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शरीर मेरे लिए है, मैं शरीर के लिए नहीं || आचार्य प्रशांत (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
21 मिनट
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आचार्य प्रशांत: मेरा उद्देश्य आत्मा है, ठीक है? आत्मा मेरा लक्ष्य, आत्मा मेरा अभिप्राय, आत्मा मेरा प्रेम। अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मुझे जो भी कुछ उपलब्ध है वो साधन है बस। तो शरीर क्या है? साधन है। जिस सीमा तक शरीर मेरे प्रेम में सहायक होता है उस सीमा तक शरीर को भी सम्मान भी मिलेगा, ध्यान भी मिलेगा लेकिन साधन की तरह ही मिलेगा, साध्य की तरह नहीं मिल जाएगा। और जिस दिन वो साधन की जगह साध्य बनने लग गया और मुझे मेरा कर्तव्य बताने लग गया उस दिन उसको कहूँगा, ‘हट परे हट।’ मैं बताऊँगा न गाड़ी को कहाँ जाना है! जिस दिन मैं बैठूँ गाड़ी में और गाड़ी मुझे बताने लग जाए कहाँ जाना है मैं कहूँगा, ज़रा सा एक मिनट, ब्रेक लगाने दो, नीचे उतरूँगा और गाड़ी में आग लगा दूँगा का इशारा करते हुए।

गाड़ी अच्छी चीज़ है, उसी दिन तक जिस दिन तक गाड़ी को मैं चला रहा हूँ। मैं गाड़ी का ख़्याल भी रखूँगा, सर्विसिंग भी करवाऊँगा, पॉलिश कराऊँगा, उसमें ईंधन डालूँगा और जो भी चीज़े हैं सब करूँगा उसकी, गाड़ी की। गाड़ी बहुत अच्छी चीज़ है पर गाड़ी अगर ऐसी हो गयी कि गाड़ी मेरे बिस्तर पर पार्क्ड (खड़ा करना) है और मैं गैराज में पार्क्ड हूँ और सुबह-सुबह गाड़ी मुझे बता रही है कि आओ चलो, बैठो, तुम्हें इस जगह छोड़ेंगे।

मैं पूछ रहा हूँ, ‘कहाँ? देवी बता दीजिए’ तो गाड़ी कह रही है, ‘गुस्ताख़ मुँह बहुत चलाता है! जिधर को हम बताएँ बस उधर को चलो।’ और ले जा रही है, ले जा रही है, अचानक मूड स्विंग हो गया! देह का तो यही है, मूड स्विंग , अचानक रस्ते में गाड़ी का मूड स्विंग हो गया और ऐसे घूम गयी और वो भी कहीं और ले जा रही है तो ऐसी गाड़ी से तो फिर पैदल चलना भला। मतलब समझ रहे हैं? देह का महत्व बस उस सीमा तक है जिस सीमा तक देह आपको आपकी मंज़िल की ओर ले जा रही है।

अपनेआप में देह कुछ नहीं है, अपनेआप में देह मिट्टी है, अपनेआप में देह की क्या अहमियत है, बताइये ज़रा? साथ ही साथ हम ये भी कह रहे हैं अगर आपको अपने लक्ष्य तक, अपने गन्तव्य, अपनी मंज़िल, अपने प्रेम तक जाने के लिए किसी साधन की ज़रूरत हो और आप उसका ख़्याल न रखे तो भी आप अपराधी हो गये।

मुझे सुबह-सुबह कहीं जाना है और मैंने गाड़ी में न तो हवा देखी, न कूलेंट देखा, न उसमें तेल देखा, कुछ नहीं देखा गाड़ी का, बस मैं कह रहा हूँ, ‘मैं तो जाऊँगा, जाऊँगा’ तो गाड़ी थोड़ी देर में क्या करेगी? तो अपराधी हो गया न मैं? अपराधी इसलिए नहीं हो गया कि गाड़ी ख़राब हो गयी, अपराधी इसलिए नहीं कि बेचारी गाड़ी ख़राब हो गयी। अपराधी इसलिए हो गया कि अब मंज़िल नहीं मिलेगी तो ये कोई संतुलन की बात नहीं है कि थोड़ा सा देह को देखो और थोड़ा सा अध्यात्म को देखो। ये कोई बैलेंसिंग एक्ट नहीं है। देह को कितना देखना है ये आपका अध्यात्म तय करेगा।

गाड़ी पर कितना ध्यान देना है, ये गाड़ी की आवश्यकता से तय होगा न? एक समय ऐसा भी आ सकता है कि मैं गाड़ी की क़ुर्बानी देने को भी तैयार हो जाऊँ क्योंकि गाड़ी की क़ुर्बानी देकर ही मंज़िल मिल सकती है।

मुझे कुछ पाना है और मेरे पास गाड़ी ही है, जो मुझे पाना है उसके लिए मेरे पास पैसे नहीं तो मैं क्या करूँ? ‘गाड़ी बेच दो।’ अभी रामधारी सिंह दिनकर कर्ण का और ईसा का और सरमद का और मंसूर का और गाँधी का, सुकरात का उदाहरण दे रहे थे। इन्होनें क्या किया? इन्होनें गाड़ी बेच दी। बोले, ‘और अब कोई तरीक़ा नहीं बचा, यही आख़िरी चीज़ बची है और इसको बेचे बिना जो चीज़ चाहिए उसका मोल नहीं दे पाएँगे।’ उन्हें कोई जिद नहीं थी आत्महत्या की, पर करें तो करें क्या?

जो चाहिए वो चाहिए ही है और जो चाहिए वो बिना क़ीमत दिए मिलता नहीं और मेरे पास अब एक ही चीज़ बची है ये गाड़ी, ये देह, ये आख़िरी चीज़ बची है तो क्या करूँगा? गाड़ी बेच दी। गाड़ी बेच दी, इसका ये नहीं मतलब है कि बिना मतलब गाड़ी बेचते फिर रहे हो तो समझने की, विवेक की बात है। गाड़ी जब तक साथ दे, दे, दे बहुत अच्छी बात है लेकिन अन्त में गाड़ी ही कहीं बाधा न बन जाये।

मैंने फ़िल्म देखी थी, अब कौनसी थी याद नहीं— उसमें नसीरुद्दीन शाह का किरदार था तो उसके पास ट्रक होता है और लोग होते हैं ग़लत क़िस्म के, उन्होंने कहीं छुपी हुए जगह पर बारूद का बड़ा एक ढेर बना रखा होता है और उस बारूद के ढेर से वो जगह-जगह अपना हिंसक काम करना चाहते हैं तो ऐसे लोगों को तलाशते हुए उनका पीछा करते हुए ये जो चरित्र है ये उनकी गुप्त जगह तक पहुँच जाता है, जहाँ आगे वो उनका छुपा हुआ गोदाम है जिसमें बारूद है बहुत सारा।

अब ये वहाँ पहुँच तो जाता है पर वो सारे-के-सारे उस पर टूट पड़ते हैं। इस व्यक्ति के पास फोन वगैरह कुछ नहीं है। ये अकेले ही आ गया था खोज़ते हुए, कोई तरीक़ा नहीं है कि ये बाक़ी दुनिया को सूचित कर दे कि यहाँ पर है, जीपीएस जैसी कोई सुविधा नहीं है कि यहाँ पर बारूद का गोदाम है, मैंने आपको बता दिया।

सिर्फ़ यही व्यक्ति है जो जानता है कि सामने बारूद है, इसे ये भी पता है कि इस बारूद का अब तुरन्त ही इस्तेमाल होने वाला है जगह-जगह पर, न जाने कितने लोगों को मारने में। वो ये भी जनता है कि उसने अब एक मिनट की भी देर की तो ये अकेला आदमी है ट्रक चला रहा है ये बाक़ी सब लोग आ करके क्या करेंगे? इसको या तो मार देंगे या इसपर चढ़ बैठेंगे, इसका ट्रक छीन लेंगे ये सब कर ही देंगे, ये अच्छे से जानता है तो उसके पास फिर एक ही उपाय बचता है। क्या उपाय बचता है? जो ट्रक उसकी यात्रा में इतना सहायक हुआ था कि उसको वहाँ तक ले आया वो अन्ततः उसी ट्रक को लेकर जाता है और गोदाम में घुस जाता है। नहीं तो फिर ट्रक का उपयोग क्या हुआ?

आप कहो ट्रक बहुत अच्छी चीज़ थी, वो आपको गोदाम के सामने तक ले आया तो उससे क्या मिल गया? अब जब यहाँ तक ले आये हो तो आख़िरी क़ीमत भी चुका ही देते हैं। कोई और तरीक़ा नहीं है न! तो ये बात थोड़ी सूक्ष्म है, समझिएगा, न तो हम ये कह रहे हैं कि ट्रक को लात मार दो, न हम ये कह रहे हैं कि अभी यात्रा शुरू भी नहीं हुई और ट्रक में आग लगा दी, क्यों? क्योंकि वो फ़िल्म थी उसमें उसने ट्रक में आख़िरकार आग लगा दी थी न।

न हम ये कह रहे हैं कि ख़रीद कर लाये बारूद, ट्रक में डाला और आग लगा दी। देखो, उसका ट्रक भी बारूद से जला था, हमने भी जला दिया। अरे भाई, पूरा इस्तेमाल करना है इस गाड़ी का लेकिन एक वो बिन्दु जरूर आता है जब जीवन आपसे यक्ष प्रश्न करता है, कहता है, ‘या तो इसको बचा लो या प्रेम पा लो।‘ उस समय पर जानने वालों ने हमसे कहा है, ‘ग़लत फ़ैसला मत कर देना।’ ये बचाने की चीज़ नहीं है, वो ट्रक को बचा भी लेता तो क्या हो जाता? ट्रक तो वो सब छीन ही लेते, वो अपनी जान भी बचा लेता तो क्या होता उसे छोड़ने वाले थे क्या? वो जाकर उस बारूद में नहीं घुसता तो भी क्या होता? पकड़कर क्या करते उसको? छोड़ देते वो? मार ही देते। उसने कहा अब तो ट्रक भी उड़ेगा और मैं भी उड़ूँगा, जब मुझको और ट्रक दोनों को उड़ना ही है तो जैसे उड़ना चाहिए वैसे उड़ा देतें हैं। वो लेकर सीधे घुस ही गया अन्दर।

मेरे ख़्याल से पैंसठ के युद्ध से है, कोई देखिएगा। तो पैंसठ के युद्ध में, पाकिस्तान के जो विमान थे वो बहुत बेहतर थे भारतीय विमानों से। वो अमेरिकी मदद से मिले हुए थे उनके तो वो कोई कोई तुलना ही नहीं थी जो भारतीय विमान थे और जो वो थे, भारतीय नैट्स थे वो हल्के छोटे विमान थे सिंगल सीटर मेरे ख़्याल से। उनके शायद, स्टार फाइटर्स इस नाम से थे। तो वो एक विमान था वो उनका मिशन था भेजा गया था कि और भारतीय वायुसेना उसमें शुरू में थोड़ा हल्की पड़ रही थी। अगर आप पैंसठ का युद्ध देखेंगे तो उसमें ये सब है कि जो नम्बर ऑफ़ किल्स होती है, किसके कितने विमान गिरे तो आइएएफ के भी बहुत विमान गिरे थे उसमें।

इकहत्तर में बात पलट गयी थी पर पैंसठ में तस्वीर थोड़ी अलग थी तो ये वहाँ जा रहे हैं उनको पता है कि हमारी जो-जो-जो टेक्नोलॉजी है वो उतनी बढ़िया नहीं है। पाकिस्तान को अमेरिकी टेक्नोलॉजी है तो एक पायलट ने अपना प्लेन ही सीधे उस रिफाइनरी में ही डाल दिया बोले, ‘ बॉम्बिंग नहीं हो पा रही है।’

बॉम्बिंग का मिशन था कि वहाँ से ही जो ईंधन की सप्लाई थी पूरी सेना को वो रोकनी थी या क्या था देख लीजिएगा, हो सकता है मेरे फैक्ट्स ऊपर नीचे हो रहे हो तो मिशन तो ये था कि उसको उड़ा दो। बोले, कैसे उड़ा दे वो पाकिस्तानियों को भी पता था तो उन्होंने अपने एयर डिफेन्स एकदम टाइट कर रखी थी। और उस क्षेत्र में एयर सुपिरियॉरिटी उनके अपने फाइटर्स वहाँ। बोले, ‘अब समय ही नहीं है इनसे कौन लड़ेगा! क्या करेगा!’ उसने ले जाकर अपना सीधे उसी में डाल दिया बोले, ‘लो! यही तरीक़ा है।‘ कोई नहीं कह रहा है कि यही करना शुरू कर दो कि हवाई अड्डे से अपना विमान ले के उड़े और कहीं भी ले जा के खेत-वेत में गिरा दिया कि अन्ततः शरीर का मूल्य ही क्या है।

ये नहीं कहा जा रहा पर कहा जा रहा है कि एक ऐसा आख़िरी इम्तिहान आता है, आख़िरी कहा जा रहा है, ये नहीं कह रहा कि रोज़ यही करो कि शरीर को जहाँ मिला वहीं जाकर डाल दिया और कहा देखा, हमें कौनसा भाव है जाके किसी भी गटर में गिर जाते हैं तो ये समझ रहे हो बात को उससे पहले क्या करा जाता है?

उससे पहले तो खूब चमकाकर रखा जाता है न गाड़ी को, तो गाड़ी को चमकाइए, चमकाइए खूब चमकाइए, खूब चमकाइए। काहे के लिए? इस्तेमाल करने के लिए। इस्तेमाल करना है न सही काम में इसलिए चमका रहे हैं। खूब ख़्याल रख रहे हैं शरीर का, किसलिए? क्योंकि इससे रगड़ कर मेहनत करवानी है, भाई!

शरीर तो तगड़ा होना ही चाहिए, नहीं तो मेहनत कैसे करेगा? खूब मेहनत करनी है। शरीर इसलिए नहीं तगड़ा बना रहे हैं कि आकर्षक हो जाएगा तो लड़के-लड़कियाँ खींच आएँगे या आकर्षक हो जाएगा तो कपड़े बढ़िया पहनेंगे या कोई और बात या खाना बढ़िया पचेगा। नींद अच्छी आती है जब शरीर बढ़िया रहता है ये सबकुछ नहीं है। शरीर वैसे ही चमका रहे हैं जैसे गाड़ी का ख़्याल रखा जाता है।

गाड़ी बढ़िया रहेगी तो अच्छी, चलने की बात नहीं है, मंज़िल तक जाना है गाड़ी बढ़िया रखनी पड़ेगी। आप कभी जाइए वहाँ पर वायुसेना के विमान देखिए कैसे रहते हैं एकदम चमकते हुए, उनके टायर्स देखिए कैसे रहते हैं जैसे एकदम नये हो। मिलिट्री के ट्रकों के भी आप टायर देखिए कैसे रहते हैं एकदम क्योंकि उनसे अब जमकर के काम करवाना है न, इसी तरह इससे जमकर काम कराना है तो इसलिए इसको खूब मरम्मत इसको दे के रखो, वर्ज़िश करके रखो। मजबूत नहीं रहेगा तो काम कैसे करेगा!

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, जैसे जो अवलोकन की बात आप करते हैं ये बात तो बहुत स्पष्ट समझ में आयी है कि झूठ है। पिछले सत्र में भी आपने बताया था पहले प्रश्न के उत्तर में कि बहुत उदाहरण दिये थे कि कैसे इन सबको झूठ जाना जाये और वो साफ़ नज़र आता है। पर सर, बात यहाँ फँसती है मेरे लिए कि हम जीव हैं तो हमें लगता है कि जो जीवन है उससे ज़्यादा महत्वपूर्ण कुछ नहीं है। जीवित रहना, जीवित होना और जीवन ऐसा लगता है जैसे कि शरीर और मन, इस जीवन और वो हमें प्रकृति से ही मिल रहा है। तो सर, ये जो परायापन देखने वाली बात होती है ये इसका तो जैसे एक झलक भी आज तक मुझे दिखा नहीं है।

परायापन तो दिख ही नहीं पाता है और अन्त में अगर परायापन नहीं देख पा रहे हैं तो फिर अवलोकन आप जानते हैं कुछ परिणाम नहीं। तो यहाँ पर बात फँस रही है मतलब मुक्ति या सुन्दर जीवन भी जीवन के बाद ही प्रतीत होता है तो जीवन की परिभाषा क्या ग़लत समझ ली है?

आचार्य: देह होने से देह नहीं हो जाती, देह के साथ जुड़ने से देह होती है आपके लिए। देह के साथ जुड़ने से। जब देह से ही जुड़े रहो, देह के ही आदेश लेते रहो तब देह होती है। देह आपके पीछे चल रही है, आपके आदेश ले रही है तो उसको देहभाव नहीं कहते। अभी आप बैठी हुई हैं, आपकी देह है। क्या आपको अपनी टाँगों को, घुटनों का, अंगूठों का कुछ ख़्याल है? नहीं है।

आपकी आँखें हैं और कान हैं जो इस वक़्त सक्रिय हैं— आँखें— स्क्रीन की ओर देख रही हैं और कानों में कुछ लगा हुआ है आप सुन रही हैं, आपने कानों को अनुमति क्यों नहीं दे दी है? आप उतार दीजिए कानों से, बोलिए, ‘जो सुनना हो सुनो।’ आँखों को आपने क्यों नहीं छूट दे दी है? ‘जहाँ जाना है जाओ।’ आँखें, आपके पीछे- पीछे चल रही है न?

मान लीजिए, अभी आप ध्यान पूरी तरह छोड़ दें। अभी आपका मुझ पर कुछ ध्यान है, मान लीजिए वो ध्यान पूरी तरह भंग हो जाये ये आँखें क्या तब भी स्क्रीन को ही देखती रहेगी? तो आप हटी तो आँखें हट गयी न। तो माने अभी भी स्क्रीन पर आँखें इसलिए है क्योंकि स्क्रीन पर पहले आप हैं। आप पहले है, आँख पीछे है, आप हट जाये तो आँख भी स्क्रीन पर नहीं लगेगी। इसी तरीक़े से कुछ आवाज़ें और भी होंगी आपने शायद उन्हीं आवाज़ों को हटाने के लिए कान पर लगाया है।

मान लीजिए वो आवाज़ें नहीं भी हों, ये नहीं भी लगाओ तो भी अभी अगर दूसरी आवाज़ें आ जाये तो भी आपके कान नहीं सुनना चाहेंगे। लेकिन अगर आप हट जाएँ तो कान दूसरी आवाज़ों से भी आकर्षित हो जाएँगे। देहभाव का अर्थ ये नहीं होता है कि देह है। देहभाव का अर्थ होता है, देह मालिक है। देह के होने भर से देहभाव नहीं आ जाता जिस क्षण आप मालिक हो गये उसी क्षण को कहते हैं—देह को पराया जान लेना।

‘आप मालिक हो गये’ से आशय है आपने आत्मा को अपना मालिक बना लिया। देह को घोषित कर दिया तुम परायी, आत्मा मेरी, आपने कह दिया, ‘आत्मा मेरी, तुम परायी तो आत्मा के हिसाब से बेटा अब तुमको चलना पड़ेगा’ आपने देह को बोल दिया यही देह का परायापन है। देह के परायेपन से अगर आपको उम्मीद है कि एक दिन ऐसा आएगा कि हाथ पता ही नहीं चलेंगे या हाथ उतने ही पराये लगेंगे जितने ये मेज़ तो ऐसा तो कभी भी नहीं होने वाला। समझ रहे हैं?

फिर से समझिए, देहभाव का अर्थ है कि देह मालिक है। वो देहभाव होता है। देह अगर मालिक नहीं है तो देह से मुक्त हैं आप। जीवन-मुक्ति का ये अर्थ थोड़े ही होता है कि अब जीवन ही नहीं रहा। जीवन-मुक्ति का क्या ये अर्थ है, ‘अब जीवन ही नहीं रहा मर गये?’ जीवन मुक्ति का अर्थ होता है जीवन है पर जीवन हम पर राज नहीं कर रहा, जीवन हमें नचा नहीं रहा।

एक वो पोस्टर , आप लोग लेकर— खेल तो चलता ही रहेगा, सवाल ये है कि तुम जीवन से खेल रहे हो या जीवन तुमसे खेल रहा है, उसको ऐसे ही पढ़ लीजिए कि सवाल ये है कि तुम जीवन के मालिक हो या जीवन तुम्हारा मालिक है? जब आप जीवन के मालिक हो गये तो वो जीवन मुक्ति है। जीवन समाप्त नहीं हो गया है लेकिन जीवन अब आप पर चढ़ा नहीं बैठा, इसी को जीवन मुक्ति बोलते है।

जीवन तो है पर जीवन हम पर चढ़ा नहीं बैठा है तो आप अगर अभी शरीर को आज्ञा देकर स्क्रीन के सामने ले आ पायी है तो यही शरीर से परायापन है। आप माने चेतना, चेतना ने जाना और शरीर ने अनुकरण किया यही शरीर से परायापन है और शरीर के आदेशों की चेतना अनुयायी हो गयी ये शरीर धर्म है या देह धर्म है या देहभाव है, स्पष्ट हो रहा है ये?

प्र: जी, वो कुछ मेटाफिजिकल कॉन्सेप्ट (पराभौतिक अवधारणा) लगाने लग गयी थी मैं, यही ग़लती कर रही थी।

आचार्य: मुक्ति बहुत, देखिए, पूरे अध्यात्म से न मेटाफिजिक्स एकदम हटा देनी चाहिए। सारी गड़बड़ी इस मेटाफिजिक्स ने ही करी है। इसके कारण जो फिजिक्स है हम उसको भूल गये हैं। अब मेटाफिजिक्स में न कोई साक्ष्य होते हैं, न प्रमाण होते कुछ भी, ऐसी मेटाफिजिकल है मामला उसका तो कुछ हो नहीं सकता। एकदम दिमाग़ से निकाल देनी चाहिए।

अपनी अगर हम भलाई चाहते हो तो जो कुछ भी अदृश्य, अज्ञात, पराभौतिक, वगैरह-वगैरह है वो सब हटा देना चाहिए। ज़िन्दगी सीधी, स्पष्ट, प्रत्यक्ष, भौतिक, टेंजिबल (ठोस) सिर्फ़ इसकी बात करनी है क्योंकि मुझे सबका तो आपका पता नहीं मेरी ज़िन्दगी तो ऐसी ही है। मैं तो इन्हीं में जीता हूँ, भाई और मेरा जो पूरा सरोकार है, वो किसी स्वर्ग-नर्क से नहीं है और न ही किन्हीं इधर-उधर घूमती दिव्य आत्माओं से है। मेरा सारा सरोकार तो आप लोग जो हाड़-माँस के जीव हैं आपसे है, आपकी भलाई के लिए काम कर रहा हूँ। मैं भी हाड़-माँस का, आप भी हाड़-माँस की तो यहाँ मेटाफिजिकल कौन है, भाई?

ये बैठा इधर (स्वयं की ओर संकेत) ये भी कौन है फिजिकल और वो जो उधर स्क्रीन में बैठी हैं (प्रश्नकर्ता की ओर संकेत) वो भी कौन है फिजिकल तो ये मेटाफिजिकल कौन घूम रहा है यहाँ पर और इस मेटा फिजिकल ने धर्म की बड़ी दुर्दशा करी है। ये मेटाफिजिकल माने ही होता है इधर-उधर उड़ती जीवात्मा।

ये मेटाफिजिकल ही होता है कि ये होगा, फिर पुनर्जन्म होगा, फिर वहाँ पर हूरें घूम रही हैं। ये सब मेटाफिजिक्स और क्या है ये? लेना एक न देना दो, बेकार का ख़्याली पुलाव, कल्पना की कसरत, कुछ नहीं। हम, एक बात बताइए, यहाँ सारी बातचीत इसलिए कर रहे हैं कि उधर किसी और मेटाफिजिकल वर्ल्ड में कहीं कोई गड़बड़ चल रही है? ये सारी बातचीत हम कर रहे हैं क्योंकि हम, हमारा ये फिजिकल वर्ल्ड , हमारे फिजिकल सरोकार इसमें कुछ ऊँच-नीच है न, तो धर्म का या अध्यात्म का मतलब ही होना चाहिए हम जो हाड़-माँस के पुतले हैं हमारी भलाई से। बाक़ी इधर-उधर की बातें सब बेकार की, एकदम बन्द करें और धर्म कौनसा कितना सफल है या आप सचमुच धार्मिक हैं कि नहीं ये भी बस इसी बात से जाँचा जाना चाहिए कि आपका जो आज भौतिक, मटेरियल , टेन्जिबल (मूर्त) जीवन है, उसमें कितना आनन्द है और सन्तोष है और प्रेम है, और नहीं कोई तरीक़ा है।

आपने पुण्य कितने किलो इकट्ठा कर लिये मुझे क्या पता कितना इकट्ठा कर लिया, क्या होगा, क्या होगा? धर्म का उद्देश्य ये नहीं है कि उधर कहीं दूर किसी पारलौकिक जगत में कोई ईश्वर बैठा है और हमें उसको प्रसन्न करना है और बार-बार हम उसकी तारीफ़ें कर रहे हैं, ‘वाह, तुम सा तो कोई है नहीं, क्या बात है! क्या बात है!’

‘भाई, मुझे कोई लेना-देना नहीं मैं अभी ज़िन्दा हूँ। और मैं अभी तकलीफ़ में हूँ जो मेरी अभी तकलीफ़ हटा दे वो ही मेरे लिए धर्म है।’ ये ठीक है कि इसमें कोई आपत्ति? ‘क्यों मैं बात करूँ कि मरने के बाद क्या होता? मुझे क्या पता मरने के बाद का? मुझे लेना-देना भी नहीं होता होगा कुछ, अभी मैं ज़िन्दा हूँ पहले ज़िन्दगी की बात कर लें।’ ये तो मौत वाला धर्म होता है इसने हमें ही मुर्दा कर दिया।

वो सारे समय बात ही चल ही होती है मौत, डेथ फिर ये, फिर वो और वो बहुत सस्ती बात होती है क्योंकि कोई आ कर के उसको फ़ॉल्सिफ़ाई तो कर ही नहीं सकता न। मरकर के कौन वापस आएगा बताने कि ये जो बाबा जी इन्हें पूरा झूठ बोला था। ‘इन्होंने पूरी किताब लिख दी कि मौत के बाद क्या होता है वैसा कुछ हुआ नहीं, मैं आ रहा हूँ, लौटकर आया हूँ बताने के लिए।’

ऐसा होगा कभी? तो सबसे जो सुरक्षित सेफ़ तरीक़ा है बकर मचाने का वो यही है कि मौत के बाद क्या है वो सब लिख डालो और कुछ भी बोल तो कौन आएगा, कैसे प्रमाणित करोगे कि वो सब ग़लत है? कोई है तरीक़ा? होगा भी तरीक़ा तो हमें उससे कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि मेरे सिर में दर्द अभी हो रहा है। अभी ज़िन्दा हूँ मेरी ज़िन्दगी का इलाज कर दो, मौत वगैरह जब की बात तब देखी जाएगी। ये धर्म है।

मौत और स्वर्ग और अगला जन्म और पिछला जन्म ये नहीं धर्म है। ज़िन्दा लोगों की ज़िन्दगी आज बेहतर करने का नाम धर्म है। किसी ईश्वर को खुश करने का नाम धर्म नहीं है, स्वयं आनन्द में जाने का नाम धर्म है।

धर्म के केन्द्र में, कोई पारलौकिक सत्ता नहीं बैठी है। धर्म के केन्द्र में ये (शरीर) हाड़-माँस का जीव बैठा है। धर्म मेरे लिये है, मेरे लिये और जो धर्म मेरे काम नहीं आ सकता अस्वीकार है, धिक्कार है, नहीं चाहिए। फिर से बोलो, धर्म के केन्द्र में ये मिट्टी का पुतला (शरीर) बैठा है, ये दहक रहा है, ये बेचैन है इसको शान्ति दो न! इसको शान्ति मिली तो धर्म है बाक़ी इधर-उधर की फिज़ूल बातें बन्द करो।

लोग सवाल पूछेंगे, कहेंगे, ‘ये तो मैटेरियलिज़्म हो गया!’ देखिए साहब, ये मैटेरियलिज़्म नहीं हुआ मैटेरियलिज़्म तब हुआ जब आप कहें कि इसको शान्ति मिल जाएगी मटेरियल के ही भोग से। वो होता है भोगवाद या पदार्थवाद। मैटेरियलिज़्म ये नहीं होता कि मैं इस हाड़-माँस के पुतले की बेहतरी की बात करूँ, वो नहीं हुआ। मैं कह दूँ कि इसकी बेहतरी हो जाएगी मटेरियल से, वो हुआ मैटेरियलिज़्म। तो धर्म कहता है समस्या इसको है लेकिन इसका समाधान इसमें नहीं है, इसका समाधान समझने में है।

इस मिट्टी के पुतले को जो तकलीफ़ें हैं उनका समाधान, और मिट्टी चबा लेने में नहीं है। अगर मैं ये कह दूँ कि मिट्टी का पुतला है और उसकी तकलीफ़ों का इलाज हो जाएगा, और मिट्टी खा-खाकर, वो हुआ मैटेरियलिज़्म। धर्म कहता है, ‘तकलीफ़ तो मिट्टी के पुतले को है लेकिन तकलीफ़ दूर नहीं होगी मिट्टी से।’ वो असली धर्म है। किससे दूर होगी? ईश्वर से दूर होगी? न-न-न-न! मिट्टी को ही समझने से। यही मिट्टी (शरीर) है, यही अवसर है। इसके अलावा और कुछ नहीं है बाक़ी सब बेकार की कल्पनाएँ।

तकलीफ़ इस मिट्टी (शरीर) को है और इस मिट्टी के अलावा कहीं कुछ नहीं है जानने, देखने, समझने को। इसी को देखूँगा, समझूँगा, वही बोध का अवसर है। और इसको जानना-समझना, यही समाधि है। उसी में मुक्ति है। ये धर्म होता है, बाक़ी सब कुछ नहीं।

प्र: थैंक यू सर।

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