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सब आचार्य जी जैसे हो गए तो दुनिया कैसे चलेगी? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मैं आपकी काफ़ी सारी यूट्यूब लेक्चर्स देखे या सेशन (सत्र) देखे। तो जो आप चेतना की जो बात करते हो, अगर जो आपकी इच्छा या आपकी कोशिश है, मुझे पता नहीं कोशिश है कि नहीं। अगर एक कामना करते हैं या एक हाइपॉथेटिकल सिचुएशन (काल्पनिक स्थिति) देखते हैं, मान लो सारे लोगों की चेतना सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँच गयी; अगर ऐसे दुनिया की कल्पना करें, तो आपको लगता है कोई प्रॉब्लम्स (समस्या) रहेगी, कि इश्यूज (विवाद) रहेगी, कि किस टाइप (प्रकार) की दुनिया रहेगी वो?

आचार्य प्रशांत: सबसे निकट की समस्या तो मुझे यह दिख रही है कि हम उस दुनिया की कल्पना करके, उस दुनिया की समस्याएँ जानना चाहते हैं (श्रोता हँसते हैं), जो ऊँची चेतना की होगी। पहली बात तो कल्पना करनी है ऊँची चेतना की दुनिया की। कहाँ से वो कल्पना करनी है? जहाँ हम बैठे हुए हैं, अपनी वर्तमान निचली चेतना पर।

वहाँ बैठकर के आप किसी ऊँची चीज़ की क्या कल्पना करोगे? जिस तल का व्यक्ति होता है न, उसकी ऊँची-से-ऊँची कल्पना भी उसी तल की होती है। एक कुत्ता है मान लीजिए, उसके लिए ऊँची-से-ऊँची बात क्या हो सकती है? क्या हो सकती है?

श्रोतागण: हड्डी।

आचार्य: बारिश होगी तो हड्डियाँ बरसेंगी। हम कल्पना की प्रकृति को समझ नहीं रहे हैं। ‘मैं’ केंद्र में होता है, उसके चारों ओर चेतना का माहौल निर्मित होता है। वह माहौल जहाँ ‘मैं’ है, माने जहाँ आपने अपने अस्तित्व का खूँटा गाड़ रखा है, उससे बहुत दूर नहीं जा सकता।

आप किसी पशु को खूँटे से बाँध देते हैं, वह कितनी दूर जा पाता है, उस खूँटे से? तो ‘मैं’, अहम् भाव क्या है, खूँटा। कहाँ गाड़ दिया आपने, वो आपके हाथ में होता है कहाँ गाड़ना है। अब आप रस्सी कर लो लम्बी, कल्पना का मतलब है ज़्यादा लम्बी रस्सी। बहुत लम्बी रस्सी भी कर लोगे तो उड़ थोड़े ही जाओगे। खूँटे के इर्द-गिर्द ही कहीं पर घूमोगे। तो कल्पना बहुत काम नहीं आती।

और यह जो प्रश्न है इससे मैं पिछले पन्द्रह सालों से रू-ब-रू हो रहा हूँ। जब कॉलेजों में जाता था तो, पन्द्रह क्या और पहले सत्रह साल, अठारह साल, बीस साल पहले।

वहाँ स्टूडेंट्स होते थे वह फर्स्ट ईयर (प्रथम वर्ष) के हों, सेकंड ईयर (दूसरे वर्ष) के हों, फर्स्ट सेमेस्टर के हों; "पूरी दुनिया बुद्ध जैसी हो गई तो दुनिया कैसे चलेगी! बताओ?(सब हँसते हैं)।

‘अच्छा, आप तो बीटेक, एमबीए करने के बाद सब छोड़-छाड़कर आ गये, आपका पूरा बैंच ही छोड़ देता अगर तो बताओ इंडस्ट्री को प्लेसमेंट कहाँ से मिलते? आपने ग़लत किया न? सब आपकी तरह शादी नहीं करें, तो लोगों के वंश कैसे चलेंगे? बताओ! बताओ!’

छोड़ दीजिए न?

एक ऊँची दुनिया में क्या समस्याएँ आएँगी, यह आप नीची दुनिया में बैठकर के कल्पित नहीं कर सकते। कल्पना में गोते मारना छोड़ें। आप अभी जिस दुनिया में है पहले उसकी कल्पनाएँ, पहले उसकी समस्याएँ देखें।

नहीं समझे?

यह ऐसी-सी बात है कि किसी के पास दृष्टि न हो, कोई अँधा हो और कोई चिकित्सक उसका उपचार कर रहा हो, और वो चिकित्सक से कहें कि दृष्टि आ जाने के बाद मुझे किस-किस तरह की समस्या होंगी। मुझे यह सोचकर के बड़ा डर लग रहा है।

वह यह नहीं देख रहा है कि दृष्टि नहीं है तो उसे कौन सी समस्याएँ हैं, पहली बात। दूसरी बात — और ज़्यादा मूलभूत बात — जब उसके पास दृष्टि है ही नहीं, तो क्या वह उस दुनिया की कल्पना कर सकता है, जो दृष्टि आ जाने के बाद उसको मिलेगी।

आप कैसे कल्पना कर लोगे, एक बुद्ध के मन में क्या चलता है, कृष्णों की दुनिया कैसी होगी? आप कल्पना कैसे कर लोगे बताओ मुझको। क्या आप मन की मूल प्रकृति से परिचित नहीं हो? क्या आप नहीं जानते कि कल्पना सिर्फ़ पुराने अनुभव से आती है। क्या आपके पुराने अनुभवों में श्रीकृष्ण सम्मिलित हैं? क्या आपको श्रीकृष्ण से पूर्व परिचय या पूर्व अनुभव है, अगर नहीं तो आगे कैसे कल्पना कर लोगे? आप आगे की जो भी कल्पना करते हो, वह आपके पुराने अनुभवों से ही आती है। और जिस चीज़ का आपको अनुभव नहीं है, उसकी आप कल्पना नहीं कर सकते। यह बात आप सोचते ही नहीं हो।

हम अपनेआप को बहुत होशियार समझते हैं। हम सोचते हैं मुक्ति के बाद क्या होगा, वह मैं अभी बैठे-बैठे कल्पना कर सकता हूँ न। आप बँधन में हो, मुक्ति के बाद क्या होगा आप उसकी कल्पना नहीं कर सकते भई। आप कल्पना करोगे भी तो वो मुक्ति के नाम पर किन्हीं बँधनों की ही आपने कल्पना कर ली होगी और चूँकि वह बँधन होंगे, इसलिए आपको पसन्द नहीं आएँगे, तो आप कहेंगे मुक्ति के बाद जो होता है, वह हमें पसन्द नहीं आया। मुक्ति हमें चाहिए ही नहीं। कितनी ग़ज़ब चाल है न यह।

(प्रश्नकर्ता से) आपको फ़्रेंच आती है? यह सवाल में पन्द्रह साल से पूछ रहा हूँ, उन लड़कों से (हँसते हुए)। मुझे पूछते हुए भी लगता है, फिर पूछ लिया। आपको आती है? कल्पना करिए आप फ्रेंच बोल रहे हैं। करिए, करिए, (श्रोतागण हँसते हैं) करिए, करिए; करिए न? आप फ्रेंच बोलने की कल्पना कर नहीं पाते, आप मुक्ति की कल्पना कैसे कर ले रहे हो भाई। जो चीज़ आपके ज्ञान में है ही नहीं, आप उसकी भविष्य में कल्पना कैसे कर लोगे? और यह बात आपको बहुत अजीब लगेगी।

इसको आप समझ जाएँ तो आप मन के खेल से बच जाएँगे। भविष्य को लेकर आपने जितनी कल्पना बैठा ही रखी होती हैं, वह सब आपके अतीत के अनुभवों का ही एक रिसाइकल्ड (पुनरावृति) रूप होती हैं। हैं, ऐसा! हाँ। इसीलिए ज्ञानी कल्पनाओं में नहीं जीता, वह बस यथार्थ में जीता है। वो भविष्य को लेकर अरमान नहीं खड़े करता।

भविष्य के आपके अरमान, अतीत के आपके अनुभवों से आते हैं, इसीलिए वह कोई बड़ी बात होते ही नहीं। उदाहरण के लिए अगर अतीत में गरीबी है तो भविष्य के अरमानों में अमीरी आ जाएगी, बस इतना होगा।

अगर अतीत में दुख है तो भविष्य की कल्पना में सुख जाएगा। सारी कल्पनाएँ अतीत के खूँटे से बँधी होती हैं। इसलिए कल्पनाओं में जीना बहुत व्यर्थ बात होती है। और जो लोग कहते हैं न कि मैं जी इसलिए रहा हूँ ताकि आगे अपने सपने साकार करूँगा, उनसे व्यर्थ जीवन किसी का नहीं होता। क्योंकि भविष्य के सपने बस अतीत के क्षुद्र अनुभवों से आते हैं।

मुक्ति की, सत्य की, बौद्ध की कल्पनाएँ नहीं करी जा सकती और आप करोगे कल्पना तो उनको बहुत छोटी चीज़ बना दोगे। लोगों ने करी है कल्पना, बैठे-बैठे कर लेते हैं। नेत्रहीन व्यक्ति बैठे-बैठे कल्पना कर रहा है कि जब आँखें ठीक हो जाएँगी तब क्या होगा। सोचिये कैसे करेगा कल्पना, क्या कल्पना कर लेगा। उसने न कभी प्रकाश देखा, न रंग देखे, वह कल्पना करेगा भी तो क्या करेगा (हँसते हुए), हम कर लेते हैं लेकिन।

हमने अपनी समझ में श्रीकृष्ण हों, कि बुद्ध हों, राम हों, सत्य हो, बोध हो, मुक्ति हो, शिव हों, हमने सबका ख़ाका खींच रखा है। सबकी कुंडली हमारे भैजे में मौजूद है, हम सबको जानते हैं। हम कहते हैं, ‘देखो, ज़्यादा पसन्द नहीं आते हमको।‘ तुम्हें पसन्द नहीं आते, तुम नापसन्द करते हो, तुम जानते हो।

बिना जाने तुमने पसन्द-नापसन्द सब कर डाला। सब हम कर लेते हैं, और पसन्द-नापसन्द ही नहीं कर लेते, हम उनसे लड़ भी लेते हैं, जो हमसे विपरीत कल्पना रखते हैं। पता कुछ नहीं है, लड़ लिए।

चलिए आपसे फिर पूछ लेता हूँ, वही जिनसे कॉलेजी वालों से…(हँसते हुए)। मुझे लगता है कहीं आप उसी कॉलेज के तो नहीं हैं। पन्द्रह सालों में आप यहाँ तक पहुँच गये (सब हँसते। लेकिन सवाल का उत्तर आपको नहीं मिला।

काकाटुआ किन-किन लोगों को पसन्द है? काकाटुआ किस-किस को पसन्द है। अरे! हाथ खड़े कर दो, कल्पना करके। करो तो, कल्पना कर लो, करो, करो, हाथ खड़े कर दो। तो मान लीजिए इधर जितने हैं, सबने हाथ खड़े कर दिये (दायीं ओर इशारा करते हुए)।

और काकाटुआ किस-किस को नापसन्द है, अब इधर जितने हैं, इन्होंने सबने हाथ खड़े कर दिये (बायीं ओर इशारा करते हुए), हमें सख़्त नापसन्द है। फिर यहाँ दंगा हो गया, तीन-चार के सिर फोड़ दिये गये। क्योंकि कुछ को काकाटुआ पसन्द है, कुछ को नापसन्द है।

काकाटुआ है क्या? वो हमें नहीं पता, पर हमें नहीं पसन्द है तो नहीं पसन्द है। तुमने कल्पना कर कैसे ली, जब तुम जानते ही नहीं थे। पर हम ऐसे ही हैं, हम कल्पना के घोड़े बेलगाम, कहीं भी जा रहे हैं। सारी दुनिया अगर — आपने क्या कहा? — "बुद्धों जैसी हो जाएगी?"

प्र: हाईएस्ट लेवल पर सब, कोशिश हम वही करते है।

आचार्य: नहीं। कोशिश हाई जाने की नहीं होती है, सौ बार समझाया है। मुक्ति का राग छोड़ो, बँधनों की बातें करो। आप कह रहे हैं कि आपने सुना है मुझको। सुना होता तो पता होता।

ख़ास तौर पर जब उपनिषद् समागम या गीता समागम होता है, उसमें इतनी बार बोलता हूँ कि मुक्ति-मुक्ति क्या करते रहते हो, यथार्थ से आँखें चार करो और यथार्थ है, मुक्ति नहीं है, बँधन है। यह तक बोला है कि उपनिषद् सत्य का नहीं, माया का प्रतिपादन करते हैं। सत्य की वहाँ बहुत कम बात है, बँधन की बात है।

हम निरालम्ब उपनिषद में थे, वहाँ प्रश्न पूछा गया ऋषि से, ‘बँधन क्या है? मुक्ति क्या है?’ मुक्ति क्या है, इसका बड़े संक्षेप में कुछ शब्दों में उत्तर देकर के बात ही रफा-दफा कर दी ऋषि महाराज ने। बँधन क्या है, यह दर्जन श्लोक लेकर के समझाया।

किसी बताने वाले की यह बताने में कभी रुचि नहीं रही है कि मुक्ति क्या है। कोई मुक्ति की बहुत बात करे तो समझ लो अनाड़ी है। वह ऐसी चीज़ है जिसके बारे में कुछ बताया जा ही नहीं सकता, नहीं तो तुम कल्पना करना शुरु कर दोगे।

बताने वालों की हमेशा रुचि रही है आपको यह समझाने में कि बँधन क्या है, ताकि आप बँधन से बचें क्योंकि बँधन ही आपका यथार्थ है। आपको लड़ना बँधन से है। बँधन से अगर लड़ लिए तो मुक्ति तो स्वतः ही मिल जाएगी। उसकी बात क्या करनी है, बात बँधन की करनी है।

तो बुद्धों का विश्व कैसा होगा, उसकी कल्पना की ज़रूरत नहीं है। हमारा विश्व कैसा है? उसका यथार्थ जानिए, उसकी ज़रूरत है। वह काल्पनिक विश्व कैसा होगा, जिसमें सब ऊँची चेतना के होंगे।

इसकी क्या कल्पना करोगे, छोड़ो। आज का विश्व कैसा है, जिसमें सब घटिया चेतना के हैं। इसकी हक़ीक़त से रू-ब-रू होना ज़रूरी है। और जब इसको आप जान लेंगे, तो शायद वह साकार करना सम्भव हो पाये, कौन वो, ऊँची चेतना का विश्व।

और मन की चाल देखिए। देखिए, आप उस आगे वाले की कल्पना क्यों करना चाहते हो, समझो। वह लगभग वैसा ही प्रश्न है, जैसा आप दुकानदार से करते हो, जब आप कहते हो माल दिखाओ, माल।

जब वह आपको माल दिखाएगा तो आप क्या बोलोगे, ‘यह माल मुझे पसन्द नहीं आया।‘ फिर आप कहोगे, ‘देखो ऐसा नहीं है कि हम मुक्त हो नहीं सकते थे, मुक्ति तो बहुत आसान सी चीज़ थी, हमें उपलब्ध थी, हमें पसन्द नहीं आयी, हम ठुकरा के आए हैं।‘ कैसे पसन्द नहीं आयी? हमने मुक्ति की कल्पना करी, हमने करी।

हमने मुक्ति की कल्पना करी और मुक्ति वाले संसार का एक-एक कोना-कोना, चप्पा-चप्पा हमने देखा। हमने पूछा, ‘यह सब क्या है, यह बताओ? ये सब। हेलो! हेलो! समझाइए ज़रा, यह सब कैसे चल रहा है यहाँ पर?’ हमने पूरा देखा और वह डील हमें कुछ ठीक नहीं लगी, हमने कहा, ‘यह मुक्ति वगैरह बेकार की बात, हटाओ, हटाओ।‘

मन इसलिए मुक्ति की कल्पना करना चाहता है, ताकि कल्पना कर ले। उस कल्पना में कुछ गन्दगी ख़ुद ही निकाल ले। अपनी ही कल्पना करी। उस कल्पना में अपनी ही गन्दगी निकाल ली और फिर कहा यह मुक्ति वगैरह ठीक बात नहीं है।

तो हमारा जैसा चल रहा है घर, द्वार, संसार चलने दो, चलने दो। मुक्ति अच्छी चीज़ नहीं है। क्यों अच्छी चीज़ नहीं है। हमने कल्पना करके देख ली, वो अच्छी चीज़ नहीं है।

यह है कुल चाल हमारी। ख़ूब कल्पना करो, और कल्पना ही करके उसको फिर रिजेक्ट कर दो, अस्वीकृत कर दो। कह दो ठीक नहीं थी, हमने कल्पना कर ली न, ठीक नहीं थी।

तुम्हें पता क्या है और वह चीज़ ऐसी है जो जहाँ बैठे हो वहाँ बैठे-बैठे पता चल नहीं सकती। मुक्ति को जानने के लिए मुक्त होना पड़ता है। फँस गये, फँस गये, फँस गये, फँस गये।

मुक्ति ऐसी चीज़ नहीं है कि क्या आपके दिमाग़ में कुछ सूचना, जानकारी, ज्ञान डाल दिया जाएगा कि मुक्ति क्या है, और आप जान जाओगे, अच्छा जान गये। मुक्ति क्या है और मुक्तो का संसार कैसा होता है, यह सिर्फ़ वही जान सकता है, जो मुक्त है। कल्पना की बात नहीं है, जानने की बात है, जीने की बात है। जो मुक्ति को जी रहा है, सिर्फ़ वही मुक्ति को जान पाएगा। मुँह चलाने से नहीं जान जाएगा कोई।

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो। ~कठोपनिषद

कोई प्रवचन दे रहा है मुक्ति के विषय में, आपने सुन लिया तो उससे आप आत्मा को नहीं जान जाओगे। न प्रवचन करने से जान जाओगे, न प्रवचन सुनने से जान जाओगे। जिओगे तो जानोगे और कल्पना कर-करके नहीं जिया जाता। यथार्थ के धरातल पर ठोस क़दम रखकर जिया जाता है।

समझ में आ रही है बात?

अहंकार सोचता है, वह सर्वज्ञ है, महाज्ञानी है, महाज्ञानी।

कॉलेजों में जाऊँ, तो आप लोग तो अब थोड़ा सा समय बदल गया है, तो अपनी श्रद्धा से आते हैं, सहयोग, योगदान वगैरह कर-करके आते हैं। पन्द्रह साल पहले कॉलेजों में जाऊँ तो वहाँ मैनेजमेंट उन्हें ऐसे (घेरने का इशारा करते हुए) भेड़-बकरियों की तरह घेर-घेरकर भेजता था। जाओ, जाओ, जाओ। कुछ बोलने आये हैं, सुन लो।

तब यह नहीं था कि कोई तत्वज्ञ आ रहे हैं, ज्ञानी आ रहे हैं सुन लो। तब उनको यह लगता था कि कोई आइआइटी, आइआइएम से कुछ बताने आये हैं तो कुछ अच्छा ही बता रहे होंगे, सुन लो। तो मैनेजमेंट उन्हें इधर-उधर से घेरे और भेजे। अब वो एकदम ऐसे भागें जैसे जानवर भागने की कोशिश करता है, पकड़ो तो। उन्हें अन्दर भी लेआ दो तो खिड़की से कूद-कूदकर भाग रहे हैं, कुर्सियों के नीचे छुप रहे हैं, दरवाजा तोड़ दिया, यह सब हुआ पड़ा है।

तो एक जगह थी जो विख्यात थी इसी के लिए कि यहाँ जब भी जाओ तो ज़बरदस्त भागते हैं। उन्हें अगले दिन अगर पता चल जाए कि मैं आने वाला हूँ, तो वो सुबह से ही नहीं आयें कॉलेज कि हम सारी क्लासेज मिस करने को तैयार हैं, इनके सामने नहीं बैठेंगे।

तो फिर मैं औचक धावा बोलता था, फ्लाइंग स्क्वाड (उड़नदस्ता) बिना बताए। या जिस क्लास में वो बैठे हुए हैं कुछ पढ़ने के लिए, कोई है, लेब चल रही है उनकी। तो लैब में घुस जाता था, धर लेता था, भाग।

तो एक भाग रहा था, उसको मैंने दौड़ाकर पकड़ा। (श्रोतागण हँसते हैं) मैंने कहा तू रुक, लम्बा दौड़ाकर के। वो पकड़ के लाया। मैंने कहा कि क्यों भाग रहा है, ‘मैं ऐसे ही भाग रहा हूँ, माफ कर दो।‘

मैंने कहा, ‘मैं जाने दूँगा पर पहले बता भाग क्यों रहा है?’ आप अच्छी बातें नहीं करते।‘ मैंने कहा,’कौन सी बात अच्छी नहीं लगी? ‘नहीं आप अच्छी बात नहीं करते, जाने दो, प्लीज।‘ मैंने कहा, ‘बात तो बता दे कौन सी अच्छी नहीं लगती?’

तो मैंने कहा, ‘अच्छा बता किस ‘सेशन’ में मैंने कौन सी बात बोली जो तुझे पसन्द नहीं आयी, समझ नहीं आयी, क्या है, बता दे?’ ‘नहीं, कुछ नहीं बताऊँगा, जाने दो।? जब तीन-चार बार मैंने उसे पकड़ा, फिर मैंने उसे धौंस दिखाई, मैंने कहा, ‘थप्पड़ मार दूँगा बता।‘

तो पता चला उसने आज तक मेरा कोई भी सेशन अटेंड ही नहीं करा था (सब हँसते हैं)। उसने एक सेशन अटेंड नहीं करा था, मैंने कहा, ‘तू भाग क्यों रहा था? जब कभी तूने अटेंड ही नहीं करा तो तुझे कैसे पता कि मैं ग़लत या गन्दी बातें बोलता हूँ?’

तो बोला, ‘नहीं, क्या है, आप क्या बोलोगे? आप यही सब तो बोलोगे न कि अच्छे काम करो, बुरे काम मत करो। जितने भी लोग आते हैं विज्डम के नाम पर, ऐसे ही तो…, यही सब आप बोलोगे।‘

मैंने कहा, ‘तुझे कैसे पता मैं यही बोलूँगा?’ तो बोला, ‘नहीं, वो तो पता ही है, वह तो पता है।‘ मैंने कहा, ‘तुझे कैसे पता, मैंने क्या बोला? या मैं क्या बोलूँगा?’ बोले, ‘नहीं, वह तो ऐसे ही होता है, मुझे पता है।‘

अठारह-बीस साल उसकी उम्र रही होगी। वह कुछ नहीं जानता। वह एक बार, एक मिनट के लिए भी मेरे सामने आकर के नहीं बैठा कभी। लेकिन उसको पहले से ही पता है कि मैं क्या बोलूँगा। और मुझे यह बड़ी मेहनत करनी पड़ी उसको यह समझाने में कि मैं वैसा कुछ नहीं बोलता जो तू सोच रहा है कि मैं बोलता हूँ। और फिर यही होता भी था।

पहले भागते थे, फिर पकड़ लो दो-चार बार ज़बरदस्ती बैठा लो, फिर उनको रस आने लगता था। फिर ऐसा होता था कि दो घंटे का समय होता था मेरे सेशन्स का। तो दो घंटे तो जितने सब घेर के लाये जाते थे दो सौ-चार सौ सब बैठे होते थे।

फिर मैं कहता था, ‘अब छोड़ रहा हूँ जाओ और अब बस वह बैठे जिसको वाकई बैठना है स्वेच्छा से।‘ तो दो घंटे के बाद भी ऐसा होता था कि कभी तीस, चालीस, पचास जनें, कभी और ज़्यादा लोग रुक जाएँ, वो स्वेच्छा से रुकते थे।

फिर उनके साथ और कई बार देर-देर तक, रात-रात तक बात चलती थी, तीन-चार घंटे और अतिरिक्त। लेकिन वह तभी होता है, जब वह पहले बैठ लें। सबसे ज़्यादा वह तभी भागते थे, जब उन्होंने कुछ नहीं सुना है, वह मुँह देखकर भागते थे मेरा। उन्हें बड़ा डर लगता था। हॉव! (सब हँसते हैं) मेरी शक़्ल में ऐसा क्या है, क्यों डर जाते थे?

कल्पना, कल्पना। हमारा अहंकार हमको बताता है कि हम बिना जाने ही सबकुछ जानते हैं। वह बिना बैठे ही जानता था कि मैं क्या बोलने वाला हूँ। वह जान भी गया और उसने निर्णय भी कर लिया कि उसे नहीं सुनना है और वह भाग भी लिया। और भागे ही जा रहा है। तुझे यह कैसे पता? इस प्रश्न का हम कोई उत्तर ही नहीं देना चाहते।

एपिस्टेमोलॉजी (ज्ञान-मीमांसा), सोर्स ऑफ नॉलेज, (ज्ञान का श्रोत) तुम्हें कैसे पता इसका हमारे पास कोई जवाब ही नहीं, बस पता है। और ले-देकर के पता कैसे है, क्या करा है, कल्पना करी है। किसी भी फिलॉसिफिकल सिस्टम (दार्शनिक प्रणाली) में इमेजिनेशन इस नॉट अ वैलिड सोर्स ऑफ नॉलेज, सर (कल्पना ज्ञान का वैध स्रोत नहीं है, श्रीमान)।

दुनिया का कोई भी दर्शन हो, वह पहले साफ़-साफ़ बताता है कि ज्ञान के किन स्त्रोतों को, मार्गो को, माध्यमों को वैध माना जाएगा। प्रमाणिकता किसकी है, कौन से ज्ञान के स्रोत को हम प्रमाण रूप में स्वीकार कर रहे हैं, यह पहले मान लिया जाता है।

और मैं बता दूँ कल्पना कहीं भी प्रामाणिक नहीं मानी जाती। कोई दर्शन नहीं कहता कि कोई बात इसलिए सत्य है, क्योंकि तुम उसकी कल्पना कर रहे हो। न भारतीय, न पाश्चात्य, न आस्तिक, न नास्तिक।

किसी दर्शन में कल्पना को ज्ञान का वैध स्रोत नहीं माना गया है, एकदम ही नहीं। पर हम बैठे-बिठाये सब जान जाते हैं। क्या करके, (ऑंखें बन्द करके) आँखें बन्द करी, अगड़म-बगड़म करा, ज्ञान आ गया। कैसे आ गया?

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