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सोच- सोच कर देखा तो क्या देखा || आचार्य प्रशांत, कृष्णमूर्ति पर (2014)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्न: इसका क्या मतलब है कि, “ट्रू ऑब्ज़रवेशन इज़ विदाउट थॉट(असली अवलोकन बिना विचार के होता है)”? इसको कृष्णमूर्ति बहुत बार कहते हैं कि, “ट्रू ऑब्जरवेशन इज़ ऑलवेज़ विदाउट थॉट।”

वक्ता: सोच-सोच के कुछ भी देख कैसे सकते हैं? थॉट विल एनलाइज़, थॉट विल नॉट ओब्ज़र्व , थॉट विल नॉट ओब्ज़र्व (विचार विश्लेषण करेगा, विचार अवलोकन नहीं करेगा। और जब ऑब्ज़रवेशन (अवलोकन) की बात हो रही है, तो हम एक शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं – ‘देखना’।

तीन तल होंगे देखने के। एक तल तो ये है कि मन विचारों से इतना भरा हुआ है, स्मृतियों से इतना अच्छादित है कि, “मैं देखूँ इस दीवार को, और मुझे दीवारों से जुड़ी हुई तमाम घटनाएँ याद आ जाएँ। ये दीवार को देखने का निम्नतम तरीका है। अब दीवार कुछ दिख ही नहीं रही है।

या मैं देखूँ एक चेहरे को, और उस चेहरे से जुड़ी हुई, या उससे मिलते-झूलते चेहरों से जुड़ी हुई पाँच-सौ घटनाएँ कौंध गयीं। अब कुछ दिखा नहीं है। समझ रहे हो ना? सुना है कुछ, और तुरंत अतीत से उसका संपर्क बना लिया, और वो पूरा एक किस्सा चालू हो गया। और वो जो रैंडम एसोसिएशन (निर्रुदेश्य संपर्क) होता है, इससे ये जुड़ा, उससे वो जुड़ा, और पूरी एक लम्बी श्रृंखला विचार की चालू हो गयी, ये देखने का निम्नतम तरीका है।

उसके बाद ये है कि चेहरा देखा, तो चेहरा-चेहरा ही है। हम कह रहे हैं, “व्यक्ति को व्यक्ति की तरह देखा।” हम आमतौर पर जब अपने छात्रों से बात करते हैं, तो उनको यहीं तक ले आते हैं। हम कहते हैं, “नहीं, व्यक्ति को पहचान और नाम के रूप में नहीं देखो, व्यक्ति को ‘व्यक्ति’ के जैसा देखो।” यहाँ पर हमने चाहा है कि कम से कम अतीत बीच में खड़ा न रहे। लेकिन यहाँ भी बात पूरी नहीं है, क्योंकि यहाँ पर भी जब आप कह रहे हो कि – “व्यक्ति को देखो,” तो ‘व्यक्ति’ माने क्या? ‘व्यक्ति’ माने एक आकार, ‘व्यक्ति’ मतलब वो जो इन्द्रियों से भासित हो रहा है। ‘व्यक्ति’ माने क्या?

जब आप कहते हो, “मुझे एक चेहरा दिख रहा है,” तो ‘चेहरा दिख रहा है’, ये नाम तो दे दिया ना कि ये ‘चेहरा’ कहलाता है।अतीत अभी भी है, सूक्ष्म रूप में मौजूद है, पर अभी भी है। आप इतना तो कहोगे कि पुरुष है, या स्त्री है’, अतीत अभी भी है। आप इतना तो कहोगे कि इसके आँखें हैं, मुझे देख रहा है, या इधर-उधर देख रहा है, अतीत अभी भी है। समझ रहे हैं ना? जो मेकनिक्स (प्रक्रिया) है मन की, वो अभी भी काम कर रही है। बहुत ज़ोर से नहीं काम कर रही है, चिल्ला-चिल्ला कर नहीं कर रही है, पर दबे-छुपे तो कर ही रही है।

तो फिर देखने का एक तीसरा तल भी है, जिसको ‘अतीन्द्रिय’ तल कह सकते हैं, कि आँखों से नहीं देखा। देखा, पर आँखों से नहीं देखा। इस तल से जो देखा जाता है, उसका देखे जाने वाले विषय से कोई ख़ास सम्बन्ध नहीं होता है, क्योंकि विषय हमेशा ख़ास ही होता है। ‘विषय’ का अर्थ ही है कि कुछ बंटा हुआ है। जब मैं कह रहा हूँ, “मैं एक व्यक्ति की ओर देख रहा हूँ,” तो मैं एक ‘ख़ास व्यक्ति’ की ओर देख रहा हूँ, तो ये द्वैत हो के रहेगा। ‘एक ख़ास व्यक्ति’ है, जिस पर मेरी नज़र है। तो यहाँ पर भी सब्जेक्ट-ऑब्जेक्ट (व्यक्ति-विषय) का खेल चल रहा है।

ये जो तीसरे तल पर देखा जाना है, यहाँ पर भूल ही गए कि कोई विषय है जिसे देखा जा रहा था, क्योंकि अतीन्द्रिय है, इसीलिए ये बाहर नहीं देख रहा है, क्योंकि इन्द्रियाँ तो मात्र बाहर ही देखती हैं। ये है कि कुछ ऐसा देख लिया, जिसका अंदर-बाहर से कुछ सम्बन्ध ही नहीं – ये है जग जाना, ये है जग जाना। तो जब कृष्णमूर्ति कह रहे हैं, “ रियल ऑब्ज़रवेशन इज़ विथाउट थॉट (असली अवलोकन बिना विचार के होता है),” तो सबसे पहले तो दूसरे तल पर आया जाए, पहले पर ना रहा जाए, क्योंकि अधिकाँश लोग, अधिकाँश समय, पहले ही तल पर गुज़ारते हैं। सबसे पहले तो दूसरे पर आया जाए, कि चेहरा दिखा तो कहें कि, “चेहरा है।”

और फिर यदि संभव हो, तो छलांग लगे वहाँ की भी, जहाँ पर सारे चेहरे, सारे शब्द, सारे अर्थ, सब विलीन ही हो जाते हैं। समझ रहे हैं? ये वास्तविक ऑब्ज़रवेशन (अवलोकन) है। तो बात उल्टी पड़ गयी। जो वास्तविक ऑब्ज़रवेशन है, उसमें कोई ऑब्जेक्ट ही नहीं है देखने के लिए। तो देख क्या रहे हो? कुछ नहीं। अब मुझे उस बात को अगर थोड़ा मज़े लेकर कहना है, तो मैं यूँ कहूँगा कि – जब तक देख रहे हो, तो कुछ दिख नहीं रहा। और दिखना शुरू ही तब होता है, जब कुछ ख़ास दिख नहीं रहा। क्योंकि जब तक दिखने के लिए कोई विषय, कोई ऑब्जेक्ट मौजूद है, तब तक तुमने देखा क्या?

जहाँ भी ऑब्जेक्ट होगा, जहाँ भी विषय होगा, वहाँ पर उसे देखने वाला होगा ना? एक केंद्र होगा, जहाँ से देख रहे हो। ऑब्जेक्ट है, तो सब्जेक्ट तो होगा। और वो सब्जेक्ट हमेशा कौन होता है? कौन होता है? अहंकार। अपने ही सन्दर्भ में हम दुनिया को देखते हैं। तो वास्तव में तभी देखा, जब न रूप दिखा, न नाम दिखा, न आकार दिखा। और तब देखा क्या? कुछ नहीं देखा। तो तभी देखा, जब ‘कुछ’ नहीं देखा। और जब तक देखा, तब तक क्या देखा?

और देखियेगा, ऐसा नहीं है कि ये बहुत दूर की बात है। वास्तव में आपने जब भी देखा है, तो आँखे बंद कर के ही देखा है। अपने ही जीवन पर ध्यान दीजिये। अपने ही जीवन पर ध्यान दीजिये।

प्रार्थना में आँखें बंद होंगी, प्रेम के गहनतम क्षणों में भी आँखे बंद होंगी। और जो प्रार्थना में भी आँखे खोल के बैठा हो, ये आदमी परम को कभी नहीं पाएगा। जो गहरे प्रेम में भी आँखें खोल के बैठा हो, वो प्रेम को कभी नहीं पाएगा। मात्र ऑंखें नहीं – आँखें, कान, समस्त इन्द्रियाँ, पूरा मन, ये बंद होकर रहेगा। तो घबराईयेगा नहीं, आँखों के बंद हो जाने से।

आँखे बंद हो रही हैं, इसका अर्थ ये नहीं है कि देखना छूट रहा है। आँखें बंद हो रही हैं, इसका मतलब ये है कि अभी-अभी जन्म ले रहे हो, देखना अब शुरू होगा। आँखें जब कह ही रहीं हों कि, “अब जाने दो हमें, बंद होने का आ गया समय,” तो उन्हें बंद होने दीजियेगा। सावधान मत हो जाईयेगा कि “आँखें बंद कैसे होने दूँ? कुछ ख़तरनाक ना हो जाए?” हो रही हैं बंद, हो जाने दीजिए। मन बंद हो जाना चाहता है, तो हो जाने दीजिए, आड़े मत खड़े होईये।

श्रोता १: सर, वो जो संकुचन हो रहा है, इन्द्रियाँ बंद हो रही हैं, वही एक तरीके से शक्ति का भी होता है। जैसे तूफ़ान का केंद्र हमेशा ही शांत होता है, जहाँ से बहुत बड़ा भवंडर खड़ा होता है।

वक्ता: होने दीजियेगा। जब होगा, तो उस वक्त इतने समझदार नहीं रह जाएँगे। थोड़ा अजीब-अजीब-सा लगेगा, थोड़ी वेदना भी उठेगी। आहट तो मिलेगी कि कुछ प्यारा-सा है, जो हो रहा है, लेकिन डर भी लगेगा। डर मत जाईयेगा।

~ ‘शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

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