Acharya Prashant is dedicated to building a brighter future for you
Articles
पिछले जन्म से क्या अर्थ है? || (2015)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
8 मिनट
98 बार पढ़ा गया

प्रश्नकर्ता: सर, कहते हैं पुराने जन्म में जो हमने कर्म किया है वो अब हम भुगतेंगे इस जन्म में; ये एक तरह से मूर्खता नहीं है? अगर अपने पुराने जन्म में ग़लत काम किए हैं, अगर पुराना जन्म होता है तो वो सज़ा हमें उसी समय मिलना चाहिए। अब ये थोड़े ही न कि पिछले जन्म में जो मैंने किया उसकी सज़ा आज मिल रहा है। अगर मैं कोई ग़लत काम आज कर रहा हूँ अब सज़ा मुझे अभी मिल रही है तो ये सही है, पर ये?

आचार्य प्रशांत: सज़ा की परिभाषा अलग-अलग होती है न बेटा। तुम्हें एच.अई.वी का इंजेक्शन लगा दिया जाए तुम अच्छे से जानते हो उसको बनने में सालों लग जाते हैं। एच.अई.वी वायरस तुम्हारे शरीर में घूमता रहे, घूमता रहे लेकिन तुम्हें एड्स कई सालों बाद होगा। वो तब होगा जब तुमको टी.बी हो जाएगी, निमोनिया हो जाएगा तो उसको एड्स कहते हैं कि अब तुम्हारी प्रतिरोध क्षमता इतनी गिर गयी है कि तुम्हें और कई बीमारीयाँ लग गयी। उसमें समय लगता है, अब तुम कब कहोगे कि सज़ा मिली, ये तुम्हारी बुद्धि पर है। अगर तुम्हारी नज़र सूक्ष्म है तो तुम कह दोगे कि सज़ा तो तभी मिल गई थी जिस दिन इंजेक्शन लगा था पर दुनिया में ज़्यादातर लोगों को ये समझ में नहीं आता कि सज़ा मिल गई। उनको सज़ा का पता तभी चलता है जब वो बुरी तरह भुगतते हैं तो उन्हें दस साल बाद पता चलता है। ये कर्मफल का सिद्धांत है। तो तुमने जो बात कही वो ठीक है कि फल तो तत्काल मिलता है, तुरंत बिलकुल तुरंत मिलता है लेकिन तुरंत मिलता है ये बात उसी को समझ में आएगी जो समझ सकता हो।

अब फल मिल किसको रहा है? किसको मिल रहा है फल?

जो मूर्ख है उसी को तो फल मिल रहा है न, जो ज्ञानी है वो तो कर्मों का कोई अवशेष छोड़ता नहीं, 'मुझे आगे फल मिले', वो तो अपने कर्म पूर्ण रखता है। तो फल मिल किसको रहा है? जो मूर्ख है। और जो मूर्ख है क्या वो इस बात को समझ पाएगा कि 'मुझे तुरंत फल मिल गया है'? तो इसीलिए फल का एहसास हमेशा भविष्य में होता है, बहुत आगे होता है।

बात समझ आ रही है? इसीलिए कहा गया है कि कर्मफल आगे मिलेगा। मिलता तुरंत है पर पता बाद में चलता है। अब रही अगले पिछले जन्म की बात तो ऐसे समझ लो कि तुम पैदा होते हो न तो अपने साथ बहुत कुछ ले करके पैदा होते हो। बस उस पर विचार करना कि वो सब कहाँ से ले कर आए। वो सब कहाँ से लेकर आए? बच्चे पैदा होते हैं, दो साल की उम्र में मधुमेह भुगत रहे हैं। उन्होंने ऐसा कुछ करा नहीं पिछले दो साल में, पर भुगत रहे हैं। समझ रहे हो बात को?

और अगर तुम इसको ज़रा वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखो तो उसके पूरे ढाँचे में, उसकी रचना में, उसके शरीर में, उसके डी.एन.ए में ही कुछ ऐसा है जो गड़बड़ है। और वो ये लेकर आ रहा है आप इस पर ये नहीं कह सकते कि, "भाई अभी तुमने करा तो भुगत रहे हो", वो लेकर आ रहा है। और कहाँ से लेकर आ रहा है? माँ-बाप से लेकर आ रहा है। और माँ बाप कहाँ से लेकर आ रहे हैं? और पहले से। पूरी मानवता के जो सम्मिलित कर्म हैं वो बच्चे तक पहुँच रहे हैं। तुम्हारे पास वो ही नहीं है जो तुमने अभी पैदा होने के बाद किया है, आदि काल से इंसान ने जो भी कुछ किया है तुम वो भी भुगत रहे हो; उसको भूलना नहीं। यहाँ पर कुछ भी अकेलेपन में नहीं चल रहा है। तुम्हारे बच्चे पैदा होंगे उनको तुम दिल्ली में ये जो रेसिदुअल सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर होता है प्रदूषण का सूचक, उनको तुम बहुत सारा देकर जाओगे। उन्होंने क्या किया है? तुम्हारे कर्म हैं जिसको भुगतेगा कोई और। कर्म किसका है? तुम्हारा। भुगतेगा कोई और; जो भुगत रहा है वो किसी और का कर्म क्यों भुगते? तो कहने वालों ने इसको इस तरीके से कहा कि वो जिसका कर्म भुगत रहा है वो उसका पिछला जन्म था। कर्म किसका है? क्या नाम है बेटा तुम्हारा?

प्र: जय।

आचार्य: कर्म किसका है? जय का। भुगत कौन रहा है? कुछ नाम दे दो, पप्पू। अब पप्पू जय का कर्म क्यों भुगते? पप्पू जय का कर्म नहीं भुगतता तो कहने वालों ने ऐसे कहा कि जय, पप्पू का पिछला जन्म था। तो अपने ही पिछले जन्म में उसने जो किया, उसको अब वो इस जन्म में भुगत रहा है।

प्र: तो बच्चों को जो समस्या होती है वो पूर्वजों के डी.एन.ए के कारण है, लोगों को जो समस्या होती है वो आगे आने वाले पीढ़ीयो को हो जाती है।

आचार्य: हाँ, तो बस अगले-पिछले जन्म का अर्थ इतना ही है कि हम अकेले नहीं हैं न, हमारा जो कुछ भी है वो एक बहाव रहा है। एक अनंत बहाव जो पीछे से आ रहा है और पीछे से बहुत कुछ है जो हमें मिल रहा है, बस इसी को कर्मफल समझ लो, इसी को पिछले जन्म की बात समझ लो और कुछ नहीं।

प्र२: मैं तब तक भुगतता रहूँगा जब तक मुझे समझ नहीं आएगा कि मरने के बाद आगे कोई और भुगतेगा। आपने कहा उसको पिछला जन्म मानो पर वो जन्म पूरी तरह किसी एक आदमी का तो नहीं है; एक संग्रह है कई जन्मों का?

आचार्य: बिलकुल।

प्र२: अभी थोड़े दिनों पहले हम गीता पढ़ रहे थे तो उसमें एक था कि, "जो मुझे जैसे साधता है मैं वैसे ही सधूँगा।" तो उसमें था कि, "तुम मुझे पितृों के रूप में साधोगे तो में वैसे सधूँगा, ऐसे करोगे तो वैसे करूँगा। पर अगर तुम मेरे को साधोगे तो तुम्हारा पुनर्जन्म नहीं होगा।"

आचार्य: क्योंकि मुझे साधने का मतलब है कि अब तुम इस पूरे बहाव से बाहर कुछ है इस बात को समझ गए हो। अब तुम इस बहाव से बाहर हो गए हो। तुमने ये मानना ही बंद कर दिया है कि मैं अपने-बाप का बेटा हूँ, तुमने ये मानना ही बंद कर दिया है कि मैं मात्र शरीर हूँ जो मुझे मेरे पूर्वजों से मिल रहा है। तुम बिलकुल समझ गए हो कि तुम कृष्ण रूप हो। मैं वो हूँ ही नहीं जिसे फल मिल सकता है।

और बात सिर्फ़ बोलने की नहीं है। बोल तो कोई भी सकता है, बात तो तब है न जब देखा जाए कि इस कष्ट के मध्य भी वो व्यक्ति ज़िंदगी जी कैसी रहा है, वही प्रमाण है। बयानबाजी तो कोई भी कर सकता है, प्रमाण तो यही है कि इस सब के बीच भी तुम कैसे हो। क्योंकि शरीर को तो दर्द हो रहा है भाई, देखिए आप इनकार नहीं कर पाएँगे। और रमण का शरीर हो या किसी चोर डाकू का, दर्द तो बराबरी का ही होता है। दो आँख, दो कान सबके होते हैं, खाना सबको चाहिए। प्रमाण यही है कि दर्द आपके साथ क्या कर पाता है, दर्द आप पर कितना हावी हो पाता है, आप दर्द के साथ कैसे जीते हैं।

पुराने कर्म क्या थे उनका फल क्या आ रहा है ये कोई विशेष विचार करने की बात नहीं है क्योंकि वो तो तयशुदा चीज़ है न। वो तो जो कुछ भी संचित होगा वो आपके सामने आएगा। जो चीज़ तयशुदा है उसके बारे में सोच-सोच कर कुछ बदल जाना है? हाँ एक चीज़ है जिस पर ज़रूर ध्यान होना चाहिए और पुराने कर्म और पुराने फल कि चिंता में उसको भूल जाते हैं। जब कोई इंसान ये कहता है न कि, "ये सब जो हो रहा है ये मुझे पुराना कर्म फल मिल रहा है", तो उससे पूछा जाना चाहिए कि, "क्या तू इस बारे में सजग है कि ठीक अभी तू कौनसा नया फल पैदा कर रहा है?" पुराने कर्म का फल मिला ये तो तूने बिलकुल, बहुत चतुराई से बोल दिया कि ये सब तो पुराने कर्मों का फल है। पर ये तुझे दिखाई दे रहा है कि अभी-अभी तूने नया फल क्या पैदा कर दिया और इसको अब कब भुगतेगा? पुराने की चिंता छोड़िए, वो तो अब पक्का है कि आ रहा है, आना है। परवाह करनी है तो इस पल की करिए कि, "अभी मैं नया क्या पैदा किए दे रहा हूँ? क्या मेरे कर्म में पूर्णता है?"

अभी के कर्म में पूर्णता हो तो आगे के लिए तो कुछ छूटता ही नहीं और पीछे वाला भी साफ़ होने लग जाता है। बड़ी चमत्कारिक बात है, अभी में अगर ठोस पूर्णता है तो इतना ही नहीं कि उससे आगे के लिए कुछ नहीं छूटता, जो पीछे वाला है उसका असर भी कम होने लग जाता है।

क्या आपको आचार्य प्रशांत की शिक्षाओं से लाभ हुआ है?
आपके योगदान से ही यह मिशन आगे बढ़ेगा।
योगदान दें
सभी लेख देखें