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सांसारिक ज्ञान अधिक ज़रूरी या आध्यात्मिक ज्ञान? || (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम एक बोधपूर्ण जीवन जी सकें और मान्यताओं से प्रभावित ना हों इसके लिए सांसारिक ज्ञान ज़्यादा आवश्यक है या आध्यात्मिक ज्ञान?

आचार्य प्रशांत: अलग-अलग नहीं हैं दोनों भाई! बाहर से अलग हैं, अंदर से एक हैं। असल में जिसको आध्यात्मिक ज्ञान भी कहते हो, वो क्या है? वह बस मन की खोजबीन, जाँच-पड़ताल का नाम है। तो ऐसे समझ लो कि, जैसे मुक्ति की दो आवश्यकताएँ हों, दो आवश्यकताएँ क्यों? क्योंकि हम द्वैत में फँसे हैं। दो सिरे होते हैं द्वैत के। दोनों सिरों को देखना पड़ता है न। एक सिरे पर हमको बाँधा हुआ है उसने जिसे संसार कहते हैं और दूसरे सिरे पर हम बंधे हुए हैं उससे जो संसार से बंधा रहना चाहता है, जो संसार की ओर आकर्षित होता है। जिसे मुक्ति चाहिए उसे इन दोनों को देखना पड़ेगा; संसार को भी देखना पड़ेगा, मन को भी देखना पड़ेगा।

संसार मन को रिझाता है और मन संसार सजाता है। दोनों में बड़ा गहरा नाता है। मुक्ति जिसे चाहिए उसे इन दोनों की ही खोजबीन करनी पड़ती है। इसीलिए तो मैं बार-बार बोलता हूँ विज्ञान और अध्यात्म, विज्ञान और अध्यात्म, विज्ञान और अध्यात्म!

विज्ञान इसीलिए ताकि तुम्हें जगत की हक़ीक़त पता रहे; भौतिक पदार्थ का यथार्थ तुम्हें पता रहे इसलिए विज्ञान में निष्णात होना ज़रूरी है। बहुत उपयोगी है। और अध्यात्म ताकि तुमको मन का ज्ञान रहे, तुम्हें पता हो कि ये मन चीज़ क्या है, कैसे चलता है, किधर को जाता है, क्या-क्या इसके छिपे हुए खेल हैं।

इन दोनों का ही पता होना चाहिए। और दोनों के ही ज्ञान के लिए ही शास्त्र हैं। जहाँ भी ज्ञान होगा वहाँ शास्त्र होगा। शास्त्र माने किताबें समझ लो। क्योंकि ज्ञान तो ज्ञान है, वो किताबों में दर्ज किया जा सकता है। विज्ञान की किताबें होती हैं, उनको मैं बहुत सम्मान की दृष्टि से देखता हूँ। और अध्यात्म की भी किताबें होती हैं उनको मैं बहुत सम्मान की दृष्टि से देखता हूँ। दोनों एक साथ चलती हैं। दोनों का पता होना चाहिए।

हाँ, अब तुम मुझसे पूछोगे अगर ज़ोर देकर के कि, "दोनों में से आचार्य जी ज़्यादा आवश्यक क्या है?" तो फिर तो मुझे अध्यात्म की तरफ़ कहना पड़ेगा। वही ज़्यादा आवश्यक है। लेकिन ये सवाल मुझसे करो मत।

आज के युग में ये सवाल पूछना कि अध्यात्म और विज्ञान में चुनाव कैसे करें, बड़ा बेहूदा प्रश्न हो गया न। सूचना प्रौद्योगिकी का युग है। जितनी तरीके की तुम सूचनाएँ चाहते हो, वो तकनीकी तुमको सुलभ करा देती है। तो अब यह क्यों पूछ रहे हो कि, "मैं ये पढ़ूँ कि वो पढूँ? अध्यात्म पढूँ कि विज्ञान पढूँ?" तुम दोनों क्यों नहीं पढ़ सकते भई?

तुम कहते हो "नहीं, मैं अध्यात्मिक आदमी हूँ, विज्ञान नहीं समझ में आता।” इतनी वेबसाइट्स हैं उन पर इतने ट्यूटोरियल्स हैं, तरह-तरह के कोर्सेज़ हैं। कक्षा दस, कक्षा बारह के स्तर तक का विज्ञान सबको पता होना चाहिए। नहीं पता तो जाकर पढ़ लो।

उसी तरीके से एक आदमी आकर कहे कि, "नहीं, मुझे विज्ञान तो पूरा पता है, लेकिन अध्यात्म तो मैंने कभी पढ़ा ही नहीं। कभी मुझे इस तरीके की कोई औपचारिक शिक्षा मिली नहीं।"

फिर कह रहा हूँ इतनी वेबसाइट्स हैं, इतनी किताबें हैं इतने वीडियो हैं, जाकर देख लो भई!

आज के समय में कोई ये सवाल कैसे कर सकता है कि, "ये या ये? अध्यात्म अथवा विज्ञान?" नहीं, ये नहीं। दोनों पता हों। और जब मैं विज्ञान की बात कर रहा हूँ तो उससे मेरा तात्पर्य सिर्फ़ भौतिक विज्ञान भर से नहीं है। मैं उसमें जैविक, सामाजिक सब तरह के विज्ञानों की बात कर रहा हूँ। मैं विज्ञान की सब शाखाओं की बात कर रहा हूँ। बात समझ में आ रही है?

दोनों को साथ लेकर के चलो, बड़ा बढ़िया रहेगा। एक टाँग पर भी चल सकते हो पर कितनी दूर जाओगे? पक्षी एक पंख से भी उड़ सकता है, पर कितना उड़ेगा? हवाई जहाज़ दो इंजन वाला होता है न, हम जिनपर आमतौर पर चलते हैं दो इंजन वाले प्लेन्स होते हैं। एक इंजन पर भी हवाई जहाज़ चल सकता है पर कितनी दूर जाएगा? दो हों तो मज़ा आ जाएगा, कि नहीं? देख तो एक आँख से भी सकते हो, जी तो एक किडनी पर भी सकते हो पर मज़ा नहीं आता फिर। दोनों हों तो क्या बात है! एक हाथ से भी काम चल ही जाता है, कि नहीं? दोनों हों तो फिर वाह!

हमें दोनों चाहिए, विज्ञान भी अध्यात्म भी। वास्तव में विज्ञान के जितने केंद्र हैं चाहे कॉलेज हों, विश्वविद्यालय हों उनमें अध्यात्म का विभाग होना चाहिए, *डिपार्टमेंट ऑफ स्पिरिचुअल स्टडीज़*। और जितने भी आश्रम हैं, जितने भी अध्यात्मिक केंद्र हैं उन सब में अनिवार्यतः विज्ञान की शिक्षा देनी चाहिए। ऐसे आश्रमों की और अध्यात्मिक केंद्रों की महत्ता बहुत कम है जहाँ विज्ञान की उपेक्षा की जाती है। दोनों साथ चलने चाहिए क्योंकि दोनों एक ही हैं, ज्ञान तो ज्ञान है न। अगर आप कह रहे हो कि, आप ज्ञान को सम्मान देते हो तो ज्ञान के एक पक्ष का आप अपमान कैसे कर सकते हो? अगर आप वैज्ञानिक हो तो आप आध्यात्मिक ज्ञान की उपेक्षा कैसे कर सकते हो?

मैं अध्यात्मिक ज्ञान की बात कर रहा हूँ, मिस्टिकल मम्बो-जंबो या अंधविश्वास की बात नहीं कर रहा हूँ। उसकी उपेक्षा आप कैसे कर सकते हैं? और इसीलिए ये बात बिलकुल सटीक है, एकदम सही है कि आईआईटी कानपुर ने गीता सुपर साइट बनाई है। उन्हीं को बनानी चाहिए थी। और कौन बनाएगा? विज्ञान का और प्रौद्योगिकी का जो उच्चतम केंद्र है वही तो बनाएगा न गीता सुपर साइट * । उन्हीं को बनानी चाहिए, बहुत बढ़िया! और यही काम अध्यात्म के ऊँचे केंद्रों को करने चाहिए कि उनके पास एक विज्ञान संकाय भी हो। कि आप आए हो यहाँ पर जीवन की समस्याएँ लेकर, आप आए हो यहाँ पर जीवन को समझने के लिए तो आपको विज्ञान के * कोर्सेज़ भी करने पड़ेंगे क्योंकि आधी तो आपकी समस्या ये है कि आपने ज़िंदगी में कभी साइंस नहीं पढ़ी।

उसके कारण आप सौ तरह के अंधविश्वासों में लिप्त हो। इन दोनों को साथ-साथ चलना होगा, ज्ञान ज्ञान अलग नहीं होते। समझ में आ रही है बात?

और इस वक़्त देश का बड़े-से-बड़ा दुर्भाग्य ये है कि जो ये दो ज्ञान की शाखाएँ हैं, दोनों का ही बड़ा अपमान किया जा रहा है। गुरुजन आ गए हैं जो बिलकुल विज्ञान विरोधी और अंधविश्वास भरी बाते करते हैं और साथ-ही-साथ वही गुरु जन आध्यात्मिक ग्रंथों का भी अपमान करते हैं। और यह संयोग की बात नहीं है। जो विज्ञान विरोधी बातें कर रहे हैं, वही शास्त्र विरोधी बाते भी कर रहे हैं। ग़ौर करो!

जो व्यक्ति विज्ञान के विरोध की बातें करेगा और तमाम तरह के अंधविश्वास फैलाएगा, वही वह आदमी होगा जो कहेगा कि आध्यात्मिक शास्त्रों की भी कोई ज़रूरत नहीं है।

ये कोई संयोग की बात नहीं है, इन दोनों को तो साथ-साथ चलना ही था। जैसे दोनों बीमारियाँ हों जो साथ-साथ लगती-ही-लगती हों। भाई कोरोनावायरस फैला है, उसमें डॉक्टर कहते हैं न कि बुख़ार भी आएगा, शरीर में दर्द भी होगा, खाँसी भी आएगी और साँस लेने में तकलीफ़ भी होगी। सब ये साथ-साथ चलेंगे। उसी तरीके से विज्ञान की उपेक्षा, अध्यात्म की उपेक्षा ये भी दो बीमारियाँ हैं जो साथ-साथ ही चलती हैं। जो आदमी गहराई से वैज्ञानिक मन का हो गया वो अध्यात्म की बहुत दिन तक उपेक्षा नहीं कर पाएगा।

वास्तव में आज भौतिकी के सामने जो एक बड़ी समस्या है वो है ही यही — द प्रॉब्लम ऑफ कॉन्शियसनेस * । भौतिकी आज वहाँ खड़ी है जहाँ पर * ऑब्जर्व्ड (दृश्य) के बराबर ही महत्व का हो गया है आब्जर्वर (दृष्टा)। बहुत सारे ऐसे फिनोमेना (घटना) हैं जिनके बारे में कोई विवेचना, व्याख्या हो ही नहीं सकती जब तक आप ऑब्जर्वर को भी फैक्टर-इन ना करें। और जब ऑब्जर्वर की बात आई वहाँ तो फिर ऑब्जर्वर की चेतना की बात आ गई न। तो विज्ञान भी अब वहाँ खड़ा है जहाँ उसे अध्यात्म की ओर आना होगा। पूछना होगा कि, "ये कॉनशियसनेस क्या है? ऑब्जर्वर कौन है?" हम ऑब्जर्व्ड फिनोमिना की बात करते हैं, हम दृश्यों की बात करते हैं, हम दृश्य-मान जगत की बात करते हैं, पर इनका दृष्टा कौन है?

इसी तरीके से अध्यात्मिक मन के लिए भी आवश्यक हो जाएगा कि वो विज्ञान की मदद ले। उसमें विज्ञान के प्रति प्रेम का जगना बड़ी स्वाभाविक बात है। अगर कोई आदमी वास्तव में आध्यात्मिक है तो उसमें विज्ञान के प्रति बड़ा प्रेम होगा और बड़ा सम्मान होगा। कोई आपको आदमी मिले जो अपने-आपको आध्यात्मिक बोलता हो लेकिन विज्ञान की उपेक्षा करता हो, निरादर करता हो, समझ लेना यह झूठा, फ़र्जी आदमी है। अगर आप ही वो आदमी हैं तो अपने-आपसे बचिए।

मैं चाहता हूँ कि उपनिषद रखे हों और उनके बगल में रखी हो आइंस्टीन की पुस्तकें। मैं चाहता हूँ संतवाणी रखी हों और उनके बगल में रखे हों *लेटेस्ट रिसर्च जर्नल्स*। जहाँ ये संगम हो गया वहाँ समझ लो कि फिर तुम पार कर गए; जैसे तुम्हारी नाव को दो चप्पू मिल गए दोनों तरफ़ से। जैसे तुम्हारे मन के पखेरू को अब दो पंख मिल गए, अब वो मुक्ति के आकाश में उड़ जाएगा। तो ये मत पूछिएगा कि संसार को जानना ज़्यादा आवश्यक है या अध्यात्म को। अलग-अलग नहीं हैं दोनों।

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