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ख़ुशी क्या है? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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श्रोता: ख़ुशी क्या है ?

वक्ता: ख़ुशी क्या है? ना जानते होते तुम तो मेरे लिए उत्तर देना आसान होता। पर तय तो तुम सब ने ही कर लिया है कि ख़ुशी क्या है। पहले उसको ही देख लो कि-ख़ुशी क्या है? हिन्दुस्तान का और न्यूज़ीलैंड का मैच चल रहा है, तो न्यूज़ीलैंड की टीम ज़रा सस्ते में आऊट हो गयी। तो हिन्दुस्तान के लिए ये ?

सभी श्रोतागण: ख़ुशी की बात है।

वक्ता: और न्यूज़ीलैंड के लिए ये ?

सभी श्रोतागण: दुःख की बात है।

वक्ता: तुम और तुम्हारी दोस्त दोनों कोशिश कर रहे थे क्लास को टॉप करने की, टॉप तुम कर गयीं, तो तुम्हारे लिए ये ?

सभी श्रोतागण: ख़ुशी की बात है।

वक्ता: और तुम्हारे दोस्त के लिए ये ?

सभी श्रोतागण: दुःख की बात है।

वक्ता: हमारे लिए ख़ुशी सिर्फ वो है जो हमारे अहंकार को बढ़ावा देती है। यही है ख़ुशी। मन को बस वही प्रिय लगता है जो मन की धारणाओं को और पुख्ता करे। तुम्हें हँसी ही उन बातों में आएगी जो तुम्हें और ज्यादा अहंकार में ले जाती हैं। और उन्हीं की तुम तलाश करोगे। इससे तुम ये भी समझ जाओगी कि दुःख क्या है ?

अहंकार पर जब चोट लगती है, उसका नाम है दुःख।

अहंकार जब मज़बूत होता है, उसका नाम है सुःख।

बड़ी साधारण सी बात है। अहंकार पर चोट लगी तो दुःख; अहंकार मज़बूत हुआ तो सुःख। तो सुःख को कीमती मत मान लेना। सुःख तुम्हें और पतन में गिराता है। जो साधारण सुःख है, मैं उसी की बात कर रहा हूँ। जितना तुम्हें सुःख मिलेगा और जितना तुम सुःख के पीछे भागोगे, उतना ही ज्यादा अपने लिए इंतज़ाम कर रहे हो नर्क का| वो नर्क मरने के बाद वाला नर्क नहीं है, वो अभी का नर्क है, इसी क्षण का। एक चीज़ और समझना। तुम अभी यहाँ बैठी हो, मान लो तुम्हारी सैंडल बहुत टाइट है और दिन भर उसको पहन करके घूम रहे हैं, छाला भी आ गया। वापिस जा कर जब तुम उस सैंडल को उतारोगी, तो कैसा महसूस होगा? सुःख।

वो सुःख तुम्हें सिर्फ इसलिए अनुभव हुआ क्योंकि दिन भर तुम्हें पहले से दुःख अनुभव करना पड़ा। तो सुख की ये एक बड़ी मज़ेदार खूबी है कि वो तुम्हें उतना ही मिलता है, जितना तुम दुःख भोगते हो। मैंने कहा- जो लोग सुःख के पीछे भागते हैं वो नर्क का इंतज़ाम कर लेते हैं, इसी कारण। क्योंकि सुःख तुम्हें उतना ही मिलेगा जितना तुमने दुःख भोगा है। अतः यदि तुम्हें ज्यादा सुःख चाहिए तो ज्यादा दुःख इकट्ठा करो।

परीक्षा का परिणाम लगता है। दो लोग जा रहे हैं परिणाम देखने। एक को बड़ा गहरा तनाव है, बड़े दुःख में है। उसको नहीं पता कि वो पास होगा कि नहीं, और दूसरा सहज है। दोनों जातें हैं और दोनों देखतें हैं कि पास हो गए। ज्यादा सुःख किसको मिलेगा? जो जितने तनाव में था कि पता नहीं फेल हो जायेंगें या नहीं। वो जैसे ही देखेगा कि मैं पास हो गया, नाचना शुरू कर देगा। सुःख मिलने के लिए पहले दुःखी होना बड़ा ज़रूरी है। और जो दुःखी ही नहीं है, उसे सुःख की कोई तलाश भी नहीं। बात समझ में आ रही है? यही है सुःख का नर्क, कि क्योंकि तुम्हें सुःख चाहिए इस कारण तुम अपने लिए पहले दुःख तैयार करोगे।

एक तीसरी चीज़ भी होती है- जो ना सुःख है, ना दुःख है। उसको कई नाम दिए जा सकतें हैं। कोई मौज कह सकता है, कोई मस्ती कह सकता है, कोई आनंद कह सकता है। और ये तीनों ही नहीं हैं; ये सुःख, किसी दुःख पर निर्भर नहीं करते। मस्ती इस पर निर्भर नहीं करती कि तुम पहले दुःखी हो तब मिलेगी। ये कुछ पाने से नहीं मिलते हैं। इनसे अहंकार और मज़बूत नहीं होता है। ये कुछ दूसरी ही चीज़ हैं। ये ‘मैं’ और ‘मेरा’ पर नहीं पनपते हैं। इनके कोई कारण नहीं होते हैं। अगर तुम पाओ कि मौज का कोई कारण मिल रहा है, तो तुम पाओ कि वो मौज नहीं, वो सुःख है।

मस्ती का अर्थ है,समझना ध्यान से, मस्ती का अर्थ है- निष्प्रयोजन मुस्कान।

कोई वजह नहीं है तब भी मुस्कुरा रहे हैं। कोई कारण नहीं रहता लेकिन फिर भी मूड़ अच्छा अच्छा सा रहता है। किसी ने हमें कुछ दे नहीं दिया, फिर भी मन में बड़ा अनुग्रह है। ग्रेटीटयूड की भावना है, पता नहीं किसको मन करता रहता है धन्यवाद देने का- कि तूने इतना कुछ दे दिया। ये आनंद है, ये मौज है, ये मस्ती है- कि इतना मिला है कि बाँट दो सब में। और ये प्रेम है कि – बाँटते चलो।

ठीक है?

सभी श्रोतागण: हाँ।

वक्ता: कि आनंद, मस्ती, मौज। सुःख नहीं, बड़ी ओछी चीज़ है सुःख।

-‘संवाद ‘ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

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