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सफ़ाई इकट्ठा मत करो, इकट्ठा कचरे की सफ़ाई करो || आचार्य प्रशांत (2013)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: बाहर जो कुछ भी है वो तो एफर्ट (प्रयास) माँगेगा-ही-माँगेगा। एफर्टलेसनेस (सहजता) कहाँ होती है, एफर्टलेसनेस कहाँ होती है?

श्रोता: मन में।

आचार्य: वहाँ एफर्टलेसनेस रहे। वहाँ पर अननेसेसरली कॉन्फ्लिक्ट (अनावश्यक टकराव) न रहे। मानसिक एफर्ट का मतलब होता है—बहुत सारी बातें जो सोच रहे हैं, बहुत सारे ऑप्शन्स (विकल्प) हैं जो सामने आ रहे हैं और आप उनमें उलझे हुए हैं।

बाहर तो अगर आप एक शब्द भी बोलेंगे तो उसमें एफर्ट लगेगा-ही-लगेगा। एक शब्द भी अगर बोला जाता है तो उसमें भी कुछ एनर्जी (ऊर्जा) लगती है।

तो जो बाहर आप जो कुछ करते हैं जो भी है, शिवसूत्र जब कह रहे हैं:-

उद्यमो भैरव:।

~प्रथम उन्मेष, शिव सूत्र (१-५)

उद्यम अर्थात एक सार्थक प्रयास। भैरव — शिव का एक रूप जो अत्यंत भयानक है। इस सूत्र का शाब्दिक अर्थ यह है कि एक आध्यात्मिक सार्थक प्रयास से ही हम भैरव स्वरूप को समझ सकते हैं।

तो इसका मतलब है, वो बाहर की दुनिया में हमारे काम किसलिए होते हैं, जिसका मन अशान्त है, वो बाहर बस पाना चाहता है। जिसका मन अशान्त है, वो बाहर जो भी एफर्ट करता है वो बस पाने के लिए होता है।

'उद्यमो भैरव:’ का अर्थ है कि जब मन शान्त है, मन एफर्टलेस (प्रयास रहित) है तब बाहर पाने जैसी कोई ऑब्लिगेशन (दायित्व) नहीं रह जाती है कि बाहर कुछ पाना-ही-पाना है। वो ऑब्लिगेशन ख़त्म हो जाती है कि बाहर कुछ पाना-ही-पाना है।

और फिर बाहर जो कुछ होता है वो अगर होता है तो इसलिए कि गन्दगी है साफ़ कर दो। साफ़ कर दो, संचय नहीं कर लो, साफ़ कर दो। कुछ पाना नहीं है जीवन में। कुछ पाना नहीं है जीवन में। पाने लायक जो है वो पहले ही है। पाने लायक जो है वो पहले ही है। अधिक-से-अधिक सफ़ाई करनी है।

बात को समझिएगा?

जिसका मन शान्त नहीं है वो एफर्ट करता है पाने के लिए। हमारे जो भी एफर्ट्स होते हैं, वो पाने के लिए एफर्ट्स होते हैं, कुछ पा लो।

और जिसका मन शान्त हो गया, उसके एफर्ट्स होते है कि जो पाया ही हुआ है, जो इकट्ठा ही हुआ है वो हट किस प्रकार जाए। वो पाने के लिए काम नहीं करता, वो सफ़ाई के लिए काम करता है। उसको पाने में कोई रस नहीं रह जाता।

थॉट (विचार) को एनर्जी ही देना एक अशान्त मन का ही काम है। स्टिमुलस (प्रोत्साहन) अगर ताकतवर हो तो वो आपके भीतर एक विचार उठा सकता है, ठीक है। लेकिन वो विचार गद्दी तभी पकड़ेगा जब आपका मन पहले ही तैयार है उसको वो ज़मीन देने के लिए।

बीज, ज़मीन पर कहीं बाहर से डल सकता है। बीज ज़मीन पर बाहर से कहीं डल सकता है पर वो बीज पेड़ तभी बनेगा जब ज़मीन तैयार हो, उस बीज को अपनाने के लिए, खाद देने के लिए, पानी देने के लिए।

ये तो जानी हुई बात है कि थॉट का जो बीज होता है, जो स्टिमुलस होता है वो तो बाहर से ही आता है। बहुत पक्की बात है। आप अभी कुछ सुनें उसके फलस्वरूप कोई थॉट पैदा हो जाएगा या इस पर देखें, स्क्रीन (पर्दे) पर तो उसके कारण कोई थॉट पैदा हो जाएगा।

वो बीज है, वो इनिशियल (प्रारम्भिक) स्टिमुलस है जिसके कारण थॉट एक्टिवेट (सक्रिय) होता है। स्टिमुलस आते रहेंगे क्योंकि हम दुनिया में हैं चारों-तरफ़ से स्टिमुलस आ ही रहे हैं। हालाँकि उस स्टिमुलस पर भी जितना काम करा जा सकता है, जितना उसको साफ़ रखा जाए, उतना अच्छा होता है।

लेकिन वो नहीं पनपेगा स्टिमुलस , बीज नहीं पेड़ बनेगा अगर आपके दिमाग़ में पहले ही उसके लिए पोषण मौजूद नहीं है। दिमाग़ में ख़ुराफ़ात मौजूद है तो एक छोटे-से-छोटा बीज भी पेड़ बन जाता है। यही चीज़ है कि हम ख़ुद विचारों को एनर्जी देते हैं।

एक ही बात मैं कह रहा हूँ किसी के कान में पड़ती है, पड़कर निकल जाएगी, वो कहेगा ठीक है, हो गया। दूसरे के कान में पड़ेगी तो ये पूरी कहानी बन जाएगी। एक ही बात, एक आदमी के कान में पड़ेगी तो बस बात बनकर रह जाएगी।

दूसरे के कान में वो पूरी कहानी और कहानी पर, कहानी पर, कहानी पर, कहानी बनेगी। ये दिमाग़ का अन्तर है कि आपकी जो फंडामेंटल (मूलभूत) वृत्तियाँ हैं, वो कैसी हैं? उनकी सफ़ाई है कि नहीं है। हाँ, यहाँ पर लगेगा एफर्ड , यहाँ लगेगा।

जिसके दिमाग़ का पूरा हिसाब-किताब ही ऐसा हो गया है कि उसमें ख़ूब इकट्ठा हो गया है। उसको एफर्ट करना पड़ेगा उसको साफ़ करने के लिए और जमकर एफर्ट लगेगा। जब जमकर इकट्ठा करा है तो सफ़ाई में जमकर एफर्ट भी लगेगा। उसमें थोड़ा सा दर्द भी हो सकता है।

प्रश्नकर्ता१: चीज़ होगी-ही-होगी, इंसल्टेड फील (अपमानित अनुभव) करना आपकी चॉइस (चुनाव) होती है।

आचार्य: हाँ, और क्या? हेनेल्वे का इसीलिए इतना प्रसिद्ध है कि पेन इज़ इनएविटेबल, सफरिंग इज ऑप्शनल (दर्द अनिवार्य है, पीड़ा विकल्प है)। पेन तो संसार में होने का हिस्सा है, पेन संसार में होने का हिस्सा है।

आप यहाँ बैठे हो, शरीर बहुत बेहतर महसूस करेगा अगर यहाँ एयर कंडीशनिंग (वातानुकूलित) भी हो। अभी कई लोगों के थोड़ा पसीना छलक आया होगा। एयर कंडीशनर चल रहा हो तो वो सब नहीं होने का है।

लेकिन वो आपको प्रभावित उसी, इसी रूम में बैठे हुए दो अलग-अलग लोग हो सकते हैं। एक जिसको उस छलके हुए पसीने के कारण बार-बार ये ख़्याल आये कि यार आई एम फीलिंग अनकंफर्टेबल (मैं असहज अनुभव रहा हूँ)।

और दस बातें और ख़्याल में आ जाएँ। पसीने से आपको कोई और स्थिति याद आ सकती है आपको पसीना था। वो विचार आपको कहीं और ले जा सकता है, और कहीं और ले जा सकता है। जैसा मैं कह रहा था कि कहानी पर, कहानी पर, कहानी पर, कहानी खड़ी हो सकती है।

और एक दूसरा आदमी होगा उसको भी शायद उतना ही पसीना आ रहा होगा क्योंकि शरीर एक से ही है। लेकिन उसके मन में कोई कहानी आगे नहीं बढ़ रही है। और ये काम संयोगवश नहीं होता कि ये तो रैंडमनेस (यादृच्छिकता) है कि एक आदमी इतना सोच गया और दूसरा नहीं सोच पाया।

इस दूसरे आदमी ने सावधानीपूर्वक दो काम करे हैं। पहला—कचड़ा इकट्ठा होने दिया नहीं है या परिस्थितियाँ अनुकूल रही हैं जिस कारण कचरा इकट्ठा हुआ कम है। और दूसरा—इसने सफ़ाई जमकर करी है।

उस सफ़ाई का ही परिणाम होता है जो डे-टू-डे (दिन-प्रतिदिन) लिविंग (जीना) होती है। आपका मन कैसा है? उसका इंडिकेटर (सूचक) आपकी डे-टू-डे लिविंग है। आप यहाँ बैठे हो और मन कहीं उड़ गया तो बस यही यही दिखाता है कि मन कैसा है, आपने पूरा जीवन कैसा जिया है।

आप यहाँ बैठे हो, कहीं किसी से कोई विशेष सर्टिफिकेट (प्रमाण-पत्र) माँगने की ज़रूरत थोड़ी होती है। ये जानना है, अगर कि कोई कैसा है? उसका पूरा इतिहास ही क्या है? क्योंकि आपको ही कहते हैं कोई कैसा है? तो वस्तुत: हम उसके इतिहास की ही बात करते हैं।

उसका मन कैसा है? मन, इतिहास से निकलकर आ रहा है। सब कुछ जान जाएँगे आप, आदमी जब खुली किताब है कहा जाता है तो उसका अर्थ यही है। उसकी एक हरकत देखो और सब बता सकते हो। उसका जो हार्डवेयर है, पूरा पता चल जाएगा कि कैसा है? क्या है?

अगर आपको कोई शान्त दिखता है तो ये संयोग की घटना नहीं है। ये साधना से निकली हुई बात है। उसने काम करा है, उसने मेहनत करी है अपने ऊपर। शान्ति ऐसे नही टपक पड़ती है या फिर वो ज़बरदस्त रूप से सौभाग्यशाली रहा है कि उसकी कंडीशनिंग (अनुकूलन) हुई ही नहीं।

इन दोनों में से एक ही चीज़ हो सकती है, या तो उसको पता नहीं ऐसा वातावरण मिल गया है जहाँ उस पर धब्बे लगे ही नहीं या उसने ज़बरदस्त सफ़ाई करी है अपनी। पहली बात की सम्भावना नगण्य है, ऐसा होता नहीं कि आपके धब्बे लगें नहीं। संसार का मतलब ही है, धब्बे।

तो कंडीशनिंग तो होगी, हमेशा होगी। जब ये स्थिति आ जाए जहाँ पर ये समझ में ही न आये कि मैं इनफ्लुएंस्ड (प्रभावित) हूँ। वहाँ पर उनको थोड़ा रुककर के पाँच मिनट बताना पड़ेगा कि तुम कंडीशन्ड (अनुकूलित), इनफ्लुएंस्ड सिर्फ़ तभी नहीं हो जब कोई ज़ोर से, दिखाकर के, चिल्लाकर के तुमको गुलाम बनाये।

अब ये पंखा है, ये अपना बड़ा दोस्त है। इसका उदाहरण सब बता देता है। दो तरह से किसी से काम कराया जा सकता है। बोलूँ कि अगर मैं अभी तुमसे कहूँ कि यहाँ पर वैसे ही नाचो, वैसे ही गोल-गोल घूमो जैसे ये पंखा घूम रहा है।

तो तुम कहोगे मुझसे ज़बरदस्ती करायी जा रही है। है न? क्योंकि स्पष्ट दिख रहा है कि मैं तुमसे कुछ करवाना चाहता हूँ। कोई बाहरी प्रभाव है जो तुमसे काम करवा रहा है। लेकिन एक दूसरा तरीक़ा है वो ये है कि मैं तुमको पंखा ही बना दूँ। मैं तुमसे ये न कहूँ कि पंखे की तरह घूमो। मैं तुमको पंखा बना ही दूँ।

मैं तुम्हारे ही दिमाग़ में ऐसे ही एक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक (विद्युत-चुम्बकीय) मोटर फिट कर दूँ। मैं तुमको पंखा ही बना दूँ। तुम्हारे दिमाग़ में मोटर ही फिट कर दूँ। जैसे इस पंखे के दिमाग़ में लगी है। और फिर तुमको लगेगा कि घूमना गोल-गोल दुनिया का सबसे स्वाभाविक काम है।

इसके अलावा और है ही क्या दुनिया में? बटन दबेगा नहीं और तुम घूमना शुरू कर दोगे। ये बड़ी खौफ़नाक चीज़ होती है। तो उसको समझाना पड़ेगा कि देखो जब बात दिखती है कि इम्पोज्ड है, थोपी गई है तो हम सब रिबेल (विद्रोह) करना चाहते हैं।

पर अगर कंडीशनिंग इतनी सूक्ष्म हो कि वो पता ही न चले कंडीशनिंग है तो आप उससे रिबेल भी नहीं कर पाते। रिबेलियन (विद्रोही) का सवाल भी तो तब पैदा होता है न, जब कुछ बचा रहे रिबेल करने के लिए।

अगर आप पूरे ही, किसी पंखे को आज तक विद्रोह करते देखा है कि मैं, कि मैं गोल-गोल नहीं घूमूँगा, मुझे सीधी चाल चलनी है। देखा है क्या? जब कंडीशनिंग इतनी पूरी हो जाए, इतनी कम्प्लीट हो जाए कि कोई बचे ही न ये जानने वाला कि मैं कंडीशन्ड हूँ तो वहाँ बड़ी दिक़्क़त होनी है।

सौभाग्य से हमारे साथ कभी ऐसा हो नहीं सकता क्योंकि हममें हमेशा वो बचा रहेगा जो जान सकता है कि हम कंडीशन्ड हैं, उसी का नाम इंटेलीजेंस (बुद्धि) है, उसी का नाम ऑबजर्वर (देखने वाला) है। वो ध्यान से देखोगे तो दिख जाएगा। फिर उनको उदाहरण देने पड़ेंगे दस तरीक़े से, वो उदाहरण हमें पता होने चाहिए।

एक जगह पर उन्होंने पूछा था, मैंने कहा था स्कर्ट (घाघरा) पहनना पसन्द करोगे? बोले, ‘नहीं।’ मैंने कहा, हैं दुनिया में देश जहाँ पर अच्छे-अच्छे मर्द स्कर्ट पहनते हैं।

और ये फ़क्र की बात होती है कि हमने स्कर्ट पहन रखी है। तुमको भी स्कर्ट पहनने को कह दिया जाए तो ये तुम्हारे लिए बड़ी शर्मिंदगी की बात हो जाएगी कि हमको स्कर्ट पहनाकर घुमा दिया। और वहाँ स्कर्ट पहनकर घूम रहे हैं।

इस बात को समझो न?

तुम जब छोटे से थे। तभी से तुम देख रहे हो कि तुम्हारी बहन को स्कर्ट पहनाई जा रही है, तुम पैंट पहन रहे हो। और ये एक स्वाभाविक बात की तरह तुम्हारे मन में प्रवेश करायी गई। तुमको ये लगा ही नहीं कि मेरे साथ ज़बरदस्ती की जा रही है। तुमको यही लगा कि ये तो ऐसा होता ही है।

जैसे सूरज बड़ा और चाँद छोटा होता है ठीक वैसे ही लड़की स्कर्ट और लड़का पैंट पहनता है। तुमको लगा ये तो दुनिया का कोई नियम ही है, कोई मूलभूत बात है। न, मूलभूत बात कुछ नहीं है, धीरे-धीरे तुम्हारे दिमाग़ में इसको घुसा भर दिया गया था।

प्र२: सबसे घटिया यहाँ पर सवाल होता है। ज़बरदस्ती का कंक्लूजन (निष्कर्ष) तो क्या स्कर्ट पहनना शुरू कर दें? मतलब बात कुछ और कही जा रही होती है।

आचार्य: इसका जवाब वही है कि हाँ, पहनना तुम शुरू भी कर दोगे। क्योंकि जो आदमी दूसरों के कहने पर पैंट डाल सकता है वो किसी और के कहने पर स्कर्ट भी डाल सकता है।

लेकिन तुम चाहे पैंट पहनो, चाहे स्कर्ट पहनो तुम रहोगे फिर भी नंगे। क्योंकि न तुमने पैंट अपनी मर्जी से पहनी थी, अपनी समझ से पहनी थी। न तुमने स्कर्ट अपनी समझ से पहनी है।

आओ चलो, पैंट को समझते हैं। बताओ मुझको कि ये आदमी का शरीर है, ये उसकी एनाटोमी (शरीर रचना) है मुझे बताओ पैंट जैसी चीज़ क्यों होनी चाहिए?

और दुनिया भर में हज़ार और आवरण होते हैं जो पहने जा सकते हैं कमर से नीचे हम वो क्यों नहीं पहन सकते, पैंट ही क्यों? अच्छा बताओ ये शर्ट है इसके नीचे पजामा क्यों नहीं पहन सकते? अच्छा हँसो मत?

अभी तुम सोच रहे हो, तुमको अजीब सा लग रहा है कि शर्ट के नीचे पजामा अजीब लगेगा। तुम्हें अजीब ही इसीलिए लग रहा है क्योंकि तुमने किसी को पहने देखा नहीं। अगर एक ऐसा देश हो जहाँ लोग बचपन से ही शर्ट के साथ पजामा पहनते हों तो उनको बहुत स्वाभाविक सी बात लगेगी कि शर्ट के साथ पजामा।

और दक्षिण भारत में शर्ट के नीचे पैंट कम पहनी जाती है और लुंगी। तुम्हारे लिए अजीब सी बात होगी कि एक अच्छी फॉर्मल शर्ट के नीचे, कोई पैंट की जगह लुंगी कैसे पहन सकता है?

समझ रहे हो?

तो सिर्फ़ यही चीज़ कि कपड़े कितने तरीक़े के होते हैं। उसको तुम देखोगे तो तुम हैरान रह जाओगे। तुमने ये कभी सोचने की कोशिश की कि शर्ट का यही रूप क्यों होना चाहिए? और तुम उसको पहने जाते हो, पहने जाते हो।

दो-चार लोगों को ऐसे ही उठाकर पूछिए कि तुमने कभी ये जानना चाहा कि कॉलर होना ही क्यों चाहिए। पर हमको ये लगता है कि बहुत नेचुरल (प्राकृतिक) सी बात है। उसमें नेचुरल कुछ नहीं है तुमको सिर्फ़ आदत लग गयी है।

और सोचो अगर एक ऐसी चीज़ में भी आदत लग सकती है जो तुम्हारे ठीक सामने है। जिस पर तुम कभी भी सवाल उठा सकते हो तो उन चीज़ों की आदत कितनी ज्यादा लगेगी जिन पर सवाल उठाना ही मना है।

तुम बचपन से ही मुक्त थे, तुम किसी से कभी भी कह सकते थे कि शर्ट में कॉलर नहीं चाहिए, मुझे बिना कॉलर की शर्ट बनवाकर दो पर तुमने कभी कहा नहीं। और भारत में कॉलर जो है वो एक बहुत न्यूसेंस (बाधा) चीज़ ही है।

आपको कॉलर चाहिए नहीं पर आप फिर भी कॉलर पहन रहे हो। एक गर्म देश में, एक उमस वाले देश में कॉलर सिर्फ़ आपको परेशान करेगा और पसीना जमा होगा यहाँ गर्दन पर, कॉलर से इतना ही होने वाला है। आपको कोई फ़ायदा नहीं दे सकता कॉलर।

ठंडे देशों में वो आपको बचाएगा। गरम देशों में उससे आपको खुजली और पैदा हो जाएगी, गर्दन के पीछे। और इरिटेटेड (चिढ़ा हुआ) और महसूस करोगे, हर समय कॉलर लगा हुआ है।

लेकिन आप सवाल नहीं करते जबकि इसमें कोई धार्मिक बात नहीं है, इसमें कोई बड़ा विद्रोह नहीं करना है। तो सोचो जिन बातों में विद्रोह करना है, वहाँ तो तुम सवाल बिलकुल ही नहीं कर पाओगे। जहाँ सवाल करना इतना आसान था, वहाँ भी नहीं कर पाये क्योंकि वो बात बहुत नॉर्मल (सामान्य) लगने लग गई।

तो जहाँ बात धार्मिक किस्म की हो, थोड़ा सेंसिटिव (संवेदनशील) किस्म की हो। वहाँ पर कैसे सवाल उठा पाये होगे? नहीं उठा पाये न? तो जब तुम कहते हो कि नहीं सब सपोर्टिव (सहायक) है तो तुम बस इतना ही कह रहे हो की मेरी और उनकी सोच एक सी है।

जब तुम कहते हो कि मेरे दोस्त सपोर्टिव रहे हैं, उस सपोर्टिव का अर्थ तुम्हारा बस इतना है, वो भी वही सोचते हैं जो तुम सोचते हो। और उसी को कबीर साहब ने कहा है—

'अंधा-अंधे ठालिया।' जाका गुर भी अंधला, चेला खरा निरंध। अंधा−अंधा ठेलिया, दून्यूँ कूप पड़ंत॥ कबीर साहब

एक अंधा, दूसरे अंधे को सपोर्ट (सहायता) कर रहा है। अब ये सपोर्ट है या क्या है? वो भी कंडीशन्ड , तुम भी कंडीशन्ड। तुम्हारे आपसी सपोर्ट का कोई अर्थ बनता है। ये सपोर्ट तो नहीं हो सकता न?

उनसे पूछा था कि एक अगर चूहेदानी हो, उसमें चार चूहे हों तो वो आपस में एक-दूसरे को क्या सपोर्ट करते होंगे? क्या कर सकते हैं सपोर्ट ? और बन्द हैं, हमेशा से बन्द हैं। क्या सपोर्ट करेंगे एक-दूसरे को?

उनको सपोर्ट भी तो कोई ऐसा ही करे न जो उनसे सब अलग हो। जो उनकी दुनिया से बाहर का हो। उनकी दुनिया में बस इतना सा है। उनको अगर उससे बाहर भी निकलना है, अपनी चूहेदानी से उसको उनको अगर बाहर भी निकालना है तो उनको कोई बाहर वाला चाहिए।

पर बाहर वाले से उनका कोई परिचय ही नहीं है क्योंकि उनको तो वही चार लोग पता हैं जो उनके पिंजरे के ही अन्दर हैं। अब पिंजड़े के अन्दर के चार चूहे कुछ भी कर लें, पर क्रान्ति नहीं कर सकते।

यूनियन (संघ) बाजी कर सकते हैं, नारे लगा सकते हैं पर कभी पिंजड़े से बाहर तो नहीं आ पाएँगे, कि आ पाएँगे? कितना भी ज़ोर लगा लें, अन्दर के चार चूहे मिलकर के पिंजड़े से बाहर तो नहीं आ पाएँगे?

प्र३: सर, उनके लिए तो वो पिंजरे से बाहर ही हैं।

आचार्य: उनके लिए वो पिंजरे से बाहर ही हैं। बस-बस, यही-यही। और यही कारण है कि वो सदा अन्दर रहेंगे। जो अन्दर होते हुए ही ये मान ले कि मैं बाहर हूँ। उसकी सम्भावना बड़ी कम हो जाती है बाहर आने की।

इसीलिए ये जो पूरा सेल्फ अवैरनेस (आत्म-जागरूकता) का आयोजन है, ये हमेशा से कुछ लोगों के लिए ही रहा है। जिन्हें सबसे पहले ये दिखाई दे जाए कि हम चूहे हैं जो बंद हैं। जिनको अभी यही भ्रम हो कि हम तो मुक्त हैं, उनकी मुक्ति नहीं हो सकती।

तो बहुत हंबलिंग (नम्रतापूर्वक) चीज़ है। पहले तो ये देखना पड़ता है साफ़-साफ़ और उस पीड़ा से गुजरना होता है कि मैं चूहा हूँ और मैं पिंजरे में बन्द हूँ। उसके बाद ही उस पिंजड़े से बाहर आने का कोई रास्ता सम्भव हो पाता है। ये काम कष्ट देता है अहंकार को, चोट लगती है।

कृष्णमूर्ति इसी को कहते हैं न— फर्स्ट स्टेप इज़ अ लास्ट स्टेप (पहला कदम ही लास्ट कदम है)। पहला ही कदम अगर ले लिया ठीक-ठीक कि मैं चूहा हूँ जो पिंजरे में बन्द है, फर्स्ट स्टेप तो अब लास्ट स्टेप दूर नहीं है। उसी को वो फर्स्ट एंड द लास्ट फ्रीडम (पहली और आख़िरी आज़ादी) भी बोलते हैं।

इट रिक्वायरस ग्रेट फ्रीडम टू सी एंड अनकंडिशनली एकनॉलेज दैट आई एम अ रैट इन अ ट्रैप, आई एम अ रैट इन अ ट्रैप (यह देखने के लिए बहुत बड़ी आज़ादी और निष्पक्ष रूप से स्वीकार चाहिए कि मैं चूहा हूँ और मैं पिंजरे में हूँ)।

वंश यू हैव सीन दैट्स अ वेरी हंबलिंग थिंग्स (एक बार ये आपको दिख गया, वो फिर बहुत विनम्रता की बात होती है)। दिमाग़ भन्ना जाएगा और मन यही करेगा कि इस बात को ठुकरा दो, स्वीकार ही मत करो। मैं स्वीकार नहीं करूँ तो शायद मैं चूहा ही न रहूँ। मन का विशेष तर्क है ये कि मैं अगर स्वीकार ही न करूँ तो मैं चूहा ही नहीं रहूँगा।

बड़ी ईमानदारी चाहिए होती है, बड़ी मजबूती चाहिए होती है, ये स्वीकार करने के लिए—'मैं चूहा हूँ और मैं बन्द हूँ।' देयर इज़ अ फर्स्ट फ़्रीडम एंड द लास्ट फ़्रीडम इज़ नॉट फार अवे, इन फैक्ट इट्स वेरी क्लोज़ बैक (वहाँ पहली आज़ादी है, और आख़िरी आज़ादी दूर नहीं रहती, वास्तव में वह बहुत पास होती है)।

प्र४: सर, अगर चूहे को पता भी चलने लगे कि वो पिंजरे में है और वो बाहर निकलने की कोशिश करे तो उसके ऊपर बहुत सारी बेट (चूहे का दाना-पानी) फेंकी जाती है। अन्दर के, अन्दर से बाहर की, जिससे कि वो कभी बाहर निकल ही ना पाए।

आचार्य: वो बेट किसके लिए फेंकी जाती है?

प्र४: वो बेट कि यानी अगर हम बाहर निकल गये तो वो सर्वाइव (जीवित रहना) नहीं कर पाएँगे।

आचार्य: हिमांशू, चूहा अन्दर ही रहा आये, इसके लिए चूहे को तुमने कहा बहुत सारी बेट फेंकी जाती है, दाना-पानी।

प्र४: नहीं-नहीं, चूहे को अगर पता चल चुका है कि वो ट्रैप (जाल) के अन्दर है वो बाहर निकालना चाहता है। अब निकालने का जो प्रोसेस (प्रक्रिया) होता है उसके लिए जो अन्दर वाले, जो अन्दर वाले जो चूहे हैं वो उसको बेट फेंकेंगे।

आचार्य: अन्दर वाले चूहे उसको बेट फेंक रहे रहे हैं।

प्र४: वापस लाने के लिए।

आचार्य: समझो तो? अन्दर वाले चूहे किसको बेट फेंक रहे हैं? एक चूहे को?

प्र४: हाँ।

आचार्य: चूहे को। उस बेट से आकर्षित कौन होगा?

प्र४: आकर्षित होना तो हमारे हाथ में होगा।

आचार्य: चूहा ही तो आकर्षित होगा होगा?

प्र४: हाँ, चूहा ही।

आचार्य: और अगर तुम जान जाओ कि मैं चूहा तो हूँ ही नहीं। तो वो बेट तुम्हें आकर्षित करेगी?

प्र४: नहीं, बिलकुल नहीं।

आचार्य: वो बेट भी तुम्हें तब तक आकर्षित कर रही है जब तक तुमने अपने आप को चूहा बना रखा है।

श्रोता: बेट क्या होती है?

आचार्य: कुछ दाना-पानी, समथिंग टेम्टिंग (कुछ मोहक)। इसको समझिएगा थोड़ा? जो चूहा है, जो ट्रैप है, जो बेट है, उसको समझिए, क्या है पूरा मामला? आप अन्दर बन्द ही तभी तक हो जब तक आपने अपनेआप को चूहा मान रखा है। क्योंकि वो जो ट्रैप है वो सिर्फ़ चूहो को कैद कर सकता है।

समझ रहे हो?

वो जो ट्रैप है, जो पिंजड़ा है, जो चूहेदानी है वो सिर्फ़ चूहों को ही फँसाने के लिए बनी है। वो सिर्फ़ चूहों को ही फँसाने के लिए बनी है। उसमें आपको फँसाए रखने के लिए, आपको जितने लालच दिये जा रहे हैं वो सारे लालच सिर्फ़ चूहों को आकर्षित कर सकते हैं।

जिस क्षण आपने पहचान लिया कि मैं कौन हूँ? चूहा होना मेरा स्वभाव नहीं। उस क्षण वो बेट आपको आकर्षित ही नहीं करेगा। वो आपके सामने रोटी डालेगा, सड़ी हुई; चूहे को क्या डाला जाता है?

प्र४: बेट कुछ और हो, बेट ये हो कि तुम बाहर निकालो, मैं सुसाइड (आत्महत्या) कर लूँगा। मैं मज़ाक नहीं कर रहा इसमें वियर्ड साउंड (अजीब लगना) करेगा ये।

आचार्य: हाँ, बिलकुल समझ रहा हूँ। पर वो जो बात है वो किसको रोक सकती है? ये धमकी किसको रोक सकती है?

श्रोतागण: चूहे को, जो उसके जैसा ही है।

आचार्य: याद रखना ये जो डुएलिटी (द्वैत) के दो सिरे होते हैं। हमने कहा था दिखते विपरीत हैं होते एक हैं। धमकाने वाला और धमक जाने वाले में कोई बहुत अन्तर नहीं हो सकता। ये विपरीत दिख रहे हैं पर एक ही हैं। डराने वाले और डर जाने वाले में कोई विपरीत अन्तर , विशेष अन्तर नहीं होता।

एक आदमी हिंसा करने आता है आप डर जाते हो। हिंसा जो कर रहा है, लगता है कि ये अपराधी है और जो डर रहा है लगता है ये बेचारा है। जबकि सच ये है कि डर जब बाहर की ओर बहता है, तो वो हिंसा के रूप में दिखाई देता है और हिंसा जब अपने ही मन पर छा जाती है तो वो डर के रूप में दिखाई देती है।

आप डरे हो, यही डर अगर बाहर की ओर चैनलाइज़ (दिशा देना) हो जाए तो हिंसा का रूप ले लेगा और आपकी ही हिंसा जब आपके ही मन को सताने लग जाए तो डर कहलाती है। हिंसा और डर एक ही चीज़ हैं।

इसी तरीक़े से धमकाने वाला और उस धमकी से डर जाने वाला बिलकुल एक ही मिट्टी के बने हुए हैं। उनका एक्सप्रेशन (अभिव्यक्ति) बस अलग-अलग है। एक अभी धमका रहा है, दूसरा धमक जा रहा है। थोड़ी देर में वो रोल्स (भूमिकाएँ) बदल भी लेंगे, थोड़ी ही देर में वो रोल (भूमिका) बदल भी लेंगे कोई बड़ी बात नहीं है।

बात ये नहीं है कि मैं डुएलिटी (द्वैत) के एक सिरे से दूसरे पर कूद जाऊँ। बात ये है कि मैं दोनों सिरों के आगे कूद जाऊँ। वही बियोंडनेस (परेपन) है, उसी को ट्रांसेंडेंस (श्रेष्ठता) कह रहे थे। वही बियोंडनेस है।

समझ रहे हो न?

मुझे कोई कैसे डरा सकता है या लालच दे सकता है, अगर मेरे मन में डरने के या लालच के बीज, उसके लिए ज़मीन मौजूद न हो। कोई मुझे कैसे डरा पाएगा, अगर डरने के लिए मैं तैयार न हूँ, उत्सुक न हूँ? कोई मुझे लालच कैसे दे पायेगा, अगर मैं लालची न हूँ। आप बताइए? कोई मुझे लालच दे कैसे पायेगा, अगर मैं लालची न हूँ।

हमें ये बहुत ध्यान से देखना होगा। हमको डराने वाला तत्व — देखिये एक इसको आप चाहें तो एक फार्मूले की तरह जीवन में इस्तेमाल कर लें — जब भी कभी कोई बहुत हावी हो रहा हो आपके ऊपर; कोई परिस्थिति, कोई व्यक्ति, या कुछ भी, कोई विचार तो उससे लड़िए मत। अपने मन को तलाशिए कि उसमें ऐसा क्या है, जिसका उपयोग करके वो व्यक्ति आपको नचा रहा है।

अगर कोई आप पर हावी हो रहा है तो अपने मन को तलाशिए कि उसमें ऐसा क्या है, जिसको उपयोग करके वो आपको नचा रहा है। कोई बार-बार आपके ऊपर ऐसे फंदा डालता है और आपको फँसा लेता है। तो निश्चित रूप से कुछ हुक हैं आपके पास — जिनमें वो फंदा फँस जा रहा है — आप उस फंदे से लड़ेंगे या उन हुकों को ही हटा देना चाहेंगे। बताओ न।

अगर इस दीवाल पर खूँटियाँ न हों तो आप इस पर आप अपनी शर्ट टाँगेंगे कैसे? अगर कोई बार-बार आकर के इस दीवाल पर अपने गन्दे कपड़े टाँग जा रहा है तो इसका अर्थ क्या है? इस दीवार पर खूँटियाँ मौजूद हैं।

अगर चाहते हो इस दीवार पर कोई आगे अपने गन्दे कपड़े न टाँगे तो क्या करना होगा? लोगों से लड़ूँ, पूरी दुनिया से लड़ूँ और अगर खूँटियाँ मौजूद हैं तो किसी को भी लालच हो सकता है कि लाओ यार टाँग ही दो, मस्त दीवाल है, खूँटी है लाओ इस पर टाँग दो।

खूँटियाँ मौजूद हैं तो कोई-न-कोई आ ही जाएगा यहाँ पर गन्दगी मचाने के लिए। मैं करूँ क्या? दुनिया भर से लड़ूँ, नोटिस लगाऊँ या चुपचाप वो खूँटियाँ ही हटा दूँ।

श्रोतागण: खूँटियाँ हटा दूँ।

आचार्य: खूँटियाँ हटा दूँ न? हमारे पास वो सारे खूँटियाँ मौजूद हैं जिनका लोग इस्तेमाल कर रहे हैं। उनको हटा दीजिए, कोई आपका इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। निश्चित आपको किसी बात का लालच होगा जिसका उपयोग करके कोई आप पर हावी होता है।

निश्चित रूप से आपको कोई लालच है और वो सामने वाला जानता है आपको क्या लालच है? आप वो लालच हटा दीजिए वो व्यक्ति आपके जीवन पर हावी नहीं हो पाएगा। कोई भी परिस्थिति हावी नहीं हो पाएगी। समाज में, संसार में कोई बड़े-से-बड़ा आप पर हावी नहीं हो पाएगा।

हम जो बार-बार अपनी असमर्थता का, दयनीयता का रोना रोते हैं, वो कुछ नहीं है। हम एक बड़ा दोहरा खेल खेलना चाहते हैं। हम कहते हैं, हमारा लालच भी बरकरार रहे पर हम गुलाम भी न बनें।

ये अब नियमों के विपरीत बात कर रहे हैं आप। आप चाहते हैं आपका लालच भी बरकरार रहे और आपको गुलाम भी न बनना पड़े। जहाँ लालच है वहाँ गुलामी है। जिसको गुलामी छोड़नी है उसे लालच छोड़ना होगा।

अगर आप बार-बार पा रहे हैं कि आप गुलाम बन जा रहे हैं तो देखिए कि क्या लालच है? उस लालच को हटा दीजिए, गुलामी को हटा दिया आपने।

प्र४: तो वो जो खूँटी है वो एक इंसान का सन (पुत्र), डॉटर (पुत्री) या हसबेंड-वाइफ (पति-पत्नी) बन जा रहा है या वो टैग है?

आचार्य: न-न, वो तो एक बाहरी चीज़ है। चलो पैदा हुए हो तो किसी के तो रिलेटिव (सम्बन्धी) कहलाओगे ही। वो तो एक बाहर-बाहर अगर आपको एक नाम दे दिया गया है तो कोई बड़ी बात नहीं हो गयी।

हम सब यहाँ के पास अपना-अपना नाम तो लेकर बैठे हैं न? नाम की यूटिलिटी (उपयोगिता) है एक-दूसरे से बात करने में। उस नाम के साथ क्या लालच जुड़ा है? वो देखो न? वहाँ पर कोई लालच जुड़ा है क्या?

प्र४: सर, नाम तो सिर्फ़ रिकॉग्निशन (पहचान) बताता है।

आचार्य: अगर वो सिर्फ़ रिकॉग्निशन बताए तो कोई दिक़्क़त नहीं होगी फिर उसकी यूटिलिटी बस है। पर उसके साथ कुछ और भी जुड़ गया है क्या? बेटा होना क्या है मेरे लिए? पिता की सम्पत्ति का वारिस होना तो नहीं है? पिता के घर में रहना तो नहीं है कहीं। पिता की सहूलियतों पर कब्ज़ा जमाना तो नहीं है कहीं?

अगर बेटा होने का ये अर्थ है मेरे लिए तो अब पिता मुझे डोमिनेट (हावी होना) करेगा, इसमें ताज्जुब क्या है, होकर रहेगा ऐसा। जिस बेटे की नज़र पिता द्वारा दी जा रही सहूलियतों पर हों, उस बेटे को पिता डोमिनेट करेगा-ही-करेगा। पिता का इसमें कोई कसूर नहीं। आपने खूँटियाँ तैयार कर रखी हैं कि आओ और मुझे डोमिनेट करो।

प्र५: सर, आउट ऑफ़ रिस्पेक्ट (सम्मान के बाहर) होता है न? अगर एक बेटा अपने फॉदर (पिता) की हर बात मान रहा है, समझ रहा है सबकुछ तो वो तो आपको रिस्पेक्ट है न?

आचार्य: कुछ भी नहीं है, कुछ भी नहीं है। फिर हम रिस्पेक्ट को भी नहीं समझ रहे हैं?

प्र५: मतलब इस तरीक़े की कंडिशनिंग है कि यस (हाँ) हम रिस्पेक्ट कर रहे हैं, बिकॉज दैट अलसो एक्ट एज माय फॉदर (क्योंकि वो मेरे पिता हैं)।

आचार्य: फिर हम रिस्पेक्ट भी नहीं जान रहे न? एक छोटे बच्चों को बता दिया जाए, किसी के सामने हाथ जोड़ो, ये सब करो वो करता चले तो ये बात समझी जा सकती है।

पर एक पच्चीस साल, पैंतालीस साल का आदमी भी वही सबकुछ कर रहा है। उसने समझना ही नहीं चाहा कि ये रिस्पेक्ट चीज़ क्या है? तो वो बात थोड़ी समझी जाएगी।

रिस्पेक्ट वो नहीं है जो हम समझते हैं। वो फीयर (डर) बस है। रिस्पेक्ट के नाम पर हम डरे रहते हैं कि अगर किसी से रिस्पेक्ट करते हो तो उसके सामने मुँह न खोलो। वो फीयर बस है।

रिस्पेक्ट शब्द का भी अर्थ बस इतना ही होता है, ठीक से देखना, बार-बार समझना, ध्यान से देखते रहना। सम्मान का भी वही अर्थ होता है, सम्यक रूप से मानना। पहले जानना फिर मानना।

रिस्पेक्ट का वो थोड़े ही अर्थ है कि कोई कुछ बोल रहा है चुपचाप मान लिया। ये किसने पट्टी पढ़ा दी। और ये पट्टी पाँच साल के बच्चे को पढ़ाई जा सकती है। पैंतीस साल का आदमी भी अभी क्यों माने बैठा है?

रिस्पेक्ट जैसा ही; रिस्पेक्ट जो है न ये बड़ा आर्टिफिशियल (कृत्रिम) शब्द है। बड़ा अस्वाभाविक शब्द है। प्रेम स्वाभाविक है। रिस्पेक्ट में कुछ भी स्वाभाविक नहीं है। रिस्पेक्ट मैनमेड (मनुष्य द्वारा निर्मित) चीज़ है।

रिस्पेक्ट पूरी तरीक़े से आदमी के दिमाग़ की उपज है। ठीक वैसे ही जैसे फीयर आदमी के दिमाग़ में बैठता है वैसे ही रिस्पेक्ट भी वहाँ बैठती है। लव दिमाग़ से बाहर की है।

प्रेम आपके दिमाग़ की उपज नहीं होती। प्रेम आपकी अपनी शान्त, साफ़ अवस्था है। रिस्पेक्ट बाहर से ओढ़ी हुई चीज़ है। पर होता यही है न?

बचपन से ही ये थोड़े ही कहा जाता है कि आप किसी को लिख रहे तो उसमें लिखो योर्स लविंगली (आपका प्यारा)। योर्स रिस्पेक्टफुली (आपका सम्मान सहित) और ये सब चलता रहता है।

वो कुछ नहीं है, वो सिर्फ़ व्यवस्था बनाये रखने की बातें हैं। वो व्यवस्था बनाये रखने की बातें हैं कि मैं तुम्हारे सामने झुक रहा हूँ, मैं तुम्हारे सामने झुक रहा हूँ।

अब जिसको आप योर्स रिस्पेक्टफुली लिखते हैं। उसका अहंकार एकदम और घना होगा। हाँ, मुझे रिस्पेक्ट मिल रही है। आप किसी को प्रेम करें, उसमें उसका अहंकार बहुत नहीं बढ़ पाएगा।

ख़ास तौर पर अगर वो कोई बहुत ऊँचे क़िस्म का आदमी है। उसको आप लिख दें, योर्स लविंगली। तो उसको गुस्सा और आ जाएगा। तू होता कौन है, मुझसे लव करने वाला।

रिस्पेक्ट में डर है, डर। अगर आप किसी की रिस्पेक्ट करते हैं तो आप पर उसका सम्बन्ध डर का है, एकदम घनघोर डर का है।

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