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पूर्व संध्या पर
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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मैं बड़ी लगन से

जतन कर रहा हूँ

खूब छुप-छुप के,

इसीलिए अब

कविता काफी कम लिखता हूँ ।

मैं पैने कर रहा हूँ

चुपके से

अपने हथियार

तुम्हारे ही बीच रह कर

रंग-बिरंगा वेश पहन कर

हूँ तुम में से एक

(अभी)

सतर्क हूँ मैं

खुद को भी नहीं जानने देता

रंगों के पीछे क्या है

बैल की तरह आ भिड़ने

की साध तो बहुत है

पर, अब छिपाऊँ क्या

थोड़ा सा ….डरता हूँ

यहीं पर जियूँगा

यहीं पर हँसूंगा

अपने हथियार खुरचूँगा

जब भी

साँस लूँगा

या बत्तीसी दिखाऊँगा ।

या तो तुम मुझे बेनकाब कर दो

या फिर

अपने चोले में छिपे

निरंतर पैने होते खंजरों से

मैं खुद ही मारा जाऊँगा ।

~ प्रशान्त (२८.०३.००)

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