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स्मरण और स्मृति में क्या अंतर है? || आचार्य प्रशांत, श्रीरामचरितमानस पर (2017)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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नामु राम को कलपतरु, कलि कल्यान निवासु।

जो सिमरत भयो भाँग ते तुलसी तुलसीदास।।

~ संत तुलसीदास

आचार्य प्रशांत: राम का नाम 'कल्पतरु' है, कल्पवृक्ष; माँगे पूरी करने वाला, मन चाहा अभीष्ट देने वाला। और कल्याण निवास है, "कल्यान निवासु" – वहाँ पर तुम्हारा कल्याण बसता है। “जो सिमरत भयो" – जिसको स्मरण करने से; “भाँग ते तुलसी तुलसीदास" – भाँग मतलब 'बेहोशी'; जब तक तुलसी ‘तुलसीदास' नहीं हुए थे, कहते हैं कि, “मैं भँगेड़ी-सा था, नशे में था, व्यर्थ था, बिना मोल का था।"

राम का नाम ‘कल्पतरु’ है और ‘कल्याण निवास’ है, जिसका स्मरण करने से तुलसी ‘तुलसीदास' हो गए।

ये बात क्या है? कौन-सा मंत्र दे रहे हैं? क्या कह रहे हैं? कह रहे हैं, “कुछ ऐसी चीज़ है जिसको स्मरण करने से आदमी बदल ही जाता है, कुछ-का-कुछ हो जाता है।"

ये क्या चीज़ है? कुछ समझ में नहीं आ रहा? हमें तो गुरुजन ये भी सिखा गए हैं कि स्मृतियों में न रहा करो, और यहाँ कहा जा रहा है कि कुछ ऐसा है जिसको स्मरण करने से आप घास (भाँग घास होती है) से तुलसीदास हो गए।

ये कौन-सा स्मरण है? आपमें से कई लोग शिक्षक हैं। आपसे जब आपके छात्र पूछते हैं कि, “अतीत बड़ा सताता है, स्मृतियाँ हावी हो जाती हैं,” तो आप कहते हैं, “क्या स्मृतियों में जीते हो? अरे, वर्त्तमान में जियो!" और यहाँ कह रहे हैं तुलसी कि, “कुछ ऐसा है जिसका सतत स्मरण घास को तुलसीदास बना देता है"। ये क्या बात है? क्या माजरा है?

‘स्मृति' में और ‘सुमिरन' में कोई भेद है क्या? लग तो रहा है। आप बताइए।

फिर पूछ रहा हूँ: ‘स्मृति' में और ‘सुमिरन' में कोई अंतर है?

समझिएगा, बात गहरी है, चूकना नहीं।

स्मृति है बार-बार उसको देखना जो ‘पीछे' है; स्मरण है लगातार उसको देखना जो 'सामने' है।

स्मृति में प्रयत्न है क्योंकि जो पीछे है वो स्वयं नहीं आ रहा अपने-आपको दर्शाने। वो तो गया। तो वहाँ आप कोशिश कर-करके उसको देखते हो, जैसे किसी जाते हुए को कोशिश कर-करके देखा जाता है कि दिख नहीं रहा है, तो अब दूरबीन लगाओ। या जा चुका है तो उसके पैरों की धूल देखते रहो, देखते रहो। और अब कुछ न मिलता हो तो उसके पदचिन्ह ही निहारते रहो। ये है स्मृतियों में जीना। इसमें इच्छा है, इसमें कामना है, और कामना-जनित प्रयत्न है।

और सुमिरन है उसको देखना जो सामने ही खड़ा है, जिसको देखने के लिए कोई कोशिश नहीं करनी है, जिसको देखने के लिए कुछ नहीं चाहिए। बस बेहोशी ‘नहीं' चाहिए। जो सामने खड़ा हो, उसको देखने के लिए क्या चाहिए? बस बेहोशी ‘नहीं' चाहिए। कुछ चाहिए नहीं; किसी का अभाव चाहिए। किसका अभाव? बेहोशी का। ये सुमिरन है। सुमिरन उसका किया जाता है जो सत्य है, जो सामने ही है, जो छुपा नहीं हुआ है।

जो सामने ही है उसके दो ही नाम हो सकते हैं: या तो मृत्यु, या राम। अगर अहंकार के केंद्र से देखेंगे तो जो सामने है उसका नाम है – मृत्यु। क्योंकि अहंकार के केंद्र से देखेंगे, अपने व्यक्तिगत केंद्र से देखेंगे तो संसार दिखाई देगा। और संसार में लगातार क्या हो रहा है? बदलाव। बदलाव का ही नाम मृत्यु है। जो पहले था वो अब नहीं है – यही है मर जाना, यही है बीत जाना, यही है न होना। पर अगर आप उम्मीदों के केंद्र से देखेंगे तो आपको बदलाव दिखाई नहीं देगा, क्योंकि उम्मीद आप कर रहे हैं लगातार कि —न बदले। चूँकी आप उम्मीद कर रहे हो कि न बदले, तो इसीलिए आप ये स्वप्न लिए जाते हो कि कुछ बदल नहीं रहा।

आपका बेटा पाँच साल का था, अब पंद्रह का हो चुका है। आपका व्यवहार अभी भी वैसा ही है जैसा पाँच की उम्र में था। आप उम्मीद कर रहे हो, “मेरा बेटा हमेशा नन्हा-मुन्ना राजकुमार रहा आए।" आप झूठ में जी रहे हो। इसीलिए आपको मृत्यु दिखाई नहीं दे रही, आपको बदलाव दिखाई नहीं दे रहा, आपको प्रवाह दिखाई नहीं दे रहा। कुछ भी कभी वैसा है नहीं जैसा वो थोड़ी देर पहले था। लेकिन आशा हमारी ये रहती है कि सब कुछ वैसा ही रहे जैसा कभी था। उसमें हमें संबल (सहारा) मिलता है। उसमें हम सुरक्षा पाते हैं। उसी की आस में जिए जाते हैं। और अगर कुछ बदलता दिखाई दे तो हम भरसक प्रयत्न करते हैं कि वो न बदले।

‘देखना' जब शुरू करोगे तो विवशता है तुम्हारी कि अपने ही केंद्र से देखोगे, अहंकार के, तो मृत्यु-ही-मृत्यु दिखाई देगी। पर अगर मृत्यु दिखने लगी तो मृत्यु का तथ्य अहंकार को गला देगा। मौत इतनी बड़ी बात है कि अहंकार उसे झेल नहीं सकता। अहंकार जब चारों तरफ़ मौत-ही-मौत देखता है, तो मर जाता है। “अरे! जब मौत-ही-मौत है तो मैं कहाँ जी रहा हूँ?" वो (अहंकार) भी गया। इसीलिए मौत को देखना बहुत ज़रुरी है।

जिसने मौत को देख लिया, उसकी अहंता की मौत हो जाती है। अहंता मरी नहीं कि फिर जब देखोगे तो राम-ही-राम दिखाई देंगे। ये है स्मरण।

जो शुरू कर रहा हो, वो लगातार स्मरण करे मृत्यु का; ये रास्ता है नेति-नेति का। 'नेति-नेति' का अर्थ ही है मृत्यु-मृत्यु; “ये भी नहीं, ये भी नहीं, सब झूठा, सब गया"। यही तो है नेति-नेति: सब झूठा, सब गया। और जब सब जा रहा होता है तो एहसास तुम्हें यही होता है कि मैं भी जा रहा हूँ। तुम नहीं जा रहे होते हो, अहंकार जा रहा होता है। अहंकार भीतर खड़ा होता है इस आशा में कि बाहर कुछ खड़ा रहेगा। और बाहर जो भी कुछ खड़ा है, वो खड़ा है ही नहीं, वो लगातार ध्वस्त हो रहा है। बाहर जब सब निरंतर ध्वस्त हो रहा है, तो जो भीतर है, उसकी आशा भी ध्वस्त हो रही है। उसे भी ध्वस्त होना पड़ेगा।

नेति-नेति यही करती है: बाहर जो कुछ है, उसका झूठ दिखा देती है, पर्दाफाश कर देती है। जैसे कोई खुलता जा रहा हो। क्या खुल रहा है? फ़रेब है, खुलता जा रहा है; धोखा है जो खुलता जा रहा है। "संसार नहीं खुल रहा मेरे सामने, एक धोखा खुल रहा है।" बाहर का पर्दा खुलता है; भीतर का पर्दा भी खुल जाता है। अहंकार पर्दे के पीछे अँधेरे के रूप में ही कायम रह सकता था, वो भी गिर जाता है। ये नेति-नेति है, ये है सतत स्मरण मृत्यु का। ये है होश में जीना।

बाहर जो देख रहे हो, अगर ईमानदारी से देखोगे, उसे बदलता हुआ देखोगे। कुछ भी वैसा नहीं है जैसी तुमने उम्मीद करी थी। कुछ भी वैसा नहीं है जैसा कभी तुम्हें लगा था। तुम कैसे जीओगे फिर बाहरी के भरोसे? अहंकार वो जो संसार भरोसे जीना चाहता हो। अब जीओगे कैसे? बाहर किसका भरोसा करोगे? बाहर जो है, वो तो अपने ही भरोसे का नहीं। बाहर जो है, उसमें तो इतनी भी क्षमता नहीं कि अपने-आपको एक पल बचा पाए। अरे! वो तुम्हें क्या बचाएगा?

अब अहंकार जिएगा कैसे? अहंकार सहारा तो निश्चित लेना चाहता है, पर किसका? संसार का, बाहर का। वो कभी राम का सहारा नहीं लेना चाहता, आत्मा का नहीं लेगा सहारा, हृदय का नहीं लेगा। अहंकार से पूछो, “तुझे किसका सहारा है?" वो कहेगा, “पद का सहारा है।" पद कहाँ है? वो कहेगा, “मुझे पैसे का सहारा है।" पैसा कहाँ है? वो कहेगा, “मुझे इस शरीर का सहारा है।" शरीर भी क्या है? वो कहेगा, “मुझे बीवी का सहारा है।" बीवी कहाँ है? कहाँ है पत्नी? बाहर ही तो है! अहंकार जिन भी चीज़ों पर अपना घर बनाता है, वो सब-की-सब बाहरी हैं।

जब बाहरी को अहंकार ध्वस्त होते देखता है, तो स्वयं भी ध्वस्त हो जाता है। ये स्मरण है। इस स्मरण में स्मरण ‘करना' नहीं पड़ रहा। स्मरण क्या करना है? इधर देखा, यहाँ मौत नाच रही है; उधर देखा, वहाँ मौत नाच रही है; कहीं और देखा, वहाँ मौत नाच रही है। स्मरण क्या करना है? वो तो नाच ही रही है। तुम भूल कैसे सकते हो, ये बताओ!

अब स्मरण नहीं करना पड़ेगा। अब अगर तुम कुछ करना ही चाहते हो, उतारू हो करने पर, तो तुम्हें विस्मरण करना पड़ेगा; वो भी ज़बरदस्ती। जो ज़बरदस्ती विस्मरण करने पर उतारू हो, उसको कहते हैं – भँगेड़ी। विस्मरण करना माने 'भुलाना'। और भाँग तुम लेते ही इसीलिए हो क्योंकि तुम्हें विस्मृति चाहिए, तुम भुलाना चाहते हो। किसको भुलाना चाहते हो? तुम और किसी को नहीं भुलाना चाहते, तुम चारों तरफ़ अपने ये जो मौत का नाच देख रहे हो, इसको ही भुला देना चाहते हो। इसीलिए तुम भाँग लेते हो। इसीलिए तुलसीदास कह रहे हैं, “अरे, मैं भाँग था।"

जो भी कोई राम के साथ नहीं है, उसे भाँग के साथ होना ही पड़ेगा। हो सकता है तुम वो भाँग न लेते हो जो खेतों में होती है। तुम कोई और भाँग लेते होगे। तुम कोई और नशा लेते होगे। पर बिना नशे के जी नहीं पाओगे क्योंकि चारों तरफ़ ये जो मृत्यु का महानृत्य है, ये तुम्हें इतना आतंकित कर देगा कि तुम्हें दुबकना पड़ेगा; तुम जी नहीं पाओगे; साँस नहीं आएगी। इसे भुलाने के लिए कुछ तो नशा करोगे!

हम सब नशे में हैं। सुबह ये जो गाड़ी उठाकर तुम दफ़्तर के लिए निकलते हो, ये और तुम क्या कर रहे हो? ये नशा ही तो कर रहे हो। ये जो तुम आते ही टी.वी. में अपना मुँह, आँखे, पूरा सर्वस्व दे डालते हो, ये तुम और क्या कर रहे हो? ये जो तुमने अपने जीवन में उद्देश्य पाल रखे हैं, ये तुम और क्या करते हो? “बड़ी बिल्डिंग बनानी है। बच्चे को बड़ा करना है। बेटी का विवाह करना है।” अरे, कोई भी हो सकता है उद्देश्य: "पत्नी का विवाह करना है।" तुम्हारा क्या भरोसा? सवाल ये है ही नहीं कि कैसा उद्देश्य है; हर उद्देश्य पागलपन है! किसी एक उद्देश्य पर मत हँसो, हर उद्देश्य भाँग है। वो इसीलिए है ताकि तुम्हें ये लग सके कि कहीं तो सुरक्षा है इस संसार में।

सुमिरन का मतलब है कि देख लिया, कहीं सुरक्षा नहीं है। संत इसीलिए बार-बार बोलते हैं, “मौत को याद रख।" मौत को याद रख ऐसे नहीं कि आज से दो साल पहले बगल की बिल्ली मर गयी थी, उसको याद रख। मौत को याद रख माने: मौत सामने है, याद भी नहीं रखना है, देखना है, होश रखना है।

बात आ रही है समझ में?

राम नाम कल्पतरु है और कल्याण का निवास है। और राम नाम का स्मरण करने से घास बन गयी तुलसीदास।

कल्पतरु कैसे है? अब ये बड़ी मज़ेदार बात है। राम का नाम कल्पतरु कैसे है? समस्त इच्छाओं की पूर्ति करने वाला कैसे है? कहिए, कैसे है?

प्र: क्योंकि सुख और शांति उन्हीं से मिलनी है।

आचार्य: बढ़िया, बहुत अच्छे!

तुम्हारी जो सबसे बड़ी इच्छा है, वो सिर्फ़ एक है: अपनी खाल (शरीर) बचाने की। हम जी ऐसे रहे हैं कि जैसे बत्तीस दाँतों के बीच में जीभ! हम अपने-आपको बड़ा गौरवमण्डित करते हैं जब हम कहते हैं कि हमें राम चाहिए। हमें राम नहीं चाहिए, हमें किसी तरीक़े से जान बचानी है अपनी। तो और क्या है? आप बताइए न, इतना दुर्बल आपका अस्तित्व है! अभी चल रहा है जून का माह, पैंतालीस तो आमतौर पर ही हो रहा है तापमान, और पचपन होने लग जाए अगर लगातार, तो आप बचोगे? पैंतालीस में भी अगर चार दिन धूप में रोज़ चार-चार घंटे खड़ा होना पड़ जाए, आप बचोगे?

प्र: नहीं।

आचार्य: इतने दुर्बल हो आप। और इस दुर्बलता के साथ, इस क्षीणता के साथ आप कौन-सा भरोसा, कौन-सी ठसक लेकर जीओगे? आप कितने निर्भर हो, आपको पता है? आप तो अन्न के लिए भी संसार पर निर्भर हो। कभी सोचा है, धरती अगर गेहूँ उगाना बंद कर दे तो क्या होगा? बारिश आपसे पूछ कर होती है? आपके आदेश पर होती है?

प्र: नहीं।

आचार्य: बारिश न हो तो? और बारिश ने कोई ठेका ले रखा है आपके जीवन की अपूर्तियाँ वहन करने का? रगों में, शिराओं में ये ख़ून बहना बंद कर दे तो?

हम इतने दुर्बल हैं! तापमान ज़रा बदल जाए, हम बचेंगे नहीं। ये जो हवा का दबाव है, ये ज़रा बदल जाए, हम बचेंगे नहीं। आज कहीं से एक बड़ा शिलाखण्ड आकर के इस पृथ्वी से टकरा जाए, हम बचेंगे नहीं। कहीं दूर किसी ग्रह से कोई अनजाना बैक्टीरिया या वायरस आकर के आपके वायुमंडल में प्रवेश कर जाए, आप बचेंगे नहीं। हज़ार शर्तें पूरी करनी होती हैं तब आप बचते हो। और उन हज़ार शर्तों से ऊपर लाख शर्तें जब पूरी होती हैं तब एक बच्चे का गर्भ से जन्म होता है। मानव शिशु जितना दुर्बल पैदा होता है, उतना किसी जानवर का नहीं। आदमी का बच्चा अकेला होता है जिसे सालों तक परवरिश चाहिए। उसे छोड़ दो, वो मर जाएगा। जानवरों के बच्चे देखे हैं? तीसरे दिन खड़े हो जाते हैं और भागने लग जाते हैं।

(एक श्रोता को संबोधित करते हुए) तुम्हारे पास ख़रगोशों के बच्चे हैं, वो एक-दो महीने के हैं, तुम एक-दो महीने की थीं तो कैसी थीं? वो भागते हैं इधर-उधर, घास खाते हैं। उनके ऊपर तो अगर बिल्ली आक्रमण करेगी तो वो फिर भी थोड़ी दूर तो भागेंगे; तुम दो महीने की थीं, तुम्हारे ऊपर एक कुत्ते का बच्चा भी आक्रमण कर देता तो वो जीत जाता! इतने दुर्बल हो तुम।

‘कल्पतरु’: कल्पना, इच्छा। तुम्हारी इच्छा है क्या? तुम्हारी इच्छा ये है कि बच जाऊँ, किसी तरह से बच जाऊँ। लगातार यही डर सता रहा है कि - मेरा होगा क्या? घर बनाते हो, दीवारें खड़ी करते हो, क्या बड़े प्रेम में? नहीं, प्रेम में नहीं, हवाओं से बचने के लिए—अच्छा चलो, पड़ोसियों से बचने के लिए, पर किसी से तो बचने के लिए न? दीवार क्या प्रेम में खड़ी करते हो? अध्यात्म में खड़ी करते हो? मंदिर है? दीवार क्यों है? जान बचानी है, “अरे बच जाए।" कपड़े क्यों धारण किए हैं? तुम्हारी खाल से ज़्यादा सुन्दर है कपड़ा? तुम्हारे आसपास के लोग ज़्यादा पसंद करते हैं जब तुम हज़ार तरह से ढक लेते हो अपने-आपको? आवश्यकता क्या है इतना प्रयोजन करने की कि एक पूरी व्यवस्था है, उद्योग-दर-उद्योग हैं जो तुम्हारे लिए कपड़ों का निर्माण कर रहे हैं? ज़रुरत ये है कि तुम्हारी खाल किसी भी जानवर की खाल से कहीं ज्यादा असुरक्षित है। तुम्हारे तो रोएँ, रेशे भी नहीं बचे हैं। एक बंदर भी होता है छोटा-सा, तो वो बारिश झेल ले जाएगा। उसका शरीर ऐसा है कि उसे बचा देगा। तुम्हारे पास तो कुछ नहीं है: बाल भी गए, खाल भी गयी। इतनी मुलायम हो गयी है ये कि कुछ नहीं झेल सकती।

इंसान डर में जी रहा है लगातार। जिसे तुम अपनी प्रगति, तरक़्क़ी कहते हो, वो और कुछ नहीं है, डर से बचने के आयोजन हैं। और कोई आयोजन तुम्हें डर से बचा नहीं पा रहा है।

‘कल्पतरु’, एक ही कल्पना है तुम्हारी: “कोई दिन तो ऐसा आए जिस दिन मैं डरा हुआ न होऊँ। कोई दिन तो ऐसा आए जिस दिन खुल कर साँस ले सकूँ।"

हम सब सकपकाए हुए हैं। हम हक्का-बक्का हैं। हम ऐसे हैं जैसे किसी का गला पकड़ लिया गया हो: ऊपर की साँस ऊपर और नीचे की साँस नीचे। हम खुल कर जी ही नहीं पा रहे हैं। एक ही इच्छा है हमारी: खुल कर जी पाएँ।खुल कर जिसे जीना हो, उसे राम की शरण में जाना होगा। इसलिए तुलसी कह रहे हैं, “राम का नाम कल्पतरु है।"

एक तुलसी ही निर्भय होकर जी सकता है। एक राम भक्त ही डरेगा नहीं। और जो राम का भक्त नहीं है, जिसके जीवन में सत्य नहीं है, उसके जीवन में डर के अलावा कुछ होगा नहीं।

हाँ, हो सकता है उसने डर को बड़े रंगीन नाम दे दिए हों, ख़ूब सजावट कर ली हो। हो सकता है वो डर को कहे, “ये डर थोड़े ही है, ये मेरी नई गाड़ी है।" हो सकता है वो डर को कहे, “नहीं, नहीं, ये तो मेरे रिश्तेदारों की टोली है। नहीं, ये तो मेरे संघियों की फ़ौज है। ये तो समाज में मेरा रुतबा है, मेरी प्रतिष्ठा है।" तुम कुछ कह लो, तुम जो भी कुछ कर रहे हो, तुम डर के मारे कर रहे हो।

राम का नाम ‘कल्पतरु’ इसीलिए है क्योंकि वो तुम्हें डर से निजात दिला देता है। डर तुम्हारा एक ही है: “कहीं मेरा होना 'न होने' में न तब्दील हो जाए। हर तरफ़ से लक्षण यही है कि कोई चाहता नहीं कि मैं बचूँ। हवाएँ चलती हैं, मुझे लगता है मुझे सुखा डालेंगी। बारिश होती है, मुझे लगता है मुझे गला डालेगी। सूरज ऊपर चमकता है, मुझे लगता है अब मैं हुआ भाप, अभी जला। लगातार मैं ‘न होने' के डर से आक्रांत हूँ।"

राम का नाम कल्पतरु इसीलिए है क्योंकि वो तुम्हें डर से मुक्ति दे देता है। मन में या तो डर से मुक्ति की कामना रहेगी; काम रहेगा, या राम रहेंगे। कामवासना भी और क्या है? यही तो है। न होने के डर से मुक्ति चाहते हो, कहते हो, “पुनः गर्भ में प्रवेश मिल जाए। पुनः सुरक्षा का आश्वासन हो जाए। या फिर कोई ऐसा पैदा हो जाए जो मेरी मृत्यु के बाद भी बचेगा।" तुम्हारा छोटा बच्चा और कुछ थोड़े ही है, तुम्हारी असुरक्षा की अभिव्यक्ति है। तुम कहते हो, “मैं मर जाऊँगा, ये मुझसे तीस साल छोटा है, ये मेरे मरने के कम-से-कम तीस साल बाद तक तो रहेगा।"

तुम अपने मन को जानते नहीं। उसकी गहराइयों में जो डर छुपा है, उसको तुम जानते नहीं। तुम कहोगे, “नहीं, बच्चा हमने इसलिए थोड़े ही पैदा किया है। वो तो मैंने और मेरी स्त्री के प्रेम ने पैदा किया है।" नहीं, प्रेम इत्यादि से नहीं आते बच्चे। तुम्हारे जीवन में यदि इतना ही प्रेम होता तो न जाने कहाँ-कहाँ और क्या-क्या फूल खिल रहे होते। घर में बच्चे ही थोड़ी खिल रहे होते! संसार में तो तुम हिंसा की प्रतिमूर्ति हो, और घर में तुम प्रेम के देवता हो जाते हो बच्चा भर पैदा करने के लिए! ये क्या झूठ है? बच्चा जना है तुम्हारी असुरक्षा ने। बच्चा जना है तुम्हारे भीतर के भीमकाय डर ने। डर ही काम है। इसीलिए अध्यात्मिकता को ‘काम से राम की यात्रा’ कहते हैं। वो डर से राम की यात्रा है।

"कल्याण निवासु": वहीं तुम्हारा कल्याण है। अपना अकल्याण तो ख़ूब जानते ही हो न? अकल्याण से तो वाक़िफ़ हो, उसी का तो ख़ौफ़ है। कल्याण कहाँ है, फिर वो भी जान लो। जहाँ कहीं अपना कल्याण आज तक मानते आए हो, बस ये जान लो कि वहाँ नहीं है। इतना काफ़ी होगा। अकल्याण से ग्रस्त होकर कल्याण तुमने ख़ूब खोजा है। जहाँ कहीं खोजा है, वहाँ नहीं है, ये पक्का कर लो। वहाँ नहीं है।

जब डर नहीं रहेगा, तो डर से बचने के लिए जितने नशे करते हो, उसकी भी ज़रुरत नहीं रहेगी।

दोहरा रहा हूँ: भाँग माने नशा। तुलसीदास वो – जिसने नशा छोड़ दिया।

जिन्हें नशा छोड़ना हो, वो राम नाम का नशा कर लें। राम ख़ुमारी से बड़ा नशा दूसरा नहीं।

सूफ़ी इसीलिए कहते हैं: “अल्लाह तू साक़ी है, जाम पिला।"

अल्लाह से बड़ा नशा दूसरा नहीं। राम से बड़ा नशा दूसरा नहीं। छोटे-मोटे नशों में क्या फँसे हो? शराब, सिगरेट, जुआ, मनोरंजन, सट्टा, संसार, परिवार – ये छोटे नशे हैं। तुम बड़ा नशा करो।

जिन्हें छोटे नशे छोड़ने हों, वो बड़ा नशा करें।

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