आनंदित है। वो भी बड़ी गड़बड़ बात है। अध्यात्म में वो भी ख़ूब चलती है कि दुःखी आओ, सुखी-सुखी जाओ।

पहले यह कहते हुए आए थे कि हम बड़े दुःखी रहते हैं। फ़िर आए गुरु जी की दुकान पर। गुरु जी ने सिखा दिया कि बोला करो; हैप्पी थॉट्स। हम बड़े सुखी-सुखी हैं। ये सब नहीं। और उनसे भी ऊंची दुकानें होती है, वो कहते हैं न सुख, न दुःख; आनंद। तुम कहना मैं आनंदित हूं वो भी नहीं। दुःख तो नहीं ही कहना। सुख कहना और भद्दी बात है। आनंद कहना बड़ा भ्रामक है। न दुःखी हो, न सुखी हो, आनंदित भी नहीं हो। तुम हो ही नहीं। अपने बारे में कुछ कहना ही नहीं। मौसम ठीक है। मौसम किसके लिए है? जिसके लिए होगा वही बात कर रहा हैं। हम तो नहीं करते हैं। ये भी चूक हो गई हम तो नहीं करते, कुछ कह दिया आपने। तो जब कह भी रहे होते हो अपने बारे में तो यह जानना कि चमड़े की ज़ुबान है; रपट ली। जैसे चप्पल फिसल जाती है ना, वैसे यह भी चमड़े की है फिसल गई। यूं ही कह दिया। डिस्क्लेमर लगा के बात किया करो। अपने बारे में कुछ कह दे तो उसके लिए पहले से माफ़ी मांगते हैं। हम किसी कथन की विषय वस्तु है नहीं।

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