Acharya Prashant is dedicated to building a brighter future for you
Articles
समय: एक विशेष सत्र, मात्र गंभीर जिज्ञासुओं के लिए || आचार्य प्रशांत कार्यशाला (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
83 min
149 reads

आचार्य प्रशांत: स्वागत है! और मेरी मेज़ पर ये दोनों रीडिंग्स (पठन सामग्री) रखी हुई हैं जो आपको दी गयी थीं पढ़ने के लिए। तो कितने लोग हैं जो इसमें से कम-से-कम आधी सामग्री पढ़ पाये? आधी भी जिन्होंने पढ़ ली हो वो बता दें। (कुछ श्रोता हाथ उठाते हैं)

ठीक है। कितने लोग हैं जो एक-चौथाई भी नहीं पढ़ पाये हैं? (कुछ श्रोता हाथ उठाते हैं) कोई समस्या की बात नहीं है। हम यहाँ पढ़ने के लिए ही बैठे हैं। आप बता देंगे तो मुझे सुविधा रहेगी। अच्छा, और कितने लोग हैं जो समय की कमी के कारण या किसी अन्य वजह से एकदम देख ही नहीं पाये हैं, जो ये सामग्री है? बता दीजिए साफ़-साफ़। (कुछ श्रोता हाथ उठाते हैं)

ठीक है, ठीक है। मुझे ऐसा लग रहा था कि ऐसा होगा, तो इसलिए मैं चाहता था कि रजिस्ट्रेशन्स (पंजीकरण) भी जल्दी हो जाएँ और आपको जो सामग्री दी जाए वो इतनी ज़्यादा रहे भी नहीं। लेकिन इस फ़ॉर्मेट (प्रारूप) पर अभी पहली बार प्रयोग कर रहे हैं, अगली बार सामग्री इससे कम रहेगी, क्योंकि मैं देख पा रहा हूँ कि ज़्यादातर लोग नहीं ही पढ़ पाते हैं उतना। और दूसरा मैं चाहता था कि आपको ये कम-से-कम दस दिन पहले मिल जाए। लेकिन शायद ये हुआ है कि ज़्यादातर लोगों ने रजिस्ट्रेशन ही दस दिन के भीतर-भीतर किया है, तो उनको पर्याप्त समय मिला नहीं है।

हम ऐसे करते हैं कि हमारा जो विषय है — काल, समय — सबसे पहले उसका जो सैद्धान्तिक पक्ष है वो आपके सामने रख देता हूँ, ताकि एक बुनियाद बन जाए। और उसके बाद फिर आपके प्रश्न ले लेंगे। ठीक है? तो जो नहीं भी पढ़ पाये हैं उनको भी एक आधार मिल जाएगा। और फिर वो सवाल उस आधार पर कुछ कर पाएँगे। ठीक है?

तो शुरुआत वहीं से होगी जहाँ से शुरुआत होती है — जो प्रथम है, प्रधान है, जिसको आदि बिन्दु कहते हैं। शुरुआत वहाँ से हम करेंगे जहाँ दिक्-काल नहीं है, जहाँ कुछ भी नहीं है — न स्पेस है, न टाइम है, मात्र एक अद्वैत बिन्दु है — द नॉन-डुअल ट्रुथ (अद्वैत सत्य)।

हम समझना चाहते हैं कि समय क्या है। समय क्या है?

समय की बहुत सारी परिभाषाएँ होती हैं। विचारकों ने, ऋषियों ने, दार्शनिकों ने समय की तरह-तरह की परिभाषाएँ देने की कोशिश करी हैं, पहले से ही। भारत भर में नहीं, ग्रीस में भी हम पाते हैं कि ये प्रयास करा गया लेकिन घूम-फिरकर के जितनी परिभाषाएँ हमें मिलती हैं, उनके साथ समस्या ये है कि वो साइक्लिक (चक्रिय) हैं, सेल्फ़ रेफरेंशियल (स्वसन्दर्भित) हैं।

समझ रहे हैं?

साइक्लिक का अर्थ होता है कि आप किसी चीज़ को उसके ही टर्म्स (पदों) में परिभाषित कर दें। जैसे कि कोई पूछे कि समय क्या है, तो आप कह दें ‘वो जो घड़ी दिखाती है।’ फिर कोई आपसे पूछे कि अच्छा, एक घंटा क्या होता है, तो आप कहें — वो जिसमें साठ मिनट होते हैं। तो पूछे, ‘अच्छा, साठ मिनट होते हैं, तो एक मिनट क्या होता है।’ आप कहें, ‘घंटे का एक बटा साठ भाग।’

समझ में आ रही है बात?

किसी ने आपसे पूछा, ‘एक घंटा माने कितना?’ तो आपने कहा ‘साठ मिनट’। ठीक है? बात सुनने में सही लगी। उसने कहा, ‘लेकिन ये तो बता दो कि एक मिनट कितना होता है।’ तो आपने कह दिया घंटे का एक बटा साठ। ये क्या बन गयी? *साइक्लिक*। तो इसमें कुछ पता नहीं चला। इसमें सिर्फ़ शब्दों के साथ खिलवाड़ हुआ है। हमें कुछ पता नहीं चला।

तो समय की हम एक ऐसी परिभाषा पर आना चाहते हैं जो साइक्लिक न हो, चक्रिय न हो; जिसमें हम चक्र में, माने चक्कर में न फँस जाएँ। ठीक है? तो उसका हम प्रयास करेंगे और अगर उसको हम समझ गये तो अध्यात्म के और जीवन के, जितने भी हमारे सवाल हैं, उन सब को हम उसी परिभाषा के, उसी समझ के आधार पर उत्तर देने की कोशिश करेंगे। ठीक है?

अब अगर हम कह रहे हैं कि समय क्या है, अगर मैंने ये प्रश्न पूछा, हमारे सामने ये है तो हमें तो दो दिखायी दे रहे हैं, तभी हमें समय का भास हो रहा है न। अगर डुएलिटी माने द्वैत हो ही न। द्वैत का मतलब होता है ये पूरा जो संसार हमें प्रतीत हो रहा है। मैं हूँ, दुनिया है, दुनिया में चीज़ें हैं, दुनिया में सब कार्यक्रम चल रहे हैं — उठना-गिरना, ऊँच-नीच, सब चल रहा है।

तो मैं हूँ और दुनिया है; तभी मुझे लग रहा है कि समय है। ठीक है? और मुझे अगर लग रहा है कि समय है, तो मैंने प्रश्न पूछा है कि बताइए समय क्या होता है। तो जैसे ही हम इसका उत्तर देना शुरू करते हैं कि समय क्या होता है, हमें सबसे पहले द्वैत को स्वीकृति देनी पड़ेगी। ठीक है? तो समय तभी शुरू होता है जब दो बनते हैं। दो न हों तो समय नहीं है। दो न हों तो समय नहीं है।

तो इस ओरिजिन से सबसे पहले दो बनते हैं। तो यह नॉन-डुअल है अद्वैत है।

(आचार्य जी आइपैड पर मॉडल बनाकर समझाते हुए)

तो शुरुआत होती है हमारे होने की। हमारे होने की शुरुआत ऐसे होती है कि जब वो जो शून्य है, जो बिन्दु है नीचे, ये जो ओरिजिन है, ये दो में बँट जाता है। जब ये दो में बँट जाता है, तो अहम् वृत्ति खड़ी हो जाती है 'मूल मैं'। और जब वो खड़ी होती है तो कभी अकेले खड़ी नहीं होती, उसके सामने हमेशा प्रकृति होती है।

पर जब तक अभी अहम्-वृत्ति की बात कर रहे हैं, तब तक हम सामने बात करेंगे एक प्राकृत वृत्ति की ही। ठीक है? प्राकृत वृत्ति। ये दोनों सामने आ गये और इसमें जो अहम्-वृत्ति है — अगर आपने थोड़ा ध्यान दिया है — तो उसका गुण क्या होता है? उसकी पहचान ही क्या होती है? अपूर्णता। ठीक है न? अपूर्णता।

क्योंकि पूर्ण कहाँ था? पूर्ण तो नीचे बैठा हुआ था। उसी पूर्ण से छिटक कर के इस 'मैं' का, अहम् का निर्माण हुआ है। तो जब पूर्ण से छिटक कर के कुछ बनोगे आप, तो पूर्ण तो नहीं रह गये न? मोटे तौर पर कह सकते हैं कि पूर्ण के दो टुकड़े हो गये, जो वास्तव में हुए नहीं हैं। वास्तव में नहीं हुए हैं, पर ये जो अहम् है इसको लगता है कि हुए हैं। चूँकि इसको लगता है कि हुए हैं, इसलिए इसको माया कहा जाता है। ऐसा हुआ नहीं है, पर तुम्हें तो भाई ऐसा ही लग रहा है कि हुआ है।

तो ये जो अहम् वृत्ति है, इसके सामने ये प्राकृत वृत्ति आती है और चूँकि ये अपनेआप को अपूर्ण समझती है, इसलिए इन दोनों में सम्बन्ध बनता है। ठीक है?

अहम् में और प्रकृति में बनता है एक सम्बन्ध। वो सम्बन्ध क्यों बनता है? ये जो अहम् वृत्ति है ये सम्बन्ध क्यों बनाती है? ताकि अपूर्ण से हटकर पूर्ण हो सके। वो इसकी कोशिश है।

ठीक है न?

लेकिन इस सम्बन्ध के फलस्वरूप ये दोनों ही बदल जाते हैं। ये जो सम्बन्ध बनता है अहम् का प्रकृति से, वो सम्बन्ध दोनों को ही बदल देता है। आप अपने साधारण व्यावहारिक जीवन में भी देखते होंगे कि जब भी आपने किसी से सम्बन्ध बनाया — चाहे वो कोई जीव हो, चाहे वो कोई वस्तु हो — सम्बन्ध के फलस्वरूप दोनों ही बदल जाते हैं। आप भी और जिससे सम्बन्ध बनाया वो विषय भी। ऐसा होता है कि नहीं होता है?

आपके पास एक नया मोबाइल फ़ोन आया, वो अभी पैक्ड है, डब्बे में है। लेकिन अब वो आपके पास आ गया, सम्बन्ध बन गया। सम्बन्ध बनते ही क्या वो मोबाइल फ़ोन वैसा ही रह जाता है जैसा आपके पास आया था? पहले तो अनपैकिंग (डब्बे से निकालने की प्रक्रिया) हो जाती है। फिर उसमें आप अपने एप्स डाल देते हो, लॉग इन कर लेते हो। ये सारी चीज़ें हो जाती हैं न? वो बदल दिया। हम जिससे रिश्ता बनाते हैं, हो ही नहीं सकता कि उसको बदल न दें। और जब आपके पास मोबाइल फ़ोन आ गया तब क्या आप भी वही रह गये जो फ़ोन आने से पहले थे? आप भी बदल गये न, किसी तौर पर।

तो इन दोनों का जैसे ही रिश्ता बनता है, उसका परिणाम ये निकलता है कि ये (अहम् वृत्ति) भी बदल गया और ये (प्राकृत वृत्ति) भी बदल गया। अब हम इसको (अहम्-वृत्ति को) बोलते हैं अहंकार और इसको (प्राकृत वृत्ति को) अब हम सीधे-सीधे बोलते हैं प्रकृति। ठीक है? ये बदल गये। लेकिन ये बदलने के बाद भी क्या करते हैं? आपस में व्यवहार करते रहते हैं, क्योंकि वही इनकी मजबूरी है। व्यवहार न करें तो क्या करें?

ये (अहम्) आइ ज़ीरो (मूल अहम्-वृत्ति) पर भी कैसा था? शुरुआत में भी कैसा था ये?

श्रोतागण: अपूर्ण।

आचार्य: और बदलने के बाद भी क्या हुआ?

श्रोतागण: अपूर्ण।

आचार्य: तो बदलने के बाद अब जो ये प्रकृति है उसके दूसरे विषय से या उससे दूसरे तरह से सम्बन्ध बनाएगा। लेकिन नतीजा वही ढाँक के तीन पात। वो रहेगा अपूर्ण का अपूर्ण ही। ठीक है?

तो ये बन गया अब यहाँ से (बदले हुए अहम् को आइ वन और आइ टू द्वारा और बदली हुई प्रकृति को पी वन और पी टू द्वारा दर्शाते हैं)। अब ये फिर आपस में क्रिया करेंगे, फिर आगे कार्यक्रम चलता ही रहेगा। इसका कभी अन्त होगा?

आ रही है बात समझ में?

तो इसमें आप समझिए कि कौनसी चीज़ क्या हैं? ये जो दो आपको होरिज़ोंटल (क्षैतिज) रेखाएँ या तीर के निशान दिख रहे हैं, ये क्या हैं? ये सम्बन्ध हैं। इसको बोलते हैं द्वैत। ठीक है? ये द्वैत है।

और इनमें आपस में सम्बन्ध अगर होरिज़ोंटली हो रहा है, तो उसका परिणाम क्या निकल रहा है? परिणाम हम बिलकुल एक दूसरे ऐक्सिस (अक्ष) पर ही डिनोट (प्रदर्शित) कर रहे हैं, वर्टिकल एक्सिस (ऊर्ध्वाधर अक्ष) पर उसको बोलते हैं ‘समय’, *टाइम*।

तो समय क्या हुआ फिर? आपसे कोई पूछे कि इसको (मॉडल को) देखकर बताओ कि समय क्या है, तो आप क्या कहोगे? अपूर्ण का अपने प्रति असन्तोष ही समय है। अपूर्ण का अपनी स्थिति के प्रति असन्तोष ही समय है। टाइम इज़ डिस्सैटिसफ़ैक्शन (समय असन्तोष है)।

चूँकि ये जो अपूर्ण है, जिसको हम यहाँ पर आइ से सम्बोधित कर रहे हैं, ये अपनी स्थिति से तृप्त नहीं है, इसलिए ये बदलेगा। उसी बदलाव को ये इंगित करता है समय से। बदलना ही समय है। और बदलने के मूल में क्या बैठा हुआ है? अपूर्णता। अपूर्णता ही समय है। असन्तोष ही समय है। बदलाव ही समय है।

स्पष्ट हो रही है बात ये, समय क्या है?

अब ये भी स्पष्ट हो रहा है कि समय लगातार चलता ही क्यों रहता है? क्यों चलता रहता है? क्योंकि हम लगातार अपूर्ण बने ही रहते हैं। हम लगातार अपूर्ण बने ही रहते हैं। जीवित होने का अर्थ ही होता है लगातार संसार के साथ एक क्रिया करते रहना। लेकिन वो जो क्रिया है वो कभी भी ऐसा नहीं होता कि सन्तोष दे पाये। क्रिया चलती रहती है, असन्तोष बना रहता है और समय की धारा है वो लगातार बहती रहती है, बहती रहती है।

अब इसमें जो जीव है उसकी चेतना के लिए क्या स्थान है? हम कहते हैं चेतना माने चुनाव, ठीक? तो इसको आप देख रहे हैं तो इसमें आपको चुनाव का कहाँ, क्या महत्व दिखायी दे रहा है? (मॉडल को देखकर पूछते हुए)

श्रोता: क्रमशः ऊपर की तरफ़ जाएगा। (मॉडल को देखकर बताते हुए)

आचार्य: हाँ, अगर सम्बन्ध सही है तो जो अगली अवस्था बनेगी, आइ एन या पी एन , जो भी अगली आपकी अवस्था बनने वाली है, वो ऐसी हो सकती है कि आपको सन्तुष्टि की ओर भेजे। और सही सम्बन्ध की निशानी क्या होगी? सही सम्बन्ध की निशानी ये होगी कि उसमें ये जो आदान-प्रदान होगा, ये जो दोनों में परस्पर व्यवहार होगा — अहम् में और प्रकृति में — वो ज्ञान में होगा। क्योंकि व्यवहार करने वाला तो अहम् ही है न। हो दोनों तरफ़ से रहा है। दोनों एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं, निश्चित रूप से।

आपने खाना खाया, खाना जैसा था वैसा बचा क्या? और आप भी क्या जैसे थे वैसे ही रह गये? तो प्रभावित तो दोनों एक-दूसरे को करते हैं, लेकिन आपका खाने से रिश्ता क्या होगा, इसका सम्बन्ध एकपक्षीय होता है। प्रभावित दोनों एक-दूसरे को करते हैं। एक बार रिश्ता बन गया दो में प्रभावित दोनों एक-दूसरे को करते हैं। लेकिन रिश्ता कैसा बनेगा, इसका फ़ैसला करने का अधिकार आपको होता है; खाने को नहीं होता। आप कह दें आपको बहुत सारा खाना है, तो भोजन इनकार नहीं करेगा। और आप कह दें आज मुझे भोजन करना ही नहीं है, तो भोजन अपमान नहीं मानेगा।

समझ में आ रही है बात?

तो ये जो दोनों में रिश्ता है, जब वो ज्ञान के साथ बनता है और ज्ञान माने क्या? आत्मज्ञान। कि मैं कौन हूँ और इसलिए मुझे प्रकृति से क्या सम्बन्ध बनाना है। जब वो रिश्ता ज्ञान के साथ बनता है तब जो बदलाव होता है वो फिर ऐसा होता है जिसमें कि सन्तोष की, तृप्ति की, सम्भावना ज़्यादा रहती है।

देखिए, गड़बड़ तभी शुरू ही हुई थी जब ये फ़ासला बना था। किन दो में?

प्रकृति में और अहम् में जब फ़ासला बना था, तभी गड़बड़ शुरू हुई थी। तो सार्थक बदलाव निश्चित रूप से वही होगा जिसमें ये फ़ासला और कम होगा।

और फ़ासला कम होने का क्या मतलब होगा?

श्रोता अद्वैत हो जाना।

आचार्य: वो ठीक है, वो बात बिलकुल ठीक है, पर उसको एकदम ज़मीनी तौर पर बताइए। हमारा उद्देश्य यह है न कि व्यावहारिक परिवर्तन आये कुछ। फ़ासला कम होने का ये मतलब होगा कि जब आप कहते हो कि इधर आइ है, अहम्, तो अहम् अपनेआप को बोलता है, 'मैं तो चैतन्य हूँ, कॉन्शियस हूँ।' और उधर सामने ( पी ) जो कुछ होता है उसको बोलता है, वो तो जड़ है। तो दोनों में फ़ासला तभी कम हो सकता है जब ये जो दोनों की अलग-अलग परिभाषाएँ हैं ये अलग-अलग न रहें, ये एक हो जाएँ।

आकर्षण इसीलिए होता है, क्योंकि दोनों एक-दूसरे से अलग प्रतीत होते हैं न। मैं कहता हूँ, 'मैं हूँ चैतन्य और वो है जड़' या 'मैं हूँ जीव और वो है जगत।' दोनों को जब तक अलग-अलग मानोगे तब तक आकर्षण रहेगा और जब तक आकर्षण रहेगा तब तक आपस में जो व्यवहार और सम्बन्ध बनेगा वो तृप्ति नहीं देने वाला।

तो दोनों में फ़ासला कम सिर्फ़ किस शर्त पर हो सकता है?

जैसा कि अष्टावक्र समझाते हैं कि ये जो चैतन्य है, ये देख लेता है कि सामने जो प्रकृति है, मैं बिलकुल वैसा ही हूँ। मैं झूठमूठ अपनेआप को कहता हूँ कि मैं चैतन्य हूँ, मैं चैतन्य हूँ ही नहीं। जैसे बाहर प्रकृति में तमाम तरह की क्रियाएँ चल रही हैं, गुण आधारित, गुणधर्म आधारित, उसी तरीक़े से इधर भी वही सब प्रक्रियाएँ चल रही हैं। मैंने झूठमूठ उनको बोल दिया है कि वहाँ मैं हूँ। 'मैं' कुछ नहीं है, बस प्रक्रियाएँ हैं। अब ये जो ‘पी’ है इसमें तो प्रक्रियाएँ ही होती हैं न — सारी प्रकृति में — पानी बह रहा है, आग जल रही है। सब अपने-अपने गुणधर्म का पालन कर रहे हैं। तो वहाँ तो प्रक्रियाएँ ही होती हैं।

उन प्रक्रियाओं से हटकर के जो व्यूइंग कॉन्शियसनेस होती है, जो जीव देख रहा है इस पूरी दुनिया को, वो कहता है, ‘वो सब प्रक्रियाएँ हैं, मैकेनिकल हैं, यन्त्रवत हैं, तयशुदा हैं, लेकिन मैं? मैं तो साहब फ़ैसला करता हूँ।’ तो या तो ये दिखने लग जाए कि आप जो फ़ैसले वगैरह करते हो, वो भी बस पानी के बहने जैसे हैं, प्रकृति के नियमों द्वारा संचालित।

पानी बह रहा है, क्या वो ग्रैविटेशन (गुरुत्वाकर्षण) का उल्लंघन कर सकता है? नहीं। क्या वो फ़्लूइड डाइनेमिक्स (तरल गतिकी विज्ञान) का उल्लंघन कर सकता है? नहीं। अगर कहीं से पानी की एक धार चली है और आगे जितने तरीक़े की कंडिशंस (परिस्थिति) होती हैं वो सब आपको बता दी जाएँ, तो अगले पूरे एक साल में इस धार का क्या होगा, ये आप अभी बैठकर के निर्धारित कर सकते हो। क्योंकि धार के पास वास्तव में चुनाव की कोई शक्ति है ही नहीं। वो तो जैसी स्थितियाँ होंगी उस हिसाब से बह चलेगी।

ठीक है न?

जब हमें ये दिखने लग जाए कि हम भी जो कुछ करते हैं, वो भी सब हमारे रसायनों और शरीर द्वारा ही — जो हमारा पूरा जैविक और मानसिक, सामाजिक संस्कार है, उसके द्वारा ही निर्धारित हो रहा है, उसमें मुक्त चुनाव, मुक्तेच्छा, फ़्री विल कहीं पर है ही नहीं, तब इन दोनों में फ़ासला कम हो जाता है। क्योंकि तब आप कहते हो, ‘भाई, जैसा तू है वैसा ही मैं।’

तो जैसे खम्भा खड़ा है, क्योंकि उसको खड़े होने को बोल दिया गया है। जिस दिन कोई इंसान ये देख लेता है कि वो भी खम्भा ही है। ये खम्भा क्या अपनी मर्ज़ी से खड़ा हुआ? नहीं। इसका रंग क्या इसकी अपनी मर्ज़ी का है? नहीं। जो इस पर टेक लगाकर खड़ा है, उसने क्या इस खम्भे की अनुमति माँगी थी? नहीं। जिस दिन इंसान देख लेता है कि उसमें और खम्भे में कोई विशेष अन्तर नहीं है, उस दिन ये फ़ासला कम हो जाता है।

समझ में आ रही है बात?

और उस दिन से उस व्यक्ति के लिए फिर समय मिटना शुरू हो जाता है। और दूसरा तरीक़ा ये होता है कि आप कहो कि हूँ तो मैं एकदम संस्कारित, लेकिन मेरे भीतर मुक्ति की प्यास है। ठीक है, जीवन मेरा बीत रहा होगा बिलकुल एक तयशुदा तरीक़े से, स्क्रिप्टेड तरीक़े से, फिर भी मुक्ति की प्यास तो है ही। और वो जो मुक्ति की प्यास है, वो मेरी हर कोशिका में भरी हुई है।

और फिर आप देखते हो और कहते हो, ‘वो जो मेरी कोशिकाएँ हैं, हैं तो वो बनी अणुओं से ही और वो सब अणु वहाँ भी हैं। तो दूसरे अर्थ में भी फिर आप कहने लग जाते हो कि जैसा मैं हूँ, वैसा ही वो है। अगर मुझे मुक्ति चाहिए, तो मुक्ति फिर उस खम्भे को भी चाहिए। अगर मुझे मुक्ति चाहिए तो इस अस्तित्व के हर अणु को भी मुक्ति चाहिए' — तब भी इन दोनों में फ़ासला कम हो जाता है।

कुल मिलाकर बात ये है कि ये जो द्वैत फ़ासला बनाता है, जीव में और जगत में; वो फ़ासला ही समय है, वो फ़ासला ही माया है, वो फ़ासला ही मूल भ्रम है।

और वो जो इन दोनों के मध्य अन्तराल है उसका कारण क्या है? उसी को अज्ञान और अविद्या बोलते हैं। हम स्वयं को नहीं जानते, इसीलिए हम जो हैं उससे बहुत हटकर के अपनेआप को कुछ मानते रहते हैं। और जब आप अपनेआप को जानते ही नहीं, तो अपनेआप को आप तृप्त कैसे करोगे?

कोई सोचिए इतना पगला हो गया हो — बहुत सटीक उदाहरण नहीं है, पर कुछ मदद करेगा — इतना पगला गया हो कि जानता ही नहीं हो कि उसका मुँह कहाँ पर है। और आप उसके सामने खाना लाकर रखें और वो अपने कान में डालने लग जाए, उसे क्या तृप्ति मिलेगी! आपकी जो भी स्थिति है उसको ठीक करने के लिए पहले आपको अपना पता होना चाहिए न। ठीक, वगैरह सब हो सकता है मामला, कोई उसमें समस्या नहीं है। लेकिन आत्म अज्ञान का आलम ये हो कि आप किसी और को ही 'मैं’ का नाम देते हों, तब तो आपको दवाइयाँ दी भी जाएँगी तो वो किसी और को खिला दोगे। आप कहोगे ‘मैं तो वो है।’ ‘मैं तो वो है’, कुछ पता ही नहीं।

समझ में आ रही है बात?

तो समय क्या है, हमने ये परिभाषित करने की कोशिश करी है बिना घड़ी का सहारा लिये हुए। क्योंकि समस्या जब हमारे भीतर है तो समय की भी कोई हमें भीतरी परिभाषा ही देनी होगी। ठीक है? और समस्या का समय से कुछ तो बड़ा गहरा ताल्लुक तो है ही। क्योंकि बार-बार मुक्ति को जानने वालों ने यही कह कर सम्बोधित करा है कि हमें कालचक्र से मुक्ति दे दो। प्रार्थना ही यही रही है कि कालचक्र से मुक्ति मिले, कालचक्र से मुक्ति मिले।

तो ये जो कालचक्र है, ये चीज़ क्या है? काल माने क्या? और काल समझ गये तो मुक्ति को समझ जाएँगे। काल को समझ नहीं सकते मुक्ति को समझे बिना। तो ये सब चीज़ें आपस में गुत्थम-गुत्था हैं। इनमें से एक को भी पूरी तरह जान लिया तो फिर सबकुछ पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है।

इस बात को थोड़ा सा अपने भीतर उतरने दीजिए। आप जीवन से जो भी क्रिया करते हैं, वो क्रिया आपको और आपके द्वारा देखे जा रहे और अनुभव करे जा रहे जीवन को बदल देती है। ठीक है? ये बात एकदम ठीक है न। इसी बदलाव का नाम…?

श्रोतागण: समय है।

आचार्य: तो समय के मूल में क्या है? ये जो क्रिया है। ये क्रिया ही समय को जन्म देती है न एक तरह से। समय कहाँ से आया? आपके बदलने से समय आया। कुछ बदले न तो समय तो नहीं हो सकता न। और बदलाव क्यों होता है? क्योंकि आप समय के साथ इंटरैक्शन (परस्पर क्रिया) करते हो। ये जो जगत के साथ हमारा एंगेजमेंट (संलग्न होना) है, ये बदलाव ले आ देता है। आप छोटी-से-छोटी चीज़ को अगर देख भी लेते हो तो वो बदल जाती है।

फ़िज़िक्स (भौतिकी) अब सप्रमाण घोषित कर चुकी है कि सबअटॉमिक लेवल (उप परमाणु स्तर) पर तो सम्भव ही नहीं है किसी फ़िनोमिना (घटना) को देखना बिना उसमें इंटरफ़ियर (हस्तक्षेप) करे। मैक्रो लेवल पर वो पता नहीं चलता। मैक्रो माने बड़े स्तर पर। बड़े स्तर पर आप दीवार को देखें, ज़मीन को देखें, मेज़ को देखें तो आपको कोई ऐसा प्रमाण मिलता नहीं कि आपके देखने भर से आपकी देखी हुई चीज़ ही बदल गयी। ऐसा कोई प्रमाण मिलता नहीं।

लेकिन जब आप एकदम बारीक तल पर उतरते हैं, एकदम सूक्ष्मतम तल पर उतरते हैं, जहाँ पर डिस्टेन्सेज़ (दूरियाँ), नैनो मीटर से और भी छोटे होते जाते हैं, और वहाँ पर जो घटनाएँ घट रही हैं, आप उन्हें ऑब्ज़र्व (अवलोकन) करने की कोशिश करते हैं, तो आपको बड़ी अड़चन आ जाती है। वैज्ञानिकों को अड़चन यह आयी है कि वहाँ पर जैसे ही घटना को देखते हो, घटना बदल गयी देखने भर से।

वही बात हम यहाँ पर आपसे कह रहे हैं। आप जिस भी चीज़ से ज़रा सा भी इंटरैक्शन कर लेते हो, वो चीज़ स्वयं भी बदल जाती है और आप भी बदल जाते हो। इसी बदलाव का क्या नाम है?

श्रोतागण: समय।

आचार्य: समझ में आ रही है बात?

वो ऐसे आगे बढ़ा, उतने में आपने कुछ कर डाला है (उँगली से घड़ी के काँटा के आगे बढ़ने का इशारा करते हैं)। घड़ी का काँटा ज़रा सा आगे बढ़ा, उतने में आपने कुछ कर डाला है। वो जो आपने कुछ कर डाला है, वही घड़ी की टिक-टिक है। बात समझ में आ रही है? जो आपने कुछ कर डाला है, वही घड़ी की टिक-टिक है।

अब ये दोनों बदलते हैं। बदलते ये दोनों हैं। मैं भी बदलता हूँ। प्रकृति को मैंने छुआ, उससे वो बदल गयी और मैंने उसको छुआ, इसलिए मैं भी बदल गया। अनुभव जो है वो जो अनुभव्य वस्तु है और जो अनुभोक्ता है, वो दोनों को ही बदल देता है। लेकिन दोनों अपने-अपने गुणधर्म से बदलते हैं। दोनों अपने-अपने तरीक़े से बदलते हैं। दोनों के बदलने के नियम अलग-अलग हैं। प्रकृति बदलती है अपने नियम के हिसाब से।

समझिएगा!

प्रकृति बदलती है अपने नियम के हिसाब से और अहम् बदलता है अपनी नीयत के हिसाब से। प्रकृति बदलती है अपने नियम के हिसाब से और अहम् बदलता है अपनी नीयत के हिसाब से। आप किसी से एक कप उधार में लेकर आये थे। मान लीजिए यही है (मेज़ पर रखे कप को इंगित करते हैं)। ठीक है? आप इसको किसी से उधार लेकर आये थे, लेकिन आप इतने लापरवाह निकलें कि आपने उसको हाथ में लिया और छोड़ दिया।

जैसे ही आपने उसको छोड़ा, तो वो तो बदलेगा एक नियम के हिसाब से। उसका क्या होगा? वो टूटेगा, वो छितराएगा। उसका टूटना और छितराना कोई अलौकिक घटना नहीं है। उसके पीछे विज्ञान के नियम हैं। उसके ठीक कितने बड़े-बड़े टुकड़े होंगे और वो टुकड़े कहाँ-कहाँ जाकर गिरेंगे, ये सबकुछ कौन निर्धारित करता है? प्रकृति के नियम। तो प्रकृति तो बदलती है नियमों के हिसाब से।

लेकिन आपने उसको तोड़ दिया। अब, उसको तोड़ने से आपके भीतर दो-तीन तरह की क्रियाएँ हो सकती हैं — आप कह सकते हो, 'अरे, ये तो इसने मुझे दे दिया था गिलास के बाहर तेल लगाकर के। मैं इसका दोस्त हूँ तब भी साफ़ करके गिलास नहीं दे सकता था। गन्दी गिलास दे दी। बाहर उसमें तेल लगा हुआ था तभी तो वो मेरे हाथ से छूट गया।'

ये नीयत की बात है कि आप क्या बोल रहे हो। एक ये हो सकता है कि मैं कितना लापरवाह, कितना बेहोश आदमी हूँ कि उधार की चीज़ का भी ख़याल नहीं रख पा रहा। मैंने किसी दूसरे की चीज़ तोड़ दी। मैं बन्दा कैसा हूँ? और आप एक दूसरे तरीक़े से बदल जाओ। तो आपके भीतर क्या परिवर्तन होगा, इस पर प्रकृति का कोई नियम नहीं लागू होता।

क्योंकि चेतना और प्रकृति होते दो अलग-अलग आयाम हैं। दोनों मिले-जुले हैं, दोनों लगातार एक-दूसरे से क्रिया कर रहे हैं — वो क्रिया भले ही अज्ञान में हो रही है, लेकिन हो तो रही है लगातार — लेकिन है दोनों अलग-अलग। प्रकृति के नियमों को कोई नहीं बदल सकता और भीतर सिर्फ़ नीयत का खेल चलता है। वहाँ पर कोई आकर कोई कमाल, कोई जादूगरी नहीं दिखा सकता।

कोई आपको बड़ी-से-बड़ी बात बता दे, जीवन आपको बड़े-से-बड़ा सबक दे दे, चाहे सदमा दे दे, आप उससे क्या सीखोगे और आप कैसे परिवर्तित होगे, ये तो बात आपकी नीयत की है। प्रकृति में चमत्कार नहीं चल सकते और भीतर चमत्कार के अलावा कुछ चल नहीं सकता। बाहर की दुनिया में कहीं कोई जादू-टोना, कोई चमत्कार नहीं हो सकता।

गिलास अगर यहाँ से गिरा है, तो गिराया होगा किसी महात्मा, किसी तपस्वी ने, किसी ने गिराया होगा, ऐसा नहीं है कि वो गिरेगा और आधे रास्ते में रुक जाएगा कि एक दैवीय हाथ आया और उसने रोक लिया कि देखो भाई ये तो फ़लाने महात्मा जी द्वारा गिराया गया गिलास है, ये टूटना नहीं चाहिए, धर्म की बड़ी बदनामी होगी। ऐसा कुछ नहीं है। कोई भी गिराएगा, गिलास गिरेगा और टूटेगा। वैसे ही टूटेगा जैसे उसे टूटना है।

विज्ञान के नियम कुछ और नहीं होते, वो प्रकृति के नियमों को ही गणित की भाषा में रख दिया जाता है। इसीलिए विज्ञान कोई नियम बनाता नहीं है। बस प्रकृति में जो नियम चल रहे होते हैं, उन्हें खोजता है, डिस्कवर किये जाते हैं। आप उसको चाहे कुछ भी बोल दो, आप न्यूटंस लॉ बोल दो, आप कहो, ‘गैलिलियो ने नियम दिये हैं’, ये उनके नियम नहीं हैं, वास्तव में ये नियम प्रकृति के हैं।

हाँ, श्रेय उनको ये है कि उन्होंने उनको खोजा और कोडिफ़ाइ करा, वैज्ञानिक ढंग से उनको लिपिबद्ध कर दिया। ठीक है न? नहीं तो सेब तो गिरते रहते, लोगों को कभी यह समझ में न आता कि इसके पीछे एक गूढ़ सिद्धान्त है। न्यूटन ने ऐसा नहीं करा था कि सेबों को गिराना शुरू करा और न्यूटन से पहले सेब गिरा ही नहीं करते थे।

समझ में आ रही है बात?

तो विज्ञान का काम है प्रकृति में जो कुछ चल रहा है उसका खुलासा कर देना और उसको एक इस तरीक़े से लिख देना कि सूत्र में प्रेडिक्टेबिलिटि आ जाए। प्रेडिक्टेबिलिटि क्या होती है? कि सूत्र ऐसे लिख दिया है कि अब आप पहले से ही बता सकते हो कि क्या होने वाला है। तो बहुत ऊँचा पेड़ है, अगर उससे अभी-अभी सेब गिरा है, तो आप बता दोगे कि कितनी देर में ज़मीन पर गिरेगा। ठीक है न?

सूत्रों का काम ये होता है। सूत्र कुछ नया काम नहीं करते, लेकिन फिर भी बहुत महत्वपूर्ण काम करते हैं। तो विज्ञान चलता है, माने प्रकृति चलती है अपने नियमों पर, उन्हें कोई नहीं बदलता। कभी भी सोचिएगा नहीं कि बाहर की दुनिया में आप कोई परिवर्तन ला पाएँगे सिर्फ़ अपने भीतर की दिव्यता के द्वारा; वैसा नहीं होता। भीतर जो भी परिवर्तन आते हैं, वो वहीं आते हैं। कहाँ आते हैं? भीतर आते हैं। ठीक है?

तो ये जो पी ज़ीरो से पी वन और फिर पी टू की यात्रा है, वो बहुत नियमबद्ध और रेखीय, माने लिनियर होती है। तो उसको बोलते हैं *क्रोनोलॉजिकल टाइम*। वो है प्राकृतिक समय, जो कि एक रेखा में चलता है। क्योंकि वो निर्धारित होता है नीयत से नहीं, नियम से। तो ये जो पी ज़ीरो, पी वन, पी टू, ये एकदम लीनियर प्रोग्रेशन हैं। और इसके अन्तरालों को आप डिनोट कर सकते हैं क्रोनोलॉजिकल टाइम बोलकर के।

लेकिन ये आइ ज़ीरो, आइ वन, आइ टू है इसका कुछ भरोसा नहीं। आपको बिलकुल नहीं पता कि आइ ज़ीरो से आइ वन में कितना अन्तराल बीत जाएगा भीतरी। हमने कहा न, कप आपके हाथ से गिरा। बिलकुल हो सकता है कि उससे आपके आंतरिक स्थान पर कोई फ़र्क न पड़े। आप कहो, 'मैं क्या कर सकता हूँ, कप का काम है गिरना। कितने दिन चलेगा? एक्पायरी डेट (ख़त्म होने की तिथि) आ गयी थी।' कुछ भी हो सकता है। आप कह सकते हो कि ग़लती मेरे दोस्त की थी, उसने तेल लगा कप दे दिया।

और आप ये भी कह सकते हो, 'ये कप नहीं गिरा है, ये जो टूटा है; ये मेरा जीवन है, ये आइना है, जो टूटा है भीतरी; ये दर्पण है, मेरी शक्ल दिखा रहा था, टूट गया — इससे पता चलता है कि मैं भीतर से कितना छितराया हुआ हूँ।’ ठीक है न? तो ये जो बदलाव है आइ ज़ीरो से आइ वन और आइ वन से आइ टू ; इसको हम कहते हैं, इस चेंज़ (परिवर्तन) को हम कहते हैं *सायकोलॉजिकल टाइम*। बाहर जो चल रहा है, वो है प्राकृतिक समय। भीतर जो चल रहा है वो है सायकिक समय, मानसिक समय।

प्राकृतिक समय पर किसी का कोई बस नहीं चलेगा। घड़ी के काँटों को रोकने वाला कोई पैदा नहीं हो सकता। जितने पैदा होते हैं वो घड़ी के काँटों के वशीभूत होते हैं। घड़ी के काँटों पर किसी का बस नहीं चलता। लेकिन आपके भीतर जो चल रहा है वो तो आपकी नीयत से संचालित है न। तो सारा अध्यात्म बस उसको वश में करने का विज्ञान है। आपके भीतर जो चल रहा है, वो जगह तो आपकी बादशाहत है, आपकी अपनी फ़ीफ़डम (जागीर) है। तो वहाँ सब ठीक होना चाहिए।

समझ में आ रही है बात?

दो तरीक़े की, अब समझिए, प्रलय होती हैं। एक प्रलय होती है ‘प्राकृतिक’। जहाँ चूँकि सबकुछ मिट गया, इसलिए ये जो पी था ये आकर के आइ में घुस गया। पी ही नहीं बचा, बाहर कुछ है ही नहीं। जैसे बिग-बैंग का अगर आप एकदम आरम्भिक बिन्दु ले लें, जब कुछ भी नहीं था। जब कुछ भी नहीं था, स्पेस-टाइम भी नहीं था, बस इतना सा एक बिन्दु है, इतना एक छोटा बिन्दु है जिसको आप स्पेस नहीं बोल सकते, तो उसको आप कह सकते हो प्रलय की स्थिति है, कि कुछ भी नहीं है। जब कुछ भी नहीं है तो भी आइ और पी एक हो जाएँगे; क्योंकि आइ है ही नहीं।

तो यानी क्रोनोलॉजिकल टाइम रुक जाए तो भी सारा जो बवाल है, वो रुक जाएगा। है न? जिसको आप प्रलय कहते हो, कभी क़यामत कह देते हो कि भई बाहर का पी नहीं बचा, तो सारा झंझट मिट गया। हम क्या बोल रहे थे कि हमारा सारा दुख-दर्द इन दोनों (अहम् और प्रकृति) के बीच का सम्बन्ध और फ़ासला है। अगर ये जो बाहर है, ये बचेगा ही नहीं तो कोई फ़ासला भी बचेगा क्या?

तो एक तो तरीक़ा ये है कि हो जाए प्रलय, सब नाश हो जाए। सारा संसार ही मिट जाए तो सारे दुख-दर्द मिट जाएँगे। अच्छा तरीक़ा है, लेकिन उसमें समस्या ये है कि वो जो बाहर की दुनिया है, पी की दुनिया, उस पर किसी का कोई बस…।

श्रोता: नहीं है।

आचार्य: तो भैया कब प्रलय होगी, होगी कि नहीं होगी, हमें…।

श्रोता: नहीं पता।

आचार्य: तो इंसान क्या करे? हमें तो जीना कुल मिलाकर पचास-अस्सी साल है। हम क्या करें? एक तो ये है कि आइ ये है, पी ये है, ये ( पी ) ख़त्म हो गया तो दोनों एक हो गये। ये ( पी ) बचा ही नहीं न, तो बस ये ( आइ ) बचा, तो फ़ासला ख़त्म।

तो फिर दूसरा तरीक़ा क्या हो सकता है स्वभावतः? आइ ख़त्म हो जाए। तो क्रोनोलॉजिकल टाइम ख़त्म नहीं करा जा सकता है। ख़त्म होगा तो भी भैया हमें नहीं मालूम कब ख़त्म होगा, लेकिन सायकोलॉजिकल टाइम ख़त्म हो सकता है।

तो सारे अध्यात्म का उद्देश्य क्या है? ये जो भीतर चल रहा है मामला, ये जो भीतर हम लगातार एक से दूसरे होते रहते हैं, एक पहचान से दूसरी पहचान, एक विचार से दूसरा विचार, एक भाव से दूसरा भाव, एक रिश्ते से दूसरा रिश्ता, एक आशा से दूसरी आशा, एक जगह से दूसरी जगह कूद-फाँद — ये सब समाप्त हो जाए।

भाई, हम उसी को तो नियंत्रित कर सकते हैं न जिस पर हमारा बस चलता है। इस पर (बाहरी पर) हमारा बस नहीं चल सकता। हम अभी यहाँ बैठे हैं, भूकंप आ जाए तो भूकंप यह थोड़े ही कहेगा कि देखो भाई, यहाँ पर कोई अच्छा, आध्यत्मिक कार्यक्रम हो रहा है, इसको मत गिराना। कुछ नहीं। कुछ नहीं पता। हम यह ज़रूर कर सकते हैं कि भूकंप आये तो भी भीतर बहुत ज़्यादा खलबली न मचे। यह हम कर सकते हैं।

अध्यात्म यही करता है। अध्यात्म कहता है, 'देखो, जहाँ तुम्हारा बस चल सकता है, उस जगह पर तुम्हारी सत्ता रहनी चाहिए।' रही बात दुनिया की, तो दुनिया को तो बड़े-से-बड़ा राजा भी नहीं जीत पाया। जिनको लगा भी कि उन्होंने बड़ी बादशाहत पा ली है, वो भी जाकर के हुए तो ढेर ही। ये सारी बातें अब एक-दूसरे से गुथी हुई लग रही हैं?

सब समझ में आ रही है बात यह? जिनको नहीं समझ में आ रहा था उनको थोड़ा समझ में आना शुरू हो रहा है? मैं बार-बार पूछता रहूँगा। ये स्पष्ट हो रही हैं चीज़ें?

तो अब आपके सवाल ही लें? वहीं से पता लगना शुरू होगा कि बात क्या है। (संस्था के कार्यकर्ता को सम्बोधित करते हुए) देखिए, सवाल लीजिए।

रुकिए, सवाल बाद में लूँगा, पहले मैं परीक्षा लूँगा। सबको अलग-अलग तरीक़े से बताना है, अलग-अलग शब्द से, टाइम इज़ ... ? टाइम इज़ और उसके आगे है ऐसे ब्लैंक , खाली स्थान और आपको खाली स्थान भरना है। किसी की ओर इशारा करके कहूँगा कि भरो। एक नये शब्द से भरना होगा।

जी, टाइम इज़ ...? (एक श्रोता की ओर इशारा करके पूछते हैं) कुछ भी बोलिए। (श्रोता कोई लम्बा चौड़ा जवाब देने का प्रयास करते हैं) इतना बड़ा नहीं!

क्या होता है न, इतने मोटे-मोटे जब पोथे होते हैं, तो उनसे ज्ञान पता नहीं मिलता है कि नहीं मिलता है, उनमें अज्ञान छुप जाता है। जगह जितनी बड़ी होगी, वहाँ छुपने की सम्भावना उतनी ज़्यादा हो जाती है न?

तो आप किसी बात को समझे हैं या नहीं समझे हैं, ये जानने के लिए एक सूत्र पकड़ लीजिए। क्या आप उसे एक या दो शब्द या कम शब्दों में व्यक्त कर सकते हैं?

तो एकदम सरल-से-सरल भाषा में आप बता सकते हैं, तो आप समझ गये हैं। एकदम ज़मीन की भाषा में अगर आप किसी चीज़ को व्यक्त कर सकते हैं, तो आप समझ गये हैं। ठीक है।

हाँ जी, टाइम इज़ ...? (दूसरे श्रोता से पूछते हैं)

श्रोता: टाइम इज़ चेंज (बदलाव)।

आचार्य: ठीक है, *टाइम इज़ चेंज*। कोई यह भी याद रख ले तो बहुत हो गया।

(एक श्रोता हाथ ऊपर उठाते हैं) हाथ मत उठाइए। मैं उनको पकडूँगा जो हाथ नहीं उठाएँगे।

जी, पीछे से कोई बोलें, टाइम इज़ ...?

श्रोता: *चेंज*।

आचार्य: अब चेंज जा चुका है। अब कोई और शब्द बताइए।

श्रोता: थॉट (विचार)?

आचार्य: अब ये थॉट कैसे आ गया? थॉट पर तो अभी हम गये ही नहीं थे। वो तो पूरा एक नया मुद्दा है कि विचार क्या होता है। अभी सिलेबस (पाठ्यक्रम) के अन्दर रहिए।

श्रोता: *टाइम इज़ मूवमेंट फ़्रोम…।

आचार्य: मूवमेंट (गति)। बस *मूवमेंट*। ठीक है।

श्रोता: डिस्सैटिसफ़ैक्शन (असन्तोष)।

श्रोता: अहम् से प्रकृति का सम्बन्ध।

आचार्य: हाँ, ठीक है। अच्छा, ठीक है। कह सकते हैं।

श्रोता: अपूर्णता ही समय है।

आचार्य: ठीक है, बहुत बढ़िया।

श्रोता: असन्तोष।

आचार्य: बहुत अच्छे।

श्रोता: टाइम इज़ डिसटेंस (दूरी)।

आचार्य: डिस्टेंस, फ़ासला। बहुत अच्छा।

श्रोता: विशेज़ (कामनाएँ)।

आचार्य: कामना, बहुत अच्छा। और?

श्रोता: काम करने की प्रवृत्ति।

आचार्य: हाँ, ठीक है। और?

श्रोता: सफ़रिंग (पीड़ा)।

श्रोता: *टाइम इज़ इंटरएक्शन*।

श्रोता: नीयत।

आचार्य: बहुत बढ़िया। बहुत सुन्दर। देखिए, सबसे अच्छे जवाब वो होते हैं जो सबसे काम के हों। ठीक है न। ज्ञान की भी परिभाषा यही है कि अगर उपयोगी है तब तो कहिए कि वो ज्ञान है। ऐसे ज्ञान का कोई मूल्य नहीं जिसका कोई उपयोग नहीं है। तो एब्सट्रैक्ट बातें करने से हमें कोई प्रयोजन नहीं। उससे बस ये होता है कि बुद्धि बहुत प्रसन्न हो जाती है। बुद्धि को लगता है कि मैं कुछ हूँ — देखो, मैंने कितनी बड़ी बात कर दी। पर हमें बुद्धि को नहीं प्रसन्न करना है। हमें उस समस्या को हल करना है जिससे हम ग्रस्त हैं। वो समस्या है अतृप्ति की।

श्रोता: आंतरिक यात्रा। (प्रश्न का उत्तर देते हैं)

आचार्य: हाँ, आप सायकोलॉजिकल टाइम की बात कर रही हैं। हाँ, ठीक है।

श्रोता: ज्ञान, चाहत।

आचार्य: हाँ, ठीक है।

श्रोता: सर, इंटरडिपेंडेन्स (परस्पर निर्भरता)।

आचार्य: बहुत अच्छे। ये जो इंटरडिपेंडेन्स आपने बोल दिया अभी, इसके लिए महात्मा बुद्ध का बड़ा सुन्दर शब्द है 'प्रतीत्य समुत्पाद'। वो उसको बोलते हैं *'को-डिपेंडेंट ओरिजिनेशन'*। ये और ये (अहम् और प्रकृति) दो हैं और ये दोनों आपस में करते हैं कुछ क्रिया और उससे कुछ और ही निर्मित हो जाता है। जिन लोगों ने समाजशास्त्र या दर्शनशास्त्र पढ़ा है, उन्हें कुछ याद आ रहा है? ये दो हैं, और आपस में क्रिया करते हैं तो उससे एक तीसरा निर्मित हो जाता है।

श्रोता: *सिंथेसिस*।

आचार्य: हाँ। ठीक है? तो ये दो हैं जो आपस में कुछ, किसी तरीक़े का इंगेजमेंट करते हैं, कुछ गड़बड़-झाला इनका चलता है और उससे कुछ और ही निर्मित हो जाता है। तो जिसको आप डॉयलेक्टिकली (तर्क की दृष्टि से) बोला करते हो, क्या? थीसिस (वाद), एंटीथीसिस (प्रतिवाद) और सिंथेसिस (संश्लेषण)। तो उसका सम्बन्ध टाइम से है सीधे-सीधे। और?

श्रोता: डिस्टेंस फ़्रोम ओरिजिन (उद्गम से दूरी)।

आचार्य: ठीक

श्रोता: अहम् का होना।

आचार्य: मेरा होना ही समय है। ठीक है। बहुत बढ़िया।

श्रोता: मूल भ्रम।

आचार्य: बिलकुल ठीक। फ़ंडामेंटल इल्यूज़न (मूल भ्रम)। एकदम ठीक।

श्रोता: *कॉज़ एंड इफ़ेक्ट*।

आचार्य: कॉज़ एंड इफ़ेक्ट (कारण व प्रभाव)। ठीक है। बिलकुल ठीक। कॉज़ एंड इफ़ेक्ट का आप आगे याद दिलाइएगा, हम आगे बात करेंगे। क्या वास्तव में कोई कॉज़ कोई इफ़ेक्ट होता भी है या बस ऐसे गोल-गोल घूम रहे हैं। और उस गोल-गोल घूमने में लगता है कि एक चीज़ दूसरी चीज़ की कॉज़ है।

श्रोता: क्या ऐसा कह सकते हैं कि सायकोलॉजिकल टाइम बन्धन है और फ़िज़िकल टाइम उस बन्धन से मुक्त होने के लिए साधन हो सकता है।

आचार्य: हाँ, साधन तो हमेशा प्रकृति ही होती है। ठीक है। ठीक है। ठीक है।

हाँ, बोलिए, बोलिए। आप पीछे से बोल दीजिए।

श्रोता: टाइम इज़ द प्रोसेस ऑफ़ डेथ (समय मरने की प्रक्रिया है)।

आचार्य: द प्रोसेस ऑफ़ डेथ — कमिंग टू डेथ फ़्रोम लाइफ़ (जीवन से मृत्यु की ओर आना) या मूविंग फ़्रोम डेथ टू डेथ (मृत्यु से मृत्यु की ओर बढ़ना)। है न? तो टाइम तीनों चीज़ें हो सकता है, फ़्रोम लाइफ़ टू डेथ, फ़्रोम डेथ टू डेथ , और *फ़्रोम डेथ टू लाइफ़*। हाँ, नीयत की बात है। नीयत की बात है। बदलाव तो तीनों में ही निहित है। नीयत की बात है कि आप उसका उपयोग कैसे कर रहे हैं।

श्रोता: सर, मेरा जीवनकाल। मेरे होने का काल। वो भी तो समय है, तो अहम् है वो।

आचार्य: आपके होने का जो समय है, माने जब आप कहते हो कि शरीर है वो प्रकृति का नियम है। आप उसको जो गिनते हो, तो पाते हो न कि वो हमेशा एक सीमा में है, एक नियमबद्ध सीमा में है। कोई होगा बड़े-से-बड़ा, छः-सौ साल तो नहीं जीता न? डेढ़-सौ साल भी नहीं जीता कोई। जहाँ कहीं भी आप पाओ कि तयशुदा नियम हैं जो चेतना के हिसाब से बदलते नहीं, तो तुरन्त जान लीजिए कि मामला प्राकृतिक है। तो इसीलिए देह का जो जीवन है उसको जानने वालों ने कहा है, ‘इसको जीवन मत कहो, ये तो बस प्रकृति का नियम है।’

जीवन शरीर में नहीं है। जीवन कहाँ है? जीवन चेतना में है। शरीर तो ऐसा ही है कि जैसे पेड़ से सेब गिरा है, तो एकदम निश्चित होता है न कितनी देर बाद आकर के ज़मीन पर गिरेगा। आप चढ़ जाओ कुतुब मीनार पर और वहाँ से एक पत्थर नीचे को फेंको। फेंकने से पहले ही आपको पता है न कि ठीक कितने सेकेंड में नीचे गिरेगा। इतने दशमलव इतने सेकेंड में ये नीचे गिर जाएगा। तो इंसान का जो जीवन है, शारीरिक जीवन, वो बिलकुल कुतुब मीनार से नीचे फेंके गये पत्थर जैसा है।

बस वहाँ पर एकदम पता होता है कि छः दशमलव दो सेकेंड में ये इतना नीचे पहुँच जाएगा। यहाँ थोड़ी सी वेरिएबिलिटि (भिन्नता) होती है कि साठ भी हो सकता है, अस्सी भी हो सकता है। कोई बहुत सूरमा है तो सौ चल जाएगा।

श्रोता: चेतना भी तो देह में ही है न?

आचार्य: चेतना जो देह में होगी, अब इसके हिसाब से (मॉडल के हिसाब से) बताइए, वो क्या है? ये जो आपने बताया था न कि चेतना देह में है, वो चीज़ क्या है? उसमें चेतना कहाँ है? दो हिस्से हमने बनाये हैं न, दो खड़े हिस्से? उन दो खड़े हिस्सों में चेतना वाला कौनसा है?

श्रोता: *आइ*।

आचार्य: और देह वाला कौनसा है?

श्रोता: *पी*।

आचार्य: तो चेतना देह में है, ये उनका आपस का गड़बड़झाला है। ये आपस का गड़बड़झाला है। किसी ने बड़े रोचक तरीक़े से कहा था, उसने कहा था कि देखिए, समाज इतना पगला है कि कोई पुरुष किसी स्त्री के साथ सम्बन्ध बना ले और दोनों का ब्याह न हुआ हो तो हम कह देते हैं कि अवैध सम्बन्ध है। हम कहने लग जाते हैं इल्लिसिट रिलेशनशिप (अवैध सम्बन्ध) है। यही सब कहते हैं न अवैध है, अवैध है। जानने वालों से पूछोगे तो कहेंगे, ‘एक ही पुरुष है’, और उसका नाम क्या है? चेतना, वो *आइ*। और एक ही स्त्री है, उसका नाम क्या है?

श्रोता: *पी*।

आचार्य: तो एक ही अवैध सम्बन्ध है दुनिया में। उसका क्या नाम है? बॉडी आइडेंटिफ़िकेशन (देह से तादात्मय)। ये (शरीर) जो है ये स्त्री है और जो भीतर बैठा है, वो कौन है? पुरुष है। और उसने कह दिया कि ये (शरीर) मेरी है। ये है इल्लिसिट रिलेशनशिप , अवैध सम्बन्ध। लेकिन समाज इस सम्बन्ध को तो कभी अवैध कह ही नहीं पाता। कोई बार-बार बोलता रहे 'मैं देह हूँ, मैं देह हूँ,' वो बिलकुल नहीं बोलता कि तुम ये किस गन्दे रिश्ते की बात कर रहे हो। उसकी जगह वो दूसरी बातों को बोलता रहेगा बार-बार कि ये गैरकानूनी या असामाजिक या जैसा भी रिश्ता है, निन्दनीय है।

तो जैसे-जैसे आपकी गहराई बढ़ती है वैसे-वैसे जो रिश्ता आपके लिए सबसे अवांछित होता जाता है, वो कौनसा है? देहभाव। पुरुष कौन है?

श्रोता: चेतना।

आचार्य: और स्त्री कौन है?

श्रोता: देह।

आचार्य: और उसका नर और नारी से कोई लेना-देना नहीं है। उसका मेल-फ़ीमेल से सम्बन्ध नहीं है। ये यहाँ पर कोई एंटी महिला (महिला विरोधी) वाली बात नहीं हो रही है। तो एक नारी की देह में भी, ये (देह) क्या है? ये प्रकृति है। और आपके भीतर जो बैठा है वो कौन है?

श्रोता: पुरुष।

आचार्य: तो इसमें बात यहाँ पर सेक्स की, लिंग की नहीं हो रही है। ये बात किसी और तल की हो रही है। ठीक है न? इन दोनों में जो ये दो तरफ़ का है, ये नहीं होना चाहिए। जब तक वो चलता रहेगा तब तक जो सायकोलॉजिकल टाइम है वो चलता रहेगा। और?

श्रोता: सरल से कॉम्प्लिकेटेड (जटिल) हो जाना ये भी तो एक।

आचार्य: बहुत बढ़िया। इस पूरे चित्र में (मॉडल में) आपको सरल कहाँ दिख रहा है? किसको बोलेंगे सरल?

श्रोतागण: ओरिजिन, आदि बिन्दु।

आचार्य: बहुत अच्छे। तो सरलता सिर्फ़ एक जगह पायी जाती है। वहाँ पहुँच जाओ। जब तक वहाँ नहीं हो, तब तक सरल नहीं हो। तो ये सब बहुत सामान्यतया प्रयुक्त शब्द हैं, जैसे सरलता। इनके अर्थ नये हो जाते हैं, जैसे-जैसे आप नये होते जाते हैं। तो सरलता माने ये नहीं होता कि कोई बुद्धू ही है तो आपने कह दिया सरल है। या कि कोई अभी बच्चा है तो आपने कह दिया कि वो सरल है। सरल होने के लिए बड़ी मेहनत करनी होती है।

आपको क्या करना है कि रीडिंग में जो कुछ भी था, आपको अब इस मॉडल (प्रारूप) पर परख कर देखना है, क्योंकि इसी बात को जानने वालों ने न जाने कितने तरीक़ों से कहा है। और आपको जो ये रीडिंग दी गयी है ये बहुत-बहुत गाढ़ी है, थिक है। दुनियाभर की विज़डम (ज्ञान) इनमें आपके सामने रख दी गयी है। आप उसमें भटक सकते हैं, लेकिन नहीं भटकेंगे अगर आप पा लें कि जो भी उसमें कहा जा रहा है, वो है बस इतना ही। यही बात बहुत अलग-अलग तरीक़े से कभी संस्कृत में, कभी अंग्रेज़ी में, कभी अवधी में आपके सामने रख दी जा रही है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आचार्य जी, मेरा प्रश्न कृष्णमूर्ति जी के कथन से है। उन्होंने कहा है कि *देयर इज़ अ टुमॉरो क्रोनॉलॉजिकली, बट देयर इज़ नो सायकोलॉजिकल टुमॉरो। इफ़ देयर इज़ नो टुमॉरो, देयर इज़ अ ट्रीमेंडस रेवोल्यूशन इनवर्डली*। कृपया इसका अर्थ बताइए।

आचार्य: आप ही लोग बताएँगे। आपमें से कोई चाहे तो इसका उत्तर देने के लिए वॉलंटियर कर सकता है, क्योंकि हम इसकी पूरा-पूरा अभी चर्चा कर चुके हैं। इन्होंने कहा कि कृष्णमूर्ति जी कहते हैं कि निश्चित रूप से क्रोनॉलॉजिकली एक कल है। *देयर इज़ डेफ़िनिटली अ क्रोनॉलॉजिकल टुमॉरो, बट इफ़ देयर कैन बी अ रेवोल्यूशन विदिन, देयर विल बी नो सायकोलॉजिकल टुमॉरो*। कुछ यही है। उसको फिर से पढ़ दीजिए।

प्र: देयर इज़ अ टुमॉरो क्रोनॉलॉजिकली बट देयर इज़ नो सायकोलॉजिकल टुमॉरो। इफ़ देयर इज़ नो टुमॉरो, देयर इज़ अ ट्रीमेंडस रेवोल्यूशन इनवर्डली।

आचार्य: *इनवर्डली*। कौन वॉलंटियर करेगा इसके बारे में एक मिनट बोलने को बस? बस एक मिनट। इधर एक, किसी को भी दे दीजिए। कई लोगों ने हाथ उठाये हैं।

श्रोता: जब हम क्रोनॉलॉजिकल टुमॉरो की बात कर रहे हैं तब हम पी के ऐक्सिस में हैं। प्रकृति में कल आएगा। जब इनवर्ड रेवोल्यूशन (आंतरिक क्रान्ति) होता है तब 'मैं' कम्प्लीट (पूर्ण) हो जाता है। फिर आइ ओरिजिन की तरफ़ जाता है और वहाँ पर सायकोलॉजिकल टुमॉरो की ज़रूरत नहीं।

आचार्य: ठीक कहा न इन्होंने बिलकुल। और ये जो बात इन्होंने कही है, ये बस इसी को पकड़ लें तो उसके बाद कुछ बचता है? सारे ग्रन्थों का सार, ये जो बात कही है, इसमें समा गया है। अब समस्या ये नहीं होगी कि आपने कुछ पढ़ा नहीं है। पढ़ने से कुल मिलाकर जो एक बूँद निकली है, उसको आप गाढ़ा अमृत बोल दो, वो तो इसमें है। अब आगे बात ज्ञान की नहीं होगी, अभ्यास की होगी, क्योंकि यहाँ पर एक माहौल है, उसमें ये बात स्पष्ट हो गयी। आपको स्पष्ट हुई है, ये बहुत और लोगों को भी हुई होगी। हम इस बात को जी नहीं पाएँगे।

ये बात यहाँ स्पष्ट हुई है पर वो स्पष्टता खो जाएगी। हमेशा के लिए नहीं खोएगी, फिर दोबारा अच्छा माहौल मिलेगा तो वो स्पष्टता वापस आ जाएगी। लेकिन ऐसे क्या मज़ा है? ऐसे क्या मज़ा है? ऐसे कुछ मज़ा है क्या? मज़ा तो तब है न कि जब माहौल बिलकुल विपरीत हो — और माहौल माने क्या, उसमें (मॉडल में)?

श्रोता: प्रकृति।

आचार्य: देखिए, माहौल माने सिर्फ़ प्रकृति नहीं होता है। माहौल का सम्बन्ध प्रकृति से तो है, पर प्रकृति से ज़्यादा आपकी नीयत से है। वेदान्त आपको बार-बार पकड़ेगा और बोलेगा कुछ और मत कहना। बस अपनी…?

श्रोता: नीयत देखना।

आचार्य: क्योंकि पूरी शुरुआत ही बदनीयती से है। मूलभूत बदनीयती क्या दिखायी थी हमने? मूल बदनीयती क्या थी? वो जो नीचे करा है (मॉडल में सबसे नीचे मूल बिन्दु है जिससे अहम् वृत्ति और प्राकृत वृत्ति उद्भूत हुए हैं)। एकदम नीचे क्या करा है? शून्य के बना दिये?

श्रोता: दो।

आचार्य: इससे कुछ ज़्यादा ग़लत बात होगी? वही जो शून्य के दो बना दिये, उसी को आप किन-किन नामों से सम्बोधित कर सकते हो? उस को आप कह सकते हो वियोग है वो, वियोग। वही वियोग है। उसी को आप कह सकते हो बेईमानी, ईमान से हटना। उसी को आप कह सकते हो सत्यद्रोह, सत्य से द्रोह करना। उसी को इनफ़िडलिटि या बेवफ़ाई कह सकते हो।

वो है बेवफ़ाई। बेवफ़ाई वो है नीचे। वो बहुत बाद की बेवफ़ाई है जिसको हम समाज में और फ़िल्मों में देखते हैं और कहते हैं फ़लाना बेवफ़ा निकला। वो होगी बेवफ़ाई, पर वो बहुत छोटी और बहुत बाद की है। जो सत्यद्रोह है, वो कौनसा है? बोलिए, बोलिए।

श्रोता: मूल बिन्दु से अलग होना।

आचार्य: हाँ, अद्वैत से द्वैत का निर्माण ही पहली बेवफ़ाई है। जो है, उससे उसको कल्पित कर लेना जो नहीं है, वो है *फ़ंडामेंटल इनफ़िडलिटि*।

आपके मन में इन दो दिनों में जितनी भी आध्यत्मिक टर्म्स (पद) होंगी, उनको इस मॉडल के साथ इंटिग्रेट कर दीजिए, संयुक्त कर दीजिए। मामला बिखरा हुआ नहीं होना चाहिए। अध्यात्म की दुनिया में जो कुछ भी होता है, वो इस स्क्रीन पर उतर आना चाहिए।

प्र१: सर, ये बहुत ही स्वाभाविक रूप से प्रश्न आया कि जब आपने वियोग शब्द का प्रयोग किया तब मुझे लगा कि अद्वैत से द्वैत का निर्माण और वियोग हुआ। तो क्या ये वियोग ज़रूरी था? और ये सब मायाजाल का निर्माण होना क्या आवश्यकता था?

आचार्य: नहीं, किसके लिए ज़रूरी था और हुआ भी किसके लिए है? सचमुच तो हुआ नहीं है।

प्र१: हाँ, तो अहम् के लिए।

आचार्य: अहम् के लिए। अब वो तो अहम् ही बोलेगा अपनी नीयत के अनुसार कि ज़रूरी था कि नहीं था।

प्र१: जी।

आचार्य: अब वो मुजरिम के कटघरे में खड़ा हुआ है। उससे जज पूछ रहा है, ‘क्या चोरी ज़रूरी थी?' अब वो कह सकता है, ‘हाँ, ज़रूरी थी, मेरी माँ बीमार थी।’ ये तो नीयत की बात है। और इसमें कोई भी और व्यक्ति निर्णेता नहीं हो सकता, क्योंकि बेवफ़ाई का फ़ैसला किसने करा है? बेवफ़ाई का फ़ैसला किसने करा है? वो तो हमने करा है। तो हम ही बता सकते हैं कि ज़रूरी था कि नहीं था।

प्र१: तो चेतना के स्तर पर जब ये बोध हो जाता है और आप प्रकृति से वापस मिल जाते हैं तो सारा खेल समाप्त।

आचार्य: काश कि इतना आसान होता! आपने कुछ ग़लत नहीं कहा। पर ठीक है।

प्र१: *थैंक यू*।

प्र२: प्रणाम आचार्य जी। सर, इस रीडिंग से पहले हमने आपकी बुक पढ़ी थी 'आध्यत्मिक भ्रान्तियाँ'। वो बुक पढ़ते-पढ़ते ही काफ़ी चीज़ें पता चलीं, काफ़ी कुछ छूट गया। और उसके बाद ये रीडिंग जो भेजी है आप लोगों ने, संस्था की ये बहुत अच्छी पहल थी। नहीं तो शिविर में आने से पहले हमलोग दूसरी तरह की तैयारियाँ करते होते थे। पर इस बार ऐसा लग रहा था कि वी विल बी पार्ट ऑफ़ वन वर्कशॉप (हमलोग एक कार्यशाला में शामिल होंगे)। तो और अच्छी तरह से पढ़ीं।

आचार्य जी, मेरा पहला प्रश्न जे कृष्णमूर्ति जी की रीडिंग से है जिसमें उन्होंने भूत, वर्तमान और भविष्य के बारे में बताया है कि हमारा जो वर्तमान होता है, वह अतीत से आता है। और ग्रैजुअली (क्रमशः) जो भी भविष्य होता है वो भी हमारे वर्तमान से ही होता है, तो यह एक साइक्लिक वे (चक्रीय रूप) में ही चलता रहता है और हम कहीं नहीं पहुँचते। तो ये जो साइकल है, इसको हमें कैसे ब्रेक (तोड़ना) करना चाहिए कि हमें एक अच्छा भविष्य मिले? न कि इसी साइकल (चक्र) में जैसे हमलोग बोलते हैं कि कालचक्र में रह जाएँ?

आचार्य: आपने एकदम महत्वपूर्ण लेकिन एकदम नया मुद्दा खोल दिया। हम इसको ले लेते हैं। बैठिए। अब, हम चूँकि काल की बात कर रहे हैं, इसलिए मुद्दा खुल गया है अतीत और भविष्य का। और इसमें एक बड़ा अहम प्रश्न खड़ा हुआ है कि वर्तमान क्या होता है। ये वर्तमान क्या चीज़ है?

वर्तमान सिर्फ़ उसको बोलते हैं, वो जो नीचे बैठा हुआ है (मूल बिन्दु)। उसके अलावा कुछ नहीं वर्तमान है। कौन है वर्तमान? वो जो बोध बिन्दु है। वो जो आदि बिन्दु है सबसे नीचे, अद्वैत स्थल, सिर्फ़ वही है वर्तमान। और ये जो पूरी धारा चल रही है, जिसमें तीर का निशान है ऊपर, ऊपर, ऊपर इसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ भूत और भविष्य होते हैं, वर्तमान नहीं होता।

तो सबसे पहले तो हमें अपने मन से ये बात निकालनी पड़ेगी कि समय एक धारा जैसा होता है जिसमें आप अवस्थित हैं। आपसे पीछे जो कुछ है उसे भूत कहते हैं, आपके आगे जो कुछ है उसे भविष्य कहते हैं और आप जहाँ पर हैं, उसे वर्तमान कहते हैं; एकदम ग़लत है। इस बात को लिख लीजिए और काट दीजिए।

क्योंकि जो पॉपुलर कॉन्सेप्शन ऑफ़ प्रेज़ेंट (वर्तमान की प्रचलित अवधारणा) है वो यही है — मैं समय में हूँ, मुझसे पीछे जो कुछ है उसे कहते हैं पास्ट और जो पास्ट है, वो बदल नहीं सकता, और मुझसे आगे जो है वो है भविष्य और भविष्य अनजाना होता है।

सामान्यतः हमारा ऐसा ही सिद्धान्त होता है न कि अतीत में जो कुछ है वो सब जाना हुआ है, भले ही हमें न पता हो, पर वो निश्चित है। और आगे जो कुछ है, उसका पता नहीं, अनन्त सम्भावनाएँ होती हैं। तो हम सोचते हैं कि ये करें कि वो करें, ऐसे-वैसे। ये चलता है और अपनेआप को हम कहते हैं कि हम जहाँ हैं वो प्रेज़ेंट है, वर्तमान है। नहीं ऐसा नहीं है।

तो ये जो पूरी आप धारा देख रहे हैं, ये धारा समय की है और समय की धारा में वर्तमान जैसा कुछ होता ही नहीं है। वर्तमान वो है जो समय की धारा से निरपेक्ष है। माने वर्तमान सिर्फ़ तब है जब समय की धारा वहाँ पी की तरफ़ बहती रहे और ये जो आइ की धारा है, ये रुक जाए। वर्तमान सिर्फ़ तब है जब ये जो प्रकृति की धारा है, ये बहती रहे और प्रकृति की धारा में आपको क्या मिलेगा? भूत मिलेगा और भविष्य मिलेगा। वो प्रकृति की धारा है। वर्तमान तब है जब आप रुक गये हैं और उस धारा को देख रहे हैं, उसे कहते हैं वर्तमान में होना।

भूत और भविष्य और पूरा काल आपके सामने ऐसे बह रहा है, आपको उससे सम्बन्ध रखने की, अपूर्णता का सम्बन्ध रखने की कोई ज़रूरत नहीं है उसको कहते हैं वर्तमान। वो है *प्रेज़ेंट*। प्रेज़ेंट ऐसा नहीं है कि आपसे कोई पूछे *व्हाट इज़् द टाइम प्रेज़ेंटली*। हम जिस आशय से प्रेज़ेंटली शब्द का इस्तेमाल करते हैं उसका वर्तमान से कोई सम्बन्ध नहीं है।

तो बताइए बींग इन द प्रेज़ेंट (वर्तमान में होने) का क्या अर्थ हुआ? बींग इन द प्रेज़ेंट का क्या अर्थ हुआ? बींग इन द प्रेज़ेंट का मतलब हुआ, नीचे है प्रेज़ेंट , वहाँ होना। ये जो आइ एक्सिस है, इससे बाहर होना। तो बींग इन द प्रेज़ेंट का ये अर्थ नहीं है कि इस मोमेंट (क्षण) में रहो; बींग इन द प्रेज़ेंट का अर्थ हुआ बींग इन द ट्रुथ (सत्य में होना)।

ये लिख लीजिए, बींग इन द प्रेज़ेंट इज़ नॉट इक्वल टू बींग इन द मामेंट; बींग इन द प्रेज़ेंट इक्वल्स बींग इन द नॉन डुअल ट्रुथ (वर्तमान में होने का अर्थ इस क्षण में होना नहीं है; वर्तमान में होने का अर्थ है अद्वैत सत्य में होना)। बींग इन द प्रेज़ेंट ≠ बींग इन द मोमेंट बींग इन द प्रेज़ेंट = बींग इन द नॉन डुअल ट्रुथ

और इसीलिए प्रेज़ेंट में होने के लिए यह ज़रूरी है कि ये जो आइ है ये स्थिर हो जाए। ये स्थिर हो जाएगा तो शून्य हो जाएगा। तो वर्तमान में होने के लिए ज़रूरी है कि आप न हों। आप हैं तो वर्तमान नहीं हो सकता। आप हैं तो या तो अतीत की स्मृतियाँ होंगी या भविष्य की?

श्रोता: कल्पनाएँ।

आचार्य: वर्तमान नहीं रह पाएगा। आपने देखा है, हम जब भी होते हैं तो क्या होता है? या तो अतीत होता है या भविष्य होता है। सत्य नहीं होता है, क्योंकि सत्य होता तो आपको अतीत और भविष्य से इतना सम्बन्ध रखने की ज़रूरत पड़ती ही नहीं। इतना भी नहीं बोलूँगा कि ऐसा सम्बन्ध रखने की ज़रूरत, बात क्वालिटी (गुणवत्ता) की है — किस तरह का सम्बन्ध रख रहे हैं। हम किस तरह का सम्बन्ध रखते हैं अतीत से और भविष्य से? अतीत मुझे पहचान देगा और भविष्य मुझे तृप्ति देगा। रुक कर सोचिएगा। क्या यही हमारा सम्बन्ध नहीं है?

देह कहाँ से आयी?

श्रोता: अतीत से।

आचार्य: धर्म कहाँ से आया?

श्रोता: अतीत से।

आचार्य: मान्यताएँ कहाँ से आयीं?

श्रोता: अतीत से।

आचार्य: भाषा कहाँ से आयी?

श्रोता: अतीत से।

आचार्य: नाम?

श्रोता: अतीत से।

आचार्य: लिंग?

श्रोता: अतीत से।

आचार्य: रिश्ते?

श्रोता: अतीत से।

आचार्य: तो अतीत मुझे क्या दे रहा है? अस्तित्व दे रहा है। दैहिक भी और…?

श्रोता: मानसिक भी।

आचार्य: तो मेरी पूरी पहचान मैं किससे लेता हूँ?

श्रोता: अतीत से।

आचार्य और मेरी सारी कामनाएँ कहाँ बैठी हुई हैं?

श्रोता: भविष्य में।

आचार्य यही तो अहम् का काम है न — पीछे से अपनी पहचान उठाना और आगे से अपने लिए तृप्ति माँगना, सन्तोष माँगना, पूर्णता माँगना। ये लक्षण सत्य के नहीं हैं। जो अतीत से अपनी पहचान उठा रहा है, वो सत्य का प्रेमी नहीं हो सकता। अतीत सुनते ही कौनसा शब्द दिमाग में आ जाना चाहिए? प्रकृति।

जिसको अतीत से बहुत सरोकार है। 'मेरे दादा पाँच गाँव में सबसे बड़े ज़मींदार थे।' होती है कि नहीं होती है फूलने वाली बात? कह रहे हैं, 'तुम्हारी तो दौलत नयी-नयी है, हम खानदानी हैं।' ये व्यक्ति सत्य का प्रेमी नहीं हो सकता, क्योंकि इसके पास अतीत — अतीत माने प्रकृति, अतीत में बड़े स्वार्थ हैं। अतीत हटा देगा तो ज़मींदारी गिर जाएगी इसकी; ज़मींदारी गिर जाएगी, तो जियेगा कैसे? और जो ज़मींदारी के बल पर जी रहा है, वो सत्य का प्रेमी नहीं हो सकता। तो उसकी वो जो कूद-फाँद है, आइ ज़ीरो, आइ वन, आइ टू, आइ फ़ॉर वो चलती रहेगी — अनन्त चलेगी।

और ये तो जो हमने मॉडल बनाया है, ये बहुत सिंपलिस्टिक (सरल) है। आप सारी कूद-फाँद इसमें दिखायें, तो वो मॉडल बहुत बड़ा हो जाएगा। ये तो उसको हमने रिड्यूस (कम) करके इतना रख दिया है।

समझ में आ रही है बात?

यही बात भविष्य के अरमानों पर लागू होती है। भविष्य सारा कहाँ है? पी में — मुझे और चाहिए, अभी प्रकृति से और चाहिए, कल ले लूँगा। ये जो पी का पूरा पसार है, इससे मुझे अभी और चाहिए। आज नहीं मिला, कोई बात नहीं, कल दोबारा धावा डालेंगे। बीसों बार प्रयास करेंगे, डटे रहेंगे, 'पीछे मत हटना बच्चू!' ये आदमी सत्य का प्रेमी नहीं हो सकता।

समझ में आ रही है बात?

वर्तमान का अर्थ है ये जो बायीं तरफ़ ( आइ तरफ़) का खेल है, ये रुक जाए। वो खेल रुक गया है और इधर वाले खेल को तो कोई रोक नहीं सकता। किधर वाले? जो दायीं तरफ़ का खेल है। जो दायीं तरफ़ का खेल है, उसे कोई रोक नहीं सकता, क्योंकि वो किसपर चलता है? वो तो चलता है नियमों पर। और वो जो नियम हैं, न हमने बनाये हैं, न आपने बनाये हैं, वो स्वतः-स्फूर्त नियम हैं। इधर का खेल किस पर चलता है, बायीं तरफ़ का?

श्रोता: नीयत पर।

आचार्य: तो नीयत का साफ़ होना ही वर्तमान में स्थित होना है। नीयत साफ़ हो गयी तो उधर का खेल चलता रहेगा, इधर का खेल रुक जाएगा। और एक बात और याद रखिए, जब ये बायीं तरफ़ वाला खेल रुक जाता है और बस दायीं तरफ़ वाला चलता रहता है, तो दायीं तरफ़ वाला खेल खूबसूरत हो जाता है।

ये एक नया शब्द आ गया ‘सौन्दर्य’। सौन्दर्य किसको बोलते हैं? ब्यूटी क्या है? ब्यूटी किसको बोलते हैं? जहाँ अहम् नहीं है वहाँ सौन्दर्य है। तो पूरी प्रकृति ही सुन्दर है, अगर उसका दृष्टा निरहंकार हो। और अगर दृष्टा में अहंकार है तो उसे प्रकृति में आकर्षण और विकर्षण तो दिखेंगे, सौन्दर्य कहीं नहीं दिखेगा।

अगर मेरी आँख के पीछे वही अज्ञान बैठा हुआ है, आइ , अहंकार, तो मुझे कोई चीज़ आकर्षक लगेगी और कोई चीज़ कुरूप लगेगी, उससे विकर्षण होगा। सौन्दर्य का मुझे जीवनभर पता नहीं चलेगा। कुछ अट्रैक्टिव (आकर्षक) है, ये तो मुझे पता चल जाएगा, और उसको ही हो सकता है मैं ब्यूटीफ़ुल का नाम दे दूँ। तो आकर्षक तो फिर भी मैं कुछ अनुभव कर पाऊँगा, सौन्दर्य से बिलकुल वंचित रह जाऊँगा।

समझ में आ रही है बात?

और अगर आँख साफ़ हो गयी है, ये जो बायीं तरफ़ वाला मामला है, ये रुक गया है तो आप जहाँ भी देखेंगे, वहाँ सौन्दर्य-ही-सौन्दर्य है। सब सुन्दर हो जाता है फिर। आप रुक गये हो न, तो इसीलिए जो अगलिनेस (कुरूपता) होती है, वो कहाँ होती है? संसार में कुछ भी होता है क्या अगलि ? हमेशा दृष्टा में ही होता है भद्दापन, कुरूपता, असौन्दर्य। और वो है अहंकार।

तो सामाजिक तौर पर हम कहते हैं कि जो कुछ आकर्षक दिखता है उसकी ओर खिंच गये, उसको हम बोल देते हैं प्रेम। वही बात अध्यात्म में भी लागू होती है। सामाजिक तौर पर, साधारण तौर पर हमें जो कुछ आकर्षक दिख गया, उसकी ओर खिंचने को हम प्रेम बोल देते हैं। अध्यात्म में वो जो नीचे बैठा हुआ है ‘सत्य’ उसके प्रति निष्ठा को प्रेम कहते हैं और मात्र उसी को सुन्दर कहते हैं। वही नीचे वाले को। सत्य ही सुन्दर है, उसके अलावा कुछ सुन्दर नहीं है।

अब सत्य कहीं से पकड़ में तो आएगा नहीं, तो जहाँ निरहंकारिता है, वहाँ सत्य है। तो सत्य कहाँ मिलता है? तो जानने वालों ने कहा है, वो कोई चीज़ तो है नहीं जो कहीं मिल जाए। लेकिन जहाँ देखो कि मामला आइ से हट रहा है, वहाँ कह देना कि उस देह में ही सत्य है। उसी देह में सत्य है। और जो अलख है उसका दर्शन — अलख माने जो देखा नहीं जा सकता, जिसको इन्द्रियाँ लक्ष्य नहीं कर सकती, उसको अलख कहते हैं — तो जो अलख है उसको लक्ष्य करना हो तो वहाँ मिलेगा जहाँ अहंकार न हो।

गा दीजिए। (स्वयंसेवक गाते हैं) अलख पुरुष की आरसी, साधु का ही देह। लखा जो चाहे अलख को, इन्हीं में तू लख ले।। ~ कबीर साहब ठीक है! सौन्दर्य वहाँ खोजिए, जहाँ साधुता हो। आँखों को क्या अच्छा लग रहा है, उससे बस ये साबित होता है कि आप प्रकृति के चक्र में अभी फँसे ही रहना चाहते हैं। आप जान ही नहीं रहे हैं कि वहाँ फँसकर कुछ मिल नहीं जाना है। जो आकर्षक है, आवश्यक नहीं है कि वो सुन्दर हो और ये एक तरह का अभ्यास करा जा सकता है जीवन में कि कुछ शब्दों को बहुत ख़ास मौक़ों के लिए, जगहों के लिए, अवसरों या लोगों के लिए आरक्षित कर दिया जाए।

मत कहिए किसी को भी ब्यूटीफ़ुल ! अट्रैक्टिव कह दीजिए; कहिए ही नहीं, ज़बान पर ताला लगा दीजिए। ये साधना है एक प्रकार की और अगर ये साधना आप नहीं कर रहे हैं, तो वही तो सत्य के प्रति द्रोह है न। जिस शब्द से सिर्फ़ उच्चतम को सम्बोधित करना था देखिए, आपने किसको बोल दिया। बोलने वाले आपको बता गये हैं कि सत्य को सुन्दर बोलना और शिव को सुन्दर बोलना और आप किसको सुन्दर बोल आये, तो मत बोलिए!

इसी तरह प्रेम, लव शब्द का बड़ा ठहरकर, बहुत सोचकर, और बड़ा कम इस्तेमाल करिए। कुछ भी बोल दीजिए, लगाव है, मोह है, ममता है, या बोल दीजिए खिंचाव है। मत कहिए कि प्रेम है। प्रेम का अधिकारी तो बस या तो वो होता है या वो जिसको ये अभी गा रहे थे कि "लखा जो चाहे अलख को, इन्हीं में लख ले।" प्रेम का अधिकारी कोई आकर्षक विषय नहीं हो जाता।

समझ में आ रही है बात?

इसी तरह से निष्ठा, वफ़ा, लॉयल्टी , इन शब्दों का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर करिए, बहुत कम करिए। और कोई आदमी अच्छा है, कोई आदमी या कोई स्थिति — आदमी से मेरा आशय नर नहीं है, आदमी से मेरा आशय मनुष्य है। अब भाषा ऐसी हो गयी है, उसका आप लोग उल्टा अर्थ मत लगा लीजिएगा। ये भी न कर दीजिएगा कि क्लिप निकाल ली तीस सेकेंड की और उसको चला दी कि ये देखो, ये तो — जो आपसे लॉयल्टी की माँग करे, वहाँ थोड़ा सा झिझकिएगा। क्योंकि आदमी अगर ज़रा सा भी समझदार होगा तो वो आपकी लॉयल्टी को एक ही दिशा में भेजेगा, किस दिशा में?

श्रोता: सत्य की दिशा में।

आचार्य: है न? कहेगा, यार, दम लगाना ही है अगर और वफ़ा दिखानी ही है, तो ज़रा सही दिशा में दिखाओ। हम हाड़-माँस के आदमी, हमसे वफ़ा करके क्या कर लोगे? क्या मिल जाना है तुमको? और हमें भी कुछ नहीं मिल जाना है। दो पल का सपना मिल जाएगा और सपने के टूटने के बाद बहुत सारा दुख।

तो इसीलिए उपनिषदों को जब आप पढ़ें, तो उसके साथ सन्त-कवियों की रचनाओं को पढ़ना भी बहुत ज़रूरी है। क्योंकि उपनिषदों के ऋषि तो थे वैज्ञानिक। उनकी जो पूरी भाषा है, शब्दावली है, टर्मिनॉलॉजी है, वो एकदम सुपर साइंटिफ़िक (अति वैज्ञानिक) है। उसमें किसी तरीक़े का आपको विचलन नहीं मिलता है, डेविएशन नहीं मिलता है कि ये भी बोल दिया और ये भी बोल दिया।

लेकिन सन्त कवियों ने ज़मीन की भाषा में बात करी है। और उन्होंने हमारी ज़िन्दगी से उदाहरण उठाये हैं और हमारे जीवन से उन्होंने संयोग और घटनाएँ उठायी हैं। और उन्होंने हमारे जीवन की आम भाषा को नये अर्थ दिये हैं। तो उन्होंने हमें बताया है कि फिर इन शब्दों का इस्तेमाल कैसे करना है। प्रेम शब्द का क्या इस्तेमाल करना है, पूजा माने क्या होता है, सम्मान माने क्या होता है ये सब आपको वहाँ पर मिल जाता है। और इन दोनों को जब आप साथ लेकर चलते हैं कि एक तरफ़ श्लोक रखे हैं और एक तरफ़ भजन रखे हैं, तब जो बात बनती है, वो अनूठी होती है एकदम।

भूत, भविष्य, वर्तमान — ये बात स्पष्ट हो गयी है सबको? हमारे जीवन में क्या कुछ भी वर्तमान जैसा होता है आमतौर पर? तो कोई न कहे कि वर्तमान में मैं यहाँ कार्यरत हूँ। वर्तमान जैसा कुछ नहीं होता। अच्छा, बताइए, वर्तमान में मैं क्या आपके सामने बैठा हूँ? जल्दी बोलिए। आध्यत्मिक तल पर तो छोड़िए, ये जो बायीं तरफ़ का है डंडा, इसको तो छोड़िए, अगर आप दायीं तरफ़ की भी बात करोगे तो भी ये बात ग़लत है कि मैं आपके सामने बैठा हूँ।

कारण बताये देता हूँ। आप मुझे देख पा रहे हैं, इसमें एक टाइम लैग (समय अन्तराल) है। ये तो आप सबने सुना ही हुआ है कि सूरज की रोशनी को आप तक पहुँचने में आठ-दस मिनट लग जाते हैं, सुना है न? तो भाई, सूरज आप तक पहुँचे, आठ-दस मिनट लगता है। मेरी बात भी आप तक पहुँचे या मेरा दृश्य आप तक पहुँचे, उसमें भी कुछ तो समय लगता होगा न? माने जब तक आपको लगता है कि आपने मुझे देखा, उतनी देर में मैं कुछ और हो गया।

तारों के बारे में हम ये जानते हैं। बहुत सारे तारे इतनी दूर होते हैं, इतनी दूर होते हैं, इतनी दूर होते हैं कि जब तक आप तक उनकी रोशनी पहुँचती है, तब तक हो सकता है कि वो तारा बिलकुल मिट चुका हो। तो आप उस तारे को देख रहे हैं और वो तारा है ही नहीं, क्योंकि रोशनी एक सन्देश की तरह होती है। ऐसा हो सकता है न कि कोई आपको चिट्ठी लिखे और जब तक आपको चिट्ठी मिले तब तक वो बेचारा मर गया हो, ये हो सकता है न? तो रोशनी भी ऐसी ही चीज़ होती है। वो ऐसे ही चल-चलकर आती है आप तक और जब तक आप तक पहुँची तब तक वो पीछे से ग़ायब ही हो गया बेचारा।

तो वैसे ही आपको लग रहा है कि वर्तमान में हम और आप बैठे हुए हैं। लेकिन हमारे और आपके बीच में समय बैठा हुआ है। मेरी बात को, मेरे चेहरे को आप तक पहुँचने में समय लग रहा है। तो आप मुझे जब देख रहे हैं तो वर्तमान में नहीं देख रहे; भूत में देख रहे हैं, तो ये वर्तमान कहाँ है? वर्तमान कहाँ है? आप अभी भी मेरा अतीत देख रहे हो। एक तरह से रिकॉर्डिंग देख रहे हो। अभी भी वीडियो ही चल रहा है। जब वीडियो देखते हो तो आप बोलते हो न, ‘अरे! ये तो पुराना वीडियो है।' वो तब एक साल पुराना होता है। अभी जो आप वीडियो देख रहे हो, ये एक क्षण के शतांश पुराना है। पर पुराना तो ये भी है।

अब और ख़ौफ़नाक बात सुनिएगा। कलेजा कड़ा करे लें। आप कहते हो ‘आप हो’, अपने बारे में भी सोचने में आपको…? जल्दी बोलिए।

श्रोता: समय लगता है।

आचार्य: तो आप अपनी भी रिकॉर्डिंग ही देख रहे हो, आप हो नहीं। अहंकार का कोई भी वर्तमान होता ही नहीं है। उसके पास हमेशा या तो भूत होता है या ज़्यादा खोपड़ा चलाता है तो भविष्य। वर्तमान कुछ नहीं होता। आपने जितनी देर में अपने बारे में सोचा है, उतनी देर में तो आप बदल गये। तो आप जिसके बारे में सोच रहे थे, वो तो है ही नहीं। आप अतीत के बारे में सोच रहे थे। न मैं हूँ, न आप हो। हम सब एक-दूसरे के चित्रों से, कल्पनाओं से, रिकॉर्डिंग्स से बात कर रहे हैं। ये छवियों का आदान-प्रदान चल रहा है। इसलिए इसको मिथ्या कहा जाता है।

ये जो सारा जगत कहा जाता है न, 'बेटा, जगत मिथ्या है', जगत इसलिए तो मिथ्या है। ये खम्भा आप देख रहे हो। मालूम है ये खम्भा गिर भी जाए तो भी आपको आधे सेकेंड तक लगेगा कि ये है, क्योंकि उसके गिरने की ख़बर आप तक पहुँचने में इतना सा समय लग जाएगा। ये जो रियलिटी है, ये डेफ़र्ड लाइव (स्थगित प्रसारण) है। आप टीवी पर मैच देख रहे होते हो, आपको क्या लगता है जब विकेट गिरा, तभी गिरा है? वो विकेट एक मिनट पहले गिर चुका है। अब वो रिकॉर्ड हुआ, फिर ऊपर सैटेलाइट तक गया। फिर ये हुआ, फिर आपके परदे पर आया, परदे से आपकी इन्द्रियों तक आया, इन्द्रियों से आपके मन में गया, और मन ने उसकी प्रोसेसिंग करी। उतनी देर में आपको समझ में आया कि विकेट गिरा और विकेट तो उससे पहले ही गिर चुका था।

श्रोता: रेडियो में पहले ही विकेट गिर जाता है।

आचार्य ये लो। बोले, टीवी में बाद में गिरता है, रेडियो में पहले गिर जाता है। वो होगा, क्योंकि टीवी में आने की प्रक्रिया थोड़ी ज़्यादा लम्बी है। तो टीवी में बाद में गिरता है विकेट, रेडियो पर पहले गिर जाता है। और जो स्टेडियम में बैठा है, उसके लिए और पहले गिर गया। और जो बैट्समैन खड़ा हुआ है, उसके लिए और पहले गिर गया। और स्वयं विकेट के लिए विकेट और भी पहले गिर गया। तो बताइए रियल किसको बोलें? सबकुछ तो अतीत में चल रहा है। सबकुछ अतीत में चल रहा है।

एक बहुत विचित्र स्थिति पैदा हो सकती है कि विकेटकीपर बहुत शार्प (तेज़) हो — क्रिकेट तो आपको पता है न — अब गिल्ली उड़ी, ये कीपर ने तो देख ली, पर अभी अम्पायर नहीं देख पाया क्योंकि उसकी दूरी ज़्यादा है, बाईस गज का फ़ासला है। तो कीपर के देखे तो विकेट गिर गयी, अम्पायर के देखे गिरा ही नहीं है। इतनी देर में कीपर ने अपील भी कर दी और अम्पायर ने बोल दिया, 'नॉट आउट'। क्योंकि अम्पायर तक अभी ये सूचना पहुँची ही नहीं है कि बेल डिसप्लेस हो चुकी हैं।

ये हाइपोथेटिकल (काल्पनिक) है, पर समझो। ये थॉट एक्सपेरिमेंट (चिन्तन प्रयोग) है एक तरह का, क्योंकि टाइम गैप (समय अन्तराल) है भाई। कीपर विकेट से बिलकुल सट कर खड़ा है, तो उसको तो दिख गया कि गिल्ली उड़ गयी है पर वो इन्फ़ोर्मेशन (सूचना) अम्पायर तक जाने में थोड़ा वक़्त लगेगा। ये हाइपोथेटिकल है। ये डिस्टेंसेज़ (दूरी), स्पीड ऑफ़ लाइट (प्रकाश की गति) के तुलना में इतने छोटे हैं कि हम जो बात कर रहे हैं, उनका कोई अर्थ नहीं है। स्पीड ऑफ़ लाइट सोचिए और ट्वेंटी टू यार्ड सोचिए; कोई तुलना ही नहीं है। लेकिन फिर भी समझो।

ऐसा बिलकुल हो सकता है कि सारी अम्पायरिंग ग़लत हो जाए। कीपर ने अपील करी, अम्पायर कह रहा है अभी गिल्ली तो गिरी नहीं, तो अम्पायर ने बोल दिया 'नॉट आउट'। फिर थर्ड अम्पायर तक बात गयी। उसने कहा ये तो आउट है। हम हमेशा अतीत में ही जीते हैं। वर्तमान जैसा…?

श्रोता: कुछ नहीं होता।

आचार्य: जे के इसीलिए बार-बार बोला करते थे कि जहाँ थॉट आ गया, वहाँ टाइम आ गया। आपमें से किसी ने बोला, मैंने जब बोला टाइम क्या है, तो आपने बोला *थॉट*। अब समझ में आ रही है बात? आप जिसको भी कहते हैं परसेप्शन (अनुभूति) या एक्सपीरियंस (अनुभव) उसमें हमेशा क्या होता है? एक टाइम लैग (समय अन्तराल) होता है, क्योंकि उसमें विचार बीच में होता है।

विचार माने यही नहीं कि *थिंकिंग*। जो मेंटल एक्टिविटी (मानसिक गतिविधि) है उसको थॉट बोलते हैं, भले ही उसमें कॉन्शियस थिंकिंग इनवॉल्वड (बोधयुक्त सोच शामिल) हो चाहे न हो। तो उसको थॉट मत बोलिए, मेंटेशन बोलिए, *मेंटेशन*। जहाँ कहीं भी माइंड इनवॉल्वड है, वहाँ टाइम इनवॉल्वड है। और अगर टाइम इनवॉल्वड है तो प्रेज़ेंट कहाँ है? टी इज़ इक्वल टू जीरो तो हमें कभी मिलता ही नहीं।

ये स्पष्ट हो रही है बात?

तो हम छवियों में जीते हैं। ये सबकुछ जो हमें प्रतीत हो रहा है, वो प्रतीत ही हो रहा है मात्र। वो है नहीं। ठीक है? वर्तमान सिर्फ़ उसके लिए सम्भव है जो जाकर बैठ गया है एकदम वहाँ आधार में (मूल बिन्दु में)। अब उसको जो कुछ प्रतीत हो रहा है उससे लेना-देना नहीं रहा। वो अपनी पहचान के लिए समय पर आश्रित नहीं रहा। वर्तमान में कौन जी रहा है? जो अपनी पहचान के लिए समय पर आश्रित नहीं है।

इसके अलावा वर्तमान में जीने का कोई तरीक़ा नहीं है। देह बनकर, इन्द्रियाँ बनकर, मन बनकर और विचार बनकर वर्तमान में जीने का कोई तरीक़ा नहीं है। वर्तमान में सिर्फ़ वही है जो वहाँ बैठ गया है जहाँ वह प्रकृति पर आश्रित नहीं है। तो प्रकृति में अब जो भी हलचल चल रही है, वो देख रहा है, लेकिन उस पर डिपेंडेंट (आश्रित) नहीं है कि इससे मेरी कामना पूरी हो जाएगी, इससे मुझे नाम मिल जाएगा, इससे मुझे हस्ती मिल जाएगी। उसको कहते हैं *लिविंग इन द प्रेज़ेंट*। और अगर आपने थोड़ा सा ध्यान दिया होगा तो आप ये भी कह देंगे कि साहब, लिविंग इन द प्रेज़ेंट एक रिडंडेंट फ्रेज़ (अनावश्यक) है। इसमें रिडंडेंसी (अनावश्यकता) है बीच में। क्या रिडंडेंसी है?

श्रोता: लिविंग प्रेज़ेंट में ही हो सकती है।

आचार्य हाँ, बहुत बढ़िया। अगर लिविंग होगी तो पास्ट में कोई जी सकता है क्या? वो तो मर गया और फ़्यूचर अभी है नहीं, तो लिविंग इन द प्रेज़ेंट का मतलब है कि लिविंग सिर्फ़ प्रेज़ेंट में ही हो सकती है। और हम तो जी रहे हैं वहाँ पी में। तो यानी हम सब क्या हैं?

श्रोता: मुर्दे।

आचार्य: तो चलो, सुनाओ रे, 'साधो, मुर्दों का गाँव।' (स्वयंसेवक को गाने के लिए कहते हैं) सिर्फ़ सुनिएगा नहीं, ध्यान भी दीजिएगा। ये पी ऐक्सिस की बात हो रही है। मुर्दे क्यों हैं? क्योंकि प्रकृति में हैं। (स्वयंसेवक गाते हैं)

प्र३: प्रणाम, आचार्य जी। आज जब मैं जिद्दू कृष्णमूर्ति जी का उल्लेख पढ़ रही थी तो उसमें वो काफ़ी ज़्यादा एक विश्लेषक और विश्लेषण के बारे में बात कर रहे थे। तो जब हम किसी समस्या को सुलझाने की कोशिश करते हैं और हम उसके विश्लेषण में लग जाते हैं, तो वहाँ पर उन्होंने एक स्टेटमेंट (कथन) बोला थी जिसमें मैं फँस गयी। मैं एक-एक लाइन , सबकुछ समझती चल रही थी, लेकिन अन्त में ये लिखा था कि विश्लेषण करने से विश्लेषक की समझ कम हो जाती है।

परन्तु मुझे लगा था कि जब तक हम किसी समस्या का विश्लेषण नहीं करते हैं तब तक उस समस्या का समाधान ढूँढा नहीं जा सकता। तो विश्लेषण करने से समझ कैसे कम हो सकती है हमारी?

आचार्य: देखिए, वो तब होता है जब विश्लेषक इस ज़िद पर अड़ा हो कि उसे बदलना नहीं है। तब जो विश्लेषण है न, वो विश्लेषक की छाया जैसा हो जाता है। वो फिर ऐसा सा हो जाता है कि आपने अपने घोड़े को खूँटे से बाँध दिया है। वो खूँटा क्या है? आपके आइ की *पोज़िशन*। उससे आप हिलना नहीं चाहते। कह रहे हैं, ‘मेरा अहंकार फ़लानी जगह पर गड़ा हुआ है, वहीं गड़ा रहेगा।' घोड़ा क्या है? आपकी विश्लेषक बुद्धि, द एनालाइज़िंग इंटेलेक्ट और आप उस पर बैठ गये हैं, और आप उसको बोल रहे हैं, ‘चल मेरे घोड़े तड़बक-तड़बक।'

शर्त आपने ये रख दी है कि जहाँ से बँधा हुआ है उससे दूर जाना नहीं है, खूँटा उखड़ नहीं सकता। ये आपने शर्त रख दी है कि खूँटा उखड़ नहीं सकता। ये आपने शर्त रख दी है, तो बताइए घोड़ा क्या करेगा। आप उसको लगा रहे हो चाबुक, क्योंकि आपके पास है एक तार्किक विश्लेषक बुद्धि। आप उसको बोल रहे हो और विश्लेषण करो, और विश्लेषण करो, लेकिन शर्त क्या रखी हुई है? जहाँ से तू बँधा हुआ है वहाँ से तू दूर नहीं जा सकता। तो घोड़ा क्या करेगा? घोड़ा वहीं उछलेगा, कूद-फाँद मचाएगा।

क्या करेगा? गोल-गोल घूमेगा। एकदम पागल हो जाएगा। कहेगा, ‘क्या आदमी है!’ या कहेगा, ‘तू सचमुच अगर चाहता है विश्लेषण हो तो उसके लिए सबसे पहले तुझे मुझे मुक्त करना पड़ेगा न।’ हाँ, तो दिक्क़त यही होती है। *द एनालाइज़िंग इंटेलेक्ट रिमेन्स कैप्टिव टू द एनालाइज़र इगो*। जो एनालाइज़र इगो है वो अपनी जगह छोड़ना नहीं चाहती और बुद्धि को कह रही है, जाओ, जाओ, जाओ, जाओ ये एनालिसिस करो, वो एनालिसिस करो। बुद्धि कैसे आगे बढ़ेगी?

आपके घर में चार रिश्तेदार, आपके स्वजन और तीन सेवक हैं। ठीक है? तो चार आपके रिलेटिव्स हो गये। तीन आपके अटेंडेंट हो गये। घर में हो गयी चोरी। और आप अब ज़बरदस्त खुफ़िया एनालिसिस करने में लगी हुई हैं कि चोरी किसने की। वही कहते हैं न कि "होशियार रहना रे नगर में चोर आएगा।" वो आ गया, हो गयी चोरी। अब आप एनालिसिस करने में लगी हुई हैं कि चोरी किसने करी। लेकिन एक शर्त आपके अहंकार ने पहले ही तय कर रखी है। क्या? पहले तो मैंने नहीं करी। दूसरे, मेरे रिश्तेदार थोड़ी चोर हो सकते हैं, क्योंकि मेरे रिश्तेदार हैं न। रिश्तेदार थोड़ी चोर हो सकते हैं।

अब ये इगो ने खूँटा गाड़ दिया है। खूँटा क्या गाड़ा है? न मैं चोर हूँ, न मेरे रिश्तेदार चोर हैं। अब एनालिसिस चल रही है ज़बरदस्त। और एनालिसिस चल रहा है, एक डिटेक्टिव (जासूस) को भी आपने बुला लिया, हायर (किराये पर लेना) कर लिया और उसको भी बोल दिया, ‘ये जो तीन हैं, इनका पूरा पता लगाओ, उनकी आठ पीढ़ियों तक पूरी उनकी कुंडली खोल दी है।' सबकुछ कर दिया है। उन पर नार्को लगा दिया आपने। जितने तरीक़े के प्रयोग-परीक्षण कर सकते थे, सब कर दिये। किन पर कर दिये? उन्हीं तीन पर। तो ये एनालिसिस किसी काम आएगा क्या?

इस एनालिसिस को किसने हाइजैक (अपहरण) कर लिया? इगो ने। तो बुद्धि बहुत चलेगी लेकिन कुछ नहीं पाएगी। कुछ भी नहीं पाएगी, क्योंकि उस पर पहले ही बहुत कड़ा आपने पहरा लगा दिया है। बहुत कड़ी शर्त लगा दी है। तो कितनी बुद्धि चला लो, कुछ नहीं पता चलेगा।

ज़्यादातर जो बुद्धिजीवी एनालिसिस करते हैं उनका जो एनालिसिस है, वो इसी कमी का शिकार होता है। उन्होंने कुछ शर्तें पहले ही तय कर रखी होती हैं और उन शर्तों को तोड़ने में उनको बहुत दर्द होता है। वो कहते हैं, ‘ये तो हो ही नहीं सकता तो इस पर हमें कोई एनालिसिस नहीं करनी। और फ़लानी चीज़ तो है ही है, क्योंकि ओब्वियस है, तो उस पर भी एनालिसिस नहीं करनी।'

न तो एनालिसिस उस पर करेंगे जो हमें लगता है कि हो ही नहीं सकता और न ही एनालिसिस उस पर हम करेंगे जो लगता है कि निश्चित है, ओब्वियस है, स्पष्ट है। तो जब इतनी कड़ी शर्तें रख दी हैं, तो घोड़ा कैसे दौड़ा? घोड़ा नहीं दौड़ा, वो पागल और हो जाता है। फिर वो विक्षिप्त बुद्धि होते हैं कि सोच रहे हैं, सोच रहे हैं। देखे हैं?

अब इसमें सोच की ग़लती नहीं है। ग़लती किसकी है? खूँटे की ग़लती है जो कि सोच को मुक्त नहीं होने दे रहा। दुनिया का सबसे महँगा आपने जासूस हायर करा है पता करने को कि चोरी किसने करी। लेकिन उस जासूस को आपने आदेश क्या दे रखे हैं? सबकी जाँच-पड़ताल करना, मेरे रिश्तेदारों की मत करना। क्योंकि अगर मेरे रिश्तेदार चोर निकल आये तो मैं जियूँगी कैसे? और कोई बड़ी बात ये भी नहीं है कि रिश्तेदार भी चोर न हों (मुस्कुराते हुए)। चोरी…?

श्रोता: ख़ुद ही करी हो।

प्र३: आचार्य जी, इसी के साथ कंटेंट (सामग्री) पढ़ते-पढ़ते, क्योंकि पहले तो जिद्दू कृष्णमूर्ति समझ में नहीं आते थे, पर जैसे लगा थोड़ा-थोड़ा आ रहे हैं, तो फिर उनकी कुछ टाइम से सम्बन्धित वीडियोज़ भी देखनी शुरू करी, तो उसमें दो-तीन वीडियो देखने के बाद जो बार-बार एक निष्कर्ष निकल रहा था, वो बार-बार कहते हैं, ’टाइम इज़ थॉट एंड थॉट इज़ टाइम।'

और एक में उन्होंने टाइम , स्पेस और मेज़रमेंट को रिलेट किया है समझाने के लिए। तो वो जो उनका निष्कर्ष निकलता है वो कुछ ऐसा दिखता है कि वो थॉट से ही सबकुछ रिलेट करते हैं। जैसे आपने अभी समझाया कि एनालाइज़र जो है उसके थॉट में ही प्रॉब्लम है, जो वो सोच रहा है और क्योंकि * एनालाइज़र * ग़लत है तो उसका थॉट ग़लत है।

आचार्य: *सेंटर, सेंटर ऑफ़ थॉट*। देखिए, कृष्णमूर्ति सीधे राक्षस की नाभि में बाण मार रहे हैं। वो ये कह रहे हैं कि देखो, जिन भी चीज़ों को तुम सत्य समझते हो, ईमानदारी से बता देना, वो तुम्हारे विचार से उठी हैं कि नहीं उठी हैं। क्योंकि वो जिस समस्या से लड़ रहे थे, वो समस्या थी ओर्थोडॉक्सी (रूढ़िवादीता) की, कंज़रवेटिज़्म की। आप उन्नीस-सौ-पचास, साठ, सत्तर के दशक के दुनिया की बात कर रहे हैं, विशेषकर भारत की।

वो पैदा भी एक बहुत निर्धन परिवार में हुए थे। फिर उनको थियोसॉफ़ि (ब्रह्मविद्या) वाले ले गये थे। तो उस समय के भारत की आप दशा सोचिए कैसी रही होगी। और भारत की दशा ऐसी थी कि मैं समझता हूँ कि लगभग मजबूर होकर उन्हें ये फ़ैसला करना पड़ा था कि वो भारत में रहेंगे ही नहीं।

तो वो लगभग पूरी ज़िन्दगी अपना वहाँ अमेरिका में रहें। भारतीय भाषा में बोलें ही नहीं। आपको बहुत यदा-कदा ही मिलेगा कि कृष्णमूर्ति अंग्रेज़ी छोड़कर बोले हैं। मुझे तो कहीं पर भी रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं हुई आज तक, जहाँ वो तेलुगू में बोल रहे हों या तमिल में। तो उनकी जो मातृभाषा थी वो उसमें भी नहीं बोले। तो वो किस चीज़ को चैलेंज करना चाहते थे? वो बार-बार ये कहते थे कि तुम सब धार्मिक बनकर बैठे हुए हो और तुमने फ़लानी चीज़ को सत्य मान लिया है।

उनकी लड़ाई इस चीज़ से थी कि तुमने ट्रुथ मान लिया है किसी कॉन्सेप्ट (अवधारणा) को, किसी इमेज (छवि) को। और तुम जिसको ट्रुथ मान रहे हो, मैं तुमसे पूछ रहा हूँ, वो प्रोडक्ट ऑफ़ थॉट (सोच का उत्पाद) है कि नहीं। तो लोगों को मानना पड़ता था कि हाँ, हम जिसको भी ट्रुथ कह रहे हैं, अगर हम सो रहे हों, तो वो हमारे मन में नहीं होता। तो माने आता तो विचार से ही है। विचार से ही आता है। और जिन्होंने उसका विचार नहीं करा, उनके मन में वो आता भी नहीं है, चाहे वो कोई छवि हो, कोई सिद्धान्त हो, कोई भी बात हो।

तो कृष्णमूर्ति कहते हैं, ‘तो माने जो ये तुम्हारा सत्य का पूरा धन्धा है, तुमने सत्य के क्षेत्र में, धर्म में जो भी बातें खड़ी कर रखी हैं, वो विचार से आयी हैं।‘ विचार से आयी हैं न? इतना स्थापित कर देने के बाद वो बस फिर उस विचार की जड़ खोदने लग जाते थे। कहते थे, ‘देखो अब ये विचार क्या चीज़ है।' कहते थे, टोटली कंडिशंड चीज़ है *थॉट*। और उसी थॉट से तुमने रिलीजन का अपना पूरा संसार खड़ा कर रखा है विच इज़ ऑब्वियसली फ़ेक एंड फ़ॉल्स (जो स्पष्ट रूप से नकली और झूठा है)।

ये समझ में आ रही है बात?

तो इसीलिए आप पाएँगे कि वो बार-बार थॉट पर चर्चा करते हैं, क्योंकि आपके पास जो कुछ भी है वो थॉट से ही आ रहा है न। आप जो भी बोलते हो दिस, दिस, दिस, दिस , वो है तो थॉट रिलेटेड ही न। और अगर आप थॉट को ही इनवैलिड (अमान्य) किसी तरह से प्रूव (सिद्ध) कर दो, तो आप जो भी चीज़ें पकड़ कर बैठे हो, वो सब-की-सब एक साथ क्या हो जाएँगी? इनवैलिड हो जाएँगी। तो ये उनकी पद्धति है।

तो वो बार-बार पूछेंगे, आप उनके पास जाएँगे, वो पूछेंगे, ’इज़ फ़ेथ अ प्रोडक्ट ऑफ़ थॉट ?’ (क्या आस्था विचार का उत्पाद है?) और अगर आपने कह दिया 'हाँ', तो कहेंगे, ’गेट लॉस्ट यू फ़ेथलेस पर्सन' (भाग जाओ तुम विश्वासी आदमी)। और ज़्यादातर जो हमारी फ़ेथ होती है वो थॉट के बिना होती ही नहीं है। आप उनके पास जाएँगे, कहेंगे, ’इज़ लव अ प्रोडक्ट ऑफ़ थॉट ?' (क्या प्रेम विचार का उत्पादन है?) और अगर आपने कह दिया 'हाँ, मेरा तो ऐसा ही है कि मुझसे अगर किसी ने प्रपोज़ भी करा था तो मैंने कहा था सोच कर बताऊँगा, *आइ विल थिंक इट ओवर*। सुना है कि नहीं?

सोच कर बताएँगे तो कृष्णमूर्ति पूछेंगे, ’इज़ लव अ प्रोडक्ट ऑफ़ थॉट?’ , और आपने कह दिया ' यस ,' तो कहेंगे, *’गेट आउट, लवलेस पर्सन।*।'

तो आप जिन भी चीज़ों को सेकरड (पवित्र) मानते हो या महत्वपूर्ण मानते हो, उसमें तो बस यही पूछेंगे, 'ये तुमने थॉट से पैदा करा है क्या?’ तुमने अपना भगवान क्या विचार से निकाला? और अगर तुम्हारा भगवान भी विचार की पैदाइश है तो हटाओ ऐसे भगवान को — ये उनका तरीक़ा है।

प्र३: धन्यवाद, आचार्य जी।

आचार्य: वो (मॉडल) जो सामने आपके है, उसमें थॉट कहाँ पर है? थॉट कहाँ है उसमें? वो जो आगे-पीछे दो तीर हो रहे हैं वो थॉट है। वो थॉट है। और वही जब स्थूल हो जाता है तो वो ऐसे दिखायी देता है (गिलास को उठाते हुए बताते हैं)। जब सूक्ष्म है तो कहाँ है? तो विचार है कि मैं इसको उठा लूँ (सिर की ओर इशारा करते हैं)। और वही विचार स्थूल हो जाता है तो ऐसा दिखायी देता है। लेकिन चीज़ एक ही है। पहले यहाँ (सिर में) होती है, फिर (बाहरी जगत में)।

है वो यही, आदान-प्रदान, वही थॉट है, वही एक्शन है। तो थॉट और एक्शन में कोई गुणात्मक अन्तर नहीं होता है। अन्तर किसका होता है? बस मात्रा का होता है या सटलिटी (सूक्ष्मता) का। सूक्ष्मता का अन्तर होता है। डायमेंशन (आयाम) का या क्वालिटी (गुण) का नहीं अन्तर होता।

हम कैसे सिद्ध करेंगे कि थॉट भी वहीं पर है? (मॉडल की ओर इशारा करते हुए)

देखो, जैसे ये है (गिलास हाथ में उठाते हैं), यहाँ तो सिद्ध करना आसान है कि साहब, इंटरएक्शन करने के लिए एक 'मैं' चाहिए और एक…। ठीक है न? तो ये इधरवाला तीर (गिलास से पानी पीते हैं) और एक उधरवाला तीर (गिलास को वापस जगह पर रखते हैं)। इसमें एक तीर ऐसा था (प्रकृति से अहम् की ओर) और एक तीर ऐसा था (अहम् से प्रकृति की ओर)। तो इसमें तो आपने प्रूव कर दिया कि यह जो घटना घटी है इन दोनों के बीच घटी है (पानी पीने की घटना)। इसी बात को आप विचार के लिए कैसे सिद्ध करोगे?

श्रोता: अतीत और भविष्य।

आचार्य और आसान है। इसको सिद्ध करने के लिए आपको बस ये कहना है, 'साहब बिना प्राकृतिक विषय के विचार हो नहीं सकता।' आप विचार करके दिखा दो जिसमें पी न मौजूद हो। जैसे मैं चाय पी नहीं सकता बिना चाय के। एक स्थूल कर्म करने के लिए विषय चाहिए न। मैं एक स्थूल कर्म कर रहा हूँ, उसके लिए क्या चाहिए?

श्रोता: स्थूल विषय।

आचार्य अच्छा विचार सूक्ष्म कर्म है, लेकिन उसके लिए भी क्या चाहिए? चलो, विचार करके दिखाओ जिसमें कहीं प्रकृति नहीं आती हो। विचार में हमेशा ये दोनों ही मौजूद होंगे। कौन-कौन?

श्रोता: विचार और विचारक।

आचार्य विचारक और प्रकृति। विचारक होगा और प्रकृति होगी। तो एक विचारक होगा, आइ और एक प्रकृति होगी। कोई-न-कोई आपके पास विषय होगा प्रकृति का विचार उसी से सम्बन्धित होगा।

प्र४: नमस्ते, आचार्य जी। तो मेरा प्रश्न जो आपने कल समझाया था और कृष्णमूर्ति जी ने बोला है, उसके सन्दर्भ में है। तो मुझे यह समझना है कि वर्ड्स (शब्दों) को यूज़ करके हम टाइमलेस (समयातीत) कैसे हो सकते हैं? अगर मैं कृष्णमूर्ति जी की बुक पढ़ रहा हूँ और उसमें उन्होंने क्रोनोलॉजिकल टाइम, सायकोलॉजिकल टाइम की बात करी है तो मेरे लिए तो वो शब्द हैं, और मैं उनको जब पढ़ता हूँ तो मेरी मेमोरी (स्मृति) में भी चले जाते हैं।

उनको फिर मैं बाद में रिकॉल भी कर सकता हूँ कि उन्होंने ऐस बोला था, वैसा बोला। अब इस इन्फ़ोरमेशन को यूज़ करके कि अगर वो टाइम की भी बात कर रहे हैं तो मैं तो उन वर्ड्स में ही फँसा रह गया न। मैं उससे उस टाइमलेस स्टेट में कैसे जा सकता हूँ?

आचार्य: नहीं, वर्ड्स का ये काम ही नहीं होता कि आपको टाइमलेस स्टेट में ले जाएँ। वर्ड्स का काम होता है दूसरे वर्ड्स को काटना। झाड़ू आपको सफ़ाई नहीं देता है। झाड़ू का काम होता है कचरा बाहर करना। झाड़ू का नाम सफ़ाई होता है क्या? तो वर्ड्स का नाम टाइमलेसनेस नहीं हो सकता। सही शब्द झाड़ू की तरह होते हैं। वो जो व्यर्थ के शब्द दिमाग में होते हैं, वो उनको काटने भर का काम करते हैं। और इसलिए ये नहीं करना होता है कि आप कोई ब्रश लेकर के आयें और इस मेज़ पर कुछ धूल पड़ी हुई है और उस ब्रश से धूल को हटाएँ और जाते-जाते ब्रश को इसी मेज़ पर छोड़ जाएँ। तो ये गड़बड़ बात हो जाएगी न?

या कि कोई सर्जन हो — इस तरह का आपने सुना होगा — सर्जन कई बार ऐसा कर देते हैं। सर्जरी करी और पेट में फोड़ा था, फोड़ा निकाल दिया, अन्दर रुई और कैंची छोड़ दी और उसका पेट बन्द कर दिया। तो ये गड़बड़ हो गयी न। तो शब्दों का काम ये नहीं होता है। शब्द माने जो आध्यत्मिक शब्द हैं, अच्छे शब्द, वास्तविक शब्द, जैसे कृष्णमूर्ति जी के, उनका काम ये नहीं होता कि आप उनको रट ही लो।

उनका काम ये होता है कि वो अपनी उपयोगिता सिद्ध करें। उनकी उपयोगिता ये है कि हमने भीतर तमाम तरह के अंधविश्वास और उलट-पुलट धारणाएँ पकड़ रखी हैं, सही शब्द आकर के उनको साफ़ करता है और साफ़ करने के बाद उसका कोई औचित्य बचता नहीं है तो स्वयं भी विलुप्त ही हो जाता है। हाँ, आप उसको पकड़ कर रखने लगो तो वो बात ठीक नहीं होती है।

प्र४: धन्यवाद।

Have you benefited from Acharya Prashant's teachings?
Only through your contribution will this mission move forward.
Donate to spread the light
View All Articles