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पैसे और रोज़गार को लेकर कुछ सवाल
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम! जी मेरा नाम सूरज है और मैं उत्तरांचल का रहने वाला हूँ। अभी मैं चार-पाँच साल से एक जॉब कर रहा हूँ। जो ब्लूटोकाई नाम की कंपनी है उसमें कॉफ़ी का काम होता है। उसमें सर्विंग का काम, होटल उद्योग ये सभी है। तो इसकेे साथ-साथ मैंने लॉकडाउन में कुछ काम शुरु किया है, मोमोज बनाने का और इसके साथ और भी प्रकार है। जैसे कि सोया चाप हो गई, ये सब चीज़ें भी हो गई। पर इसमें बहुत ज़्यादा आय नहीं हो पा रही है। तो लॉकडाउन में मैंने ये शुरू इसलिए किया था क्योंकि जॉब में उन्होंने मेरे को ब्रेक दे दिया था। उन्होंने कहा था कि अभी परिस्थिति अच्छी नहीं है तो काफ़ी लोगों को उन्होंने निकाल दिया था। तो अब फ़िर उन्होंने दोबारा बुला दिया तो मैं दोबारा जुड़ गया हूँ। पहले मैं सिनेमा में जॉब करता था, फ़िर पिज्जा हट में किया, फ़िर मैंने स्टारबक्स में किया, फ़िर इसके बाद ब्लूटोकाई में किया इस तरीके जॉब चलता ही जा रहा है। मगर अभी कुछ साफ़ नहीं हो पाया कि क्या करूँ, क्या ना करूँ? बेचैनी सी रहती है, क्या काम करूँ, क्या ना करूँ?

आचार्य प्रशांत: खर्चें कैसे हैं?

प्र: खर्चे तो सर सामान्य ही हैं। मतलब वहाँ पर जाना है…

आचार्य: तुम्हारे अपने खर्चें कैसे हैं?

प्र: अपने खर्चे मैं सर क्या बताऊँ। मतलब मेरे पास तो वैसे कुछ है नहीं ख़र्चा तो।

आचार्य: शादी-शुदा हो?

प्र: जी नहीं।

आचार्य: और कोई क़र्ज़ वगैराह ऐसा कुछ?

प्र: नहीं-नहीं कुछ भी नहीं है सर।

आचार्य: तो फिर क्या डर है? अपना काम कर रहे हो करो।

प्र: सर वही बात बता रहा हूँ। सब तो काम कर रहा हूँ कोई दिक्कत नहीं है। काम में कुछ अच्छा नहीं लग रहा है। बेचैनी सी लगती है। जब से आपको सुन रहा हूँ और ज़्यादा बेचैनी लगती है।

आचार्य: ऊँचे-से-ऊँचा आख़िरी उच्चतम आदर्श काम एक झटके में नहीं मिल जाएगा। जीवन चलते रहने का नाम है। जिस नौकरी में हो उस से बेहतर अगर तुमको स्वरोजगार लग रहा है तो करो न। फ़िर उससे आगे निकल जाना। कम-से-कम अपना काम कैसे करा जाता है यह सीखने की शुरुआत तो करो। अभी अगर तुम्हारे ऊपर कोई ज़िम्मेदारी या कर्जे वगैराह नहीं है तो यह सबसे अच्छा मौका है न। अधिक-से-अधिक क्या होगा? कुछ गलतियाँ करोगे, तुम्हारा अपना धंधा है वो चलेगा नहीं।

प्र: नहीं, काम शुरू कर रखा है। मगर वो दुकान लेकर नहीं कर रखा है, रोड़ पर ही है।

आचार्य: जहाँ भी कर रहे हो, जैसे भी कर रहे हो उसमें अधिक-से-अधिक क्या बुरा हो जाएगा?

प्र: नहीं, उसमें कुछ बुरा होने लायक तो नहीं है।

आचार्य: तो उसमें आज़माने में, प्रयोग करने में हिचक क्या है?

प्र: और वहाँ बाज़ार भी इतनी अच्छी नहीं है। वहाँ दस-दस रुपए का सामान ज़्यादा बेचना पड़ता है।

आचार्य: तो वो काम मत करो फ़िर। ऐसा व्यापार क्यों करना जो घाटे का हो।

प्र: नहीं बहुत ज़्यादा घाटा भी नहीं होता है। मतलब उसमें वही है कि ₹500-₹600, ₹700-₹800 बच जाएँ।

आचार्य: नहीं, ऐसे नहीं करते हैं। ये नहीं होता, वो नहीं होता। व्यापारी आँकड़ों में बात करता है। ऐसे नहीं करता थोड़ा ज़्यादा है थोड़ा कम है। शब्दों से नहीं चलता आँकड़ों से चलता है। ले देकर तुम्हें मुनाफा गिनना होगा। मुनाफा बोला नहीं जाता। क्या किया जाता है? गिना जाता है। कोई तुमसे पूछेगा कितना कमा...वो ये... ऐसे थोड़े ही बात करोगे। टैक्स (कर) देने का जब समय आएगा तब ऐसे कहोगे कि, "हाँ थोड़ा बहुत कमाया है थोड़ा बहुत टैक्स दे दूँगा।" वहाँ पर आख़िरी रुपए तक गिनना पड़ेगा न कि कितना कमाया है फ़िर उसमें से इतना हमें टैक्स देना है। तो अगर तुम्हारा मन जा रहा है अपना कुछ करने की ओर, तो आज़मा लो न इन्हीं दिनों। क्या समस्या हो गई?

प्र: पर सर समझ में ही नहीं आता कि क्या करूँ?

आचार्य: कुछ समझ नहीं आता बैठे-बैठे; कर के समझ आता है। बैठे-बैठे किसको क्या समझ में आएगा? ज़मीन पर उतरोगे, हाथ गंदे करो, थोड़ा मुनाफा कमाओ, थोड़ी ठोकरे खाओ तो चीज़ें समझ में आएँगी न।

प्र: अब जैसे कि मैंने काम शुरू किया उसमें घर वाले कह रहे है, पापा कह रहे हैं कि उसमें चिकन सूप रख लो या चिकन मोमोज रख लो तो ज़्यादा अच्छा चलेगा। मैंने कहा यह तो मेरे को रखना ही नहीं है चाहे कुछ भी हो जाए।

आचार्य: तो मत रखो। देखो, सही काम करने का मतलब बुद्धू बनना नहीं होता। तुम अगर ये मानसिकता लेकर चलोगे या आप में से कोई और लोग भी वो कहते हैं न कि “गुड गाइस फिनिश लास्ट” कि आप अच्छे आदमी हो तो आप ज़िंदगी में सबसे पीछे रहोगे और मार खाओगे और लात खाओगे। ये अगर पहले से सोचकर चलोगे तो फ़िर तो तुम सच्चाई को हराने का काम कर रहे हो। तुमने अगर यह कह दिया कि सच्चा आदमी है जो उसको तो ज़िंदगी में हार ही मिलनी है तो तुमने तो सच को ही हरवा दिया। ऐसे नहीं मानते। सच के साथ भी रहना है और सफल होकर भी दिखाना है। नहीं तो हम क्या कह रहे हैं कि जो सच्चा जीवन जीने लग गया उसकी दुर्दशा ही होगी। हम ऐसा कह रहे हैं क्या?

और अगर सच्चा जीवन जीने वाले की दुर्दशा ही होनी है तो फ़िर सच की ओर कोई क्यों आए? फ़िर तो झूठ और फरेब से ही काम चलने दो न। तुम वैष्णव मोमोज क्यों नहीं बेच सकते? ये जो तुम ढाबे पर आते हो वो इतना बड़ा क्यों प्रचारित करते हैं; शुद्ध शाकाहारी वैष्णव ढाबा। क्यों करते हैं? तुम्हें भी व्यापार ही करना है न? क्या वो व्यापार में होने के बावजूद कोई ऐसी चीज़ लिखेंगे जो व्यापार गिराए? निश्चित रूप से ये बोल कर के कि उनका ढाबा शुद्ध शाकाहारी है उनको व्यापार में भी लाभ ही हो रहा है। क्योंकि बहुत लोग ऐसे होते हैं जो ऐसी जगह पर नहीं खाना चाहेंगे जहाँ बगल में हड्डियाँ तोड़ी जा रही हो। आप इस मेज़ पर बैठ कर खा रहे हो और बगल की मेज़ पर चिकन चल रहा है, बहुत लोग हैं जो नहीं खाना चाहेंगे। तो इस बात को तुम अपना एक विक्रय केन्द्र क्यों नहीं बना सकते?

फ़िर बोल रहा हूँ ऐसे हम कैसे करेंगे जहाँ जो अधर्मी हैं वो तो पूरे शातिर हैं और जिन्हें धर्म पर चलना है वो भोंदू हैं। ऐसे कैसे चलेगा? कृष्ण जैसा होना पड़ेगा न। कि धर्म भी समझ में आता है, धर्म परायण भी हैं, गीता भी है और युद्ध नीति भी जानते हैं। अर्जुन का अहंकार तोड़ना भी जानते हैं और दुर्योधन की जांघ तोड़ना भी। और अर्जुन का अहंकार तोड़ने के लिए गीता है तो गीता सही। और दुर्योधन की जांघ तोड़ने के लिए अगर अनीति करनी पड़ी तो अनीति भी सही। नहीं तो युधिष्ठिर ने तो सब मामला तबाह कर ही दिया था। जीता-जिताया युद्ध दुर्योधन के हाथ पर रख दिया था। पता है न क्या बोल दिया था दुर्योधन से? वो छुपा हुआ था तालाब में तो उस से बोलते हैं कि, "अच्छा ठीक है तुम चुन लो हम पाँचों में से तुम्हें किस से युद्ध करना है। और अगर हम पाँचों में से तुमने किसी एक को भी हरा दिया तो सिंहासन तुम्हारा है।" कृष्ण ने माथा पीट लिया। बोले, "सोच समझकर तो बोला करिए। क्या वचन दे दिया आपने?" युधिष्ठिर बोले, "वो तो हमारी आदत ही ऐसी है। अब ये दुर्योधन की खुद्दारी थी कि वह बोला कि तुम पाँचों इस लायक ही नहीं हो कि तुम से युद्ध करूँ। करूँगा तो मैं उससे जो मेरी ही टक्कर का है। मैं भीम से करूँगा।" वो ये भी बोल सकता था कि मैं युधिष्ठिर से करूँगा या सहदेव से करूँगा, वहीं पर खेल खत्म हो गया होता। लेकिन उसके बाद भी भीम पर भारी पड़ रहा था। तो फ़िर कृष्ण ने ये नहीं सोचा कि नीति क्या कहती है और गदा युद्ध के नियम क्या हैं। उन्होंने कहा कि अगर सब कुछ नियमानुसार ही हुआ तो आज ये भीम को तोड़ देगा। तो उसको इशारा करा कि, "मारो नीचे मारो कोई बात नहीं मार दो!" ऐसा धार्मिक आदमी चाहिए आज। होता उल्टा है, मैं जितने भी कपटी लोगों से मिलता हूँ उनकी धूर्तता की कोई सीमा नहीं। उनका दिमाग चल रहा है। वो महत्वकांक्षी हैं, वो कुछ भी करने को तैयार हैं। उनमें उर्जा पूरी है। वो दुनिया पर छा जाने के लिए हौसला रख रहे है। उनका आत्मविश्वास देखो। और मैं जितने भी तथाकथित सच्चे लोगों से मिल रहा हूँ वह ऐसे हैं; "हम तो जी राम जी के भक्त हैं, हम तो कुछ नहीं करते, हम तो भजन करते हैं। हम डर जाते हैं। आचार्य जी, क्या करें? आचार्य जी, गोद में बैठा लो।" ये क्या चल रहा है? ऐसे काम चलेगा?

तुम ऐसे समय पर पैदा हुए हो जो इतिहास का सबसे भयानक संक्रमण काल है। संक्रमण से मेरा मतलब कोरोना नहीं है। संक्रमण काल मतलब इस समय आदर्शों का, धर्म का जो संकुचन है जो त्रासदी है वैसी कभी नहीं देखी गई। और आज के समय में अगर तुम गोलू बनकर बैठ जाओगे, भोंदू बनकर बैठ जाओगे तो फ़िर तो अधर्म ने मैदान मार ही रखा है। वो लोग तो जीते ही हुए हैं। नहीं जीते हुए हैं? सारी सत्ता उनके पास, ताकत उनके पास, पैसा उनके पास वो तो छाए ही हुए हैं। संगठित वो हैं, उनको कैसे हरा पाएँगे फ़िर हम? बुद्धि कहाँ है, हौसला कहाँ है? या सारा बुद्धि और हौसला हमने पापियों के ही हिस्से छोड़ दिया है? पापा ने कह दिया चिकन सूप बेचो, तुम शुरू कर दो मुर्गे मारना।

प्र: मैंने तो मना ही कर रखा है कि मैं नहीं रखूँगा।

आचार्य: अरे मना ही कर रखा है तो ये मुद्दा ही क्यों है आज की चर्चा में?

प्र: यही कि वो प्रेशर दे रहे है।

आचार्य: वो प्रेशर कैसे दे रहे हैं तुम्हें; तुम गद्दे हो?

प्र: नहीं, वो भी आ जाते हैं उधर काउंटर पर सामान वगैरह देखने के लिए, इस तरीके से...

आचार्य: क्यों आ जाते हैं? तुम्हारी दुकान है।

प्र: सर पापा को तो मना नहीं कर सकते।

आचार्य: क्यों नहीं मना कर सकते? दुर्योधन तो भाई था भीम का। वो जांघ तोड़ सकता है, तुम पापा को नहीं मना कर सकते? ये क्या है? माया माँ की शक्ल लेकर आ सकती और पाप पापा की शक्ल लेकर आ सकता है। तो उन से लड़ेंगे नहीं हम? बोलो। मैं नहीं कह रहा हूँ सब माएँ माया होती हैं और सब पापा पापी होते हैं। लेकिन अगर माँ माया बन गई हो और पापा पाप सिखा रहे हो तो उनसे लड़ेंगे कि नहीं लड़ेंगे?

प्र: लड़ेंगे।

आचार्य: फ़िर जवानी कहाँ है तुम्हारी?

प्र: सर, तभी तो साहस दिखाया है मैंने।

आचार्य: ये क्या साहस है? तुम तो ऐसा लग रहा है साहस माँग रहे हो।

अध्यात्म में कमज़ोरी के लिए कोई जगह नहीं होती है। ज़िंदगी में ही कमज़ोरी के लिए कोई जगह नहीं होती है। गुनाह है कमज़ोरी। ये लुचूर-पुचूर, ऐसे कैसे जीयोगे?

प्र: और सर जहाँ मैं काम करता हूँ वहाँ ये सब सारे सैंडविच परोसे जाते हैं तो फ़िर ये नॉन वेज (माँसाहार) भी सर्व होता है, वेज (शाकाहार) भी सर्व होता है।

आचार्य: तो इसी बात को प्रेरणा बना कर के कुछ और शुरू करो न। देखो खुद को अभिव्यक्ति देने का एक अच्छा तरीका होता है स्व-रोजगार। स्वरोजगार में रोटी भर ही नहीं कमाते हो अपने भीतर की सृजनात्मकता को एक आकार भी देते हो। उम्र तुम्हारे साथ है, ज़िम्मेदारीयाँ तुम पर नहीं हैं, कोई क़र्ज़ तुम पर नहीं है। और ऐसा भी नहीं है कि अभी तुम नौकरी कर रहे हो वह बहुत तुम्हारे लिए बड़ी है या ऊँची है या बहुत कमा रहे हो। तो फ़िर तुम्हारे सामने कोई बाधा ही नहीं न।

प्र: सर अगर जो मेरे को काम आता है कॉफ़ी का, जिस कॉफी उद्योग से मैं हूँ उसका काम खोलने के लिए तो कम से कम 8 से 10 लाख या उससे ज़्यादा ही चाहिए होंगे।

आचार्य: देखो सस्ते में कैसे हो सकता है?

प्र: और जिस क्षेत्र में जैसे मैं दुकान भी लूँगा या रेस्टोरेंट लूँगा तो उसका किराया कम-से-कम पचास-हज़ार या एक-लाख तो होगा ही।

आचार्य: ठीक है, मत करो। यही सुनना चाहते हो तो मत करो। कोई भी काम आसान तो होता नहीं। तुम जिसके सामने अपनी मजबूरियाँ गिना रहे हो अगर उसने अपनी मजबूरियाँ गिनी होती तो तुम उसके सामने नहीं बैठे होते। तुम तो फ़िर भी कोई ऐसा काम करने जा रहे हो जो 'काम' कहलाता है। जो मैंने काम करा है वो तो काम कहलाता ही नहीं है। तुम तो फ़िर भी एक उद्योग के हिस्से बनने जा रहे हो। अब मैं ही अगर ये काम करने के विरोध में तर्क ढूँढने लग जाता तो मुझे एक नहीं सौ तर्क़ मिलते। मजबूरियों का कोई अंत नहीं होता। और मजबूरियाँ गिनाने वाले को समझाया नहीं जा सकता।

प्र२: प्रणाम आचार्य जी, आचार्य जी आपने अभी ऑस्टेरिटी (आत्मसंयम) के बारे में कहा था कि एक साधक को कम खर्चना चाहिए, कम पैसों में अपना गुज़ारा करना चाहिए। कोई ऐसा अपने मेहनत से कमाता हो, किसी पर निर्भर न हो। फ़िर भी किसी के पुश्तैनी किसी के दादा, सामान्य हरियाणा में होता है कोई चालीस-पचास क़िले छोड़ कर चला गया तो उसका अधिकार जो हस्तान्तरित होता है उत्तराधिकार में, तो वो क्या अपना अधिकार भी ऐसे छोड़ दें?

आचार्य: तुम्हें एक संसाधन मिला है तुम उसका किस लिए इस्तेमाल करोगे? अभी थोड़ी देर पहले हम कह रहे थे कि जिसको जो कुछ भी मिला है उसी का इस्तेमाल करना है उसे अपनी आज़ादी के लिए, ऊँचा उठने के लिए। तो तुम्हें अगर पैतृक विरासत मिल गई है तो उसका सही इस्तेमाल करना सीखो न बस। कुछ छोड़ना क्या है? छोड़ोगे तो क्या करोगे, वो भाप बन जाएगी, किसी और ग्रह पर चली जाएगी? नहीं। छोड़ने का यही मतलब हुआ न तुमने किसी और को दे दी। अगर किसी और को ही देना उसका सर्वश्रेष्ठ उपयोग है तो दे दो किसी और को। लेकिन आमतौर पर जिसको दोगे उसको भी अगर कोई चीज़ मुफ़्त की मिल गई तो ऐसा कम ही होगा कि वो उसका समुचित उपयोग करे। तो जो चीज़ तुम्हारे हाथ में है उसका सही इस्तेमाल करना जानो। और सही का मतलब तो तुम जानते ही हो क्या होता है।

प्र: नहीं मतलब वही मैं कह रहा हूँ कि अधिकार का लाभ लेना चाहिए। पर कहीं कहते हे न कि मैंने तो अपने बाप-दादा का सब त्याग दिया। अपने दम पर जो किया वो किया।

आचार्य: अगर किन्हीं शर्तों पर मिल रहा हो और वो शर्तें बंधन में डालती हों, बेशक त्याग दो।

प्र: नहीं, शर्त तो नहीं, पर अधिकार तो है...

आचार्य: अगर मिल रहा है तो त्यागने से कहीं बेहतर है उसका बेहतर इस्तेमाल करना। लेकिन यह कह कर के मैं अनुशंसा नहीं कर रहा हूँ कि आप पैतृक संपत्ति को ले लें फ़िर उसका अंधाधुंध उपभोग करें। वो मैं नहीं कह रहा हूँ, ठीक है? मैं सिर्फ़ यही कह रहा हूँ कि अगर आपको मिल ही रही है पैतृक संपत्ति तो उसको आप एक प्रसाद की तरह, आशीर्वाद की तरह जानें और फ़िर उसका बिलकुल सही इस्तेमाल करें। यह याद रखते हुए कि मुझे जो चीज़ मिली है मैंने वो अर्जित नहीं करी है। एक उपहार है और मेरी ज़िम्मेदारी यह है कि मैं इसको व्यर्थ न जाने दूँ।

प्र: और आचार्य जी आजकल कुछ पश्चिमी अद्वैत दार्शनिक हैं। मतलब उनकी बात एकदम उपनिषदिक है। वो कहते हैं “सब कुछ सेल्फ है, सब कुछ सेल्फ से प्रकट होता है, तुम सिर्फ़ शुद्ध जागरुक चेतना हो”। पर वो जब ये बात कह रहे होते हैं उनके मुँह में हवाईयन सिगार होता है। और हर महीने उनकी गर्लफ्रेंड बदल जाती है। और अपने चार्टेड प्लेन से घूमते हैं। और सिक्स-पैक-एब्स पूरा अपना...

आचार्य: देखो हवाईयन सिगार या सिक्स-पैक-एब्स में पता नहीं बुराई है कि नहीं। वो तो उनके अपने व्यक्तिगत संदर्भों पर निर्भर करता है। लेकिन जब भी कोई कहे कि सब कुछ सेल्फ है, तुरंत चौंकन्ने हो जाओ। क्योंकि हम उपनिषदों पर इतनी चर्चा कर चुके हैं, इतनी बार हम बोलते हैं कि हमेशा ये पूछा करो जो बात बोली जा रही है वो किसके लिए है, किसको संबोधित किया जा रहा है? यूँ ही थोड़े ही कभी कुछ बोल दिया जाता है।

तुम अगर कह रहे हो सब कुछ सेल्फ ही है, ठीक है। ये तुमने किससे बोल दिया? मैं ही बोलूँ; हाँ सब कुछ सत्य है, सत्य के अतिरिक्त किसी की सत्ता नहीं है, ठीक है? और यह बात मैंने बोल किस से दी? नितिन (प्रश्नकर्ता) से बोल दी। अब नितिन के लिए क्या है ये खंभा सेल्फ , सत्य? है नहीं, पर उसको यक़ीन दिला दिया कि है। तो वो प्रसन्न ही हो जाएगा। तो शुरुआत उससे करोगे न जिससे बातचीत हो रही है। उसकी हालत को ध्यान में रखते हुए उससे कोई बात कही जाएगी न। तुम तो पूरे तरीके से अहम् में बैठे हुए हो। और मैं तुम से बोलूँ कि नहीं तुम आत्मा हो। तुम क्या करोगे? तुम समझ लोगे कि अहम् ही आत्मा है। तुम यकीन करते हो अहम् पर और मैंने तुम्हें साथ-ही-साथ रटा दिया कि तुम सेल्फ हो, आत्मा हो। तो तुरंत तुमने क्या सीख लिया? अहम् ही तो आत्मा है फ़िर क्योंकि मैं अहम् हूँ। उन्होंने कहा, "मैं आत्मा हूँ" तो माने अहम् ही आत्मा है। ये चूक हो जाती है। और इसलिए ये जो निओअद्वेता (नव-अद्वैत) है या निओवेदांता (नव-वेदांत) है ये बहुत खतरनाक है। ये अहंकार को बहुत पोषण देता है।

प्र: लेकिन आचार्य जी पहली बार सुनते हैं तो एक बार सारा टकराव रुक जाता है। एक बार तो शांति मिलती ही है।

आचार्य: हाँ एक बार को मिल जाएगी। एक बार को तो शांति समोसा खाकर मिल जाती है। ये एक बार की शांति तो बहुत ख़तरनाक चीज़ होती है न।

प्र: तो जो हमारी एक धारणा है कि साधक को एकदम मितव्ययी होना चाहिए।

आचार्य: मितव्ययी का मतलब समझो न। मितव्ययी का क्या मतलब है? मितव्ययी का मतलब है उतना व्यय करो, उस दिशा में व्यय करो जिस दिशा में व्यय करने से जीवन सार्थक होता है। व्यय का क्या मतलब होता है? पैसा ही तो व्यय करोगे न? पैसा क्या होता है? पैसा तुम्हारे द्वारा संचित श्रम और बौद्धिकता होती है। तुमने मेहनत करी है, वो मेहनत समझ लो जैसे घनीभूत होकर एक मुद्रा का नोट बन गई है। और वो नोट तुमको दे दिया गया। वो नोट तुम्हें किसलिए मिला है? क्योंकि तुम चैतन्य हो और तुमने चैतन्य हो कर के श्रम करा है। तो उसमें तुम्हारा श्रम और तुम्हारी बुद्धिमता, तुम्हारी सृजनात्मकता सब शामिल हैं तो वो तुमको दे दिया गया है। अब सवाल यह है कि श्रम करना क्यों है? हमने इतनी बार इसकी चर्चा करी है कि आदमी अकेला है जो कर्म करता है। कर्म या श्रम करना क्यों है? क्यों करें? कोई ज़रूरत होगी तभी न करेंगे। तो क्या ज़रूरत है? ज़रूरत यही है कि हम बंधे हुए हैं, बेचैन हैं, परेशान हैं इसलिए श्रम करना है। तो व्यय का मतलब है श्रम और श्रम होना चाहिए बंधनों को काटने की दिशा में। माने व्यय भी होना चाहिए बंधनों को काटने की दिशा में। तो मितव्ययी होने का क्या मतलब है?

मितव्ययी होने का यही मतलब है कि कोई ऐसी किताब है जो तुम्हारे लिए बहुत उपयोगी है, जो तुम्हारी समझ को बढ़ाएगी, जो तुम्हारे कोहरे को काटेगी। और वो किताब छह-हज़ार रूपए की है तो तुम नहीं लोगे ये बोलकर कि, "मैं तो मितव्ययी हूँ"? और समोसा है वो चालीस रूपए का ही है तो तुम कहोगे, "मैं तो मैं मितव्ययी हूँ चालीस रूपए कर सकता हूँ न।" नहीं, मितव्ययी होने का मतलब है समोसा चालीस रूपए का हो तब भी नहीं लेना है और वो किताब छह-हज़ार रूपए की हो तब भी लेनी है। यह कोई ऐसी सीधी-साधी चीज़ नहीं है कि मितव्ययी होने का मतलब है जो चीज़ सस्ती हो वही उठा लो। "समोसा सस्ता था उठा लिया, किताब महँगी थी, नहीं उठाई।" ये वैसा मामला नहीं है। सम्यक व्यय करना है, सम्यक व्यय। सही दिशा में पैसा ख़र्च करो और गलत दिशा में एक रुपया भी खर्च नहीं करना है।

प्र: तो आचार्य जी शारीरिक सुरक्षा पर कितना ख़र्च करना चाहिए?

आचार्य: अगर तुम्हारी सबसे बड़ी बाधा तुम्हारा शरीर ही है तो शारीरिक सुरक्षा पर ख़र्च कर लो। लेकिन ईमानदारी से देख कर के, "क्या वाकई मेरी सबसे बड़ी तकलीफ़ मेरी शारीरिक सुरक्षा ही है?" अगर है तो कर लो उस पर ख़र्च। इनके कोई काले सफेद में दोहरे ज़वाब नहीं होते। हर व्यक्ति के लिए ज़रूरी होता है अपने शरीर की सुरक्षा के लिए कुछ श्रम करना। कोई ऐसा नहीं है जो नहीं करेगा। अवतार, महापुरुष वो भी बैठ करके भोजन जब करते हैं तो इसमें श्रम तो हो ही रहा है न? शारीरिक सुरक्षा के लिए ही तो किया जा रहा है। ये जो तुम खाना खा रहे हो शरीर को ही तो सुरक्षा देगा। तो श्रम तो सभी करेंगे। तुम यह थोड़े ही कह सकते हो कि शरीर की सुरक्षा के लिए बिलकुल श्रम नहीं करना है। करना है, सवाल उठता है कितना? वो रेखा कहाँ खींचनी है यही विवेक का नाम है। किस चीज़ को कितना देना है, कौन-सी चीज़ कितना पाने की अधिकारी है।

प्र: आचार्य जी जिसके पास संपत्ति होती है लेकिन वो सोचता है कि इधर-उधर न ख़र्च करें। पर कई लोग कहते हैं, "अरे इसके पास इतनी जायदाद है फ़िर भी कंजूस किस्म का है।"

आचार्य: लोगों को सोचने दो। ख़र्च करोगे तो लोग बोलेंगे, "देखो फ़िज़ूल खर्च है।" नहीं ख़र्च करोगे तो कहेंगे, "कंजूस है!" लोगों को देखकर थोड़े ही तुम ख़र्च करोगे। तुम्हें तो अपने विवेक से सोचना है कि, "किस दिशा में ये मेरा संचित धन, संचित श्रम जाना चाहिए और कहाँ नहीं जाना चाहिए। जहाँ जाना चाहिए वहाँ अगर दस-लाख भी जाना चाहिए तो जाएगा और जिधर नहीं जाना है उधर एक-रुपया भी नहीं जाने दूँगा।"

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