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सुंदरता - बात नाज़ की, या लाज की? || आचार्य प्रशांत (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
22 min
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प्रश्न: सर, आप हमेशा शारीरिक सुंदरता को नीची नज़र से देखते हैं। मैं सुंदर और आकर्षक हूँ। पुरुष मेरी ओर ख़िचते हैं और मुझे इस बात पर नाज़ भी है। सुंदर होना कोई अपराध तो नहीं? पर आपको सुनती हूँ तो ऐसा लगता है जैसे सुंदर होकर मैंने कोई गुनाह कर दिया हो।

आचार्य प्रशांत: सवाल तो कुछ पूछा नहीं, मेरा गुनाह गिना दिया।

कौन-सी चीज़ सुंदर है? सुंदरता माने, किसकी सुंदरता? तुम जब कह रही हो - "मैं सुंदर हूँ," माने क्या सुंदर है? कौन सुंदर है? वो सामने एक स्वयंसेवक बैठा है, उसका चश्मा सुंदर है या उसकी टूटी कलाई सुंदर है? 'मैं' माने, कौन है जिसकी सुंदरता की बात कर रही हो? और मैं कोई यूँ ही किताबी-सैद्धांतिक बात नहीं कर रहा, जल्दी से ऊबने मत लग जाना। सुंदरता माने, किसकी सुंदरता? सुंदरता हर तल पर अच्छी होती है, पर आप बात किस तल की कर रही हैं?

अच्छा चलो ठीक है, मैं इस कैमरे के सामने बैठा हूँ, ठीक है न? आप से बात कर रहा हूँ। ये कोई बुरी बात तो नहीं है कि ये माइक सुंदर है? बात तो अच्छी ही है अपने आप में कि माइक सुंदर है। देखो कितना सुगढ़ है। यही आड़ा-तिरछा होता, अजीब-सा लग रहा होता, इसका यहाँ प्लास्टिक गिर रहा होता, या इसका तार उड़ा हुआ होता, तो कुछ बात बनती नहीं न? या इसका रंग उड़ा हुआ होता, आधा पीला आधा लाल हो रहा होता। तो अच्छी बात है कि एकदम तराशा हुआ सा इसका आकार है, और सुंदर है ये माइक, ठीक है? माइक का सुंदर होना अच्छी बात है। पर यहाँ मैं नहीं हूँ और बस एक सुंदर माइक है, तो कैसा लगेगा तुम्हें? इस कुर्सी पर मैं नहीं हूँ और सुंदर माइक है, कैसा लगेगा तुमको? माइक तो सुंदर है, क्या आपत्ति है? आपत्ति ये है कि माइक सुंदर है, लेकिन माइक केंद्रीय चीज़ नहीं है। हालांकि सुंदर होना अच्छा है। एक घटिया और बदसूरत माइक से बेहतर है एक सुंदर माइक।

तुमने कहा - "नहीं, नहीं, नहीं, माइक सुंदर है लेकिन इससे बात बनती नहीं, आप भी आइए।" तो मैं आकर बैठ गया यहाँ पर। अब मैं आकर यहाँ पर बैठ गया। मेरी ये शर्ट बड़ी सुंदर है। आ हा हा! क्या रंग है! वाह! एकदम नई-नई लग रही है। मैं यहाँ बैठ गया, और तुम्हें अपनी सुंदरता दिखा रहा हूँ। बात बन जाएगी? क्यों सुंदर तो है न? और शर्ट का सुंदर होना कोई बुरी बात तो नहीं है न? या ये चाहते हो कि शर्ट बदसूरत हो, बदबू मार रही हो, फटी हो, या तो बहुत ढीली हो, या बहुत कसी हुई हो? ऐसा तो ठीक नहीं है। शर्ट अगर सुंदर है, दिखने में आकर्षक है, तो अच्छी ही बात है। कोई तकलीफ़ तो नहीं हो गई इस बात से। लेकिन सिर्फ़ शर्ट ही सुंदर है, मैं तो कुछ बोल ही नहीं रहा? माइक सुंदर है, शर्ट सुंदर है, मैं चुप बैठा हूँ; चलेगा काम? नहीं चलेगा न? कुछ बात बनी नहीं। मुझे शर्ट की सुंदरता से कोई आपत्ति है क्या? आपत्ति नहीं है, लेकिन मैं कह रहा हूँ सिर्फ़ शर्ट ही सुंदर है।

अच्छा चलो, शर्ट से भी आगे आते हैं। लॉकडाउन खुल गया है मान लो, आज मैं बाहर निकला, मैंने कहा - "आज सत्र है, आज लोगों के सवाल आएँगे, तुम्हारा भी सवाल आएगा, तो मुझे अपनी शक्ल कुछ सुंदर कर लेनी चाहिए।" ठीक है? तो मैं गया और मैंने कहा - "चलो भई, मेरी शक्ल सुंदर कर दो," तो उसने कहा - "बैठिए जनाब!” तो उसने मेरे मुँह पर तरह-तरह की सामग्री मल दी और दाढ़ी भी तराश दी बिल्कुल, जो कुछ भी वो कर सकता था, बालों में तेल लगा दिया, इधर-उधर से बाल-वाल भी सेट कर दिए, शक्ल भी सुंदर हो गई। और मैं यहाँ बैठ गया हूँ। अब माइक भी सुंदर है, शर्ट भी सुंदर है, और शक्ल भी सुंदर है—लेकिन मैं नहीं कुछ बोल रहा। चल जाएगा काम? नहीं चलेगा न? इसका मतलब क्या ये है कि मैं अपनी शक्ल बदसूरत रखना चाहता हूँ? इसका मतलब क्या ये है कि, जैसा कि तुमने मुझ पर इल्ज़ाम लगाया—"सुंदर होना कोई गुनाह है क्या?" मैं ये कह रहा हूँ कि सुंदर होना गुनाह है? अगर सुंदर होना गुनाह होता तो मैं हर तरीक़े के बदसूरत कुर्ते और शर्ट वगैरह पहन कर बैठा करता न तुम्हारे सामने। ऐसा तो हम करते नहीं, या करते हैं? और मुँह पर भी मैं यहाँ पर अभी-अभी खाकर आया होता, और यहाँ दाल लगी होती, यहाँ चावल लगा होता, दाढ़ी में आटा-बेसन फंसा होता। ऐसे करता तो यहाँ कान से एक तिलचट्टा निकल पड़ता। नहीं, कुछ भी हो सकता है। आचार्य जी तो सुंदरता को गुनाह मानते हैं! सुंदरता अगर गुनाह है तो बदसूरती फिर बहुत बड़ा पुण्य होती होगी। तो हर तरीक़े के वो काम, जो असुंदर हों, जो कुरूपता दर्शाते हों, मैं ज़रूर करता। पर मैं ऐसा तो कोई काम करता नज़र नहीं आ रहा जिसमें मैं कुरूपता को प्रश्रय देता हूँ, या कर रहा हूँ ऐसा कोई काम?

तो ठीक है, अब माइक भी सुंदर हो गया, शर्ट भी सुंदर हो गई, शक्ल भी सुंदर हो गई, तो उधर से प्रश्नकर्ता ने कहा - "पर आप बोल तो रहे नहीं।" फिर मैंने बोलना शुरू किया। और मैंने बोलना क्या शुरू किया.....? बड़ी सुंदर आवाज़ में, बड़ी सुंदर आवाज़ में मैंने वही सब बोलना शुरु कर दिया जो आमतौर पर सुंदर आवाज़ वाले बोलते हैं: एक-से-एक व्यर्थ, मूर्खताभरी, निरुद्देश्य, लाभरहित बातें जिससे कि किसी को कुछ मिलना नहीं है। फिज़ूल, फूहड़पन, और आवाज़ मेरी बड़ी सुंदर है। आ हा हा! क्या सुंदर आवाज़ है! संगीतमय बिल्कुल। संगीत है, स्वर लहरियां भर रही हैं अब इस कमरे को। आ हा हा! और बोल क्या रहा हूँ? बेकार, कुछ नहीं।

अब तो सब सुंदर हो गया न, जैसे तुम कह रही हो कि तुम सुंदर हो। मैं भी अभी सब सुंदर किए देता हूँ—माइक सुंदर कर दिया, शर्ट सुंदर कर दी, शक्ल सुंदर कर दी, आवाज़ भी सुंदर कर दी। कहोगे - "नहीं, नहीं आवाज़ भर से क्या होता है? शब्दों में भी सौंदर्य होना चाहिए न?” अब प्रश्नकर्ता को मुझ पर खीझ आ रही है, गुस्सा आ रहा है, "ये क्या कर रहे हैं आप?” मैंने शब्द भी फिर सुंदर कर दिए। एक-से-एक सुंदर शब्द मैं ले आया, और खटाखट-खटाखट मैंने गोली की तरह दागने शुरू कर दिए—सुंदर शब्द। आह! क्या सुंदर शब्द हैं! सुंदर भाषा। जैसा बहुत लोग करते हैं, उनकी भाषा बहुत अच्छी होती है। ख़ासतौर पर अगर तुम पत्रकारों को पढ़ो, बहुत सारे लेखकों को पढ़ो, भाषा बहुत अच्छी होगी, तो वैसे ही मैंने भी ज़बरदस्त भाषा में सुंदर-सुंदर बातें करनी शुरू कर दीं। और उन सुंदर बातों में सुंदर क्या है बस? भाषा और शब्द। काम चल जाएगा?

तुमने जो सवाल पूछा है, उसका उत्तर मिल गया? अभी-भी नहीं मिला क्योंकि सुंदर भाषा और सुंदर शब्द से भी क्या होता है? कुछ और है जो सुंदर होना चाहिए न। क्या सुंदर होना चाहिए?

वो जो आखिरकार सुंदर होना चाहिए, उसको 'मन' कहते हैं। और मन का अंतिम सौंदर्य जिसको कहते हैं, उसको अध्यात्म ने नाम दिया है - 'आत्मा'। इसीलिए कहा गया कि जो सत्य है, वही शिव है, और वही सुंदर है, और कुछ सुंदर हो नहीं सकता क्योंकि और कुछ अगर सुंदर लगता भी है, तो उसकी सुंदरता से कुछ मिल नहीं सकता।

माइक होगा बहुत सुंदर, पर उसकी सुंदरता से मिल क्या जाएगा? शर्ट होगी बहुत सुंदर—हम नहीं कह रहे शर्ट सुंदर नहीं होनी चाहिए। अंतर समझना। शर्ट सुंदर हो, पर शर्ट का सुंदर होना तुम्हें कितना लाभ दे जाएगा भई? शर्ट के सहारे जी लोगे? मुँह सुंदर हो, अच्छी बात है, पर मुँह का सुंदर होना तुम्हें कितना लाभ दे जाएगा? मैं सुंदरता के ख़िलाफ़ नहीं हूँ। तुम अगर सुंदर हो, शरीर से, शक्ल से, अच्छी बात है, पर उतने से जी कैसे लोगी? उतने भर से तुम्हारा काम चल कैसे जाएगा?

जीवन बहुत बड़ी बात है। वो सुंदर देह या सुंदर चेहरे भर से नहीं चल जाता। और जो लोग इस बाहरी सुंदरता के फेर में ही रह जाते हैं, उनको सज़ा ये मिलती है कि वो आंतरिक सुंदरता से सदा के लिए वंचित रह जाते हैं।

मैं बाहरी सुंदरता के ख़िलाफ़ नहीं हूँ, मैं कह रहा हूँ - बाहरी सुंदरता, आंतरिक सुंदरता के सामने बहुत छोटी चीज़ है। हाँ, आंतरिक सुंदरता हो, उसके बाद तुम बाहरी सुंदरता लाओ, तो अच्छी बात है।

भई, तुम्हारा एक सौ रुपये का नोट गिरा है और एक पाँच रुपये का सिक्का, पहले किसको उठाते हो? किसको उठाते हो? सौ रुपये के नोट को न? इसका मतलब क्या ये है कि पाँच के सिक्के की कोई क़ीमत नहीं है? उसकी क़ीमत है, लेकिन सौ रुपये के सामने एक बटा बीस। यही अनुपात बाहरी सुंदरता और भीतरी सुंदरता में। सौ रुपये का नोट उठा लिया, उसके बाद उठा लो पाँच का सिक्का। लेकिन उस आदमी को क्या कहोगे या उस औरत को क्या कहोगे जो पाँच का सिक्का उठा रही है और सौ रुपये का नोट छोड़े दे रही है, ध्यान ही नहीं दे रही है? पाँच का सिक्का भी कुछ महत्व तो रखता है, पर सौ का नोट कहीं ज़्यादा महत्व रखता है। ये बात मैं कहता हूँ, मैं बाहरी सुंदरता के ख़िलाफ़ नहीं हूँ। बात समझ में आ रही है?

बहुत अच्छी बात है कि तुम्हारा शरीर सुंदर है; उससे कहीं ज़्यादा अच्छी बात होगी कि तुम्हारा मन सुंदर हो। बहुत अच्छी बात है कि तुम्हारी आँखें देख कर के तुमने कहा पुरुष तुम्हारी ओर आकर्षित हो जाते हैं। क्या बात है तुम्हारी आँखें ऐसी आकर्षक हैं कि पुरुष खिंचे चले आते हैं! लेकिन और भी बेहतर होता - वाह! क्या बात होती - अगर तुम्हारी आँखों के पीछे सच की रोशनी होती।

हम कहते हैं न आँखों में रोशनी होनी चाहिए? एक तो होती है साधारण रोशनी आँखों की, जिसने बस इतना देखा कि एक आदमी चला आ रहा है। ये साधारण रोशनी वाली आँख भी देख लेती है कि एक आदमी चला आ रहा है। और एक आँख होती है जिसमें सच की रोशनी होती है, वो बस यही नहीं देख लेती कि आदमी चला आ रहा है, वो ये भी देख लेती है कि - जो आ रहा है वो कौन है, जो उसे आता हुआ देख रहा है, वो 'मैं' कौन हूँ, और मेरा और उसका रिश्ता क्या है। वो आँख बहुत कुछ देख लेती है। वैसी आँख अगर आपके पास हो, तो उस आँख की सुंदरता का कहना क्या! ये आँख जिसकी आप सुंदरता बनाती फिरती हैं, भौहें बनवाते हैं, काजल लगाते हैं, ये आँख तो देखिए बहुत दिन चलनी नहीं है। असली आँख अगर आपके पास हो, तो फिर क्या बात है!

और एक फ़ायदा और सुनो!

अगर बस वही आँख है, ये हाड़-माँस वाली, तो इस आँख पर जो पुरुष रीझ रहे हैं, वो भी वैसे ही होंगे बस हाड़-माँस के पुजारी। अगर असली आँख है तुम्हारे पास, तुम्हारी आँख में अगर असली रोशनी है, तो फिर जो पुरुष तुम्हारी ओर आकर्षित होंगे वो भी असली होंगे। * तुम्हारी अगर सतही सुंदरता है, तो इस सतही सुंदरता से आकर्षित भी सतही लोग ही होंगे। ये तुमको सज़ा मिलेगी। * जो लोग बाहर-बाहर की सुंदरता बनाकर खूब घूमते हैं न बाज़ारों में, कि - "लो हमें देखो! हमारी ओर खिंचो। अपना ध्यान दो हमको,” उनको सज़ा ही ये मिलती है कि उनको ध्यान तो ख़ूब मिल जाता है, लोग उनकी ओर खिंच भी जाते हैं, पर कैसे लोग खिंचते हैं उनकी ओर? जो यही बाहरी खाल के और सतह के पुजारी होते हैं। यही उनको फिर मिल भी जाते हैं। और जिनको ऐसे लोग मिल जाएँ जीवन में, उनका जीवन नर्क हो जाता है। मिल गई सज़ा। बात आ रही है समझ में?

बहुत अच्छी बात है कि तुम कहीं पर निकलती होगी तो लोग तुमको देखकर के एकदम तुम पर ध्यान देने लगते होंगे। कहीं और अच्छा होता न कि लोग तुम्हारे गुणों को, तुम्हारी समझदारी को, तुम्हारी गहराई को, तुम्हारी ताक़त को देख कर तुम पर ध्यान देते। बोलो, क्या पसंद करोगी? कि लोग तुम्हारे जिस्म को देख कर के तुम पर ध्यान दे रहे हैं, या लोग तुम्हारी ताक़त को, तुम्हारे वजूद को, तुम्हारे ज्ञान को और तुम्हारी उपलब्धियों को देखकर तुम पर ध्यान दे रहे हैं? बोलो?

ये बात मैं सिर्फ़ तुम से नहीं कह रहा, ये बात मैं सब लड़कियों से कह रहा हूँ। लोग आप पर ध्यान दें ये कुछ ग़लत नहीं हो गया। गीता में कृष्ण बार-बार अर्जुन से यश और कीर्ति, यश और कीर्ति की बात करते हैं। वो कहते हैं कि - "अर्जुन, देख, जो सही काम करता है, उसको ही यश मिलता है," और कई जगहों पर कहते हैं, कि - "जो आदमी सही ज़िंदगी जीता है, वही कीर्ति का भोग करता है। उसको ही प्रशंसा और सम्मान मिलते हैं।" तो प्रशंसा और सम्मान पाना कुछ ग़लत बात नहीं हो गई, लेकिन तुम किस आधार पर प्रशंसा और सम्मान की चाह रख रहे हो? अगर वो आधार बस ये है कि - "देखो मुझे एक देह मिल गई है प्राकृतिक तौर पर, जिसको देख कर के पुरुषों में उत्तेजना की लहर दौड़ जाती है, वासना का संचार हो जाता है," तो ये बहुत ही निम्न कोटि का आधार है दूसरों का ध्यान आकर्षित करने का, दूसरों से प्रशंसा पाने का। तारीफ़ें तुम्हें मिलें, बहुत अच्छी बात है, पर क्यों न तुम्हें तारीफ़ मिले, मैं कह रहा हूँ, तुम्हारे अस्तित्व की शक्ति और गहराई पर?

बोलो, क्या चाहती हो - कि लोग इसलिए तुमको याद रखें क्योंकि तुम उनकी हवस का विषय हो, या ये चाहती हो कि लोग तुम्हें इसलिए याद रखें क्योंकि तुम्हें देखकर के उन्हें भी ये प्रेरणा मिल जाती है कि ज़िंदगी में ऊँचा उठा जा सकता है, कुछ हासिल किया जा सकता है, बंधन तोड़े जा सकते हैं, आकाश की ऊँचाइयाँ छुई जा सकती हैं?

इतिहास में सब तरह की स्त्रियाँ हुई हैं। तुम्हारे आदर्श कौन हैं? ऐसी भी बहुत औरतें हैं जिन्होंने जीवन भर बस यही करा कि जिस्म को संभाला, संवारा और दुनिया को आकर्षित किया। उनका शरीर ऐसा सोने जैसा कि दुनिया चकाचौंध हो जाए बिल्कुल। ऐसी भी बहुत स्त्रियाँ हुई हैं। और ऐसी भी स्त्रियाँ हुई हैं जिनके आगे पुरुषों ने सिर झुकाया है, गहरी श्रद्धा से नमन करा है। कैसी स्त्री बनना चाहती हो?

और मैं नहीं कह रहा हूँ कि जिन स्त्रियों के सामने पुरुषों ने श्रद्धापूर्वक सर झुकाया है उन स्त्रियों का शारीरिक रूप से कुरूप होना ज़रूरी है। शारीरिक सौंदर्य की मैं बात ही नहीं कर रहा। तुम अगर शरीर से सुंदर हो, भली बात है, इसमें कोई अपराध नहीं हो गया। पर वो बात महत्वपूर्ण नहीं है। बात ये है कि शरीर के चक्करों में फँसकर तुम उस चीज़ को भुलाए दे रहे हो, जो चीज़ महत्वपूर्ण है। इतना समय तुम्हारा शायद सिर्फ़ शरीर की देखभाल पर जाता है, और शरीर के तमाम प्रबंधन और व्यवस्था पर जाता है, कि जो ज़िंदगी की असली बात है, उसके लिए तुम्हारे पास कोई समय और ध्यान बचता ही नहीं।

सब लड़कियों को और स्त्रियों को इस विषय पर ख़ासतौर पर सतर्क रहने की ज़रूरत है।

प्राकृतिक तौर पर अधिकांश प्रजातियों में ऐसा होता है, और मनुष्यों में भी ऐसा होता है, कि नर ही ज़्यादा आकर्षित होता है मादा की तरफ़। मादा में अगर आकर्षण होता भी है तो निष्क्रिय होता है, प्रसुप्त होता है, पैसिव होता है। नर का जो आकर्षण होता है मादा के लिए वो सक्रिय होता है, सबल होता है, प्रकट होता है, एक्टिव होता है। तो इसीलिए अधिकांश प्रजातियों में तुम पाते हो कि एक नर, दो नर आठ, दस नर एक मादा का पीछा कर रहे हैं, उसको ललचा-लुभा रहे हैं, और उस मादा के पीछे आपस में लड़ाई भी कर रहे हैं। ये सब होता है। ये बात अक्सर स्त्रियों को ऐसा लगता है जैसे उनके गौरव की हो। ये जो लड़के या पुरुष, लड़कियों या स्त्रियों पर रीझते हैं, ये बात लड़कियों को ऐसा लगता है जैसे उनकी ताक़त है। नहीं, ये तुम्हारी ताक़त नहीं है, ये तुम्हारे लिए बहुत बड़ा ख़तरा है क्योंकि अगर आप सोलह की या अठारह की या बीस की या पच्चीस की हैं, और आप पा रही हैं कि आपको दुनिया से ध्यान और वाहवाही और तारीफ़ और कई बार रुपया-पैसा भी सिर्फ़ इसी बात पर मिल जा रहा है कि आपका शरीर सुंदर है—जो कि कई बार होता है, होता है कि नहीं?—तो फिर आपके पास अब वजह क्या बची अपने भीतर दूसरे गुण विकसित करने की, जीवन में ऊँचाइयाँ और उपलब्धियाँ हासिल करने की?

ऐसा संभव है कि आप ऐसा कहने लग जाएँ, कि - "भई, मेरी तो देह सुंदर है, चेहरा-मोहरा आकर्षक है, मुझे तो इतने से ही सब कुछ मिला जा रहा है। देखो, बहुत बड़ी-बड़ी उपलब्धियों वाले पुरुष भी मेरे पीछे कतार लगाकर खड़े हैं, तो मैं करूँगी क्या उपलब्धियाँ हासिल करके? एक-से-एक ऊँची नौकरियों के लोग आतुर हैं मेरा साथ पाने को, तो मुझे क्या करना है कोई ऊँची नौकरी पा करके? बहुत जिन्होंने बड़ी-बड़ी शिक्षाएँ ले लीं, वो भी मेरे आगे नाक रगड़ रहे हैं, एक घुटने पर बैठे हुए हैं, और कह रहे हैं, - "बस अपना हाथ दे दो, और ये सब वो लोग हैं जिन्होंने बड़ी ऊँची-ऊँची शिक्षा पाई हुई है, तो मुझे क्या ज़रूरत है बहुत ऊँची शिक्षा पाने की? इतनी मेहनत कौन करे? अरे भई! मुझे तो अपनी शक्ल के आधार पर ही इतने ऊँचे-ऊँचे लोग मिल गए, तो मुझे और मेहनत करने की ज़रूरत क्या है?” इस तरह का लालच उठ सकता है। इस तरह के लालच के विरुद्ध खबरदार रहने की, सावधान रहने की बहुत ज़रूरत है सब स्त्रियों को। क्योंकि ये पुरुष जो आपकी देह को देखकर आपके सामने झुक रहे हैं और आपकी प्रशंसा कर रहे हैं, ये सिर्फ़ आपकी देह के भूखे हैं। इनकी प्रशंसा बहुत दिन तक नहीं चलेगी। लेकिन अगर आपने असली कमाई करी है ज्ञान की, चरित्र की, ताक़त की और उपलब्धियों की, तो वो असली कमाई आपके साथ जीवन भर चलेगी। पुरुषों से आपको जो ध्यान मिल रहा है, उसको बहुत महत्व मत दे लीजिएगा। लेकिन पुरुषों से मिलते ध्यान को आप महत्व तब न दें न, जब आप अपने रूप-यौवन को बहुत महत्व ना दें।

दुनिया भर में साज-श्रृंगार के, कॉस्मेटिक्स के जितने सामान बिकते हैं, उसका अस्सी-नब्बे प्रतिशत स्त्रियाँ खरीदती हैं। कॉस्मेटिक्स की बिक्री का अस्सी-नब्बे प्रतिशत स्त्रियों से आता है। यहीं पर तो ख़तरा है! और ये प्रतिशत और ये क्षेत्र जिसमें ये अस्सी-नब्बे प्रतिशत आंकड़ा है, उन बहुत चुनिंदा, बिरले क्षेत्रों में है जहाँ स्त्रियों का पुरुषों पर वर्चस्व है। नहीं तो दुनिया का और कोई भी क्षेत्र देख लो उसमें पुरुष अस्सी-नब्बे प्रतिशत अधिकार लेकर बैठे होंगे, और स्त्रियों का पाँच-दस प्रतिशत होगा। ये बात मुझे बड़ी अजीब लगी।

दुनिया की कुल संपत्ति दो-चार प्रतिशत महिलाओं के पास है, पच्चानवे प्रतिशत पुरुषों के पास है। दुनिया की संसदों में और विधान सभाओं में स्त्रियों का अनुपात पाँच-दस प्रतिशत, नब्बे प्रतिशत कौन हैं? पुरुष हैं। दुनिया की कंपनियों में, शीर्ष पदों पर जो लोग हैं—'सी एक्सओज़' बोलते हैं जिनको, सीईओ, सीओओ, सीटीओ—इनमें महिलाओं की भागीदारी कितनी? पाँच-दस प्रतिशत, नब्बे प्रतिशत पुरुष हैं। लेकिन सुंदरता बढ़ाने वाली चीज़ों में महिलाओं की भागीदारी कितनी? वहाँ नब्बे प्रतिशत; वहाँ पुरुष बस दस प्रतिशत हैं। तुम्हें इन में सीधा-सीधा संबंध नहीं दिखाई पड़ रहा?

ये जो देह की सुंदरता है, जिसकी तुम बात कर रही हो, यही स्त्रियों का बहुत बड़ा बंधन है। और जब तक स्त्री अपनी देह की प्राकृतिक सुंदरता के बंधन से आगे नहीं बढ़ेगी, तब तक वो संसार में अपनी हस्ती, अपना वजूद, अपनी ताक़त स्थापित नहीं कर पाएगी। ज्ञान है आपकी असली ताक़त; आपका कौशल आपकी असली ताक़त है; आपने दुनिया कितनी देखी है, आपका अनुभव कितना है, ये आपकी असली ताक़त है।

ये थोड़े ही कि आपका पुरुष गाड़ी चला रहा है और आप उसकी बगल की सीट में बैठकर के, सामने आईना खोल करके—जो सनशील्ड होती है न ड्राइवर के बगल वाली सीट पर, उसको ऐसे पलटो तो उसमें एक छोटा-सा आईना लगा होता है। तो पुरुष महोदय गाड़ी चला रहे हैं, और बगल में सुंदर-सुंदर देवी जी बैठी हैं, वो क्या कर रही हैं? वो उसमें बाल संवार रही हैं और ऐसे-ऐसे होठों पर लाली घिस रही हैं। गाड़ी चलाने वाला कौन? और वो गाड़ी है भी किसकी? पुरुष गाड़ी ख़रीद रहा है, पुरुष गाड़ी चला रहा है, और देवी जी का काम है सुंदरता निहारना।

आप सुंदरता ही निखारती रह जाओगी तो आप जीवन कब निखारोगी अपना? लेकिन मेरी बात के विरुद्ध कुतर्क मत करने लग जाना; जल्दी से कूदकर मेरा विरोध मत करने लग जाना। मेरी बात से अक्सर स्त्रियों को ही बड़ी आपत्ति रहती है, खासतौर पर जो लिबरल स्त्रियाँ हैं उनको। वो कहती हैं - "हमारे ख़िलाफ़ कुछ बोलो ही मत; हम बिल्कुल सही हैं।" और एक और उनका ज़बरदस्त तर्क रहता है - "तुम स्त्री हो क्या? तो तुम्हें हमारे मन का क्या पता? हाउ इज़ अ मैन टॉकिंग अबाउट वीमेन्स इश्यूज़?" ये तो गज़ब हो गया!

हर तरीक़े की ताक़त अर्जित करो। दूसरे की गाड़ी में बगल में बैठकर के लिपस्टिक घिसना ना ताक़त की बात है, ना गौरव की बात है, और इसमें कोई सुंदरता भी नहीं है। गाड़ी तुम्हारी होनी चाहिए। गाड़ी तुम्हारी होनी चाहिए, स्टेरिंग भी तुम्हारे हाथ में होना चाहिए। गाड़ी कहाँ को जानी है, इसका फैसला भी तुम्हें करना चाहिए। ये है सौंदर्य। और गाड़ी कहाँ को ले जानी है, ये फैसला करने का बोध भी तुम्हारे पास होना चाहिए। ये नहीं कि - "मेरी जहाँ मर्जी होगी मैं वहाँ लेकर जाऊँगी। मैं तो आज की नारी हूँ। मुझे कोई रोके नहीं, मुझे कोई टोके नहीं।" नहीं, मन की उच्श्रृंखलता को, मनचले हो जाने को, मनमर्ज़ी चलाने को आज़ादी नहीं कहते। ये कोई लिबरल बात नहीं है कि ना ज़िंदगी समझी, ना जानी, ना उन किताबों के पास गए, ना उन लोगों के पास गए जिनसे जीवन को जानने में कुछ मदद मिल सकती है, और कहने लग गए कि - "मैं तो लिब्रेटेड हूँ। मैं तो अपने ही हिसाब से चलूँगी"। ये कोई ठीक बात नहीं हुई।

तो गाड़ी तुम्हारी हो, स्टेरिंग तुम्हारे हाथ में हो, गाड़ी की मंज़िल भी तुम्हीं ने तय की हो, और उस मंज़िल को ठीक से तय कर पाने का बोध हो तुम्हारे पास, इसमें सौंदर्य है। ये हुई असली सुंदरता।

अगर शरीर की सुंदरता से ही इतना ज़्यादा प्रयोजन है आपको, तो शरीर की सुंदरता से भी आशय क्या है आपका? खाल की सुंदरता? नहीं। अगर शरीर की भी सुंदरता की बात करनी है, तो शरीर की सुंदरता है शरीर की ताक़त, फिटनेस। शरीर ताक़तवर रखो, फिट रखो। दौड़ना आना चाहिए; ये नहीं कि हील इतनी ऊँची है कि दौड़े तो एड़ी मुड़ गई और "उइ माँ!”

और तुम्हारे घूँसे में जान होनी चाहिए कि किसी के भी चेहरे पर पड़े, किसी ताक़तवर पुरुष के चेहरे पर भी पड़े, तो मुँह तोड़ दे। ये है सुंदरता।

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