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रुक जाओ, अब बस करो! || आचार्य प्रशांत, बातचीत (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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मेनका गांधी: सबसे पहले तो हम शुरुआत करते हैं माँस खाना, दूध पीना, अंडा खाना। हम सोचते हैं कि ये बहुत आम चीज़ है।

आचार्य प्रशांत: हम इतने अभ्यस्त हो जाते हैं हिंसा देखने के, क्रूरता देखने के कि बहुत कुछ हो रहा होता है जानवरों के साथ, जो हमको लगता है कि सामान्य है—इसलिए सामान्य है सिर्फ़, क्योंकि हम उसको रोज़ देख रहे हैं। तो हमको लगता है ऐसा ही तो होता है; पर वो ठीक नहीं है।

और बहुत लोग जो अपने-आपको संवेदनशील बोलते हैं, कंपेशनेट बोलते हैं, वो भी उन चीज़ों को सामान्य मानकर उनकी उपेक्षा करते रहते हैं। उनको लगता है कि ये तो जानवर है, इसके साथ ये होना चाहिए। पर वो वास्तव में जो हो रहा है, वो क्रूरता है; और ये बात हमको बिलकुल भी कौंधती नहीं है। लेकिन अगर ये बात कौंधने लगे, तो बहुत सारे ऐसे लोग होंगे जो फिर उस तरह के कामों से बचेंगे, उनको रोकेंगे।

मेनका जी: मैं भी ख़ुद जब पैदा हुई थी तो एक सिख परिवार में, आर्मी परिवार में पैदा हुई थी। और मेरे लिए माँस खाना तो सामान्य बात थी। किसी ने सोचा ही नहीं कि ये जानवर है; ये आपकी प्लेट पर पड़ी हुआ कोई खाने की चीज़ है बस।

जब मैं अट्ठारह साल की हुई तो मेरी शादी हुई थी। और एक दिन मेरे पति ने मुझे यही बोला, "मैं तंग आ गया हूँ तुम्हें सुनते हुए। पूरे दिन तुम बोलती हो जानवर को बचाओ, जानवर को बचाओ, और रात को आकर के उसको खा लेती हो। तो या तो तुम अपने-आपको बदलो, अगर दुनिया को बदलना चाहती हो तो, या तो तुम बोलना ही बंद कर दो।"

और उस समय मुझे इतना झटका लगा, एकदम से, मेरी ज़िंदगी उसी वक़्त बदल गई; क्योंकि मेरी फिर आँख खुल गई। और झटके की ज़रूरत है।

तो बहुत लोग हैं जो आते हैं, कहते हैं कि "हम जानवरों को बहुत प्रेम करते हैं।" ज़्यादातर लोग सोचते हैं, प्रेम जो होता है वो 'अपने' जानवर के साथ होता है। तो ये पज़ेश्‌न्‌ है। ये जानवर भी नहीं है, ये पज़ेश्‌न्‌ है, मेरा है।

कल किसी इंसान ने मुझे चिट्ठी लिखी। मुझे दिन की चार-सौ, पाँच-सौ चिठ्ठियाँ मिलती हैं। एक ने लिखा, "इस जानवर को किसी ने बहुत पीटा, तो आप इसके बारे में कुछ करिए।" तो मैंने फ़ोन उठाकर के—जैसा अक्सर करती हूँ—मैंने फ़ोन उठाकर के कहा, "तुमने क्या किया? जानवर तुम्हारे पास है, तुम डॉक्टर के पास ले जाओ, बाकी मैं सम्भाल लूँगी।" तो उसने कहा "लेकिन मेरा जानवर नहीं है।" मैंने कहा, "फिर आपका जानवर कौनसा है, आप मुझे बता दीजिए?" कौन किसका क्या है?

दूध के विषय में मैं कहती हूँ, "चलिए! आपकी पत्नी ने बच्चा दिया है, मैं उसका दूध पी लूँगी।" आप ‘छी-छी-छी’ बोलेंगे, लेकिन और किसी माँ का दूध आप पी रहे हैं उसपर तो ‘छि-छि-छि’ नहीं बोलेंगे। इट इज़ एज़ डिसगस्टिंग टू मी (यह मेरे लिए उतना ही घृणास्पद है)। तो हम कोई भी जानवर ले लें—आप ऑडियंस हैं, आप मुझे एक भी नाम दे दें और मैं आपको बताती हूँ कि वो हमसे ज़्यादा ज़िंदगी को कैसे बचाता है। नेचर कुड नॉट हैव मेड अस इवोल्वड लाइक दिस (प्रकृति हमें इस तरह विकसित नहीं कर सकती)। और कोई जानवर ऐसे इवॉल्व क्यों नहीं हुआ कि वो सब जगह तबाही मचाए?

आचार्य: तीन प्रतीक हैं जो हमको बहुत अच्छे लगते हैं, जिसको हम अपनी प्रगति, विकास वगैरह कहते हैं। एक तो है जो हम शहरों में अपने कॉनक्रीट जंगल वगैरह बनाते हैं। उसको देखते हुए हमें बहुत अच्छा लगता है। हमें लगता है कि हमने कोई तरक्की कर ली है, अच्छी हाउसिंग आ रही है।

दूसरा जब हम बहुत फैले हुए, विस्तृत हरे-भरे खेत देखते हैं, और उसमें हरियाली है, और जितनी दूर तक देख रहे हैं उतनी दूर तक खेत-ही-खेत दिखाई दे रहा है।

और तीसरा जब हम किसी, मान लीजिए, एक्सपोर्ट ज़ोन (निर्यात क्षेत्र) में हैं, और वहाँ एक-के-बाद-एक साफ़-सुथरी सजायी हुई हम फैक्ट्रीज़ देख रहे हैं। इनको तीनों को हम देखते हैं बिलकुल अपने सन्दर्भ में, अपने पर्सपेक्टिव में; हमको लगता है कि हमने बहुत अच्छा काम कर लिया। लेकिन ये ज़रूरी है कि हम ये समझें कि वो जो हमने कॉनक्रीट जंगल बनाया है अपने रहने के लिए, वो न जाने कितने पशुओं की, पक्षियों की, विशेषकर पक्षियों की लाश पर बन रहा है।

एक बार आप अपनी हाउसिंग सोसाइटी बना लेते हैं—और ऐसी बहुत सारी जगह हैं जहाँ एक-के-बाद-एक बीसों हाउसिंग सोसाइटीज़ होती हैं। वो जगह पक्षियों के लिए कितनी घातक होती है इसपर हम कभी विचार ही नहीं करते, ये हमारे मन में कौंधता ही नहीं है कि ये एक एक्ट ऑफ क्रुएलिटी (क्रूर कृत्य) है।

इसी तरीके से, वो जो हमें खेत दिखाई पड़ रहा है, हम उस खेत को तो देख रहे हैं, हम ये नहीं पूछ रहे, ‘उस खेत से पहले वहाँ पर क्या था? वो खेत कैसे आ गया?’ क्योंकि खेत तो हमारे लिए आया है।

भई! हमें खाना खाना है, एक तो तरीका ये है कि आप जानवर को सीधे-सीधे मारकर खा लो, ठीक है? बाकी लोग अपने-आपको शाकाहारी बोलते हैं और जानवर को नहीं खाते, लेकिन वो अन्न तो खाते हैं; वो अन्न उस खेत से आ रहा है। पहली बात तो आपने जंगल काटा, दूसरे आप वहाँ पर जो माइक्रो लाइफ़ (सूक्ष्म जीवन) है, उस माइक्रो लाइफ़ को भी मार रहे हो। माइक्रो लाइफ़ को ही नहीं मार रहे हो, उसमें आप जो कुछ इस्तेमाल कर रहे हो उससे बड़े पक्षी भी मरते हैं।

न जाने पक्षियों की कितनी प्रजातियाँ हैं, जो सिर्फ़ उन चीज़ों के कारण आज खतरे में हैं, जो हम अपने खेतों में इस्तेमाल करते हैं। अब उसका असर इंसानों पर भी पड़ता होगा, क्योंकि अगर पक्षी को उससे खतरा है या और जानवरों को खतरा है या रूडेंट्स (कुतरने वाले जीवों) को खतरा है, तो हमें भी होता होगा।

मेनका जी: हाँ, तो शाकाहारी भी उतना ही मारता है जितना माँसाहारी।

आचार्य: उतना ही मारता है लेकिन शाकाहारी अपने-आपको एक मोरल हाई ग्राउंड (नैतिक उच्चता) पर रखता है। ये बहुत ज़रूरी है कि हम ये याद रखें कि हम जिस सिविलाइज़ेशन में जी रहे हैं वो आधारभूत रूप से क्रूर और हिंसक है।

आप खेत का खा रहे हो, आप फ़ैक्टरी का पहन रहे हो या इस्तेमाल कर रहे हो और आप एक हाई राइज़ बिल्डिंग में रह रहे हो, ये तीन बातें ही काफ़ी होनी चाहिए कम-से-कम आपको ये याद दिलाने के लिए कि आप हर तरीके से हिंसक हो।

लेकिन वैसा हमको पढ़ाया नहीं गया है, वैसे हमारे संस्कार नहीं हैं, वैसा हमारे दिमाग में कभी ख़्याल नहीं डाला गया है; क्योंकि वो जो पूरा कॉनक्रीट का एरिया (क्षेत्रफल) है वो वास्तव में पशुओं के लिए, हर तरीके के जीवन के लिए कितना ज़्यादा घातक है।

और ये भी हो सकता है कि उसी एरिया में बैठकर के हम एक-दूसरे को बता रहे हों कि, ‘देखो जानवरों के साथ तो बहुत नाइंसाफ़ी होती है; एनिमल्स राइट्स-एनिमल्स वेलफेयर’ , हम ये सारी बातें कर रहे हों उसी बिल्डिंगस के भीतर बैठकर के, जैसे हम यहॉं पर कर रहे हैं।

अगर हम उसको एक नीति या पॉलिसी के तौर पर याद रखना चाहें कि ‘भई! मुझे ये बता दो, ये बता दो, ये बता दो’, तो ये मुश्किल है।

फ़ण्डामेंटली जो ग़लती हो रही है, वो कहीं इसी में तो नहीं है कि हम जैसा दिमाग लेकर के बड़े हो रहे हैं, जो हमारी पूरी शिक्षा ही है, परवरिश ही है, उसमें एकदम मूलभूत बात गायब है। वो ये है कि आपको इसलिए नहीं जीना है कि आप ख़ुद मज़े मारो। आपको इसलिए नहीं जीना है कि आप अधिक-से-अधिक कंज़प्शन कर लो, भोग कर लो और अंत में बोलो कि ‘ आई लिव्ड अ हाई एंड हैप्पी लाइफ (मैंने एक ऊँचा और खुशनुमा जीवन जिया)’।

देखिए मैं जो बोल रहा हूँ, वो और पीछे जाकर बताता हूँ कि क्यों बोल रहा हूँ। दुनिया में जानवरों को बचाने वाली इतिहास की सबसे बड़ी ताक़त कौनसी रही है? एकदम मैक्रो व्यू (वृहद् दृश्य) लेते हैं। कौनसी ताक़त है जिसने जानवरों को क्या इंसानों को भी बहुत हद तक आज तक बचाकर रखा है?

एक हिंट पकड़ते हैं, भारत सबसे बड़ा शाकाहारी देश रहा है दुनिया का। आज भी दुनिया में जो शाकाहारी लोग हैं उनमें से अधिकतर भारत में ही पाए जाते हैं। उसकी वजह क्या है? उसकी वजह ये तो नहीं है कि यहाँ का आम-आदमी बहुत पढ़ा-लिखा था या कि पर्यावरण के लिए वो बहुत संवेदनशील था; उसकी वजह रही है आध्यात्मिकता। और आध्यात्मिकता ने ज़्यादा पशुओं और पक्षियों को बचाया है, तुलना में किसी भी तरह के एक्टिविज्म या सक्रियता के। सोचकर देखिए कि अगर धर्म नहीं होता भारत में तो कितने अरब-खरब और पशु-पक्षी मारे गए होते, सताए गए होते।

मेनका जी: बिलकुल सही!

आचार्य: उनको किसने बचाया है? उनको बचाया है धार्मिकता ने। तो एक तरफ़ तो ये बात है कि हम कई तरह के अवेयरनेस प्रोग्राम्स ला सकते हैं। लोगों को सेन्‌सटाइज़् (सचेत) कर सकते हैं और वो सब होना चाहिए निश्चितरूप से, उसकी अपनी अहमियत है। लेकिन जो मूलभूत समस्या है वो ये है कि हमारे जीवन में सेल्फ़ अवेयरनेस नहीं है, अध्यात्म नहीं है, तो हम तो वो एलियंस हैं – जैसे आपने कहा, "पता नहीं कहाँ से आ गया ये इंसान।" – हम तो वो एलियंस हैं, जो पाँव भी रखेगा कहीं पर तो हिंसा कर देगा, क्योंकि उसके पास बड़ी ताक़त आ गई है ज्ञान की, टेक्नोलॉजी की, इकोनॉमिक्स की। बहुत शक्तिशाली राक्षस है वह इस समय।

शायद हम उस चीज़ की बहुत उपेक्षा करते हैं कि जो पूरे इतिहास में हमारे पक्ष में सबसे बड़ी ताक़त रही है, हमें उसको दोबारा से सक्रिय करना होगा। वो ताक़त जैसे-जैसे कमज़ोर होती गई है, कम-से-कम भारत में तो पशु-पक्षियों का उत्पीड़न उतनी ही तेज़ी से बढ़ता चला गया है।

भारत, जो कि आज़ादी के समय यहाँ आधे से ज़्यादा लोग शाकाहारी हुआ करते थे, उनकी तादाद अब चौथाई के आसपास आ गई है। उसका सीधा-सीधा संबंध एक तो आर्थिक संपन्नता से है, दूसरा जो अध्यात्म का पतन हुआ है, उससे है। और ये बहुत बड़े आँकड़े हैं। हम कुछ हज़ार, कुछ लाख लोगों की बात नहीं कर रहे, हम पूरी आबादी के पच्चीस-प्रतिशत की बात कर रहे हैं।

तो अध्यात्म बिलकुल मैक्रो लेवल (वृहद् स्तर) पर काम करता है। और मैक्रो लेवल पर जो चीज़ काम कर सकती है, वो माइक्रो मेजर (सूक्ष्म स्तर) से कहीं ज़्यादा प्रभावी होगी। नहीं तो हम कुछ भी करेंगे – कुछ भी कर रहे होंगे क्योंकि हमें तो आगे बढ़ना है, हम तो विकास की बातें करते हैं। हमें नए हाईवेस चाहिए, हमको नई इमारतें चाहिए, हमें शॉपिंग के लिए चाहिए, ये चाहिए, वो चाहिए – हम जो कुछ भी कर रहे होंगे, उसमें खून ही तो होगा; हम और क्या कर रहे हैं लगातार? हमें बेहतर सेहत भी चाहिए तो हम एक नई दवाई बनाते हैं, उसके लिए भी हम जानवरों को ही मार डालते हैं। हम कुछ भी कर रहे हैं, उसके लिए हम हत्या ही तो कर रहे हैं।

जो लोग अपने-आपको पशु प्रेमी बोलते हैं—कुत्ता रख रखा है, उसको माँस खिला रहे हैं। अभी वो फ़िल्म देखी थी, 'चार्ली' , अच्छी थी; लेकिन उसमें भी क्या था? कुत्ता मछली खा रहा है, कुत्ता चिकन खा रहा है। बहुत अच्छी फ़िल्म है, लेकिन वहाँ पर भी ये याद रख पाना बड़ा मुश्किल होता है कि साहब वो मछली, वो मुर्गा, वो भी तो कुत्ते जैसे ही हैं, उनको क्यों हमने छोड़ दिया है?

तो जब तक वो एक भीतर केंद्र नहीं चालू होता, जो हर साँस की, हर जीव की कद्र करना जाने, बड़ा मुश्किल लग रहा है और बड़ी तकलीफ़ लग रही है।

एक भारी ताक़त है, और वो जो ताक़त है, वो एक विचार की है। और वो अपने-आपमें एक दर्शन है, फ़िलोसोफ़ी है, जिसने हमको ये बता दिया है कि आप इसलिए पैदा हुए हो ताकि आप मज़े कर सको। और जो सबसे बड़ा हत्यारा है, वो ये दर्शन है।

इसकी जड़ें मैं समझता हूँ हमारे भीतर सदा से थीं, लेकिन टेक्नोलॉजी (तकनीकी) और कैपिटल (पैसे), इन दोनों ने इस दर्शन को बहुत ज़्यादा ताक़त दे दी है, इसको सक्रिय कर दिया है; और ये हम सबपर बिलकुल चढ़कर राज कर रहा है। रेगुलेशन के द्वारा या लेजिस्‌लेश्‌न्‌ (कानून प्रक्रिया) के द्वारा हम कैसे एक-एक आदमी को रोक पाएँगे, ये मुझे थोड़ा-सा मुश्किल लगता है। जब उस आदमी के भीतर ये भावना चढ़कर बैठ गई है कि ‘मुझे तो बस मारना है, मारना है।‘

आपको तो दिन-प्रतिदिन ऐसे मामले देखने को मिलते होंगे कि जहाँ पर इंसान मरने को तैयार होगा, लेकिन मज़े छोड़ने को नहीं तैयार होगा। आप उसको सज़ा दे लीजिए, वो कहेगा, ‘सज़ा भी झेल लूँगा’, लेकिन फिर भी पीछे से कुछ-न-कुछ अत्याचार, हिंसा, क्रूरता करता ही रहता होगा।

मेनका जी: आप देखिए, ये जो वीगनिज़्म है, ये पैदा कहाँ से हुआ है? यूरोप से। ये हिंदुस्तान से पैदा नहीं हुआ है। हम लोग वीगन हैं, थे, लेकिन हमारी नज़र हमेशा दूध पर थी। क्योंकि आपके सारे गुरु, आपके सारे रिलीजन दूध दूध दूध दूध… हालाँकि अगर आप पढ़ लीजिए कृष्ण दूध नहीं पिए, कहीं भी नहीं लिखा कि कोई दूध पी रहे थे। ज़्यादा-से-ज़्यादा घी इस्तेमाल हो रहा था हवनों के लिए, बस इतना ही।

पर अगर आप किसी को पूछें तो, "कृष्ण दूध पीते थे!"

कैसे दूध पीते थे? "क्योंकि वो एक चरैया थे।"

लेकिन वो छोड़िए, मैं कह रही हूँ कि वीगनिज़्म ने यूरोप में जड़ें कैसे पकड़ी। बिकॉज़ दे वर फेजिंग देमसेल्व्स आउट (क्योंकि वे अपने-आपको कम करते चले गए)। इन्होंने बच्चे पैदा करने बंद कर दिए तो उनके पास इतना समय था कि वो अपने-आपको समझ सकें। इट इज़ नॉट दैट दे हैव रिपलेस्ड द् लैक ऑफ़ चिल्ड्रन विद अय्याशी (ऐसा नहीं है कि उन्होंने बच्चों की कमी को अय्याशी से प्रतिस्थापित कर दिया)। उन्होंने तय किया कि, ‘अब बस’। जहाँ हम रह रहे हैं, उस धरती के साथ यदि हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है तो हम क्यों नहीं यहीं ख़त्म कर दें और हम अपनी ज़िंदगी को इस्तेमाल करें रिएस्टेब्लिश (पुनर्स्थापित) करने में। दे आर नॉट गोइंग अबाउट इट प्रौपरली, बट दैन दे हैव नो अंडरपिनिंग्स ऑफ नॉलेज, दे आर नॉट डूइंग इट थ्रू अ फ़िलोसोफिकल वे (वे इसे व्यवस्थित रूप से नहीं कर रहे हैं, क्योंकि उनके पास कोई आधारभूत दर्शन नहीं है)। पर कर तो रहे हैं न, जैसे-तैसे कर रहे हैं।

हम लोग तो यहाँ, बस शादी होते ही शुरू करो, अपनी प्रजाति को बढ़ाना। तो हम अगर हिंसा के विरुद्ध युद्ध करने का फैसला करते हैं, तो सबसे पहला कदम होगा कि अब बस, बच्चे ख़त्म। तब जाकर के कुछ बात बनेगी।

आचार्य: बहुत बढ़िया, बहुत बढ़िया!

मेनका जी: और इसमें कोई त्याग नहीं है। जब आप बच्चे पैदा करते हो तो आप उनको और दुखी बनाते हो। उनके लिए कोई व्यवस्था भी नहीं बची है। तो व्हाई नॉट डू दैम अ फेवर एंड स्टॉप इट (क्यों न उनको नहीं पैदा करके उनपर कृपा की जाए)।

प्रश्नकर्ता: मैम, ये जो समाधान है, इस समाधान को अध्यात्म के माध्यम से जनमानस तक पहुँचाया जाए या पॉलिसी के माध्यम से पहुँचाया जाए, या दोनों का एक मिश्रण होना चाहिए?

मेनका जी: बेटा जी, अगर आप अध्यात्म के माध्यम से करें, तो उसका प्रभाव दीर्घकाल तक रहेगा। पर फिर इसे पाने में भी बहुत समय लगेगा। आपके पास बहुत कम समय है, आप सदी के अंत में हो, अब इसमें जो भी बतंगड़ करना है कर लो। चाहे अध्यात्म की मदद से या पॉलिसी के माध्यम से।

द् वर्ल्ड इज़ पास्ड इटसेल्फ बाय डेट (अब पृथ्वी के पास समय नहीं बचा है)। अब तो जैसे तैसे कर सकते हो कर लो। इफ़ यू कैन डू इट बाय पॉलिसी, बाय स्प्रिचुअली कॉन्विनसिंग द पीपल, हू मेक द पालिसी, दैट्स फाइन। बिकॉज़ इट्स समथिंग दैट ईच वन ऑफ अस रियलाइजेस इज़ द नीड ऑफ दी ऑवर पर्सनली (यदि आप इसे कानून के द्वारा करना चाहते हैं, कानून बनाने वालों को इसे आध्यात्मिक रूप से समझाकर, तो ठीक है; क्योंकि हम सभी जान रहे हैं कि यही समय की माँग है)।

और हर कोई इसके लिए तैयार है, बस ये है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधेगा? कौन करे? एक दूरदर्शी कर सकता है। एक ऐसा आदमी जो सच में अपने देश से प्यार करता है, वो करेगा।

आचार्य: तो देश प्रेम की ख़ातिर ही सही, वो ऊपर से नीतियाँ बना दे। और अध्यात्म के माध्यम से नीचे ज़मीन पर जो विरोध होने की संभावना है, बस वो संभावना थोड़ी कम हो जाती है।

देखो, जब भी बनेगी ऐसी नीति, विरोध तो उठेगा। तो इसको रोकने का तरीका यही है कि अगर आप धर्म के नाम पर विरोध कर रहे हो, तो सबसे पहले ये समझो कि आज का सबसे बड़ा धर्म यही है कि तुम कम फैलो।

अभी तक धर्म को ऐसे दर्शाया गया है जैसे धर्म फैलने – जनसंख्या के तल पर – धर्म फैलने का समर्थन करता हो, जबकि तथ्य ये है कि धार्मिकता आज कम-से-कम फैलने में है। आज सबसे बड़ा धार्मिक आदमी वो है, जो अपने ही जीवन-मरण के चक्र को और आगे नहीं बढ़ा रहा है। और इसमें फिर से बात सिर्फ़ प्रकृति या पर्यावरण के प्रेम की नहीं है; जैसा आपने कहा, तुम्हें अपनी संतान से भी अगर प्रेम है तो पहला काम ये करो कि संतानों को कम रखो या पैदा ही मत करो।

मेनका जी: इस वक़्त इस देश में अगर आपको स्कूल में हर बच्चे को भेजना है, तो आपको हर चार मिनट में स्कूल पैदा करना पड़ेगा।

आचार्य: हाँ, लेकिन अगर एकदम ये बोल देंगे न कि पैदा ही मत करो, तो वो कल्पना लोगों को इतनी भयावह लगती है कि वो बड़ा उग्र विरोध करने लगेंगे। तो ये कहना चाहिए कि जिसमें हिम्मत है वो तो पैदा ही न करे। इससे अच्छा तो कुछ हो ही नहीं सकता। जिसे करना है, वो अधिक-से-अधिक एक करे, उतने पर रुक जाए। तो आदमी के मन को थोड़ा संतोष रहेगा कि चलो पूरे तरीके से नहीं रोक दिया गया है।

मेनका जी: आचार्य जी, एक चीज़—मैं आपको इन्‌टरप्‍ट्‌ करना चाहती हूँ—इसके लिए एक पॉलिसी डिसीजन होना चाहिए, वो ये है सोशल अंडरपिनिंग्स (सामाजिक आधार)। यूरोप में आप बच्चा पैदा नहीं कर सकते, क्योंकि आपको, चाहे आप काम करो या न करो, आपको भत्ता मिलता है (बच्चे पैदा न करने के)। यहाँ हिंदुस्तान में कुछ नहीं मिलता, कुछ भी नहीं मिलता है। तो लोग पैदा करते हैं, ये सोचकर के कि वो हमारा ख़्याल रखेंगे जब हम बड़े होंगे। ये अलग बात है कि किसी बच्चे ने कभी अपने माँ-बाप का ख्याल नहीं रखा; क्योंकि आपने उसको उस लायक ही नहीं बनाया कि वो आपका ख़्याल रखे। आपने दस बच्चे पैदा किए, भूखे, नंगे, प्यासे, स्टंटेड (अविकसित), अनपढ़, तो आपका क्या ख़्याल रखेंगे?

आचार्य: आप सोशल सिक्योरिटी (सामाजिक सुरक्षा) की बात कर रहे हैं न, कि उसको डरकर न रहना पड़े कि मेरे बुढ़ापे की लाठी छिन जाएगी। हाँ, वो सब बिलकुल रहेगा। लेकिन देखिए हो सकता है, उसमें भी अभी बहुत समय लग जाए। न जाने भारतीय स्टेट कब उस हालत में आएगा कि अपने हर नागरिक को, एक-सौ-चालीस करोड़ नागरिकों को, सबको सोशल सिक्योरिटी दे पाए।

मेनका जी: ये हम लोग उस समय तक आ गए हैं, हमारे पास पैसे हैं। आज ज़्यादातर राज्य वोट पाने के लिए मुफ़्त में गरीबों को राशन दे रहे हैं। तो एक लाख करोड़ रुपए तो जा रहे हैं केवल राशन में। यही आप मनरेगा को देखिए, वो भी तो मुफ़्त में जा रहा है; ये नहीं कि कोई काम कर रहा है उसके लिए; घर में बैठो और पैसे पाओ। तो उससे अच्छा आप उसी को ही डाल दीजिए सोशल सिक्योरिटी में।

आचार्य: नहीं, आपके स्थान पर देखिए जो सब्सिडी प्रति व्यक्ति जाती है मनरेगा के माध्यम से या कि किसानों को चली जाती है बिजली या फर्टीलाइजर के माध्यम से, उसकी तुलना नहीं की जा सकती है सोशल सिक्योरिटी से। सोशल सिक्योरिटी का मतलब होता है कि वो व्यक्ति अगर बूढ़ा है या फिर बेरोज़गार है, जैसा भी है, तो भी मैं उसको इतना दे रहा हूँ कि वो एक सम्मानजनक जीवन जी सके। तो हमारी अर्थव्यवस्था अभी वहाँ नहीं पहुँची है।

हो सकता है अगले दस साल, बीस साल में वहाँ पर पहुँच जाए लेकिन अगले दस-बीस साल में वहाँ पहुँचती भी है तो उस पहुँचने का मतलब ही होगा कि उतने विकास के लिए हमने पर्यावरण का, पशुओं का और ज़्यादा नाश कर दिया है। ये जो विकास का रोडरोलर है, जब उस हालत तक पहुँचेगा जहाँ हम सबको यूनिवर्सल सोशल सिक्योरिटी (सम्पूर्ण सामाजिक सुरक्षा) दे पाएँ, तो उतने पहुँचने में ही वो और नाश कर चुका होगा। तो वहाँ पहुँचने से पहले अगर ये चीज़ एक तरह से…

मेनका जी: एक और तरीका है सोचने का, बजाय कि और जगह बनाएँ, और घर बनाएँ, और कुछ बनाएँ, हम लोग शुरू करें, एक तो बच्चे पैदा करना कम कर दें, तो उसमें आध्यात्मिक तरीके से, तो वैसे कम लोग होंगे, दूसरा बहुत सारी चीज़ें हैं जिसको आप डेवलपमेंट समझते हैं, जो हमारा पैसा खा रहे हैं; मतलब जिससे हम जितना बढ़ेंगे आगे, उतने ही हमारे पैसे कम होंगे।

मिसाल के तौर पर माँस निर्यात। आप जितने स्लॉटर हाउसेस खोलोगे, जितने आप माँस को जॉर्डन को खिलाओगे, मिडिल ईस्ट को खिलाओगे, यूरोप को खिलाओगे, उतना ही आप गरीब होते जाओगे। अब आप ये सवाल पूछेंगे, "लेकिन हम कमा भी तो रहे हैं मीट एक्सपोर्ट्स से!" ये झूठ है। क्योंकि आपके सारे मालिक विदेशी हैं, सारे-के-सारे दुबई बेस्ड हैं, सारा पैसा वहाँ जाता है।

दूसरा, सरकार ने इसको जीएसटी माफ़ किया है, माँस को, मटर को नहीं, माँस को! आपका एक्सपोर्ट भी माफ़ है, कोई भी टैक्स उनको देना नहीं पड़ता है। आल योर डेवलपमेंट इज़ नॉट डेवलपमेंट, एज़ लौंग एज़ यू आर डूइंग (आपका सारा विकास विकास है ही नहीं, जब तक आप कर रहे हैं) माँस निर्यात, अंडा निर्यात, चिकन निर्यात, दूध निर्यात। ये इसको बंद कर दो, तीन साल के अंदर-अंदर आप देखेंगे कैसे हमारा स्वास्थ्य बेहतर होने लगेगा, हमारा पैसा बढ़ने लगेगा, सबकुछ शांत हो जाएगा। मौसम ठीक होने लगेंगे, जगह भी बढ़ जाएगी।

आचार्य: इसमें जो एक इकनॉमिक एस्पेक्ट (आर्थिक पहलू) जो हमने कहा कि गाय, भैंस, बकरे ये सब चर रहे होते हैं, और इस तरीके से जो ये फॉरेस्ट प्रॉपर्टी है, उसका नुकसान करते हैं। उसी में जो और एक डायरेक्ट सॉलिड फैक्ट है, वो ये है कि दुनियाभर का जितना भी कल्टीवेटेड एरिया है, जिसपर खेती हो रही है, उसमें से सत्तर प्रतिशत जानवरों के लिए है। वो इसलिए नहीं है कि हम उसमें से सीधे अन्न खाएँगे या कुछ होगा, वो जानवरों के लिए है। हम जंगलों को सीधे-सीधे काट रहे हैं क्योंकि हमको वहाँ पर अनाज उगाना है। वो सत्तर प्रतिशत जहाँ पर हम खेती करते हैं, इस्तेमाल ही यही है कि वहाँ कटने वाले जानवरों के लिए अन्न उगाया जाता है, ग्रेन उगाए जाते हैं।

मेनका जी: जैसे कि मध्यप्रदेश, जिसने सत्तर प्रतिशत अपने जंगल काट दिए हैं केवल सोयाबीन उगाने के लिए। टुडे एवरी सेवंथ किलो ऑफ युरोपियन मीट इज फ़ेड विद इंडियन सोयाबीन (वर्तमान में यूरोप में जानवरों को खिलाया जाने वाला कुल सोयाबीन का सातवाँ भाग भारत से जाता है)।

आचार्य: और ये चीज़ हम आमतौर पर जब बोलते हैं कि ऐसा होता है, तो उसमें ये तर्क भी आता है सामने से कि ‘ऐसा अमेरिका में हो रहा है, ऐसा भारत में नहीं हो रहा है’, पर हो रहा है भारत में भी। हमने भी अपने जंगल साफ़ कर रखे हैं ताकि वहाँ पर वो ग्रेन उगाया जा सके, जिससे कटने वाले जानवरों को हम बड़ा कर सकें। और आप जब जानवर को काटते हो, उससे एक किलो माँस लेते हो तो ये जानी बात है कि उस एक किलो माँस के लिए आपने उसको पहले दस किलो ग्रेन और बीस-तीस किलो पानी उसमें लगाया होता है। तो ये एकॉनॉमिकली (आर्थिक दृष्टि से) निश्चित रूप से एक नुकसानदेह, लॉसमेकिंग काम है कि आप एक किलो माँस के लिए इतने सारे उसमें रिसोर्सेस इन्वेस्ट (संसाधन व्यय) करो।

लेकिन ये बात सामने आने नहीं दी जाती है। और ये बात उनको भी अपील करेगी जिनपर कोई करुणा का, कम्पैशन का या अध्यात्म का तर्क काम नहीं करता है; क्योंकि ये तो सीधे-सीधे कोल्ड लॉजिक है। ये तो सबको मानना ही पड़ेगा, सुनना ही पड़ेगा। उनको भी सुनना पड़ेगा जिनके लिए बस एक ही भगवान है, इकनोमिक प्रोग्रेस। तो मीट कंज़प्शन इकोनॉमिक प्रोग्रेस के लिए भी कितना घातक है, इस बात की लोगों को खबर लगनी चाहिए।

अगली बात क्लाइमेट चेंज ; तो हम सब लोग जानते ही हैं, हम ये भी जानते हैं कि क्लाइमेट चेंज की इकनोमिक कॉस्ट्स क्या हैं।

मेनका जी: और क्लाइमेट चेंज का जो सबसे बड़ा प्रॉब्लम है, वो कार्बनडाइऑक्साइड नहीं है, वो है मिथेन।

आचार्य: वो मिथेन है, और मिथेन आ रहा है इन्हीं कटने वाले जानवरों से। मैं इस पर आ रहा था कि क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) की इकनोमिक कॉस्ट (आर्थिक लागत) से तो हम सभी परिचित हैं न। ये जितनी बड़ी-बड़ी कॉन्फ्रेंसेस (सम्मेलन) हो रही हैं, इनमें सब बात कर रहे होते हैं कि इतने बिलियन कॉस्ट है, इतने ट्रिलियन कॉस्ट है क्लाइमेट चेंज की और उससे जो नुकसान होगा उससे हमको इतना झेलना पड़ेगा, इतना झेलना पड़ेगा।

अगर मान लीजिए कि हम कह देते हैं कि एक ट्रिलियन कॉस्ट है किसी एक लिमिटेड कॉन्टेक्स्ट (सीमित परिप्रेक्ष्य) में, तो हमें ये भी तो पता होना चाहिए कि क्लाइमेट चेंज का तीस से चालीस प्रतिशत कारण सिर्फ़ यही है, एनिमल हसबेंडरी (पशुपालन)। तो वो जो ऐट ट्रिलियन है, उसका तीस-चालीस प्रतिशत तो तुम सीधे-सीधे, जो तुम्हारी माँस खाने की लत है उसपर डालो न।

मेनका जी: हिंदुस्तान ने बहुत खूबसूरती से—हिंदुस्तान, चाइना और ब्राज़ील ये तीन सबसे ज़्यादा दोषी हैं दुनिया में। और हम क्योंकि तीन बड़े-बड़े देश हैं, और हम सबसे ज़्यादा खरीददारी भी करते हैं दुनिया से, और सबसे ज़्यादा बेचते भी हैं दुनिया में, इसलिए हम लोगों की धौंस चलती है। इसीलिए हम तीनों ने मिलकर के—विश्वास करें या नहीं करें—हम तीनों ने मिलकर के सारे इंटरनेशनल कांफ्रैंसेस से मिलकर के मिथेन को एक्सक्लूड (अलग) कर दिया। हम केवल बटर-बटर करते हैं कार्बनडाइआक्साइड पर। कार्बनडाइआक्साइड का हमें कुछ लेना देना नहीं। तो फिर हम लोग कह सकते हैं कि, "हाय हाय! हमारी तो गाड़ियाँ भी नहीं हैं। हाय हाय! हमारे पास तो घर भी नहीं हैं। हमारे सारे लोग डेड लाइन पर मर रहे हैं।"

किया तो आप लोगों ने ही है। अब वो भी, बिकॉज़ गिल्ट इज़ अ वंडरफुल फ़ीलिंग ऑल्सो। इट मेक्स यू फील गुड (अपराध बोध भी एक अच्छा अहसास है। आपको इससे अच्छा लगता है)।

आचार्य: एंड ऑल्सो ईनेबल्स यू टू हैव कॉम्पनसेशन (और ये आपको क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का प्रार्थी भी बना देता है)।

मेनका जी: बिलकुल सही। तो क्या होता है कि अमेरिकन्स फ़ील गिल्टी, यूरोपियन फ़ील्स गिल्टी , और फिर वो कहते हैं, "अच्छा थोड़े से पैसे ले लो और चुप रह जाओ।" लेकिन अगर असलियत पर आ जाते हैं और हम ये अगर बोल देते कि हाँ, हमने किया—तीन चीज़ों से मिथेन होती है, राइस, कोल एंड एनिमल्स ; ये तीनों चीज़ों में भरपूर हम लोग दोषी हैं—तो हम बंद कर देंगे लेकिन हम तैयार ही नहीं हैं उसको डिस्कस भी करने को। तो हम सब मरेंगे बिकॉज़ वी आर कीपिंग मिथेन ऑफ़ द टेबल (क्योंकि हमने मिथेन को इन सबसे अलग कर दिया है)।

मैं मिसाल एक बताती हूँ जो हिंदुस्तान अक्सर करता है। एक तो हम लोग जो सोयाबीन उगाते हैं आचार्य जी, उससे जैसे आपने कहा कि हम पूरी दुनिया को खिला रहे हैं। हम अपने जंगल काट चुके हैं, सबकुछ काट दिया, लेकिन हमने क्या किया, ये किश्तियों में जाता था सोयाबीन। पहले इस तरीके से (शंकु आकार के ढेर में) जाता था, लेकिन ये अनइकोनॉमिकल (काफ़ी महँगा) था, तो किसी अक्लमंद ने बोला कि "ऐसे करो, उसको करने की बजाय उसके स्क्वेयर्स (चौकोर) बना लो और स्क्वेयर्स एक के ऊपर एक डाल दो, तो आप दो गुना, तीन गुना ज़्यादा किश्ती में डाल सकते हो।"

लेकिन सोयाबीन को स्क्वेयर्स में बना कैसे सकते थे? उनको डब्बे की ज़रूरत नहीं थी क्योंकि डब्बा और महंगा था। तो इनको खून के साथ जोड़ा गया। तो आपका जो सोयाबीन बाहर जाता है, इनको स्लॉटर हाउसेस के खून के साथ चिपका दिया जाता है। अब जब ये पहुँचता है लंदन या यूरोप—ज़्यादातर लंदन जाता था सोयाबीन, वहाँ से और देशों में—तो वहाँ चिपके हुए खून को कौन निकाले? पानी से तो निकलेगा नहीं, तो उसको ऐसे ही तोड़-ताड़कर के गायों के सामने रख दिया कि वो खाएँ। नाउ इफ ऐनी एनिमल, इन्क्लूडिंग ह्यूमन, इंडल्जेस इन कैनिबलिज्म (कोई भी जानवर, इंसान भी, जब अपने ही प्रजाति को खाता है) तो फिर आपके जो प्रोटीन्स हैं, जो पोलतार, जिससे आपके मैसेजेस जाते हैं दिमाग में, वो जो पोल्स हैं, वो मुड़ने लगते हैं और इसको फिर बोलते हैं प्रियोन। इससे कोई मैसेजेस जाते ही नहीं। फिर आहिस्ते-आहिस्ते से आपका दिमाग पिघलने लगता है। जब आप कैनिबल बनते हैं तो ये पोल प्रियोन बन जाता है, प्रोटीन प्रियोन बन जाता है। ये हो गया गायों में, और गायें फिर स्टेगर (लड़खड़ाने) करने लगे, मरने लगे, और इट वॉज़ डायग्नोस्ड एस क्रोएसड फैल्ट याकूव सिंड्रोम यानी कि मैड काऊ डिसीज़।

वो मैड काऊ डिसीज़ इंसानों में बहुत जल्दी—एकदफ़ा खा लो तो आठ साल के अंदर-अंदर कभी-न-कभी आपको होने वाला है, और उसका कोई उपाय नहीं है। नाउ दिस इज़ व्हाट हैपेनड टू दैम बिकॉज़ ऑफ द सोयाबीन कमिंग फ्रॉम अस (तो ये हुआ उनके साथ, हमारे यहाँ से जो सोयाबीन जा रहा था उसके कारण)।

नाउ व्हाट हैपनड , ये रिसर्च ऑक्सफ़ोर्ड ने किया और ऑक्सफ़ोर्ड के जो वैज्ञानिक थे, उन्होंने कहा कि. ‘भैया! मैड काऊ डिसीज़ — जिसकी वजह से इन्होंने बंदूक लेकर के लाखों-लाखों गायों को मारा—वो आयी है हिंदुस्तान के सोयाबीन से।‘

अब हम लोग इसपर कूद पड़े और हमने कहा कि "अगर ये बोलोगे, तो हमारा पूरा आपके साथ जो आयात-निर्यात है, वो हम बंद कर देंगे।" अब वो भी घबरा गए, छोटा-मोटा सा तो देश है, सबकुछ उनका हमारे यहॉं से आता है; खाना-पीना, कपड़े, जो भी है अंग्रेज़ों के ज़माने से, तो दे बैक्ड ऑफ (वो पीछे हट गए)। एंड ओआईई, व्हिच इज़ द इंटरनेशनल यूनियन फ़ॉर एनिमल हेल्थ , उनसे उन्होंने अनाउंस करवा दिया कि सारे देशों में मैड काऊ डिसीज़ है लेकिन हिंदुस्तान में नहीं।

आजतक ये स्टैंड है कि हिंदुस्तान में मैड काऊ डिसीज़ नहीं है। हमारे पास कुछ भी नहीं है। तो जो उन लोगों को हुआ था, ये अपने-आपसे हुआ या हमें नहीं मालूम कैसे हुआ।

अब हमारा एक डोनर था देहरादून में, वो भी जैन था और अचानक से वो गिरने लगा, चल नहीं पाता था, अन्य चीज़ें होने लगीं। उसको बॉम्बे ले गए। ये अब की बात है, दस साल के अंदर-अंदर की बात है। शायद छह साल पहले हुआ था। उसमें उन्होंने खून का सैंपल (नमूना) भेजा अटलांटा। जहाँ एक सेन्टर है मैड काऊ डिसीज़ के लिए और वहाँ पता चला कि इसको मैड काऊ डिसीज़ है।

अब उसकी बीवी बोले, "जी, हम तो शाकाहारी हैं, शुद्ध शाकाहारी हैं।" फिर पता चला कि ये जनाब जाते थे ढाबे में और माँस खाकर के आते थे। मैंने सरकार को उस समय चिठ्ठी लिखी कि "भैया! अकेले गाय तो ये नहीं खा सकता न, बहुत लोगों ने खाया होगा। और एक गाय इस अकेले बंदे ने तो नहीं खाया तो जहाँ से भी माँस लाया गया, इंवेस्टिगेशन करिए कि कौनसे पशुओं के झुंड से आया, कौन पाल रहा है, किधर से कटा है।" क्योंकि एक व्यक्ति का तो पता चला है, लेकिन भगवान जाने कितनों को है।

हम हिंदुस्तान में इसको बोलते हैं एल्जाईमर्स। तो यहाँ एकदम से सबको एल्जाईमर्स हो रहा है लेकिन मैड काऊ नहीं। चाहे आपके लक्षण एल्जाइमर्स के नहीं हैं, मैड काऊ के हैं फिर भी ये एडवांस एल्जाइमर्स है। या एडवांस पारकिनसन्स है। हमने बहुत नाम उसको दिए हैं, असल में नाम है मैड काऊ ; और जो किसी ने नहीं देखा, क्योंकि वी आर नॉट अलाऔइन्ग अवरसेल्वेस टू रेकग्नाइज़ (हमारी सच्चाई सबको पता चले, ऐसा हम नहीं चाहते)। तो हम लोग नैशनली और इंटरनेशनली बहुत ज़्यादा धौंस जमाते हैं, चीज़ों को छुपाने में।

मिसाल, हमारे दूध में ब्रुसेलोसिस है। प्रैक्टिकली एवरी टाइम यू आर ड्रिंकिंग मिल्क, यू आर ड्रिंकिंग ब्रुसेलोसिस (व्यावहारिक रूप से आप जितनी बार दूध पी रहे हैं, आप अपने भीतर ब्रुसेलोसिस ले रहे हैं)। ब्रुसेलोसिस आपके शरीर के अंदर ट्यूबरक्लोसिस बनता है। आप देखें जो स्पाइरल है ब्रुसोलोसिस के बढ़ने का और ट्यूबरक्लोसिस के बढ़ने का, वो ऑडेंटिकल है। जितना दूध पिएँगे उतना ही टीबी बढ़ेगा लेकिन हम इसपर बिलकुल नहीं कोई शोध करेंगे, क्योंकि दूध पीना तो हमारा धर्म है। कृष्ण पीते थे, तो हम क्यों नहीं!

सो वी नीड टू स्टॉप फूलिंग अवरसेल्वस। इंडियन गवर्नमेंट फूल्स इटसेल्फ एंड ट्राइड टू हाईड फिगर्स। एवरी गवर्नमेंट फूल्स दैमसेल्वेस बट वी मोर दैन मोस्ट (हमें ख़ुद को बेवकूफ़ बनाना बंद करना होगा। भारतीय सरकार ख़ुद को बेवकूफ़ बनाती है और आँकड़ों को छुपाती है। हर सरकार ख़ुद को बेवकूफ़ बनाती है, पर हम सबसे आगे हैं।)

आचार्य: ये जो टू प्रॉन्स स्ट्रेटेजी है, एक तो यही कि जैसे जो आप बातें बोल रही हैं, ये बहुत-बहुत कम लोगों को पता होंगी। इनमें से कुछ बातें मुझे भी नहीं पता थी। एक तो ये बातें सामने आनी चाहिए कि भई! अगर तुम सिर्फ़-और-सिर्फ़ मटेरियल वेलफेयर (भौतिक समृद्धि) में भी यक़ीन करते हो, तो देखो कि इकोनॉमिक कॉस्ट (आर्थिक लागत) कितनी हाई (ऊँची) है तुम्हारे मीट कंज़प्शन (माँस उपभोग) की।

उसमें तुम क्रुएलिटी (क्रूरता) वगैरह बीच में मत भी लाओ। तुम्हें नहीं सोचना है क्रुएलिटी बुरी चीज़ है, मत सोचो। तुम्हें इकॉनोमी सोचनी है न, तो देखो कि ये जो तुम्हारी डायटरी हैबिट्स (खाने की आदतें) हैं, ये कितनी पुअर इकोनॉमिक्स हैं। तो ये चीज़ होनी चाहिए।

और जो लोग उससे आगे समझने को तैयार हों, जिनके पास थोड़ी सी संवेदना हो, उन तक वो पक्ष भी लाया जाना चाहिए कि तुम कौन हो और तुम्हारा जानवरों से रिश्ता क्या है; और उनके साथ जो तुम कर रहे हो, क्या तुम्हें पता भी है।

मेनका जी: जितना आप उनके साथ अत्याचार करेंगे, आपके साथ वो भी वैसा करेंगे। 'फर्स्ट यू ईट द काऊ, दैन द काऊ ईट्स यू' (पहले आप गाय को खाते हैं, फिर गाय आपको खाती है)। यही होना है, सृष्टि यही करती है; जो आप उसे देते हैं, वह भी वैसा ही लौटाती है।

आचार्य: बिलकुल सही।

नहीं तो हो नहीं सकता न कि जितनी आज मानसिक बीमारियाँ हैं और जितना हम आज दुःख में हैं, अपनी प्रोस्पेरिटी (समृद्धि) के बावजूद, उसकी कोई तो वजह होगी। कुछ तो हम ऐसा कर रहे हैं न कि इतना पैसा है आज—आज आम-आदमी के पास दुनिया में जितनी प्रोस्पेरिटी है, जितनी समृद्धि है, उतनी इतिहास में कभी भी नहीं थी; लेकिन उसके बाद भी हमारे चेहरे कैसे हैं?

मैं प्रति व्यक्ति आय की बात कर रहा हूँ कि आज हम जितने समृद्ध हैं उतने कभी नहीं थे। लेकिन उसके बाद भी हम मानसिक तल पर जितने दुखी हैं, शायद इतने दुखी भी हम कभी नहीं थे।

मेनका जी: यदि हम ये देखना शुरू करें कि हम क्या हैं बजाय इसके कि हमारे पास क्या है, फिर हम खुश भी होंगे, दुनिया भी जिएगी, हम भी जिएँगे। और हम उतनी ही खुशी से रहेंगे जितना टू हैव के साथ हम सोचते हैं कि हम खुश हैं।

आचार्य: लेकिन इसके लिए आपको यह प्रमाणित करके दिखाना होगा। कुछ ऐसे रोल मॉडल्स निकलकर के आने चाहिए जो बीइंग में जी रहे हैं।

मेनका जी: सर, मैं ये कहती हूँ कि हमारे दिल के अंदर अगर आप झाँक लें तो हिंदुस्तान में किसको हम लोग इज़्ज़त देते हैं? हम किसी अमीर को इज़्ज़त नहीं देते, उसके सामने झुकेंगे। वी नो दैट टू बी इज़ मोर इम्पोर्टेन्ट दैन टू हैव (हम जानते हैं कि आप क्या हैं ज़्यादा महत्वपूर्ण है बजाय इसके कि आपके पास क्या है)।

आचार्य: वो बदल गया न।

मेनका जी: अभी नहीं, अभी नहीं।

आचार्य: बहुत बदल गया। जबकि जब तक हम वैसे थे न कि जब हमारे लिए सड़क पर चलता नंगा साधु, जो सबसे बड़ा सेठ होता था उससे ज़्यादा सम्माननीय था, तब तक हम इतने ज़्यादा हिंसक भी नहीं थे। आज आपको साधु नज़र कहाँ आता है सड़क पर?

और आज तो आध्यात्मिक होने का मतलब हो गया है कि आपको और गालियाँ पड़ेंगी, सीधे-सीधे फ्रॉड माना जाएगा। आज का तो रोल मॉडल — मैं कहूँगा आज का तो महात्मा ही बिलियनेयर है। और उसको ही हमने आदर्श बना लिया है, वही हमारा सेलिब्रिटी है, उसी की लिखी हम किताबें पढ़ रहे होते हैं।

मेनका जी: लेकिन अभी भी तो हम भागते हैं गुरुओं के पीछे?

आचार्य: उससे ज़्यादा हम भागते हैं पैसे के पीछे। क्योंकि गुरु भी भाग रहा है पैसे के पीछे। तो आप गुरु के पास भी जा रहे हो तो...

मेनका जी: लेकिन वो गुरु नहीं है।

आचार्य: पर उसके अलावा और दूसरे तरह के गुरु हैं कहाँ पर? हमें कुछ बहुत प्रमाणिक, इरिफ़्‌यूटब्‌ल् , जिनके ऊपर कोई शक नहीं किया जा सके, और जो प्रत्यक्ष प्रमाण हों, हमें ऐसे रोल मॉडल्स चाहिए, जो ये दिखा सकें कि बीइंग पहले अगर आती है, तो हैविंग बहुत बड़ा सरदर्द नहीं रह जाता; ये जीने का तरीका है। ये जब सामने आएगा न तो जो हमारी भोग की लिप्सा है कि और चाहिए, और चाहिए, और पैसा आया नहीं कि मुझे और एक हार्टलेस (हृदयविहीन) और इंसेंसिटिव , क्रूर और ब्लडीड लाइफ़ स्टाइल जीनी है, वो फिर हमारी चीज़ थोड़ी पीछे चली जाएगी।

उसमें मैं समझता हूँ नयी पीढ़ी का जो किरदार होगा, वो बड़ा अहम हो जाएगा क्योंकि इन्हीं के हाथ में सबकुछ है। भारत जवान देश है, इन्हीं की तादाद सबसे ज़्यादा है। और अभी पन्द्रह-बीस साल तक भारत की औसत आयु कम ही होनी है। अगर इन तक ये संदेश जा सके कि देयर इज़ अल्टरनेट वे टू बी एंड स्टिल बी जॉयफुल (जीने का एक और तरीका है और वह आनंदप्रद भी है)।

और ज़रूरी नहीं है कि आपको जो बात फ़िल्म दिखा रही है, मीडिया दिखा रहा है या आपका घर-परिवार भी दिखा रहा है, आप उसी पर चलो। अगर इनको किसी तरीके से ये बात समझ में आ सके, तो ही ये बच पाएँगे, पृथ्वी बच पाएगी, प्रकृति बच पाएगी, और ये पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, जीव ये सब बच पाएँगे।

और अगर इनका मन ऐसा बन गया कि ‘साहब, हम तो दुनिया में आए हैं हैविंग (पाने) के लिए। हैव व्हाट? हैव फन, हैव प्लेज़र, हैव प्रॉपर्टी, हैव दिस, हैव दैट, हैव चिल्ड्रन, हैव व्हाटएवर (क्या प्राप्त करना है? मज़े, सुख, धन-दौलत, बच्चे और जो भी मिल जाए)।‘ तो अगर इनका ये मन बन गया, तो मुझे नहीं लगता कि बहुत उम्मीद है। बहुत ज़रूरत है इनके साथ काम करने की। एक क्रांति ही चाहिए और वो एक कम्पोज़िट , इंटीग्रेटेड (एकीकृत) क्रांति होगी इस अर्थ में कि उसका संबंध सिर्फ़ माँस खाने से नहीं हो सकता, उसका संबंध जीवन के हर पहलू से होगा।

ऐसा हो पाना बड़ा मुश्किल होगा कि एक आदमी ऐसा हो जो हर तरीके से भ्रष्ट है, हर तरीके से उसके विचार बिलकुल नरक के हैं लेकिन उसके बाद भी वो वीगन है। और ऐसे अगर कुछ लोग हुए भी तो पहली बात, वीगनवाद दूर तक जाएगा नहीं। दूसरी बात, ये लोग वीगनवाद के लिए बड़े बुरे प्रचारक होंगे। तो एक कॉम्प्रिहेंसिव (व्यापक) तरीके का, मन का और व्यक्तित्व का अभी हमको बदलाव चाहिए। जिसमें बंदा ही ऐसा निकलकर के आए कि उसके लिए असंभव हो जाए माँस खाना या क्रूरता करना या कोई भी बेवकूफ़ी का काम करना।

ये सिर्फ़ आध्यात्मिक रूप से नहीं, बौद्धिक रूप से, आर्थिक रूप से भी तो मूर्खता का काम है न माँस खाना, डेयरी खाना। ये एक नयी पौध ही चाहिए, एक पूरे नए तरीके का जवान इंसान चाहिए। हम उसी को तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं। और वही कल का वोटर भी बनेगा। वही कल नीतियों को इन्फ्लुएंस (प्रभावित) करेगा।

मेनका जी: असल में हम लोगों की जो सबसे बड़ी बाधा बन रही है, वो ये है कि हम लोग कल की बात करते हैं। यू नो, इवन व्हेन यू हैव दिस कॉन्फ्रेंसेस, वी टॉक अबाउट क्लाइमेट चेंज (जब हम सम्मेलन में बात करते हैं तो कहते हैं जलवायु परिवर्तन) होगा। होगा नहीं, हो रहा है, हो चुका है। सो लेटस नॉट टॉक अबाउट...

आचार्य: इसलिए जवान आदमी के साथ डील करना ज़रूरी है, क्योंकि वो आज पैदा करने जा रहा है। वो आज या कल किसी भी दिन बच्चा पैदा कर सकता है। तो इसीलिए ज़रूरी है कि इनसे बात की जाए, क्योंकि ये जवान हैं अभी। सबसे पहले तो हम जनसंख्या वृद्धि को ही रोक सकें, तो वही कंपैशन का सबसे बड़ा कदम होगा। हम ये समझ ही नहीं पा रहे हैं कि टुडे टू बी कंपैशनेट इज़ टू बियर आइदर नो चिल्ड्रन और वेरी फ्यू, वन अटमोस्ट (अभी करुणा यही है कि बच्चा ही न हो या बहुत ही कम हों, ज़्यादा-से-ज़्यादा एक)। तो लोगों के साथ काम करना ज़रूरी है।

मेनका जी: केवल एक चीज़ समझने की ज़रूरत है कि अभी कोई भी खुश नहीं है, चाहे अम्बानी हो, चाहे कोई भी हो। अगर आप खुश नहीं रह सकते तो जो बच्चा पैदा आप कर रहे हैं, वो कौनसी उम्मीदों के साथ पैदा कर रहे हैं? क्या वो खुश रहेगा? नहीं। तो आप और दुःख में पैदा कर रहे हैं।

आचार्य: लेकिन मैम ये चीज़ कहीं से निकलकर नहीं आती कि जिसके पास पैसा है या जिसके पास सत्ता है, वो आदमी दुखी है।

मेनका जी: लगता नहीं है? आप संसद के सारे लोगों को देखिए जब आप कैमरा चलाएँगे, एक-से-एक बढ़कर के...

आचार्य: देखिए! सारा खेल पीआर (जन सम्पर्क) का है। आप इनसाइडर हैं इसलिए आप जानती हैं कि वहाँ कितना दुःख है। आप ये तक जानती हैं कि वहाँ लोग ईविल हैं। लेकिन मीडिया, ये सब तो कम उम्र के लोग हैं न, और कच्चा दिमाग होता है, गलिब्ल (भोले-भाले) होते हैं, मीडिया इनके सामने...

मेनका जी: वही टू हैव टू बी। लगता है कि पार्लियामेंट में पहुँचे हो, तब तो एमपी (सांसद) होना बड़ी चीज़ होगी। आप लोग जानते नहीं कि हम लोग कितनी मेहनत करते हैं।

आचार्य: जो पूरा पीआर प्रोपेगैंडा (दुष्प्रचार) है, वो ये बताता है कि अगर आपने मिलियन डॉलर कमा लिए हैं या अगर आपके हाथ में सत्ता आ गई है, तो आप स्वर्ग में रह रहे हो। उसको बस्ट (तोड़ना) करना बहुत ज़रूरी है।

इन लोगों को बहुत ज़रूरी है कि निकलकर के आएँ कि "हम एक अलग तरीके से जी रहे हैं, लेकिन हम आनंदित हैं और सफल हैं। और हम ही आनंदित हैं, और सफल हैं। और ये हम खुले खड़े होकर घोषणा करते हैं कि हमने जो जीवन में कदम लिया है और स्टैंड लिया है हम उसके साथ बहुत-बहुत खुश हैं।" नहीं तो सारी भीड़ उधर को ही जाएगी।

मेनका जी: ऐसा है कि हमने देखा है बहुत लोग जो जीवन छोड़कर के एक चीज़ पर लग जाते हैं—जैसे कि राजेंद्र सिंह ने पानी के ऊपर बहुत मेहनत की—वो खुश हैं। लेकिन सरकार ने उनको जेल में डाला है, उसकी मारा-पीटी भी की है, कई दफ़े उसका सिर भी टूटा है, लेकिन किसी को खुश देखकर भी इंसान को चिढ़ आ जाती है।

आप जानते हैं कि यदि आप लोग पार्टी में जाएँगें और आप बोल दें कि आप शराब नहीं पीते हैं, तो कहेंगे "क्या? किस किस्म के लोग हो? थोड़ा-सा पी लो।" अगर हम कहें—जैसे मैं एलाउ नहीं करती हूँ कि मैं अगर बाहर जाऊँगी तो कोई भी माँस खाएगा, कोई नहीं। या तो आप मुझे मत बुलाइए या तो सब लोग शाकाहारी बनिए। उस समय लोग कहेंगे, "क्या घास-फूस खा रहे हैं!"

लेकिन गर्व से अगर हम बोलें कि हम खुश हैं चीज़ें छोड़कर। गर्व से हम बोलें कि हम देश के लिए कुछ कर रहे हैं। क्या कर रहे हैं? हम बच्चे पैदा नहीं कर रहे हैं, हम माँस नहीं खा रहे हैं, हम चीज़ें नहीं माँग रहे हैं। वी वुड रादर बी दैन हैव (हम क्या हैं ये देखेंगे, ना कि हमारे पास क्या है)। आप रातों-रात खुश भी हो सकते हैं। शुरू-शुरू में एक चिढ़ होगी आपके साथ, जैसे वीगनवाद के साथ। जो असली वीगन हैं, उनके साथ बहुत चिढ़ है। यू नो, यू सी द नंबर ऑफ जोक्स दैट आर ऑन विगन्स (आप जानते हैं बहुत सारे चुटकुले वीगन लोगों पर होते हैं), बहुत भयानक है। लेकिन क्यों? क्योंकि आपकी खुशी कोई बर्दाश्त नहीं कर पा रहा।

आचार्य: तो कल्चर को बदलना होगा और थोड़ा चढ़कर खेलना होगा। ट्रू हैप्पीनेस इज़ रिकलेम्ड बाय दोस हु डिज़र्व दिस एंड वैरी पॉवरफुल्ली (सच्ची खुशी का दावा उन्हें करना चाहिए जो इसके हकदार हैं, और दृढ़ता के साथ)।

मेनका जी: गर्व से।

आचार्य: हाँ, गर्व के साथ, गरिमा के साथ, तो उस चीज़ को रीक्लेम करना होगा और खुलकर, चढ़कर बहुत ज़ोर से, दहाड़कर घोषणा करनी होगी कि "देखो! आनंद का अधिकार हमको है और हम प्रसन्न हैं। और तुम जो ये अपनी खुशी की डुगडुगी बजा रहे हो, ये खोखली है। खोखली है, ये तुम्हारे चेहरे पर भी लिखा है और तथ्यों से भी प्रमाणित किया जा सकता है। इकोनॉमिक्स (अर्थशास्त्र) से भी प्रमाणित किया जा सकता है, अध्यात्म से तो प्रमाणित होता-ही-होता है, सबसे ज़्यादा तो तुम्हारे मुँह से और जीवन से प्रमाणित होता है कि तुम खुश नहीं हो।"

तो कल्चर में फ़िलहाल जो रोल मॉडल बनकर बैठे हैं, इनको नीचे लाना पड़ेगा। इनको नीचे नहीं ला सकते, तो हमें उनसे ऊपर उठना पड़ेगा। हम ये नहीं दिखा सकते कि हम परेशान हैं या हम तड़प रहे हैं या हम अगर परेशान हैं भी, हम अगर संघर्ष में हैं भी, तो हम संघर्ष के बीच भी राजा हैं।

मेनका जी: नहीं, संघर्ष से कोई दुखी नहीं होता। मेरी पूरी ज़िंदगी चली गई संघर्ष में।

आचार्य: आप हमारा सिर फोड़ दो, आप हमको जेल में डाल दो लेकिन हम उसके बीच भी अपनी गरिमा रखे रहेंगे, और हमारी आँखों में जो तेज होगा, जो जॉय होगा, वो तुमको कभी नसीब नहीं होने वाला, क्योंकि तुम जीवन ही ग़लत जी रहे हो।

ये पूरी जो लड़ाई है, वो इस वक़्त सही और ग़लत के बीच में है। और एक बड़ी व्यापक लड़ाई चल रही है, कुरुक्षेत्र ही है ये पूरा। और पशुओं को अगर हमको बचाना है, तो उसमें एक तरफ़ तो नीति संबंधी उपाय हैं, और वो चीज़ें हैं जो हमको तुरंत ज़मीन पर करनी हैं।

और दूसरी तरफ़ जो हमें इंसान का मन ही बदलना है, वो ही करना होगा। नहीं तो क्या होगा न कि पैनी वाइज़ पाउंड फूलिश (छोटे मुद्दों में होशियारी और बड़े मुद्दों में बेवकूफ़ी) वाली चीज़ हो जाएगी। मैं कितने ही वीगन लोगों को जानता हूँ, जो दस साल से वीगन हैं और पिछले दस साल में तीन बच्चे पैदा कर दिए हैं, ये कौनसा वीगनवाद है?

मेनका जी: नहीं, वो वीगनवाद बहुत अजीब है। मैं उसके बारे में बहुत लिखती भी हूँ, कि इट इज़ जस्ट ऐन अल्टरनेटिव शॉपिंग टेक्निक (केवल यह खरीददारी का एक विकल्प है)। आप कह दो, "मुझे वीगन लिपस्टिक चाहिए, मुझे दस कपड़े और खरीदने हैं जो वीगन हैं, ऑर्गेनिक हैं। मुझे वीगन हैमबर्गर चाहिए मैकडोनाल्ड जाकर के", तो ये क्या वीगनवाद हुआ? दिस इज़ जस्ट ए डिफ़रेंट मार्केटिंग स्ट्रैटेजी (तो ये वस्तुओं को बेचने का बस एक अलग तरीका हुआ)।

आपको लिपस्टिक किसलिए चाहिए? आपको हैमबर्गर किसलिए चाहिए? आपको दस बच्चे किसलिए चाहिए? आप हर वक़्त पूरे दिन अपने-आपको वीगन बोलेंगे, लेकिन ढूँढने जाएँगे कि क्या खाएँगे जो वीगन है। क्यों भई? दाल-रोटी खा लो। इस प्रकार यह सिद्धांत पूरी तरह से खोखला हो जाता है।

यू नो, नाउ बिकॉज़ द मार्किट, जस्ट इट सेल्स वेरी क्विकली (चूँकि बाज़ार चीज़ों को जल्दी बेचना चाहती है), सारी कम्पनीज़ का एक वीगन विंग है। उदाहरण, बॉडी शॉप। बॉडी शॉप कहते हैं, ‘हम जानवरों पर एक्सपेरिमेंट (प्रयोग) नहीं करते हैं, हम ये नहीं करते, वो नहीं करते’; तो बहुत सारे वीगन्स वहाँ पहुँच जाते हैं। लेकिन जो मालिक है बॉडी शॉप का वो लॉरियल है, जो सबसे ज़्यादा जानवरों पर टेस्टिंग करती है दुनिया में। और यह वैसा ही है जैसे बिल्ली चूहे को ट्रैप करने के लिए करती है। सो द आईडिया ऑफ वीगनिज्म इज़ छोड़ो-छोड़ो (तो असली वीगनवाद त्याग से ही सफल होगा)।

आचार्य: ये जो त्याग है न या कहिए कि निष्कामता, कि नहीं चाहिए, क्यों नहीं चाहिए? क्योंकि जो असली चीज़ है, वो ऐसे मिलने की नहीं। ऐसे नहीं मिलती इसलिए नहीं चाहिए। ये एक पूरे तरीके से स्प्रिचुअल वैल्यू (आध्यात्मिक मूल्य) है और ये भारत में रही ही है। त्याग असल में – कई बार कहा करता हूँ कि अध्यात्म का मतलब ही है कि जो बेकार की चीज़ है, कचरा है, नुक़सान देगा उसको छोड़ दो, यही अध्यात्म है। अध्यात्म का और कोई मतलब ही नहीं होता।

क्यों उसको पकड़कर के बैठे हो जो तुम्हें नुक़सान देगा? क्यों उसको पकड़कर के बैठे हो जो तुम नहीं हो? एक झूठी पहचान या झूठे विचार, झूठी मान्यताएँ, झूठे संबंध, इनको पकड़कर के क्यों बैठे हो?

वही जो झूठी चीज़ हम पकड़कर के बैठते हैं, अध्यात्म में उसी को अहंकार बोलते हैं। कि जो तुम्हारा है नहीं, पर तुमने उसको बहुत ज़रूरी मान लिया, तो तुम पकड़कर के बैठे हो।

त्याग कैसे हो पाएगा अगर स्प्रिचुअल वैल्यूज़ आगे नहीं बढ़ रही हैं? पुराने तरीके से ना आगे बढ़ें, नए तरीके से आगे बढ़ें। आज की भाषा में आगे बढ़ें, आज के उपायों से आगे बढ़ें। लेकिन घूम-फिरकर के बात यहीं पर आ जाती है कि आप कैसे, जो माँस है, उसका स्वाद, या जो अपनी इग्नोरेंस (अज्ञान) है— इग्नोरेंस में भी तो एक स्वाद होता है न, एक मज़ा होता है, एक ब्लिस होती है इग्नोरेंस में भी—अब उसको कैसे त्याग दोगे अगर आपको त्यागने का प्रशिक्षण ही नहीं मिला है?

और ये चीज़ बचपन से होनी ज़रूरी है। बचपन में नहीं हुई है तो कम-से-कम बीस-पच्चीस साल के हो जाओ, तब ये पता चले। वो भी ना हो पाए, तो इतना तो हो जाए कि आपके लिए त्याग एक खौफ़नाक शब्द ना रह जाए। बहुत सारे लोग ऐसे हैं, जवान पीढ़ी में खासतौर पर, जिनको अगर बोल दिया जाए 'छोड़ो', तो उनको लगता है उनकी ज़िंदगी से ही कुछ घट गया—ज़िंदगी से नहीं, जैसे उनकी हस्ती से ही कुछ छीन लिया गया है, वो कम हो गए, उनके दिल में सुराख हो गया; क्योंकि कह दिया गया है कि त्याग कर दो।

जो त्याग नहीं सकता वो तो यही करेगा कि जिधर से भी नोंच-खसौट सकता है, मार सकता है, किसी का खून पी सकता है, वो ये सबकुछ करेगा। जहाँ कहीं भी उसको लगेगा कि प्लेज़र की थोड़ी भी संभावना है, वो वहाँ पर अपना दाँत गढ़ा ही देगा। वी नीड ए डिफ़रेंट ह्यूमन बीइंग (हमे एक अलग ही मनुष्य चाहिए)। हम हिंसक तो हमेशा से थे, आपने बड़े उसको काव्यात्मक और नाटकीय तरीके से कहा कि इंसान जब पैदा ही हुआ था, तभी उससे पूछा गया, ‘भई! तेरे पास दो विकल्प हैं, या तो आत्मा की तरह जी सकता है, बी (होना)। या अहंकार की तरह जी सकता है, हैव (पाना)।‘

लेकिन इतिहास की धारा में तब से लेकर के आजतक, ये जो राक्षस रहा है मनुष्य के रूप में, इसके पास उतनी ताक़त नहीं रही है। तो ये उतना नाश नहीं कर पाया है जितना आज कर रहा है।

भई! पहले भी लोग माँस खाते थे, पर ये तो नहीं कर पाते थे न कि भारत में काटकर के, पानी के जहाज पर लादकर के, वो उसको वियतनाम या ब्राज़ील या यूरोप भेज रहे हों। आज आप वो सबकुछ कर सकते हो, इसीलिए आपकी विध्वंस की ताक़त अनंत गुणा हो गई है। इस बंदे को बदलना पड़ेगा। ये बंदा नहीं बदलेगा तो कुछ होगा नहीं। ये बंदा जानवर को खा रहा है, ये अपने-आपको खा रहा है।

बिलकुल आपने ठीक कहा कि ये फ्लेश इटर नहीं है, ये कैनिब्‌ल्‌ है वास्तव में; ये नरभक्षी है। ये नरभक्षी है, हम ख़ुद को ही खा रहे हैं और हमें पता भी नहीं है।

साँप वगैरहा कई बार जब पागल हो जाते हैं, तो वो अपनी ही पूँछ अपने मुँह में रखकर के खाना शुरू कर देते हैं। और उसको पता भी नहीं चलता, वो ख़ुद को ही खा रहा है। वो अपनी ही पूँछ को अपने ही पेट में डालता रहता है, डालता रहता है और उसको उसमें स्वाद आ रहा होता है; और फिर वो मर जाता है थोड़ी देर में।

हम वैसे हो गए हैं। हम जानवर ही नहीं हो गए हैं, हम पागल जानवर हो गए हैं।

तो वो एक टोटल ट्रांसफॉर्मेशन (पूर्ण परिवर्तन) लाने की बहुत-बहुत सख़्त ज़रूरत है। और वो तभी होगा जब जो लोग जान रहे हैं, समझ रहे हैं, वो लोग डर छोड़ें, घबराना छोड़ें, शर्म छोड़ें और बहुत बुलंद तरीके से खड़े हो जाएँ।

मेनका जी: हाँ, और शर्म किस बात की? जो आदमी पीता है या माँस खाता है, उसको शर्माना चाहिए या हमें शर्माना चाहिए? कोई चीज़ छोड़ने से क्या शर्म हो?

आचार्य: आपने एक शब्द इस्तेमाल करा था कि यू नीड टू डिक्लेयर योरसेल्फ एरोगेंटली (आपको घमंड के साथ स्वयं की घोषणा करनी पड़ेगी)। उसमें भाव क्या था, वो मैं बिलकुल समझ रहा हूँ और आप ख़ुद उस चीज़ का सजीव प्रमाण हैं। तुम जो हो उसको अभिव्यक्त करो न, किसी को बुरा लगता है तो लगे, कोई कोर्ट केस करता है तो करे। आप अच्छे भी बनकर रहोगे, तो लोग तो तब भी कोर्ट केस कर देंगे।

मेनका जी: अच्छा क्या है, बुरा क्या है? प्रमाण तो केवल इतना है कि आपके कारण पृथ्वी कितना भुगत रही है, बस इतना ही। यदि आपके कारण पृथ्वी कम नष्ट हो रही है तो तुलनात्मक रूप से आप अच्छे हैं। अच्छा तो कोई हो नहीं सकता। तो आप प्रमाणों के ऊपर जाइए न।

दूसरा ये है कि आपके मापदंड क्या हैं? कौन अच्छा है? अच्छा वो है जो आपसे मिठास से बोले, और मिठास से बोलने के बाद आपकी पूरी दुनिया तबाह कर दे? क्या वो अच्छा है?

या वो अच्छा है जो आपसे साफ़-साफ़ बात करे, या ना भी बात करे, लेकिन आपकी रक्षा करे? और हर तरीके से अपने जीवन को आगे करके, न्यौछावर करके, तब जाकर के अच्छाई करे? जो अपने हर होप्स एंड ड्रीम्स को क्रश करके, एक ऐसे रास्ते पर चले जिसमें सबकी भलाई है। कौन अच्छा है? हमको अपने मापदंड के तरीके भी बदलने पड़ेंगे कि क्या सही है और क्या ग़लत।

सबकुछ वहीं से शुरू होता है, रेस्पेक्ट एंड गुडनेस। रेस्पेक्ट फ़ॉर आल ऑफ लाइफ, एंड सेकंडली व्हाट इज़ गुडनेस? हू इज़ गुड एंड हू इज़ बैड? इज़ देयर गुड एंड बैड? हू इज़ कंपेरिटिवली बेटर, हू इज नॉट? (समष्ट जीवन के प्रति आदर, और दूसरा, अच्छाई है क्या? अच्छा और बुरा है कौन? क्या अच्छा-बुरा है भी? तुलनात्मक रूप से कौन बेहतर है और कौन नहीं?)

कौन है धरती का दुश्मन? धरती का बोझ एस आई कॉल दैम, यू नो, एंड हू इज़ नॉट? दैट इज़ आल यू हैव टू इवैलयुएट पीपल। डोंट इवैलयुएट पीपल बाय सेइंग (जैसा कि मैं उनको बोलती हूँ, और कौन नहीं है? सिर्फ़ इसी तरह हमें लोगों को परखना चाहिए। लोगों ko ये कहकर नहीं परखना चाहिए कि,) ‘वो अच्छा बोलते हैं, वो भाषण अच्छा देते हैं, वो नौटंकी अच्छा करते हैं।‘

आचार्य: कॉन्फिडेंस बहुत है।

मेनका: बुरे लोगों में कॉन्फिडेंस ज़्यादा है। क्योंकि जो अच्छा होता है, वो पूरे दिन अपने-आपको टटोलता है। "क्या मैंने ये ठीक किया? नहीं ठीक किया? मुझे ऐसे करना चाहिए था?"

आचार्य: और कुछ-न-कुछ उसको ग़लत मिलता है।

मेनका जी: हमेशा-हमेशा।

आचार्य: तो वो अपने आत्मसन्देह में रहता है और अपनी एक विनम्रता में रहता है, एक ह्यूमिलिटी होती है। और जो ये बेवकूफ़ आदमी है, इग्नोरेंट है, इसीलिए तो हिंसक है, इसमें कूट-कूटकर हिंसा भरी होता है। और एकदम ये छाती तानकर खड़ा हो जाता है और जो अच्छा आदमी है वो दब जाता है। अभी समय आ गया है जो अच्छा आदमी है, वो अपने आत्मसंदेह को साथ रखकर भी, अपनी विनम्रता को साथ रखकर भी, एक मिशन के कारण अपने-आपको डिक्लेयर (घोषित) करे।

आप सफल हो या नहीं, उसका निर्धारण उनके मापदंड से नहीं हो सकता। उन्होंने जो यार्ड स्टिक , जो बेंचमार्क निर्धारित करे हैं, कि आप इस बेंचमार्क पर अगर इतने हो तो आपको सफल मानेंगे, हम उसका इस्तेमाल नहीं कर सकते। साहब! हम कितने ठीक हैं, हम कितने पानी में हैं, हम जानेंगे और हमारे मापदंड अलग होंगे।

ये तो ऐसी सी बात है कि कोई दूसरा जीव हो, जिसका शारीरिक तापमान एक-सौ-दस रहता हो हमेशा, और हमारा रहना होता है अट्ठानवे, और हम उसका थर्मामीटर लेकर अपना नाप रहे हैं, हमें लगातार ये लग रहा है कि "अरे बाप रे बाप! मैं ठंडा पड़ रहा हूँ, मैं ठंडा पड़ रहा हूँ, उसकी ज़िंदगी ज़्यादा गर्म है, उसकी ज़िंदगी ज़्यादा गर्म है; मैं ठंडा पड़ रहा हूँ।"

"वो होंगे जैसे होंगे, मैं कितना अच्छा हूँ, मुझे आगे क्या करना है, मैं कितना सफल हुआ, मुझे अभी और किस तरीके से बेहतर बनना है; वो मैं ख़ुद नापूँगा।" अगर हम ये नहीं कर रहे हैं न, तो हमने कल्चर को ऐसों के हाथ में दे दिया है जो बिलकुल राक्षस हैं। और उनको अगर हम कल्चर का ठेकेदार बनाए रहेंगे तो देर-सवेर फिर हमें भी उन जैसा बन जाना पड़ेगा। और उनके जैसे हम नहीं भी बनेंगे तो हम दबे-दबे जिएँगे। हम कम-से-कम जो लड़ाई लड़ रहे हैं, उसको जीत नहीं पाएँगे। दबे-दबे कोई लड़ाई जीती नहीं जाती।

प्र२: मैम मेरे पास कुछ सवाल थे, जो मैं चाहता था आपसे पूछूँ। उसमें एक बड़ी इंटरेस्टिंग चीज़ थी जब मैं आपके बारे में पढ़ रहा था कि जिस समय पर आप एनिमल वेलफ़ेयर मिनिस्ट्री की हेड बनी थीं, उस समय भारत में तो था ही नहीं, ऐसा कोई डिपार्टमेंट दुनिया में कहीं नहीं था। तो मैं चाहता था आपसे पूछूँ कि उस समय पर इस चीज़ को मेन स्ट्रीम में लाना आपके लिए कितना मुश्किल था?

मेनका जी: असल में ये मैंने नहीं किया था, मैंने माँगा था; करने वाले अटल बिहारी वाजपेयी जी थे, उन्होंने मुझे दे दिया। क्योंकि मैंने कहा कि आप मुझे कुछ भी दे दो लेकिन ये मुझे चाहिए, चाहे मैं कहीं भी जाऊँ। तो उन्होंने मुझे मिनिस्ट्री ऑफ सोशल जस्टिस भी दिया लेकिन उसके साथ-साथ ये भी दिया। वो एक सोचने वाले इंसान थे।

बहुत लोग मंत्री बनाते हैं उनको दबाने के लिए। और वो मंत्री ऐसे बनाएँगे कि जो सबसे ज़ीरो होंगे अपने महकमें में। नॉर्मली द प्राइम मिनिस्टर ऑलवेज़ मेक्स पीपल हू आर होपलेस इन देयर जॉब्स , (अकसर प्रधानमन्त्री ऐसे मिनिस्टर बनाते हैं जो अपने काम में बिलकुल शून्य होंगे) 'अंधों में काना राजा।' लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे नहीं थे, तो उन्होंने ये मिनिस्ट्री मुझे दे दी। एंड आई विल ऑलवेज बी ग्रेटफुल फ़ॉर दैट (और मैं हमेशा आभारी रहूँगी)।

बस ये है कि मेरी अपनी अज्ञानता की वजह से बहुत चीज़ें मैं नहीं कर पायी। शायद मेरी अपनी कमज़ोरी थी। वी आर आल्सो लिविंग इन ए डेमोक्रेटिक सिस्टम (और हम एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में हैं उस वजह से भी)।

मगर उस समय जितना कर सकती थी, रेड एंड ग्रीन डॉट, एंड मैनी अदर थिंग्स , वो उस समय का है। लेकिन अब तो वो मंत्रालय नहीं है, वो ख़त्म हो गया। वो आते ही अगला कदम उन्होंने पहले जोड़ दिया एनवायरमेंट के साथ, अब एनिमल हसबैंडरी में है। तो एक तरफ़ से आप उसको हैलो-हैलो बोलें और दूसरी तरफ से उसको काटो; वो एक ही मंत्रालय करता है।

प्र२: आचार्य जी, एक प्रश्न आपके लिए था। जो हमारे धार्मिक ग्रंथ हैं, धर्म जिसको हम बोलते हैं, उसमें भी किसी भी तरह का विगनिज्म हम देख सकते हैं, पहचान कर सकते हैं क्या?

आचार्य: देखो, विशुद्ध अध्यात्म को ज़रूरत ही नहीं पड़ती है कुछ भी बोलने की, कि क्या खाओ और क्या ना खाओ। क्योंकि ये बात इतनी स्पष्ट है, इतनी ज़ाहिर है कि इसमें वो बोलें भी क्या।

तुम वेदांत अगर लोगे तो उसमें तुम्हें शायद ही कोई श्लोक मिले—है ही नहीं जो तुमको ये बता रहा होगा कि माँस खाना बुरा है या पशु से किसी तरह का भोज्य पदार्थ बनाना बुरा है, वेदांत इस तरह की कोई बात नहीं करता। क्यों नहीं करता? क्योंकि ऋषियों को पूरा विश्वास है कि अगर तुमको वेदांत का 'व' भी समझ में आया है, तुमको अभी आरंभिक सूत्र भी समझ में आ गए हैं, तो तुमको ये बताने की ज़रूरत ही नहीं है कि ‘भई! जानवर तुम्हारे भोजन के लिए या मनोरंजन के लिए या उपयोग के लिए नहीं हैं।‘

तो तुम अगर ये पूछोगे कि "कहाँ लिखा है? क्या लिखा है?" तो ये बात भी बहुत मायने नहीं रखती। आप कहें कि, "आप मुझे बताइए कि कौनसी विशिष्ट श्लोक संख्या है, किस ग्रंथ में?" मैं वो बता भी सकता हूँ, लेकिन वो भी बहुत मायने नहीं रखती, क्योंकि पूरे अध्यात्म का जो मर्म है, जो गर्भ है, जहाँ से सबकुछ निकलता है, वो वेदांत है। वो इसकी बात करना भी ज़रूरी नहीं समझता।

और बात करना ज़रूरी इसलिए नहीं समझता क्योंकि ये बात बहुत स्पष्ट है। जो चीज़ पता ही होती है, आप उसकी तो बात नहीं करते न। आपके यहाँ कोई मेहमान आता है, आप उसको बोलते हो, "पानी लीजिए; अच्छा! चाय लीजिए; अच्छा! फल लीजिए।" आप उसको ये थोड़े ही बोलते हो, "अच्छा! साँस लीजिए।" क्योंकि ये कोई कहने की बात है? ये तो समझने की बात है, साँस तो आप लोगे-ही-लोगे। तो आपने किसी भी प्रेमीजन को या सम्मानितजन को कभी नहीं बोला होगा, “कृपया साँस लेते रहिएगा।“ ऐसे तो नहीं बोलते?

तो वैसे ही वेदांत कहीं नहीं बोलता कि पशु हत्या मत करो। अभी अगर स्थिति ये है कि दुनिया के निन्यानवे प्रतिशत लोगों को ये समझाने की ज़रूरत है कि साहब ये ग़लत काम है, मत करो, मत करो, क्यों मत करो? इससे क्लाइमेट चेंज होता है, इससे इकोनॉमिक लॉस होता है। इससे बायोडायवर्सिटी लॉस होता है, इसमें क्रुएलिटी है, इसमें ये है, इसमें वो है, पचास तरीके के तर्क देने पड़ते हैं न। हम लोग रोज़ यही तो कर रहे हैं, इतने तर्कों से लोगों को समझाना पड़ता है।

इतने तर्कों से लोगों को समझाना पड़ रहा है, इसका मतलब यही है कि वो अध्यात्म के तल पर बिलकुल शून्य हैं। थोड़ा भी अगर उनको आता होता, तो उन्हें कुछ आगे की बात समझानी पड़ती, उन्हें ये बिलकुल आरंभिक बात नहीं समझानी पड़ती। ये बिलकुल आरंभिक बात है, ये क ख ग है, ये ए बी सी डी है। ये भी अगर बताना पड़ रहा है तो मतलब दुनिया की हालत बहुत खराब है, बहुत ज़्यादा खराब है।

ये ऐसी सी बात है कि आप किसी को गाड़ी दिखाओ और आपको उसको बताना पड़े कि वो जो वो वाला पैडल है न, उसको एक्सीलरेटर बोलते हैं। किसी को नयी गाड़ी दिखाओ तो हो सकता है, आपको कुछ बातें उसको बतानी पड़ें। उदाहरण के लिए ये कि ‘साहब! इसमें वाइपर बाईं तरफ नहीं दाईं तरफ है’, या इंडिकेटर ; ये सब चीज़ें कई बार बतानी पड़ जाती हैं। या कुछ और चीज़ें होती हैं, जो हो सकता है आपको किसी को गाड़ी में बतानी पड़ें। लेकिन अगर आपको ये बताना पड़ रहा है कि गाड़ी आगे तब बढ़ती है जब एक्सीलरेटर दबाया जाता है, तो इसका मतलब हालत बहुत ज़्यादा खराब है।

मेनका जी: या उससे भी गए-गुज़रे कि ‘ये गाड़ी है’। (व्यंग्य करते हुए)

आचार्य: उससे भी गया-गुज़रा, ‘तुम इंसान हो, राक्षस नहीं। वो गाड़ी है और तुम इंसान हो। तुम गाड़ी नहीं हो, तुम मेकेनिकल नहीं हो, तुम्हारे पास चेतना है।‘

असल में ये लड़ाई जीती शायद इसलिए जा भी नहीं सकती, या मुश्किल है, क्योंकि ये लड़ाई अपने ही खिलाफ़ है। दूसरे बंदे में जो राक्षसी प्रवृति है, वो हम सबकी साझी ही तो है। हम सभी जानवर हैं, जिनकी बुद्धि भ्रष्ट है।

जो सड़क पर जानवर है, जो निरीह-मासूम पशु है, वो बिलकुल वैसा है जैसा प्रकृति ने उसको बना दिया है। इंसान अकेला है, इसको चेतना मिल गई है, जो चुनाव कर सकती है, और उसकी चेतना है भ्रष्ट। तो जब तक जो वो भीतरी जानवर है, हम उसको ठीक नहीं करते, ये लड़ाई रहेगी। तो मुश्किल है लेकिन फिर भी जितने भी दिन हैं जीने के लिए, उसमें इस लड़ाई को लड़ते हुए जीने में एक सुकून है, एक आनंद है। हार-जीत होगी या नहीं होगी, पता नहीं। निष्काम युद्ध करना है।

वही जो अर्जुन को कृष्ण ने कहा था कि "तुम्हारा धर्म है युद्ध करना; हारोगे या जीतोगे, वो तुम छोड़ दो; वो बाद की बात है, लेकिन तुम पीठ नहीं दिखा सकते यहाँ से। हार-जीत से तुम्हारा प्रयोजन नहीं है, तुम्हारा काम है लड़ना। तुम लड़ो क्योंकि उसके अलावा कोई विकल्प नहीं है अभी।"

"जीना तो है ही, कुछ-न-कुछ तो करना ही है, और इस वक़्त करने के लिए अभी सर्वश्रेष्ठ कर्म, अनिवार्य कर्म—सर्वश्रेष्ठ भी नहीं, अनिवार्य कर्म यही है कि तुम लड़ो।" तो ये लड़ाई तो हमें लड़नी ही पड़ेगी। इसी के लिए हम इकट्ठा हैं।

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