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सत्-चित्-आनंद का क्या अर्थ है? || तत्वबोध पर (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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सत्किम्? कालत्रयेअपि तिष्ठतीतिसत्। चित्किम्? ज्ञानस्वरूपः। आनंद कः? सुखस्वरूपः।

सत् किसे कहते हैं? जो तीनों कालों में रहता है। चित् क्या है? जो ज्ञानस्वरूप है। आनंद क्या है? जो सुखस्वरूप है।

—तत्वबोध, श्लोक १६.२-१६.४

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सत्, चित् और आनंद के बारे में आदि शंकराचार्य बता रहे हैं। कृपया इसे और सरल करें।

आचार्य प्रशांत: सत्, चित्, आनंद, ये सत्य के गुण अथवा उपाधियाँ नहीं हैं। ये वो हैं जिनकी मन को सदा तलाश रहती है और मुक्ति की दशा में या मुक्ति के अति निकट आने पर जिनका अनुभव होना मन को आरंभ हो जाता है।

सत् क्या है?

वह जो तीनों कालोंं में विद्यमान है।

आदि शंकराचार्य कह रहे हैं, “सत् क्या है? वह जो तीनों कालों में विद्यमान है।”

मन लगातार उसको खोजता रहता है जिसको काल हर ना ले जाए। मन को लगातार अमरता की तलाश रहती है। सत्य के संसर्ग से, आत्मा की निकटता से मन से मृत्यु का भय जाता रहता है। यह मन की सत् अवस्था है। मन को कुछ ऐसा मिल गया है जिसे अब काल, समय छीन नहीं ले जाएगा – सत्।

चित् क्या है?

आदि शंकराचार्य समझा रहे हैं, “वह जो ज्ञानस्वरूप है – ‘ज्ञानस्वरूपः’।”

मन लगातार झूठे ज्ञान को ढोता रहता है, झूठे ज्ञान का ही नाम अज्ञान है।

अज्ञान मतलब ज्ञान का अभाव नहीं होता, अज्ञान का मतलब होता है झूठे ज्ञान की उपस्थिति।

सच्चाई के निकट आने पर झूठा ज्ञान कटता है, झूठे ज्ञान की आधारहीनता साफ़ दिखाई देती है, धारणाएँ, मान्यताएँ मिटती हैं। यह चित् की स्थिति है। कोई ख़ास ज्ञान हो नहीं गया, बस जो झूठा था, वह मिट गया। जैसे हमने कहा कि सत् में मृत्यु का भय मिट गया, वैसे ही चित् में झूठा ज्ञान मिट गया।

फिर पूछा है कि “आनंद क्या है?”

तो शंकराचार्य कह रहे हैं कि ‘सुखस्वरूप:’। आनंद सुख नहीं है, फिर भी समझाने के लिए शंकराचार्य कह रहे हैं सुखस्वरूप है। किस अर्थ में सुखस्वरूप है? इस अर्थ में कि दुःख मिट गया।

सत् में काल मिट गया, चित् में अज्ञान मिट गया, आनंद में दुःख मिट गया। पर चूँकि हमने दुःख के मिटने को आंशिक रूप से सिर्फ़ सुख के क्षणो में अनुभव किया है, तो इशारा करने के लिए हमसे कह रहे हैं कि आनंद सुखस्वरूप है, सुख नहीं है।

आनंद और सुख में एक समानता भर है, क्या समानता है? दोनों में ही दुःख प्रतीत नहीं होता। पर बस समानता यहीं पर समाप्त हो जाती है। सुख में बस तात्कालिक रूप से दुःख प्रतीत नहीं होता लेकिन दुःख विद्यमान रहता है और थोड़े समय बाद पुनः अपना रूप दिखा देता है, आनंद में दुःख से सरोकार विदा ही हो जाता है। आनंद दुःख-सुख दोनों के प्रति अगंभीरता है।

हमें याद रखना होगा कि तत्वबोध की रचना आरंभिक चरण के छात्रों को समझाने हेतु की गई थी, इसीलिए तत्वबोध के वाक्यों में सरल इशारे हैं। चित् को शंकराचार्य ने कह दिया ज्ञानस्वरूप; ज्ञान नहीं है चित्। जैसे सुख नहीं है आनंद, वैसे ही ज्ञान नहीं है चित्। ठीक उसी तरीक़े से तीनों कालोंं में जो विद्यमान रहे, वो नहीं है सत्। तीनों कालोंं से अनूठा जो है, तीनों कालोंं से अस्पर्शित जो है, वह है सत्।

पर समझाया तो मन को जा रहा है न? मन को तो उसी भाषा में समझाना पड़ेगा जिससे वह भिज्ञता रखता है। तो मन की जान-पहचान की भाषा सुख की, ज्ञान की और काल की है, तो इसीलिए कालातीत को भी शंकराचार्य काल का उदाहरण लेकर समझा रहे हैं, इसीलिए ज्ञानातीत को भी शंकराचार्य ज्ञान का उदाहरण देकर समझा रहे है और इसीलिए मनातीत को भी शंकराचार्य सुख-दुःख का उदाहरण लेकर समझा रहे है। यह हुआ सच्चिदानंद।

सच्चिदानंद का संबंध परमात्मा से नहीं है, सच्चिदानंद मन की मिटती हुई हालत का नाम है। सच्चिदानंद अहंकार की विदाई के आख़िरी पलों का वर्णन है। सच्चिदानंद ज्ञानी की और भक्त की उच्चतम अवस्था है। सच्चिदानंद के बाद जो है, वह अवस्था है ही नहीं; सच्चिदानंद के बाद जो है, वह योग है। उसको योग कह दीजिए, चाहे लय कह दीजिए और चाहे उसका मिट जाना, शून्य हो जाना कह दीजिए। सच्चिदानंद के बाद कोई बचता ही नहीं है अनुभव करने के लिए। अनुभोक्ता का आख़िरी अनुभव है सच्चिदानंद।

प्र२: आचार्य जी, इसमें स्वप्न अवस्था और सुषुप्ति अवस्था के बारे में वर्णन है। और जो वर्णन है, उसमें यह बताया गया है कि स्वप्न अवस्था में जो वासनाएँ हैं, वो हमें स्वप्न में ले जाती हैं और सुषुप्ति अवस्था में हमने गहरी नींद ली, हमें नहीं पता क्या हुआ, इसका वर्णन होता है। और कभी-न-कभी जीवन में ये दोनों ही प्रकार के अनुभव होते हैं जो स्वतः ही हो रहे हैं, तो इनका अर्थ क्या है? जो सुषुप्ति अवस्था है, उसका अर्थ है क्या?

आचार्य: किसके लिए?

प्र२: जिसके साथ वह घटा है, उसके लिए।

आचार्य: वह तो मस्त है, उसे तो कोई अर्थ चाहिए ही नहीं।

प्र२: लेकिन अचेतन रूप से उसे नहीं पता, ये अनुभव हमेशा नहीं हो रहे। कभी अनुभव हुआ, कभी स्वप्न अवस्था में है वह और यह सबके साथ कभी-न-कभी होता है कि कोई स्वप्न नहीं देखा।

आचार्य: जिसके साथ होता है, वह दूसरा होता है। वह अनुभव तुम्हारे साथ नहीं हो रहा है। बताने वालों ने इसीलिए नहीं कहा कि तुम ही हो जिसे जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का अनुभव होता है। बताने वालों ने कहा कि तुम जागृति में जागृति का अनुभव करने वाले हो, तुम्हारा नाम ही अलग है, तुम हो ‘वैश्वानर’। सपने में तुम बचोगे ही नहीं, सपने का अनुभव तो करने वाला ही दूसरा है, उसका नाम दे दिया ‘तैजस’। और सुषुप्ति में फिर कोई तीसरा है, जो सुषुप्ति का अनुभोक्ता है, उसका नाम दे दिया ‘प्राज्ञ’।

तुम वैश्वानर हो, तुम्हें प्राज्ञ का क्या पता? वह तो कोई और था। अर्थ कुछ नहीं है इन भिन्न अवस्थाओं का, सीख है इनमें। सीख क्या है? सीख यह है कि तुमको साफ़ दिखाई पड़ता है कि तुम सपने में कुछ और हो जाते हो। चूँकि सपने में तुम कुछ और हो जाते हो, इसीलिए सपने लेते हुए आदमी का नामकरण ही अलग कर दिया गया, और सीखने वालों ने इस बात से बहुत सीख लिया। उन्होंने कहा कि, "हम सिर्फ़ सपने में ही कुछ और नहीं हो जाते, हम जाग्रत अवस्था में भी कभी कुछ, कभी कुछ, कभी कुछ बदलते ही रहते हैं। यह सीख है कि हम लगातार बदल रहे हैं।"

लेकिन आमतौर पर छात्र तीन अवस्थाओं की तो बात कर ले जाते हैं और यह भूल जाते हैं कि इन तीनों अवस्थाओं में जो अवस्थित हैं, वो भी तीन अलग-अलग हैं। वो कुछ इस तरह से कहते हैं कि, "हम कभी जागृति में होते हैं, हम कभी स्वप्न में होते हैं और हम कभी सुषुप्ति में होते हैं।" ग़लत, बात झूठ है बिलकुल। तुम कभी जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति में नहीं होते; जागृति में तुम कुछ और हो, स्वप्न में तुम कुछ और हो और सुषुप्ति में तुम कुछ और हो। अब बात महत्व की हुई, अब बात क़ायदे की हुई।

इससे तुम कुछ सीख सकते हो, इससे तुम क्या सीख सकते हो? इससे तुम सीख सकते हो कि चेतना बदलती है, हम बदल जाते हैं। तो फिर हमारा बदलना तीन ही बार नहीं होता होगा दिन में, हमारा बदलना तीन करोड़ बार हो रहा है दिन में। हम लगातार बदल रहे हैं। बदलाव सिर्फ़ तब ही नहीं हुआ जब जगता आदमी सो गया, बदलाव तब भी हो रहा है जब जगता आदमी जगा हुआ प्रतीत हो रहा है, तब भी वह लगातार बदल रहा है।

और अगर तुम लगातार बदल रहे हो जगते हुए भी, तुम लगातार बदल रहे हो सोते हुए भी, तो फिर विकराल प्रश्न खड़ा होता है — तुम हो कौन? इसलिए अध्यात्म में चेतना की ये तीन अवस्थाएँ बार-बार पढ़ाई जाती हैं ज़ोर देकर ताकि तुममें यह प्रश्न उठ सके कि तुम हो कौन। लेकिन अध्यात्म के छात्र तीन अवस्थाएँ पकड़ लेते हैं और नाम रटना तो पाँच मिनट का खेल है – जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति; जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति। थोड़ा और आगे बढ़ें तो फिर कह देते हैं – तुरीय, तुरीय, तुरीय। इस बात का उनके जीवन से क्या ताल्लुक़ है, इसको वे कम ही समझते हैं।

जब यह दिखाई देता है कि इन तीनों में जो चल रहा है, वह तो खिलवाड़ ही है, क्योंकि इन तीनों में जो है, वही बार-बार बदल रहा है। ये तीन अवस्थाएँ ही नहीं हैं, इन तीन अवस्थाओं में जो अवस्थित है, इन तीनों अवस्थाओं का जो भोक्ता है, वही लगातार बदल रहा है, तब फिर आवश्यकता महसूस होती है यह कहने की कि “भाई, मैं इन तीनों में से कोई नहीं हूँ, मैं तो कोई चौथा हूँ।” उस चौथे को कह देते हैं 'तुरीय'। तुरीय माने चौथा।

चौथे की ज़रूरत क्यों पड़ी?

तभी पड़ी जब दिखाई दिया कि इन तीनों में से मैं कोई नहीं हूँ। पर ये कोई कहे क्यों, कि इन तीनों में से मैं कोई नहीं हूँ? ऐसा तो वही कहेगा न जिसने पहले यह पूछा हो कि “मैं हूँ कौन?”

हममें से अधिकांश लोगों में इतनी धार नहीं होती, इतनी तीव्र हमारी नज़र नहीं होती कि हम अपने-आपको देखें और तुरंत यह सवाल खड़ा हो जाए, तुरंत हम इस बात को पकड़ लें कि लोचा है, मामला गड़बड़ है। “मैं हूँ कौन? अभी सो रहा था, कुछ था, अभी जग गया हूँ, कुछ हूँ और जगते हुए भी यह मिल गया तो कुछ हूँ, वह मिल गया तो कुछ और हूँ। चाय मिल गई तो कुछ हूँ और कॉफी मिल गई तो मैं कुछ और हूँ। ख़तरा! गड़बड़झाला! चाय-कॉफी के साथ हस्ती बदल रही है हमारी, तो हम हैं कौन, भाई?”

यह जो एक नाम चल रहा है, यह तो झाँसा है, नाम तो एक दे दिया है, नाम बता दिया गया है तुम्हारा कि ये शिखर सिंह हैं। अब नाम चूँकि अनवरत है, तो भ्रम यह हो जाता है कि हम भी अनवरत हैं। नहीं भाई, तुम्हारा नाम ही लगातार है, तुम लगातार नहीं हो; तुम तो घड़ी-घड़ी बदलते हो।

यह बात इतनी घबरा देने वाली होती है, यह बात इतना दम घोट देती है कि तुम इस बात पर अगर विचार करोगे तो चिल्ला उठोगे। कहोगे, “कौन हूँ मैं, कौन हूँ मैं? मैं कौन हूँ? कुछ हूँ ही नहीं मैं। और अगर कुछ नहीं हूँ मैं, तो फिर यह सारा खेल क्यों चल रहा है, मैं इस खेल का भुक्तभोगी क्यों हूँ? अजीब मेरी हालत है, हूँ मैं कोई नहीं, और दुःख झेल रहा हूँ। लेना एक न देना दो, अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बो।”

प्र२: बचपन में मैं कोई और था।

आचार्य: अरे! बचपन तो छोड़िए, अँगड़ाई लेने से पहले कुछ और थे और अँगड़ाई ली तो कुछ और हो गए। इस पूरे खेल में हमारी कोई हस्ती ही नहीं। हमारा काम बस यह है कि भुगते जाओ। खाया-पिया कुछ नहीं, गिलास तोड़े बारह आना। फिर आदमी कहता है, “मुझे इन तीनों में कुछ नहीं होना, मुझे इन तीस हज़ारों में कुछ नहीं होना। मुझे इन तीनों से आज़ादी दो, मैं कहीं और जा रहा हूँ।” उस कहीं और को क्या नाम दे दिया? 'तुरीय'। तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा। हमें माफ़ करो, भाई!

देखा है न मौसम बदलते ही कैसे विचार बदल जाते हैं? और विचार नहीं बदल रहे, विचारक बदल गया है। कितनी ख़तरनाक बात है! विचार तो ऐसा लगता है कि बाहरी है, विचार तो ऐसा लगता है तुम्हारे नियंत्रण के हैं, पर विचारक तो तुम हो न? तुम ही बदल गए, ये कितनी-कितनी भयानक बात है!

तुम्हारे बच्चे को बुख़ार चढ़ा हुआ है, १०४ हो गया है, और तुम विचार कर रहे हो कि अगर यह बच जाए तो अपनी आधी जायदाद भगवान को समर्पित कर दूँगा।

१०३ – “नहीं, एक-तिहाई ठीक है।”

१०२ – “चौथाई में क्या बुराई है, भाई? भगवान कोई लालची हैं?”

१०१ – “यह लेने-देने का खेल क्या मैं भगवान के साथ खेल रहा हूँ? दस प्रतिशत बहुत होता है।”

१०० – “कितना घिनोना आदमी हूँ मैं! जो दाता मुफ़्त लुटाता है, मैं उसे घूस देने चला था। पाँच प्रतिशत!”

९८.४ – “अरे, यह सब तो मोह-माया, मिथ्या है। मेरा तो यह बच्चा ही नहीं है, जिसका यह बच्चा, उसी ने इसको ठीक किया। मैं होता कौन हूँ कर्ता भाव रख करके दान इत्यादि करने वाला?”

देखा है न कैसे विचार पलटते हैं? स्थितियाँ बदली नहीं कि विचार पलट गए। विचार ही नहीं, विचारक ही बदल गया, और बिना तुम्हारी अनुमति के बदल गया, तुम्हें पता भी नहीं लगा। तुम इस बात के ख़ौफ़ को थोड़ा महसूस तो करो, दिल दहल जाएगा। तुम्हारे विचार तुम्हें तुम्हारी अनुमति से नहीं आते। रोंगटे खड़े हो जाएँगे। कुछ भी आ जाता है—और कुछ भी नहीं आता, जैसा माहौल, जैसी स्थितियाँ होती हैं वैसा आ जाता है।

कितने तो प्रयोग हो चुके हैं। तुम अंधेरे कमरे में बैठकर सोचो, एक तरह के विचार आएँगे; कोई ज़रा-सी बत्ती जला दे, विचार बदल जाते हैं। तुम ठंड में सोचो, एक प्रकार के विचार आएँगे; तुम गर्मी में सोचो, दूसरी तरह के आएँगे; तुम नहाने चले जाओ, चौथी तरह के आएँगे। कैसी-कैसी बातों से तुम बदल जाते हो, विचार का बदलना माने विचारक का बदलना।

तुम यूँ ही बैठ करके सोच रहे हो, एक तरह की बात सूझेगी; तुम कंघा कर लो, फिर देखो, चीज़ दूसरी हो जाती है। जिन्होंने इस ख़ौफ़ को महसूस किया है, वो इन तीनों की तिकड़ी से जान बचाकर भागे हैं और बोले हैं, “हम दूर ही भले, भाई।” और तुर्रा यह कि हम कहते हैं, “हमने सोचा।”

एक-दो बार तो हो चुका है मेरे साथ। लोगों को बुरा लग जाता है। देवी जी ने फरमाया, "आचार्य जी, मैं सोच रही थी कि..." और आचार्य जी लगे हँसने। वह बात ही ना पूरी कर पाएँ।

वो बोलीं, “यह तो ग़लत है, मैंने तो कुछ बोला ही नहीं।”

मैंने कहा, “कितना तो बोल दिया।" क्या बोल दिया? “मैंने सोचा!” तुमने कहाँ सोचा? तुम थोड़े ही इस सोच को नियंत्रित कर रही हो? तुम्हें तो पता भी नहीं चलता यह सोच कहाँ से आ गई। सोच आती है, तुम्हें अपने साथ ले जाती है और तुम इतनी अंधी कि तुम कहती हो, “मैंने सोचा।” तुमने थोड़े ही सोचा।

और विचारों के साथ तो फिर भी एक बार को तुमसे चूक हो जाए तो समझ में आता है कि तुम कह दो, तुमने सोचा। भावनाओं के साथ यह चूक कैसे कर लेते हो भाई? कल ही तो कोई कह रहा था – "आचार्य जी, मैं क्रोध बहुत करता हूँ।" तुम क्रोध बहुत करते हो? तुम क्रोध करते हो? या क्रोध आता है और तुम्हें अगवा कर ले जाता है? ईमानदारी से बताना।

पर हमारे सवाल भी ऐसे, हम लाजवाब हो जाते हैं! “आचार्य जी, कामवासना का क्या करूँ?” तुम्हारे बस में है कुछ करना? तुम्हारी है कि कुछ करोगे? अब तो कामवासना तय करेगी कि तुम्हारा क्या करे। रोज़-रोज़ यह हो रहा है कि वह तय करती है कि तुम्हारा क्या करेगी। कितना पटकेगी तुम्हें, कितना डुबोएगी, किस पत्थर पर फेंकेगी तुम्हें, किस कुएँ में डुबोएगी। पर हमारे रुतबे में कोई कमी नहीं है, “मैंने सोचा!” तुमने सोचा?

इसे कहते हैं प्रकृति के साथ तादात्म्य। घटना प्रकृति में घट रही है और स्वयमेव घट रही है, लेकिन तुमको भ्रम यह है कि तुम उस घटना के कर्ता हो। गुस्सा उठ रहा है, अपने-आप उठ रहा है, लेकिन तुम्हें भ्रम यह है कि तुम क्रोध कर रह हो। तुम क्रोध कर नहीं रहे, क्रोध हो रहा है, तुम्हारी नादानी के कारण हो रहा है। अंतर समझना, तुम्हारे करने के कारण नहीं हो रहा, तुम्हारी नादानी के कारण हो रहा है।

प्र३: प्रणाम, आचार्य जी। सुषुप्ति के बारे में शंकराचार्य जी कहते हैं कि हमें कुछ नहीं पता, हमने बस सुखपूर्वक निंद्रा का अनुभव किया। गुरु गोविंद सिंह जी को भी सोते हुए खंजर मारा गया था। लेकिन श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि योगी नींद में भी जागता है और गुरु कबीर साहब भी कहते हैं कि दास कभी ना सोए। तो ऊपर की दोनों बातों और नीचे की दोनों बातों में विरोधाभास लगता है। कृपया स्पष्ट करें।

आचार्य: ये कहने के तरीक़े हैं। कैसे कहा जा रहा है, समझ लो। जब कबीर साहब कहते हैं, “दास कभी ना सोवे”, तो उस वक़्त वे यह नहीं कह रहे हैं कि दास सदा जागता रहता है, वे यह कह रहे हैं कि जो दास हो गया, वह सोने-जगने की प्राकृतिक घटनाओं से रिश्ता तोड़ लेता है। वह फिर इन चीज़ों में हस्तक्षेप करता ही नहीं कि कौन जग रहा है, कौन सो रहा है। जिसको सोना है वह सोएगा, जिसको जगना है वह जगेगा; दास ना सोया हुआ है, ना जगा हुआ है।

लेकिन चूँकि पढ़ तुम इतना ही रहे हो, उद्धृत तुम एक बहुत छोटी, संक्षिप्त बात कर रहे हो, तो तुमको ऐसा लग रहा है कि जैसे कहा जा रहा है कि दास कभी सोता नहीं और सदैव जगता ही रहता है। ना, सोने का काम भी शरीर का और जगने का काम भी शरीर का, दास कहता है, "प्रकृति अपना खेल खेलती रहे, हम अलग हैं।" तो शरीर जग रहा है, सो रहा है, दास क्या कर रहा है? जग रहा है, कि सो रहा है? ना वह जग रहा है, ना वह सो रहा है।

यह मत समझना कि तुरीय अवस्था का अर्थ होता है शाश्वत जागरण। अगर कहीं ऐसा कह भी दिया गया है या कहीं तुम ऐसा पढ़ भी लो कि तुरीय का मतलब है शाश्वत जागरण, तो वह बात सांकेतिक है।

जागरण दो तरह के होते हैं, समझना। तुम भ्रमित हो। क्यों भ्रमित हो, अभी समझ में आ जाएगा। एक जागरण होता है जाग्रत अवस्था का जागरण। चेतना की तीन अवस्थाओं में से सिर्फ़ एक अवस्था है जागृति। जब तुम उस अवस्था में होते हो तो तुम्हारी ये भौतिक आँखें खुली होती हैं, इसको तुम कह देते हो 'जागरण'। यह जागरण का सामान्य और प्रचलित अर्थ है।

आध्यात्मिक तौर पर जब जागरण की बात की जाए, जब गुरु कबीर साहब या अन्य संतजन तुम्हें चेताएँ कि “जाग बावरे! क्यों सोया पड़ा है? उठ, जाग मुसाफ़िर।” तो उसका अर्थ यह नहीं है कि ये माँस वाली आँखें खोलो, ये शरीर की आँखें खोलो। तब किसी दूसरे जागरण की बात की जा रही है; पलक झपकाने की बात नहीं की जा रही।

तो आध्यात्मिक जागरण है जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति, तीनों अवस्थाओं के पार चले जाना। लौकिक जागरण क्या है? स्वप्न से जागरण की स्थिति में आ जाना। यह लौकिक जागरण है कि खन्ना साहब सपने देख रहे थे और किसी ने झंझोड़कर जगा दिया तो अब कह रहे हैं, “हमारा जागरण हो गया।” यह जागरण का लौकिक, सामान्य, प्रचलित अर्थ है। जब गुरु बोले, “जग जाओ”, तो अलार्म मत लगाने लग जाना। वह इन आँखों को खोलने की बात नहीं कर रहा, वह इस आँख (माथे के बीच में ऊँगली से इशारा करते हुए) को खोलने की बात कर रहा है। अब यहाँ पर कोई आँख होती नहीं है, खुरचने मत लग जाना।

गुरु कह रहा है, “जग जाओ”, तो मतलब है कि स्वप्न से जागृति में नहीं आना है, बल्कि स्वप्न, जागृति, सुषुप्ति, तीनों के आगे निकल जाना है। वह जागरण है। तो कबीर साहब जब कह रहे हैं कि 'दास कभी ना सोवे', तो वे कह रहे हैं कि यह सोने-जगने के काम तो स्वप्न, सुषुप्ति और जागृति के हैं। दास को प्रकृति से ज़्यादा प्यारा कोई मिल गया है, दास अब उसकी ख़िदमत करता है। दास अब चाकर हुआ, दास अब बंदगी करता है। दास अब उसके साथ है जहाँ ना सोया जाता है, ना जगा जाता है; ना जाया जाता है, ना आया जाता है; ना धूप है, ना छाँव है; ना दिन है, ना रात है। तो अब वह सोएगा कैसे? वहाँ वह अब लगातार जगा हुआ है।

लेकिन जगने की हमारी छवि यही है कि आँखें फाड़-फाड़कर देखना। कई लोग तो आध्यात्मिक साधना में भी इस बात को शामिल करने की कोशिश करते हैं, वो कहते हैं, “जगना बहुत ज़रूरी है, तो कम-से-कम सोओ।” अर्थ का अनर्थ मत कर लेना।

इसी तरीक़े से श्रीकृष्ण जब कहते हैं कि योगी नींद में भी जगता है, तो उनका आशय यही है कि योगी चाहे नींद में रहे, चाहे जागृति में रहे और चाहे सुषुप्ति में रहे, इन तीनों ही ऊपरी अवस्थाओं के पीछे उसकी आंतरिक अवस्था तुरीय है। वह नींद में भी तुरीय में है, वह जागृति में भी तुरीय में है, वह सुषुप्ति में भी तुरीय में है। वह केवल नींद में ही नहीं जाग रहा, वह जब जगा है, तब भी जगा है।

हम जब जगे भी हैं, तब भी सो रहे हैं, हम जब सो रहे हैं, हम तब भी सो रहे हैं और जब हम सुषुप्ति में हैं, हम तब भी सो रहे हैं। तो जागृति के इन दोनों अर्थों को ठीक से समझो और भिन्न-भिन्न समझो, नहीं तो फँसे रहोगे। नहीं तो तुम्हें यही लगेगा कि संतों को नींद से कुछ दुश्मनी है और सब संत जन एक ही बात बोलते हैं कि, "उठ, उठ, उठ!" वे किसी और उठने की बात कर रहे हैं। वे बिस्तर से उठने की बात नहीं कर रहे हैं, वे ऊर्ध्वगमन की बात कर रहे हैं।

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