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निजता कहाँ से आती है?
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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वक्ता: शहंशाह का प्रश्न है कि इंडिविजुएलिटी व्यक्ति में आती कहाँ से है?

इंडिविजुएलिटी का अर्थ है निजता या अविभक्त्यता

ये व्यक्ति में आती कहाँ से है?

कहीं से नहीं आती, जो तुम हो ही वो तुम कहाँ से पाओगे?

लेकिन मैं तुम्हारी बात समझ रहा हूँ। जीवन में तुम सिर्फ़ उन चीज़ों को जानते हो जो तुमने कहीं से पायी हैं और तुम अपने आप को भी बस उन्हीं चीज़ों के सन्दर्भ में जानते हो जो तुमने कहीं से पाई हैं।

तुम अभी खड़े हुए, तुमने कहा “मैं शहंशाह हूँ“। अब निश्चित रूप से जिस क्षण तुम पैदा हुए थे तब शहंशाह नहीं थे, ये नाम तुमने कहीं से पाया और तुम अपने आप को सिर्फ़ उन्हीं सन्दर्भों में जानते हो जो तुमने कहीं से पाए हैं। तुम कहोगे कि तुम हिंदू हो या मुस्लिम हो, निश्चित रूप से ये धर्म भी तुमने कहीं से पाया है । तुम कहोगे कि मैं इतनी शैक्षणिक योग्यता रखे हुए हूँ, वो प्रमाण–पत्र भी तुमने कहीं से पाए, किसी और ने घोषणा की थी। तुम्हारे मन में जो कुछ भी है वो तुमने कहीं–न–कहीं से पाया ही है, धारण किया है, धारणायें ही हैं, मिला है तुम्हें। जो कुछ भी तुम्हारे पास ज़िन्दगी में है– नाम, इज्ज़त, शोहरत, कपड़े, किताबें, दौलत, ज्ञान– ये सब कुछ तुमको लगातार बाहर–ही–बाहर से मिला है।

तो मैं समझा इस बात को कि तुम्हें ये शक है कि निजता भी तुम्हें कहीं बाहर से मिल सकती है क्योंकि तुम्हें आज तक सब बाहर से ही मिला है| तो तुम्हारे मन में ये बात उठ रही है कि हो सकता है निजता भी कहीं बाहर से ही मिल जाये। ना, ऐसा नहीं हो पायेगा। वो तुम्हें कहीं बाहर से नहीं मिल पायेगी क्योंकि वो तुम्हारे पास है ही। सच तो ये है कि जो कुछ तुमको आज तक बाहर से मिला है, जब तुम ये जान लेते हो कि ये बाहरी है तो उसी जानने का नाम ‘निजता‘ है।

तुम्हारे मन में जो कुछ भी चल रहा है, मन के सभी विषय, ये सब बाहर से आया है। जानना चाहते हो क्या–क्या बाहर से आया है? तुम्हारे सारे उद्देश्य बाहर से आये हैं, तुम्हारे सारे डर बाहर से आये हैं, जीवन के बारे में तुम्हारे जितने विचार हैं वो सब बाहर से आये हैं। तुम में ऐसा कोई भी नहीं बैठा है जो रोज़ाना इन शब्दों का प्रयोग न करता हो– शिक्षा, व्यवसाय, पैसा, प्रेम, आनंद, मुक्ति, सत्य, वास्तविकता, समाज, परिवार। तुम रोज़ाना ही इनको प्रयोग करते हो पर इनके अर्थ तुम्हें कुछ मालूम नहीं क्योंकि इनके अर्थ तुमने सिर्फ़ बाहर से ले लिए हैं।

जो कुछ तुम बहुत आंतरिक समझते हो वो भी तुमने खुद नहीं पाया है, तुमने बाहर से ही ले लिया है, मन की एक-एक गतिविधि बाहरी है, यहाँ तक कि ये शरीर भी बाहरी है। इसकी पहली दो कोशिकाएँ माँ-बाप से आयीं और इसके बाद यही मिट्टी, यही धूप, यही हवा और यही पानी- उससे ये शरीर बन गया, सब बाहरी। जीवन में जो कुछ भी है, मन में, शरीर में, सब बाहरी है, तो इसी कारण तुम्हें लग रहा है कि शायद निजता भी कोई बाहरी चीज़ होगी। नहीं, निजता बाहरी चीज़ नहीं है।

जब बात होती है निजता की तो बस एक कोशिश है तुमको ये बताने की कि उसको जानो जो बाहरी नहीं है, जो तुम्हारा अपना है ही है । अब वो है तुम्हारी जानने की शक्ति, वो है तुम्हारा ध्यान, समझ वही है। उसके बिना कोई निजता संभव नहीं है । बिना समझ के निजता संभव नहीं है । कहीं से पानी नहीं है, बस जानना है और क्या जानना है, ये जानना है कि ये सब बाहरी है और भीतर सिर्फ़ मैं हूँ, मेरा साम्राज्य है, जहां मैं वास्तव में शहंशाह हूँ। वो जो भीतरी है, असली शहंशाह वो तुम हो, बाहर वाला नहीं जिसको बस एक नाम दे दिया गया है शहंशाह । निजता का अर्थ होता है, अपने मालिक हम खुद हैं क्योंकि हम जान सकते हैं, हम समझ सकते हैं, उस समझ पर कोई बेड़ियाँ नहीं डाल सकता- ये अर्थ होता है निजता का।

निजता का अर्थ है- ये जीवन है और ये ग़ुलामी के लिए नहीं है, कोई मुझसे धोखा नहीं कर पायेगा। जानते हो सबसे बड़ा धोखा क्या होता है? एक ग़ुलाम को ये बता देना कि तू आज़ाद है। अब वो कभी आज़ाद नहीं हो पायेगा क्योंकि उसने ग़ुलामी को ही आजादी समझ लिया है। निजता का अर्थ है -ग़ुलामी को ग़ुलामी जानना और इस जानने का ही नाम आज़ादी है । निजता का अर्थ है- *मैं समझूँ कि मैं सिर्फ़ समझ हूँ*। निजता का अर्थ है- मैं पूरी तरह देखूँ कि मैं जान सकता हूँ, कि जरूरी नहीं है कि जीवन उधार का हो , ये अर्थ है निजता का।

जो कुछ बाहरी है, उसको बस जानो कि वो बाहरी है।

इसका ये अर्थ नहीं है कि जो कुछ बाहरी है उसको छोड़ देना है, हटा देना है। बस जानना है ये बाहरी है जैसे कि एक अभिनेता जानता है कि वो जिस चरित्र को अभिनीत कर रहा है वो चरित्र बाहरी है। ठीक है, अभिनय करेंगे, संवाद बोलेंगे लेकिन जानते रहेंगे कि वो हम नहीं हैं, वो सिर्फ एक चरित्र है। हम हमारा चरित्र नहीं हैं, इसी का नाम निजता है कि हम-हम हैं । ठीक है, अभी एक मौका है तो वहाँ पर हम एक अभिनय कर रहे हैं, एक चरित्र में हैं लेकिन वो हम हो नहीं गए, वो बाहरी है, वो बाहर ही है।

निजता का अर्थ है अपने उस बिंदु को तलाश लेना जिसे कोई छू नहीं सकता, जहां सिर्फ तुम हो।

जैसे कि समझ लो एक चक्र का केंद्र, जहां पर सिर्फ तुम हो और बाकी जो पूरा क्षेत्र है वो भरा हुआ है दूसरों से, पर केंद्र में सिर्फ़ तुम हो, उसी का नाम है निजता, और उस ‘ तुम’ का नाम है समझ| उसको अहंकार मत बना लेना कि ‘सिर्फ़ हम’, कि तुम शहंशाह हो, राजा हो, मालिक हो।

उस केंद्र पर तुम कुछ नहीं हो, सिर्फ़ समझ हो, वहाँ पर तुम्हारी कोई पहचान नहीं है, कोई परिचय नहीं है, सिर्फ़ बोध है।

– ‘संवाद’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

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