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संतों ने बार-बार किस 'मरण' के गीत गाये हैं? || आचार्य प्रशान्त, युवाओं के संग (2014)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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बिरहिन ओदी लाकड़ी, सकुचे और धुधुआए। छूट पड़े या विरह से, पूरी ही जरि जाये।।

आचार्य प्रशांत: (आचार्य जी ने उपरोक्त दोहा बच्चों को लिखवाया) थोड़ा सा मज़ेदार है। बॉन-फायर करी है? बॉनफायर में जो लकड़ी डालते हो और वो गीली हो, तो क्या होता है?

श्रोता१: आवाज़ करती है। (आचार्य जी अस्वीकृति में सिर हिलाते हैं)

श्रोता२: धुआँ देती है।

आचार्य: धुआँ देती है जमकर। अब जब धुआँ दे रही है, तो साथ में थोड़ा-थोड़ा जल भी रही है। वरना बिना जले धुआँ नहीं दे सकती। पर पूरी तरह जलती भी नहीं रही है वह। बहुत देर तक धुआँ देती है। बड़ा गंदा धुआँ देती है। गीली लकड़ी का धुआँ आँख में लगता है। कबीर कहे रहे हैं कि जैसे गीली लकड़ी होती है न, जलना तो उसको पड़ेगा, पर वो जलने को तैयार नहीं है। इसीलिए जो काम उसका पाँच मिनट में हो जाता कि जलकर ख़त्म हो जाती, पाँच घंटे तक वो सकुचाती रहेगी। सिर्फ़ धुधुकति रहेगी, सहती रहेगी।

कबीर कहे रह हैं— “बिरहिन।” बिरहिन मतलब जो अपनेआप से, जो अपनी एसेंस (सार) से अलग है — विरह है जिसको। विरह माने सेपरेशन। बिरहन मतलब जो सेपरेशन में है। जो अपनी ही एसेंस से दूर है। जो अपने ही से करीब नहीं है। ओदी माने गिली। लाकड़ी मतलब लकड़ी। तो वो कहे रहे हैं कि अरे! तू अपनेआप से ही दूर है।

उन्होंने उसका इशारा किया है, प्रतीक है। इशारा इंसान की ओर है। पानी उसका अहंकार है, ईगो है। कह रहे हैं कि तू अपनेआप से ही दूर है, इसीलिए तू इतना सकुचाता रहता है और इसी कारण बस धुधुआता है। धुधुआता माने धुआँ दे रहा है। क्योंकि तू हैज़िटेट (झिझकना) बहुत कर रहा है। कूद जा! कूद जा! ‘छूट पड़े या विरह से’। इस विरह से तुझे मुक्ति मिल जाएगी अगर तू…?

श्रोता१: कूद जाए।

आचार्य: अगर तू…?

श्रोता२: पूरी ही जल जाए।

आचार्य: पूरी ही जल जाए। कह रहे हैं, 'जलना तो तुझे पड़ेगा। तू जल जा पूरी तरह से। तू क्यों रेज़िस्ट (विरोध) कर रही है। ना कर रेज़िस्ट। जल जा! प्रतिरोध छोड़! पूरा जल जा।'

प्र१: हमें ही जलना पड़ेगा?

आचार्य: (स्वीकृति में सिर हिलाते हैं) अब देख रहे हो बर्बाद होना? अब इसी पर लिखो अगला। (आचार्य जी बच्चों से श्लोक लिखो आते हैं) ‘जिन डूबा तिन पाइयाँ’। जो डूबता है वही पाता है। ‘जिन खोजा तिन पाइयाँ’। इसी का दूसरा वर्ज़न (संस्करण) कहता है— “जिन खोया” — ये भी चलता है।

जिन डूबा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ। जो बौरा डुबन डरा, रहा किनारे बैठ।।

क्या अर्थ है इसका ?

श्रोता: (श्रोतागण एक साथ बोलते हैं) जो कूद पड़ा उसे मिल गया और जो बाहर बैठा है बैठा ही रह गया, उसे नहीं मिला।

श्रोता: सुनो, जोक (मज़ाक) कर रहे हैं सर।

आचार्य: बात समझ में आ रही है?

श्रोतागण: यस, सर।

आचार्य: तो डूब जाओ, मर जाओ। (मुस्कुराते हैं)

श्रोतागण: (पुनः सभी श्रोतागण एक-एक कर बोलते हैं) नहीं। सर डूब के थोड़ी मरना है ? तैरो, उसका आनंद भी तो ले सकते हैं?

आचार्य: अब मैं तुम्हें और क्लियर कर देता हूँ, लिखो— (आचार्य जी दूसरा श्लोक लिखवाते हैं) ‘मरण-मरण सब करे’, ताकि तुम्हें कोई शक न रह जाए कि डूबने का अर्थ क्या है— मरण-मरण सब करें, मरण न जाने कोय — बात करते हो पर तुम्हें मरना आता नहीं है।

श्रोता: मरने का मतलब नहीं पता।

आचार्य: लिखो— मरण मरण सब करें, मरण न जाने कोय। मैं कबीरा ऐसा मरा, दूजा जन्म न होय।।

तो ऐसा मरो कि अब उसके आगे दुबारा जो मरा है, उसके उठने कि गुंजाइश ही न रहे। कौन मरा है? कौन मर सकता है? वही जिसे ज़िंदा होने का भ्रम है। कौन? वही मर सकता है जिसको लगता है कि मैं पैदा हुआ हूँ।

श्रोता: ईगो।

आचार्य: हाँ। तो बातें तो तुम करते हो कि मर जाएँगे, मर जाएँगे, पर तुम्हें मरने का कुछ नहीं पता। तुम मरके तो देखो, बहुत मज़ा आएगा। (श्रोतागण और आचार्य जी प्रेम पूर्ण वार्तालाप करते हैं)

लिखो फिर। लिखो, लिखो अभी मज़े लिखो। तुम एक ही मरना जानते हो कि शरीर जल गया। एक मरना दूसरा भी होता है। (आचार्य जी बोल बोल कर लिखवाते हैं) मरो हे जोगी मरो, मरो हे जोगी मरो। मरो मरण है मीठा।

प्रश्नकर्ता: सर, सुसाइड करने की बात हो रही है क्या?

आचार्य: अरे! समझो भाई ये किस मरने कि बात हो रही है। वैसे नहीं मरते। ऐसी मरनी मरो, ऐसी मरनी मरो, जिस मरनी गोरख मर जिठा। (आचार्य जी अगली पंक्ति लिखवाते हैं) ये गोरख का है। वो वाली मरनी मरो जिसको मरने के बाद गोरख दुबारा ज़िंदा हो गया। ‘मर जिठा’। मरकर दोबारा ज़िंदा हो गया।

हम तो मुर्दा ही हैं, अपनेआप को ज़िंदा समझते है। वो कहे रही हैं, 'वो वाली मरनी मरो जिसके बाद असली जीवन शुरू हो जाता है।' अभी तो तुम मुर्दा हो। तुम्हें लगता है तुम ज़िंदा हो — सिर्फ़ कण्डीशन्ड (संस्कारित) मशीन (यंत्र) हो। वो कहे रहे हैं, 'मरो। मरने में बहुत मज़ा है।' एक बार मर जाओ फिर असली ज़िंदगी शुरू होगी। ‘ऐसी मरनी मरो, जिस मरनी गोरख मरजिठा। मरो रे जोगी मरो, मरो मरण है मीठा।’

प्र: ईगो को मारो?

आचार्य: वो तुम हो पूरे। तुम ईगो (अहंकार) के अलावा कुछ हो नहीं। तो मरना विज़डम (बुद्धिमत्ता) में बहुत सेक्रेड (पवित्र) शब्द है। सारी कोशिश ही यही है कि किसी तरह से मर जाऊँ बस। किसी तरह से मर जाऊँ।

प्र: सर कोशिश…?

आचार्य: क्योकि तुम जहाँ बैठे हो, तुम्हारी ज़िन्दगी में तो कोशिश के अलावा कुछ है नहीं। तो वो भी —हमने कहा था न — ध्यान भी पहले विचार होता है।

प्र: हाँ, वही कह रहा हूँ, सर। आज तक तो हमने कुछ नहीं करा।

आचार्य: हाँ, शुरुवात वही से होगी। मैं उसको बिलकुल नकार नहीं रहा हूँ।

प्र: जब हमने कुछ नहीं करा, तो हम कोशिश भी क्यों करते हैं?

आचार्य: ये तुम्हें लगता कहाँ है बेटा, मेरे बताने से थोड़ी हो जाएगा। जिस क्षण तुम्हें ये लगे कि मुझे वास्तव में सब मिला है क्षण तुम वैसे भी कोशिश नहीं करोगे। पर अब तुम्हें क्या लगता है लगातार कि नहीं मिला। तो अभी तो कोशिश ही करो! पर वो कोशिश दो दिशाओं में जा सकती है। एक दिशा ये होती है कि नहीं मिला है तो और पा लूँ — एक डिग्री और ले लूँ, थोड़े पैसे और ले लूँ।

और दूसरी कोशिश ये होती है कि इस ना मिलने में सच्चाई कितनी है —मैं इस बात को जानूँगा — कौन कह रहा है कि नहीं मिला है। ये किसको इतनी भूख लगती है। ये है कौन?

प्र: सर, पर हमारी रिक्वायरमेंट (ज़रूरत) तो बॉडी (शरीर) की है, पर यहाँ पर ईगो की बात हो रही है।

आचार्य: बॉडी (शरीर) क्या है ये भी समझना पड़ेगा न? बॉडी और मन कोई अलग चीज़े थोड़ी हैं। स्पेस (जगह) अगर मन है तो बॉडी कहाँ है?

श्रोता: स्पेस में।

आचार्य: तो बॉडी भी क्या है ?

श्रोता: स्पेस। आपने एक तरह से एक स्पेस ओक्यूपाई (व्याप्त/कब्जा करना) कर रखी है जिसको आप एक तरह से…।

आचार्य: ओक्यूपाई कुछ नहीं कर रखी है। आप स्पेस प्रोजेक्ट (प्रक्षेपिक) करते हो। स्पेस कोई होती थोड़ी ही है। स्पेस कोई है थोड़ी ही। जैसे आपने वो पेंटिंग बनाई न मैंने बात इतनी ही बोली थी कि — ' पेंटिंग बनाई पेंटर ने खुद ही और डर गया।' अब मैंने उसके आगे कि बात बोल रहा हूँ, 'वो पेंटिंग जिस स्पेस में बनाई जाती है, वो स्पेस भी तुम्हीं बनाते हो।' ये कमरा और कहीं नहीं हैं तुम्हारे दिमाग में है, खोपड़े में है। तुम इस कमरे में नहीं हो ये कमरा तुम में है। तुम्हारे दिमाग में है। तो बॉडी मत पूछो कि बॉडी मरती है कि नहीं मरती। बॉडी है ही नहीं।

श्रोता: तो ये सब कुछ मेट्रिक्स वाली बात है, एनर्जी का खेल है?

आचार्य: एनर्जी (ऊर्जा ) भी तब होती है जब स्पेस हो। एनर्जी का क्या अर्थ है? जब कोई ओब्जेक्ट (वस्तु) मूव (हिले) करे तो तुम कहते हो एनर्जी है। ऑब्जेक्ट ही नहीं है, क्योकि ऑब्जेक्ट के लिए स्पेस चाहिए, तो एनर्जी कहाँ से आ गई। एनर्जी भी नहीं है। कुछ नहीं है। जो कुछ तुम सोच सकते हो वो कुछ नहीं है।

प्र: ये माइंड (मन) के सब प्रोजेक्शन (प्रक्षेपण) हैं?

आचार्य: जो भी तुम सोच सकते हो वो मेन्टल (मानसिक) है — याद रखना। तुम जिस भी चीज़ को फॉर्मूले (सूत्र) में कैद कर सकते हो, वर्ड्स (शब्दों में) में कहे सकते हो वो सब मेंन्टल ही है।

श्रोता: अच्छा, तो कुछ फ़ायदा ही नहीं है?

आचार्य: फ़ायदा इतना ही है कि अगर मेन्टल दुनिया में रह रहे हो तो याद रहे हमेशा — कहा था न वो बिंदु — वो बिंदु बना रहे , जिसको अच्छे से पता रहे कि ये सब क्या हो रहा है — उसको अच्छे से पता रहे।

श्रोता: सर, आपने एक बार बोली थी कि अगर आपके सामने ईंट के ऊपर ईंट, ईंट के ऊपर ईंट, ईंट के ऊपर ईंट रख-रखकर बना रहे हो और वो भी आपने सोच रखी है कि वो ईंट है, तो मतलब जो ज़मीन हम देख रहे हैं वो जमीन है ही नहीं? तो अर्थ जो है वो अर्थ है ही नहीं?

आचार्य: (अस्वीकृति में सिर हिलाते हैं) यूनिवर्स ही नहीं है अर्थ (पृथ्वी) कहाँ से आ गया। स्पेस और टाइम ही ह्यूमन (मनुष्य) माइंड (मन) है, तो कहाँ से अर्थ और ईंट तो बहुत छोटी चीज़ है।

प्र: सर, तो बाहर कुछ है ही नहीं?

आचार्य: ये सब तुमने फेंक रखा है बाहर।

प्र: सर, एक घंटे में साठ मिनट भी बनाएँ हो सकते हैं। अस्सी कर लो, सौ कर लो। यहाँ जो बनाए हो सकते हैं? (आचार्य जी स्वीकृति में सिर हिलाते हैं)

प्र: सर, ये तो समझ में आता है, पर ये स्पेस का सीन समझ में नहीं आता।

आचार्य: तुमने करे से नहीं करा है। देखो, एक होता है कॉन्ससियस माइंड (सचेत मन) और एक होती है वृत्ति अनकॉन्ससियस (अवचेतन) । ये सब तुम्हारी डीपेस्ट फिज़िकल कंडीशनिंग (गहरे शारीरिक संस्कार ) है। डीपेस्ट। इसको तुम बदल नहीं सकते। क्या तुम अपने चाहने से अपनी तीन आँखे कर सकता हो? तो फिर तुम अपने चाहने से वो बिल्डिंग कैसे बदल दोगे? ये तुम्हारी डीपेस्ट फिज़िकल कंडीशनिंग है। ये बदली नहीं का सकती, पर इसे समझा जा सकता है। इससे मुक्त हुआ जा सकता है।

प्र: सर, अगर मुक्त हो गए जो कुछ चल रहा है उससे, तो क्या होगा? क्योंकि कुछ तो है ही नहीं।

आचार्य: अभी से पता है तुम्हें, मुक्त हो गए हो? तो फिर क्यों कल्पना कर रहे हो कि क्या हो जाएगा। तो कैसे पता तुम्हें? 'अब बर्दाश्त नहीं होता। यही कमी रह गई थी कि हम है ही नहीं, कि शरीर है ही नहीं। इतना सारा शरीर मैंने क्यों कमाया? ये सुनने के लिए कि मैं हूँ ही नहीं।' तो गड़बड़ हो गई।

प्र: सर, आपने पहले भी ऐसे कहा था कि हमारा कुछ है ही नहीं। इंटेलिजेंस (बुद्धिमत्ता) भी हमारी नहीं है।

आचार्य: हाँ, हमारा बस ये विचार है कि हम हैं। उसको लेकर हम घूम रहे हैं। जैसे कि एक आदमी कि जेब खाली हो, पर उसको ये भरोसा दिलाया जाए कि उसमें करोड़ों हैं और वो घूम रहा हो। हमारा बस वो है, वो विचार कि हम हैं। है कुछ नहीं। एक थॉट (विचार) है कि है। मज़ेदार है न, सुकून रहता है कि कुछ है। ऐसा लगता है अच्छा-अच्छा कुछ होगा ज़रूर। और फिर चेक (जाँच) भी नहीं करते हैं कि अगर न निकला तो मेरा क्या होगा। तो इसीलिए माने रहो कि कुछ है।

श्रोता: उसमें ही जीते रहो। और फिर उसमें लिमिटेड (संकुचित) की बात हो जाती है।

आचार्य: अरे! भाई लिमिटेड तुम कभी नहीं सोचते। तुम ये सोचते हो कि सिक्योरिटी (सुरक्षा) है। ये कहाँ कहते हो कि लिमिटेड हूँ। कहते हो 'कुछ तो है न।'

श्रोता: कुछ तो है जिसके नियम हैं।

आचार्य: ये पक्का समझ लो जो भी कभी अपनी ओर देखना शुरू करता है उसकी ज़िन्दगी हमेशा उन लोगों से बेहतर होती है जिनको अपना कुछ पता ही नहीं है। तो कन्फ़्यूज़न (उलझन) सामने आए या पेन (दर्द) सामने आए या रजिस्टेंस (प्रतिरोध) सामने आए, तो या थोड़ा सा ये लगे कि यार और कोई तो परवाह करता ही नहीं हम ही ये सब बातें क्यों सोचें।

प्र: हाँ, सर। जब सभी चीज़े सही चल रही है, सब मस्त चल रहा है, तो हम ही क्यों सोचें हम अलग क्यों जाएँ?

आचार्य: हाँ, दुनिया मस्त है, हम ही क्यों कहे रहे है कि ये सब नकली है, ये है वो है। इन बातों को अभी थोड़े समय के लिए कहो कि ' प्लीज़ वेट! यू विल गेट द आंसर्स। ' (कृपया रुके! आपको उत्तर मिल जाएँगे) थेन यू विल आल्सो स्टार्ट नोइंग व्हेदर पीपल आर एक्चुअली गुड। (तब आप ये भी जानना शुरू कर देंगे कि क्या लोग वास्तव में अच्छे हैं)

श्रोता: राइट। (सही हैं)

आचार्य: राइट नहीं। व्हेदर दे आर एक्चुअली जॉयफुल इन देमसेल्व्स। (क्या वे वास्तव में अपनेआप में आनंदित हैं) हो सकता है कि जो लोग ऊपर-ऊपर से तुम्हें दिखते हों कि मस्त है, उनके अंदर ही अंदर क्या चल रहा है तुम न जानते हो।

श्रोता: और वो आपके सामने नहीं बोलते। जब आप अपनेआप में थोड़े शांत हो जाते हैं तो वो भी थोड़ा-थोड़ा अपना बोलना शुरू कर देते हैं के ये हो रहा है, ये हो रहा है।

आचार्य: हाँ। तो अभी बस उस सवाल को थोड़ी देर के लिए रोक दो। बोलो, ' आय विल कम टू यू (मैं आता हूँ तुम्हारे पास)। वी आर फ्रेंड्स बट प्लीज़ वेट फॉर अ व्हाइल आय एम बिज़ी विथ समथिंग।' (हम दोस्त हैं लेकिन कृपया थोड़ी देर रुकें, मैं किसी काम में व्यस्त हूँ) एंड देन स्लोली यू विल सी व्हाट देट क्वेश्चन इज़ द रिएलिटी। (और फिर धीरे-धीरे आप देखेंगे कि कौन सा प्रश्न वास्तविकता है)

प्र: सर जब आप राइट (सही) रॉन्ग (ग़लत ) को नहीं मानते, तो जॉय (आनंद) और सैडनेस (दुःख) को क्यों मानते हो?

आचार्य: क्योंकि जॉय (आनंद) का अपोज़िट (उल्टा) सैडनेस (दुःख) नहीं है। जॉय (आनंद) का कोई अपोज़िट होता नहीं। हैप्पीनेस का ऑपोजिट है सैडनेस। जॉय का अपोजिट नहीं है। जॉय डुअलिटी (द्वैत) से बाहर है। जॉय वो बिंदु है जो नॉन-ड्यूल (अद्वैत) है। जॉय , फ्रीडम ट्रुथ (सचाई) इनके कोई ऑपोज़िट नहीं होते।

प्र: सर, ट्रुथ का?

आचार्य: ट्रुथ का कोई अपोजिट नहीं होता, जॉय का कोई ऑपोजिट नहीं होता।

प्र: आपका मतलब है कि इन प्रश्नों को हम बोल दे कि अभी रुक जाओ बाद में हम तुमको उत्तर देंगे।

आचार्य: इनको ये बोलो कि तुम्हारा आंसर (उत्तर) किसे देना है। तुम क्वेश्चन (प्रश्न) हो , तुम्हारा आंसर कौन देगा? मैं। मैं अगर कन्फ्यूज़्ड माइंड के साथ आंसर दूँगा, तो वो कैसा आंसर होगा? कन्फ्यूज़्ड ही होगा। (उलझा हुआ) तो मुझे थोड़ा सा मन सुलझा लेने दो, क्योंकि आंसर तो इसी मन से आना है न। अगर मन उलझा हुआ रहेगा तो आंसर भी कैसा रहेगा? तो तू थोड़ा सा वेट (रुक) कर ले, मन सुलझाकर आता हूँ।

श्रोता: सर, ये बात मैंने भी नोटिस की है कि अलोननेस का मन ज़्यादा करता है। मतलब अच्छा लगता है। आपनेआप में रहने में ज़्यादा मज़ा आता है। कुछ बात करने को नहीं है। आप बस देख रहे हो मज़े कर रहे हो।

प्र: मेरे मन में ये आता है कि सब कुछ चल तो रहा है। ठीक ही तो चल रहा है।

आचार्य: अभी तुम्हें पता नहीं है कि ठीक चल रहा है कि नहीं। क्योंकि पता लगने वाला भी कौन है, किसे पता लगेगा?

श्रोता: ठीक की परिभाषा को भी सही करना पड़ेगा।

आचार्य: हाँ। बहुत बढ़िया। (श्रोता को संबोधित करते हुए) ठीक के परिभाषा भी तो तुम्हारा मन है, न? हो सकता है ठीक की परिभाषा ही बदल जाए। तो अभी कहो कि रुक जा, अभी तो मुझे कुछ पता नहीं। थोड़ा इसको साफ़ कर लूँ, थोड़ा अपना मिरर (आईना) साफ़ कर लूँ तभी तो साफ़-साफ़ दिखेगा न।

प्र: सर, ये साफ़ कैसे करेंगे ?

आचार्य: कर तो रहे थे दो घंटे से। और कोई तरीक़ा नहीं है।

प्र: इन सब को जानकर?

आचार्य: इन सब को जानकर नहीं, अपने को जानकर। ढीक हैं। चलें। चलिए।

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