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स्वामी विवेकानंद का दर्दनाक संघर्ष, अपनों के ही विरुद्ध || आचार्य प्रशांत (2024)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: सर, नमस्कार। सर, बारह तारीख को स्वामी विवेकानन्द जी की अभी जयंती आने वाली है। तो बचपन से काफ़ी उनको पढ़ा है, उनकी जीवनी के बारे में। हमेशा काफ़ी अट्रैक्टिव (आकर्षक) रहा है उनको पढ़ना, उनको जानना। हालाँकि जितना मैंने उनकी जीवनी पढ़ी तो उनके बारे में पता लगा कि कैसे वो रामकृष्ण से मिले, फिर आगे बात बढ़ी। और फिर कैसे मिशन उन्होंने चलाया, रामकृष्ण मिशन। तो सर, आपसे जानना चाहेंगे कुछ ऐसी बातें, स्वामी जी के बारे में, जो हमें पता न हों और जिससे हम बहुत सीख ले सकते हैं?

आचार्य प्रशांत: देखो, उनके बारे में जितनी बातें हैं, मैं अभी बताऊँगा, वो सब सार्वजनिक ही हैं। वो सब पब्लिक रिसोर्सेज़ हैं, वहीं से बातें आएँगी, कहीं कोई गुप्त दस्तावेज़ तो है नहीं। तो अगर हमें उनके जीवन के किसी बहुत महत्वपूर्ण पक्ष के बारे में नहीं पता हो, तो उसकी वजह ये नहीं होती है कि वो सूचना उपलब्ध नहीं थी। उसकी वजह ये होती है कि महापुरुषों के जीवन के कुछ ऐसे पहलू होते हैं जिनकी ओर देखने में हमें असुविधा होती है, तो हम उनको देखना नहीं चाहते।

वरना उनका पूरा जीवन एक खुली किताब जैसा ही था, लगभग सबकुछ ही अंकित किया जा चुका है और बहुत सारी बातों के तो विस्तृत और विविध भी विवरण मिलते हैं। तो वो सब आप पता कर सकते थे। तो आपके प्रश्न पर आते हुए, उनके जीवन के जिस पक्ष की ओर आमतौर पर उतना नहीं देखा जाता, और न देखने में हमारा बड़ा स्वार्थ है। क्योंकि देखेंगे तो हमें दिक्क़त हो जाएगी — वो है उनका संघर्ष, उसकी ओर हम नहीं देखते।

तो जैसा कि हम अपने सभी महापुरुषों के साथ करते हैं, हम उनकी दिव्यता पर ज़्यादा ध्यान दे लेते हैं और हम कुछ इस प्रकार दर्शाते हैं, जैसे कि वो मनुष्य पैदा ही हुआ था कोई महान काम करने के लिए और उसके पास जन्म से ही जैसे कुछ अलौकिक शक्तियाँ थीं या सिद्धियाँ थीं या न जाने क्या था, हम इस तरह से बताते हैं।

और इसमें जो उस इंसान की पूरी संघर्ष यात्रा का मानवीय पक्ष है, वो बिलकुल दबकर रह जाता है — दबकर रह नहीं जाता, हम उसे दबाते हैं, जानबूझ कर दबाते हैं। क्योंकि अगर हम ये स्वीकार कर लेंगे कि उस व्यक्ति ने संघर्ष कितना करा है, तो वो बात हमारे मुँह पर चाँटे जैसी होगी।

बड़ा अपमान लगेगा कि कोई देखो, इस दुनिया में आकर अच्छा काम करने के लिए इतना संघर्ष करके गया और वो संघर्ष उसे किसके ख़िलाफ़ करना पड़ रहा है, ये असली अपमान है। वो इंसान जो कोई अच्छा काम करना चाह रहा है, उसे संघर्ष किसके ख़िलाफ़ करना पड़ रहा है, हमारे ही ख़िलाफ़ करना पड़ रहा है।

तो उसकी जो पूरी संघर्ष गाथा है, वो भले ही फिर उपलब्ध हो, किताबों में उपलब्ध हो, और रामकृष्ण मिशन ने बहुत अच्छे तरीक़े से सारी बातों को सहेज कर रखा है, प्रस्तुत भी किया है। वो सब उपलब्ध है, लेकिन आमतौर पर ध्यान नहीं दिया जाता।

तो अभी यूथ डे (युवा दिवस) आ रहा है, उस पर स्वामी जी को लेकर के गोष्ठियाँ होंगी, सभाएँ होंगी, संकल्प होंगे। पर उसमें उनके संघर्षों की बहुत चर्चा नहीं होगी। तो वो चीज़ है जो हमें पता है। और उनका जो जो संघर्ष था, जो उन्होंने चुनौतियाँ झेलीं, कठिनाइयाँ झेलीं, वो पूरी कहानी ऐसी है कि सुन लो तो बस रोंगटे ही नहीं खड़े हो जाएँगे, रो पड़ोगे। लेकिन हमने वो बात अपने ही आपको कभी ठीक से पता नहीं लगने दी है, आत्म प्रवन्चना है, हम ख़ुद को धोख़ा देते हैं।

और वो जिन कष्टों से गुज़रे और जिन मुश्किलों का सामना किया, और जितना उनमें भीतरी द्वंद्व रहा, और जितनी उन्होंने बेहिसाब परेशानियाँ झेलीं, वो बात ऐसी है कि अगर सुने तो पत्थर पिघल जाए। और वो सब बाक़ायदा जो है वो दर्ज़ है किताबों में।

अपना विवेकानन्द रीडर दीजिए ज़रा, खोलिए (स्वयंसेवक से कहते हुए)। तो इसमें से पूछ रहे हो न कि आपको क्या नहीं पता विवेकानन्द के बारे में, उनके बारे में आपको क्या नहीं पता, वो मैं आपको थोड़ा बताने की कोशिश करूँगा।

इससे आपको लेकिन एक अन्दाज़ लग जाएगा कि एक असली आदमी, ख़रा आदमी जीता कैसे है। और जब एक ऐसा आदमी पैदा होता है, तो समाज से उसका रिश्ता क्या होता है और जिस समाज को बेहतर बनाने के लिए वो संघर्ष कर रहा होता है, वही समाज उस आदमी के सामने कितने तरीक़े की आफ़तें पैदा करता है। ठीक है?

तो ये स्वामी जी का पत्र है, ये श्री हरिदास देसाई को उन्होंने लिखा था और ये तब का है, जब वो अमेरिका में हैं, तो इसमें से कुछ बातें हैं, वो मैं पढ़े देता हूँ।

जब वो अमेरिका में थे तो हम ये सोच रहे हैं कि जैसे आज हमारे सामने तस्वीर पेश की जाती है कि वहाँ गये थे शिकागो में, सन१८९३ में, तो जैसे पूरा भारत उनको समर्थन और सहयोग देने के लिए, उनके स्वागत के लिए बिलकुल आतुर, तैयार खड़ा हुआ था बाहें फैलाकर के; ऐसा नहीं हुआ था। स्वामी जी को घोर विरोध का सामना करना पड़ा था। और जितने लोग, जितने तरीक़े से उनके सामने तकलीफ़े और अड़चनें ला सकते थे, सब लाये थे।

और जो पूरी उनकी दिल को पिघला देने वाली कहानी है, उसको आप पढ़िए, उसके कुछ अंश मैं आपके सामने आज ला रहा हूँ। तो लिखते हैं कि — रूढ़िवादी लोग थे, वो बहुत ज़बरदस्त विरोध कर रहे थे स्वामी जी का। वो बोलते थे, ‘इनका जो पहनावा है वो पारम्परिक सन्यासियों जैसा क्यों नहीं है? और ये अंग्रेजी बोलते हैं।’

और उनके खानपान को लेकर के बहुत आपत्ति करते थे कि ये खानपान में वो सब शुद्धि नहीं रखते जो आमतौर पर वैष्णवों में बोला जाता है कि होनी चाहिए, तो ये सब किया करते थे। उनको लेकर के दुष्प्रचार करें, उनकी बदनामी भी खूब करें हर तरह की। अब वो सब हमें आज पता नहीं लगता, क्योंकि आज हमने स्वामी जी को महिमामंडित कर दिया है, आज हम कहते हैं, ‘स्वामी जी महापुरुष हैं।’

तो स्वामी जी के ख़िलाफ़ जितनी चालें चली गयीं और उनको बदनाम करने की जितनी कोशिश की गयी और उनकी राह में जितनी अड़चनें लायी गयीं, वो हमें अब पता नहीं चलती हैं। वो इतिहास के पन्नों में अब खो गयी हैं, मौजूद हैं पर खोजनी पड़ती हैं।

तो क्या बोल रहे हैं? स्वामी जी कह रहे हैं — धर्म की नयी एक तरंग आयी है, उसके बारे में कह रहे, “धर्म की नयी तरंग के लिए एक नये केन्द्र की आवश्यकता होती है।” रूढ़िवादी लोग उनका बड़ा विरोध कर रहे थे, तो कह रहे हैं, “अपनी रूढ़ियों और पुराने सिद्धान्तों को सूली पर चढ़ा दीजिए, उनसे कोई लाभ नहीं होने वाला।”

जो ट्रेडिशनलिस्ट (रूढ़िवादी) थे उनको लगता था, हमारी परम्परा और हमारी संस्कृति को; ये नया लड़का आ गया है, अंग्रेजी बोलता है और अपने खानपान, चाल-चलन में ये थोड़ा पाश्चात्य भी लगता है, ये तो हमारे साथ ही नहीं चल रहा और अन्धविश्वास का भी विरोध करता है। तो ये तो ख़तरनाक है और इसकी उम्र भी कम है! अध्यात्म तो काम माना जाता है बूढ़े लोगों का, ये नया लड़का पैदा हो गया है और ये कैसे-कैसे कर रहा है!

तो कह रहे हैं, “अपने रूढ़ियो और पुराने सिद्धान्तों को सूली पर चढ़ा दीजिए, उनसे कोई लाभ नहीं होता।” अब आगे क्या कह रहे हैं, कह रहे हैं, “दीवानजी महाराज, जो काम मैं करना चाहता हूँ, उसके लिए एक संस्था की आवश्यकता है और सबसे ज़्यादा रुपयों की ज़रूरत है।”

जब आप स्वामी विवेकानन्द के बारे में आज सुनते हैं या पढ़ते हैं, तो उन्होंने पैसे के लिए कितनी जद्दोजहद करी, ये बात कभी ख़याल में आती है? उनका नाम कभी पैसे से जोड़कर रखा ही नहीं जाता। स्वामी विवेकानन्द का नाम कभी रूपयों से, पैसों से जोड़कर आपके सामने लाया जाता है क्या? हमको लगता है कि नहीं, वो जो काम कर रहे थे वो तो बस ऐसे ही हो गया था। हवा से पैसे उतरे थे, काम अपना हो गया।

तो हम कभी पूछते ही नहीं कि वो इतना बड़ा काम करने निकले थे, उसकी फाइनेंसिंग (वित्त व्यवस्था), फंडिंग (अनुदान), पैसा, वित्त ये कहाँ से आ रहा था। उसकी बात हम बिलकुल छुपा देते हैं। और जो हमने छुपा रखा है, उसी में एक दर्दनाक कहानी छुपी हुई है।

“दीवान जी महाराज, रुपयों की ज़रूरत है, भले ही थोड़े से मिल जाएँ, जिससे काम तो शुरू कर सकूँ! भारत में मुझे धन कौन देता? इसलिए दीवान जी महाराज, मैं अमेरिका आ गया हूँ। आपको याद हो कि सारा धन तो मैं आम लोगों से माँगता था। धनी लोग मेरी बात समझ ही नहीं पाते थे, तो उनका धन तो मैंने अस्वीकार किया।”

आम लोगों को उठाने के लिए स्वामी जी का सारा काम था, तो आम लोगों के सामने वो जाकर फरियाद करते थे कि धन दे दो ताकि संस्था बनाऊँ, आगे तुम्हारे कुछ कल्याण के लिए करूँ। और आम लोग स्वामी जी को कोई सहायता नहीं दे पा रहे थे।

अब अमेरिका के लिए कह रहे हैं कि अमेरिका आ गये हैं, वहाँ से लिख रहे हैं, सन१८९४ है। कह रहे हैं, “इस देश में, अमेरिका में पूरे साल तक व्याख्यान देते रहने पर भी मुझे अपने काम के लिए धन इकट्ठा करने में ज़रा भी सफलता नहीं मिली।” कह रहे है, ‘मैं पैसा इकट्ठा करने अमेरिका आया हूँ, लेकिन यहाँ भी नहीं हो पा रहा।‘ उसके कुछ उन्होंने कारण बताये हैं।

बोल रहे हैं, ‘अमेरिका में ही आर्थिक मन्दी चल रही है, वगैरह, वगैरह। लेकिन जो बड़ा कारण है कि अमेरिका में भी वो क्यों नहीं पैसा इकट्ठा कर पाये, बोलते हैं, “मिशनरी और हमारी हिन्दू संस्थाएँ ही मेरे काम में बाधा डालने का सबसे बड़ा प्रयास कर रही हैं।” स्वामी जी के काम को सबसे ज़्यादा ख़राब करने में आगे थीं हमारी हिन्दू संस्थाएँ ही, क्योंकि इन्हें ईर्ष्या होती थी। इन्हें ईर्ष्या होती थी, तब रामकृष्ण मिशन तो था नहीं।

एक नया लड़का है जो एक नया काम शुरू करने की कोशिश कर रहा है। उनकी उम्र ही क्या थी उस समय, कोई उम्र नहीं थी। बोले, ‘ये नया लड़का है और हमारी सैकड़ों साल पुरानी सब संस्थाएँ हैं, ये उनसे आगे निकल जाएगा, परम्परा को तोड़ देगा।’

तो ये जितनी पहले से ही जमी हुई संस्थाएँ थीं और परम्पराएँ थीं और आश्रम थे और मठ थे, इन्होंने स्वामी जी को परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यहाँ तक कि अमेरिका में भी उनका काम नहीं होने देते थे। आगे कहते हैं, अब भारतवासियों के लिए कह रहे हैं, “मेरे देशवासी, मेरे लिए इतना भी नहीं कर पायें कि अमेरिका के लोगों से कह देते कि मैं बेईमान नहीं हूँ, बल्कि एक सच्चा सन्यासी हूँ।”

अमेरिका में भारतीयों ने जाकर के स्वामी जी के ख़िलाफ़ ये दुष्प्रचार करा था कि ये तो एक ऐसे ही हैं, कोई बेईमान आदमी हैं ये। तो अमेरिका में भी फिर स्वामी जी को फंडिंग नहीं मिलती थी। कह रहे हैं, “मेरे देशवासी मेरे लिए इतना भी नहीं कर पायें कि कह दें कि मैं हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व कर रहा हूँ।”

भारत में तो स्वामी जी को डोनेशन (दान) नहीं ही मिली, वो अमेरिका भी गये तो वहाँ भी भारतवासियों ने आकर, जो पुरानी संस्थाएँ और जो रूढ़िवादी लोग थे, परम्परावादी — उन्होंने अमेरिका भी आकर के स्वामी जी के काम में अड़ंगा डालने की कोशिश की।

तो आगे कहते हैं स्वामी जी, “शाबाश! मेरे देशवासियों, शाबाश!” तुमने भारत में भी मुझे कुछ नहीं दिया और मैं अब अपने काम के लिए धन इकट्ठा करने अमेरिका आया, तो तुम अमेरिका में भी मुझे धन नहीं पाने दे रहे।

आगे कह रहे हैं, “दीवान जी, मैं अपने भारतवासियों को प्यार करता हूँ। इंसान मुझे जो कुछ भी दे सकता है, उसको मैं लात मारता हूँ। सुख में, दुख में, पर्वतों, मरुस्थलों, वनों में, जो मेरे साथ रहे हैं वो तो मेरे साथ रहेंगे ही।” सत्य की बात कर रहे हैं। कह रहे हैं, “ऊँचा है, नीचा है, तुम मुझे बर्बाद कर लो, लेकिन जो मेरे आराध्य है वो हमेशा मेरे साथ हैं।

फिर आगे कह रहे हैं, “और अगर मैं सफल नहीं हो पाया” — उन्हें दिख रहा था, ये सन १८९४ की बात है। अभी उनके जीवन में अभी कई वर्ष शेष थे, लेकिन उस वक़्त भी उनको दिखने लग गया था कि भारतवासी ही उनका इतना घोर विरोध कर रहे हैं कि शायद उनका मिशन सफल नहीं हो पाएगा। तो बोले, “अगर मैं नहीं सफल हो पाया, तो भारत में कभी आगे मुझसे भी कहीं योग्यता सम्पन्न किसी और वीर का जन्म होगा, जो मेरे कार्य को सम्पन्न करेगा।”

उनको दिख रहा था कि शायद उनके जीवन काल में तो न हो पाये, तो फिर उन्होंने भी भविष्य से आशा रखी कि मुझसे नहीं हो पाएगा तो मेरे बाद कोई और आएगा जो मेरा ये जो काम है, ये सम्पन्न करेगा।

अब ये स्वामी ब्रह्मानन्द को उन्होंने लिखा है, ये सन १८९५ का है। तो उनके अपने स्वामी हैं, उनके साथ के हैं तो उनको कह रहे हैं, “जहाँ भी हो सके, एक केन्द्र स्थापित करो।” ये उनकी व्यथा देखिए, कह रहे है, ‘बनाओ तो, एक सेन्टर बनाओ कहीं देश में, जहाँ भी हो सके एक केन्द्र स्थापित करो।‘

“कि यहाँ(अमेरिका) पर और इंग्लैंड में, मैं अपनेआप को दृढ़ता से स्थापित कर चुका हूँ और न्यूयॉर्क तो उन्मत्त हो चुका है। और अगली गर्मी में लंदन को आन्दोलित करना है, बड़े-बड़े दिग्गज बह जाएँगे।” ये चुनौती का स्वर देख रहे हो, ये कह रहे हैं, “बड़े-बड़े दिग्गज़ बह जाएँगे।” किन दिग्गजों की बात कर रहे हैं, यही सब जो जमे-जमाये धार्मिक मठाधीश थे, उनकी बात कर रहे हैं। उन्हीं को तो चुनौती दे रहे थे, बोल रहे थे, ‘इनको भगाना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि जब तक ये रहेंगे, तब तक भारत राष्ट्र का और सनातन धर्म का पुनरुद्धार सम्भव है नहीं।’

कह रहे हैं, “बड़े-बड़े दिग्गज हैं, बह जाएँगे।” फिर अपने जो संस्था के उनके सन्यासी थे, जो उनके अपने लोग थे, उनको सम्बोधित करके कह रहे हैं, “तुम लोग कमर कसकर काम में जुट जाओ, हुंकार मात्र से हम दुनिया को पलट देंगे। अभी तो केवल शुरुआत है मेरे बच्चों।” फिर अपने देश की व्यथा पर बोलते हैं, “हमारे देश में कोई आदमी हैं?” भारत के लिए कह रहे हैं, “हमारे देश में कोई आदमी या इंसान हैं! ये सब तो शमशान सदृश लाशें हैं।”

भारत के लिए कह रहे हैं कि यहाँ कोई आदमी है ही नहीं। “निम्न श्रेणी के लोगों को शिक्षा दे सको तो कुछ कार्य हुआ।” तुम्हें करना ही यही है कि भारत में जो सब शमशान जैसा माहौल है, इन्हें शिक्षा दो, तब जाकर के भारत राष्ट्र उठेगा। और फिर भारत में काम कैसे होगा, इसके लिए वो अपने सन्यासियों को क्या इशारा दे रहे हैं? कह रहे हैं, “बड़े आदमियों से काम नहीं बनेगा। धनी लोगों की ओर मत जाओ, उनसे तुम्हें आर्थिक सहायता नहीं मिलेगी।“

कह रहे हैं, “सभी देशों में मध्यमवर्गीय लोगों ने ही महान काम किये हैं। रुपये मिलने में क्या देर लगती है, बस आदमी सही मिल जाएँ।” कह रहे हैं, मध्यमवर्गीय लोगों के पास जाओ, उनसे बात करो, उन्हें अपने काम, अपने मिशन के बारे में बताओ, वो तुम्हारी सहायता करेंगे।

“अपने देश में असली आदमी कहाँ हैं? अपने देश में रहने वाले लोग तो बच्चे जैसे हैं, इनके साथ तो बच्चे जैसा ही व्यवहार करना पड़ेगा!” ये स्वामी विवेकानन्द के शब्द हैं। अब एक और उनका ये पत्र है, फिर से हरिदास देसाई जी को, सन १८९४ का है। तो यहाँ पर कह रहे हैं उदाहरण देकर, कि “हमारे ही जो लोग हैं, हम चूँकि अब बाहर आकर के काम कर रहे हैं, तो वो सिद्ध करने में लगे हुए हैं कि हम उनकी जाति के नहीं रहे।”

भारतवासी, भारत के भी जो बड़े पुराने धार्मिक लोग हैं और जो ऊँचे-ऊँचे धार्मिक पदों पर बैठे हुए लोग थे, वो लोग क्या करने में लगे हुए हैं, बोल रहे हैं, “हम यहाँ काम कर रहे हैं”, बोल रहे हैं, “मैं काम कर रहा हूँ” और एक वहाँ पर जैन स्वामी थे वीरचन्द गाँधी, ये दोनों मिलकर काम कर रहे थे, बोले, “हम यहाँ काम कर रहे हैं, तो हमारे को बदनाम करने का काम हमारे देशवासी ही कर रहे हैं।“

और ये लगे हुए हैं ये सिद्ध करने में कि “ये लोग तो अब हमारी जाति के ही नहीं रहे।” क्यों, “क्योंकि दासों में स्वभावत: ईर्ष्या उत्पन्न होती है।” भारत एक दास देश है, सिर्फ़ राजनैतिक दृष्टि से नहीं, सबसे ज़्यादा मानसिक दृष्टि से, आध्यात्मिक दृष्टि से। बोल रहे हैं, “दासों में स्वभावतया ईर्ष्या उत्पन्न होती है, और वो ईर्ष्या ही उनको पतन में ले जाती है।”

बोल रहे हैं, भारत उठेगा कैसे, यहाँ आपको उठाने के लिए कोई आये, तो आप उससे ईर्ष्या करने लग जाते हो। यहाँ जो भी कोई आगे बढ़ता है भारत को उठाने के लिए, भारतवासी ही उसे नीचे खींचने लग जाते हैं। आध्यात्मिक, धार्मिक क्षेत्र में कोई आगे आएगा धर्म की सफ़ाई के लिए, धर्म को चमकाने के लिए, धर्म की शुद्धि के लिए, धर्म को मांझने के लिए, तो जो पुराने धार्मिक लोग और पुरानी धार्मिक संस्थाएँ बैठी हैं, वही ईर्ष्या में भरकर के उसे नीचे खींचने लग जाएँगी; वही स्वामी जी के साथ हो रहा है।

“यदि कोई मनुष्य आगे बढ़ना चाहता है”, तो अब यहाँ पर वो बात कर रहे हैं लंदन और अमेरिका की, कह रहे हैं, “यदि कोई मनुष्य यहाँ आगे बढ़ना चाहता है, तो सभी लोग यहाँ उसकी सहायता करने को प्रस्तुत हैं। किन्तु यदि आप भारत में, मेरी प्रशंसा में, एक भी पंक्ति लिख दें तो दूसरे ही दिन सब आपके-मेरे दुश्मन हो जाएँगे।” भारत में, अब ये स्वामी जी का हाल था कि भारत में किसी समाचार पत्र में आप उनके प्रशंसा में एक शब्द लिख दो, तो दुश्मन पैदा हो जाते थे कि क्यों तुम एक नये आदमी की बात कर हे हो।

जब पारम्परिक धर्म चल रहा है, तो उसके अन्धविश्वासों और रूढ़ियों, उन्हीं का यशोगान करो न? स्वामी जी तो एक नयी, साफ़-सुथरी, वैज्ञानिक, तार्किक बात कर रहे थे। और इससे भारतीयों को बड़ी असुविधा होती थी।

“क्यों सब मेरे विरुद्ध हो जा रहे हैं? क्योंकि यही तो ग़ुलामों का स्वभाव है।“ ये सब ग़ुलाम — भारतीयों के लिए कह रहे हैं, “ये सब ग़ुलाम अपने किसी भाई को ज़रा भी आगे बढ़ते देखना सहन नहीं कर सकते।” ये बातें विवेकानन्द जी के बारे में आपको पता थीं कि विवेकानन्द जी को, स्वामी जी को भारतीयों द्वारा ही इतने घोर विरोध का सामना करना पड़ा था? ये बातें बतायी गयीं क्या हमें? नहीं बतायी गयीं। क्योंकि पता चल जाए हमें तो शर्म का मामला हो जाएगा न! हमें पता चलेगा कि महापुरुषों का अपने हम ही कितना विरोध और अपमान करते हैं।

अब ये बहन निवेदिता को उन्होंने लिखा हुआ है, ये सन १८९७ का पत्र है। तो उनको लिख रहे हैं कि — उनकी तबियत तभी से ख़राब होनी शुरू हो गयी थी, ठीक है और तबियत उनकी ख़राब इसीलिए होती थी, क्योंकि धन का उनको बहुत अभाव रहता था और बहुत मेहनत करनी पड़ती थी। एक-एक रूपया, एक-एक पैसा जोड़ने के लिए दिनभर उनको खटना पड़ता था। तो कह रहे हैं, “अपनी शारीरिक अस्वस्थता की ओर मैं कोई ख़ास ध्यान नहीं दे रहा हूँ, पर मुझे दुख इस बात का है कि मेरी योजनाओं को साकार करने का कोई अवसर मुझे प्राप्त नहीं हो रहा। और बहन तुम जानती हो कि इसका मूल कारण धन का अभाव है।”

भारत के पास हर चीज़ के लिए धन था, स्वामी विवेकानन्द को देने के लिए भारत के पास धन नहीं था। आगे कह रहे हैं, “ये हमारे हिन्दू लोग जुलूस निकाल रहे हैं” — और ये उन्हीं के शब्द हैं बिलकुल, उद्धरित कर रहा हूँ, “ये हमारे हिन्दू लोग जुलूस निकाल रहे हैं, और भी न जाने क्या-क्या कर रहे हैं लेकिन ये मुझे आर्थिक सहायता नहीं कर सकते।”

हिन्दुओं के पास धार्मिक कामों के लिए पैसों की कमी नहीं है। आप जाएँगे, तो जितना पैसा आज भी भारत में मन्दिरों में जमा हुआ है और लगा हुआ है, उतना पैसा कहीं और नहीं लगता। और स्वामी जी ये सब देख रहे थे, तो बोले, “ये हिन्दू लोग जुलूस निकाल रहे हैं, और भी न जाने क्या-क्या कर रहे हैं, किन्तु मेरी आर्थिक सहायता नहीं कर सकते। जहाँ तक आर्थिक सहायता का प्रश्न है, वो तो मुझे दुनिया में मिली सिर्फ़ इंग्लैंड की मिस मुलर और कैप्टन सीवियर से।”

इंग्लैंड वालों ने कर दी सहायता फिर भी स्वामी जी की, भारत के हिन्दुओं ने नहीं करी, भारत के हिन्दू तो उनके ख़िलाफ़ ही खड़े हो गयें। फिर कह रहे हैं, “मुझे लग रहा था कि अगर मुझे एक हज़ार पाउंड मिल जाएँ, तो मैं कलकत्ता में पहला अपना केन्द्र बना दूँगा। लेकिन मेरी वो बात भी सफल नहीं हो पायी, क्योंकि मैंने दस-बारह साल पहले के दामों के हिसाब से सोचा था। और दस-बारह साल बीतते-बीतते कलकत्ता में महँगाई तीन-चार गुना बढ़ चुकी है।”

तो जो काम मैं सोच रहा था कि इतने अगर मुझे पाउंड मिल जाएँ तो काम हो जाएगा। अब उतने पांउड मिलेंगे तो भी मैं वो जो केन्द्र मैं स्थापित करना चाहता हूँ, वो नहीं बना पाऊँगा।

जो आदमी ऊँचे-से-ऊँचा साहित्य लिख सकता था, बड़े-से-बड़ा काम कर सकता था, उस आदमी को अपना छोटा सा जीवन पूरा बिताना पड़ा है क्या करने में? किसी तरह एक-एक रुपया जुगाड़ने में। आगे ये उन्होंने मिस जोसेफिन को लिखा है, आगे उनकी तबियत अब और ख़राब हो चुकी है, सन १९०० पर आ चुके हैं हम। तो उनसे पूछा गया, ‘आपकी तबियत?’ बोल रहे हैं, “तबीयत, चल रहा है काम”, आगे लिखते हैं, “धन का अभाव और साथ ही जी तोड़ परिश्रम, लेकिन कोई परिणाम नहीं मिल रहा।”

ये उनके मन पर बीत रहा था, ये उनकी ज़िन्दगी थी, सुन लीजिए अच्छे से। ये करा है हमने अपने महापुरुषों के साथ।

“धन का अभाव और साथ ही जी तोड़ परिश्रम और कोई परिणाम नहीं मिल रहा। यहाँ तो दशा मेरी अमेरिका से भी ज़्यादा ख़राब है।” और क्या हो रहा है? अब हैं वो यहाँ पर। तो हो क्या रहा है? बोल रहे हैं, “एक रुपया ख़र्च न करना पड़े, तो लोग भीड़ों में आ जाते हैं मुझे सुनने के लिए — मतलब अगर मुझे मुफ़्त में सुनने का मौक़ा मिले तो पूरी-की-पूरी भीड़ आकर खड़ी हो जाती है। लेकिन अगर एक रुपया भी देना हो, तो लोग नहीं आते। ये हालत है।“

स्वामी जी बोल रहे हैं, ‘मुफ़्त में सुनने का मौक़ा मिल रहा है तो पूरी भीड़ आ जाएगी, पर लोगों से कह दिया जाए कि आये हो तो कुछ देकर जाओ, तो कोई नहीं आता।‘ स्वामी जी कह रहे हैं, “ये मेरी स्थिति है, और मैं इसमें कोई परिणाम नहीं देख रहा, पराजय सी दिख रही है मुझे बस।” आगे स्वीकार ही कर लेते हैं कि हालत ख़राब है।

“दो-चार दिन से मेरा शरीर ठीक नहीं है” और मेरा शरीर क्यों नहीं ठीक है, ये ध्यान से सुनिएगा, “मुझे ऐसा लग रहा है कि रोज़ रात में भाषण देने के कारण ही ऐसा हो रहा है कि मेरी तबियत इतनी ख़राब हो गयी है।”

वो रोज़ रात में बोला करते थे, भाषण देते थे, ताकि लोग आकर के उनको पैसा दे दें, ताकि वो अपना काम आगे बढ़ा सकें। और लोग भी ऐसे थे कि मुफ़्त में मिल जाए तो पूरा लेकर चले जाते थे, तब भी उनको कुछ देते नहीं थे। और उनकी तबियत दिन-ब-दिन गिरती जा रही थी।

आगे सन १८९४ का है — अब उनको बताया गया, ये आलासिंगा पेरुमल थे, उनको बताया गया कि भारत के अख़बार तो आपके ख़िलाफ़ ज़हर उगल रहे हैं। हम तो ये सोचते होंगे न, कि जब स्वामी जी थे तो भारतीय अख़बारों में उनकी बड़ी प्रशंसा होती होगी; प्रशंसा नहीं हो रही, निन्दा हो रही है।

तो स्वामी जी उनसे कह रहे हैं — जब उनको बताया गया कि स्वामी जी भारतीय अख़बारों में तो आपकी बदनामी करी जा रही है। यहाँ जिसके मन में आ रहा, जो चाह रहा आपके बारे में बोल रहा है। तो कह रहे हैं, “भारतीय समाचार पत्रों के विषय में आप जो मुझे बता रहे हो, वो मैंने पढ़ा। उनका छिद्रान्वेषण स्वाभाविक है।” छिद्रान्वेषण क्या होता है? कि बड़ी-से-बड़ी चीज़ में जहाँ छेद हो, बस उसको देखो। ये मत देखो की चीज़ कितनी बड़ी है, उसमें कहीं छेद दिख गया हो तो उसको देखो, छिद्रान्वेषण कहते हैं। “उनका छिद्रावेषण स्वाभाविक है, प्रत्येक दास-जाति का मुख्य दोष ईर्ष्या होता है। ईर्ष्या और मेल का अभाव ही पराधीनता पैदा करता है और पराधीनता को स्थायी बना देता है।”

कह रहे हैं, ‘इन्हें ईर्ष्या इतनी है कि मैं इनको ही बेहतर करना चाहता हूँ, बढ़ाना चाहता हूँ और ये मेरी ही निन्दा में लगे रहते हैं।’ भारतीयों के लिए क्या आगे कहते हैं उसी पत्र में, “इन पराधीन जाति के लोगों से (भारतीयों को कह रहे हैं) हमें कोई आशा नहीं रखनी चाहिए। मामला निराशाजनक है, फिर भी मैं इसे तुम्हारे सामने स्पष्ट रूप से कह रहा हूँ, जिनकी उच्च अभिलाषा मर चुकी है, उन्नति के लिए जो बिलकुल चेष्टा नहीं करते और भलाई करने वाले को ही धर दबोचने में जो हमेशा तत्पर हैं, ऐसे मृत, जड़ पिंडों के भीतर तुम कैसे प्राणों का संचार कर लोगे? क्या तुम उस वैद्य की जगह ले सकते हो जो लाते मारते हुए उद्दंड बच्चे के गले में दवाई डालने की कोशिश करता हो?”

अपनी पूरी चेष्टा के बाद कह रहे हैं, ‘ये भारतीय हैं ये मृत हैं, जड़ पिंड हैं, इनकी तो भलाई करो तो ये तुम्हें नीचे खींचते हैं और तुम पर पलटकर वार करते हैं, तुम इनकी कैसे भलाई कर लोगे?’

फिर आगे कह रहे हैं, “लेकिन मैं तुम्हें याद दिलाता हूँ, ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” — तुमको कर्म का अधिकार है, फल का नहीं, चट्टान की तरह दृढ़ रहो, श्री रामकृष्ण की सन्तान निष्कपट और सत्यनिष्ठ रहे, शेष जो होगा देखा जाएगा। हम उसका फल देखने के लिए जीवित नहीं रहेंगे, लेकिन अभी जब हम जीवित हैं, तो हमें कोई सन्देह नहीं है कि फल आएगा तो ज़रूर।“

“भारत को एक नव विद्युत शक्ति की ज़रूरत है, जो जातीय धमनी में नवीन स्फूर्ति उत्पन्न करे। ये काम धीरे-धीरे ही हुआ है और आगे भी धीरे-धीरे ही होगा। तुम बस निस्वार्थ सन्तुष्ट रहो और अपने प्रति सच्चे रहो, पूर्ण रूप से शुद्ध, दृढ़, निष्कपट रहो, आगे जो होगा ठीक है।” आगे कह रहे हैं, “अगर मैं ऐसे सौ आदमी भी भारत में छोड़ जा सकूँ, तो मेरा काम पूरा हो जाएगा और मैं शान्ति से मर सकूँगा।”

उनको दिख रहा था कि अभी जो हालात हैं भारत में, इतनी जल्दी वो सफल हो ही नहीं सकते। क्योंकि भारतीय ही सबसे ज़्यादा उनका विरोध कर रहे थे, अड़चन डाल रहे थे। बोले, “सौ आदमी छोड़ जाऊँ, अभी नहीं होगा मेरा काम, तो आगे पूरा होगा।”

फिर आगे ये सन १८९५ का उनका पत्र है आलासिंगा पेरुमल को। अब क्या हुआ था कि भारत के अख़बारों वगैरह में ये खूब उछाला गया था कि स्वामी जी वहाँ अमेरिका में जाकर के सात्विक भोजन नहीं करते और सिगार आदि का सेवन करते हैं। तो स्वामी जी के चाल-चलन और आचरण को लेकर के बदनामी करी जा रही थी।

तो स्वामी जी जवाब क्या देते हैं, “अगर भारतवासी मुझे नियमपूर्वक हिन्दू भोजन के सेवन पर बल देते हैं, तो उनसे एक रसोइया एवं उसको रखने के लिए पर्याप्त रुपये का प्रबन्ध करने के लिए कह देना।” कहना तुम अगर चाहते हो कि मैं तुम्हारे हिसाब से खाऊँ-पियूँ, तो रसोइया भेज दो और पैसे भेज दो।

“इन सब लोगों में एक पैसे की सहायता करने का तो सामर्थ्य है नहीं, पर आगे बढ़कर ये मुझे उपदेश झाड़ते हैं। इन पर मुझे बस हँसी ही आती है।”

ये लोग हैं जो स्वामी जी को बता रहे थे कि ऐसे खाया करो, ऐसे पिया करो, ये सब क्यों कर रहे हो तुम। ये बताया करते थे।

इसी तरह ये लोग क्या बोल रहे थे, जिसमें ख्रिश्चन मिशनरी (प्रचारक) भी शामिल थे। ये कह रहे थे कि कामिनी-कंचन के जो नियम होते हैं कि कामिनी और कंचन से दूर रहना, ये नियम इन स्वामी ने तोड़ दिये हैं। अब स्वामी जी वहाँ स्त्रियों से भी हिलते-जुलते थे। अमेरिका की संस्कृति अलग है, वहाँ भारत की तरह तो नहीं रहेंगे। तो ये कहते थे कि ये कामिनी और कंचन सारे इन्होंने नियम तोड़ रखे हैं।

तो स्वामी जी का जवाब है, “कि अगर ये कहते हैं कि कामिनी-कंचन आदि व्रत मैंने तोड़े हैं, तो उनसे कह देना कि वे झूठ बोलते हैं। मेरे बारे में तुम इतना ही जान लेना कि मैं किसी के कहने पर नहीं चलूँगा, मेरे जीवन का क्या व्रत है, वो मैं स्वयं तय करता हूँ। किसी राष्ट्र विशेष के प्रति न मेरा बहुत अनुराग है, न विद्वेष है। जैसे मैं भारत का हूँ, वैसे ही पूरी दुनिया का हूँ। मुझसे जहाँ तक हो सकता था, मैंने तुम लोगों की सहायता की है, अब तुम ख़ुद अपनी सहायता करो। ऐसा कौनसा देश है जो मुझ पर विशेष अधिकार रखता है? क्या मैं किसी राष्ट्र नेशन के द्वारा ख़रीदा हुआ दास हूँ?”

अंग्रेजी में यही है — ”एम आइ ए स्लेव टू ए पार्टिकुलर नेशन (क्या मैं किसी देश विशेष का ग़ुलाम हूँ)?” कि तुम कह रहे हो कि भारतवासी हैं और अमेरिका जाकर के ऐसी हरक़तें क्यों कर रहे हैं?

वो कह रहे हैं, ‘मुझे जैसा चलना होगा, मैं अपने हिसाब से चलूँगा, तुमसे पूछकर थोड़े ही चलूँगा!’ आगे कहते हैं — “अविश्वासियों! नास्तिकों! व्यर्थ की मूर्खतापूर्ण बातें बन्द कर दो।” ये लोग जो बदनामी कर रहे थे उनकी, “मैंने यहाँ कठोर परिश्रम किया है और मुझे जो कुछ धन मिला है, उसे मैंने कलकत्ते और मद्रास ही भेजा है। ये सबकुछ करने के बाद, अब मुझे क्या तुम लोगों के मूर्खतापूर्ण निर्देशों पर चलना पड़ेगा?”

तुम सोचो, स्वामी जी को अगर क्रोध आ रहा है इतना, तो लोगों ने उनके बारे में कैसी-कैसी बातें करी होंगी। लोग कह रहे थे कि ये वहाँ जाकर चन्दा इकट्ठा कर रहे हैं और वहाँ गुलछर्रे उड़ा रहे हैं। ‘ये विदेश गये हैं, ताकि वहाँ जो धन इकट्ठा करें और उस धन का ख़ुद ही वहाँ पर भोग कर रहे हैं।’ तो उन्होंने कहा, ‘मैंने जो भी पैसा इकट्ठा करा है, वो संस्था के काम के लिए कलकत्ता और मद्रास भेज दिया है। और तुमसे पूछकर थोड़े ही चलूँगा?’

“तुम्हें लज्जा नहीं आती, मैं तुम लोगों का किस बात के लिए कर्ज़दार हूँ?”

‘तुम कौन हो, तुमने कभी मुझे एक रूपया दिया क्या, तो मैं तुम्हें क्यों जवाब दूँ?’

“क्या मैं तुम लोगो की प्रशंसा की कोई परवाह करता हूँ या तुम्हारी निन्दा से डरता हूँ? मैं एक ऐसा विचित्र स्वभाव का व्यक्ति हूँ कि मुझे पहचानना तुम लोगों के लिए अभी सम्भव नहीं है। तुम अपना काम करो या चुपचाप बैठ जाओ, लेकिन अपनी मूर्खता के दम पर मुझसे अपनी इच्छा अनुसार काम करवाने की चेष्टा मत करो। मुझे किसी की सहायता नहीं चाहिए, जीवनभर मैं ही दूसरों की सहायता करता रहा हूँ। ऐसा तो कोई मुझे आज तक मिला ही नहीं, जो मेरी सहायता कर सके। एक थे श्री रामकृष्ण परमहंस, उनसे मुझे जो मिलना था, मिला।“ उनके बारे में कह रहे हैं। उनसे जो मिलना था मिला। “उसके बाद अब मुझे किसी की सहायता की कोई दरकार नहीं है। हमारे कामों में सहायता देने के लिए जिन लोगों में दो रूपये देने की भी शक्ति नहीं है, वही लोग लगातार व्यर्थ की बातें कर रहे हैं।”

दो रुपये हमारे काम में कभी तुम दे नहीं पाये, और हमारे बारे में उल्टी बातें करने में सबसे आगे हो।

“तुम लोग उस व्यक्ति पर अपना हुक़्म चलाना चाहते हो, जिसने अपने लिए कुछ भी नहीं किया, बल्कि जहाँ तक हो सकता था उसने सबकुछ तुम्हारे लिए किया। जगत ऐसा ही अकृतज्ञ है, अनग्रेटफुल है। क्या तुम यहाँ कहना चाहते हो कि ऐसे जातिभेद, जर्जरित कुसंस्कारयुक्त, दयारहित, कपटी, नास्तिक, कायरों में से जो केवल शिक्षित हिन्दुओं में ही पाये जा सकते हैं — एक बनकर जीने-मरने के लिए मैं पैदा हुआ हूँ? कह रहे हैं, “तुम कपटी लोगों, मैं तुम्हारे जैसा नहीं हूँ। ठीक है। तुम्हारे जैसा होने के लिए मैं न पैदा हुआ हूँ, न मरूँगा।“

”कायरता को मैं घृणा की दृष्टि से देखता हूँ और किसी प्रकार की राजनीति से मेरा कोई लेना-देना नहीं। मात्र सत्य ही मेरी राजनीति है।”

कैसा लग रहा है ये सब सुनकर स्वामी जी के बारे में? उनके जीवन का ये पहलू जानते थे? हमें तो ये बताया गया कि वो जब लौटकर आये थे, तो उनका बड़ा, भारी स्वागत किया गया था, ज़बरदस्त! और भारत बिलकुल उनके चरणों में लोट गया था, ये हमें बताया गया कि भारत ने ही उनको कितना परेशान किया, कितना परेशान किया।

अभी ये सुनो, ये अंग्रेज़ी में है। ये हम भारतीयों ने ही करा है उनके साथ, क्या किया है? सुनो, उन्होंने अपनी माँ के लिए एक मकान ख़रीदा। उन्हें अलग से आकर के किसी ने कुछ पैसे दिये। उनकी माँ के पास मकान नहीं था रहने को, पिता पहले ही जा चुके थे। ये सब आप जानते हो, जीवनी उनकी। उन्होंने अपनी माँ के लिए मकान ख़रीदा। किसी को अग्रिम, एडवांस में राशि दे दी कि ये पैसे ले लीजिए और मुझे मकान दे दीजिए माँ के लिए।

जिसने पैसे ले लिये, उसने पज़ेशन (कब्ज़ा) नहीं दिया। स्वामी जी के व्यक्तिगत पैसे लूट लिये। और स्वामी जी कह रहे हैं, “उसने ये सिर्फ़ इसलिए किया है क्योंकि उसको पता है कि मैं सन्यासी हूँ, मैं कोर्ट में तो जाऊँगा नहीं, तो उसने मेरे पैसे लूट लिये।“ ये करा है हम हिन्दुस्तानियों ने उनके साथ। उनकी माँ को रहने के लिए घर भी नहीं दिया।

पढ़े देता हूँ — “माय डिअर मदर, द ऑन्ट व्होम यू सा हैड ए डीप लेड प्लान टू चीट मी एंड शी एंड हर पीपल कॉन्ट्राइव टू सेल मी अ हाउस फ़ॉर सिक्स थाउज़ेंड रूपीज़, एंड आइ बॉट इट फ़ॉर माय मदर इन गुड फेथ, देन दे वुड नॉट गिव मी पज़ेशन हॉपनिंग दैट आइ वुड नॉट गो टू कोर्ट फ़ॉर द शेम ऑफ़ टेकिंग फोर्सिबल पज़ेशन एज़ अ सन्यासी।“

आगे, “आइ डू नॉट थिंक आइ हैव स्पेंट इवन वन रूपी फ़्रॉम व्हाट यू एंड अदर्स गेव मी फ़ॉर द मिशन। कैप्टेन सेवियर गेव मी एट थाउज़ेंड रूपीज़ विथ द क्लियर एंड एक्सप्रेस्ड डिज़ायर ऑफ़ हेल्पिंग माय मदर बट इवन देट मनी हैज़ गॉन टू द डॉग्स।“

(प्रिय माँ, जिस महिला को आपने देखा था, उसने मुझे धोख़ा देने की गहरी योजना बनायी थी। उसने और उसके लोगों ने मुझे छः हज़ार रुपये में एक घर बेचने की साज़िश रची, जिसे मैं अपनी माँ के लिए ख़रीदना चाहता था। उन्होंने पैसे लेने के बाद मुझे घर का कब्ज़ा देने से इनकार कर दिया। ये सोचकर कि एक सन्यासी होने के नाते, जबरन कब्ज़ा लेने के लिए मैं अदालत नहीं जाऊँगा।

आपने और अन्य लोगों ने मिशन के लिए जो पैसे दिये थे, उसका एक रुपया भी मैंने अपने लिए ख़र्च नहीं किया। कैप्टन सीवियर ने मेरी माँ की मदद करने की दृढ़ और प्रकट इच्छा से आठ हज़ार रूपये दिये थे। लेकिन अब लगता है शायद वो पैसे भी बर्बाद हो गये।)

उनकी माँ के लिए, उनको विशेषकर जो पैसे दिये गए, हमने उनके वो पैसे भी लूट लिये। अब हम उनकी मूर्तियाँ बनाएँ, हम युवा दिवस मनाएँ, इससे ये बात छुप थोड़े ही जाएगी कि जब वो जीवित थे तो हमने उनको कितना परेशान किया, कितनी हमने कृतघ्नता दिखायी और उनके मिशन के रास्ते में कितनी अड़चनें करीं?

उनका जो अन्तिम पत्र था, उसमें उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता का वही श्लोक उद्धरित किया है जो मेरा भी पसन्दीदा है। कह रहे हैं, “मैं बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ, पर शरीर दुर्बल है, लिख नहीं पाऊँगा। बस इतना लिख रहा हूँ — श्रीमद्भगवद्गीता का चौथा अध्याय, ग्यारहवाँ श्लोक — “जो मेरी जिस तरह पूजा करता है, उसको मैं उसी तरह मिलता हूँ। जो मुझे जैसे ध्याता है, मैं उसके सामने वैसा ही आता हूँ।”

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्तमानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।

(जिस भाव से सारे लोग मेरी शरण ग्रहण करते हैं, उसी के अनुसार मैं उन्हें फल देता हूँ। हे पार्थ! प्रत्येक व्यक्ति सभी प्रकार से मेरे पथ का अनुगमन करता है।)

(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक११)

आगे है, ’हिज़ हेल्थ डिटेर्योटेड बिकॉज़ ऑफ़ एक्सटेंसिव वर्क एंड ट्रेवल एंड ही हैड टू डू देट जस्ट टू रैज़ फंड्स टू द मिशन। (अधिक काम और व्यापक यात्राओं के कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ा। और ये इसलिए हुआ क्योंकि उन्हें मिशन के लिए संसाधन जुटाने थे।)’

जो टाइमलाइन (समय-सीमा) भी है, वो यही बता रही है कि अमेरिका गये मई, १८९३ में, सितम्बर १८९३ में, शिकागो का उनका व्याख्यान था। मई, १८९७ में रामकृष्ण मिशन की स्थापना हुई और उसके बस पाँच ही साल के अन्दर-अन्दर प्रस्थान कर गये।

पुण्यतिथि: ४ जुलाई, १९०२।

हमें उनकी मृत्यु के बारे में भी यही बता दिया गया, जन धारणा बन गयी है कि उन्होंने समाधि ले ली थी। पर हम कभी साफ़-साफ़ ईमानदारी से स्वीकार नहीं करना चाहते हैं कि अधिक काम करने के कारण और दिन-रात खटने के कारण, और धन के अभाव से जूझने के कारण उनकी मृत्यु हुई, हम ये कभी नहीं स्वीकार करना चाहते। जबकि ये बात उनके पत्रों में साफ़-साफ़ चिल्ला-चिल्लाकर सामने आ रही है, पर हम कभी स्वीकार नहीं करते। स्वीकार करेंगे तो पाप जैसी हालत हो जाएगी न, हमें मानना पड़ेगा कि ये कलंक हमारे ही माथे लगा हुआ है।

अन्त में उनको साफ़ दिख रहा था कि तबियत बहुत ख़राब हो रही है, तो एक मैगज़ीन निकालना चाहते थे। वो मैगज़ीन निकल नहीं रही थी, तो उसके लिए जो बहुत सारी बातें हैं, जो उन्होंने बोला है अपने लोगों को, ये उसमें आख़िरी बात है — “अगर कुछ नहीं कर पा रहे हो, इफ़ दे आर ऑल्सो नॉट एबल टू डू एनीथिंग देन सेल ऑफ़ एवरीथिंग, एंड देन रिटर्न द प्रोसीड्स टू द डोनर।“ (जितने डोनर से पैसे आये हैं उनको उनके पैसे लौटा दो, अगर तुम वो नहीं कर सकते जिसकी मिशन को ज़रूरत है।)

आगे, “आइ गेट नो न्यूज़ एट ऑल फ़्रॉम द मठ। व्हाट इज़ शरत डूइंग? आइ वांट टू सी वर्क डन। बिफ़ोर ड, आइ वांट टू सी देट व्हाट आइ हैव एस्टेब्लिश्ड एज़ ए रिज़ल्ट ऑफ़ माय लाइफ़ लॉन्ग स्ट्रगल इज़ पुट इन अ मोर ऑर लेस रनिंग कंडीशन।“ (मुझे मठ से कोई ख़बर नहीं मिलती। शरत क्या कर रहा है? मैं काम पूरा होते देखना चाहता हूँ कि मैंने अपने आजीवन संघर्ष के परिणाम स्वरूप जो स्थापित किया है, वो थोड़ा-बहुत चालू हालत में है।)

ऐसे जीता है एक योद्धा। हम सोचते हैं कि वो तो बस; जैसे उनका एक चित्रण है न कि वो तो अपना योगावस्था में बैठ गये हैं और बस ध्यानस्थ हैं। ध्यानस्त नहीं रहा जाता, संघर्षरत् रहा जाता है और दिन-रात जूझा जाता है, तब जाकर के कहीं बदलाव आता है, क्रान्ति आती है।

फिर लिखते हैं, “एनीवे पे स्पेशल अटेंशन टू द मैगज़ीन। मेंटली टेक इट एज़ दो आइ वर नॉट। एक्ट इंडिपेंडेंटली ऑन दिज़ बेसिस।

मैगज़ीन के लिए बोले, ‘ऐसे चलाओ जैसे अब मैं नहीं हूँ। मैं जा चुका हूँ और मैगज़ीन छपती रहेगी हमेशा।‘

लोगों ने कहा कि जो मैगज़ीन होगी, इसमें सब आध्यात्मिक बातें होंगी, लोग पढ़ेंगे नहीं। बोले, ‘मैं जानता हूँ लोग कैसे हैं कि नहीं पढ़ेंगे, मुझे पता है कि लोग आध्यात्मिक बातें होंगी तो नहीं पढ़ेंगे।’ तो बोले, ‘एक काम करो, यात्रा के मेरे जितने रोचक अनुभव रहे हैं, जिसमें लोगों का मन लगता है, मनोरंजन जैसा होता है, वो छापो।’

लिख रहे हैं, “शरद राइट्स दैट द मैगज़ीन इज़ नॉट गोइंग वेल लेट देम पब्लिश अकाउंट्स ऑफ़ माय ट्रैवल्स एंड थरली एडवटाइज़ बिफ़ोर हैंड।“ कह रहे हैं, ‘लोगों को कुछ भी देने के लिए आवश्यक है कि पहले से ही प्रचार करो, विज्ञापन करो, एड्वरटीज़मेंट दो कि मैगज़ीन में कोई रोचक बात आने वाली है ख़रीद लो, मैगज़ीन ख़रीद लो।’

ओन्ली देन विल सब्स्क्राइबर्स कम रशिंग इन। सब्स्क्राइबर्स के लिए बड़ी मारा-मारी है, नहीं आएँगे लोग। जब तक उनको कुछ रोचक, मनोरंजक नहीं दिखाओगे।

”डू पीपल लाइक मैगजीन इफ़ थ्री फोर्ट्स ऑफ़ इट आर फील्ड विथ पायस स्टफ़्स।“ पायस माने शुद्ध, धार्मिक पवित्र।

कह रहे हैं, ‘अगर तीन-चौथाई मैगज़ीन में तुमने शुद्ध और धार्मिक और पवित्र बातें लिख दीं तो तुम्हारी मैगज़ीन वैसे भी नहीं बिकेगी। मैगज़ीन बेचनी है तो उसमें कुछ थोड़ा मनोरंजक मसाला डालो।’ इससे किसके बारे में पता चलता है? इससे उस मैगज़ीन के पाठकों और ग्राहकों और सब्स्क्राइबर्स के बारे में पता चलता है। कि विवेकानन्द जैसे महापुरुष को भी अपनी मैगज़ीन को स्वीकृत बनाने के लिए कहना पड़ा कि इसमें और बातें डालो, अगर इसमें तीन-चौथाई आध्यात्मिक बातें रहेंगी तो कोई नहीं पढ़ेगा।

ये ऐसे काम करना पड़ता है, ये बातें आपको नहीं पता हैं, आप बस ऐसे ही कहते रहते हो, ‘स्वामी जी की जय! बिना ये जाने कि वो कितना जूझे हैं और कितना उन्होंने चोट खायी है। जब उन्होंने मोनेस्ट्री (मठ) बनायी, तो लोगों का उस पर रवैया क्या था?

“मोस्ट पीपल डिड नॉट वेलकम द न्यूली बॉर्न मोनेस्ट्री़।” (अधिकांश लोगों ने मठ को पसन्द नहीं किया)। लोगों को पसन्द नहीं आयी। अब तो हमें लगता है कि रामकृष्ण बना होगा तो लोगों ने बाहें फैलाकर खुले दिल से हार्दिक स्वागत किया होगा, नहीं था, ऐसा नहीं था।

वो ख़ुद लिख रहे हैं, ”मोस्ट पीपल डिड नॉट वेलकम द न्यूली बॉर्न मोनेस्ट्री, मच लेस एडमायर इट।” एडमायर (प्रशंसा) करना तो दूर की बात है, लोगों को बहुत गुस्सा आ रहा था कि ये क्यों बना दिया, ये नहीं चाहिए, परम्परागत् हमारा धर्म चलने दो। और उस समय तो और रूढ़ियाँ और अन्धविश्वास; अभी भी हैं वही। बोल रहे हैं, ‘ये रूढ़ियाँ हैं, अन्धविश्वास हैं, परम्पराएँ हैं, संस्कार हैं वही चलने दो न, ये तुम नयी बातें क्यों लेकर आ रहे हो?’

स्वामी जी तो बिलकुल नयी बात ला रहे थे — वो विज्ञान को ला रहे थे, वो अद्वैत की बात करते थे। तो ”मोस्ट पीपल डिड नॉट वेलकम द न्यूली बोर्न मोनेस्ट्री, मच लेस एडमायर इट। इनडिफरेंस, टॉन्टिंग, स्लैन्डर, ओप्रेशन, इटीसी वर व्हाट द मोंक्स हैड टू फेस…।“ (ज़्यादातर लोगों ने नये मठ का स्वागत नहीं किया, प्रशंसा करना तो दूर की बात है। सन्यासियों को उदासीनता, ताने, बदनामी, उत्पीड़न आदि का सामना करना पड़ा।)

क्या-क्या करा लोगों ने, अब उन्होंने इसकी सूची दी है, इनडिफरेंस, पहली चीज़, और क्या करा? टॉन्टिंग , ताने कसे, व्यंग्य मारे — एक रुपये की सहायता नहीं, पर ये सब दिया ज़रूर। इनडिफरेंस, टॉन्टिंग, स्लैंडर स्लैंडर माने बदनामी करी, किसी की बदनामी कर दो खूब, उसका नाम ख़राब करो, ओप्रेशन दमन करो। दीज़ वर व्हाट द मॉन्क्स हैड टू फेस (ये सब सन्यासियों को सहना पड़ा)। उनके लोगों को ये फेस करना पड़ा।

आगे क्या लिखते हैं, अब ये विदिन कोट्स है — “द ओन्ली थिंग वी गोट फ़्रॉम दोज़ अराउंड अस वाज़ अ किक एंड अ कर्स देट वाज़ ऑल।” जो लात मार सकता था उसने लात मारी, और जो गाली दे सकता था, श्राप दे सकता था, अपशब्द बोल सकता था, उसने ये सब करा।

ऐसे ही नहीं कोई चालीस का होने से पहले ही विदा हो जाता है। बहुत मज़बूत आदमी थे, पहलवान सरीखी उनकी काया थी, ऐसे कैसे उनकी मृत्यु हो गयी, समझो। ये सब उनको हमने दिया है, ऐसे करके हमने उन्हें मौत तक पहुँचा दिया।

“द ओन्ली थिंग वी गॉट फ़्रॉम दोज़ अराउंड अस वाज़ अ किक एंड अ कर्स।”

अब किस बात पर बदनामी करते थे लोग उनकी? उसका एक कारण है, दे रखा है, ”द ड्रिंकिंग ऑफ़ टी वाज़ नॉट पॉपुलर; बट वन वुड टेक टी व्हेन इन्फेक्टेड विथ मलेरिया ऑर कफ़ ऑर कोल्ड…। अनादर रिपोर्ट, हॉवएवर, क्लेम्स देट अ डिकॉक्शन ऑफ़ टी विदाउट मिल्क और शुगर वाज़ अवेलेबल। द ओन्ली लग्ज़री दे इंडल्ज इन वाज़ स्मोकिंग टोबैक्को फ़्रॉम अ हब्बल-बब्बल। ऐज़ दे हैड नो वार्म क्लाउड्स द मोंक वुड डू फिजिकल एक्सरसाइज़ेज़ टू वार्म देमसेल्व्ज़ व्हेन दे आर अवाकेन बाय द चिल ऑफ़ कोल्ड विन्ट्री नाइट्स।“

(चाय पीना लोकप्रिय नहीं था; लेकिन मलेरिया या खाँसी या सर्दी से संक्रमित होने पर कोई भी चाय पिएगा। हालाँकि एक अन्य रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बिना दूध या चीनी वाली चाय का काढ़ा उपलब्ध था। उनकी एकमात्र विलासिता थी तम्बाकू, धूम्रपान करना। चूँकि उनके पास गर्म कपड़े नहीं थे, इसलिए जब सन्यासी ठंडी रातों की ठंड से जगते थे, तो वे ख़ुद को गर्म करने के लिए शारीरिक व्यायाम करते थे।) ये हालत थी।

बात समझ रहे हो?

ठंड ज़्यादा लगी तो क्या किया, उठे तो एक्सरसाइज़ (व्यायाम) करने लग गये कि शरीर गर्म हो जाए। आगे लिखते हैं — “ओइंग टू वॉन्ट ऑफ़ फंड्स आइ वुड समटाइम्स फाइट फ़ॉर एबोलिशिंग द मठ अलटुगेदर…।“

धन की कमी के कारण मैं कई बार कहता था कि ये मठ ही पूरा बन्द कर दो न, पैसा तो है नहीं, तो चलाएँ कैसे काम?

“देयर हैव बीन डेज़ व्हेन द मठ वाज़ विदाउट अ ग्रेन ऑफ़ फूड। इफ सम राइस वाज़ कलेक्टेड बाय बेगिंग, देयर वाज़ नो साल्ट टू टेक इट विथ।“

खाने को नहीं होता था। चावल मिल जाए तो नमक नहीं होता था। “ऑन सम डेज़ देयर वुड बी जस्ट राइस एंड साल्ट एंड नोबडी केयर्ड फ़ॉर इट।“

ठीक है। चावल और नमक है उसी से काम चल रहा है। लेकिन इसको ही कह रहे हैं — “ओह, दोज़ वंडरफुल डेज़!”

पर मौज बहुत थी!

“ओह, दोज़ वन्डरफुल डेज़!” आगे कहते हैं, इट इज़ अ ट्रिमेन्डस ट्रूथ देट इफ़ देयर बी रियल वर्थ इन यू, द मोर आर सर्कमस्टेंसेज़ अगेंस्ट यू, द मोर विल देट इनर पॉवर मेनिफेस्ट इटसेल्फ़…।“

जितना स्थितियाँ प्रतिकूल होंगी, उतना आपके भीतर का बल प्रकट होगा।

ये है — द अर्ली हिस्ट्री ऑफ़ द रामकृष्ण मूवमेंट, स्वामी प्रभानन्द से है। और भी बहुत है, कितना मैं इसमें से पढूँ, सारा वही है। संघर्ष, संघर्ष, संघर्ष और लोगों द्वारा, भारतीयों द्वारा, हिन्दुओं द्वारा ही ज़बरदस्त विरोध।

प्र२: प्रणाम आचार्य जी। जैसे आपने अभी स्वामी विवेकानन्द जी के बारे में बताया, उनके संघर्षों के बारे में बताया। जब वो जीवित थे तब उन्हें लोग इतना नहीं समझते थे और उन्हें फॉलो (अनुसरण) भी नहीं करते थे। तो जैसे कि उनकी मृत्यु के बाद फिर हम उन्हें अब ज़्यादा मानते हैं, तो ऐसा क्यों होता है आचार्य जी कि किसी महापुरुष के रहते, लोग उनकी बातों को उतना नहीं समझते और उनकी मृत्यु के बाद उनके फॉलोवर्स (अनुयायी) ज़्यादा बन जाते हैं, किसी भी महापुरुष के? जैसे कि सच्चाई बलिदान ही माँग रही हो, उनकी मृत्यु के बाद ही हमें उसकी सच्चाई का विश्वास होता है?

आचार्य: भाई देखो, वो इंसान जब मर जाएगा तो उसके बाद तो वो आकर आपको न सलाह देगा, न निर्देश, न आदेश। ठीक? तो सुविधा है, सुरक्षा है। वो ज़िन्दा है, उस वक़्त आपने कह दिया वो महान है। मान लो, मैं यहाँ बैठा हूँ, ये गुलशन (स्वयंसेवक) यहाँ बैठा हुआ है। अभी ये ज़िन्दा है, और मैं कह दूँ, ‘गुलशन महान’। मैं अगर अपने मुँह से मान लूँ गुलशन महान, तो अब गुलशन जो कुछ कहेगा, वो मुझे मानना पड़ेगा, तो बड़ी दिक्क़त हो जाएगी।

और गुलशन मुझे तोड़ देगा, गुलशन पैदा ही हुआ है तोड़ने के लिए। महानता का अर्थ ही यही होता है नेति-नेति, तोड़ देगा, मिटा देगा, चूरा कर देगा। तो जब तक ये ज़िन्दा है, ख़तरनाक है, अभी इसको महान मान लिया तो ये मुझे तोड़ डालेगा। तो जब तक ये ज़िन्दा है, तब तक इसका विरोध करो, इसको जीने मत दो, किसी तरह इसको मार डालो। फिर जब ये मर जाएगा, तब इससे कोई ख़तरा तो बचा नहीं, अब ये तो मर गया, तो अब बोल दो, ‘गुलशन महान।’

जब तक वो ज़िन्दा है, तब तक उसको एक रुपया मत दो। जब मर जाए तो बड़ी-बड़ी उसकी मूर्तियाँ बनवा दो। जितनी उसकी मूर्तियाँ बनवा रहे हो, उतना पैसा उसको दे दिया होता। उस समय भी, जब हम पढ़ रहे थे कि स्वामी जी एक-एक रुपये के लिए परेशान हो रहे थे, उस समय भी भारत में बड़े-बड़े मन्दिर थे और और बन रहे थे। और उनमें करोड़ो रुपया तब भी जमा था। और सब हिन्दु जाकर वहाँ दान-दक्षिणा कर भी रहे थे और अन्य धार्मिक कामों में भी पैसा लगा रहे थे, पर स्वामी जी को नहीं दे रहे थे।

ज़िन्दा महापुरुष आग होता है। जिनमें जलने का दम होता है वही उसके पास आते हैं। जब आग बुझ जाती है, राख रह जाती है, तब तो कोई भी वहाँ आकर कह सकता है, ‘महान-महान, गुलशन महान।’ अब क्या होगा, अब कोई ख़तरा नहीं है न। अब राख थोड़े ही उठकर कहेगी, ‘ये बेईमान! ज़िन्दगी ठीक कर अपनी, मुझे महान मत बोल। अपनी ज़िन्दगी ठीक कर बेईमान।’ अब राख तो ऐसा कहेगी नहीं, अब कोई ख़तरा नहीं है।

वो व्यक्ति सत्तर-अस्सी साल कम-से कम जीने वालों में था। रामकृष्ण परमहंस ने उनका चयन बहुत देख-समझ कर किया था। और जो बातें उन्होंने देखी थीं, उनमें एक बात ये भी थी कि ये व्यक्ति मेरे सन्देश का वाहक बनेगा, ये कद-काठी का मज़बूत होना चाहिए। वो बहुत मज़बूत आदमी थे। और ऐसा मज़बूत आदमी अड़तीस की उम्र में चला गया। वो पहले ही बोल रहे थे, ‘चालीस नहीं पूरा करूँगा।’

अपनी ज़िन्दगी देखकर उनको अनुमान लग गया था कि ये खिंचूँगा नहीं मैं बहुत, क्योंकि आग है न, आग को बुझाना पड़ता है। जो जल सकते हैं, उनके लिए आवश्यक हो जाता है कि आग को बुझा दो; या तो आग बुझेगी, नहीं तो हमें जलना पड़ेगा। तो बहुत तरीक़े के षड़यन्त्र करके आग को बुझा दिया जाता है। अब सीधे-सीधे किसी की हत्या नहीं कर सकते, तो ऐसी स्थितियाँ पैदा कर दो कि वो संघर्ष करते-करते ही बेचारा वीरगति को प्राप्त हो जाए।

आज आप उन लोगों से जाकर हिसाब थोड़े ही माँग रहे हो जिन्होंने स्वामी जी को बदनाम करा था? वो लोग तो छुप गयें। उस समय वो जितना नुक़सान कर सकते थे, उन्होंने करा। और अब तो वो छुपे बैठे हैं न? उनके नाम अब हम निकाल नहीं रहे हैं कि किस जगह पर, किन किताबों में, किन लोगों ने, किन समाचार पत्रों में, किन-किन तरीक़ों से स्वामी जी को बाधा डाली थी, अड़चन डाला था, निन्दा करी थी, बदनामी करी थी। वो लोग तो अपना दुष्प्रचार करके साफ़ बच निकले।

प्र2: आचार्य जी, इसमें विश्वास को लेकर भी था कि इन महापुरुषों की मृत्यु के बाद ही उन पर ज़्यादा भरोसा हुआ?

आचार्य: ये भरोसे से क्या मतलब है आपका? ये भरोसा हुआ कि अब ये ख़तरनाक नहीं रह गया, ये भरोसा हुआ। भरोसा तो हुआ, पर उस भरोसे को थोड़ा समझिए, क्या भरोसा हुआ? भरोसा तो आया, पर क्या? कि अब कोई ख़तरा नहीं है, ये भरोसा आ गया। अब ये कुछ बिगाड़ नहीं सकते हमारा, अब इनको महान मान लो।

अरे! महान उसको मानना है, तो जब वो ज़िन्दा है तब मान लो न। और अपने लिए व्यक्तिगत महानता तो माँग भी नहीं रहा है, वो माँग रहे थे कि भाई, मैं मठ बनाना चाहता हूँ, रामकृष्ण मिशन बनाना है, उन्हें अपने लिए कुछ व्यक्तिगत रूप से थोड़े ही चाहिए था?

जब वो थे, उस समय उनको महान मान लिया होता, तो वो इस राष्ट्र के लिए बहुत कुछ और कर पाते, उस समय तो उनको बस परेशान करा। और बहुत बातें हैं उनके जीवन से सम्बन्धित, अभी समय का अभाव है, मैं पूरा नहीं बता पाऊँगा।

अमेरिका वो इतनी आसानी से नहीं पहुँच पायें थे, अमेरिका जाने के लिए भी उन्होंने बहुत मुश्किल से धन जुटाया था। वो भी कुछ ख़ास लोग थे जिन्होंने सामने आकर मदद कर दी, नहीं तो जा भी नहीं पाते। जब पहुँचे हैं तो उस समय संचार, सूचना के माध्यम नहीं थे, उन्हें पता नहीं था, वो बहुत पहले पहुँच गये। अब उतने दिन का उनके पास पैसा नहीं था, तो कैसे जियें वहाँ पर? वो सब आप उनका वृतान्त पढ़िए।

हाँ! जब वो व्यक्ति चला जाता है, इस दुनिया से विदा हो जाता है, तब हम आकर के खड़े हो जाते हैं दावा ठोकने के लिए। हम कहते हैं, ‘हमारे विवेकानन्द हैं।’ अगर हमारे विवेकानन्द हैं, तो जब विवेकानन्द थे, तब आपने उनके लिए क्या किया? और अब जब वो नहीं रहे, तो फिर अब उनकी विरासत पर हक़ क्यों जमा रहे हो?

वो तो साफ़-साफ़ लिख रहे हैं कि उनकी मदद तो पश्चिम के लोगों ने ही करी! तो फिर भारत वाले क्यों आकर कह रहे हैं कि हमारे विवेकानन्द? और भारत के लोगों की ही बात नहीं है, आम आदमी तो भीड़ का हिस्सा होता है, उनका विरोध कोई आम आदमी नहीं कर रहा था, उनका विरोध कौन कर रहे थे? ये जो जमे-जमाये पुराने धर्म के लोग थे।

क्योंकि विवेकानन्द आये थे धर्म को एक नयी चमक देने के लिए, वैदिक धर्म को उसकी पुरानी नींव वापस दिलाने के लिए, तो ये सब जो बीच में सब फर्ज़ी, अन्धविश्वासी, रूढ़िवादी, परम्परावादी पैदा हो गये हैं, इनको बड़ा ख़तरा हो गया था। यही थे जो अड़चन करते थे और स्लैंडर कैंम्पेन (बदनामी अभियान) ये सब यही लोग करते थे।

और आम आदमी तो वैसे ही, उसको कुछ पता ही नहीं, कुछ हो रहा है, वो कहता है, ‘हमें क्या पता, कुछ हो रहा होगा। कुछ छप गया अख़बार में, तो उसको मान लो।’ हम इस बात को उनकी बार-बार उद्धरित करते हैं कि उन्होंने कहा था, ‘सौ मिल जाएँ तो हो जाए।’ हम ये नहीं सोचते कि एक व्यक्ति जो स्वयं अभी बस तीस-पैतीस साल का है, वो अभी ही क्यों बोलने लग गया कि अगर सौ मिल जाएँ तो देश बदल दूँगा।

उन्होंने कहा था, ‘सौ जब भी हो जाएँगे, ये देश बदल जाएगा।’ उन्हें दिख गया था, कि उनके जीते जी ये काम नहीं हो पाएगा, तो फिर उन्हें भविष्य पर उम्मीद लगानी पड़ी कि मेरे बाद हो सकता है ऐसे लोग आयें, जो मेरा काम सम्पन्न कर पायें।

प्र३: प्रणाम आचार्य जी। जैसा कि स्वामी विवेकानन्द जी के साथ हुआ कि लोग उनकी उपेक्षा करते थे, उनका सहयोग नहीं किया। तो जो आज का दौर है, जहाँ तक मैं देख पा रही हूँ और मैं समझ पा रही हूँ, तो आपके साथ भी सेम वैसा ही हो रहा है कि जो सो कॉल्ड (तथाकथित) धर्म के ठेकेदार लोग बैठे हैं, वो आपको; कहना चाहिए, बदनाम करने की कोशिश करते हैं या फिर आपके बारे में उपेक्षा करते हैं या बुरा बोलते है कि कुछ भी चीज़ को लेकर, तो हमेशा से यही चीज़ क्यों होती आती है?

उन्हें ये क्यों नहीं समझ में आता कि अगर कोई एक अच्छा काम करने के लिए चल रहा है, तो उसको साथ चलकर जो सौ लोगों की बात की थी, अगर वो सौ लोग आज बन जाएँ, तो भारत की जो दशा है वो सुधर जाएगी, तो इस बारे में सब लोग ऐसा क्यों नहीं सोचते? क्यों सिर्फ़ एक स्वामी विवेकानन्द या एक आचार्य प्रशांत ही होता है, जिसको पूरी दुनिया की, हिन्दुस्तान की या बाक़ी चीज़ों की फ़िक्र होती है?

आचार्य: इसका उत्तर अभी पिछले ही प्रश्न में हमने दिया तो है न, हमें बने रहना है। उपनिषद् हों, ऋषि हों, सन्त हों या स्वामी विवेकानन्द हों, ये होते हैं ताकि हम हमारे जैसे न रह पायें। तो ये आग होते हैं, ये आते हैं हमें जलाने के लिए। हम ये नहीं समझते कि हमारे जलने में ही हमारी भलाई है। हम ये नहीं समझते कि जब हम जलेंगे, तो वास्तव में हम शुद्ध होकर, निखरकर सामने आएँगे। हम ये नहीं समझते कि जब हम जलेंगे तो हमारा मर्म नहीं जलता, हमारा बस कचड़ा जलता है, तो हम शुद्ध हो जाते हैं, हम ये नहीं समझते।

जब हम आग सामने देखते हैं तो हम डर जाते हैं, तो हम उसका विरोध करने लग जाते हैं। बस इतनी सी बात है और कुछ नहीं। डर जाते हैं, ये अज्ञान है, स्वयं के प्रति अज्ञान। हम जानते ही नहीं कि हममें सोना कितना है, कचड़ा कितना है। हम कचड़े को ही अपना वजूद समझे बैठे हैं। हम सोचते हैं हम कचड़ा ही हैं ऊपर से लेकर नीचे तक, तो सामने जब आग देखते हैं तो कचड़ा बिलबिलाने लगता है, कहता है, ‘ये आग तो जला देगी मुझे।’

कचड़ा समझ ही नहीं रहा है कि वो हटेगा तभी भीतर जो सोना है, जो मर्म है, आत्मा है वो प्रकाशित होकर प्रकट होगी। उसके प्रकट होने के लिए कचड़े का जलना ज़रूरी है। आग इसलिए पूजनीय है। पर कचड़ा तो आग से डरता है, विरोध करता है आग का।

वो बोल रहे थे न बार-बार, बार-बार कह रहे थे कि हम पराधीन लोग हैं, हम दास लोग हैं, बार-बार बोल रहे थे न यही? बोल रहे थे, ‘कोई वजह है कि हम पराधीन हैं, कोई वजह है कि हम दास हैं।’ आज भी तो भारतीय लोग हर मामले में दबे हुएँ हैं। और आजकल जो धर्म के नाम पर आक्रामकता दिखा रहे हैं, वो भी इसी बात का प्रमाण है कि हम बहुत दबे हुएँ हैं और डरे हुएँ हैं।

जो डरा होता है उसी को आक्रामक होने की ज़रूरत पड़ती है। आक्रामकता डर का ही दूसरा नाम है, आक्रामकता कायरता का ही दूसरा नाम है। स्वामी जी बार-बार यही तो बोल रहे थे कि ये देश के लोग हैं, ये तो डरे हुए, ईर्ष्यालु लोग हैं। इनकी चेतना सोयी पड़ी है, ये बिलकुल अभी चेतना में बच्चे समान हैं। वो उदाहरण दिया था न कि जैसे कोई वैद्य किसी बच्चे को कड़वी दवाई पिलाना चाहता हो और बच्चा छूट-छूटकर, उछल-उछलकर दूर भागता हो, इस देश के लोगों की ये हालत है।

प्र३: आचार्य जी, वो भी कई साल, सौ साल पुरानी बात थी। और आज जो आपके साथ संघर्ष हो रहा है, जितनी मेहनत आपको अपने मिशन को आगे बढ़ाने के लिए करनी पड़ रही है, फिर भी हमारे अन्दर इतनी बेईमानी क्यों है कि हम आपके साथ रहते हुए भी पूरे तरीक़े से आपका साथ नहीं देते हैं?

आचार्य: वो बेईमानी मिटती है, जब आप भी वही करने की कोशिश करो जो सही है। साथ देना थोड़ी छोटी बात होती है, साथ देने में ऐसा हो जाता है कि साथ माने एक हाथ — किसी का साथ दिया जाता है, उसको एक हाथ दे दिया। पर उसको एक हाथ दे दिया माने ये थोड़े ही है कि दूसरा हाथ किसी और को नहीं दे दोगे, तो साथ बड़ी गड़बड़ बात होती है।

आप बिलकुल एक के साथ हो सकते हो और पचास और के साथ भी हो सकते हो; दूसरा हाथ कहा है, कुछ पता नहीं। मामला वहाँ फँस जाता है। तो साथ मत दीजिए, वही होइए जो आपको हो जाना है। श्रीकृष्ण हों कि कोई अन्य महापुरुष हों, वो इसीलिए नहीं आते कि आप सिर्फ़ साथ दें या पीछे चले। वो इसलिए नहीं आते हैं ताकि आपके भीतर का जो कृष्णत्व है, वो प्रकट हो।

उसके बाद बात साथ देने की नहीं हो जाती, साथ तो किसी दूसरे का दिया जाता है, उसके बाद बात अपनी हो जाती है, एकदम निजी हो जाती है, एकदम आत्मिक हो जाती है। उसके बाद वो लड़ाई आपकी है, उसके बाद आप किसी दूसरे की लड़ाई में दूसरे का साथ नहीं दे रहे, उसके बाद आप अपनी लड़ाई लड़ रहे हो, तब जाकर के जान आती है लड़ाई में।

किसी दूसरे का साथ कोई कितनी दूर तक दे सकता है। किसी दूसरे के रास्ते पर, दूसरे के पीछे-पीछे कोई कितनी दूर तक चल सकता है। आप इस बात को अपनी बात मानो, आप इस लड़ाई को अपनी लड़ाई बनाओ, आप देखो कि ये जो कुछ है, ये बिलकुल वही है जो आपके लिए ज़रूरी है और जो आप हमेशा से चाहते रहे हों।

जब आपको ये दिखाई देगा, तो फिर आप खुलकर, मुक्त होकर, अपने पूरे वैभव में प्रकट हो पाओगे। नहीं तो एक बात समझिएगा हमेशा — झूठ और डर साथ-साथ चलते हैं, अहंकार हमेशा कायर होता है, क्योंकि उसे अपनेआप को बचाने की बड़ी फ़िक्र होती है।

कायरता तब तक नहीं हटेगी, जब तक आपने अपने भीतर के झूठ को ही अपना राजा बना रखा है, आप कायर ही रह जाओगे। आपको साफ़ कहना होगा, ‘मैं किसी के साथ नहीं चल रही, ये जीवन मेरा है, ये संघर्ष मेरा है।’ गीता क्या सिर्फ़ अर्जुन की है? नहीं, गीता आपकी है, आपको कहना पड़ेगा, ‘गीता मेरी है।’

आपको ये नहीं कहना पड़ेगा कि मैं गीता पढ़ती हूँ — कि सर हैं, वो गीता पढ़ा रहे हैं, मैं गीता पढ़ रही हूँ, ऐसे नहीं। ‘गीता मेरी है।’आपको एक अपना निजी, आत्मिक रिश्ता बनाना पड़ेगा गीता से, श्रीकृष्ण से, तब बात बनती है। तब फिर आपको निर्देशों की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी, तब आप ये नहीं कहेंगे कि जो कहा गया वो हमने कर दिया, फिर जो नहीं भी कहा जाएगा, वो भी करके दिखा दोगे।

सबकुछ जो कर रहे थे स्वामी विवेकानन्द, वो थोड़े ही था जो उन्हें रामकृष्ण परमहंस करने को बोल गये थे? रामकृष्ण तो उनको एक विरासत छोड़ गये थे, एक दिशा-निर्देश दे गये थे कि ये बात है, इसको पूरी दुनिया तक पहुँचाओ, जन कल्याण इसमें है। उसके आगे जो कर रहे हैं स्वामी जी, वो स्वयं कर रहे हैं न, क्योंकि बात अब उनकी अपनी हो गयी है।

तो गीता आपकी अपनी हो जानी चाहिए। ये बात जब तक मेरी है, तब तक आप बस या तो साथ दोगे या पीछे चलोगे, ये बात आपकी अपनी हो जानी चाहिए।

प्र४: जो स्वामी विवेकानन्द जी के बारे में बताया, तो उसके बारे में मुझे कुछ एकाध चीज़ें बोलनी थीं। मैंने काफ़ी किताबें भी पढ़ी हैं विवेकानन्द जी के ऊपर, लेकिन वो किसी और की लिखी हुई थीं। ऐसे विवेकानन्द जी की लिखी हुई लेटर्स (पत्र) या ऐसे कुछ मैंने कभी नहीं पढ़ा है। एकाध चीज़ें मैं बताना चाहूँगा यहाँ पर, कि हमें तो ये बताया गया है कि उनकी मृत्यु जो है उन्तालिस की उम्र में हुई है, क्योंकि उनका जो काम है इस दुनिया में, वो ख़त्म हो गया था और इसलिए वो इच्छामृत्यु वरण कर रहे हैं, ये एक चीज़ है।

दूसरा ये है कि जब उनका जन्म हुआ था, तब रामकृष्ण जी को कोई टूटता हुआ तारा दिख गया था। और वो समझ गये थे कि कोई आ रहा है वीर ये, इस दुनिया में जो कि कुछ अलौकिक कुछ करेगा।

तीसरा एक है, जो कि हम बंगाली में कहा जाता है कि वीर जवान पुरुष है, मतलब वीर जवान पुरुष हैं वो, जिसका मतलब है कि जब भी वो अन्धेरे में भी वो जब चलते थे, तो वो एक एनलाइटेन्मेंट (आलोक) जो चीज़ है वो दिखती थी उनमें वो जब जलते थे, ऐसा कुछ।

लेकिन आज उनकी जो व्यथा है, जो उनके लेटर्स में जो आपने पढ़कर सुनाया है, वो तो मतलब कभी नहीं सुना। ये हर किसी को ऐसा ही बताया जाता है, स्टूडेंट्स को।

आचार्य: दर्ज़नों उनको बीमारियाँ हो गयी थीं, जिस तरह का वो जीवन जी रहे थे, श्रमसाध्य, कष्टप्रद। कौन-कौनसी बीमारियाँ थीं, आप लोग ख़ुद ही खोजिएगा तो मिल जाएँगी। जहाँ तक मुझे याद है, डायबिटीज़, हाइपरटेंशन, कितने तरह की उनको बीमारियाँ थीं! मृत्यु भी जो उनकी हुई थी, वो कोई ब्रेन (मस्तिष्क) की ब्लड वेसल (रक्त धमनी) थी, उसके रप्चर (टूटना) होने से हुई थी।

तो मैं क्या बोलूँ, आप समझ तो रहे ही हो न? इस पर हम पहले चर्चा कर चुके हैं कि कैसे हम अपने महापुरुषों की संघर्ष गाथा बिलकुल छुपा देते हैं और उनको अलौकिक बना देते हैं।

ऐसा लगता है, जैसे ये हम सम्मान के नाते कर रहे हों, पर इसमें सम्मान तो पता नहीं कितना होता है, जो वो थे वो बात दब जाती है। जो असलियत थी, जो उनकी पूरी रक्तरंजित कहानी है, वो छुप जाती है। और कोई महापुरुष ऐसा नहीं होगा जिसकी कहानी में आपको ख़ून-ही-ख़ून न दिखाई दे।

आप जिसको बदलने आये हो, वो एक बहुत बड़ा समाज है, वो एक बहुत बड़ी तादाद है, असंख्य जन समुदाय है, आप जिसको बदलने आये हों। और वो बदलना नहीं चाहते, तो वो मुट्ठियाँ भींचकर आपका विरोध करेंगे भाई! और उनमें भी बीच में न्यस्त स्वार्थ वाले लोग होते हैं, पदासीन लोग होते हैं, सत्तासीन लोग होते हैं, मठाधीश होते हैं, और पुरानी परम्पराओं के वाहक लोग होते हैं, वो लोग जान लेने को उतारू हो जाते हैं।

ये बात हमें समझ में क्यों नहीं आ रही? हमें क्यों लग रहा है कि जब कोई आता है हमें समझाने को, बताने को, तो हम उसका बड़ा स्वागत करते हैं; स्वागत नहीं करते हम, लिखा है न,” ऑल दैट दे कैन गिव अस अ किक एंड अ कर्स।“ ये उनके अपने शब्द हैं। स्वास्थ्य उनका कब से ख़राब चल रहा था! मृत्यु से कई वर्ष पहले से उनका स्वास्थ्य गिरने लग गया था। किसी को भी अलौकिक मत बना लेना, इससे तुम उसकी मानवीयता छीन लेते हो, उसकी ह्यूमननेस छीन लेते हो, उसकी असलियत छीन लेते हो।

और उसने जो — करुणा में बोल लो, वीरता में बोल लो, आपकी मर्ज़ी है —

उसने जो जान लगायी होती है, आप उसका श्रेय छीन लेते हो उससे, आप उसे डिस्क्रेडिट (बदनाम) कर देते हो।

कोई अलौकिक नहीं होता, सब इसी ज़मीन से, इसी मिट्टी से पैदा होते हैं, एक मानव के गर्भ से पैदा होते हैं। हमारे आपके चुनाव की बात होती है कि ज़िन्दगी कैसी जाएगी, कितनी ऊँची जाएगी। कुछ लोग सही चुनाव करते है और कुछ डर के मारे नहीं करते हैं, इतना ही अन्तर होता है बस, कोई तारा-वारा नहीं टूटता।

कोट्स:

“जितना स्थितियाँ प्रतिकूल होंगी, उतना आपके भीतर का बल प्रकट होगा।“

“हमारे आपके चुनाव की बात होती है कि ज़िन्दगी कैसी जाएगी, कितनी ऊँची जाएगी। कुछ लोग सही चुनाव करते है और कुछ डर के मारे नहीं करते हैं, इतना ही अन्तर होता है बस।“

ध्यानस्त नहीं रहा जाता, संघर्षरत् रहा जाता है और दिन-रात जूझा जाता है, तब जाकर के कहीं बदलाव आता है, क्रान्ति आती है।

आक्रामकता डर का ही दूसरा नाम है, आक्रामकता कायरता का ही दूसरा नाम है।

झूठ और डर साथ-साथ चलते हैं। अहंकार हमेशा कायर होता है और कायरता तब तक नहीं हटेगी, जब तक आपने अपने भीतर के झूठ को ही अपना राजा बना रखा है।

ज़िन्दा महापुरुष आग होता है। जिनमें जलने का दम होता है वही उसके पास आते हैं।

हम ये नहीं समझते कि हमारे जलने में ही हमारी भलाई है। जब हम जलेंगे, तो वास्तव में हम शुद्ध होकर, निखरकर सामने आएँगे। मर्म नहीं जलता, हमारा बस कचड़ा जलता है, तो हम शुद्ध हो जाते हैं।

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