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सपने से बाहर आओ, स्वयं का अवलोकन करो || (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
32 min
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आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते। योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते।।

योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मननशील पुरुष के लिए योग की प्राप्ति में निष्काम भाव से कर्म करना ही हेतु कहा जाता है और योगरूढ़ हो जाने पर उस योगरूढ़ पुरुष का जो सर्वसंकल्पो का अभाव है, वही कल्याण में हेतु कहा जाता है।

—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ६, श्लोक ३

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। इस श्लोक में ‘योग में आरूढ़ होने की इच्छा’ से क्या तात्पर्य है? क्योंकि इस अध्याय के पहले ही श्लोक में तो कर्मफल की इच्छा से मुक्त होने को ही योग कहा गया है, फ़िर किस इच्छा का वर्णन श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में किया है? कृपया समझाने की कृपा करें।

आचार्य प्रशांत: बाकी सब इच्छाएँ एक तल पर हैं और कृष्ण की इच्छा दूसरे तल पर है। सर्वसंकल्पों का अभाव होना चाहिए तभी एक मात्र संकल्प बचेगा ‘कृष्ण-संकल्प’। सब संकल्पों को छोड़ना और कृष्ण-संकल्प को धारण करना, यह दोनों बिलकुल एक ही बात हैं; इसमें कोई विरोधाभास नहीं है। सबको छोड़कर एक दिशा जाना है, वह दिशा संसार की नहीं है, वह दिशा ऊपर की है। या तो उसे कह दो कि वह दिशा ऊपर की है या कह दो कि भीतर की है, दोनों एक ही बात हैं।

संसार की दिशाएँ चारों तरफ पसरी होती हैं। भक्तिमार्गियों ने कहा कि यह चारों तरफ की दसों दिशाएँ हैं, इनकी तरफ नहीं जाना – ग्याहरवीं दिशा की ओर जाना है। भक्ति मार्ग पर चलोगे तो ग्याहरवीं दिशा ऊपर की ओर है, ज्ञान मार्ग पर चलोगे तो ग्याहरवीं दिशा भीतर की ओर है। पर बात यह है कि जाना ग्याहरवीं दिशा में ही है। संसार की अगर दस दिशा मानो तो उनमें नहीं जाना है; संसार में किसी दिशा में नहीं जाना है।

अब कहोगे कि “जीना तो संसार में ही है, ऐसा कैसे करें कि संसार में किसी दिशा ना जाएँ?” तो उत्तर यह है कि संसार में उस दिशा जाओ जिस दिशा जाने से ग्याहरवीं दिशा जाने में मदद मिलती हो।

अगर संसार में ही गति करनी है तो संसार में उसकी तरफ गति करो जो तुमको या तो तुम्हारे भीतर पहुँचा देगा या आकाश पहुँचा देगा।

प्र२: आचार्य जी, कल से सुनता आ रहा हूँ और आज भी बहुत अवलोकन करने के बाद एक चीज़ समझ में आ रही है, वह आपसे पूछना चाह रहा हूँ। आपने बोला कि सारे बन्धनों को छोड़ दो, तोड़ने का प्रयास करो, उसके बाद कृष्ण की प्राप्ति है। तो मेरा सवाल यह है कि मैं सर्वप्रथम अपने सारे बन्धनों का अवलोकन करूँ, उन्हें तोड़ने का प्रयास करूँ और उसके बाद जो भी करूँगा, वह सही होगा?

आचार्य: बन्धनों का अवलोकन नहीं करो, जीवन का अवलोकन करो तो समझ में आएगा कि बंधन कितने हैं। तुम्हें पता ही नहीं है कि बंधन हैं या नहीं, उनका अवलोकन कैसे कर लोगे? कह तो रहे हो कि बंधनों का अवलोकन करूँ, जैसे कि जानते ही हो कि बंधन कितने हैं और कहाँ-कहाँ हैं।

पहले तो वह सब आभूषण, जिनको तुम बड़े प्यार से सहेज कर रखते हो, वास्तव में बंधन हैं, यह देखो, जानो। बंधन यूँ ही थोड़े ही तुम पर बिराजे रहते हैं, तुम बंधनों को पकड़कर रखते हो, क्योंकि बंधन तुम्हें लगते हैं आभूषण जैसे। तुम कहते हो कि यही तो जीवन का रस है, यही तो जीवन का श्रेय है।

करने की जल्दी में ना रहो, पहले पहचानों समय लगा करके कि बंधन मेरे हैं कहाँ। पता ही नहीं तुमको कि बीमारी कहाँ है तो इलाज किसका कर लोगे? और बीमारी अक्सर वहाँ नहीं होगी जहाँ तुम्हारी मान्यता है उसके बारे में, बीमारी कहीं और बैठी होती है। बीमारी अक्सर वहाँ होती है जहाँ तुम्हें लग रहा है कि स्वास्थ्य है। बीमारी स्वास्थ्य का नाम और रूप लेकर छुपी बैठी है। असली चुनौती है बीमारी को उद्घाटित करना, फ़िर इलाज तो हो जाएगा।

यह मान्यता मत बना लेना कि अपने बन्धनों से तो मैं परिचित ही हूँ। वही असली चुनौती है – नहीं पता होते बंधन। बहुत आकर्षक लगती हैं चाँदी की चूड़ियाँ, पता ही नहीं चलता कि हथकड़ियाँ हैं। देखो कि उनकी उपस्थिति तुम्हारी ज़िन्दगी में प्रभाव क्या डाल रही है। बिलकुल खोजी की दृष्टि से पता करो। ऐसे नहीं कि “मैं जानता ही हूँ कि यह बड़ी अच्छी चीज़ है, मैं तो जानता ही हूँ कि यह बड़े प्रेम की बात है”, ऐसे नहीं। ऐसे कि “मैं कुछ नहीं जानता, मैं खोजूँगा, मैं पता करूँगा।“

जो धारणाओं पर चले, वह बड़ा अज्ञानी, अनपढ़, अंधविश्वासी। रवैया तुम रखो प्रयोगकर्ता का। जिज्ञासु हो, शोधी हो, खोजी हो; कुछ नहीं जानते तुम, ज्ञान से खाली हो – मुझे कुछ पता नहीं है, मुझे पता करना है – तो मैं पूछूँगा, मैं प्रयोग करूँगा, मैं जानूँगा, मैं पर्दे हटाऊँगा, मैं फावड़ा चलाऊँगा, मैं खोदूँगा।

हम सवाल देखो कितने कम पूछते हैं, है न? यहाँ भी मैं जब बार-बार तुमको ठेल रहा हूँ, तब तुम प्रश्न पूछते हो। और अपने रोज़मर्रा के जीवन में तो हम सवाल पूछते ही नहीं। ख़ासतौर पर जो काम के सवाल होते हैं, वह तो कभी हम पूछते ही नहीं। सवाल भी हम ऐसे पूछेंगे, “ स्कोर क्या है मैच में?” यही बहुत बड़ा सवाल है, “आज पोहे में प्याज़ डली है कि नहीं?” यह हमारी ज़िन्दगी के महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। पोहे में प्याज़ डली है या नहीं, पति-पत्नी में यही चर्चा चल रही है लगातार। असली बात तो पूछो, “तेरा-मेरा नाता क्या है?” पर रूह काँप जाएगी यह पूछने में। पोहे और प्याज़ की बात करना सुगम है।

प्र३: एक थोड़ा सा अलग प्रकार का प्रश्न था। मन में एक जिज्ञासा है कि जिस तरह से आजकल की दुनिया है, जिस तरह से वैज्ञानिक विकास हुआ है तो इस समय हर वक़्त परमाणु युद्ध का ख़तरा मंडरा रहा है। तो अगर किसी तरह का परमाणु युद्ध हो जाता है और पृथ्वी बिलकुल नष्ट हो जाती है, या जिसे शास्त्रों में प्रलय कहा गया है, तो जो साधु पुरुष साधना कर रहे हैं और जो नहीं भी साधना कर रहे हैं, इस पृथ्वी के नष्ट होने के बाद फ़िर उनकी गति क्या होती होगी? वे फ़िर अपनी शेष साधना कैसे कर पाएँगे, क्योंकि उनकी ग़लती से तो नष्ट हुआ नहीं?

आचार्य: काफी प्रेम है तुम्हें साधुओं से! बताओ, कितने साधुओं के सत्कार में गए हो और कितने साधुओं की शरण में गए हो? तुम्हारा जो पूरा प्रश्न है, उससे तो लग रहा है कि साधुओं के प्रति चिंता छलक रही है बिलकुल, “अगर परमाणु युद्ध हो गया तो बेचारे साधु भी मारे जाएँगे, उनका तो कोई अपराध ही नहीं।”

साधुओं से इतना प्रेम है तो पहले यह तो बताओ कि कितने साधुओं को जानते हो। कितने साधुओं का दर्शन करते हो? कितनों को भोग लगाते हो, बताओ? कितने साधुओं के साथ उठना-बैठना है तुम्हारा? साधु माने क्या? तुम्हें क्या पता साधु कोई है भी। क्यों व्यर्थ का प्रश्न कर रहे हो?

और तुम्हें क्या लग रहा है, प्रलय तब आएगी जब परमाणु युद्ध होगा? यह जो इस तरह के प्रश्न हैं न, यही प्रलय है। परमाणु युद्ध नहीं हुआ तो दुनिया की जो आबादी है, ८०० करोड़ आज है, ११००-१२०० करोड़ हो जाएगी, उसका नाम प्रलय नहीं है क्या? बोलो। प्रलय सिर्फ तब है क्या जब एटम बम (परमाणु बम) गिर जाए? आज जो हो रहा है, इसका नाम प्रलय नहीं है?

एक झटके में ही विनाश हो जाए, तभी प्रलय कहलाती है क्या? यह जो धीरे-धीरे करके पृथ्वी की गर्दन काटी जा रही है, यह प्रलय नहीं है? लाखों प्रजाति विलुप्त हो गईं, सैकड़ों रोज़ विलुप्त हो रही हैं, यह प्रलय नहीं है? या प्रलय सिर्फ तब होगी जब परमाणु युद्ध होगा? बोलो। और जो वृत्ति परमाणु युद्ध करवाती है, वही वृत्ति प्रजातियों का समूल संहार करवा रही है। क्रोध और भोग, ये करवाएँगे परमाणु युद्ध, है न? क्रोध और भोग, इनसे होगा परमाणु युद्ध। और क्रोध, भोग और वासना, इन्हीं के कारण तो पृथ्वी जंगलों से जीवों से प्रजातियों से खाली हुई जा रही है। यह भी तो प्रलय ही है। और यह और ज़्यादा भयानक प्रलय है क्योंकि इसका तुम्हें पता ही नहीं चल रहा।

साधु का कुछ नहीं बिगड़ेगा, साधु अगर असली है तो वह संसार के पार जा चुका है। करुणावश वह संसार की भलाई चाहता है, पर संसार से उसका स्वार्थ का कोई नाता बचा ही नहीं है। साधु का कुछ नहीं बिगड़ेगा, वह अब आत्मस्थ है। आत्मा किसी परमाणु युद्ध में नहीं जल मरेगी। पूरा ब्रह्मांड भी नष्ट हो जाए, सत्य तो रहेगा न। साधु अब सत्य में प्रतिष्ठित हो गया है, उसका कुछ नहीं बिगड़ जाना है। बिगड़ेगा तुम्हारा, जो सोच रहा है कि प्रलय दूर की बात है, प्रलय तब होगी जब मिसाइलें और बम गिरेंगे।

प्रलय हमारे घर की बात है। यह जो रोज़ हमारे घरों में और हमारे मन में होता है, वही तो राष्ट्रों के बीच होता है। अगर हमें अपने घर की और अपने मन की प्रलय नहीं पता तो हम राष्ट्रों के बीच की प्रलय क्या रोकेंगे!

यह जो तुम अपने घर में अपने मेज़ पर मुर्गा काट रहे हो और बकरा खा रहे हो, यह ठीक वही चीज़ हो रही है जो जंगलों में हो रही है। हर साल कई मिलियन स्क्वायर किलोमीटर का क्ष्रेत्र, लाखों किलोमीटर वर्ग क्षेत्र जंगलों से ख़ाली हो जा रहा है। जहाँ जंगल नहीं भी काटे जा रहे, वहाँ उनकी गुणवत्ता ख़राब हो जा रही है। पर जिसको कोई करुणा नहीं उठ रही जब उसके घर में पशु कट रहे हैं, उसे कोई करुणा क्यों उठेगी जब जंगल में पशुओं की प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं?

प्रलय घर में है। प्रलय आदमी के मन में है। हमारे मन हिंसक हैं इसलिए यह विश्व विनाश की ओर बढ़ रहा है। मन को तो अपने ठीक करो। मन ठीक तब होगा जब तुम साधु की बात करना छोड़ोगे और साधु की संगत में रहना शुरू कर दोगे। अभी तो तुम न जाने किस काल्पनिक साधु की बात कर रहे हो! तुम्हें लग रहा है कि हिमालय के ऊपर कहीं कोई साधु बैठा है, जब बम फटेगा तो वह बेचारा जान बचाकर भागेगा, “हाय राम! हाय राम!” करता। “अरे! बड़ा बुरा होगा उसके साथ।“

तुम तो दूरस्थ किसी काल्पनिक साधु की बात ही कर पा रहे हो। साधु कौन है? साधु को पहचानों और उसकी संगत करो, फ़िर मन से हिंसा मिटेगी, भ्रम मिटेगा, फ़िर प्रलय भी नहीं आएगी।

प्र१: प्रणाम, आचार्य जी। सब मानते हैं कि हम सब अलग-अलग आत्मा हैं लेकिन हम तो एक आत्मा का प्रकाश हैं। यह हम कैसे समझें? यह समझ नहीं पा रही तो यह मान्यता ही होगा न? यह तो हम समझते ही नहीं।

आचार्य: सबकी केंद्रीय माँग एक ही है न, उसको ही आत्मा कहते हैं। आपको शांति चाहिए न? तुम्हें चाहिए? आपको चाहिए? आपको चाहिए? (सभा में बैठे अन्य श्रोताओं से पूछते हुए)।

वह जो सबकी केन्द्रीय माँग है, वह जो एक चीज़ है जो सबको चाहिए, उसका नाम ‘आत्मा’ है। इसलिए कहा गया है कि सब एक ही आत्मा का प्रकाश हैं।

प्र१: हम अहम् वृत्ति से और देहभाव से मुक्त क्यों नहीं हो पाते? कोशिश करने से भी…

आचार्य: क्योंकि हम ‘हम’ हैं। यह जो ‘हम’ कहा न आपने, वही तो अ-हम है। आप कह रही हैं, “अहम् वृत्ति से मुक्त क्यों नहीं हो पाती?”

प्र१: कैसे अहम् वृत्ति से…

आचार्य: आप जो कुछ कर रहे हो, वह अहम् होकर कर रहे हो। और अहम् बिना किए रह नहीं सकता, बिना किए बच नहीं सकता। जो कुछ कर रहे हो, उसको समर्थन देना बंद करो न। अहम् का काम है लगातार बौराए-बौराए कुछ-न-कुछ करना। और जो कुछ आप करते हो, उसके पीछे अपना पूरा समर्थन, पूरी ऊर्जा दे देते हो।

दिन भर जो करते हो, देखो उसको और पूछो कि, “यह क्यों कर रही हूँ?” और जैसे ही दिखाई देगा निरर्थक है, जो कर रहे हो उससे अहम् ही बढ़ रहा है, वैसे ही करना थमेगा, करना थमा तो अहम् थमा। अहम् बचा हुआ है हमारे कर्मों की ऊर्जा से। आप अपने सामान्य-साधारण कर्मों को हवा देना बंद करो, पीठ थपथपाना बंद करो, फ़िर देखो कि अहम् बचता है कि नहीं, उसका दम घुट जाएगा।

अहम् माने कर्ताभाव और कर्ताभाव माने कर्म। जिसमें कर्ताभाव है, वह कर्म करेगा। अहम् बराबर कर्ताभाव, कर्ताभाव बराबर कर्म। कर्म की निरर्थकता दिखी नहीं कि सीधे चोट किस पर पड़ेगी? अहम् पर। अहम् बराबर कर्ताभाव, कर्ताभाव बराबर सकाम कर्म। और इस सकाम कर्म की निरर्थकता दिखी नहीं कि सीधे चोट पड़ जाएगी अहम् पर।

कर्मों को देखना आसान है क्योंकि स्थूल हैं न। साफ़ दिख जाएगा क्या किया पिछले दो घण्टे में। “सुबह से उठकर क्या कर रही हूँ? यह दोपहर के चार घण्टे कहाँ लगा रही हूँ? यह पिछला पूरा हफ़्ता कहाँ बिताया?” जैसे ही दिखेगी निरर्थकता इन कामों की, वैसे ही अहम् गिरना शुरू हो जाएगा।

प्र३: आपने कहा कि तथ्यों का हमें कोई पता ही नहीं कि हम किस तरह से जी रहे हैं। इन तथ्यों को जानने के लिए हमें क्या करना चाहिए?

आचार्य: कुछ नहीं करना चाहिए। तथ्यों को जानने के लिए तो इन्द्रियाँ ही काफी हैं। श्रीकृष्ण बड़े प्यारे तरीके से कहते है ‘निर्मल इंद्रिय’, शुद्ध इन्द्रियों वाला। आँखें काफी हैं, कान काफी हैं, नाक काफी है, त्वचा काफी है। आँखों से ही दिख जाएगा, कानों से ही सुनाई दे जाएगा, तुम देखो तो सही। इसलिए संस्था में हम अवलोकन को बड़ा महत्व देते हैं।

तुम देखो तो सही, तुम देखते भी नहीं। तुम सुनो तो सही, तुम सुनते भी नहीं। तथ्य समझते हो, तथ्य? पशु भी तथ्य जानता है। कम-से-कम जितनी उसकी इन्द्रियाँ अनुमति देती हैं, उतना तो जानता ही है। आदमी अकेला है जो अपनी कपोल-कल्पनाओं में पूरी तरह क़ैद होकर रह सकता है; उसे तथ्यों से कोई लेना-देना ही नहीं।

तथ्य का मतलब होता है ठोस आँकड़ें, प्रमाणित बातें, वह सब कुछ जो लिखकर जाँचा जा सके, वह सब नहीं जो मात्र तुम्हारी व्यक्तिगत कल्पना में मौजूद है। कोई बहुत बड़ी विधि नहीं चाहिए अपनी हालत से रूबरू होने के लिए, बस कल्पनाओं से थोड़ा मुक्त हो जाओ। कल्पनाओं से थोड़ा हटो, फ़िर दिखाई देगा।

मैं हैरान हो जाता हूँ आदमी की आत्मघाती शक्तियों पर। हममें स्वयं को धोखा देने का जो सामर्थ्य है, वह अनुपम है, किसी और जीव में पाया ही नहीं जाता।

एक सज्जन आए मिलने के लिए, बोले, “मैं तो जी ही रहा हूँ अपने बेटे के ख़ातिर। ऐसा प्रतिभाशाली, दैवीय तेज से ऐसा ओत-प्रोत, भारत का भविष्य। अरे! भारत नहीं, अखिल ब्रह्माण्ड का भविष्य है। मैंने समझिए कि अपने पूरे जीवन का रस पिला दिया है उसको। सिर्फ उसी के लिए जी रहा हूँ। उठता हूँ, कहता हूँ कि आँख खुलते ही तेरा चेहरा दिखना चाहिए। सोता हूँ तो उससे बात करके, उसे याद करके। दुनिया की कोई सुख-सुविधा नहीं है जो मैंने उसको नहीं दे रखी है। बिलकुल दिव्यमूर्ति बनकर उभर रहा है।” मुझे भी बड़ा विस्मय हुआ, मैंने कहा कि अब आगे की बात तभी करेगे जब आप सुपुत्र को साथ ही लेकर आएँगे। ऐसी महानता विश्व में अवतरित हुई है, मैं भी उस बालरूप के दर्शन करना चाहता हूँ। आगे पता नहीं मिले, न मिले, तो प्रभु को लेकर ही आइएगा। बोले, “ज़रूर-ज़रूर, मैं भी चाहूँगा कि आप उसके दर्शन करें।” “ठीक है, लेकर आना।”

वे लेकर आए। बारहवीं में पढ़ता था, जाने बारहवीं पास कर चुका था। कुछ नहीं तो सवा-सौ किलो का, और यह तो मैं बहुत किफ़ायत में बोल रहा हूँ, डेढ़-सौ भी हो सकता है। चहुँदिश माँस का बाज़ार लगा हुआ था, लटक रहा था इधर-उधर, बह भी रहा है। माँस इतना कि गाल चू रहे हैं, ये बड़े-बड़े। आँखें पीली, आँखों में निर्मलता नहीं।

वह आया। मैंने कहा कि बैठो, फ़िर समझ में आया कि ग़लत बोल दिया। मैंने कहा कि कुर्सी हटाओ, सोफा लगाओ बैठने के लिए इनके। तो उसमें धँसे, नहीं, बैठे नहीं। मैंने पिताजी से कहा कि देखिए, मुझे थोड़ा एकांत दीजिए दिव्यमूर्ति के साथ। मेरे और प्रभु के बीच की बात है, आलौकिक साक्षात्कार है, थोड़ा अकेले में करने दीजिए। वे बोले, “ज़रूर-ज़रूर, आपको बड़ा लाभ होगा।” “जी, थोड़ा पधारें आप। बाहर निकलें।”

पंद्रह-बीस मिनट मैंने बात करी और उसमें ऊभरकर आया ड्रग्स , शराब, लड़कियाँ। ये जो आलौकिक प्रतिभा के धनी साहब थे, बारहवीं में बमुश्किल पास हुए थे। अभी घर में बैठे हुए थे कि “मैं तो प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी कर रहा हूँ”, और पिताजी का पूरा समर्थन था। पिताजी कहते थे कि तुम तो इंजीनियरिंग एंट्रेंस देना, आइआइटी जेईई रैंक १ तुम्हारी निश्चित है। वह तो पिछली बार कुछ संयोग बैठ गया कि तुम निकल नहीं पाए।

मैंने पूछा, “बारहवीं में कितने नंबर थे?” तो कुछ बताया। मैंने कहा कि गणित में बता दो, भौतिकी में बता दो, रसायन शास्त्र में बता दो, मैथ्स , फिजिक्स , केमिस्ट्री , जो आइआइटी के पेपर में आते हैं। पता चला इन तीनों में तो साठ प्रतिशत भी नहीं था, या था भी तो बमुश्किल। पिताजी ने उनके लिए कई-कई लाख रुपए की कोचिंग लगवा रखी थी और पाँच-सात तरीके के कोच लगा रखे थे, कोई संगीत सिखाता था, कोई टेनिस सिखाता था।

क्रिकेटर भी थे। मैंने पूछा, “क्या करते हो?”

बोले, “गेंदबाज हूँ।”

मैंने कहा, “लुढ़क तो तुम्हीं रहे हो। गेंद का क्या करते हो?”

बोला, “ फ़ास्ट बॉलर हूँ।”

मैंने कहा, “ फ़ास्ट मतलब कितना?”

“उसके पीछे कोई दौड़े तो कोई पकड़ नहीं पाए, इतना फ़ास्ट , माने आदमी जितना तेज़ चलता है या दौड़ता है, उससे ज़्यादा तेज़ी से डालता हूँ।”

ठीक है। हाँ, छू उन्होंने बहुत सी चीज़ों को रखा था। सितार को छू रखा था, तबला को छू रखा था, और पाँच-सात तरीके के पाश्चात्य यंत्र होते हैं जिनके नामों से भी हम परिचित नहीं हैं, वो भी उन्होंने छू रखे थे। पिताजी की तमन्ना थी कि बेटा एक दिन एवरेस्ट चढ़ेगा, तो ट्रेकिंग की भी कोचिंग करके आए हुए थे।

मैंने कहा कि तुम तो भौगोलिक ख़तरा हो। तुम एवरेस्ट पर चढ़ गए तो एवरेस्ट उतर आएगा। इतनी लैंडस्लाइड (भूस्खलन) हो रही हैं, पर्यावरण को वैसे ही तमाम तरह की चुनौतियाँ हैं, और नवीनतम चुनौती तुम हो।

पिताजी का मानना यही था कि यह जो मेरा बेटा है, यह अगला सिकंदर है। “नहीं-नहीं, वह टैलेंटेड (प्रतिभाशाली) तो बहुत है, बस उसके कोच लोग उसकी प्रतिभा को आइडेंटिफाई (पहचान) नहीं कर पाता है। कोच लोग उसकी प्रतिभा को, आचार्य जी, आइडेंटिफाई नहीं कर पाता है।”

ठीक अभी-अभी वे उस शिखर पर पहुँचे थे जहाँ ड्राइविंग-लाइसेंस मिलता है। और पिताजी ख़ुद जिस गाड़ी में चलते थे, उससे ज़्यादा बड़ी गाड़ी इनको दे रखी थी। ये पिताजी की गाड़ी पर उड़ा करते थे। वह गाड़ी नहीं थी, वह हाथी थी, बहुत बड़ा *एस.यू.वी.*। वह तो चाहिए भी था, छोटी गाड़ी में ये घुसते कहाँ से! और अद्भुत, पिताजी को पूरा यकीन कि मेरा लड़का तो हीरा है।

हम तथ्यों पर भी तो ध्यान नहीं देते न। आपने पूछा कि ज़िन्दगी से परिचित होकर कैसे जीएँ। पिताजी नहीं देख रहे हैं कि अगर यह टेनिस सीख रहा है तो आज तक इसको सर्विस डालनी भी आई कि नहीं आई। उनको यही लग रहा है, बड़ा प्रतिभाशाली है। तथ्य तो देख लो, कोच से जाकर पूछो कि फर्स्ट सर्व परसेंटेज कितना है मेरे लाडले का? बारहवीं में नंबर कितने आए हैं? वह तो तथ्य हैं, आँकड़ें हैं। देखो तो सही कि गणित में कुल उसके ४८ नंबर आए हैं और तुम कह रहे हो यह तो आइआइटी जेईई क्रैक (उत्तीर्ण) करेगा।

तुम बता रहे हो कि तमाम तरह के दैवीय गुणों से ओत-प्रोत है। वह दिन में छः दफे खाता है, यह दैवीय गुण है? वह भी घर में नहीं, किसी फूड कोर्ट में पहुँच जाता है और कहता है कि “अब मैं चरूँगा, हाथी की भाँति।“ यह दैवीय गुण है? हम तथ्य भी नहीं देखते न।

कुछ ख़बर नहीं है पिताजी को, उसको बड़ी गाड़ी में बैठाकर उसको जो नोटों के बंडल देते हैं, उससे वह भांग-गाँजा भी चला रहा है। इसको कहते हैं कल्पनाओं में जीना। हम हक़ीक़त का कुछ पता ही नहीं करना चाहते। और सिर्फ उसका चेहरा ध्यान से देख लेते तो जान जाते कि यह निश्चित रूप से नशा करता है।

ये तो बातें मुझे पंद्रह-बीस मिनट में साहबज़ादे ने अपनी शान में बता दीं। अभी तो और बहुत कुछ रहा होगा, पर इतना ही बर्दाश्त से बाहर था। मैंने कहा, “आप कभी बाद में दर्शन दीजिएगा। आपका नूर अब मुझसे झेला नहीं जा रहा।”

पिताजी का कहना था कि “अगर इस देश ने मेरे बेटे की प्रतिभा को पहचाना नहीं तो कोई बात नहीं, मैं उसे अमेरिका भेजूँगा। ये गरीब देश की गरीब संस्थाएँ हैं आइआइटी वगैरह, इनमें रखा क्या है? अरे, मैं हॉर्वर्ड भेजूँगा। और हॉर्वर्ड में नहीं मिला तो किसी और मुल्क में, फॉरेन डिग्री के साथ आएगा मेरा लड़का!”

सिर्फ आँखें ही खोलकर देखो तो दिख जाएगा न। बहुत बुद्धिमानी नहीं चाहिए। पड़ोसी से पूछ लो तो वही बता देगा कि हाल-चाल क्या है। बहुत बुद्धिमानी नहीं चाहिए। पर जो बातें हमारे पड़ोसियों को भी पता होती हैं, हमें ही वो बातें नहीं पता होती अपने घर के बारे में।

जैसे धृतराष्ट्र अँधे हो गए थे दुर्योधन को लेकर। इसको कहते हैं कल्पनाओं में जीना। पूरी दुनिया को पता था दुर्योधन का हाल, बस धृतराष्ट्र को नहीं पता था। इसी तरीके से हम अपने-आप को बिलकुल भुलावे में रखते हैं अपने प्रियजनों के प्रति और सबसे ज़्यादा अपने प्रति।

हमें दूसरे का हाल इसलिए नहीं पता होता क्योंकि सर्वप्रथम हमें अपना ही हाल पता नहीं है।

इनके पिताजी को अगर पता होता कि वे कितनी बुरी तरह से बीमार हैं, मोहग्रस्त हैं, रुग्णचित्त हैं, अशक्त हैं, अगर उन्हें अपना हाल पता होता, उन्हें अगर अपने अंदर की बीमारी पता होती, तो उन्हें यह भी दिख जाता कि उनका बेटा बहुत बीमार है। पर चूँकि हमें अपना कुछ नहीं पता तो हमें दूसरे का भी क्या पता होगा।

अपना भी हाल जानने के लिए बहुत मेहनत नहीं चाहिए। ऑंखें खोलकर बस देखना होता है। आँकड़े देखो। और बहुत तरह के आँकड़ें उपलब्ध हैं। मैं बहुत अहमियत देता हूँ आँकड़ों को, फैक्ट्स एंड फिगर्स को। मैं कहता हूँ कि देखो दिन कहाँ जा रहा है। साफ़-साफ़ कितने घण्टे कहाँ लगाए, बताओ? मैं कहता हूँ कि देखो तुम्हारा धन कहाँ जा रहा है। कितना कमाते हो और कहाँ लगाते हो, बताओ? ये सब आँकड़ें ही सामने रख लो तो चीज़ें साफ दिखाई दे जाती हैं।

एक बार साफ दिखाई देने लग गया कि तुम्हारी हालत क्या है तो मैं कह रहा हूँ, उसके बाद धोखे में जीना मुश्किल हो जाएगा, फ़िर बड़ा दुःख उठेगा। और जो दुःख की आग होगी, यह तुमको बदल डालेगी, पिघला देगी।

जीवन में परिवर्तन का और कोई तरीका ही नहीं है। शुरुआत ही अपनी ज़िंदगी के तथ्यों से करनी पड़ेगी। तुम्हारे तथ्यों में अगर सबकुछ ठीक ही है तो किसी बदलाव की ज़रूरत क्यों? तो बदलाव की ज़रूरत ही तुम्हें तभी पता चलेगी न जब तुम पहले अपने जीवन के तथ्यों को देखोगे और वहाँ बड़ी गड़बड़ पाओगे। तभी तो तुम बदलाव के लिए प्रेरित होओगे न। बहुत सीधी सी चीज़।

हमें नहीं पता तथ्यों का। हम अपने मन की ओर देखना ही नहीं चाहते। कुछ दिख भी जाता है तो हम उसकी अवहेलना कर देते हैं, अनदेखा करते हैं। घंटी बजी, तुम्हारा दिल धक्क से हो गया। फ़ोन आया, किसी का नंबर दिखाई दिया फ़ोन पर, तुम बिलकुल चौंक गए। यह सब छोटी-छोटी घटनाएँ तुम्हें तुम्हारे अंतर्जगत का पूरा हाल बता देंगी। बस जब यह घटनाएँ घटें तो इनको अनदेखा मत किया करो। थोड़ा ठहरा करो और पूछा करो कि कुछ बात होगी, “मैं इतना डर क्यों गया अचानक? मुझे सदमा सा क्यों लग गया? यह पसीना क्यों उभर आया परेशानी पर?” यह होता है कि नहीं होता है?

हम तो अपने सपनों पर भी ध्यान नहीं देते। रात में कई-कई दफ़े अचानक नींद खुल रही है घबरा करके, पसीने से लथपथ, और हम पूछते ही नहीं हैं कि क्या छुपा हुआ है चित्त में जो रात में सपनों में उभरकर आता है। कौन सा पुराना दरिंदा? कौन सा आदिम डर? हम यूँ आगे बढ़ जाते हैं जैसे हमने कुछ देखा ही नहीं, जैसे हमें कुछ अनुभव ही नहीं हुआ।

जिनको सगा मानते हो, उनकी बेवफाई साफ़ दिख भी जाती है, उनका स्वार्थ बिलकुल स्पष्ट प्रकट भी हो जाता है तो भी यूँ दिखाते हो कि जैसे सब सामान्य है। क्या सब सामान्य है? सब ठीक है? क्या तुमने साफ़-साफ़ देखा नहीं कि जो तुमसे जुड़े हुए हैं, कितने स्वार्थों के कारण जुड़े हुए हैं? इसी को कहते हैं जीवन के हालचाल से परिचित होना।

मुश्किल है क्या? सब दिखेगा, साफ़ दिखेगा। कहाँ से दिखेगा? आँखों से ही दिखेगा। नीयत होनी चाहिए देखने की। अरे, जाँच पड़ताल तो करो। यूँ ही माने बैठे हो कि तुम स्वस्थ हो, स्वस्थ हो। जाओ न ज़रा पैथालॉजी * । जाँच करवाओ, * रिपोर्ट लेकर आओ, आँकड़ें बताएँगे कितने स्वस्थ हो।

बताओ दिल का क्या हाल है? बताओ कोलेस्ट्रॉल , बताओ ट्राइग्लिसराइड्स * । बताओ * लिवर का क्या हाल है? एस.जी.ओ.टी बताओ, एस.जी.पी.टी बताओ। बताओ न, माने ही क्यों बैठे हो? कह रहे हो आँख ठीक है, आँख ठीक है। जाओ ज़रा, आँख का परीक्षण तो कराओ। नहीं-नहीं, हमारे दाँत तो बहुत मज़बूत हैं। कितने साल पहले तुमने किसी डेंटिस्ट को दिखाए थे? वह बताएगा न कि तुम्हारे दाँतों की जड़ों में क्या लगा हुआ है।

हमें तो कैंसर का भी पता तब चलता है जब बिलकुल आख़िरी तल पर पहुँच गया होता है। हम तो यही माने बैठे होते हैं कि हम तो स्वस्थ हैं, हमें कुछ है ही नहीं। इसे कहते हैं जीवन की तथ्यों की उपेक्षा करना। हम पता ही नहीं करना चाहते कि हमारा हाल वास्तव में क्या है। तब ज़िन्दगी झटके दे देती है।

“मेरी गाड़ी तो बिलकुल ठीक है!” कभी वर्कशॉप में उसकी जाँच करवाई है? लेकर निकल पड़े उसको, चढ़ जाएँगे बिलकुल पहाड़ पर, और रास्ते में दे गई धोखा। दे दिया न ज़िन्दगी ने झटका? तुम तो कल्पनाओं में ही थे कि “मेरी गाड़ी तो बिलकुल मस्त है!” लग गया न झटका? ज़रा जाँच तो करवा लो।

हम जाँचते ही नहीं। हम प्रयोग नहीं करते, हम परीक्षण नहीं करते। हम में जिज्ञासा नहीं, हम मान्यताओं पर चलते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं है हमारा, खोजी की दृष्टि नहीं है हमारी। हम अंधविश्वासी हैं।

जिनके लिए ज़िन्दगी गुज़ार रहे हो, मुझे बताना उनसे बेबाक दो टूक बात कब करते हो? करते हो क्या कभी? जो जीवन के अहम मसले होते हैं, उनको तो तुम अपने स्वजनों के साथ कभी उठाना ही नहीं चाहते; क्योंकि पता है यह मुद्दे उठे नहीं कि रिश्ता ख़तरे में पड़ जाएगा।

इधर-उधर की, व्यर्थ की सारी बातें कर लोगे, गोभी-बैंगन, मटर-टमाटर, ये भी बातें कर डालोगे। पैंट-सूट, कुर्ता-पजामा, ये बातें खूब चलेंगी। चलती हैं न? दिन-रात यही बातें करते हो अपने प्रियजनों के साथ। असली बातें नहीं करते। असली बातें करी नहीं कि तथ्य उघड़कर सामने आएँगे। उसी दिन, उसी रात रिश्ते पर चोट पड़ जाएगी। इसको कहते हैं जानबूझकर सच्चाई से बचना, मुँह चुराना।

जो सच्चाई से मुँह चुराकर जी रहा है, वह तो दुनिया में ही बेवकूफ बना हुआ है, उसे दुनिया से मुक्ति क्या मिलेगी। जो इस लोक में ही अँधा जीवन जी रहा है, उसे कौन से परलोक की प्राप्ति होनी है, कौन से सतलोक की प्राप्ति होनी है? जो तथ्य ही नहीं जानता, उसे सत्य क्या मिलेगा!

खोजी बनो, जिज्ञासु बनो, सवाल बहुत सारे पूछा करो। लगातार प्रयोग करो, परीक्षण करो, खुदाई करो, अन्वेषण करो। मान मत लो। पूछते रहो, पूछते रहो जब तक स्पष्ट ही ना हो जाए कि मामला साफ दिख रहा है। एक वैज्ञानिक का, एक खोजी का, एक शोधकर्ता का रवैया रखो जीवन में। श्रद्धा बहुत बाद की बात है। पहले संदेह करना सीखो। सोचना सीखो, ज़रा दिमाग लगाया करो। निर्विचार बहुत आगे की बात है। विचार करो, गहन विचार करो, सोचो-समझो।

छोटे बच्चे की तरह मत जियो कि चंदा मामा की कहानी सुना दी। बड़ी सुखदायक कहानी थी। ‘चंदा मामा दूर के, पुए पकाए पूर के। आप खाएँ थाली में, मुन्ने को दें प्याली में।’ आहाहाहा, चंदा मामा दूर के… (लोरी गाते हुए)

हममें से ज़्यादातर लोग ऐसे ही हैं, ‘नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए’। और इन मान्यताओं, इन कल्पनाओं में बड़ा आकर्षण है, क्योंकि इन मान्यताओं के साथ कुछ करना नहीं पड़ता न।

“वह कौन है?”

“वह चंदा मामा हैं।“

चंदा मामा हैं, हमारे ही तो हैं! अब चंद्रयान की क्या ज़रूरत है? अब कौन बने वैज्ञानिक, कौन मेहनत करे और कौन इतना बड़ा रॉकेट विकसित करे?

‘चंदा मामा दूर के, पुए पकाए पूर के।’ “हमें तो अब पता ही है चंदा के बारे में। कौन है चंदा? अरे! मामा है। अपने मामा के बारे में क्या खोजबीन करनी? मामी का पति है; माँ का भाई है। माँ को हम जानते हैं कि नहीं जानते हैं! अरे, यही मइया जो घर में है, इसी का भइया है। मइया का भइया – चंदा। अब उसके बारे में क्या परीक्षण करना है? कौन सा मून मिशन ? जैसी मइया, मइया का भइया, चंदा मामा।“

हम सब ऐसे ही, ’जैक एंड जिल वेन्ट अप द हिल’ * । आम आदमी की ज़िन्दगी बिलकुल ऐसी ही है, * नर्सरी राइम्स , परी कथाएँ। ‘हम जिस घर में रहते हैं, उसे प्यार का मंदिर कहते हैं’, फिल्मी गाने। थोड़ा खोजबीन करो, ज़रा देखना प्यार कितना है और दैवीयता कितनी है तुम्हारे घर में। और तुम तो उसे प्यार का मंदिर बता रहे हो।

मान्यताएँ आसान होती हैं न; क्योंकि मान्यताएँ तुम्हारे आलस में मददगार बनती हैं। एक बार तुमने कह ही दिया कि चंदा को जानते हो, अब क्या ज़रूरत है चाँद पर जाने की? एक बार तुमने कह ही दिया कि “मेरा घर तो प्यार का मंदिर है”, अब ज़रूरत क्या है घर को सुधारने की?

और लाज भी आती है मानने में कि मेरा घर वास्तव में नर्क है। बड़ी लाज आती है क्योंकि सब अड़ोसी-पड़ोसी सब यही बता रहे हैं कि उनका घर भी प्यार का मंदिर है। अब पूरा मोहल्ला ही प्यार के मंदिरों से भरा हुआ है, और तुम बोलो कि “मेरा घर तो नरक है”, तो बड़ी लाज आएगी। कहोगे, “हम ही पीछे रह गए।” लेकिन जो मान लेगा कि उसका घर नर्क है, उसके साथ कुछ संभावना बनेगी कि वह नर्क को सुधार ले। जो प्यार का मंदिर, प्यार का मंदिर ही बताता रह जाएगा, उसका नर्क स्थाई हो जाएगा।

मान्यताएँ, मान्यताएँ...

“वह घर पर न वैफ है, वैफ (पत्नी)।”

“तो?”

“नहीं, मुझे जाना है।”

“क्यों?”

“नहीं, वह मुझसे बहुत प्यार करती है न।”

इस शिविर से ही कई लोग बीच में भग गए। किसी का वैफ , किसी का हसबैंड * । नहीं * हसबैंड (पति) नहीं, हैसबेंड * * वैफ और हैसबेंड * । ऐसा तो होता है न। * वैफ माने वह जो तुमसे बहुत प्यार करती हो और हैसबेंड माने वह जो तुमसे बहुत प्यार करता हो। करते हैं क्या? या बस परीकथा? और जो तुमको शिविर से उठा ले गया, वह प्रेम करता है तुमसे या तुम्हारा जानलेवा दुश्मन है?

मान्यताएँ, मान्यताएँ...

“नहीं, कैसा चल रहा है?”

“नहीं, हमारी तो सेटल्ड लाईफ है। वैफ है, दो बच्चा है।”

“तो?”

“नहीं, यह तो अच्छा होता है न?”

“इसी को तो गुड लाइफ बोलता है। हम हैं, हमारा वैफ है और दो बच्चा है।”

“नहीं, तुम्हें कैसे पता कि यह सब ठीक है?”

“नहीं, यही तो ठीक होता है न?”

“अरे, किस कबीले से उठकर आ रहे हो? कितना अंधविश्वास है तुममें? तुम्हें कैसे पता कि यह सब ठीक है?”

“नहीं, यह तो ठीक होता है न। हासबेंड है, वैफ है, दो बच्चा है। गुड जॉब (अच्छी नौकरी) है।”

“तुम्हें कैसे पता कि यह सब ठीक है?”

“नहीं, यही सब तो ठीक होता है न।”

“मालिक, आप मेरा सवाल ही नहीं समझ पा रहे। तुम्हें कैसे पता कि यह ठीक है?”

“नहीं, हमें ऐसा ही बताया गया है। यह है तो ठीक है। गवर्नमेंट जॉब है। गवर्नमेंट जॉब तो अच्छा होता है। वैफ हमारे ही कास्ट का है, तो अच्छा होता है।”

“और?”

“दो बच्चा है, दो। अच्छा होता है। तीसरा आने वाला है, वह और अच्छा होगा।”

“तुम्हें कैसे पता कि यह सब अच्छा है?”

“नहीं, यही सब तो अच्छा होता है न।”

“अच्छा ठीक है, भाई। माफ़ करो, तुमसे नहीं जीत पाऊँगा। अब मैं हट रहा हूँ।”

तथ्यों में जीने का मतलब होता है कि साहब, पता तो करिए मन का मौसम कैसा है। पता तो करिए आप जिस परिवेश में जी रहे हैं, जो जीवन जी रहे हैं, उसमें आपकी वास्तविक हालत क्या है।

मैं छोटा था, मैंने बर्मा या अफ्रीका के किसी कबीले की एक स्त्री की तस्वीर देखी, उसकी गर्दन इतनी लंबी कर दी गई थी। बचपन से ही उसके गले में पहना दिए जाते थे रिंग्स , चूड़ियाँ, कड़े। बचपन में गर्दन कैसी थी? पतली। तो पतली एक चूड़ी डाल दी गई। अब गर्दन मोटी नहीं हो सकती, कई सारी चूड़ियाँ पहना दी गई हैं। गर्दन अब मोटी नहीं हो सकती, कई सारी चूड़ियाँ पहना दी गई हैं। गर्दन अब मोटी नहीं हो सकती तो गर्दन क्या करेगी? गर्दन लम्बी हो जाएगी।

और इसी बात को वहाँ सुंदरता मान लिया जाता था। और यह बात वैज्ञानिक रूप से भी घातक है। तुम्हारी गर्दन के साथ कुछ अप्राकृतिक कर दिया गया। हम ऐसे ही जीते हैं। हम सब ने अपनी-अपनी गर्दनें दो-दो फुट लंबी करवा रखी हैं और हम बोल रहे हैं कि ऐसा ही तो होता है।

बचपन में गाँव इत्यादि जाता था, वहाँ देखता था, बड़ा अचंभा होता था। औरतों के कान इतने-इतने लंबे। उनके ये मोटे-मोटे कान में झुमके लटक रहे हैं, उसकी वजह से कान यहाँ तक आ गया है बिलकुल, गले तक। और यह बात बड़ी सुंदरता की मानी जाती थी। और कान फटा हुआ है।

मुझे भी ताज्जुब हो, किसी को अपना कान फड़वाने में सुख कैसे हो सकता है? पर यही बात बड़ी अच्छी है, और बड़े सौंदर्य की मानी जा रही है। हम ऐसा ही जीवन जीते हैं। हम एम.एससी. हो सकते हैं, हम एम.ए. हो सकते हैं, हम एम.बी.ए. हो सकते हैं, हम पी.एच.डी. हो सकते हैं, हम विदेश से एम.एस. हो सकते हैं, पर हम अंधविश्वासी लोग हैं; क्योंकि हमें अपने ही जीवन का कुछ पता नहीं।

जो बाहर के तथ्यों में नहीं जी रहा, उसके साथ ख़ौफ़नाक बात यह होती है कि वह अंदर के तथ्य में नहीं जीता, वह अपने ही अनुभवों से बेगाना हो जाता है, अपरिचित और नावाकिफ़ हो जाता है। उसे यह पता ही नहीं होता कि उसे कैसा लग रहा है।

सोचो, यह कितनी ज़्यादा भयानक बात है, है कि नहीं? तुम्हें यही पता लगना बंद हो जाए कि तुम्हें कैसा लग रहा है। तुम इंसान ही नहीं बचे, तुम्हारी चेतना ही मर गई। अब तुम्हें पता ही नहीं लगता कि तुम्हारे भीतर क्या गुज़र रही है, अब जैसे कि तुम एक निरंतर नशे की हालत में हो जिसमें तुम्हें कुछ होश ही नहीं आता। तुम सपनों में हो, तुम्हारी छाती पर साँप लोट रहा है, तुम्हें पता ही नहीं चल रहा।

अध्यात्म का अर्थ यही है – सपनों से बाहर आओ, भाई। अपनी हालत को देखो ताकि अपनी हालत को सुधार सको।

यही श्रीकृष्ण का संदेश है इस अध्याय में।

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