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प्रेम की भीख नहीं माँगते, न प्रेम दया में देते हैं
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: मैं लोगों के सामने अपना व्यक्तित्व ऐसे पेश करता हूँ कि मुझे लोगों से प्यार ही मिले और नफरत न मिले। मैं चाहता हूँ कि मुझे लोगो से प्यार ही मिले। और मुझे यह अच्छा भी लगता है जब मुझसे कोई प्रेमपूर्वक व्यवहार करता है, भले ही वह व्यक्ति अपनी ओर से कुछ भी कर रहा हो।

आचार्य प्रशांत : कैसे पता चलता है कि कोई प्यार कर रहा है?

प्र: वो मेरी सोच है। मतलब मैं ही सोच रहा हूँ बस...

आचार्य: तो सोच में ही प्यार कर लिया करो! जब तुम कल्पना ही कर रहे हो कि कोई तुमसे प्यार कर रहा है, तो फिर दूसरे पर आश्रित भी क्यों रहते हो अपनी कल्पना के लिए? वो कल्पना पूरे तरीके से मुक्त कल्पना कर दो। शत-प्रतिशत अब वो कल्पना ही रहे! कर लो कल्पना कि उसने आकर मुझसे प्यार कर लिया। क्योंकि वैसे भी वो दूसरा व्यक्ति तुम्हारे साथ जो कर रहा है, वो बस तुम्हारी कल्पना में ही प्यार है। क्या वास्तव में वो दूसरा व्यक्ति प्रेम कर रहा है तुमसे?

जब तुम कहते हो कि तुम्हें अच्छा लगता है कि कोई तुम्हें प्यार करे, मैं पूछ रहा हूँ, तुम्हें कैसे पता कि वो जो दूसरा व्यक्ति कर रहा है उसका नाम प्यार है, उसी को प्रेम कहते हैं? तुमने अपनी कल्पना चलाई है, तुमने कहा है, “इस-इस तरह के व्यवहार को, ऐसे-ऐसे आचरण को मैं प्रेम का नाम दूँगा। और मैं कुछ ऐसी युक्ति करूँगा, कुछ ऐसा जुगाड़ करूँगा कि दूसरा व्यक्ति इस खास तरह का आचरण करे मेरे साथ। और जब वो वैसा आचरण करेगा तो मैं कहूँगा देखो ये मुझसे प्यार करता है।”

ये सारा खेल तो तुम ही चला रहे हो न? तो ईमानदारी की बात यह है कि स्वीकार कर लो कि ये तुम्हारा ही चलाया हुआ खेल है, और बैठे-बैठे इसे चलाया करो। इस खेल में दूसरे की ज़रूरत ही नहीं है। आँख बंद करो और सोचो कि दुनिया में सब लोग आकर तुमसे प्यार कर रहे हैं! जो भी तुम्हारी प्यार की परिभाषा है; कोई मुस्कुरा रहा है, कोई तुम्हारे गले में बाँह डाल रहा है, कोई विवाह का प्रस्ताव रख रहा है, कोई कह रहा है कि, “आप मेरा सब धन-आदि ले लीजिए!” कोई आँसुओं से तुम्हारे चरण पखार रहा है। जो भी तुम्हारी प्रेम की परिभाषा होगी।

प्रेम क्या है? आचरण की बात है? तुम्हें कैसे पता कोई तुमसे प्यार करता है? बड़ा मूलभूत प्रश्न पूछ रहा हूँ, बताओ। कह तो देते हो कि तुम किसी से प्यार करते हो, कह भी देते हो कि कोई तुमसे प्यार करता है। तुम जानते कैसे हो कि कोई तुमसे प्यार करता है? पता कैसे चलता है, बताओ ज़रा? तुमने कुछ व्यवहारों की सूची बना रखी है, एक से लेकर दस तक, बीस तक, पचास तक। और तुम कहते हो, “इस तरह के व्यवहार का नाम है प्रेम!” और जैसे ही किसी ने उस तरह के व्यवहार को दर्शाया, तुम कह देते हो, “ये करता है मुझसे प्यार!”

अब मज़ेदार बात सुनो! ये जो तुम्हारी सूची है, ये उसके पास भी है। सार्वजनिक सूची है ये। ये पब्लिक पोस्ट है, ये सबको पता चल रही है। पूरी दुनिया जानती है कि तुम किस तरह के आचरण को प्यार का नाम दोगे। तो जो भी कोई साबित करना चाहता है कि वो तुमसे प्यार करता है, वो उस सूची में से कहता है, “मैं ये आठवाँ नंबर, बारहवाँ, और सोलहवाँ, ये इनके सामने आज प्रदर्शित करे देता हूँ, इनको तुरंत ये लगेगा कि मैं तो इनसे प्यार करता हूँ।”

जब यही खेल खेलना है, तो मैं कह रहा हूँ कि इसको तुम पूरा ही वर्चुअल (काल्पनिक) खेल लो। क्यों इसमें मिश्रण करते हो? अब क्या है, “कोई मेरी ओर मुस्कुराए, तो वो मुझसे प्यार करता है।” तो उसके लिए तुम क्या करोगे? पहले तुम उसके सामने जाकर दाँत दिखाओगे बार-बार, जब पाँच बार उसको दाँत दिखाओगे तो वो भी तुम्हें मुस्कुराएगा, अब तुम कहोगे, “प्यार! एक और मिल गया प्यार करने वाला।” तुम्हें पता नहीं है क्या कि तुम ही उसे अपनी परिभाषा के अनुरूप काम करने के लिए बाध्य कर रहे हो? ताकि तुम भीतर अपने टिक (सही का निशान) लगा सको कि मुझे एक और प्रेमी मिल गया।

प्र: मतलब इतना आसान भी नहीं...

आचार्य: हाँ तो ठीक है, मुश्किल है!

सूची में एक मुश्किल वाला भी प्यार होगा, कि जैसे एक बार नहीं मुस्कुराए, कम-से-कम छिहत्तर बार मुस्कुराए, इतना मुश्किल होना चाहिए। पर जो कुछ भी है, है तो सूचीबद्ध ही न?

प्र: हाँ।

आचार्य: है तो सूचीबद्ध ही। इसका नाम प्यार नहीं होता।

प्र: हाँ मतलब ये है कि सामने वाला क्या सोचता है मेरे बारे में।

आचार्य: वो भी तुम्हें पता है कि क्या सोचेगा तो प्रेम कहलाएगा।

प्र: हाँ।

आचार्य: तुम्हारे बारे में अगर कोई ये सोचता है कि तुम हैंडसम हो, और तुम्हें चुम्मी दे दी जाए, तो ये प्रेम है। और कोई सोचता है चाँटा मार दूँ जोर से, तो ये प्रेम नहीं है। ये तुम्हें पहले ही पता है। तो अब तुम ऐसा माहौल तैयार करोगे कि वो तुमको हैंडसम समझे। और ऐसा माहौल तैयार करोगे कि चाँटा न मारे। तो ये सब अपने ही अंदर तो कर रहे हो! तो अंदर ही करो न! बेचारे दूसरे को क्यों फँसाते हो इसमें? आँख बन्द करो, और कहो, "प्रेम हो गया!"

(श्रोतागण हँसते हैं)

(मुस्कुराते हुए) हो गया। आसान हो गया।

प्र: ठीक है।

(श्रोतागण हँसते हैं)

आचार्य: प्रेम क्या होता है? कैसे जानें किसी का आपसे प्रेम है? कहिए, क्योंकि ये बहुत-बहुत महत्वपूर्ण सवाल है। जीवन हमने अपना उन्हीं को दे रखा है जिनको हम समझते हैं कि हमसे प्यार करते हैं। आपको क्या पता कौन आपसे प्यार करता है, बोलिए?

प्र१: जो आपकी भलाई चाहता हो।

आचार्य: भलाई माने क्या?

प्र२: जो आपको आज़ादी दे।

प्र३: जो अपने से ज़्यादा आपके सुख का ध्यान रखे।

आचार्य: सुख? (एक श्रोता को संबोधित करते हुए) तुम्हारी ही माँ हैं। जैसे तुम सो रही हो, सुख वाला ही खेल है। सोने में सुख है! वैसे ही सुख में सुख है। सुख माने क्या? सुख माने खुशी!

प्र३: खुशी मतलब जैसे कि खुद की खुशी से ज़्यादा उसकी खुशी का ध्यान रखे।

आचार्य: कौन सी खुशी?

(नींबू पानी का ग्लास पकड़ते हुए जिस पर ‘रॉयल चैलेंज’ अंकित है) अब ये जो है, रॉयल चैलेंज का ग्लास है, ठीक है? अब ये मुझे तो पता नहीं, यहाँ बैठा है आपका सुपुत्र, अब ये इसमें रॉयल चैलेंज (शराब) ही भर दे, कहे, “आचार्य जी को बिलकुल एकदम तत्काल खुशी मिलेगी!” ये प्रेम कहलाएगा?

एक होता है कि नींबू पानी की ग्लास में भी शराब पिला दो, क्योंकि शराबी को खुशी मिले। शराबी को तो तुम नींबू पानी के ग्लास में भी जब शराब दोगे तब ही उसे खुशी मिलेगी न? इसको आप प्रेम का नाम दे रही हैं। कि ‘सुख’, कि दूसरे को ‘सुख’ देने का नाम प्रेम है। ये प्रेम की सबसे घातक परिभाषा है। और एक दूसरा आचरण होता है कि ये ग्लास भले ही शराब की हो, पर वो उसमें भर कर दे रहा है नींबू पानी।

आप बस ये इतनी सी बात अगर समझ लें तो आपका पूरा शिविर सार्थक हो गया। दूसरे को सुख देने का नाम प्रेम नहीं है, न दूसरे से सुख पाने का नाम प्रेम है। और प्रेम के मुद्दे पर हम जीवन का कितना समय, कितनी ऊर्जा, संसाधन सब व्यय करते हैं न? प्रेम का मतलब ये नहीं है: मैं तुम्हें खुश रखूँ, तुम मुझे खुश रखो। बिलकुल भी नहीं, बिलकुल भी नहीं! बिलकुल सतर्क हो जाइए जैसे ही कोई कहे कि ये खुशी का आदान-प्रदान प्रेम कहलाता है।

प्रेम मुक्ति है, खुशी नहीं। खुशी तो हमें बंधनों में ही मिलती है, नहीं तो हम बंधनों में पड़े ही क्यों होते? बंधन बुरे ही लग रहे होते, तो हमने बंधन इतने-इतने और ज़्यादा, और ज़्यादा प्रतिदिन-प्रतिपल इकट्ठा करे होते क्या? ज़रूर बंधनों में खुशी ही होगी। जो प्रेम का संबंध खुशी से जोड़ेंगे उनके लिए प्रेम एक और बंधन बन जाएगा। फिर वो ये सब बात करेंगे कि, “अरे! क्या बताऊँ, जीवन में बड़े बंधन हैं!” जब भी मैं पूछता हूँ कि कौन से बंधन हैं, तो पता चलता है वो वही हैं जिनसे आपका प्रेम है, या जिनसे आपने कभी प्रेम का नाता जोड़ा था, प्रेम प्रसंग बढ़ाया था। अब उनको कह रहे हो बंधन हैं। वो बंधन इसीलिए कह रहे हो क्योंकि प्रेम की तुम्हारी पूरी बुनियाद ही खुशी पर थी। जिसको देखा और खुशी छा गई, जिसको देखते ही मुस्कुराना शुरू कर दिया, वही कह दिया प्रेम है, यही प्रेम है।

जिससे देह का सुख मिल गया, जिससे मन का सुख मिल गया, धन का सुख मिल गया, उसी को कह दिया इससे प्रेम है। ऐसा ही है न प्रेम? कोई लंबी-चौड़ी इसमें मुझे परिभाषा या विस्तार देने की भी ज़रूरत नहीं है। यही है न प्रेम हमारा? जिसको देख कर लगा कि इससे किसी तरह का सुख मिल जाएगा, वही प्रेम है! उसी से कह दिया कि इससे तो मेरा प्रेम है। अब ये प्रेम बिलकुल गले में फाँसी की तरह अटकेगा।

जिससे प्रेम होता है उसे सुख नहीं दिया जाता। इसका आशय ये नहीं है कि उसको दुःख दिया जाता है। इसका आशय ये है कि जिससे प्रेम होता है उसके विषय में सुख-दुःख के आयाम में सोचा नहीं जाता। न ये सोचा जाता है कि इसको सुख दूँ, न ये सोचा जाता है कि इसको दुःख दूँ। उसके विषय में सुख-दुःख की बात का विचार ही नहीं किया जाता। उसके विषय में मन एक ही शुभ विचार से भरा रहता है। क्या? “इसको सच्चाई कैसे दूँ, इसको मुक्ति कैसे दूँ? इसे ऊँचे-से-ऊँचा, बेहतर-से-बेहतर कैसे होने दूँ? इसको आसमान कैसे दूँ?”

हाँ, जिसे आसमान देना चाहोगे, अक्सर पाओगे कि वो तुमको गरियाएगा। क्योंकि उसको चाहिए ज़मीन का एक टुकड़ा, तुम उसे देना चाहते हो आसमान। कोई बात नहीं! प्रेम में बड़ा धैर्य होता है, बड़ी सहनशीलता, प्रेम पी जाएगा वो गालियाँ भी देगा दूसरा तो। तो प्रेम में सुख दिया भले नहीं जाता, पर अक्सर दुःख झेला खूब जाता है। क्योंकि जिसको तुम आकाश दोगे, वो तुम्हें दुःख देगा। कोई बात नहीं, प्रेम है भई! प्रेम का मतलब ही यही है, पी जाएँगे ज़हर।

प्रेम अगर असली होगा, तो आवश्यक नहीं है कि आकर्षक लगे। बल्कि संभावना यही है कि उसमें आकर्षण की जगह विकर्षण होगा। हम बंधनों के पुजारी, कोई हमें देना चाहता है मुक्ति, ये बात हमें सुहाएगी क्यों? क्यों सुहाएगी? और दूर भागेंगे।

प्रेम हमसे सबसे ज़्यादा उन्होंने किया है जिनका हम नाम भी नहीं जानते। मुझे क्षमा करिएगा लेकिन आपके जीवन में वो सब लोग जिनको आप सोचते हैं कि आपके प्रेमीजन हैं, वो आपसे बहुत कम प्यार करते हैं। उनका-आपका सुख के आदान-प्रदान का, या दुःख के आदान-प्रदान का रिश्ता है। वो और आप सुख-दुःख बाँटते हैं, सच्चाई और मुक्ति नहीं। जिन्होंने आपके साथ सच्चाई बाँटी है, मुक्ति बाँटी है वो अधिकांश वो लोग हैं जिनका आप नाम भी नहीं जानते। उन्होंने आपसे प्यार किया है, सच्चा प्यार किया है।

पर उनका प्यार वैसा नहीं था कि जिससे प्यार करो, उसी के पास जाकर रहो, उसी के बिस्तर पर सोओ, उसी के साथ खाना खाओ। उनको तो हो सकता है आपने देखा भी न हो। वो आपसे बहुत दूर के हैं, दूसरे शहरों के, दूसरे देशों के, दूसरी शताब्दियों के। पर उन्होंने प्यार किया है, उन्होंने सच्चा प्यार किया है। प्रेम बस वही जानते थे।

लेकिन हम तो किसी को अपना प्रेमी मानते ही नहीं जब तक वो हमारे साथ शॉपिंग (खरीदारी) न करे। अब जीसस तो आएँगे नहीं आपके साथ शॉपिंग करने। तो आपकी नज़रों में उनकी कोई अहमियत नहीं, जबकि प्यार आपसे उन्होंने ही करा है। और जिनके साथ आप शॉपिंग करते हैं, मैं फिर क्षमा माँगते हुए कहूँगा, उनका आपसे कोई प्यार इत्यादि नहीं है। शॉपिंग बन्द कर दीजिए, फिर देखिए क्या होता है। उसी समय, जब शॉपिंग चल रही हो, खट से रोकिए। या इतना ही कह दीजिए, “अरे! क्रेडिट कार्ड ब्लॉक्ड (बंद) है आज शायद, पता नहीं!” देखिए क्या होता है।

लेकिन फिर वही बात, जिन्होंने आपसे वास्तव में प्यार करा है, उन्होंने निष्काम प्रेम करा है। वो यह उम्मीद भी नहीं रखते थे कि आप अपना अनुग्रह व्यक्त करेंगे। प्यार होता ही ऐसा है, अगर असली है तो वो बदले में कुछ नहीं माँगता। वो बदले में यही माँगता है, अधिक-से-अधिक, कि मैं मुक्ति देना चाहता हूँ तुझे, तू विरोध मत कर मेरा। उसकी माँग होती भी है तो बस इतनी।

हम वो हैं जो परेशान हैं। तो प्रेम का अर्थ है शांति की तरफ आकर्षण। परेशान आदमी को किसकी चाहत होगी? शांति की। तो प्रेम माने शांति की चाहत। आदमी की, औरत की चाहत नहीं, धन-दौलत की चाहत नहीं, यश-प्रतिष्ठा की चाहत नहीं, शांति की चाहत। हम परेशान हैं, तो शांति की चाहत। हम बंधन में हैं तो मुक्ति की चाहत, हम भ्रम में हैं तो सच की चाहत। यही प्रेम है।

प्रेम चाहत ही है, पर किसकी चाहत ये तो समझिए! हम देह को चाहने लग जाते हैं, हम न जाने क्या-क्या चाहने लग जाते हैं। जबकि जो चीज़ चाहने लायक है वो है शांति, सच्चाई, मुक्ति। उसकी चाहत हो तो समझियेगा प्रेम है, बाकी सब चाहतें व्यर्थ हैं, उनका नाम प्रेम नहीं। खासतौर पर सुख की चाहत का तो नाम प्रेम बिलकुल नहीं है। आप किसी से सुख चाहें तो समझ लीजिएगा कि प्रेम तो नहीं है। कोई दूसरा हो जो आपके माध्यम से सुख चाहे, कि, “गिव मी प्लैज़र, गिव मी हैप्पीनेस!” (मुझे सुख दो, मुझे खुशी दो!) तो समझ लीजिएगा कि प्रेम तो नहीं है ये।

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